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अवसरवादी युग के अंत के साथ राजनीति के नए सबक: आलोक मेहता

इस तरह यह भारतीय राजनीति के एक अध्याय का अंत और नए अध्याय की शुरुआत है। भावी राजनीति के लिए सबक है। 2026 के नगर निगम और नागरिक चुनावों में जो हुआ, वह आकस्मिक नहीं था।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

महाराष्ट्र की राजनीति में दशकों तक दो परिवार सत्ता, प्रभाव और भय का पर्याय बने रहे—ठाकरे और पवार। इन दोनों नामों के इर्द-गिर्द राजनीति घूमती रही, सरकारें बनती-टूटती रहीं और विचारधाराएँ सुविधानुसार बदली जाती रहीं। सिद्धांत स्थायी नहीं रहे, केवल सत्ता सर्वोपरि रही। लेकिन 2026 के मुंबई और महाराष्ट्र की अन्य नगर निकाय चुनावों ने यह साफ कर दिया कि जनता अब पारिवारिक राजनीति, बार-बार की निष्ठा-परिवर्तन और सत्ता-लालच से ऊब चुकी है। भारतीय जनता पार्टी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगभग सम्पूर्ण देश में कांग्रेस के किलों महलों को ध्वस्त करते हुए राष्ट्रीय विकल्प बन गई है।

मुंबई महाराष्ट्र के इन चुनावों ने शरद पंवार और ठाकरे परिवारों के एक युग का अंत दिखा दिया। ठाकरे से अधिक शरद पंवार मराठा क्षत्रप के रूप में करीब साठ वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति में मुख्य मंत्री से प्रधान मंत्री पद तक के लिए हर संभव जोड़ तोड़ और हथकंडों का इस्तेमाल करते रहे। इसी सन्दर्भ में 'नरसिंहा राव के बाद कौन' शीर्षक वाली 1993 की मेरी पुस्तक में शरद पंवार पर एक चेप्टर के प्रारम्भ में मैंने लिखा था कि 'शरद पंवार के प्रिय खेल कबड्डी, खो - खो और कुश्ती रहे हैं। कबड्डी के लिए तेजी से पाला बदलना, खो खो की तरह दूसरे को आउट करना और मौका पड़ने पर कुश्ती के दांव की तरह अपने प्रिय गुरु या शिष्य को पटकनी देने में बहुत फुर्ती वाले चतुर चालाक राजनेता हैं।

लेकिन 2026 में वह इन खेलों के दांव पेंचों और बाद में क्रिकेट की फिक्सिंग के जुवें में भी जनता द्वारा सदा के लिए मैदान से बाहर कर दिए गए हैं। इस तरह यह भारतीय राजनीति के एक अध्याय का अंत और नए अध्याय की शुरुआत है। भावी राजनीति के लिए सबक है। 2026 के नगर निगम और नागरिक चुनावों में जो हुआ, वह आकस्मिक नहीं था। मुंबई, ठाणे, पुणे जैसे गढ़ ढह गए। उद्धव् ठाकरे की शिवसेना और शरद पंवार की एनसीपी हाशिये पर चली गई। राहुल गांधी की कांग्रेस तो मुंबई में मुंह दिखाने लायक नहीं रह गई। जनता ने साफ संदेश दिया,“वंश नहीं, विश्वसनीयता चाहिए।”

एक तरह से इतिहास ने हिसाब बराबर कर दिया। ठाकरे और पवार परिवारों ने राजनीति को आंदोलन नहीं, पारिवारिक कारोबार बनाया। जब तक सत्ता मिली, सिद्धांत बदले जाते रहे। 2026 के चुनावों ने बता दिया कि लोकतंत्र देर से सही, लेकिन हिसाब जरूर करता है। आज ये दोनों परिवार उसी राजनीति के शिकार हैं,जिसे उन्होंने वर्षों तक इस्तेमाल किया। जो राजनीति को छल समझते हैं, अंततः राजनीति उन्हें बेनकाब कर देती है। महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के चुनाव के नतीजों ने ठाकरे व पवार परिवार दोनों को राजनीतिक रूप से पीछे धकेल दिया है।

