पूर्व पीएम चंद्रशेखर की 98वीं जयंती: जब एक साहसी फैसले ने भारत को दिवालिया होने से बचाया

आज चंद्रशेखर की 98वीं जयंती है। उनके असाधारण नेतृत्व के स्मरण का अवसर। 1990-91 के आर्थिक संकट में कैसे उन्होंने मुल्क को दिवालियापन से बचाया? देश की साख डूबने ही वाली थी।

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Thursday, 17 April, 2025
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हरिवंश नरायण सिंह, उपसभापति, राज्यसभा ।।

आज चंद्रशेखर की 98वीं जयंती है। उनके असाधारण नेतृत्व के स्मरण का अवसर। 1990-91 के आर्थिक संकट में कैसे उन्होंने मुल्क को दिवालियापन से बचाया? देश की साख डूबने ही वाली थी।  कुछ दिनों का भी विदेशी मुद्रा भंडार नहीं था। महज एक सप्ताह के आयात बिल का भुगतान संभव था। इस संकट की जड़ें लंबी व गहरी थीं। इंदिरा गांधी के कार्यकाल (1971-72) में इसकी शुरूआत हुई। राजीव गांधी और वी।पी। सिंह की सरकारों ने इस संकट को आगे बढ़ाया। बार-बार चेतावनी के बाद समाधान नहीं निकाला। नतीजतन यह और गहरा हुआ। 1991 में देश ने निर्णायक अर्थसंकट का दौर देखा। जयतीरथ राव जैसे कई जाने–माने अर्थशास्त्री कहते हैं कि उस वक्त चंद्रशेखर सरकार ने सोना गिरवी रखने का साहसिक कदम नहीं उठाया होता, तो 1991 में ही भारत कथा का अंत हो गया होता। बहुत संक्षेप में जानें कि यह मामला क्या था? 1991 में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। उन्हें पूर्ववर्ती सरकारों से किस स्थिति में मुल्क की बागडोर मिली? 

चंद्रशेखर का व्यक्तित्व अनूठा था। वह स्पष्टवादी थे। उनके व्यक्तित्व के कई असाधारण पहलू थे। पर, आज सिर्फ एक प्रसंग पर चर्चा। साहस उनकी पहचान था। समाजवादी विचारों से प्रेरित थे। लेकिन सोच व्यावहारिक थी। उन्होंने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की। देशहित उनके लिए सर्वोपरि था। 1970-71 में उन्होंने इंदिरा गांधी को चुनौती दी। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के चुनाव में वह उनकी इच्छा के खिलाफ चुने गए। यह उनकी लोकप्रियता का सबूत था। सुभाषचंद्र बोस के बाद वह पहले नेता थे, जिन्होंने शक्तिशाली कांग्रेस हाईकमान के प्रत्याशी को पराजित किया। उस दौर में इंदिरा जी का एकछत्र राज था। उनकी नीतियों पर सवाल उठाना आसान नहीं था। चंद्रशेखर ने यह साहस दिखाया। ‘युवा तुर्क’ के दिनों से ही देश के गंभीर सामाजिक-आर्थिक सवालों को मुख्य राजनीति का मुद्दा बनाया। उन्होंने वैकल्पिक रास्ता सुझाया। जब मुल्क में इमरजेंसी लगी, उसके पहले ही अपनी पत्रिका ‘यंग इंडियन’ में खुला लेख लिखकर तत्कालीन सत्ता (श्रीमती गांधी) को जेपी (जयप्रकाश नारायण) जैसे संत से टकराव से बचने की सलाह दी। वह चाहते थे कि राजनीति संवाद पर आधारित हो। सत्ता की जिद पर नहीं।

1970-71 में मशहूर अर्थशास्त्री प्रो. जयदेव शेट्टी ने किताब लिखी। ‘इंडिया इन क्राइसिस’। इसमें मुल्क के गहराते आर्थिक संकट का जिक्र था। 1980 के बाद पुन: इंदिरा जी की लोकलुभावन नीतियों ने राजकोष पर बोझ डाला। उच्च ब्याजदर पर विदेशी ऋण लिए गए। इससे देश कर्ज के जाल में फंसा। इसकी चेतावनी कई बड़े अर्थशास्त्रियों ने दी। इससे पहले एक और बड़ा संकट लालबहादुर शास्त्री के समय आया। खाद्यान्न की कमी थी। सूखा पड़ा। देश हिल गया था। लेकिन इंदिरा जी की नीतियों ने संकट को और गहराया। उन्होंने ‘सत्ता’ के लिए अनेक लोकलुभावन नीतियों को अपनाया। इनमें ‘लीकेज’ (भ्रष्टाचार व कुशासन) की शुरुआत हुई। उनकी योजनाएं वोट की दृष्टि से आकर्षक थी। उन्हें सत्ता तो मिली, पर इसका खामियाजा मुल्क की दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों ने भुगता। चंद्रशेखर ने यह खतरा भांपा। उन्होंने चेतावनी दी। ऐसी नीतियां देश को मंझधार में ले जाएंगी। यह दूरदृष्टि उनकी वैचारिकी का हिस्सा थी। 

जनता सरकार भी जन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। मुल्क की आर्थिक सेहत सुधारने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई। फिर इंदिरा जी की सरकार आयी। फिर राजीव गांधी का कार्यकाल। देश पश्चिमी बाजारों की ओर बढ़ा। यह दौर उत्साह का था। लगा, भारत रातोंरात बदल जाएगा। वी।पी। सिंह वित्त मंत्री थे। उन्होंने राजीव को ‘विवेकानंद का अवतार’ कहा। लेकिन संकट गहराता गया। शासक वर्ग की विलासिता चर्चा में रही। एक घटना मशहूर हुई। प्रधानमंत्री के विमान में इटली की कटलरी मंगवाई गई। गवर्नेंस में अनेक कमियां दिखीं। 1987 में पालिसी पैरालाइसिस का दौर शुरू हुआ। मुल्क की रहनुमाई  जिन हाथों में थी, उनमें साहस की कमी थी। व्यापक दृष्टिकोण का अभाव था। देश की माटी-पानी से जुड़ाव कम था। नतीजा हालात बिगड़ते गए। 1980 के दशक के अंत में हालात और खराब हुए। वी।पी। सिंह की सरकार बनी। उन्होंने संकट को अनदेखा किया। वह राजीव के वित्त मंत्री रह चुके थे। आर्थिक स्थिति से वाकिफ थे। लेकिन सत्ता की राजनीति में उलझे रहे। कोई कदम नहीं उठाया। मधु दंडवते उनके वित्त मंत्री थे। संकट को जानते-समझते हुए भी वह संकट रोकने में नाकाम रहे। रिजर्व बैंक के गवर्नर चेतावनी देते रहे। वित्त सचिवों ने भी आगाह किया। देश की साख खतरे में थी। उनकी बातें अनसुनी रहीं। देश मंझधार में फंस गया।

1990 में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। उन्हें संकटग्रस्त देश मिला। शपथ लेते ही वित्त सचिव विमल जालान मिलने को बेचैन थे। न मंत्रिमंडल बना था, न सरकार ने संसद में विश्वास मत पाया था। पर वित्त सचिव ने कहा, नहीं मिलना अत्यंत आवश्यक है। चंद्रशेखर मिले। उन्होंने गंभीर स्थिति बताई। विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर था। केवल सात दिन का भुगतान संभव था। चंद्रशेखर ने पूछा। क्या यह संकट मेरे शपथ की प्रतीक्षा में था? या पहले से था? जालान ने बताया। यह पहले से ही था। पर,  राजीव गांधी के समय से बढ़ा था। वी।पी। सिंह के कार्यकाल में बदतर हुआ। दोनों को जानकारी थी। लेकिन किसी ने कदम नहीं उठाया। चंद्रशेखर ने चुनौती स्वीकार की।

शंकर आचार्य ने अपनी किताब—‘Essay on Macroeconomic policy and Growth in India’ में इस आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर विस्तार से बताया है। 1991 में, भारत में एक बड़ा आर्थिक संकट आया था, जिसमें विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया था। निर्यात गिर गया था। महंगाई बढ़ गई थी।  इस संकट के कई कारण थे। मसलन सरकार का लंबे समय से ज़्यादा ख़र्च। व्यापार के नियमन और विदेशी निवेश को लेकर नकारात्मक रवैया। ऐसी नीतियाँ बनाना जिनसे निर्यात को बढ़ावा न मिले और आयात को बढ़ावा मिला। व्यापार घाटे को पूरा करने के लिए विदेशों से ज़्यादा कर्ज़ लिया गया।   कमज़ोर वित्तीय क्षेत्र।  खाड़ी युद्ध के कारण तेल की क़ीमतें बढ़ने से स्थिति और बिगड़ गई।

चुनौतियां कई थीं। पंजाब में आतंकवाद। असम में चुनावी अशांति। अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद। श्रीलंका में लिट्टे का संघर्ष। हर तरफ अस्थिरता थी। आर्थिक स्थिति भयावह थी। ये सारे मुद्दे पहले की सरकारों की सौगात थी। चंद्रशेखर के सामने।

नरेश चंद्रा, कैबिनेट सचिव थे। उन्होंने अपने लेख ‘Selling the Country’s Jewels’ (देखें, ‘द हिंदू’, 01 अगस्त, 2016) में जिक्र किया है। अर्थव्यवस्था के पैरामीटर बेहद खराब थे। बड़े ऋण चुकाने की क्षमता नहीं थी। ऋणदाता चिंतित थे। क्या भारत कर्ज के जाल में फंस गया है? संकट असाधारण था। आम आदमी भी समझ सकता था। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता ने इसे जटिल बनाया।

चंद्रशेखर की सरकार अल्पमत में थी। कांग्रेस का बाहरी समर्थन था। राष्ट्रपति वेंकट्टरमण ने अपने संस्मरणों में लिखा है। राजीव गांधी ने एक साल तक समर्थन का भरोसा दिया था। लेकिन यह वादा टूटा। नरेश चंद्रा ने लिखा कि चंद्रशेखर ने कठिन निर्णय लिए। तमिलनाडु और असम की सरकारें बर्खास्त कीं। कुछ राज्यपाल बदले। विदेश नीति में कदम उठाए। अमेरिकी विमानों को ईंधन भरने की अनुमति दी। लेकिन समर्थन की कमी थी। स्थिति नहीं बदली। असम में चुनाव। पंजाब चुनाव (नरसिंह राव सत्ता में आये, रोक लगी)।

आर्थिक संकट से निपटने का फैसला ऐतिहासिक था। चंद्रशेखर ने सोना गिरवी रखा। नरेश चंद्रा ने इसका वर्णन किया। यह आसान नहीं था। चंद्रशेखर को पता था, इसकी क्या राजनीतिक कीमत उन्हें चुकानी होगी? डर था। वह सोना बेचने वाले प्रधानमंत्री कहे जाएंगे। अधिकारियों ने समझाया। यही एकमात्र विकल्प है, नहीं तो देश दिवालिया होगा। दो विकल्प थे। खाई में गिरना। या समुद्र में डूबना। चंद्रशेखर ने कठिन रास्ता चुना। चर्चाएं हुईं। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा। यह नीतिगत फैसला है। सरकार को निर्देश देना होगा। 25 टन सोना गिरवी रखा गया। तस्करी में जब्त यह सोना, सरकारी खजाने में था। 400-500 मिलियन डॉलर मिले। राशि बड़ी नहीं थी। लेकिन साख पर असर हुआ। बैंकों को भरोसा मिला। भारत डिफॉल्ट से बचेगा। नरेश चंद्रा ने इसके बारे में विस्तार से बताया है। विश्व बैंक की आशंकाएं दूर हुईं। ऋण देना शुरू किया।

चंद्रशेखर जन सभाओं में बताते, देश पर संकट था, हम किसान परिवार से हैं। हमने अपनी परंपराओं से सीखा है। खेत रेहन पर रहता है। घर का जेवर दे कर छुड़ाते हैं। फिर श्रम से कमाते हैं। जेवर वापस लाते हैं। हम यही करेंगे। आर्थिक सुधार की असल शुरुआत उन्होंने ही की। पर, बाद की सरकार को इसका क्रेडिट मिला।

जयतीरथ राव जैसे अर्थशास्त्री ने भी अपनी किताब में लिखा है। यह फैसला निर्णायक था। इसके बिना भारत 1991 में बिखर जाता। हमेशा के लिए साख खो देता। यह भारतीय परंपरा जैसा था। संकट में लोग गहने गिरवी रखते हैं। बाद में मेहनत से छुड़ाते हैं। चंद्रशेखर ने यही सोचा। यह देश की अस्मिता बचाने का उपाय था। उन्होंने कभी किसी पर दोषारोपण नहीं किया। पीएम मैं, दायित्व मेरा। मुँह नहीं मोड़ कर आगे आनेवाले प्रधानमंत्री पर देश की अस्मत बचाने का दायित्व छोड़, अपने फर्ज से मुँह नहीं मोड़ूँगा। जो पहले के लोगों ने किया है, लज्जाहीनता, अदूरदर्शिता, अविवेक के साथ।

चंद्रशेखर ने अन्य विकल्प देखे। निजाम के गहनों को बेचने का प्रस्ताव आया। क्रिस्टीज ने 850 करोड़ की पेशकश की। चंद्रशेखर ने ठुकराया। टोक्यो में दूतावास की संपत्ति बेचने का सुझाव था। 900 करोड़ की पेशकश थी। विदेश मंत्रालय ने मना किया। चंद्रशेखर ने सबसे प्रभावी रास्ता चुना।

