पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
राहुल महाजन, हेड ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स, बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड।।
हिंदी पत्रकारिता का इतिहास देश की सामाजिक और राजनीतिक चेतना से जुड़ा रहा है। कभी यह जनसरोकारों की आवाज मानी जाती थी। अखबार केवल खबरें नहीं छापते थे, बल्कि समाज में बहस खड़ी करते थे, सत्ता से सवाल पूछते थे और आम लोगों की समस्याओं को सामने लाते थे। आज तस्वीर बदल चुकी है। तकनीक, बाजार और राजनीति के दबाव ने पत्रकारिता के स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है।
डिजिटल दौर ने खबरों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब सूचना का प्रवाह इतना तेज हो गया है कि हर व्यक्ति अपने मोबाइल पर हर समय नई खबर देखना चाहता है। सोशल मीडिया, यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पारंपरिक मीडिया को पीछे छोड़ने की चुनौती खड़ी कर दी है। पहले खबरों की पुष्टि और तथ्यों की जांच के बाद प्रकाशन होता था, अब पहले खबर चलाने की होड़ अधिक दिखाई देती है। इसी जल्दबाज़ी में कई बार अधूरी या गलत सूचनाएं भी लोगों तक पहुंच जाती हैं।
फेक न्यूज आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। सोशल मीडिया पर अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं इतनी तेजी से फैलती हैं कि कई बार सच पीछे छूट जाता है। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ा है। लोगों के मन में यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि किस खबर पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं।
एक बड़ा बदलाव पत्रकारिता की कार्यशैली में भी आया है। पहले पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था क्योंकि उसका काम सत्ता से जवाब मांगना और जनता की आवाज को मजबूती देना था। लेकिन अब यह धारणा मजबूत हुई है कि मीडिया का एक हिस्सा सरकार से असहज सवाल पूछने से बचता है। कई पत्रकार और मीडिया संस्थान खुलकर राजनीतिक विचारधाराओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। इससे पत्रकारिता की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।
आज दर्शक भी खबरों को अक्सर चैनलों और अखबारों की राजनीतिक छवि के आधार पर देखने लगे हैं। बहसें कई बार तथ्यों से ज्यादा आरोप-प्रत्यारोप और शोर तक सीमित रह जाती हैं। इसका असर लोकतांत्रिक संवाद पर भी पड़ रहा है। जब मीडिया का ध्यान जनहित से हटकर राजनीतिक खेमेबंदी पर केंद्रित होने लगे, तब आम लोगों के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
दूसरी ओर मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक संकट भी गहराता जा रहा है। प्रिंट मीडिया की आय पहले बड़े पैमाने पर विज्ञापनों पर निर्भर थी, लेकिन अब विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल कंपनियों की ओर चला गया है। ऐसे में कई संस्थानों के सामने कम खर्च में काम चलाने की मजबूरी है।
खर्च घटाने की इस दौड़ का असर न्यूजरूम पर साफ दिखाई देता है। कर्मचारियों की संख्या कम की जा रही है, छोटे शहरों के दफ्तर बंद हो रहे हैं और एक पत्रकार से कई तरह का काम लिया जा रहा है। रिपोर्टिंग के साथ वीडियो बनाना, संपादन करना और सोशल मीडिया संभालना अब सामान्य बात हो गई है। इससे पत्रकारों पर दबाव बढ़ा है और खबरों की गहराई कम हुई है।
खोजी पत्रकारिता और जमीनी रिपोर्टिंग सबसे अधिक प्रभावित हुई है। गांव, किसान, मजदूर और छोटे शहरों की समस्याएं पहले की तुलना में कम दिखाई देती हैं क्योंकि ऐसी रिपोर्टिंग में समय और संसाधन दोनों अधिक लगते हैं। इसके बजाय त्वरित, सनसनीखेज और ज्यादा क्लिक पाने वाली खबरों को प्राथमिकता मिल रही है।
इसके बावजूद हिंदी पत्रकारिता की संभावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। हिंदी भाषी पाठकों और डिजिटल दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच ने नए पाठक तैयार किए हैं। स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैकल्पिक पत्रकारिता के नए प्रयोग भी सामने आ रहे हैं, जो गंभीर और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रहे हैं।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है-जनता तक सही और संतुलित जानकारी पहुंचाना। तकनीक और बाजार के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को कैसे बचाए रखे। मीडिया यदि सत्ता, बाज़ार और राजनीतिक खेमेबंदी से ऊपर उठकर जनता के सवालों को केंद्र में रखे, तभी उसका लोकतांत्रिक महत्व बना रहेगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज बाजारीकरण, आर्थिक संकट और घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जितेन्द्र बच्चन, वरिष्ठ पत्रकार।।
