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साल 2026 में भारत का चेहरा अधिक चमकने का विश्वास: आलोक मेहता
आज का भारत न केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति, एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और एक राजनीतिक रूप से सक्रिय लोकतंत्र भी है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
सामान्यतः लोग बीते कल, यानी गुजर रहे साल की समीक्षा करते हैं। उससे सबक मिले हैं, लेकिन मुझे हमेशा लगा है कि आगे के रास्ते, चुनौतियों और क्षमताओं पर ध्यान देना चाहिए। 'बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले' इस सिद्धांत पर नए साल के बारे में विचार किया जाए। भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 2026 तक आते-आते यह स्पष्ट होगा कि क्या भारत अपनी तेज़ आर्थिक वृद्धि को सामाजिक संतुलन, राजनीतिक स्थिरता और आंतरिक सुरक्षा के साथ जोड़ पाया है या नहीं।
यदि विकास, लोकतंत्र और सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तो भारत न केवल अपने नागरिकों के लिए बेहतर भविष्य बना पाएगा, बल्कि 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था में एक निर्णायक शक्ति के रूप में भी उभरेगा। आज भारत केवल एक विकासशील देश नहीं, बल्कि वैश्विक नीति-निर्माण में सक्रिय भागीदार है। जी-20, क्वाड, ब्रिक्स जैसे संगठनों में वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में भारत की भूमिका बढ़ी है।
आंतरिक सुरक्षा की लड़ाई केवल हथियारों की लड़ाई नहीं है। यह एक सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक पुनर्निर्माण का लक्ष्य भी है। चाहे वह नक्सलवाद हो या कश्मीर में आतंकवाद, दोनों में सफलता केवल हिंसा पर नियंत्रण से नहीं, बल्कि स्थिरता, विकास और बेहतर सामाजिक समावेशन से नापी जाएगी। यही वह आधार है, जिस पर भारत 2026 के लक्ष्य और उससे आगे की यात्रा को मापेगा।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ विकास, राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। आज का भारत न केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति, एक तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और एक राजनीतिक रूप से सक्रिय लोकतंत्र भी है। वर्ष 2026 भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समय सरकार की कई दीर्घकालिक नीतियों, आंतरिक सुरक्षा लक्ष्यों और राजनीतिक रणनीतियों की परीक्षा का वर्ष है।
पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय विस्तार किया है। आज भारत विश्व की शीर्ष पाँच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और सरकार का लक्ष्य अगले कुछ वर्षों में इसे तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना है। बुनियादी ढाँचा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्ट-अप संस्कृति और घरेलू विनिर्माण (मेक इन इंडिया) इस विकास के प्रमुख स्तंभ रहे हैं।
सड़कें, एक्सप्रेसवे, रेलवे आधुनिकीकरण, बंदरगाह और हवाई अड्डे, इन सबने भारत की आंतरिक कनेक्टिविटी और निवेश आकर्षण को मजबूत किया है। डिजिटल भुगतान प्रणाली, आधार-जनधन-मोबाइल ट्रिनिटी और सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण भारत की विकास कहानी को अलग पहचान देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विकसित भारत के लक्ष्य से कहीं डगमगाए नहीं हैं।
आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख, आपूर्ति-श्रृंखला में भरोसेमंद भागीदार की छवि और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे का मॉडल ये सब भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को मजबूत करते हैं। नक्सलवाद और कश्मीर जैसे मुद्दों पर नियंत्रण भारत को एक स्थिर निवेश गंतव्य और भरोसेमंद शक्ति बनाता है। वैश्विक मंच पर किसी देश की ताकत केवल सैन्य या आर्थिक नहीं होती, बल्कि उसकी आंतरिक एकजुटता और शासन क्षमता से भी तय होती है।