उनकी कार्यशैली तार्किक थी। वह समस्याओं को जटिल नहीं बनाते थे। अयोध्या विवाद को सुलझाने की कोशिश की। सभी पक्षों से संवाद किया। शरद पवार ने लिखा है, अपनी आत्मकथा में। यह मसला हल होने वाला था। लेकिन राजीव ने समर्थन वापस लिया। हरियाणा के दो कांस्टेबल की जासूसी की घटना को समर्थन वापसी का आधार बनाया गया। कांग्रेस ने हरियाणा सरकार बर्खास्त करने की मांग की। चंद्रशेखर नहीं झुके। उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लेकिन वोट ऑन अकाउंट पास कराया। ताकि सरकारी खर्च रुके नहीं। राजीव गांधी स्तब्ध। शरद पवार को दो उनके घर भेजा। चंद्रशेखर बोले। निर्णय नहीं बदलता।

चंद्रशेखर का व्यक्तित्व सादगी से भरा था। वह साहसी थे। सत्ता की लालसा नहीं थी। देशहित पहले था। वह जनता की भावनाओं को समझते थे। लेकिन लोकलुभावन वादों में नहीं फंसे। उनकी सरकार का कार्यकाल छोटा था। लेकिन प्रभाव बड़ा था। उनकी 98वीं जयंती पर यह याद करना जरूरी है। संकट में साहसिक निर्णय ही देश को बचाते हैं।

 चंद्रशेखर की वैचारिकी समाजवादी थी। वह अव्यावहारिक आदर्शवाद में विश्वास नहीं करते थे। जमीन से जुड़े थे। उनकी बातें स्पष्ट थीं। वह लोकप्रियता के पीछे नहीं भागे।

आज उनकी जयंती पर उनकी दूरदृष्टि याद करनी चाहिए। वह समस्याओं को भविष्य के नजरिए से देखते थे। उनकी सरकार ने अल्प समय में बहुत कुछ किया। वह आज भी प्रेरणादायक है। उनकी सादगी और साहस नेताओं के लिए मिसाल है।

आज फिर राज्य सरकारें लोकलुभावन वादे कर रही हैं। उच्च ब्याज पर ऋण ले रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी चेतावनी दी है। मुफ्त रेवड़ियां खतरनाक हैं। ये लोगों को परजीवी बना रही हैं। कोर्ट ने कहा है, मुफ्त राशन और पैसा काम से दूर कर रहा है। यह सामाजिक और आर्थिक खतरा है।

थिंक टैंक एमके ग्लोबल की रिपोर्ट बताती है। चुनावी वर्षों में राजकोषीय घाटा बढ़ता है। इससे कई राज्य बहुत गंभीरता से प्रभावित हैं। दक्षिण के एक राज्य पर 20,000 करोड़ से ज्यादा बकाया है। बैंकों की हालत बिगड़ रही है। क्रिसिल रेटिंग्स का अनुमान है। इस साल राज्यों का घाटा 1.1 लाख करोड़ तक पहुंचेगा। यह स्थिति है।

लोकलुभावन नीतियों का लालच छोड़ना होगा। कठोर निर्णय लेने की हिम्मत चाहिए। उनकी कार्यशैली प्रेरणा देती है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने बहस को गंभीर किया है। क्या राजनीतिक दल इसे समझेंगे?

चंद्रशेखर का पूरा जीवन एक सबक है। संकट में साहस और समझदारी जरूरी है। उनकी सादगी प्रेरित करती है। उनकी स्पष्टता रास्ता दिखाती है। उनकी 98वीं जयंती पर हम संकल्प लें। उनके आदर्श अपनाएं। देश को संकट से बचाएं। उनकी विरासत हमें मजबूत भविष्य की ओर ले जाए।

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वैभव सूर्यवंशी के रूप में क्या भारतीय क्रिकेट को मिल गया नया सचिन : डॉ. संदीप गोयल

वैभव सूर्यवंशी भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा युवा चेहरा बनकर उभरे हैं। सचिन तेंदुलकर और नाओमी ओसाका से तुलना के बीच जानिए कैसे वैभव नई पीढ़ी के स्पोर्ट्स सुपरस्टार बनते दिख रहे हैं।

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2026
drsandipgoyal

डॉ. संदीप गोयल, ‘रेडिफ्यूज़न’ और ‘एवरेस्ट’ के चेयरमैन।

आईपीएल 2026 खत्म हो चुका है, लेकिन उसका सबसे बड़ा सुपरस्टार वैभव सूर्यवंशी अभी बस शुरुआत कर रहा है। राजस्थान रॉयल्स के इस 15 वर्षीय ओपनर ने ऐसा रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन किया है, जिसने भारतीय क्रिकेट में एक नई बहस छेड़ दी है। वैभव आईपीएल इतिहास के पहले खिलाड़ी बन गए, जिन्होंने एक ही सीज़न में पांच बड़े व्यक्तिगत पुरस्कार अपने नाम किए। उन्होंने 16 पारियों में 776 रन बनाए और उनका स्ट्राइक रेट 237.31 रहा। उन्हें ऑरेंज कैप, मोस्ट वैल्यूएबल प्लेयर, इमर्जिंग प्लेयर ऑफ द सीज़न, सुपर स्ट्राइकर और सुपर सिक्सेस ऑफ द सीज़न जैसे सम्मान मिले।

वैभव ने सिर्फ रन नहीं बनाए, बल्कि रिकॉर्ड्स की पूरी किताब बदल दी। वह आईपीएल इतिहास के सबसे युवा ऑरेंज कैप विजेता बने। उन्होंने एक सीज़न में 72 छक्के लगाकर क्रिस गेल का 14 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। सिर्फ 440 गेंदों में 1000 आईपीएल रन पूरे करके उन्होंने आंद्रे रसेल का रिकॉर्ड भी पीछे छोड़ दिया। पावरप्ले में 521 रन बनाकर उन्होंने नई मिसाल कायम की। इतना ही नहीं, वह आईपीएल इतिहास के पहले अनकैप्ड खिलाड़ी बने, जिसने एक सीज़न में 700 से अधिक रन बनाए।

भारतीय खेल इतिहास में इतनी कम उम्र में इतना बड़ा प्रभाव शायद आखिरी बार सचिन तेंदुलकर ने डाला था। लेकिन सचिन और वैभव की यात्रा बिल्कुल अलग दौरों की कहानी है। सचिन ने अपनी पहचान टेस्ट क्रिकेट में दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाजों के सामने टिककर बनाई थी। उनका पहला टेस्ट शतक 189 गेंदों में आया था, जो उनके धैर्य, तकनीक और मानसिक मजबूती का प्रतीक था। दूसरी ओर वैभव टी20 युग के खिलाड़ी हैं, जहां आक्रमण ही अस्तित्व का सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने सिर्फ 38 गेंदों में शतक लगाकर दुनिया को दिखा दिया कि यह नई पीढ़ी का क्रिकेट है।

ब्रांड वैल्यू के स्तर पर भी वैभव ने बेहद कम समय में विस्फोटक उछाल देखा है। उनकी एंडोर्समेंट डील्स में कथित तौर पर 24 गुना तक वृद्धि हुई है। आज स्टेडियमों में लोग सिर्फ उन्हें देखने पहुंच रहे हैं। सचिन का दौर अलग था, जब स्टारडम धीरे-धीरे बनता था। 1990 के दशक में सोशल मीडिया नहीं था, टी20 लीग नहीं थीं और ब्रांडिंग की दुनिया सीमित थी। सचिन ने वर्षों की मेहनत से खुद को “भारत की उम्मीद” बनाया, जबकि वैभव की लोकप्रियता इंस्टेंट और विस्फोटक है।

खास बात यह है कि खुद “क्रिकेट के भगवान” सचिन तेंदुलकर भी वैभव की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने वैभव के बैट स्विंग को “शानदार” बताया। कई पूर्व क्रिकेटर मानते हैं कि वैभव में जेनरेशन बदलने वाला एक्स-फैक्टर है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि दूसरा सचिन बनना लगभग असंभव है।

यहीं से तुलना एक और एशियाई सुपरस्टार से जुड़ती है- टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका। नाओमी पारंपरिक जूनियर प्रोडिजी नहीं थीं। उन्होंने 20 साल की उम्र में 2018 यूएस ओपन जीतकर दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने चार ग्रैंड स्लैम खिताब जीते और दुनिया की नंबर-1 खिलाड़ी बनीं। उनका खेल पावर, आक्रामकता और मानसिक मजबूती का मिश्रण था।

वैभव और नाओमी की तुलना दिलचस्प इसलिए है क्योंकि दोनों ने बहुत कम उम्र में अपने खेल की रफ्तार बदल दी। लेकिन दोनों का मानसिक ढांचा एकदम अलग है। वैभव आज “ज़ेन स्टेट” वाले खिलाड़ी दिखाई देते हैं। आईपीएल 2026 के एलिमिनेटर में 29 गेंदों पर 97 रन बनाने के बाद भी उन्होंने उस पारी को स्कूल नेट प्रैक्टिस जैसा बताया। वह व्यक्तिगत रिकॉर्ड्स की जगह सिर्फ टीम के लिए छक्के लगाने की बात करते हैं। ऐसा लगता है कि मीडिया का शोर उनके खेल तक पहुंच ही नहीं पाता।

इसके उलट नाओमी ओसाका मीडिया दबाव और मानसिक तनाव से गहराई से प्रभावित हुईं। 2018 यूएस ओपन जीतने के बाद उन्होंने जिस भावनात्मक दबाव का सामना किया, उसने बाद में उन्हें मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने खेल से ब्रेक लेकर दुनिया को बताया कि सुपरस्टार खिलाड़ियों के भीतर भी इंसानी कमजोरियां होती हैं।

दोनों खिलाड़ियों में एक समानता जरूर है -उनका आक्रामक खेल। वैभव अपनी विशाल बैकलिफ्ट और निडर शॉट्स से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों को निशाना बनाते हैं। उन्होंने पावरप्ले बल्लेबाजी की परिभाषा बदल दी है। वहीं नाओमी ओसाका ने अपनी 120 मील प्रति घंटे की सर्विस और ताकतवर ग्राउंडस्ट्रोक्स से महिला टेनिस में नई आक्रामकता जोड़ी।

वैभव सूर्यवंशी, सचिन तेंदुलकर और नाओमी ओसाका तीन अलग-अलग दौर और खेलों के नाम हैं, लेकिन तीनों में एक समान बात है -इन सभी ने अपने खेल की दिशा बदल दी। सचिन भारतीय क्रिकेट की बुनियाद बने, नाओमी ने टेनिस में एशियाई पहचान को नई ऊंचाई दी और वैभव आज भारतीय क्रिकेट के नए विस्फोटक युग का चेहरा बनते दिख रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है -क्या वैभव आने वाले वर्षों में सिर्फ रिकॉर्ड मशीन बनकर रहेंगे या सचिन की तरह पीढ़ियों की उम्मीद बनेंगे? क्या वह नाओमी ओसाका की तरह दबाव और स्टारडम के बोझ से जूझेंगे, या अपनी मासूम बेफिक्री को लंबे समय तक बचाकर रख पाएंगे? इसका जवाब भविष्य देगा। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि भारतीय क्रिकेट को एक ऐसा किशोर सितारा मिल चुका है, जिसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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दुनिया को जोड़ने वाला सबसे बड़ा खेल उत्सव 'FIFA वर्ल्ड कप'

FIFA वर्ल्ड कप की असली ताकत सिर्फ खेल या मनोरंजन में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे विचार में है।

Last Modified:
Wednesday, 03 June, 2026
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शुभ्रांसु सिंह, सीएमओ, टाटा मोटर्स ।।

दुनिया इस समय ऐसे दौर से गुजर रही है जहां इंसानों को जोड़ने वाली चीजें धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं। देशों की सीमाएं और सख्त की जा रही हैं या बदली जा रही हैं। व्यापार को भी राजनीतिक और रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। देशों के बीच दोस्ती और गठबंधन अब सिद्धांतों के बजाय फायदे-नुकसान के आधार पर तय हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा अब सहयोग से ज्यादा स्वार्थ, दबाव और धमकी तक सीमित होती जा रही है। ऐसे माहौल में FIFA वर्ल्ड कप 2026 का आयोजन हो रहा है।

इसे केवल दुनिया की समस्याओं से कुछ समय के लिए ध्यान हटाने वाले आयोजन के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि वर्ल्ड कप उन विभाजनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ एक मजबूत संदेश है, जो दुनिया को बांट रही हैं।

आमतौर पर वर्ल्ड कप की महानता उसकी विशालता और भव्यता से जोड़ी जाती है। यह दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन है, जिसे देखने के लिए मानव इतिहास की सबसे बड़ी टीवी ऑडियंस जुटती है। यह बात सही और प्रभावशाली है, लेकिन लेखक के अनुसार वर्ल्ड कप की असली अहमियत सिर्फ इतनी नहीं है। इसकी वास्तविक ताकत इससे कहीं ज्यादा गहरी और अर्थपूर्ण है।

FIFA वर्ल्ड कप की असली ताकत सिर्फ खेल या मनोरंजन में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे विचार में है।

असल में वर्ल्ड कप एक ऐसा मंच है जहां आर्थिक, सैन्य या कूटनीतिक ताकत के आधार पर देशों की रैंकिंग मायने नहीं रखती। यहां सभी देशों के लिए नियम एक जैसे होते हैं। यहां सेनेगल इंग्लैंड को हरा सकता है, मोरक्को किसी यूरोपीय दिग्गज को मात दे सकता है और दक्षिण कोरिया जर्मनी जैसी मजबूत टीम को पराजित कर सकता है।

दुनिया में आम तौर पर देशों की ताकत उनकी आर्थिक शक्ति, सैन्य ताकत और राजनीतिक प्रभाव से तय होती है। अमीर और शक्तिशाली देशों की बात ज्यादा सुनी जाती है, जबकि छोटे या गरीब देशों का प्रभाव कम होता है, लेकिन वर्ल्डकप में यह पूरी व्यवस्था कुछ समय के लिए बदल जाती है।

