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सिर्फ अपनी राष्ट्रीय पहचान के लिए काम करना होगा: नीरज बधवार

अगर अब भी हमने यह बात नहीं समझी, तो हालात यही रहेंगे कि एक के बाँह मरोड़ने पर दूसरे की गोद में जाना पड़ेगा, और दूसरे के धोखे के डर से तीसरे का हाथ पकड़ना पड़ेगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago

नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान जिस तरह किम जोंग, पुतिन और जिनपिंग हाथ पकड़कर चल रहे थे, वो तस्वीरें पूरी दुनिया ने देखीं। वो तस्वीर साम्यवादी (कम्युनिस्ट) देशों की एकता की प्रतीक थीं। यूरोपीय देशों के पास नाटो (NATO) की सुरक्षा है। मुस्लिम देशों में भले ही ईरान-सऊदी अरब और तुर्की के बीच प्रभुत्व की लड़ाई है, लेकिन वहाँ मुस्लिम ब्रदरहुड (इस्लामी भाईचारा) का तत्व भी काम करता है।

अब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा समझौता हुआ है, तो यह भी लग रहा है कि मुस्लिम देश भी नाटो जैसा कोई संगठन बना सकते हैं। सवाल यह है कि इस सबके बीच भारत कहाँ खड़ा है? न तो हम साम्यवाद की तरह वैचारिक स्तर पर किसी के स्वाभाविक दोस्त बन सकते हैं, न हमारे पास कोई भाईचारे का फैक्टर है, और न ही हम सैन्य तौर पर पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं।

ऊपर से, हमारा सबसे बड़ा हथियार-आपूर्तिकर्ता (रूस) आज हमारे सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी (चीन) के साथ असीमित मित्रता (Limitless Friendship) की कसमें खा रहा है। और हमारे "ढाई दुश्मनों" में से "आधा" हमारे ही घर के भीतर मौजूद है। ऐसा नहीं है कि इस पूरी स्थिति के लिए केवल हमारी ही गलती ज़िम्मेदार है।

इंसानों की तरह कभी-कभी राष्ट्रों का चरित्र भी (जैसे गुटनिरपेक्ष नीति - Non Alignment Policy) उन्हें अकेला कर देता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम सब पहचान से ऊपर उठकर सिर्फ अपनी राष्ट्रीय पहचान के लिए काम करें — न राज्य, न जाति, न धर्म; सिर्फ और सिर्फ एक भारतीय पहचान।

अगर अब भी हमने यह बात नहीं समझी, तो हालात यही रहेंगे कि एक के बाँह मरोड़ने पर दूसरे की गोद में जाना पड़ेगा, और दूसरे के धोखे के डर से तीसरे का हाथ पकड़ना पड़ेगा। हमारी हस्ती मिटेगी नहीं, लेकिन अगर उसका दायरा सिकुड़ता जा रहा है, तो इसकी कोई न कोई वजह ज़रूर रही होगी।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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