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रक्षा के क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग: रजत शर्मा
आजादी के बाद 60-65 साल तक किसी ने नहीं सोचा कि हम अपने देश में हथियार बनाएं। सारा ध्यान करोड़ों रुपये के हथियारों के आयात पर होता था। हर रक्षा सौदे में दलाली खाए जाने की खबरें आती थीं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 4 months ago
रजत शर्मा, इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ।
भारत की सुरक्षा को लेकर कई बड़े खुलासे हुए। पहली खबर ये कि डीआरडीओ (DRDO) ने गुरुवार को अग्नि प्राइम मिसाइल का परीक्षण किया जो रेल की पटरियों से दागी जा सकती है। अग्नि प्राइम 2000 किलोमीटर की दूरी तक प्रहार कर सकती है। पाकिस्तान का कोना-कोना इसकी मार के दायरे में है। दूसरी खबर, भारत और रूस मिलकर हमारे देश में ही सुखोई-57 लड़ाकू विमान बनाएंगे। ये पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान दुनिया के सबसे खतरनाक विमानों में से एक हैं।
तीसरी खबर है कि भारत और रूस मिलकर दुनिया की सबसे अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली एस-500 भारत में ही बनाएंगे। यह वायु रक्षा प्रणाली भारतीय वायुसेना का 'सुदर्शन चक्र' होगी जिसे कोई भेद नहीं पाएगा। चौथी खबर ये कि हमारे देश में बने तेजस लड़ाकू विमान तैयार हैं। रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के साथ तेजस विमान बनाने के लिए 62 हज़ार 370 करोड़ रुपये का समझौता किया है।
पाँचवीं खबर ये कि अमेठी की फैक्ट्री में भारत और रूस मिलकर एके-203 रायफलें बनाना शुरू कर चुके हैं। 'शेर' नाम की यह रायफल इस साल के अंत तक पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बनेगी। यह दुनिया की सबसे अत्याधुनिक रायफल है जिसकी तकनीक रूस ने भारत को हस्तांतरित की है।
अग्नि प्राइम मिसाइल को भारत में कहीं भी ले जाया जा सकता है, जहाँ रेल लाइन है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुवाहाटी से गुजरात तक फैला रेलवे का विशाल नेटवर्क अब अग्नि बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए न तो प्रक्षेपक यंत्रों को ज़मीन के नीचे छुपाने की ज़रूरत रहेगी, न ही तुरंत प्रक्षेपण मंच तैयार करना होगा।
रेलवे प्लेटफॉर्म से बैलिस्टिक मिसाइल दागने की क्षमता फिलहाल केवल रूस, चीन और अमेरिका के पास मौजूद है। उत्तर कोरिया भी बैलिस्टिक मिसाइल को रेलवे मोबाइल प्लेटफॉर्म से दागने की कोशिश कर रहा है।
रेलवे प्लेटफॉर्म से मिसाइल दागने की क्षमता क्यों महत्वपूर्ण है, इसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ। इस साल जून में जब ईरान और इज़रायल के बीच 12 दिनों का युद्ध हुआ था, तब इज़रायल की वायुसेना बार-बार ईरान के मिसाइल प्रक्षेपक यंत्रों को निशाना बना रही थी।
जब भी ईरानी सेना इन्हें खुले में लाती, तब तक इज़रायल की वायुसेना उपग्रह से उनकी स्थिति का पता लगाकर हवाई हमले में तबाह कर देती थी। इसी वजह से ईरान को अपनी मिसाइलों और प्रक्षेपक यंत्रों का ठिकाना बार-बार बदलना पड़ रहा था। लंबी दूरी की मिसाइलें होने के बावजूद ईरान इज़रायल को बड़ा नुकसान नहीं पहुँचा पाया।
अब भारत के पास 2000 किलोमीटर रेंज वाली अग्नि प्राइम मिसाइल है जो परमाणु बम ले जा सकती है और इस मिसाइल को कहीं से भी दागा जा सकता है। इसलिए अग्नि प्राइम अब और भी घातक हो गई है। दिल्ली से पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय रावलपिंडी और उसकी वायुसेना का सबसे बड़ा अड्डा नूर ख़ान सिर्फ़ साढ़े सात सौ किलोमीटर दूर है। ऐसे में भारत पटना में रेलवे की पटरी से भी रावलपिंडी, लाहौर और इस्लामाबाद को अग्नि प्राइम से निशाना बना सकता है।
भारत जल्द ही रूस के साथ सुखोई-57 लड़ाकू विमानों के साझा उत्पादन के लिए समझौता कर सकता है। सुखोई-57 पाँचवीं पीढ़ी का 'स्टील्थ' लड़ाकू विमान है। यह राडार की पकड़ में नहीं आता। जब अमेरिका ने भारत को एफ-35 लड़ाकू विमान बेचने का प्रस्ताव दिया था, उसके बाद ही रूस ने भारत को सुखोई-57 के संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव दिया था।