फुटबॉल के मैदान पर सभी देशों के लिए नियम एक जैसे होते हैं। वहां यह मायने नहीं रखता कि किस देश की अर्थव्यवस्था बड़ी है, किसके पास ज्यादा सेना है या कौन ज्यादा शक्तिशाली है। इसीलिए, सेनेगल इंग्लैंड को हरा सकता है। मोरक्को किसी बड़े यूरोपीय देश को मात दे सकता है। दक्षिण कोरिया जर्मनी जैसी फुटबॉल महाशक्ति को हराने में सक्षम हो सकता है। 

दुनिया का कोई व्यापार समझौता, कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन या कोई राजनीतिक मंच ऐसी बराबरी नहीं ला सकता। यह काम सिर्फ फुटबॉल का मैदान कर सकता है। यही वर्ल्डकप की असली लोकतांत्रिक (Democratic) शक्ति है।

वर्ल्डकप की ताकत सिर्फ इस बात में नहीं है कि अलग-अलग देशों के लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं या खुशी मनाते हैं। उसकी असली ताकत इस बात में है कि एक गरीब या छोटा देश भी किसी अमीर और शक्तिशाली देश को हरा सकता है। फुटबॉल का मैदान यह याद नहीं रखता कि किस देश की GDP ज्यादा है। वहां सिर्फ प्रदर्शन, प्रतिभा और मेहनत मायने रखती है।

भारत इस पूरी स्थिति को एक अलग और सीख देने वाले नजरिए से देखता है।

भारत और FIFA वर्ल्डकप का रिश्ता बहुत खास है। भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और यहां खेलों के प्रति लोगों का जुनून भी बहुत गहरा है। इसके बावजूद भारत कभी FIFA वर्ल्डकप के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाया। इसलिए वर्ल्डकप से हमारा रिश्ता एक ऐसे समर्पित दर्शक का है, जो दिल और भावनाओं से पूरी तरह जुड़ा हुआ है, लेकिन मैदान पर मौजूद नहीं है।

प्रतियोगिता से बाहर बैठकर देखने का भी एक फायदा है। जब आपकी अपनी टीम नहीं खेल रही होती, तो अहंकार और पक्षपात खत्म हो जाता है। तब आप खेल को उसके सबसे शुद्ध रूप में देखते हैं। आप सिर्फ मैच, उसका रोमांच और उन खिलाड़ियों की कहानी देखते हैं, जिन्होंने दुनिया की नजरों के सामने खेले जाने वाले 90 मिनट के लिए वर्षों तक मेहनत की है।

भारत के गांवों, कस्बों और शहरों में फुटबॉल के प्रति प्रेम हर जगह दिखाई देता है। चाहे उत्तर भारत के मोहल्लों के मैदान हों, बंगाल के पाड़ा ग्राउंड, केरल के धान के खेतों के पास बने मैदान हों या पूर्वोत्तर भारत के खूबसूरत स्टेडियम- भारतीय फुटबॉल प्रेमी टूटी सड़कों पर नंगे पैर खेले जाने वाले फुटबॉल का भी उतना ही सम्मान करते हैं।

वर्ल्ड कप को केवल ‘एस्केपिज्म’ यानी वास्तविकता से कुछ समय के लिए भागना नहीं कहा जा सकता। असली फर्क यह है कि वर्ल्डकप हमें यह अनुभव कराता है कि देशों के बीच शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्धा कैसी दिखती है।

यहां मुकाबला होता है, लेकिन नफरत नहीं। यहां देशभक्ति होती है, लेकिन दूसरे देशों पर कब्जा करने की इच्छा नहीं।

यहां गर्व होता है, लेकिन ताकत या हिंसा से नहीं, बल्कि प्रतिभा और कौशल से।

वर्ल्डकप के दौरान कुछ समय के लिए दुनिया का ध्यान युद्ध, सेना और सीमा विवादों से हटकर खेल के मैदान पर आ जाता है। लोग मिसाइलों और संघर्षों की जगह खिलाड़ियों, गोलों और पेनल्टी बॉक्स की चर्चा करने लगते हैं। खेल कई बार वह काम कर देता है जो हथियार नहीं कर सकते। खेल तनाव को प्रतिस्पर्धा में बदल देता है, जबकि युद्ध उसे विनाश में बदल देता है।

इंसानों को सिर्फ युद्ध की तैयारी ही नहीं, बल्कि शांति का अभ्यास भी करना चाहिए। लोगों को ऐसे अवसरों की जरूरत होती है जो सामूहिक डर नहीं, बल्कि सामूहिक खुशी पैदा करें। उन्हें समय-समय पर यह महसूस करने की जरूरत होती है कि दुनिया अभी भी साझा अनुभवों के जरिए एक साथ आ सकती है।

इसी वजह से FIFA वर्ल्डकप को "दुनिया का सबसे बड़ा शो" कहा जाता है। यह सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि ऐसा आयोजन है जो कुछ समय के लिए पूरी मानवता को एक साझा अनुभव में जोड़ देता है।

FIFA वर्ल्डकप को "दुनिया का सबसे बड़ा शो" कहा जाता है और यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन यह सिर्फ ऐसा कार्यक्रम नहीं है जिसे आप टीवी पर बैठकर देखते हैं। यह एक ऐसा अनुभव है जिसमें लोग भावनात्मक रूप से पूरी तरह शामिल हो जाते हैं।

हर चार साल में कुछ हफ्तों के लिए अरबों लोग ऐसे देशों के बारे में सोचने लगते हैं जहां वे कभी नहीं गए। वे ऐसे खिलाड़ियों का समर्थन करने लगते हैं जिनसे वे कभी नहीं मिले। कई लोग रात में अलार्म लगाकर अलग-अलग टाइम ज़ोन में खेले जा रहे मैच देखते हैं।

वर्ल्डकप कुछ समय के लिए ऐसे समुदाय बना देता है जिनकी कोई कानूनी पहचान नहीं होती, कोई सीमा नहीं होती और कोई औपचारिक इतिहास नहीं होता। फिर भी उस समय वे लोगों को बेहद वास्तविक और अपने लगते हैं।

आज की दुनिया में लोगों को जाति, धर्म, राष्ट्र, विचारधारा और राजनीतिक समूहों के आधार पर लगातार बांटा जा रहा है। ऐसे माहौल में जब लाखों-करोड़ों लोग बिना किसी मजबूरी के एक साथ खुशी मनाते हैं, तो यह सिर्फ भावुकता नहीं बल्कि एक शक्तिशाली सामाजिक घटना है। यही वजह है कि FIFA वर्ल्डकप आज भी इतना महत्वपूर्ण है। इसकी अहमियत सिर्फ बड़े स्टेडियमों या अरबों डॉलर के प्रसारण सौदों में नहीं है।

इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह दुनिया के लोगों को, भले ही कुछ समय के लिए, यह एहसास करा देता है कि वे सभी एक ही मानव जाति का हिस्सा हैं और यही उनके बीच सबसे बड़ा साझा संबंध है।

यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि यह टूर्नामेंट ऐसे चैनल पर दिखाया जा रहा है जिसका नाम 'Unite8' है, क्योंकि वर्ल्डकप का असली संदेश भी लोगों को जोड़ना और एकजुट करना है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)  

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ईरान युद्ध ने बढ़ाई महंगाई की चिंता: पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

बारिश कम होने का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। अब भी हमारी आधी फसल बारिश पर निर्भर है। कम बारिश से उत्पादन कम होने की आशंका बढ़ जाती है।

Last Modified:
Monday, 01 June, 2026
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मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

शुक्रवार को शेयर बाज़ार सुबह से ऊपर चढ़ रहा था। अमेरिका और ईरान के बीच डील की खबरें आ रही थीं। क्रूड ऑयल की क़ीमतें गिर रही थीं। लेकिन एक खबर ने बाज़ार का मूड बिगाड़ दिया। मौसम विभाग का अनुमान आया कि इस साल मानसून बारिश सामान्य के मुक़ाबले 90% होने की आशंका है। हम ईरान युद्ध के कारण महंगाई से जूझ रहे हैं और अब बारिश कम होने की आशंका महंगाई की आग में घी डालने का काम कर सकती है।

मौसम विभाग का अनुमान क्या है?

मौसम विभाग हर साल अप्रैल और मई में मॉनसून का पूर्वानुमान जारी करता है। अप्रैल में कहा था कि इस साल सामान्य से 92% बारिश होगी, लेकिन शुक्रवार को इसे घटाकर 90% कर दिया। इतनी कम बारिश की आशंका पिछले दस साल में पहली बार लगाई गई है। मौसम विभाग पिछले 50 साल की मॉनसून बारिश का औसत निकालता है। यह औसत करीब 87 सेंटीमीटर है। फिर बताता है कि औसत से कम बारिश होगी या ज़्यादा। बारिश कम होने की आशंका का कारण है El Niño।

अब ये El Niño क्या है?

भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में मॉनसून का रिमोट कंट्रोल है। वहाँ तेज हवा चलती है, तो समुद्र के गर्म पानी को हमारी तरफ़ (हिंद-प्रशांत) धकेलती है। गर्म पानी से बादल बनते हैं, जमकर बारिश होती है। El Niño के साल में हवा नहीं चलती है, तो गर्म पानी हमारी तरफ़ नहीं आता है। बादल कम बनते हैं। बारिश कम होती है। इस साल यही होने की आशंका है।

महंगाई बढ़ने की आशंका

बारिश कम होने का सीधा असर फसलों पर पड़ता है। अब भी हमारी आधी फसल बारिश पर निर्भर है। कम बारिश से उत्पादन कम होने की आशंका बढ़ जाती है। कम उत्पादन का मतलब महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है। राहत की बात यह है कि हमारे पास अभी अनाज और पानी का पर्याप्त भंडार है। फिर भी कम बारिश होने से ग्रामीण क्षेत्रों में खपत कम होती है। अब भी हमारे देश की 45% आबादी खेतों में काम करती है। उनकी आमदनी पर भी असर पड़ता है। इससे FMCG, ऑटो और सीमेंट कंपनियों के माल की खपत कम हो सकती है। यही कारण है कि शुक्रवार को शेयर बाज़ार में गिरावट आ गई।

ग़रीबी में आटा गीला

हम अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पहले से परेशान हैं। युद्ध खत्म होने की ख़बरें तो रोज़ आती हैं, लेकिन बात तब बनेगी जब Strait of Hormuz खुलेगा। ईरान और ओमान के बीच यह संकरा जलमार्ग तीन महीनों से बंद है। दुनिया का 20% क्रूड ऑयल यहीं से गुज़रता है। यही वजह है कि पेट्रोल और डीज़ल के भाव बढ़े हैं। युद्ध खत्म होने पर भी सप्लाई सामान्य होने में कुछ महीने लगेंगे। इस पर बारिश के पूर्वानुमान ने ग़रीबी में हमारा आटा गीला कर दिया है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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वंदेमातरम् के साथ क्या ‘जय हिन्द’ भी विवाद में आएगा: आलोक मेहता

वंदे मातरम् का इतिहास केवल एक गीत का इतिहास नहीं बल्कि भारत की राजनीति, राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक समझौतों का इतिहास भी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा मानता है।

Last Modified:
Monday, 01 June, 2026
aalokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

केरल में सत्ता में आने के बाद राहुल गांधी और सतीशन की कांग्रेस सरकार ने विधानसभा के उद्घाटन सत्र में ही राष्ट्रगीत ‘वंदेमातरम्’ के पूरे 6 अंश को राज्यपाल के लिए तय प्रोटोकॉल नियमानुसार नहीं बजने दिया और इस गीत को आरएसएस का बताए जाने पर कई आपत्तियों के साथ सवाल भी खड़े हुए हैं। एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठा है कि अब अन्य राज्यों और 2029 में केंद्र में सत्ता के लिए ‘जय हिन्द’ और ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ के नारों को भी राहुल गांधी की टीम सार्वजनिक कार्यक्रमों पर बंद करवा देगी?