भारत की सुरक्षा नीति में अप्रैल 2025 से दिसंबर 2025 तक नक्सलवाद और कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई देश के आंतरिक सुरक्षा एजेंडा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। गृह मंत्री अमित शाह ने लगातार दोहराया है कि 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा, जबकि कश्मीर में आतंकवाद को समाप्त करना भी सरकार की प्राथमिकताओं में शुमार है।
इन दोनों बड़ी चुनौतियों का प्रभाव न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा पर है, बल्कि चुनावों, राज्यों की राजनीति और भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी गहरा असर डालेगा। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त होना चाहिए, ताकि कोई नागरिक नक्सलवाद के कारण अपनी जान न खोए। इस लक्ष्य का ऐलान किसी आकस्मिक घोषणा की तरह नहीं किया गया, बल्कि मोदी सरकार की आंतरिक सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बताया गया है, जिसमें सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई, स्थानीय समुदायों के साथ संवाद, और विकास के कार्यक्रम शामिल हैं।
आंतरिक सुरक्षा में नक्सलवाद लंबे समय तक सबसे बड़ी चुनौती रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। सरकार का दावा है कि यह समस्या अब अंतिम चरण में है और 2026 तक इसका निर्णायक समाधान हो सकता है। नक्सलवाद की समस्या कई दशकों से चली आ रही है, विशेषकर पूर्वोत्तर तथा मध्य और दक्षिण भारत के संवेदनशील जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों में। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में घटनाओं में कमी देखने को मिली है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, नक्सलवाद प्रभावित जिलों की संख्या 12 से घटकर लगभग 6 तक आ गई है।
कुछ क्षेत्रों में स्थानीय विकास की वजह से नक्सली गतिविधियाँ कमजोर हुई हैं, और कई नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं या गिरफ्तार/मार गिराए गए हैं। छत्तीसगढ़, मलकानगिरी (ओडिशा) जैसे पुराने गढ़ों में सुरक्षा बलों ने ठोस प्रभावी अभियान चलाए हैं, जिससे कई शीर्ष नक्सली कमांडर भी ढेर किए गए हैं। 85% से अधिक नक्सलवादी कैडर पहले से बाहर किया जा चुका है और अब अंतिम चरण की कार्रवाई चल रही है।
इससे न केवल हिंसा में कमी आई है, बल्कि स्थानीय समर्थन तोड़ने में भी मदद मिल रही है। कई नक्सली हथियार डालकर लौट आए हैं और स्थानीय सुरक्षा संरचनाओं में शामिल हो रहे हैं, जिससे इलाके में स्थिरता आई है। सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई के साथ-साथ सड़कों, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और रोजगार योजनाओं ने उन क्षेत्रों में सरकार की उपस्थिति को मजबूत किया है, जहाँ पहले राज्य लगभग अनुपस्थित था। यह बदलाव केवल सैन्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक भी है।
जम्मू-कश्मीर में स्थिति पिछले दशक की तुलना में बदली है। बड़े पैमाने पर पत्थरबाज़ी, हड़तालें और खुले अलगाववादी आंदोलन कमजोर पड़े हैं। पर्यटन, निवेश और बुनियादी ढाँचे में सुधार देखने को मिला है। कश्मीर ने पिछले कई वर्षों में आतंकवाद, अलगाववादी हिंसा और सीमा पार आतंकवाद के साथ संघर्ष किया है। 5 अगस्त 2019 को विशेष राज्य व्यवस्था (अनुच्छेद 370) हटने के बाद से स्थिति में व्यापक बदलाव आया है और सरकार का दावा है कि कश्मीर में आतंकवाद लगभग समाप्ति के करीब है।