देश में सबसे अधिक हिंदी भाषा में ही समाचार पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होते हैं और समाचार चैनल भी सबसे ज्यादा हैं। हिंदी पत्रकारिता के बलबूते ही पत्र-पत्रिकाएं व चैनल लाखों-करोड़ों का कारोबार करते हैं। इसके बावजूद उसकी वह धाक नहीं बन पाई जो अंग्रेजी अखबारों या मैग्जींस की है।
किसान, मजदूर और आम आदमी का एक सशक्त हथियार रही हिंदी पत्रकारिता आज सरकारी उपेक्षा और बाजारीकरण, आर्थिक संकट व घटती विश्वसनीयता जैसे दौर से गुजर रही है। अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बनी हुई है और अब तो दिन-प्रतिदिन इसकी साख गिरती जा रही है।
हिंदी पत्रकारिता करने वाले 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर दूसरी भाषाओं को खूब कोसते हैं, लेकिन यही कोसने वाले लोग हिंदी के पत्रकारों को नौकरी नहीं देना चाहते। हिंदी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकार एवं सरकार बड़े-बड़े आयोजन तो करते हैं, लेकिन शोहरत अंग्रेजी में छोटे-मोटे कार्यक्रम करने वाले एडिटर के खाते में जाती है।
राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापनों में अक्सर अंग्रेजी के बड़े अखबारों को प्राथमिकता दी जाती है। क्षेत्रीय और हिंदी के छोटे समाचार पत्रों को कम विज्ञापन या कम दरें मिलती हैं, जिससे उनका आर्थिक ढांचा चरमरा जाता है। किसी सार्वजनिक बड़े मंच पर जब किसी पत्रकार को स्थान देना होगा या संवाद में हिस्सा लेना होता है तो अंग्रेजी वाले साहब को अहमियत दी जाती है। मान्यता देने के मामले में भी हिंदी के पत्रकारों की अनदेखी की जाती है। इसी उपेक्षा के चलते आज हिंदी पत्रकारिता दोयम दर्जे की बन चुकी है।
यही कारण है कि सरकारी न्यूज चैनल या पत्र-पत्रिकाओं में संवाददाता नियुक्त करते समय या संपादकीय विभाग में कोई नौकरी देते वक्त उसे साक्षात्कार अंग्रेजी में देना पड़ता है। कितनी अजीब बात है कि काम हिंदी में करना है लेकिन सरकार हिंदी को महत्व न देकर अंग्रेजी को महत्व देती है। क्यों, यह एक बड़ा सवाल है।
बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें हिंदी भाषा का अच्छा ज्ञान है। उनका अनुभव बोलता है लेकिन अंग्रेजी में कमजोर होने के नाते सरकारी अधिकारी उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। उनको महत्व देने के बजाय उनका माखौल उड़ाया जाता है। हिंदी पत्रकारिता करने वालों को दलाल और चापलूस बताया जाता है।
कितनी अजीब विडंबना है कि अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता आज अनाथ जैसी हालत में है। इसकी वकालत करने वाले को कम पढ़ा-लिखा समझा जाता है। नतीजतन हिंदी भाषा बहुल्य देश होते हुए भी आज 195 राष्ट्रों की सूची में हिंदी पत्रकारिता काफी निचले स्थान पर है।
हिंदी पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और प्रकाशनों की बहुत ही दयनीय स्थिति है। हैरानी की बात तो यह है कि इन्हीं हिंदी चैनलों और समाचार पत्र–पत्रिकाओं की बदौलत जो राजनेता, व्यापारी और अभिनेता आसमान छू रहे हैं और ताकतवर बने हुए हैं, वही वक्त आने पर हिंदी पत्रकारों को भूलकर अंग्रेजी के चैनलों व अखबारों को ज्यादा पूछते हैं। इससे अधिक उपेक्षा और क्या होगी।
और अब तो हिंदी पत्रकारिता के सामने विश्वसनीयता का संकट भी खड़ा हो चुका है। सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहों और फर्जी खबरों की बाढ़-सी आ गई है। अंग्रेजी वाली ब्रेकिंग न्यूज (सबसे पहले खबर) की बराबरी करने की अंधी दौड़ में ‘सच’ पीछे छूट जाता है। सनसनीखेज बनाने की होड़ में तथ्यों की पुष्टि किए बिना ही खबरें परोसी जा रही हैं, जिससे हिंदी पत्रकारिता के सिद्धांतों और उसकी साख को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।
