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एफबीआई में ट्रम्प पटेल के वर्चस्व से भारत के हितों की उम्मीदें: आलोक मेहता

वैसे उस समय भी एफबीआई ने भारतीय मूल के 139 लोगों को संस्थान के निचले विभिन्न पदों पर एजेंट की तरह रख लिया था। लेकिन जल्द ही स्थिति बदली।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 11 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

आपने एक मशहूर फ़िल्मी गीत सुना होगा, 'अनहोनी को होनी कर दे , होनी को अनहोनी' यह गीत अब विश्व राजनीति में मोदी ट्रम्प की जोड़ी के बढ़ते क़दमों से चरितार्थ हो रहा है। कई घोषणाओं से कुछ चमत्कार जैसा अहसास होता है। इसे कृपया सत्ता के प्रति खास लगाव या अतिशयोक्ति न मानें। तीस साल पहले क्या कल्पना की जा सकती थी कि अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण गुप्तचर तंत्र में दो हिन्दू और भारतीय छाप का महत्व हो जाएगा। मुझे सितम्बर 1987 में वाशिंगटन स्थित एफबीआई के दफ्तर में वरिष्ठ अधिकारी रिचर्ड स्वेन और अन्य अधिकारीयों से हुई मुलाकात और जाँच एजेंसी के कामकाज को समझने के अवसर की याद आती है।

सत्तर अस्सी के दशक में हमारी सरकार ही नहीं मीडिया में भी दोनों देशों के बीच तनाव की चर्चा अधिक होती थी। फिर भी एफबीआई के कामकाज से भारतीय जांच एजेंसियों को कुछ सीखने समझने की गुंजाइश थी। मजेदार बात यह थी कि तब से अब तक एफबीआई के प्रमुख यह स्वीकारते हैं कि अमेरिका में अपराध निरंतर बढ़ रहे हैं। दूसरी दिलचस्प बात यह कि 27 अक्टूबर 1999 को हमने 'दैनिक हिंदुस्तान' में अपने युवा सहयोगी पुष्परंजन की एक खबर एफबीआई का एक छोटा दफ्तर दिल्ली में खोलने के प्रयासों की खबर छापी तो अमेरिकी दूतावास ने खंडन करने का पत्र संपादक के नाते मुझे भेजा।

हमारे पास भारतीय सूत्रों से यह सूचना पक्की थी, इसलिए हमने पत्र को सामान्य खानापूर्ति मानकर खंडन प्रकाशित नहीं किया। वैसे उस समय भी एफ बी आई ने भारतीय मूल के 139 लोगों को संस्थान के निचले विभिन्न पदों पर एजेंट की तरह रख लिया था लेकिन जल्द ही स्त्थितियाँ बदली। 2001 में 9 /11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका को भारत के अधिक सहयोग की मज़बूरी आई तो औपचारिक रुप से नई दिल्ली में एफ बी आई के दो वरिष्ठ अधिकारी रखे जाने की जानकारी सार्वजनिक की गई। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने दिसम्बर 2001 में संसद में इसका विस्तृत विवरण दिया। मतलब संबंधों के दरवाजे खुले।

बहरहाल अब भी सीआईए और डीप स्टेट से भारत विरोधी गतिविधियों के खतरे भारत सरकार समझती है। अब 25 साल बाद न केवल एफबीआई ,बल्कि अमेरिकी नेशनल इंटेलिजेन्स के प्रमुख निदेशक पदों पर काश पटेल और तुलसी गबार्ड की नियुक्तियां हो गई हैं। अमेरिकी सैन्य अधिकारी और हवाई से पूर्व डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि तुलसी गबार्ड अमेरिकी खुफिया विभाग प्रमुख बनी हैं। वह यह जिम्मेदारी संभालने वाली पहली हिंदू हैं। तुलसी गबार्ड अमेरिकी कांग्रेस में पहली हिंदू नेता रही हैं।