'सिंदूर ऑपरेशन' ने सीमा पार से आतंकी घुसपैठ लगभग रोक दी है। इसके अलावा, सुरक्षा बलों ने कई जम्मू-कश्मीर पुलिस तथा सेना संयुक्त अभियानों के तहत आतंकियों को पीछे धकेलने और नेटवर्क को तोड़ने में सफलता हासिल की है, जिनमें कई आतंकवादी खत्म हुए। इन गतिविधियों के बावजूद, सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्कता बनाए रखे हुए हैं। सरकार की योजना है कि 2026 तक आतंकी गतिविधियों को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए, जिससे पर्यटन, अर्थव्यवस्था और स्थानीय जीवन सामान्य रूप से चल सके।
भारत की प्रगति की कहानी केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है; यह संभावनाओं और चुनौतियों का संगम है। आर्थिक विकास को समावेशी बनाना, सुरक्षा को स्थायी शांति में बदलना, राजनीति को संघर्ष से समाधान की ओर ले जाना, लोकतंत्र को मजबूत और संतुलित बनाए रखना—ये कसौटियाँ होंगी, जिन पर भारत की सफलता आँकी जाएगी।
भारत जब नक्सलवाद और कश्मीर आतंकवाद जैसे गहरे आंतरिक सुरक्षा जोखिमों को पार कर लेता है, तो इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गहरा पड़ेगा। यह भारत को एक सुरक्षित, स्थिर और निवेश के अनुकूल राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा। वैश्विक मंच पर भारत की आंतरिक सुरक्षा क्षमता, आतंकवाद से निपटने की नीति, और रणनीतिक गहनता को उच्च स्थान मिलेगा।
2026 भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चुनावी वर्ष भी है। इस साल देश के पाँच राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होंगे जिनमें असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी शामिल हैं। ये चुनाव 2026 के पहले पखवाड़े से मई तक विभिन्न तिथियों में आयोजित होंगे। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सत्ता बचाने की तैयारी में है। कांग्रेस गौरव गोगोई जैसे युवा चेहरों के साथ भाजपा को टक्कर देने की योजना पर काम कर रही है।
भाजपा 126 में से 100+ सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर तैयारी कर रही है। पार्टी संगठन, युवा-महिला उम्मीदवारों पर जोर दे रही है। असम एक ऐसा राज्य है, जहाँ भाजपा ने पिछले दशक में अपनी पकड़ मजबूत की, लेकिन कांग्रेस और अन्य स्थानीय दल अब फिर से गठबंधन बनाकर चुनौती देने की कोशिश करेंगे। रोजगार और विकास, शरणार्थी/नागरिकता कानून से जुड़ी पुरानी बहसे, स्थानीय पहचान और सामाजिक समीकरण प्रमुख मुद्दे होंगे।
पश्चिम बंगाल का चुनाव हमेशा ही तीव्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा वाला रहा है। पिछले चुनाव में टीएमसी ने बड़ी विजय हासिल की थी, लेकिन भाजपा बंगाल में अपनी जड़ें मजबूत करने की कोशिश में है। अवैध नागरिक, घुसपैठ, भ्रष्टाचार, विकास बनाम पहचान राजनीति, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ, स्थानीय प्रशासन की उपलब्धियाँ ये बड़े मुद्दे रह सकते हैं।
केरल की राजनीति में परंपरागत रूप से कम्युनिस्ट वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला होता रहा है। वाम मोर्चा तीसरी बार सत्ता में आने का लक्ष्य रखता है जो केरल में प्रचलित वाद-विपक्ष शैली के विपरीत है। कांग्रेस में राहुल-प्रियंका गाँधी की अग्नि परीक्षा भी होगी। वहीं, भारतीय जनता पार्टी इस बार अधिक ताकत और लक्ष्य से मैदान में होगी।
तमिलनाडु में द्रमुक गठबंधन एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में सत्ता बचाने में ताकत लगाएगा। अन्नाद्रमुक एडप्पाड़ी के. पलानीस्वामी और पार्टी गठबंधन के साथ मुकाबला करेगी। तमिलनाडु की चुनावी राजनीति में अन्नाद्रमुक और भाजपा मिलकर एनडीए रणनीति को मजबूत कर रहे हैं, खासकर सीटों का बंटवारा करके अपनी ताकत बढ़ाना चाहते हैं। भाजपा की राष्ट्रीय रणनीति 2026 में विशेष रूप से बंगाल, केरल और तमिलनाडु में अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश पर केंद्रित है। अमित शाह और पार्टी नेतृत्व इन राज्यों को देशव्यापी लोकप्रियता का परीक्षण भूमि मान रहे हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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