व्यावसायिक दबावों और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आज हिंदी पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। कुछ मीडिया घरानों ने इसे एक लाभ कमाने वाला व्यवसाय बना दिया है। राजनीतिक हित साधने लगे हैं। टीआरपी और ज्यादा क्लिक्स पाने के लिए गंभीर मुद्दों को दरकिनार कर अंग्रेजी वालों की तरह सनसनीखेज और सतही खबरों को अधिक महत्व देने लगे हैं। इसके चलते कई बार खबरें निष्पक्ष नहीं लगती।
सोशल मीडिया, यूट्यूब और एआई आधारित प्लेटफॉर्म्स ने समाचारों के उपयोग का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। वेब पत्रकारिता की भाषा व्याकरण, वर्तनी और हिंदी के मूल स्वरूप को नष्ट करने लगी है। ऐसे में जहां हिंदी पत्रकारिता को मौजूदा नई चुनौतियों का विश्लेषण करने की जरूरत है, वही सरकार को भी हिंदी के पत्रकारों को पूर्ण अहमियत देनी होगी। तभी हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान मिलेगा, जो उसकी जरूरत ही नहीं अधिकार भी है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
यह पहली बार नहीं है जब हिंदी पत्रकारिता किसी चुनौती के दौर से गुजर रही है और न ही यह आखिरी बार होगा। समय के साथ पत्रकारिता ने हर चुनौती का सामना किया है और आगे भी करेगी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो. मनोज कुमार।।
दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता का स्मरण करते हुए जब हम पंडित युगल किशोर शुक्ल और ‘उदंत मार्तण्ड’ को याद करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से गर्व की अनुभूति होती है। लेकिन जब आज की पत्रकारिता का स्वरूप देखते हैं, तो वह गर्व कहीं न कहीं चिंता में बदलता दिखाई देता है। इन दो सौ वर्षों में हिंदी पत्रकारिता ने समाज, राष्ट्र और लोकतंत्र के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन समय के साथ उसने बहुत कुछ खोया भी है। कभी हिंदी पत्रकारिता अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष का माध्यम थी, आज वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपनी विश्वसनीयता बचाने की चुनौती से जूझ रही है।
हर दौर में सत्ता के लिए पत्रकारिता एक चेतावनी की तरह रही है और आगे भी रहेगी। यह संतोष की बात है कि तमाम बदलावों और गिरावट के बावजूद आज भी प्रतिष्ठा बचाने के लिए लोग पत्रकारिता की ताकत से डरते हैं। यही हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी है।
हालांकि इन दो सौ वर्षों में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। पत्रकारिता की तकनीक अब केंद्र में है और हम तकनीक-प्रधान पत्रकारिता के दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह हिंदी पत्रकारिता का संक्रमण काल है, जिसे नई और पुरानी दोनों पीढ़ियों को स्वीकार करना होगा। आज सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि हिंदी पत्रकारिता ‘एआई’ (AI) और ‘चैटजीपीटी’ (ChatGPT) जैसी तकनीकों के साथ कैसे तालमेल बैठाए। संकट बड़ा है, लेकिन इसका समाधान भी हमें ही तलाशना होगा। यह पहली बार नहीं है जब हिंदी पत्रकारिता किसी चुनौती के दौर से गुजर रही है और न ही यह आखिरी बार होगा। समय के साथ पत्रकारिता ने हर चुनौती का सामना किया है और आगे भी करेगी।
भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। अनेक संकटों और कठिन परिस्थितियों के बीच हिंदी पत्रकारिता ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाए। स्वतंत्रता के बाद नवभारत निर्माण में भी पत्रकारिता ने एक सजग प्रहरी की भूमिका निभाई। उस दौर में देश विकास और नवाचार की ओर बढ़ रहा था और संसाधनों के वितरण को लेकर सवाल भी उठ रहे थे। तब भी हिंदी पत्रकारिता ने जिम्मेदारी निभाते हुए अनेक घोटालों और विसंगतियों को उजागर किया। समाज ने उसकी सराहना की, लेकिन सत्ता का असहज होना स्वाभाविक था।
दरअसल सत्ता और पत्रकारिता का संबंध नदी के दो किनारों की तरह है- साथ-साथ चलते हैं, लेकिन कभी मिलते नहीं। वर्ष 1947 से 1975 तक का दौर लोकतंत्र और पत्रकारिता दोनों के लिए महत्वपूर्ण रहा। 1975 का आपातकाल हिंदी पत्रकारिता की परीक्षा का समय था। उस दौर में प्रेस पर पहरे बैठा दिए गए और शब्द-शब्द सरकारी निगरानी में आने लगा। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद पत्रकारिता ने हार नहीं मानी। विरोधस्वरूप कई समाचार पत्रों ने संपादकीय पृष्ठ खाली छोड़ दिए और विभिन्न तरीकों से प्रतिरोध दर्ज कराया। पत्रकारिता का वही स्वाभिमान आज भी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
