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इंस्टाग्राम व यूट्यूब हमारी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को कर रहा है खत्म: अनूप चंद्रशेखरन

एक और जरूरी कदम यह होगा कि ऐसे कंटेंट क्रिएटर्स, जो बार-बार अश्लील या अनुचित सामग्री पोस्ट करते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि वे बार-बार नए अकाउंट न बना सकें।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 11 months ago

अनूप चंद्रशेखरन- COO (रीजनल कंटेंट), IN10 मीडिया नेटवर्क ।।

शाम का समय हो चला था। चेन्नई से ट्रेन में सफर करते हुए, मेरी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में थी जो फोन पर उत्साहपूर्वक अपनी पत्नी के यूट्यूब कुकरी चैनल के बारे में बात कर रहा था। वह अपने दोस्तों से इसे देखने और 'लाइक' बटन दबाने का आग्रह कर रहा था। उसकी पूरी बातचीत बस इसी विषय पर थी। तभी मुझे एहसास हुआ कि हमारी सोच कितनी बदल चुकी है। आज हर घर में एक स्टार है। अब हम दूसरों के काम के प्रशंसक बनने के बजाय खुद का फैनबेस बनाने में ज्यादा रुचि रखते हैं।

हाल ही में, मैं एक फिल्म के प्रीमियर में गया था, जहां कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी आमंत्रित थे। यह देखकर हैरानी हुई कि वे फिल्म का आनंद लेने के बजाय अपने फोन पर वीडियो देखते हुए स्क्रीन स्क्रॉल कर रहे थे। यही लोग बाद में इस फिल्म को प्रमोट करने वाले थे। पहले फिल्मों और टीवी शो को देखने के लिए धैर्य और संलग्नता की जरूरत होती थी, लेकिन आज के समय में यह मुश्किल हो गया है क्योंकि सब कुछ छोटे-छोटे हिस्सों में उपभोग करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। सोशल मीडिया, जो कभी दोस्तों से जुड़े रहने और हल्की-फुल्की ब्राउजिंग के लिए होता था, अब एक डिजिटल दलदल बन चुका है, जो हमारे समय, ध्यान और मनोरंजन को अनुभव करने के तरीके को भी लील रहा है।

यह लत असली है और मैंने इसे खुद महसूस किया है। कई बार मैं खुद को घंटों तक इंस्टाग्राम पर बेतहाशा स्क्रॉल करते हुए पाता हूं, फिर गुस्से में ऐप डिलीट कर देता हूं, यह सोचकर कि अब मैंने इस चक्र को तोड़ दिया है। लेकिन कुछ ही समय बाद, मैं इसे फिर से इंस्टॉल कर लेता हूं और उसी आदत में लौट आता हूं। यह अंतहीन चक्र न केवल मेरी उत्पादकता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि लंबे समय तक किसी एक चीज पर ध्यान केंद्रित करने की मेरी क्षमता को भी कमजोर कर रहा है। अब एक पूरी फिल्म देखना मनोरंजन से ज्यादा अनुशासन का कार्य लगने लगा है।

इंस्टाग्राम और यूट्यूब ने मनोरंजन को इस हद तक अपने कब्जे में ले लिया है कि अब वे धीरे-धीरे इस बात को बदल रहे हैं कि हम कहानी कहने की कला से कैसे जुड़ते हैं। एक अच्छी तरह से बनाई गई फिल्म या खूबसूरती से लिखी गई किताब की सराहना करने का आनंद अब व्यक्तिगत मान्यता पाने की लालसा से बदलता जा रहा है। हर कोई क्रिएटर, इन्फ्लुएंसर, या ट्रेंडसेटर बनना चाहता है, और इसी वजह से हम एक ऐसी समाज में बदल गए हैं जो वास्तविक कलात्मक प्रतिभा की सराहना करने के बजाय आत्म-प्रचार में डूबा हुआ है। अगर कोई वीडियो कुछ सेकंड में ध्यान आकर्षित नहीं कर पाता, तो उसे तुरंत स्क्रॉल करके भुला दिया जाता है।

इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर अंतहीन स्क्रॉलिंग हमें उत्पादकता का भ्रम देती है, जबकि वास्तव में यह केवल मानसिक थकान को बढ़ाती है। सूचनाओं की यह अंतहीन धारा, तुलना और विचलन, चिंता, तनाव और यहां तक कि अवसाद को भी बढ़ावा देती है। शारीरिक रूप से भी इसके गंभीर प्रभाव होते हैं। लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठे रहने से मोटापा, आंखों पर दबाव, नींद की गड़बड़ी और एक निष्क्रिय जीवनशैली को बढ़ावा मिलता है, जो धीरे-धीरे एक सामान्य आदत बनती जा रही है।

व्यक्तिगत भलाई से परे, सोशल मीडिया मनोरंजन उद्योग की मूलभूत संरचना को भी बदल रहा है। अब असली कहानी कहने की जगह केवल व्यूज और एंगेजमेंट के लिए बनाए गए कंटेंट को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रामाणिकता (authenticity) की जगह सनसनीखेज चीजों (sensationalism) ने ले ली है, जहां क्रिएटर अब कंटेंट की गहराई पर ध्यान देने के बजाय शॉक वैल्यू और विवाद पैदा करने के पीछे भाग रहे हैं। बिना किसी वास्तविक कलात्मक पृष्ठभूमि के डिजिटल इन्फ्लुएंसर केवल ट्रेंड्स पर कूदकर भारी संख्या में फॉलोअर्स बना लेते हैं, जबकि गंभीर फिल्म निर्माताओं, संगीतकारों और लेखकों को पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जो फिल्में और टेलीविजन शो कभी सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण हुआ करते थे, वे अब वायरल क्लिप्स और मीम-योग्य (meme-worthy) पलों के पीछे दब गए हैं। पारंपरिक मनोरंजन उद्योग को अब सोशल मीडिया की त्वरित गति से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है, और कई मामलों में वह इस दौड़ में पिछड़ रहा है।