शरद पवार कांग्रेस में यशवंतराव चव्हाण के बाद बड़े नेता बने। लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि शीर्ष पद दूर है, उन्होंने पार्टी तोड़ दी। उन्होंने वसंतराव नाइक, वसंत दादा पाटिल , शंकर राव चव्हाण को ही नहीं इंदिरा गाँधी , राजीव गाँधी , नरसिंह राव , सोनिया गाँधी के साथ समय समय पर सम्बन्ध जोड़े और सत्ता के लिए तोड़े। तीन बार महारष्ट्र के मुख्यमंत्री, केंद्र सरकारों में प्रभावशाली मंत्री बन सके लेकिन प्रधानमंत्री के सपने के बाद अब महाराष्ट्र में अपने उत्तराधिकारी को सत्ता सौंपने का सपना भी टूट गया।

नगर निगमों पर नियंत्रण खोना ठाकरे परिवार के लिए बड़ा झटका है क्योंकि इन्हीं निकायों पर उनका राजनीतिक प्रभाव मजबूत था। भावनात्मक आधार पर उनका वोट बैंक अब काम नहीं कर पा रहा है। बालासाहेब ठाकरे का राजनीतिक उदय किसी वैचारिक आंदोलन से नहीं, बल्कि भावनात्मक उभार और आक्रामक भाषा से हुआ। 1966 में शिवसेना बनी। मराठी अस्मिता के नाम पर, लेकिन बहुत जल्दी यह स्पष्ट हो गया कि शिवसेना का असली ईंधन सत्ता की निकटता है। आपातकाल और इंदिरा गांधी को समर्थन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है जिसे शिवसेना के अनुयायी अक्सर भुलाना चाहते हैं कि 1975 के आपातकाल में बाल ठाकरे ने इंदिरा गांधी का खुला समर्थन किया।

जब देश के बड़े नेता जेल में थे, प्रेस पर सेंसरशिप थी, तब बाल ठाकरे ने इंदिरा गांधी को “दृढ़ नेता” बताया। यही नहीं, शिवसेना ने उस दौर में कांग्रेस के खिलाफ कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया। यह पहला प्रमाण था कि लोकतंत्र या तानाशाही नहीं, सत्ता से निकटता ही प्राथमिकता है। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बाल ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया कि“यदि बाबरी गिरी है, तो शिवसेना के कारण गिरी है।” यह बयान हिंदुत्व की राजनीति में लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वैचारिक प्रतिबद्धता थी या राजनीतिक ब्रांडिंग?

क्योंकि यही शिवसेना बाद में उसी कांग्रेस के साथ सत्ता में गई, जिसे वह “हिंदू-विरोधी” कहती रही।1995 में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन सत्ता में आया। 1998 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी और शिवसेना उसका हिस्सा बनी। यह गठबंधन विचारधारा से ज्यादा सत्ता की मजबूरी था। बाल ठाकरे ने कभी बीजेपी को छोटा भाई माना, तो कभी उपयोगी औजार। यानी सिद्धांत नहीं बदले केवल साझेदार बदले। बाल ठाकरे के बाद उद्धव ठाकरे को नेतृत्व मिला।

उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान यह रही कि वे पहले नरेंद्र मोदी और बीजेपी के साथ थे, और फिर अचानक सोनिया गांधी और शरद पवार की गोद में जा बैठे। 2014 और 2019 तक उद्धव ठाकरे बीजेपी के साथ सत्ता में रहे। मोदी-शाह की जोड़ी पर तब तक कोई वैचारिक आपत्ति नहीं थी। लेकिन 2019 के बाद मुख्यमंत्री पद न मिलने पर उद्धव ठाकरे ने वह कदम उठाया, जिसने शिवसेना की आत्मा को झकझोर दिया। सोनिया गांधी और शरद पवार के सामने ‘समर्पण’ जिस कांग्रेस को दशकों तक शिवसेना ने गाली दी,जिस शरद पवार को सत्ता-दलाल कहा।

उसी के साथ महाविकास अघाड़ी बनी। न कोई वैचारिक विकास था, न राजनीतिक प्रयोग। यह सिर्फ़ सत्ता के लिए वैचारिक आत्मसमर्पण था। महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों की यह जीत किसी एक नेता की नहीं, बल्कि मोदी के भरोसे, अमित शाह की रणनीति और देवेंद्र फडणवीस की संगठनात्मक क्षमता का संयुक्त परिणाम है। इन तीनों ने मिलकर न केवल विपक्ष को पराजित किया, बल्कि राज्य की राजनीति की धुरी ही बदल दी।