हालांकि यह भी सच है कि समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप बदलने लगा। पत्रकारिता धीरे-धीरे मीडिया और फिर उद्योग का रूप लेने लगी। मिशन के रूप में शुरू हुई पत्रकारिता रोजगार और व्यवसाय के बड़े क्षेत्र में बदल गई। पेशेवर पत्रकार तैयार करने के लिए मीडिया शिक्षा संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी। हर संस्थान अपने दावे और विशेषताओं के साथ सामने आया।
तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने पत्रकारिता की कार्यशैली को भी बदल दिया। अब पत्रकारिता में संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ तकनीकी दक्षता को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। कभी पत्रकारिता को समाज की पीड़ा को समझने और न्याय दिलाने का माध्यम माना जाता था, लेकिन आज तकनीक के सहारे प्रस्तुति और गति को अधिक अहमियत मिल रही है।
मेरे गुरुजनों ने सिखाया कि पत्रकारिता दिल से होती है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए पत्रकारिता अधिक व्यावसायिक और तकनीक-आधारित होती जा रही है। एआई और चैटजीपीटी जैसी तकनीकों ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। आज मोबाइल पर कुछ निर्देश देते ही मनचाहा कंटेंट कुछ ही क्षणों में तैयार हो जाता है। यह तकनीकी सुविधा जितनी उपयोगी है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी।
अब हमारे सामने दो ही रास्ते हैं- या तो हम खुद को तकनीक के अनुरूप ढालें या फिर समय से पीछे छूट जाएं। जैसे कभी फोटोटाइपसेटर और फिर कंप्यूटर के आने पर पत्रकारिता की कार्यप्रणाली बदली थी, वैसे ही आज एआई का दौर पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां लेकर आया है। जो लोग बदलाव के साथ चले, वे आगे बढ़े और जो पीछे रह गए, वे धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए।
स्थिति यह है कि कभी समाज यह कहकर खबर पर भरोसा करता था कि ‘यह अखबार में छपा है’, जबकि आज लोग कहते हैं-‘एक बार खबर की पुष्टि कर लेना।’ यह बदलाव पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। फिर भी उम्मीद बाकी है। तमाम चुनौतियों और अंधेरों के बीच हिंदी पत्रकारिता का दीप अभी बुझा नहीं है। ऐसे समय में बालकवि बैरागी की ये पंक्तियां बरबस याद आती हैं-
“माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहां मना है!”
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं तथा शोध पत्रिका ‘समागम’ के संपादक हैं।)
भारतीय पत्रकारिता में हर युग में चुनौतियां और उपलब्धियां रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता।।
भारतीय पत्रकारिता में हर युग में चुनौतियां और उपलब्धियां रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं। सच तो यह है कि मीडिया के विभिन्न माध्यम एकदूसरे के पूरक भी हैं। हिंदी और भारतीय भाषाओं के बाहुल्य वाले भारतीय शहरों से लेकर गांव तक सूचना, समाचार, विचार पढ़ने, सुनने और देखने की भूख कम होने के बजाय बढ़ती गई है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही क्यों, अब तो सोशल मीडिया भी बड़े पैमाने पर लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि समय के साथ हिंदी पत्रकारिता में भी कई तरह के बदलाव आए हैं। तिलक और गणेश शंकर विद्यार्थी युग वाली पत्रकारिता की अपेक्षा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में नहीं की जा सकती। लेकिन आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से 70 के दशक से संपादकों और पत्रकारों ने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरूकता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी और हरिवंश जैसे संपादकों ने हिंदी के अखबारों के पाठकों के साथ संपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, नई दुनिया, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और प्रभात खबर जैसे प्रमुख दैनिक अखबार राजधानी दिल्ली से आगे बढ़कर विभिन्न हिंदीभाषी प्रदेशों में भी निरंतर अपनी छाप छोड़ते रहे। राजेन्द्र माथुर जब 1982 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर दिल्ली आए तो उन्होंने कुछ ही सप्ताह बाद एक समारोह में कहा था कि हिंदी का कोई अखबार केवल दिल्ली या मुंबई से प्रकाशित होने से राष्ट्रीय नहीं कहा जा सकता। वह तभी राष्ट्रीय कहला सकता है जब देश के विभिन्न राज्यों में उसके संस्करण हों।