आखिर इनमें तो सीधे हिन्द और हिन्दू शब्दों का उपयोग है। और यह आशंका आज मेरी ही नहीं है, बल्कि जनवरी 1946 में महात्मा गांधी ने गुवाहाटी के एक भाषण में व्यक्त की थी। महात्मा गांधी ने कहा था कि “कांग्रेस की स्थापना के समय से ही वंदेमातरम् गाया जा रहा है। जो लोग इसका विरोध कर त्याग करने को कह रहे हैं, वे एक दिन जय हिन्द को भी त्याग देंगे। वंदेमातरम् का बहिष्कार नहीं होना चाहिए।”

केरल विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण से पहले पुलिस बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को पूरा न बजाकर केवल शुरुआती दो छंद (पुराना/संक्षिप्त हिस्सा) बजाने पर विवाद छिड़ा है। राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने इस बात पर नाराजगी जताई कि जब वह संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार के नीतिगत अभिभाषण के लिए विधानसभा में मौजूद थे, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा नहीं गाया गया।

उन्होंने कहा कि “जब राज्यपाल ऐसे कार्यक्रमों में उपस्थित हों, तब उचित प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए।” राज्यपाल ने विधानसभा से लौटने के बाद लोक भवन में पत्रकारों से कहा कि यह पहले से तय था कि जब भी राज्यपाल सदन में मौजूद हों, तब ‘वंदे मातरम्’ पूरा गाया जाना चाहिए। नीतिगत अभिभाषण से पहले और बाद में एक बैंड दल ने ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती अंतरे प्रस्तुत किए। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इस वर्ष के प्रारंभ में ही सरकार के सभी संस्थानों और राज्य सरकारों के लिए दिशा-निर्देश जारी कर आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के पूरे छह अंश बजाना अनिवार्य कर दिया है।

केरल के नए मुख्यमंत्री सतीशन ने इस मामले में संवाददाताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस और उसका यूडीएफ गठबंधन एक राजनीतिक विचारधारा के ढाँचे के भीतर काम करते हैं और वे पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों के अनुसार संचालित होते हैं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का स्पष्ट रुख है और वही गठबंधन पर भी लागू होता है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को पूरा गाना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि संसद ने इस संबंध में कोई कानून पारित नहीं किया है।

सवाल यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी राष्ट्रगीत, राष्ट्रीय चिन्ह अथवा भारत सरकार द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का विरोध इस हद तक करेगी और सरकार की संरक्षक बनी मुस्लिम लीग के निर्देशों का पालन करेगी? मुस्लिम लीग तो आजादी से पहले भी वंदेमातरम् का विरोध और मुस्लिम नागरिकों के लिए केवल मुस्लिम उम्मीदवार को वोट देने के अधिकार की मांग कर रही थी। संविधान निर्माताओं ने इसे ठुकरा दिया था।

शायद राहुल गांधी और उनकी सलाहकार मंडली इस बात को भी याद नहीं रखना चाहती कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित गीत ‘वन्देमातरम्’ 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में ही पहली बार गाया गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पहली बार इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। इसके बाद यह पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। उन्हीं टैगोर के शांति निकेतन में कुछ समय इंदिरा गांधी ने शिक्षा भी ली।

1905 के बंगाल विभाजन आंदोलन के समय ‘वंदे मातरम्’ ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रमुख नारा बन गया। कांग्रेस कार्यकर्ता इसका प्रयोग करते थे। ब्रिटिश सरकार कई जगह इसके सार्वजनिक प्रयोग पर रोक लगाती थी। कांग्रेस अधिवेशनों के अलावा आजादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस ‘जर्नल’ का प्रकाशन शुरू किया था, उसका नाम ‘वन्दे मातरम्’ रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़ने वाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जिह्वा पर आखिरी शब्द “वन्दे मातरम्” ही थे।

सन् 1907 में भीकाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया, तो उसके मध्य में “वन्दे मातरम्” ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिंटिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिबंधित पुस्तक ‘क्रांति गीतांजलि’ में पहला गीत ‘मातृ-वन्दना’ वन्दे मातरम् ही था।

‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन का एक प्रमुख प्रतीक रहा है। इसके समर्थन और विरोध का इतिहास भारत की राजनीति, सांप्रदायिक संबंधों, स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक राजनीतिक विमर्श से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह गीत जहाँ एक ओर लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा बना, वहीं कुछ मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम लीग ने राष्ट्रगीत की कुछ पंक्तियों पर आपत्ति जताई, क्योंकि उनमें भारत माता को देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया था। फिर भी आजादी के बाद 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा— “शब्दों व संगीत की वह रचना, जिसे जन गण मन से संबोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को संतुष्ट करेगा।” (भारतीय संविधान परिषद, खंड 12, 24 जनवरी 1950) शुरुआती दौर में कांग्रेस पार्टी ने वंदे मातरम् को व्यापक रूप से अपनाया।

कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इस पर आपत्ति जतानी शुरू की। उनकी मुख्य आपत्तियाँ थीं कि गीत में भारत माता को देवी स्वरूप में दिखाया गया और कुछ पंक्तियों में देवी-पूजा जैसी व्याख्या संभव थी। इसी कारण कांग्रेस नेतृत्व ने समझौता करने की कोशिश की। यानी कांग्रेस ने समर्थन और राजनीतिक समझौते दोनों किए।

दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रारंभ से वंदे मातरम् को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रमुख प्रतीक माना। संघ के दृष्टिकोण में यह राष्ट्रीय एकता का गीत है। इसका विरोध तुष्टीकरण की राजनीति का परिणाम माना गया। इसे व्यापक राष्ट्रवादी पहचान से जोड़ा गया। संघ से जुड़े संगठनों ने स्कूलों, शाखाओं और कार्यक्रमों में इसका उपयोग जारी रखा। उसकी भारतीय जनसंघ पार्टी ने वंदे मातरम् को अनिवार्य राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में समर्थन दिया।

फिर भारतीय जनता पार्टी ने वंदे मातरम् को लगातार राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा। नेताओं ने कई बार कहा कि वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। इसका विरोध राजनीतिक तुष्टीकरण है। इसे स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में बढ़ावा मिलना चाहिए। यह प्रतीकात्मक मातृभूमि की स्तुति है।

वंदे मातरम् का इतिहास केवल एक गीत का इतिहास नहीं, बल्कि भारत की राजनीति, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिक संबंधों और लोकतांत्रिक समझौतों का इतिहास भी है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता संघर्ष की आत्मा मानता है। दूसरा पक्ष कहता है कि राष्ट्रवाद को किसी एक सांस्कृतिक प्रतीक तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

अब 26 अक्टूबर 2025 को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वंदेमातरम्’ गीत के इतिहास की देशवासियों को फिर से याद दिलाई और राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 7 नवंबर से भारत सरकार की ओर से एक वर्ष तक अलग-अलग कार्यक्रमों का आयोजन करने का निर्णय लिया। इन आयोजनों के माध्यम से देश भर में ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गान आयोजित हो रहा है, जिससे देश की युवा पीढ़ी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के विचार को आत्मसात कर पाए। संसद में वन्दे मातरम् पर लगभग 10 घंटे की चर्चा हुई, जिसमें प्रधानमंत्री एवं अन्य सदस्यों ने भाग लिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि “वंदे मातरम् हजारों वर्ष की सांस्कृतिक ऊर्जा भी थी। उसमें आजादी का जज्बा भी था और आजाद भारत का विजन भी था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने उस समय समाज के एक वर्ग की हीन भावना को भी झकझोरने के लिए और सामर्थ्य का परिचय कराने के लिए वंदे मातरम् में भारत के सामर्थ्यशाली रूप को प्रकट करते हुए लिखा था कि भारत माता ज्ञान और समृद्धि की देवी भी हैं और दुश्मनों के सामने अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली चंडी भी हैं। वंदे मातरम् सिर्फ गीत या भावगीत नहीं, यह हमारे लिए प्रेरणा है, राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए हमें झकझोरने वाला काम है और इसलिए हमें निरंतर इसको करते रहना होगा।

हम आत्मनिर्भर भारत का सपना लेकर चल रहे हैं, उसको पूरा करना है। वंदे मातरम् हमारी प्रेरणा है। हम स्वदेशी आंदोलन को ताकत देना चाहते हैं। समय बदला होगा, रूप बदले होंगे, लेकिन महात्मा गांधी ने जो भाव व्यक्त किया था, उस भाव की ताकत आज भी मौजूद है और वंदे मातरम् हमें जोड़ता है। देश के महापुरुषों का सपना था स्वतंत्र भारत का, देश की आज की पीढ़ी का सपना है समृद्ध भारत का। आजाद भारत के सपने को सींचा था वंदे मातरम् की भावना ने और समृद्ध भारत के सपने को भी वही भावना सींचेगी।”

प्रधानमंत्री ने संकल्प के रूप में कहा कि वंदे मातरम् की भावनाओं को लेकर हमें आगे चलना है। हमें आत्मनिर्भर भारत बनाना है और 2047 में देश विकसित भारत बनकर रहे। अगर आजादी के 50 साल पहले कोई आजाद भारत का सपना देख सकता था, तो 25 साल पहले हम भी समृद्ध भारत और विकसित भारत का सपना देख सकते हैं और इस सपने के लिए अपने आप को खपा भी सकते हैं। इसी मंत्र और इसी संकल्प के साथ वंदे मातरम् हमें प्रेरणा देता रहे। वंदे मातरम् का हम ऋण स्वीकार करें, वंदे मातरम् की भावनाओं को लेकर चलें, देशवासियों को साथ लेकर चलें, हम सब मिलकर चलें और इस सपने को पूरा करें।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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हिंदी पत्रकारिता दिवस: मीडिया के महासागर में सागर मंथन का दौर

30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस हमें उस गौरवशाली परंपरा की याद दिलाता है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज के डिजिटल युग तक भारतीय समाज और लोकतंत्र को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Vinod Agnihotri Hindi Journalism Day

विनोद अग्निहोत्री, सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह

30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की उस गौरवशाली परंपरा को याद करने का अवसर है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर डिजिटल युग तक भारतीय समाज, लोकतंत्र और जनचेतना को दिशा देने का काम किया है। समय के साथ पत्रकारिता के स्वरूप, माध्यम और चुनौतियां बदली हैं, लेकिन उसका मूल उद्देश्य जनता के सरोकारों को आवाज देना और सत्ता से सवाल पूछना ही रहा है।

एक दौर था जब पत्रकारिता का अर्थ केवल अखबारों और पत्रिकाओं तक सीमित था। इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के नाम पर रेडियो और बाद में दूरदर्शन के लिए समाचार संकलित करने वाले संवाददाता भी इसमें शामिल हो गए, लेकिन पत्रकारिता का केंद्र प्रिंट मीडिया ही था। आजादी से पहले पत्रकारिता मुख्य रूप से दो धाराओं में विभाजित थी—अंग्रेजी पत्रकारिता, जो आमतौर पर सत्ता के करीब मानी जाती थी, और हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता, जिसका बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन और जनता के बुनियादी सवालों से जुड़ा हुआ था।

उस दौर में पत्रकारिता जोखिम भरा काम थी। पत्रकार, संपादक, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी अक्सर एक ही भूमिका में दिखाई देते थे। महात्मा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने अखबारों और पत्रिकाओं को जनजागरण का माध्यम बनाया। अंग्रेज सरकार ने कई बार समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाए, अंक जब्त किए और पत्रकारों को जेल तक भेजा, लेकिन इसके बावजूद पत्रकारिता जनता की आवाज बनी रही।

आजादी के बाद पत्रकारिता की भूमिका बदली। राष्ट्र निर्माण के दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की भावना को समाज तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता ने भी निभाई। शुरुआती दशकों में पत्रकारिता सरकारों की कमियों को सामने लाने के साथ-साथ विकास और जनहित के मुद्दों को भी प्रमुखता देती रही। जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता इतनी मजबूत थी कि सत्ता प्रतिष्ठान उसके नैतिक दबाव को महसूस करता था।

धीरे-धीरे पत्रकारिता लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ के रूप में स्थापित हुई, जिस पर जनता को सबसे अधिक भरोसा होने लगा। साठ और सत्तर के दशक में किसानों, मजदूरों और छात्रों के आंदोलनों, गैर-कांग्रेसी राजनीति के उभार, जेपी आंदोलन और फिर आपातकाल ने पत्रकारिता को नई दिशा दी। आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई, कई पत्रकारों को जेल जाना पड़ा और अनेक प्रकाशनों को कठिन दौर से गुजरना पड़ा। लेकिन इसी संघर्ष ने प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को और अधिक मजबूत किया।

आपातकाल के बाद खोजी पत्रकारिता और मैदानी रिपोर्टिंग का दौर आया। पत्रकारिता महानगरों से निकलकर कस्बों और गांवों तक पहुंची। हिंदी पत्रकारिता ने इसी दौर में अपने प्रभाव का व्यापक विस्तार किया। जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, नई दुनिया, अमर उजाला, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका जैसे समाचार पत्रों ने हिंदी पत्रकारिता को नई पहचान दी। जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों, खोजी रिपोर्टिंग और सामाजिक हस्तक्षेप ने पाठकों का भरोसा मजबूत किया। कई पत्रकारों ने सत्ताधीशों, माफियाओं और प्रभावशाली समूहों के खिलाफ लिखने की कीमत भी चुकाई, लेकिन पत्रकारिता की साख लगातार बढ़ती रही।

हालांकि 1980 और 1990 के दशक का सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल भरा दौर पत्रकारिता को भी प्रभावित किए बिना नहीं रहा। मंडल और मंदिर की राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण और बदलते राजनीतिक समीकरणों का असर मीडिया पर भी दिखाई देने लगा। इसी दौरान आर्थिक उदारीकरण आया और पत्रकारिता के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई। मीडिया संस्थान धीरे-धीरे उद्योग और व्यवसाय में बदलने लगे। समाचारों की प्रस्तुति, प्राथमिकताओं और कार्य संस्कृति में बदलाव आने लगा। पत्रकारिता का मिशन धीरे-धीरे पेशेवर मीडिया उद्योग में परिवर्तित होने लगा।

निजी समाचार चैनलों के आगमन ने मीडिया की पहुंच और प्रभाव को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया। लोगों की रुचि पढ़ने से ज्यादा देखने और सुनने की ओर बढ़ी। लेकिन इसके साथ टीआरपी, विज्ञापन और प्रतिस्पर्धा का दबाव भी बढ़ा। कई बार खबरों की गंभीरता की जगह सनसनी और तात्कालिकता को अधिक महत्व मिलने लगा। इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने शुरू हुए।

इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट और सोशल मीडिया ने मीडिया जगत को पूरी तरह बदल दिया। वेबसाइट, यूट्यूब, फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे मंचों ने सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक बना दिया। अब आम नागरिक भी सूचना और विचारों के प्रसार में भागीदारी करने लगा। इससे पारंपरिक मीडिया का एकाधिकार टूटा और अनेक स्वतंत्र पत्रकारों तथा वैकल्पिक मंचों को नई जगह मिली।

