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न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, क्या सरकार सिस्टम बदलेगी: रजत शर्मा
उधर इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने हड़ताल की धमकी दी है। बार एसोसिएशन का कहना है कि जस्टिस वर्मा के केस की जांच ED और CBI से कराई जानी चाहिए।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 10 months ago
रजत शर्मा , इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ।
जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर मंगलवार को तीन जजों की जांच समिति मौके का मुआयना करने गई थी। समिति में पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ठ के मुख्य न्यायाधीनश जी एस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जज अनु शिवरामन शामिल हैं। होली के दिन इनस घर में आग लगी और फायर ब्रिगेड को बोरियों में अधजले नोट मिले।
सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादला कर दिया है। संसद में राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सदन के नेता जे पी नड्डा और प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे को बुलाकर इस मुद्दे पर बात की। धनखड़ ने कहा कि जस्टिस वर्मा के मामले में जांच कमेटी बना दी गई है, जज का ट्रांसफर कर दिया गया है, जांच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए लेकिन साथ साथ न्यायपालिका की साख पर जो बट्टा लगा है, ऐसा दोबारा न हो, इसके लिए सभी पार्टियों को मिलकर सोचने की जरूरत है।
उधर इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने हड़ताल की धमकी दी है। बार एसोसिएशन का कहना है कि जस्टिस वर्मा के केस की जांच ED और CBI से कराई जानी चाहिए, इस तरह के केस में जजों को जो इम्युनिटी मिली है वो खत्म होनी चाहिए। असल में जस्टिस यशवंत वर्मा के घर पर भारी मात्रा में कैश मिलने के बाद से न्यायपालिका की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
आम तौर पर कैश बरामद होने के मामले जांच के लिए पुलिस या CBI को दिए जाते हैं क्योंकि इन्हीं एजेंसी के पास ऐसे मामलों की जांच करने की विशेषज्ञता होती है। लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका की मजबूरी बताई। अपनी स्वतंत्रता कायम रखने के लिए न्यायपालिका जज से संबंधित मामलों की जांच पुलिस को नहीं सौंपती। सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के पास अपनी कोई जांच एजेंसी नहीं है।
फायर ब्रिगेड के चीफ का बयान लेने के लिए भी कोर्ट के अफसर वहां गए। फायर ब्रिगेड ने नोट देखे थे, जले हुए नोटों का वीडियो बनाया। अपने बयान में फायर ब्रिगेड ने जो कहा, वो चिंताजनक है। फायर ब्रिगेड के बयान की आखिरी लाइन नोट करने वाली है- 'आग काबू में आने के बाद 4-5 अधजली बोरियां मिलीं जिनके अंदर भारतीय मुद्रा भरी थी'।
इसके बाद शक की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती लेकिन ये अधजली भारतीय मुद्रा कहां गायब हो गईं? क्या वहां पर कुछ बिन जले नोटों की बोरियां भी थीं? उन बोरियों को कौन ले गया? पुलिस ने नोट मिलने के बाद उस जगह को सील क्यों नहीं किया? ये सारे सवाल उठाया जाना लाजिमी हैं। इसमें कोई शक नहीं कि जज यशवंत वर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने सब कुछ पारदर्शी तरीके से किया।
सारे दस्तावेज और वीडियो वेबसाइट पर डाल दिए। अब सवाल ये उठा कि इतना हो जाने के बाद भी जस्टिस वर्मा को सिर्फ ट्रांसफर किया गया। एक जज पर जब कैश लेने का आरोप हो, प्रत्यक्षतया सबूत हों, तो उन्हें सस्पेंड क्यों नहीं किया गया? इसका जवाब भी जस्टिस चंद्रचूड़ ने दिया। उन्होंने कहा कि कोर्ट के पास किसी जज को ट्रांसफर करने के अलावा सजा देने का कोई और तरीका नहीं है।
जब जांच पूरी होगी, अगर जज को दोषी पाया गया, तो चीफ जस्टिस, जज यशवंत वर्मा को इस्तीफ़ा देने को कह सकते हैं। अगर जज इस्तीफा देने से इनकार कर दे तो चीफ जस्टिस उनके ख़िलाफ़ महाभियोग की सिफ़ारिश कर सकते हैं लेकिन महाभियोग की प्रक्रिया बहुत लंबी होती है। इन सारी बातों का मतलब ये है कि न्यायपालिका में ऐसे मामलों से डील करने के तरीके में बदलाव की ज़रूरत है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जांच और सजा की एक समुचित व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस केस से इस दिशा में कोई ठोस समाधान निकलेगा।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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