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'चंदन' से जुड़ी इन बातों को याद कर भावुक हुए इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा

मेरे जहन में चंदन मित्रा को लेकर जो पहली याद है वह कॉलेज के एक टॉपर के तौर पर है, जो हमेशा अपनी किताबों के साथ नजर आते थे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व राज्यसभा सदस्य चंदन मित्रा का बुधवार (1 सितंबर 2021) की देर रात दिल्ली में निधन हो गया था। करीब 65 वर्षीय चंदन मित्रा कुछ समय से बीमार चल रहे थे। चंदन मित्रा ‘द पायनियर’ (The Pioneer) के संपादक भी थे, लेकिन इस साल जून में उन्होंने इस अखबार के प्रिंटर और पब्लिशर के पद से इस्तीफा दे दिया था। चंदन मित्रा दो बार राज्यसभा सदस्य रहे थे। पहली बार वह अगस्त 2003 से अगस्त 2009 तक राज्यसभा सदस्य रहे, फिर भारतीय जनता पार्टी ने 2010 में उन्हें मध्यप्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनाया था। इसके बाद वर्ष 2018 में चंदन मित्रा ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC) जॉइन कर ली थी।

चंदन मित्रा के निधन पर इंडिया टीवी के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा ने दुख जताया और उनसे जुड़ी कुछ यादें ताजा कीं, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं-

मेरे जहन में चंदन मित्रा को लेकर जो पहली याद है वह कॉलेज के एक टॉपर के तौर पर है, जो हमेशा अपनी किताबों के साथ नजर आते थे। कॉलेज के दिनों में, वह हर विषय का बहुत गहराई से अध्ययन करते थे और उनका ज्ञान अकसर मुझे हैरत में डाल देता था। उन्हें तमाम विषयों पर बात करते हुए सुनना हमेशा अच्छा लगता था।

चंदन की पढ़ाई का तरीका अनोखा था। वह ज्यादातर दिल्ली विश्वविद्यालय में ऊपर कॉफी हाउस के एक कोने में किताबों का ढेर, एक कप ब्लैक कॉफी और कंपनी की सिगरेट के साथ बैठते थे। मैं सोचता था कि इतने शोर-शराबे वाली जगह पर कोई कैसे पढ़ सकता है, लेकिन चंदन मित्रा करते थे।

उनकी हमेशा से राजनीति में रुचि थी। मैं भी छात्र राजनीति में इसलिए आया क्योंकि अरुण जेटली से मेरी दोस्ती थी, जो उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) के अध्यक्ष थे। चंदन सेंट स्टीफंस कॉलेज के छात्र थे, जो दिल्ली विश्वविद्यालय से एफिलेटेड नहीं था। लेकिन फिर भी हम मिलते और राजनीति पर चर्चा करते थे। उन दिनों जयप्रकाश नारायण छात्र आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे थे और पूरे देश में कांग्रेस विरोधी लहर थी। चंदन सरकार की तानाशाही की आलोचना करने में बहुत मुखर थे। चंदन के साथ, हम अकसर उनके स्कूल के दोस्त स्वप्रसाद गुप्ता से भी मिलते थे। दोनों ही इतिहास के अच्छे जानकार थे और मेरे लिए तो दोनों ही ज्ञान के भंडार थे। समय के साथ, हमारी दोस्ती और मजबूत होती गयी, लेकिन हमारी दोस्ती कैसे शुरू हुई इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प कहानी है।