लेकिन इस परिवर्तन के साथ नई चुनौतियां भी सामने आईं। फेक न्यूज, दुष्प्रचार, आधी-अधूरी सूचनाएं और वैचारिक ध्रुवीकरण ने मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित किया। पिछले वर्षों में राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण का असर न्यूज रूम तक दिखाई देने लगा। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को वैचारिक खेमों में बांटकर देखा जाने लगा। ऐसे माहौल में निष्पक्षता, तथ्यपरकता और संतुलन की कसौटी पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने मीडिया के सामने नई संभावनाएं और नई चुनौतियां दोनों खड़ी कर दी हैं। समाचार लेखन, अनुवाद, वीडियो निर्माण और कंटेंट वितरण में AI का उपयोग बढ़ रहा है। वहीं डीपफेक, फर्जी सामग्री और सूचना की प्रामाणिकता से जुड़े सवाल भी सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में पत्रकारिता की विश्वसनीयता का आधार तकनीक नहीं, बल्कि संपादकीय विवेक, तथ्य जांच और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता ही रहेंगे।

आज हिंदी पत्रकारिता ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसके सामने अवसर भी हैं और चुनौतियां भी। तकनीक ने उसकी पहुंच को पहले से कहीं अधिक व्यापक बनाया है, लेकिन विश्वसनीयता की कसौटी भी उतनी ही कठोर हो गई है। मीडिया के महासागर में यह सचमुच सागर मंथन का दौर है। इस मंथन में विष भी है और अमृत भी। यह पत्रकारिता और पत्रकारों पर निर्भर करेगा कि वे किस दिशा का चयन करते हैं।

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर यह स्मरण करना जरूरी है कि माध्यम बदल सकते हैं, तकनीक बदल सकती है, लेकिन पत्रकारिता का मूल धर्म नहीं बदलता। सत्य, जनसरोकार, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। आने वाले समय में हिंदी पत्रकारिता की प्रासंगिकता और प्रतिष्ठा भी इन्हीं मूल्यों से तय होगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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सरकारी उपेक्षा से हिंदी पत्रकारिता की गिरती साख

किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज बाजारीकरण, आर्थिक संकट और घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Jitendra Bachchan Hindi Journalism Day

जितेन्द्र बच्चन, वरिष्ठ पत्रकार।।

देश में सबसे अधिक हिंदी भाषा में ही समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और समाचार चैनल भी सबसे ज्यादा हैं। हिंदी पत्रकारिता के बलबूते ही पत्र-पत्रिकाएं व चैनल लाखों-करोड़ों का कारोबार करते हैं। इसके बावजूद उसकी वह धाक नहीं बन पाई जो अंग्रेजी अखबारों या मैग्जींस की है।

किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज सरकारी उपेक्षा और बाजारीकरण, आर्थिक संकट व घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है। अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बनी हुई है और अब तो दिन-प्रतिदिन इसकी साख गिरती जा रही है।

हिंदी पत्रकारिता करने वाले 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर दूसरी भाषाओं को खूब कोसते हैं, लेकिन यही कोसने वाले लोग हिंदी के पत्रकारों को नौकरी नहीं देना चाहते। हिंदी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकार एवं सरकार बड़े-बड़े आयोजन तो करते हैं, लेकिन शोहरत अंग्रेजी में छोटे-मोटे कार्यक्रम करने वाले एडिटर के खाते में जाती है।

राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापनों में अक्सर अंग्रेजी के बड़े अखबारों को प्राथमिकता दी जाती है। क्षेत्रीय और हिंदी के छोटे समाचार पत्रों को कम विज्ञापन या कम दरें मिलती हैं, जिससे उनका आर्थिक ढांचा चरमरा जाता है। किसी सार्वजनिक बड़े मंच पर जब किसी पत्रकार को स्थान देना होगा या संवाद में हिस्सा लेना होता है तो अंग्रेजी वाले साहब को अहमियत दी जाती है। मान्यता देने के मामले में भी हिंदी के पत्रकारों की अनदेखी की जाती है। इसी उपेक्षा के चलते आज हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बन चुकी है।

यही कारण है कि सरकारी न्यूज चैनल या पत्र-पत्रिकाओं में संवाददाता नियुक्त करते समय या संपादकीय विभाग में कोई नौकरी देते वक्त उसे साक्षात्कार अंग्रेजी में देना पड़ता है। कितनी अजीब बात है कि काम हिंदी में करना है लेकिन सरकार हिंदी को महत्व न देकर अंग्रेजी को महत्व देती है। क्यों, यह एक बड़ा सवाल है।

बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें हिंदी भाषा का अच्छा ज्ञान है। उनका अनुभव बोलता है लेकिन अंग्रेजी में कमजोर होने के नाते सरकारी अधिकारी उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। उनको महत्व देने के बजाय उनका माखौल उड़ाया जाता है। हिंदी पत्रकारिता करने वालों को दलाल और चापलूस बताया जाता है।

कितनी अजीब विडंबना है कि अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता आज अनाथ जैसी हालत में है। इसकी वकालत करने वाले को कम पढ़ा-लिखा समझा जाता है। नतीजतन हिंदी भाषा बहुल्य देश होते हुए भी आज 195 राष्ट्रों की सूची में हिंदी पत्रकारिता काफी निचले स्थान पर है।

हिंदी पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और प्रकाशनों की बहुत ही दयनीय स्थिति है। हैरानी की बात तो यह है कि इन्हीं हिंदी चैनलों और समाचार पत्र–पत्रिकाओं की बदौलत जो राजनेता, व्यापारी और अभिनेता आसमान छू रहे हैं और ताकतवर बने हुए हैं, वही वक्त आने पर हिंदी पत्रकारों को भूलकर अंग्रेजी के चैनलों व अखबारों को ज्यादा पूछते हैं। इससे अधिक उपेक्षा और क्या होगी।

और अब तो हिंदी पत्रकारिता के सामने विश्वसनीयता का संकट भी खड़ा हो चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों और फर्जी खबरों की बाढ़-सी आ गई है। अंग्रेजी वाली ब्रेकिंग न्यूज (सबसे पहले खबर) की बराबरी करने की अंधी दौड़ में ‘सच’ पीछे छूट जाता है। सनसनीखेज बनाने की होड़ में तथ्यों की पुष्टि किए बिना ही खबरें परोसी जा रही हैं, जिससे हिंदी पत्रकारिता के सिद्धांतों और उसकी साख को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।

व्यावसायिक दबावों और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आज हिंदी पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। कुछ मीडिया घरानों ने इसे एक लाभ कमाने वाला व्यवसाय बना दिया है। राजनीतिक हित साधने लगे हैं। टीआरपी और ज्यादा क्लिक्स पाने के लिए गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर अंग्रेजी वालों की तरह सनसनीखेज और सतही खबरों को अधिक महत्व देने लगे हैं। इसके चलते कई बार खबरें निष्पक्ष नहीं लगती।

सोशल मीडिया, यूट्यूब और एआई आधारित प्लेटफॉर्म्स ने समाचारों के उपयोग का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। वेब पत्रकारिता की भाषा व्याकरण, वर्तनी और हिंदी के मूल स्वरूप को नष्ट करने लगी है। ऐसे में जहां हिंदी पत्रकारिता को मौजूदा नई चुनौतियों का विश्लेषण करने की जरूरत है, वही सरकार को भी हिंदी के पत्रकारों को पूर्ण अहमियत देनी होगी। तभी हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान मिलेगा, जो उसकी जरूरत ही नहीं अधिकार भी है

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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बदलते दौर में हिंदी पत्रकारिता: चुनौतियां, बाजार और विश्वसनीयता का संकट

पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Rahul Mahajan Hindi Journalism Day

राहुल महाजन, हेड ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स, बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड।।

हिंदी पत्रकारिता का इतिहास देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना से जुड़ा रहा है। कभी यह जनसरोकारों की आवाज मानी जाती थी। अखबार केवल खबरें नहीं छापते थे, बल्कि समाज में बहस खड़ी करते थे, सत्ता से सवाल पूछते थे और आम लोगों की समस्याओं को सामने लाते थे। आज तस्वीर बदल चुकी है। तकनीक, बाजार और राजनीति के दबाव ने पत्रकारिता के स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है।

डिजिटल दौर ने खबरों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब सूचना का प्रवाह इतना तेज हो गया है कि हर व्यक्ति अपने मोबाइल पर हर समय नई खबर देखना चाहता है। सोशल मीडिया, यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक मीडिया को पीछे छोड़ने की चुनौती खड़ी कर दी है। पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।

फेक न्यूज आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। सोशल मीडिया पर अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं इतनी तेजी से फैलती हैं कि कई बार सच पीछे छूट जाता है। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ा है। लोगों के मन में यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि किस खबर पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं।

एक बड़ा बदलाव पत्रकारिता की कार्यशैली में भी आया है। पहले पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था क्योंकि उसका काम सत्ता से जवाब मांगना और जनता की आवाज को मजबूती देना था। लेकिन अब यह धारणा मजबूत हुई है कि मीडिया का एक हिस्सा सरकार से असहज सवाल पूछने से बचता है। कई पत्रकार और मीडिया संस्थान खुलकर राजनीतिक विचारधाराओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। इससे पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।

आज दर्शक भी खबरों को अक्सर चैनलों और अखबारों की राजनीतिक छवि के आधार पर देखने लगे हैं। बहसें कई बार तथ्यों से ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप और शोर तक सीमित रह जाती हैं। इसका असर लोकतांत्रिक संवाद पर भी पड़ रहा है। जब मीडिया का ध्यान जनहित से हटकर राजनीतिक खेमेबंदी पर केंद्रित होने लगे, तब आम लोगों के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

दूसरी ओर मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक संकट भी गहराता जा रहा है। प्रिंट मीडिया की आय पहले बड़े पैमाने पर विज्ञापनों पर निर्भर थी, लेकिन अब विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल कंपनियों की ओर चला गया है। ऐसे में कई संस्थानों के सामने कम खर्च में काम चलाने की मजबूरी है।

खर्च घटाने की इस दौड़ का असर न्यूजरूम पर साफ दिखाई देता है। कर्मचारियों की संख्या कम की जा रही है, छोटे शहरों के दफ्तर बंद हो रहे हैं और एक पत्रकार से कई तरह का काम लिया जा रहा है। रिपोर्टिंग के साथ वीडियो बनाना, संपादन करना और सोशल मीडिया संभालना अब सामान्य बात हो गई है। इससे पत्रकारों पर दबाव बढ़ा है और खबरों की गहराई कम हुई है।

खोजी पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग सबसे अधिक प्रभावित हुई है। गांव, किसान, मजदूर और छोटे शहरों की समस्याएं पहले की तुलना में कम दिखाई देती हैं क्योंकि ऐसी रिपोर्टिंग में समय और संसाधन दोनों अधिक लगते हैं। इसके बजाय त्वरित, सनसनीखेज और ज्यादा क्लिक पाने वाली खबरों को प्राथमिकता मिल रही है।

इसके बावजूद हिंदी पत्रकारिता की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। हिंदी भाषी पाठकों और डिजिटल दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच ने नए पाठक तैयार किए हैं। स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैकल्पिक पत्रकारिता के नए प्रयोग भी सामने आ रहे हैं, जो गंभीर और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रहे हैं।

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है-जनता तक सही और संतुलित जानकारी पहुंचाना। तकनीक और बाजार के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को कैसे बचाए रखे। मीडिया यदि सत्ता, बाज़ार और राजनीतिक खेमेबंदी से ऊपर उठकर जनता के सवालों को केंद्र में रखे, तभी उसका लोकतांत्रिक महत्व बना रहेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहां मना है!

यह पहली बार नहीं है जब हिंदी पत्रकारिता किसी चुनौती के दौर से गुजर रही है और न ही यह आखिरी बार होगा। समय के साथ पत्रकारिता ने हर चुनौती का सामना किया है और आगे भी करेगी।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Manoj Kumar

प्रो. मनोज कुमार।।

दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता का स्मरण करते हुए जब हम पंडित युगल किशोर शुक्ल और ‘उदंत मार्तण्ड’ को याद करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से गर्व की अनुभूति होती है। लेकिन जब आज की पत्रकारिता का स्वरूप देखते हैं, तो वह गर्व कहीं न कहीं चिंता में बदलता दिखाई देता है। इन दो सौ वर्षों में हिंदी पत्रकारिता ने समाज, राष्ट्र और लोकतंत्र के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन समय के साथ उसने बहुत कुछ खोया भी है। कभी हिंदी पत्रकारिता अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का माध्यम थी, आज वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपनी विश्वसनीयता बचाने की चुनौती से जूझ रही है।

हर दौर में सत्ता के लिए पत्रकारिता एक चेतावनी की तरह रही है और आगे भी रहेगी। यह संतोष की बात है कि तमाम बदलावों और गिरावट के बावजूद आज भी प्रतिष्ठा बचाने के लिए लोग पत्रकारिता की ताकत से डरते हैं। यही हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी है।

हालांकि इन दो सौ वर्षों में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। पत्रकारिता की तकनीक अब केंद्र में है और हम तकनीक-प्रधान पत्रकारिता के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह हिंदी पत्रकारिता का संक्रमण काल है, जिसे नई और पुरानी दोनों पीढ़ियों को स्वीकार करना होगा। आज सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि हिंदी पत्रकारिता ‘एआई’ (AI) और ‘चैटजीपीटी’ (ChatGPT) जैसी तकनीकों के साथ कैसे तालमेल बैठाए। संकट बड़ा है, लेकिन इसका समाधान भी हमें ही तलाशना होगा। यह पहली बार नहीं है जब हिंदी पत्रकारिता किसी चुनौती के दौर से गुजर रही है और न ही यह आखिरी बार होगा। समय के साथ पत्रकारिता ने हर चुनौती का सामना किया है और आगे भी करेगी।

भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अनेक संकटों और कठिन परिस्थितियों के बीच हिंदी पत्रकारिता ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाए। स्वतंत्रता के बाद नवभारत निर्माण में भी पत्रकारिता ने एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई। उस दौर में देश विकास और नवाचार की ओर बढ़ रहा था और संसाधनों के वितरण को लेकर सवाल भी उठ रहे थे। तब भी हिंदी पत्रकारिता ने जिम्मेदारी निभाते हुए अनेक घोटालों और विसंगतियों को उजागर किया। समाज ने उसकी सराहना की, लेकिन सत्ता का असहज होना स्वाभाविक था।

दरअसल सत्ता और पत्रकारिता का संबंध नदी के दो किनारों की तरह है- साथ-साथ चलते हैं, लेकिन कभी मिलते नहीं। वर्ष 1947 से 1975 तक का दौर लोकतंत्र और पत्रकारिता दोनों के लिए महत्वपूर्ण रहा। 1975 का आपातकाल हिंदी पत्रकारिता की परीक्षा का समय था। उस दौर में प्रेस पर पहरे बैठा दिए गए और शब्द-शब्द सरकारी निगरानी में आने लगा। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद पत्रकारिता ने हार नहीं मानी। विरोधस्वरूप कई समाचार पत्रों ने संपादकीय पृष्ठ खाली छोड़ दिए और विभिन्न तरीकों से प्रतिरोध दर्ज कराया। पत्रकारिता का वही स्वाभिमान आज भी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

हालांकि यह भी सच है कि समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप बदलने लगा। पत्रकारिता धीरे-धीरे मीडिया और फिर उद्योग का रूप लेने लगी। मिशन के रूप में शुरू हुई पत्रकारिता रोजगार और व्यवसाय के बड़े क्षेत्र में बदल गई। पेशेवर पत्रकार तैयार करने के लिए मीडिया शिक्षा संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी। हर संस्थान अपने दावे और विशेषताओं के साथ सामने आया।

तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने पत्रकारिता की कार्यशैली को भी बदल दिया। अब पत्रकारिता में संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ तकनीकी दक्षता को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। कभी पत्रकारिता को समाज की पीड़ा को समझने और न्याय दिलाने का माध्यम माना जाता था, लेकिन आज तकनीक के सहारे प्रस्तुति और गति को अधिक अहमियत मिल रही है।

मेरे गुरुजनों ने सिखाया कि पत्रकारिता दिल से होती है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए पत्रकारिता अधिक व्यावसायिक और तकनीक-आधारित होती जा रही है। एआई और चैटजीपीटी जैसी तकनीकों ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। आज मोबाइल पर कुछ निर्देश देते ही मनचाहा कंटेंट कुछ ही क्षणों में तैयार हो जाता है। यह तकनीकी सुविधा जितनी उपयोगी है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी।

अब हमारे सामने दो ही रास्ते हैं- या तो हम खुद को तकनीक के अनुरूप ढालें या फिर समय से पीछे छूट जाएं। जैसे कभी फोटोटाइपसेटर और फिर कंप्यूटर के आने पर पत्रकारिता की कार्यप्रणाली बदली थी, वैसे ही आज एआई का दौर पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां लेकर आया है। जो लोग बदलाव के साथ चले, वे आगे बढ़े और जो पीछे रह गए, वे धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए।

स्थिति यह है कि कभी समाज यह कहकर खबर पर भरोसा करता था कि ‘यह अखबार में छपा है’, जबकि आज लोग कहते हैं-‘एक बार खबर की पुष्टि कर लेना।’ यह बदलाव पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। फिर भी उम्मीद बाकी है। तमाम चुनौतियों और अंधेरों के बीच हिंदी पत्रकारिता का दीप अभी बुझा नहीं है। ऐसे समय में बालकवि बैरागी की ये पंक्तियां बरबस याद आती हैं-

“माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहां मना है!”

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं तथा शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं।)

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हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियां और संभावनाएं

भारतीय पत्रकारिता में हर युग में चुनौतियां और उपलब्धियां रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
Alok Mehta Hindi Journalism Day

आलोक मेहता।।

भारतीय पत्रकारिता में हर युग में चुनौतियां और उपलब्धियां रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं। सच तो यह है कि मीडिया के विभिन्न माध्यम एकदूसरे के पूरक भी हैं। हिंदी और भारतीय भाषाओं के बाहुल्य वाले भारतीय शहरों से लेकर गांव तक सूचना, समाचार, विचार पढ़ने, सुनने और देखने की भूख कम होने के बजाय बढ़ती गई है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही क्यों, अब तो सोशल मीडिया भी बड़े पैमाने पर लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि समय के साथ हिंदी पत्रकारिता में भी कई तरह के बदलाव आए हैं। तिलक और गणेश शंकर विद्यार्थी युग वाली पत्रकारिता की अपेक्षा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नहीं की जा सकती। लेकिन आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से 70 के दशक से संपादकों और पत्रकारों ने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरूकता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी और हरिवंश जैसे संपादकों ने हिंदी के अखबारों के पाठकों के साथ संपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, नई दुनिया, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और प्रभात खबर जैसे प्रमुख दैनिक अखबार राजधानी दिल्ली से आगे बढ़कर विभिन्न हिंदीभाषी प्रदेशों में भी निरंतर अपनी छाप छोड़ते रहे। राजेन्द्र माथुर जब 1982 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर दिल्ली आए तो उन्होंने कुछ ही सप्ताह बाद एक समारोह में कहा था कि हिंदी का कोई अखबार केवल दिल्ली या मुंबई से प्रकाशित होने से राष्ट्रीय नहीं कहा जा सकता। वह तभी राष्ट्रीय कहला सकता है जब देश के विभिन्न राज्यों में उसके संस्करण हों।

यों अज्ञेय ने भी 1977 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनने पर दिल्ली, मुंबई के अलावा बिहार की राजधानी पटना से अखबार का संस्करण निकालने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन दो वर्ष के संक्षिप्त कार्यकाल के कारण वह सपना पूरा नहीं हुआ। माथुर साहब के आने के बाद लखनऊ, जयपुर, पटना के संस्करण निकले। इसी तरह जब मुझे दैनिक हिंदुस्तान का संपादक बनने का अवसर मिला, पटना के अलावा लखनऊ यानी उत्तर प्रदेश के संस्करण निकालने के लिए प्रबंधन तैयार हुआ।

इसी तरह हरिवंशजी ने प्रभात खबर संभालने के बाद इसे झारखंड और बिहार में प्रतिष्ठित अखबार बना दिया। जनसत्ता दिल्ली के अलावा मुंबई और कोलकाता से प्रकाशित हुआ। दिलचस्प बात यह भी रही कि राजस्थान पत्रिका जैसे जयपुर के अखबार ने कोलकाता के अलावा दक्षिण भारत में हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में हिंदी पाठकों के लिए संस्करण निकाले। इस दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता ने अपनी गुणवत्ता से व्यापक स्तर पर पाठकों में अपनी पहचान बनाई। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले हिंदी अखबारों की प्रगति को उपलब्धि की श्रेणी में रखा जा सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी टेलीविजन के समाचार चैनल आने से हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या कम नहीं हुई बल्कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भी इनके पाठक बढ़ते गए। मेरा यह मानना है कि रेडियो या टेलीविजन पर कोई खबर देखने के बाद सामान्य जनता इन्हें विस्तार से देखने, पढ़ने और उस पर होने वाली टिप्पणियों के लिए अखबार या पत्रिका पढ़ती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से पहले भी दैनिक अखबारों में रंगीन फोटो तथा आधुनिक डिजाइन के आकर्षक प्रस्तुतिकरण के प्रयास होने लगे थे। अन्यथा 70 के दशक के पहले भारत ही नहीं, ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश में भी अखबारों में रंगीन फोटो नहीं छपते थे।

इसलिए यह कहा जा सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने पर हिंदी अखबारों की डिजाइन और परिशिष्ट में रंगीन फोटो छपने लगे। रविवारीय संस्करण कुछ हद तक पत्रिका की कमी भी पूरी करने लगे। असली समस्या यह है कि आधुनिक तकनीक, प्रिंटिंग का खर्च और न्यूजप्रिंट के मूल्य लगातार बढ़ने से बड़े प्रभावशाली कहे जाने वाले अखबार के प्रबंधन घाटे और मुनाफे पर अधिक ध्यान देने लगे। कुछ हद तक राजनीतिक सत्ता का प्रभाव भी इन अखबारों पर पड़ा। इस संदर्भ में देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ग्रुप द्वारा मुनाफे को ही सर्वाधिक महत्व देने और अखबार को चटपटा, मसालेदार तथा अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री के अनुवाद को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई जिसका असर अन्य हिंदी अखबारों पर भी पड़ा। लेकिन प्रादेशिक और स्थानीय कम प्रसार संख्या वाले अखबार बहुत हद तक व्यावसायिक नहीं हुए और पाठकों के बीच स्थानीय समाचारों और उपयोगी सामग्री के जरिए अपना स्थान बनाए हुए हैं।

यह कहा जा सकता है कि महानगरों का एक बड़ा वर्ग और युवा पीढ़ी इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के आने के बाद अखबारों में कम दिलचस्पी ले रही है। लेकिन छोटे कस्बों और गांवों में आज भी अखबार पढ़ने की रुचि बनी हुई है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता बढ़ने से अखबारों के लिए अब भी संभावनाएं दिखाई देती हैं। सरकारों खासकर नौकरशाहों ने यह गलत धारणा बना रखी है कि अब लोग अखबार, पत्रिका या पुस्तकें नहीं पढ़ना चाहते हैं। वह भूल जाते हैं कि अमेरिका या जापान जैसे आधुनिक संपन्न देशों में भी अखबारों की प्रसार संख्या अच्छी-खासी है।

वास्तव में प्रकाशकों और संपादकों पर यह निर्भर है कि वे बाजार से प्रभावित न होकर ऐसी सामग्री पाठकों को उपलब्ध कराएं जो सामान्यतः टेलीविजन पर भी नहीं मिल सकती। पश्चिमी देशों की तरह भारत में अलग से टैब्लॉयड अखबार भी निकले लेकिन दुर्भाग्य से कई अखबार सनसनीखेज सामग्री और फोटो आदि से टैब्लॉयड की तरह अखबार का स्तर गिराने लगे, वहीं मशीन, प्रिंटिंग और प्रसार व्यवस्था पर अधिकाधिक धन खर्च किया जा रहा है लेकिन समाचारों के संकलन और समर्पित पत्रकारों पर खर्च कम से कम करने की प्रवृत्ति बढ़ती गई है। इसका असर गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

इन दिनों मीडिया की शक्ति और स्वायत्तता को लेकर भी निरंतर सवाल उठ रहे हैं। जहां तक शक्ति का सवाल है, प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा सोशल मीडिया की बात है, उसके व्यापक असर के कारण ही हजारों करोड़ की पूंजी लग रही है और कोई भी सरकार हो उसका यथासंभव उपयोग करने का प्रयास भी करती है। यही नहीं, विदेशी शक्तियां भी भारतीय मीडिया को प्रभावित करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजी लगा रही हैं। बड़े कार्पोरेट घरानों के प्रभाव को लेकर बहुत शोर मचता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि 80 के दशक तक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तक मीडिया संस्थानों पर बिड़ला, डालमिया, टाटा के प्रभाव की चर्चा शक्तिशाली प्रधानमंत्री करते थे। इसे ‘जूट प्रेस’ कहा जाता था। सत्ता के दबाव तब भी थे।

मैंने पत्रकारिता पर अपनी पुस्तकों पावर, प्रेस एंड पॉलिटिक्स, कलम के सेनापति, भारत में पत्रकारिता, इंडियन जर्नलिज्मः कीपिंग इट्स क्लीन में इस मुद्दे पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ विवरण दिया है। सत्ता की राजनीति ने पत्रकारिता को पहले भी प्रभावित किया था और आज भी कर रही है। इसलिए मुद्दा यह भी है कि सरकारों को बनाने या हटाने की भूमिका जो अखबार या मीडिया निभाता है उसका असर विश्वसनीयता पर पड़ता है। यदि लक्ष्य केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या दल विशेष रहेगा तो स्वायत्तता कहां होगी अन्यथा प्रामाणिक तथ्यों के साथ सरकार की गड़बड़ियों या जनता की समस्याओं को प्रकाशित या प्रसारित करने पर दबाव नहीं पड़ सकता है।

खोजी रिपोर्ट के लिए संस्थानों को अधिक खर्च भी करना पड़ेगा। नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए मीडिया संस्थानों की वेबसाइट और प्रकाशित सामग्री के सोशल मीडिया पर उपलब्ध किए जाने के प्रयास किए जा सकते हैं और कुछ हद तक हो भी रहे हैं। इस दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के अखबारों की संभावना बनी रहेगी। यही बात वैकल्पिक मीडिया यानी सोशल मीडिया पर लागू होती है। जो अच्छी सामग्री उपलब्ध कराएगा उसका भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

(लेखक पद्मश्री से सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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राजस्थान में पत्रकारिता-सत्ता, समाज और सभ्यता के संक्रमण की दो शताब्दियां: त्रिभुवन

यह 200 वर्षों की यात्रा केवल पत्रकारिता की कहानी या इतिहास का एक अध्याय भर नहीं है। यह एक गर्वीली इतिहास-कथा है उस विवेक और चैतन्य की, जो सत्ता के उन्माद और संस्कृति के मौन के बीच जन्मा।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2026
tribhuvanjaipur