सुखोई-57 के साथ ही रूस ने अपने एस-70बी युद्धक ड्रोन के संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव दिया है। रूस की सुखोई कंपनी इस ड्रोन को सुखोई-57 विमान के साथ आक्रमण के लिए विकसित कर रही है। यह ड्रोन दुश्मन के राडार और वायु रक्षा पर हमला करेगा और विमान दुश्मन के ठिकानों को तबाह करेगा। रूस चाहता है कि सुखोई-57 के अलावा भारत रूस की नवीनतम वायु रक्षा प्रणाली एस-500 का भी संयुक्त उत्पादन करे।
एस-500 प्रोमेथियस दुनिया की सबसे अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों में से एक है। यह प्रणाली दुश्मन की बैलिस्टिक और अतितीव्र गति (हाइपरसोनिक) मिसाइलों को भी हवा में ही नष्ट कर सकती है। रूस ने एस-500 को क्रीमिया में यूक्रेन के खिलाफ़ तैनात किया है। एस-500 इतना शक्तिशाली है कि यह दुश्मन के 'स्टील्थ' विमानों और निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में घूम रहे उपग्रहों तक को गिरा सकता है।
दिसंबर में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आएंगे। उम्मीद है उसी दौरान समझौतों पर हस्ताक्षर होंगे। भारत रूस के साथ पहले ही ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल का उत्पादन कर रहा है जिसके तीनों संस्करण भारत की तीनों सेनाओं के पास हैं। इसके अलावा रूस की एके-203 रायफलों का भी संयुक्त उत्पादन भारत में शुरू हो चुका है। इनका कारखाना उत्तर प्रदेश के अमेठी में है। इस परियोजना के लिए 'इंडो-रशियन रायफल्स प्राइवेट लिमिटेड' के नाम से एक अलग कंपनी बनाई गई है जिसकी कमान थलसेना के मेजर जनरल एस. के. शर्मा के पास है।
मेजर जनरल एस. के. शर्मा ने बताया कि पिछले 18 महीनों में इस फैक्ट्री में बनी 18 हज़ार रायफलें सेना को सौंपी जा चुकी हैं। इस साल दिसंबर तक 22 हज़ार और रायफलें सेना को सौंप दी जाएँगी। अमेठी की फैक्ट्री को दस साल में 6 लाख से ज़्यादा एके-203 रायफलें बनाने का ठेका मिला है।
वायुसेना की ताक़त बढ़ाने के लिए गुरुवार को रक्षा मंत्रालय ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ तेजस मार्क-1 स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान ख़रीदने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। 62 हज़ार 370 करोड़ रुपए के इस समझौते के तहत वायुसेना को 68 एकल आसनी (सिंगल-सीटर) तेजस लड़ाकू विमान और 29 युगल आसनी (ट्विन-सीटर) प्रशिक्षण विमान मिलेंगे।
वायुसेना को तेजस विमानों की डिलिवरी 2027-28 से शुरू होगी और अगले छह साल में पूरी की जाएगी। यह गर्व की बात है कि आज हम अपने देश में लड़ाकू विमान बना रहे हैं और वायु रक्षा प्रणाली बनाने की तैयारी कर रहे हैं। नए युग में सुरक्षा के लिहाज से यह ज़रूरी है कि जितना हो सके हथियार अपने देश में बनें, उनकी पूरी तकनीक हस्तांतरित हो ताकि युद्ध के दौरान किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
ऑपरेशन सिंदूर के समय यह आवश्यकता महसूस हुई। इस अभियान ने यह भी साबित किया कि भारत में बनी मिसाइलें किसी से कम नहीं हैं। इस छोटी-सी जंग में ब्रह्मोस ने जो कमाल दिखाया, उसकी चर्चा पूरी दुनिया में है। आज़ादी के बाद 60-65 साल तक किसी ने नहीं सोचा कि हम अपने देश में हथियार बनाएँ। सारा ध्यान करोड़ों रुपये के हथियारों के आयात पर होता था।
हर रक्षा सौदे में दलाली खाए जाने की ख़बरें आती थीं। नरेंद्र मोदी ने इस सोच को बदला। मोदी ने नीति बनाई कि भारत को अपनी रक्षा के लिए हथियार अपने यहाँ बनाने चाहिए, तकनीक पूरी तरह हस्तांतरित होनी चाहिए। इसकी शुरुआत हो चुकी है लेकिन रक्षा की ज़रूरतें बहुत बड़ी होती हैं। इसलिए हम पूरी तरह आत्मनिर्भर हो पाएँ, इसमें समय लगेगा। अंग्रेज़ी में एक कहावत है 'Well begun is half done' और भारत में जिस तरह की मिसाइलें, जिस तरह की रायफलें, जिस तरह के लड़ाकू विमान बन रहे हैं, वह एक शुभ संकेत हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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