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क्षेत्रीय पार्टियों में फूट का कारण सिर्फ परिवारवाद नहीं: विनोद अग्निहोत्री

दरअसल, भाजपा के लिए 2024 में दो-तीन राज्यों में मुश्किलें खड़ी होती दिख रही हैं। महाराष्ट्र, बिहार इनमें से एक है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ सलाहकार संपादक, अमर उजाला ग्रुप।

'क्षेत्रीय पार्टियों में फूट का कारण सिर्फ परिवारवाद और वंशवाद होता है, ऐसा कहना गलत होगा। भाजपा में भी निचले स्तर पर काफी परिवारवाद है। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा वंशवादी राजनीतिक दलों के साथ नहीं गई हो। अकाली दल से लेकर शिवसेना और अब एनसीपी तक कई उदाहरण हैं। ऐसे में एनसीपी के अंदर जो कुछ हो रहा है, उसके लिए परिवारवाद को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं है।

दरअसल, भाजपा के लिए 2024 में दो-तीन राज्यों में मुश्किलें खड़ी होती दिख रहीं है। महाराष्ट्र, बिहार इनमें से एक है। महाराष्ट्र में क्षेत्रीय पहचान शिवसेना और एनसीपी की थी। दोनों को तोड़कर भाजपा ने अपना काम कर दिया। शिवसेना के साथ प्रयोग किया और सफल होने पर एनसीपी के साथ भी ऐसा कर दिया। ये सबकुछ 2024 को दुरुस्त करने की रणनीति के तहत किया गया है।'

'आंकड़ों पर नजर डालें तो संख्याबल के हिसाब से महाराष्ट्र की एकनाथ शिंदे सरकार मजबूत हुई है। हालांकि, एनसीपी के आने से भाजपा और शिवसेना गठबंधन के बीच अंदरूनी खींचतान और बढ़ेगी। ये किसी भी सरकार के लिए मुसीबत की घड़ी होगी। इससे सरकार का कामकाज प्रभावित होगा।

अभी ऊपर से सरकार जरूर मजबूत दिखेगी, लेकिन अंदर से ये डगमगाएगी। अगर सही ढंग से तालमेल न हो तो दिक्कत बढ़ेगी। यही दिक्कत कांग्रेस-शिवसेना और एनसीपी की सरकार में भी थी। हालांकि, इस बीच ये जरूर है कि ये सरकार टूटेगी नहीं।'

'एनसीपी और शिवसेना में बगावत का असर भाजपा पर भी पड़ सकता है। कर्नाटक इसका बड़ा उदाहरण है। कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के बागी विधायक जो भाजपा में शामिल हुए थे, वो सारे चुनाव हार गए। ऐसे में अगर चुनाव तक कोई बड़ा मुद्दा नहीं आता है तो जरूर कर्नाटक की तरह महाराष्ट्र में भी बागी विधायकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।'

'अजित पवार और शरद पवार का रिश्ता राजनीतिक के साथ-साथ पारिवारिक भी है। अजित पवार को राजनीति में शरद पवार ही लेकर आए। उन्हें पुत्र के तरह आगे बढ़ाया। सुप्रिया को लेकर आए तो उनके मन में यही था कि भाई-बहन पार्टी को आगे बढ़ाएंगे। उसके बाद भी वह अजित पवार को आगे बढ़ाते रहे। लेकिन अजित महत्वाकांक्षी निकले। अजित पवार के इरादों को शरद पवार भांप गए थे। यह भांपने के बाद ही उन्होंने तय किया था कि अगर अजित को अध्यक्ष बना लिया तो वह तो पूरी पार्टी ही लेकर चले जाएंगे।'  

(साभार - अमर उजाला डिजिटल)


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