त्रिभुवन, वरिष्ठ पत्रकार।

हर युग अपने भीतर सड़न छिपा रहा होता है तो कुछ स्वच्छताकर्मी मनुष्यों को जन्म भी देता है, जो साहस के साथ समाज के भीतर फैलाया गया अँधकार साफ़ करते हैं। नाना प्रकार की ग़ुलामियों से रूबरू ऐसी हर सभ्यता को उन विरले साहसी लोगों की ज़रूरत होती है, जो शासन सत्ता के भय से पैदा हुई चुप्पियों को तोड़ते हैं। शासन सत्ता, धर्मसत्ता और समाजसत्ता के साथ लड़ते हुए ये साहसिक लोग अंधकार के ख़िलाफ़ प्रकाश के लिए भ्रमित लोक को अवसन्न मूर्च्छा से जगाते हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप में जब आधुनिक राष्ट्रवाद का युग शुरू हुआ तो पत्रकारिता केवल लेखन नहीं रही। वह एक आह बन गई, जिसे काग़ज़-कलम ने समेटा और सियाही ने छापों तक पहुँच कर एक लपट में बदला। तलवारें पुरानी पड़ रही थीं और क़लम उन हाथों में थी, जिन्होंने अन्याय को देखा, महसूस किया; लेकिन जो चुप न रह सके। उन्होंने लफ़्ज़ों से ग़ुलामी की रूह में हर लम्हा ऐसी लपट भरी कि अंगरेज़ को काठ मार गया और उन्होंने दमन और अत्याचार बढ़ा दिए।

यह 200 वर्षों की यात्रा केवल पत्रकारिता की कहानी या इतिहास का एक अध्याय भर नहीं है। यह एक गर्वीली इतिहास-कथा है उस विवेक और चैतन्य की, जो सत्ता के उन्माद और संस्कृति के मौन के बीच जन्मा। भारतीय पत्रकारिता ने सत्ता को चेताया, लोक की करुणा को सहलाया और एक ऊबी हुई सरज़मीं को थपथपाया। बिना झुके, बिना टूटे। इस इतिहास में उसने गौरवशाली तरीके से आम लोगों के दु:खों और पीड़ाओं के लिए ही नहीं, इस मुल्क़ की मुक्ति के लिए अथक संघर्ष किया। यह एक गरिमा थी, जो तब उपजती है जब कोई आदमी निडर होकर अकेले होने के बावजूद कह उठता है, “नहीं, इस कालखंड और इस भूखंड में संपूर्ण गरिमा, साहस, न्याय और स्वतंत्रता के साथ जीना मेरा नैसर्गिक अधिकार है।”

भारत पत्रकारिता की यदि प्रयोगशाला रहा, तो राजस्थान वह स्थान था, जहाँ यह प्रयोग सबसे अधिक सघन, सबसे अधिक साहसी और सबसे अधिक चेतन रूप में प्रकट हुआ। यहाँ पत्रकारिता महज़ घटनाओं और सूचनाओं का संग्रह भर नहीं थी, रियासतों की क्रूरता, जागीरदारों के अत्याचारों और जनमानस की निष्पाप निरीह आकांक्षा के बीच पलने वाले संघर्ष की वह सांस्कृतिक भाषा थी, जो चुप रहते हुए भी सत्ता को चुनौती देती थी।

उस समय राजस्थान में पत्रकार होना केवल एक पेशा नहीं, एक निष्ठुर सन्नाटे में सच बोलने का आत्मघाती जोखिम उठाना था। लेकिन समाचार पत्र यहाँ आवाज़ नहीं, प्रतिरोध थे; शब्द नहीं, आग थे। हर संपादकीय एक घोषणा थी कि कोई है जो देख रहा है, जो समझ रहा है और जो चुप नहीं रहेगा। उस कालखंड में राजस्थान की पत्रकारिता नायक नहीं, एक जाग्रत आत्मा थी, जो क्रूरता के विरुद्ध, चापलूसी की भीड़ में अकेली खड़ी थी।

आज हम जब भारतीय पत्रकारिता के दो सौ वर्षों का उत्सव मना रहे हैं, यह जानना ज़रूरी है कि धुंधली आकांक्षाओं और मीठे सपनों के तानेबाने के बीच एक महान् राष्ट़्र की छवि को बनाने वाले अख़बार केवल ख़बरों का समूह भर नहीं थे। वे इतिहास की चेतावनी थे। वे इस तरह तैयार होते थे कि उनके पाठकों में सहज ही राष्ट्र स्वतंत्रता की विराट लालसा जगा देती थी। वे अख़बार असहमति और चेतना के दस्तावेज़ थे। उनके शब्दों का प्रभाव ऐसा था, जैसे किसी ने देह में कोई तेज़ चाकू घोंप दिया हो। वे बिलकुल गूँगी हुई शासन व्यवस्था के ख़िलाफ़ लोगों में स्वतंत्रता के लिए एक भभकती आकांक्षा पैदा कर देने वाले साहस का निर्माण कर रहे थे।

राजस्थान की पत्रकारिता सत्ता से टकराई, समाज से संवाद किया और सभ्यता को पुनर्परिभाषित किया। यह सिर्फ़ ख़बरों की बात नहीं थी, यह राज्य और समाज के बीच आत्मा की वह पुकार थी, जिसने समय को चेतना की छेनियों और निडरता के हथौड़े से एक नए रूपाकारों में ढाला। एक ऐसा आकार, जिसमें आवाज़ें दबाई नहीं जातीं, सवाल पूछे जाते हैं और सत्य, चाहे जितना असुविधाजनक हो, फिर भी प्रकाशित किया जाता है।

यह पत्रकारिता सूचनाओं का यांत्रिक संकलन नहीं थी, नैतिक आभा का वह उच्छवास थी, जो पृष्ठों पर दर्ज़ होकर जनता की स्मृति में उतरती जाती है। इसने सत्ता की दीवारों पर दस्तक दी, सामाजिक रूढ़ियों को टटोला और जनता को यह विश्वास दिलाया कि उनकी पीड़ा, उनकी आशा और उनका प्रतिरोध कोई दर्ज़ कर रहा है। राजस्थान की यह पत्रकारिता उस काल की सबसे साहसी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति थी। एक ऐसा दस्तावेज़, जो न केवल इतिहास को गढ़ता है, आने वाले युगों को यह सिखाता है कि जब सब चुप हों, तब बोलना कितना ज़रूरी होता है।

रियासती सन्नाटों में संवाद की पहली चीख: 1849–1885

उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत अंगरेज़ी हुकूमत की कठोर संरचना में जकड़ता जा रहा था। एक ओर ब्रिटिश शासन केंद्रीय भारत में अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत कर रहा था, वहीं दूसरी ओर राजस्थान की रियासतें अपने पारंपरिक वैभव और सत्ता संरचना को बचाए रखने के लिए प्रयत्नशील थीं। इन रियासतों में संवाद के नाम पर केवल सत्ता की घोषणा होती थी, जनता की कोई प्रतिध्वनि नहीं थी। शासन का स्वर एकालाप था और समाज मौन।

ऐसे समय में जब राजमहलों की दीवारें ऊँची थीं और चौक-चौराहे चुप, तब मज़हरुल सरूर (भरतपुर, 1849) और रोज़तुल तालीम (जयपुर, 1856) जैसे समाचार पत्रों का प्रकाशन केवल सूचनाओं का प्रचार नहीं था, वह एक राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का नवांकुर था।

ये समाचारपत्र न तो पूर्ण स्वतंत्र थे, न ही प्रतिरोध के मुखर उपकरण; फिर भी, उन्होंने उस सन्नाटे में पहली चीख का काम किया, जो संवाद की आवश्यकता को जन्म दे चुकी थी। इन पत्रों ने दोहरे काम किए। एक ओर वे शासक वर्ग की इच्छाओं और नीतियों को जनमानस तक पहुँचाने का माध्यम बने, वहीं दूसरी ओर उन्होंने प्रजा की दबाई हुई आकांक्षाओं को, भले ही सीमित भाषा में सही, किंतु एक सार्वजनिक मंच पर पहली बार स्थान दिया। यह कोई शोरगुल नहीं था, यह एक धीमा, किंतु स्पष्ट संकेत था कि राजस्थान संवाद की एक नूतन राह उलीक रहा है।

यह वह क्षण था जब राजपूताना की हवाओं में पहली बार शब्दों की गूंज सुनाई दी, नीतियों की नहीं, ज़रूरतों की; आदेशों की नहीं, संवाद की। सत्ता के एकालाप के बीच यह पहली दो पंक्तियाँ थीं, जिनमें जनता की उपस्थिति दर्ज हुई। यही वह ऐतिहासिक पड़ाव था, जहाँ राजस्थान में पत्रकारिता, धीरे-धीरे ही सही, परंतु एक सांस्कृतिक और सामाजिक शक्ति के रूप में आकार लेने लगी।

राजपत्रों ने जो लिखा, वह इतिहास नहीं था। वह दरअसल इतिहास के नाम पर शासन की स्मृतियों को संरक्षित करने का प्रयास मात्र था। यह स्मृतियाँ, शासन की दृष्टि से क्रमबद्ध की गईं थीं, लेकिन वे जनता के अनुभवों और पीड़ाओं से प्रायः असंबद्ध रहीं। इनमें शासकों की योजनाएँ, घोषणाएँ और उपलब्धियाँ तो थीं, पर जनता की बेचैनी, आकांक्षाएँ और असहमति का कोई स्वर नहीं था। इस प्रकार राजपत्र एकतरफा संवाद के दस्तावेज़ बनकर रह गए।

मारवाड़ राजपत्र, मरुधर मित्र और उदयपुर राजपत्र जैसे प्रकाशनों ने अपने-अपने क्षेत्र में प्रशासनिक पारदर्शिता की आड़ में वास्तव में सामंती नियंत्रण को सशक्त किया। ये पत्र सामंती सत्ता की भाषा बोलते थे, उसकी छाया में चलते थे और इसीलिए उन्होंने आलोचना या असहमति के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा। फिर भी, इन्हीं पत्रों के माध्यम से पहली बार समाज ने शब्दों की ताक़त को पहचाना और ‘जनमत’ या पब्लिक ओपिनियन जैसी अवधारणा धीरे-धीरे आकार लेने लगी।

सत्ता नियंत्रित इन पत्रों को पढ़ते हुए जनता ने यह अनुभव करना शुरू किया कि जो लिखा जा रहा है, वह पूरा सच नहीं है और यही एहसास पत्रकारिता के भीतर आलोचना, असहमति और विवेक के बीज बो गया। ये पत्र भले ही जनता की आवाज़ न बने हों, पर उन्होंने पहली बार जनता को यह चेताया कि उनके पास भी कहने के लिए कुछ है, जिसे अब छुपाया नहीं जा सकता। यही वह ऐतिहासिक अंगड़ाई थी, जहाँ राजस्थान की पत्रकारिता सत्ता के उपकरण से समाज के आईने की ओर मुड़ने लगी।

ब्रिटिश सत्ता और सामाजिक आत्मा के बीच आकार लेते शब्द: 1885–1920

1857 के विद्रोह के बाद भारत में राजनैतिक संघर्ष की जो चेतना पनपी, उसने पत्रकारिता को भी एक नई दिशा दी। राजस्थान में यह चेतना उस समय और तीव्र हो गई, जब स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे विचारक और सुधारक इस भूमि को अपनी क्रांतिकारी विचारधारा के लिए रणभूमि के रूप में चुना। वे केवल एक धार्मिक सुधारक नहीं थे, भारत की आत्मा को विदेशी सत्ता के सामने पुनर्जीवित करने वाले प्रथम विचारक थे, जिन्होंने स्वराज, स्वभाषा और स्वदेश के मंत्र दिए और इन तीनों का सबसे सशक्त उपकरण बना, मुद्रित शब्द, यानी पत्रकारिता।

स्वामी दयानंद का उदयपुर आगमन मात्र एक संत या संन्यासी का प्रवास नहीं था। वे आज के योगियों या भगवा वस्त्र पहनने वालों जैसे कुटिल, कुत्सित और संकीर्ण जड़बुद्धि रूढिवादी नहीं थे। उन्हें सांप्रदायिक वैमनस्य छू तक नहीं गया था। वह एक वैचारिक विस्फोट था। उन्होंने यहीं सत्यार्थ प्रकाश की रचना की एक ग्रंथ, जिसमें न केवल धार्मिक विमर्श था, बल्कि समाज के भीतरी ताने-बाने को समझने और बदलने की गहरी लालसा भी थी। सत्यार्थ प्रकाश में कुछ ऐसे वर्णन मिलते हैं जिन्हें आज की भाषा में रिपोर्ताज या सोशल ऑब्ज़र्वेशन कहा जा सकता है यानी यह पत्रकारिता के उस नूतन संभाव्य का बीज था, जो सत्ता से संवाद करने का साहस और उन्हें बौद्धक रूप से ग़लत साबित करने का विवेक धारण किए था।

उन्हीं के प्रभाव में दीवान श्यामजीकृष्ण वर्मा जैसे उदयपुर के कुलीन शिक्षित वर्ग के व्यक्ति, केवल रियासत के अधिकारी न रहकर अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी बन गए। उन्होंने न केवल ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस में रहते हुए स्वतंत्रता की अलख जगाई, ‘इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ जैसे प्रभावशाली पत्रों के ज़रिए भारत की स्थिति को वैश्विक विमर्श का विषय बनाया। वे पत्रकारिता को एक शस्त्र की तरह प्रयोग कर रहे थे, शब्दों की गोली बनाकर।