तुलसी गबार्ड अमेरिका की 18 खुफिया एजेंसियों की देखरेख करते हुए अमेरिकी खुफिया समुदाय का नेतृत्व करेंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अमेरिका यात्रा के दौरान तुलसी गबार्ड से भी मुलाकात की। अपनी बैठक के दौरान श्री मोदी ने गबार्ड के साथ अपनी पिछली बातचीत को याद किया और उन्हें उनकी नई भूमिका के लिए बधाई दी। पीएम मोदी ने एक्स पर इस मुलाकात की तस्वीरें साझा कीं और लिखा, वॉशिंगटन डीसी में यूएसए की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गबार्ड से मुलाकात की। उनकी पुष्टि पर उन्हें बधाई दी। भारत-यूएसए मित्रता के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की, जिसकी वे हमेशा से प्रबल समर्थक रही हैं।

उनकी चर्चा विशेष रूप से आतंकवाद से निपटने, साइबर सुरक्षा, उभरते खतरों और रणनीतिक खुफिया जानकारी साझा करने में द्विपक्षीय खुफिया सहयोग को मजबूत करने पर केंद्रित रहीं। उन्होंने क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया तथा सुरक्षित, स्थिर और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की।

इसी तरह काश पटेल अमेरिकी सीनेट द्वारा मंजूरी पाने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी एफबीआई निदेशक बने हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संघीय जांच ब्यूरो के नौवें निदेशक के रूप में काश पटेल की पुष्टि करने के लिए आधिकारिक सूचना पर हस्ताक्षर किए हैं। व्हाइट हाउस ने कहा है कि एफबीआई निदेशक के रूप में काश पटेल की पुष्टि अखंडता को बहाल करने और कानून के शासन को बनाए रखने के राष्ट्रपति ट्रम्प के एजेंडे को क्रियान्वित करने में एक महत्वपूर्ण कदम है। एफबीआई अमेरिकी लोगों की सेवा करेगी और अपने मुख्य मिशन पर फिर से ध्यान केंद्रित करेगी।

काश पटेल ट्रंप के एक वफादार समर्थक माने जाते हैं और उन्होंने उनके पहले कार्यकाल में भी अहम भूमिका निभाई थी। पटेल ने अमेरिकी सरकार के भीतर "डीप स्टेट" के रूप में वर्णित तंत्र को खत्म करने की सक्रिय रूप से वकालत की है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि काश पटेल से मुझे प्यार है। मैं उन्हें इस पद पर इसलिए रखना चाहता हूं, क्योंकि एजेंट उनका बहुत सम्मान करते हैं। ट्रंप ने कहा कि काश पटेल एफबीआई निदेशक के पद पर अब तक के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में जाने जाएंगे। वे सख्त और मजबूत व्यक्ति हैं।

काश पटेल का जन्म न्यूयॉर्क में एक गुजराती अप्रवासी परिवार में हुआ था, जो कि पूर्वी अफ्रीका से 1980 में न्यूयॉर्क के क्वींस में आकर बस गए थे। हालांकि, माता-पिता माता-पिता यूगांडा में रहते थे।पटेल ने वरिष्ठ वकील के रूप में भी काम किया है। श्री पटेल ने नियुक्ति से पहले अपने माता-पिता के पैर छुए, जो हिंदू संस्कृति में सम्मान का पारंपरिक संकेत है। उन्होंने सीनेट न्यायपालिका समिति के समक्ष अपने माता-पिता का परिचय देने के बाद उन्हें 'जय श्री कृष्ण' कहकर अभिवादन भी किया।


फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) वास्तव में अमेरिका के न्याय विभाग के अधीन एक जांच एजेंसी है, जो संघीय आपराधिक जांच निकाय और आंतरिक खुफिया एजेंसी, दोनों ही रूपों में काम करती है. संघीय अपराध की 200 से अधिक कैटेगरी में जांच का अधिकार एफबीआई के पास है | अमेरिका को आतंकवादी हमलों से बचाना इसकी पहली प्राथमिकता है। बताया गया है कि एफबीआई अपने सहयोगियों के साथ मिलकर अमेरिका में आतंकी समूहों को न्यूट्रलाइज करती है और वैश्विक स्तर पर कट्टरपथियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने में सहायता करती है।