नगर निगम चुनावों के नतीजे सिर्फ़ स्थानीय नेताओं या पार्षदों की जीत-हार नहीं थे। यह परिणाम राज्य की राजनीति में एक रणनीतिक पुनर्संरचना का संकेत थे, जिसके पीछे तीन निर्णायक स्तंभ स्पष्ट रूप से उभरे—नरेंद्र मोदी, अमित शाह और देवेंद्र फडणवीस। इन तीनों ने अलग-अलग स्तरों पर भूमिका निभाई, लेकिन प्रभाव एक साझा दिशा में गया—विपक्ष की राजनीति को कमजोर करना और सत्ता के लिए एक स्थिर ढांचा खड़ा करना।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी देश के शहरी, मध्यम वर्ग और गरीब मतदाताओं के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक ब्रांड बने हुए हैं। मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे महानगरों में नगर निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों से अधिक मोदी के नाम और छवि पर लड़े गए। “डबल इंजन सरकार”, “विकास”, “स्थिरता” और “भ्रष्टाचार-मुक्त शासन” जैसे नारे सीधे मोदी की विश्वसनीयता से जुड़े रहे। केंद्र सरकार की योजनाओं—मुफ्त राशन, प्रधानमंत्री आवास, आयुष्मान भारत, मेट्रो, कोस्टल रोड और राष्ट्रीय राजमार्ग—का राजनीतिक लाभ भी भाजपा को मिला। अस्थिर गठबंधनों और बार-बार सरकार गिरने-बनने के अनुभवों के बाद मोदी मतदाताओं के लिए मजबूत और स्थिर नेतृत्व के प्रतीक बने।

यही कारण है कि उनका चेहरा भाजपा के लिए सबसे प्रभावी वोट-मैग्नेट साबित हुआ। यदि इस जीत को रणनीतिक खेल माना जाए, तो अमित शाह उसके सबसे कुशल योजनाकार रहे। उनका सबसे बड़ा योगदान विपक्ष को भीतर से कमजोर करना रहा। शिवसेना में विभाजन कर एकनाथ शिंदे को साथ लाना और फिर एनसीपी में टूट के जरिए अजित पवार को महायुति में शामिल करना—इन कदमों ने ठाकरे और पवार दोनों परिवारों की राजनीति की नींव हिला दी। यह रणनीति तात्कालिक नहीं थी। 2022 में शिवसेना विभाजन, 2023 में एनसीपी टूट, 2024 में विधानसभा चुनाव और 2026 में नगर निगमों पर नियंत्रण—यह एक लंबी अवधि की राजनीतिक योजना का हिस्सा था।

सीटों का बँटवारा, उम्मीदवार चयन और सहयोगी दलों के बीच संतुलन दिल्ली से तय हुआ, जिससे वोटों का बिखराव रोका गया। आज विपक्ष की कमजोरी के पीछे अमित शाह की यही राजनीतिक सर्जरी सबसे बड़ा कारण मानी जा रही है। मोदी और शाह की रणनीति को ज़मीन पर उतारने का काम देवेंद्र फडणवीस ने किया। 2014 से वे महाराष्ट्र में भाजपा के सबसे प्रभावी चेहरे रहे हैं। संगठन विस्तार, कैडर निर्माण और चुनावी प्रबंधन—हर स्तर पर उनकी पकड़ बनी रही।भाजपा, शिंदे गुट और अजित पवार गुट—तीन अलग-अलग राजनीतिक संस्कृतियों को एक साथ चलाना आसान नहीं था।

फडणवीस ने टकराव को नियंत्रित किया, सीट शेयरिंग को संतुलित रखा और सरकार तथा संगठन के बीच सामंजस्य बनाए रखा। शहरी विकास उनकी सबसे बड़ी ताकत रहा—मुंबई मेट्रो, कोस्टल रोड, समृद्धि महामार्ग और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं ने शहरी मतदाता को यह विश्वास दिलाया कि विकास की गति फडणवीस के दौर में तेज़ हुई है। यह चुनावी संदेश साफ है—आज की राजनीति में भावनात्मक नारे नहीं, बल्कि रणनीति, संगठन और स्थिर नेतृत्व निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिलहाल यह त्रिकोण महाराष्ट्र में सबसे मजबूत रूप में भाजपा के पास दिखाई देता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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