स्वामी दयानंद ने अजमेर को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। यहाँ उन्होंने परोपकारिणी सभा की स्थापना की, जो सिर्फ़ एक संस्था नहीं, विचारों की प्रयोगशाला बनी। इस सभा के प्रभाव से अजमेर पत्रकारिता और सामाजिक आंदोलन का ऐसा केंद्र बना, जहाँ विचारों की आँच पर जनजागरण की रोटियाँ पकने लगीं। यहीं से राजपूताना गजट, राजस्थान समाचार और राजपूताना हेराल्ड जैसे पत्रों की नींव पड़ी, जो धीरे-धीरे सत्ता की आलोचना करने और जनता की आवाज़ बनने लगे।

इस दौर की पत्रकारिता में एक अनोखा द्वंद्व था। एक ओर यह ब्रिटिश प्रशासन की आँखों में आंखें डालकर संवाद करना चाहती थी, तो दूसरी ओर यह समाज के भीतर फैले अंधविश्वास, जातिवाद और स्त्री-विरोधी प्रवृत्तियों के विरुद्ध भी आवाज़ उठाने लगी थी। यह वह समय था जब पत्रकारिता ने पहली बार अपने भीतर सत्ता के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध और समाज के भीतर आत्मसुधार का आग्रह एक साथ साधना शुरू किया। यह वह काल था जहाँ शब्द केवल छपते नहीं थे, वे चेतना को आकार देने लगे थे। राजस्थान में पत्रकारिता अब सूचना नहीं, संघर्ष का औजार बन चुकी थी।

दयानंद सरस्वती के निधन (1883) से ठीक पहले, वर्ष 1880 में अजमेर ब्रिटिश भारत का वह दुर्लभ केन्द्र बन चुका था जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता ने अपनी आंखें खोलनी शुरू कर दी थीं। यह वह ऐतिहासिक घड़ी थी जब छपने वाला हर शब्द, राजसत्ता की गूंज को चुनौती देने की क्षमता रखता था। इसी काल में राजपूताना गजट (1885) ने जन्म लिया और इसके माध्यम से मौलवी मुराद अली ‘बीमार’ ने प्रशासन की नीतियों पर साहसपूर्वक सवाल उठाए। उनकी लेखनी इतनी प्रखर थी कि उन्हें कारावास का दंड भुगतना पड़ा, पर यह क़ैद एक व्यक्ति की नहीं थी, एक नए पत्रकारिता युग की गर्जना थी, जो अब चुप रहने को तैयार नहीं था।

इसी दौरान राजपूताना हेराल्ड के रूप में राजस्थान को पहला अंग्रेज़ी समाचारपत्र मिला, जिसने केवल सूचना नहीं दी, बल्कि सीधे एजेंट टु गवर्नर जनरल जैसे ब्रिटिश अधिकारियों की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया। यह पत्र महज़ भाषा का अनुवाद नहीं, विचार का हस्तक्षेप था। यह वह क्षण था जब राजस्थान की पत्रकारिता ‘वफादार सूचनाओं’ के सीमित दायरे से निकलकर असहमति की राजनीति और जनचेतना की ओर निर्णायक क़दम बढ़ा रही थी। इस समय की पत्रकारिता ने न सिर्फ़ रियासतों को आईना दिखाया, जनता को यह बताया कि सत्ता की आलोचना कोई राजद्रोह नहीं, एक नैतिक और लोकतांत्रिक आवश्यकता है। समाचार पत्र अब सत्ता की दर्पण छवि नहीं, समाज की विवेकशील आत्मा के प्रतिनिधि बन चुके थे।

और सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि यह चेतना केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रही। राजपूताना गजट से जुड़ी मोती बेग़म जैसी महिला पत्रकारों की सक्रिय उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि राजस्थान में पत्रकारिता उस समय भी केवल पुरुषों के हाथों की सत्ता नहीं थी। यह नारी चेतना की अभिव्यक्ति का भी माध्यम बन रही थी, वह चेतना जो बंद परदों और सघन परंपराओं को चीरती हुई संवाद के मंच पर आई और अपनी उपस्थिति से यह जता दिया कि असहमति केवल पुरुषों की विशेषाधिकार प्राप्त भाषा नहीं है। यह वह कालखंड भी था जब राजस्थान की पत्रकारिता एक निर्णायक मोड़ पर थी, जहाँ वह केवल सूचना नहीं, विचार बनने लगी थी; केवल शासन की छाया नहीं, समाज की आत्मा बनने लगी थी।

पत्रकारिता का क्रांतिकाल: 1920–1947

बीसवीं शताब्दी का तीसरा दशक जब भारतीय स्वाधीनता संग्राम की आंच से तप रहा था, तब राजस्थान की पत्रकारिता भी एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी थी। अब वह केवल सत्ता की आलोचना या सामाजिक विसंगतियों का दस्तावेज़ भर नहीं रही थी, वह खुद एक आंदोलन बन चुकी थी। 1920 के बाद की पत्रकारिता ने सामंती सत्ता, उपनिवेशवाद और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध न सिर्फ़ स्वर उठाया, बल्कि वह युद्धघोष का रूप ले चुकी थी। इस दौर में पत्रकारिता जनांदोलन की आत्मा बन गई।

विजय सिंह पाथिक द्वारा संपादित राजस्थान केसरी (1920) और नवीन राजस्थान (1922) केवल समाचारपत्र नहीं थे, वे राजनीतिक संगठन के जीवित दस्तावेज़, विचारधारा के निर्माण की प्रयोगशाला, और किसान चेतना के प्रशिक्षण शिविर बन चुके थे। इन पत्रों ने न केवल बिजोलिया किसान आंदोलन को वैचारिक ज़मीन दी, बल्कि उसे राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ा। जहाँ बंदूकें नहीं थीं, वहाँ लेखनी ने युद्ध लड़ा, राजस्थान की पत्रकारिता की यह भूमिका भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अद्वितीय है।

तरुण राजस्थान, त्यागभूमि, आर्य मार्तण्ड, दैनिक नवज्योति, यंग राजस्थान, प्रजा सेवक जैसे अनेक पत्रों ने मिलकर उस समय दोहरी लड़ाई लड़ी। एक ओर विदेशी शासन के विरुद्ध, और दूसरी ओर स्थानीय सामंतों, ज़मींदारों और जातिवादी सामाजिक ढाँचों के खिलाफ़। इन्होंने रियासतकालीन शासकों की क्रूरता, जागीरदारों के अत्याचार और समाज में फैले अंधविश्वास व अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त चेतना खड़ी की।

त्यागभूमि जैसे पत्र ने पत्रकारिता को केवल राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक और वैज्ञानिक बनाम अवैज्ञानिक विमर्श का भी मंच बना दिया। इस पत्र के कुल 64 पृष्ठों में 16 पृष्ठ ‘आधी दुनिया’ शीर्षक से केवल महिलाओं को समर्पित थे। यह दर्शाता है कि राजस्थान की पत्रकारिता स्त्री चेतना की वाहक भी बन रही थी। वह स्त्रियों की पीड़ा, आकांक्षाओं और अधिकारों को भी स्वर देने लगी थी।

यह दौर पत्रकारिता का क्रांतिकाल था, जब हर अख़बार एक मोर्चा था, हर संपादकीय एक घोषणापत्र और हर संवाद एक प्रतिरोध। पत्रकारिता अब सत्ता से भयभीत नहीं थी; वह जनता के साथ खड़ी थी, उसके दुख-दर्द की साक्षी भी, और उसकी आवाज़ भी। यह वह युग था जब शब्दों ने संघर्ष का वरण किया और राजस्थान की भूमि पर विचारों ने इतिहास को दिशा दी।

राजस्थान की पत्रकारिता: एक सभ्यता की प्रभावी पुकार

हर वह समय जब इतिहास अपनी दिशा खो देता है, वह विचार को पुकारता है और विचार शब्द में ढलता है। राजस्थान की पत्रकारिता उन शब्दों की शृंखला है, जो किसी क्रांति से नहीं, भीतर उठती एक अस्तित्वगत पीड़ा से जन्मीं। यह पत्रकारिता, सत्ता से असहमति मात्र नहीं थी। यह उस असहमति की एकाकी और असह्य स्वीकृति थी, जो मनुष्य को सत्य के अकेलेपन में खड़ा करती है। जिस समय राष्ट्र राज्य की कल्पनाएँ बन रही थीं, राजस्थान की रियासतों में शब्द अंधेरे की दीवार पर हथौड़े की तरह गिर रहे थे। प्रचार जब कहता है: "चोर, पापी और उल्लू चाहते हैं अंधकार, लेकिन प्रचार है जनता की खोजबीन की रोशनी," तो यह कोई काव्यात्मक पंक्ति नहीं, बल्कि एक दार्शनिक ध्वनि है, यह मानवीय विवेक की अंतिम चमक है, जो उस अंधकार से जूझ रही है, जिसे सत्ता 'व्यवस्था' कहती है।

राजपत्रों ने जो लिखा, वह इतिहास नहीं था। वह स्मृति को नियंत्रित करने का कुटिल प्रयास था। और जब रियासती ने जोधपुर के पाकिस्तान में विलय की खबर प्रकाशित की, तो वह केवल पत्रकारिता नहीं, वह नियति में हस्तक्षेप था। शब्द अब सूचना नहीं रहे, वे भाग्य बदलने वाले औजार बन चुके थे। पर यह संघर्ष 'राज्य बनाम समाज' का नहीं था। यह उससे कहीं अधिक गहरा और मूलभूत था। यह सभ्यता बनाम साम्राज्यवाद का संघर्ष था। एक ऐसा संघर्ष जिसमें पत्रकार की कलम, युद्ध के मैदान में उस सैनिक की तरह थी, जिसके पास न शस्त्र था, न सेना। सिर्फ़ विवेक था और मौन में गूंजता हुआ सत्य।

इसलिए राजस्थान की पत्रकारिता को महज़ राजनीतिक आंदोलनों का मुखपत्र कह देना, उसके अर्थ को सीमित कर देना है। वह उन सभ्यताओं की अंतिम पुकार थी, जो ब्रिटिश नहीं बनना चाहती थीं, पर साथ ही अपने अतीत के पत्थरों में दफ़न भी नहीं होना चाहती थीं। वे सभ्यताएँ जो जीना चाहती थीं एक नई नैतिकता के साथ, एक नई रोशनी में, अपनी शर्तों पर। और इस सबके बीच, राजस्थान की पत्रकारिता एक पुल बनी, पुल ही नहीं, एक उफनती लहर, जो अतीत और भविष्य के बीच जलती हुई चेतना थी। वह परंपरा को विसर्जित नहीं करती, लेकिन आधुनिकता को विवेकहीन भी नहीं होने देती। वह संवाद करती है, टकराती है और अंततः एक नई पहचान की ओर ले चलती है।

यह पत्रकारिता इतिहास की सेवा में नहीं थी, यह इतिहास को तोड़कर नया समय रचने की प्रक्रिया में थी। यह वह शब्द थे जो चुप्पियों से उपजे, और जो हर बार उस प्रश्न से टकराए : "क्या मनुष्य न्याय के बिना जी सकता है?" राजस्थान की पत्रकारिता ने उस प्रश्न का उत्तर शब्दों से नहीं, साहस से दिया।

आज जब हम राजस्थान की पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा को देखते हैं तो उस स्वप्न को याद करते हैं, जिसमें शब्दों ने सत्ता से टकराने का साहस किया था। आज हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि वही पत्रकारिता अब एक गहरे नैतिक संकट में है। यह संकट बाहर से थोपा नहीं गया है; इसे आमंत्रित किया गया है, मेज़ों पर बैठकर, सम्मेलनों में भाग लेकर, विज्ञापन की चुप्पियों में सहमति देकर। यह वह दौर है, जहाँ कलम, जो कभी चेतना का हथियार थी, अब वह राजकीय संवाद की चुप भाषा बन चुकी है। एक समय जो पत्रकारिता सत्य के अकेलेपन में खड़ी होती थी, वह आज भीड़ के साथ घुटनों के बल खड़ी है। अपनी रीढ़ खो चुकी, लेकिन चेहरा मुस्कुराता हुआ।

यह वही विडंबना है जिसे आचार्य नरेंद्र देव, विष्णु पराड़कर, डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे हमारे बहुत से प्रखर मनीषियों और युगांतरकारी समाजचेताओं ने आज़ादी से बहुत पहले देख लिया था। हम जानते हैं कि सत्य और सुविधा में चुनाव करना हो तो मोहक सफलताओं की दौड़ती सभ्यताएं अक्सर शासकीय ग़ुलामियाँ, भीतर नाड़ियों में सुविधाओं का नशा और रीढ़ की हड्‌डी पर जनविमुखता की बर्फ़ीली ठंड को चुनती हैं और उस युग की आत्मा को गूंगा बनाने में मदद करती हैं। राजस्थान की पत्रकारिता आज उसी मौन की गिरफ्त में है, जहाँ असहमति अपराध है और प्रश्न पूछना व्यावसायिक आत्महत्या।

यह युग ‘संघर्ष’ का नहीं, ‘सहज समर्पण’ का है। और यही वह क्षण है जहाँ इतिहास करवट लेने के लिए अकुलाता है, जहाँ स्वातंत्र्य आधारित और लोक करुणामुखी पत्रकारिता की एक पगली और अर्थवान् अभिव्यक्ति लेती है। लेकिन जाने कब इस नियति और बदनीयत को चुनौती देता हुआ पत्रकारिता का साहस छलछलाकर एक नए रूप में आएगा? कब वह जनसंवाद की प्रतीक्षा को सच में बदलेगा? और कब नई कलम को धार देगा? लेकिन अब सत्ता सुंदरी के घने बालों की लंबी लटें इतनी उलझ गई हैं कि उन्हें सुलझाने के लिए निर्भय पत्रकारिता को अपने विवेक का पीढ़ा इस अंधकार में ढाल ही लेना चाहिए।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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