सेंट स्टीफंस में चंदन का एक दोस्त मिरांडा हाउस कॉलेज की एक लड़की से प्यार करता था। लड़की राजस्थानी राजपूत और लड़का बंगाली ब्राह्मण था। लड़की का भाई, जो हिंदू कॉलेज का छात्र था। वह इस रिश्ते के खिलाफ था। उसने उस बंगाली लड़के को अपनी बहन को न देखने की धमकी दी थी। लेकिन जब वह लड़का नहीं माना, तो उसका भाई अपने राजपूत दोस्तों के साथ एक दिन उसके हॉस्टल में घुस आए और कमरे में खूब तोड़फोड़ की और लड़की से दूर रहने की धमकी दी। इससे चंदन को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने यह बात मुझे बतायी, तो मैंने कहा कि चिंता मत करो हम भी देख लेंगे। उसी शाम, मैं भी कई लड़कों के साथ हिंदू कॉलेज गया और उन लड़कों को हिदायत दी और उस लड़की के भाई को फिर कभी धमकी न देने की बात कही। यही वह घटना थी, जिससे वास्तव में हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई थी।

एक और दिलचस्प बात थी, जो हम दोनों की दोस्ती की वजह बनी, वह थी हिंदी फिल्मी गानें सुनने को लेकर हमारा शौक। चंदन हिंदी फिल्मी गानों का भंडार थे! हम एक साथ काफी समय बिताते थे और इससे हमारी दोस्ती और मजबूत होती गयी। मैं अकसर उसे 'तुम चंदन, मैं पानी' कहकर चिढ़ाता था।

लेकिन फिर समय बदल गया और 1977 में आपातकाल घोषित कर दिया गया। मुझे और अरुण जेटली को जेल भेज दिया गया। इस वजह से हम बाहरी दुनिया से कट गए। जब हम बाहर निकले तो डर का माहौल था और हम ज्यादा एक्टिव नहीं थे। तब चुनावों की घोषणा हुई और चंदन बहुत उत्साहित थे। उन्होंने जनता पार्टी के लिए बहुत मेहनत की। उनका जुनून काबिले तारीफ था। वह घर-घर जाकर लोगों से जनता पार्टी को वोट देने की अपील करते थे।

इसके बाद चंदन एक पत्रकार बन गए और अखबारों में काम करने लगे। लेकिन फिर भी हम अकसर मिलते थे और देश से जुड़े मुद्दों पर बात करते थे। वह, हमेशा की तरह, इन सभी विषयों की बहुत गहरी समझ रखते थे। अरुण जेटली तब हम दोनों के एक कॉमन फ्रैंड थे और तब तक वह एक प्रसिद्ध अधिवक्ता बन गए थे और राजनीति में भी सक्रिय रूप से शामिल हो थे। धीरे-धीरे चंदन का भी झुकाव पत्रकारिता से ज्यादा राजनीति की ओर होने लगा था। जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में आयी, तो अरुण जेटली ने उन्हें राज्यसभा भेजा। वह 10 साल तक उच्च सदन के सदस्य रहे, इस दौरान उन्होंने ‘द पॉयनियर’ को खरीदा और पत्रकारिता में वह एक सम्मानित नाम बन गए।

इस बीच, मैंने भी टेलीविजन पत्रकारिता में प्रवेश किया। हम दोनों तब अपने-अपने काम में बहुत व्यस्त हो गए थे और पहले की तरह नहीं मिल सकते थे। लेकिन मैं स्वप्रसाद से अकसर उनका हालचाल पूछता रहता था। जब भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में तीसरे कार्यकाल के लिए नामित नहीं किया, तो इससे चंदन बहुत परेशान थे। इसलिए वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

दो साल पहले, मुझे पता चला कि उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। मैं उनसे मिलना चाहता था, लेकिन नहीं कर सका क्योंकि कोविड महामारी ने बाहर जाना प्रतिबंधित कर दिया था। मुझे हमेशा इस बात का अफसोस रहेगा कि जब वह अस्वस्थ थे, तो एक बार भी उन्हें नहीं देख पाया। लेकिन दोस्तों की बातचीत में वह हमेशा याद रहेंगे। पत्रकारिता की दुनिया उन्हें उनके योगदान के लिए हमेशा याद करेगी। भारतीय राजनीति में उन्होंने जो शून्य छोड़ा है, वह हमेशा महसूस किया जाएगा।

 


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