यह एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है: यह सब आखिर हमें कहां ले जा रहा है? अब निजता जैसी कोई चीज बची ही नहीं है। रोजमर्रा की गतिविधियां—जैसे सुबह उठना, ब्रश करना और नाश्ता बनाना—इन्फ्लुएंसर्स के व्लॉग्स का हिस्सा बन चुके हैं। पारिवारिक झगड़े और घरेलू नाटक भी स्क्रिप्टेड टीवी सीरियल्स की तरह फिल्माए और एडिट किए जाते हैं ताकि वे ऑनलाइन लोकप्रियता हासिल कर सकें। यह सब बेहद थकाने वाला और उबाऊ हो गया है।

सोशल मीडिया के प्रभाव को सीमित करने के लिए कुछ न कुछ किया जाना चाहिए, इससे पहले कि यह पूरी तरह से हमारे जीवन पर हावी हो जाए। डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) उपायों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, और लोगों को यह जागरूक करना जरूरी है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव डालता है। सरकारों और टेक कंपनियों को यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि वे अपने प्लेटफॉर्म को इस तरह से डिजाइन करें कि वे लोगों में लत जैसी आदतों को बढ़ावा न दें। पारंपरिक मनोरंजन के तरीकों को पुनर्जीवित और समर्थन दिया जाना चाहिए, ताकि लोग एक बार फिर फिल्मों, किताबों या संगीत के माध्यम से लंबे फॉर्मेट की कहानी कहने का आनंद ले सकें।

बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सोशल मीडिया मनोरंजन के लिए क्या कर रहा है, बल्कि यह भी है कि यह हमें व्यक्तिगत के रूप में कैसे प्रभावित कर रहा है। इस संकट का एक संभावित समाधान सोशल मीडिया के उद्देश्य को ही फिर से परिभाषित करना हो सकता है। वायरल मनोरंजन और सतही जुड़ाव पर पनपने वाले प्लेटफॉर्म बनने के बजाय यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म को ऐसे कंटेंट को प्राथमिकता देना चाहिए जो समाज को शिक्षित करे, प्रेरित करे और उसे आगे बढ़ाए। ऐसे वीडियो, जो ज्ञान, आत्म-सुधार, आध्यात्मिकता और सार्थक चर्चाओं को बढ़ावा देते हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जबकि वह मनोरंजन-केंद्रित सामग्री, जो ध्यान भटकाती है, लत को बढ़ावा देती है और एकाग्रता को कम करती है, उसे प्रतिबंधित या कड़े नियमन के अधीन किया जाना चाहिए। इस तरह, ये प्लेटफॉर्म एक उच्च उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं, बजाय इसके कि वे रचनात्मकता, फोकस और सांस्कृतिक प्रशंसा में गिरावट लाने में योगदान दें।

एक और जरूरी कदम यह होगा कि ऐसे कंटेंट क्रिएटर्स, जो बार-बार अश्लील या अनुचित सामग्री पोस्ट करते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि वे बार-बार नए अकाउंट न बना सकें। सेंसरशिप दिशानिर्देशों को इस तरह बदला जाना चाहिए कि स्पष्ट रूप से हानिकारक और अनुचित सामग्री पूरी तरह समाप्त हो सके। पिछले साल, भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (Advertising Standards Council of India) ने इन्फ्लुएंसर्स के लिए एक स्व-नियामक दिशानिर्देश जारी किया था, जिसमें डिस्क्लेमर और जानकारी प्रकट करना अनिवार्य किया गया था। इसी तरह, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (Securities and Exchange Board of India) ने वित्तीय उत्पादों को बढ़ावा देने वाले इन्फ्लुएंसर्स के लिए नियम बनाए हैं। अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन (Federal Trade Commission), यूनाइटेड किंगडम के विज्ञापन मानक प्राधिकरण (Advertising Standards Authority) और प्रतियोगिता और बाजार प्राधिकरण (Competition and Markets Authority) जैसे संस्थानों ने ब्रांड इन्फ्लुएंसर्स के लिए ईमानदारी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नियम लागू किए हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना, दंड और कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

अब समय आ गया है कि हम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ अपने संबंधों पर फिर से विचार करें। हम पहले ही मशीनों से ज्यादा जुड़े हुए हैं बजाय वास्तविक लोगों के। हमेशा ऑनलाइन, हमेशा कुछ न कुछ उपभोग करते हुए, जैसे कि हम प्रोग्राम किए गए रोबोट हों। पूरी तरह से डिजिटल दुनिया से खुद को अलग कर पाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, लेकिन अगर हम अपने डिजिटल उपभोग को नियंत्रित करें और यह सुनिश्चित करें कि सामग्री का कोई सार्थक उद्देश्य हो, तो हम एक बेहतर और अधिक संतुलित भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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