इसके अलावा आतंकवादी संगठनों को मिलने वाली फंडिंग और अन्य समर्थन को खत्म करने की कोशिश करती है। यह देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों को साइबर क्राइम से बचाती है। एफबीआई ऐसी साइबर रणनीति बनाती है, जिससे साइबर रिस्क का सामना किया जा सके। इसके जरिए अमेरिकी नेटवर्क में सेंध लगाने वालों, आर्थिक और बौद्धिक संपदा की चोरी पर लगाम कसती है। ऐसा करने के लिए एफबीआई अलग-अलग अथॉरिटी, क्षमताओं और पार्टनरशिप का इस्तेमाल करती है।

साइबर हमलों की जांच करने के लिए एफबीआई अग्रणी एजेंसी के रूप में काम करती है। यह इंटेलीजेंस जुटाती और सहयोगियों के साथ साझा करती है। पीड़ितों के साथ मिलकर गलत साइबर गतिविधियों में जुटे लोगों का खुलासा करती है। हाल ही में गुरुग्राम में उसके सहयोग से भारतीय एजेंसियों ने साइबर अपराध के बड़े गैंग के 32 लोगों को गिरफ्तार किया है। अमेरिका में जासूसी गतिविधियों का खुलासा करना, रोकना और जांच करना भी एफबीआई के जिम्मे ही है।

आधुनिक समय में ज्यादातर जासूसी गतिविधियां डाटा चोरी पर आधारित होती हैं। इनके लिए कम्प्यूटर नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है। अपने देश की एडवांस टेक्नोलॉजी और रक्षा, खुफिया, आर्थिक, जन स्वास्थ्य, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र की सेंसिटिव इनफॉर्मेशन को सुरक्षा प्रदान करती है। विदेशी जासूसों की गतिविधियों पर लगाम कसती है। जनसंहार वाले हथियारों को गलत हाथों में जाने से रोकती है। आर्थिक जासूसी के कारण हर साल अमेरिका की अर्थव्यवस्था को सैकड़ों बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है, जिससे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।

विदेशी प्रतिद्वंद्वी अत्याधुनिक तकनीकी आर्थिक इंटेलीजेंस और सफल अमेरिकी उद्योगों को निशाना बनाती हैं। एफबीआई इन्हें रोकने के लिए हर संभव कदम उठाती है। इनके अलावा एफबीआई सार्वजनिक दंगों, भ्रष्टाचार, व्हाइट कॉलर क्राइम, हिंसा, संगठनात्मक अपराध और पर्यावरण से जुड़े अपराधों पर भी लगाम लगाती है। इस पृष्ठभूमि में खालिस्तानी और नक्सल आतंकवादियों से निपटने, ड्रग्स की तस्करी और आर्थिक अपराधों, राजनीतिक गड़बड़ियों, एन जी ओ की आड़ में सामाजिक या मीडिया के छद्म रुप में अराजकता फ़ैलाने वालों पर अंकुश के लिए अमेरिकी और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों में सहयोग की उम्मीदें अधिक बढ़ गई हैं।

भारत ने एफबीआइ से उन संदिग्ध व्यक्तियों के बारे में जानकारी साझा करने का भी अनुरोध किया है, जिन्हें हाल के वर्षों में अलगाववादी गतिविधियों में लिप्त पाया गया है। इस बीच ट्रंप प्रशासन में एलन मस्क के नेतृत्व वाले डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी ने खुलासा किया है कि यू एस एड से भारत के चुनावों में वोटर टर्नआउट बढ़ाने के लिए 21 मिलियन डॉलर की फंडिंग हुई थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने इस विवाद को और तेज कर दिया है। ट्रंप ने कहा कि इस फंडिंग से भारत में किसी और को चुनाव जिताने के लिए 21 मिलियन डॉलर दिए गए।

अब इस दावे पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, हमने अमेरिकी प्रशासन द्वारा जारी जानकारी देखी है, जो बेहद चिंताजनक है। इससे भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप को लेकर गंभीर चिंता पैदा हुई है और इस मामले की जांच की जा रही है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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