यों अज्ञेय ने भी 1977 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनने पर दिल्ली, मुंबई के अलावा बिहार की राजधानी पटना से अखबार का संस्करण निकालने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन दो वर्ष के संक्षिप्त कार्यकाल के कारण वह सपना पूरा नहीं हुआ। माथुर साहब के आने के बाद लखनऊ, जयपुर, पटना के संस्करण निकले। इसी तरह जब मुझे दैनिक हिंदुस्तान का संपादक बनने का अवसर मिला, पटना के अलावा लखनऊ यानी उत्तर प्रदेश के संस्करण निकालने के लिए प्रबंधन तैयार हुआ।
इसी तरह हरिवंशजी ने प्रभात खबर संभालने के बाद इसे झारखंड और बिहार में प्रतिष्ठित अखबार बना दिया। जनसत्ता दिल्ली के अलावा मुंबई और कोलकाता से प्रकाशित हुआ। दिलचस्प बात यह भी रही कि राजस्थान पत्रिका जैसे जयपुर के अखबार ने कोलकाता के अलावा दक्षिण भारत में हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में हिंदी पाठकों के लिए संस्करण निकाले। इस दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता ने अपनी गुणवत्ता से व्यापक स्तर पर पाठकों में अपनी पहचान बनाई। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले हिंदी अखबारों की प्रगति को उपलब्धि की श्रेणी में रखा जा सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी टेलीविजन के समाचार चैनल आने से हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या कम नहीं हुई बल्कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भी इनके पाठक बढ़ते गए। मेरा यह मानना है कि रेडियो या टेलीविजन पर कोई खबर देखने के बाद सामान्य जनता इन्हें विस्तार से देखने, पढ़ने और उस पर होने वाली टिप्पणियों के लिए अखबार या पत्रिका पढ़ती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से पहले भी दैनिक अखबारों में रंगीन फोटो तथा आधुनिक डिजाइन के आकर्षक प्रस्तुतिकरण के प्रयास होने लगे थे। अन्यथा 70 के दशक के पहले भारत ही नहीं, ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश में भी अखबारों में रंगीन फोटो नहीं छपते थे।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने पर हिंदी अखबारों की डिजाइन और परिशिष्ट में रंगीन फोटो छपने लगे। रविवारीय संस्करण कुछ हद तक पत्रिका की कमी भी पूरी करने लगे। असली समस्या यह है कि आधुनिक तकनीक, प्रिंटिंग का खर्च और न्यूजप्रिंट के मूल्य लगातार बढ़ने से बड़े प्रभावशाली कहे जाने वाले अखबार के प्रबंधन घाटे और मुनाफे पर अधिक ध्यान देने लगे। कुछ हद तक राजनीतिक सत्ता का प्रभाव भी इन अखबारों पर पड़ा। इस संदर्भ में देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ग्रुप द्वारा मुनाफे को ही सर्वाधिक महत्व देने और अखबार को चटपटा, मसालेदार तथा अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री के अनुवाद को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई जिसका असर अन्य हिंदी अखबारों पर भी पड़ा। लेकिन प्रादेशिक और स्थानीय कम प्रसार संख्या वाले अखबार बहुत हद तक व्यावसायिक नहीं हुए और पाठकों के बीच स्थानीय समाचारों और उपयोगी सामग्री के जरिए अपना स्थान बनाए हुए हैं।
यह कहा जा सकता है कि महानगरों का एक बड़ा वर्ग और युवा पीढ़ी इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के आने के बाद अखबारों में कम दिलचस्पी ले रही है। लेकिन छोटे कस्बों और गांवों में आज भी अखबार पढ़ने की रुचि बनी हुई है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता बढ़ने से अखबारों के लिए अब भी संभावनाएं दिखाई देती हैं। सरकारों खासकर नौकरशाहों ने यह गलत धारणा बना रखी है कि अब लोग अखबार, पत्रिका या पुस्तकें नहीं पढ़ना चाहते हैं। वह भूल जाते हैं कि अमेरिका या जापान जैसे आधुनिक संपन्न देशों में भी अखबारों की प्रसार संख्या अच्छी-खासी है।
वास्तव में प्रकाशकों और संपादकों पर यह निर्भर है कि वे बाजार से प्रभावित न होकर ऐसी सामग्री पाठकों को उपलब्ध कराएं जो सामान्यतः टेलीविजन पर भी नहीं मिल सकती। पश्चिमी देशों की तरह भारत में अलग से टैब्लॉयड अखबार भी निकले लेकिन दुर्भाग्य से कई अखबार सनसनीखेज सामग्री और फोटो आदि से टैब्लॉयड की तरह अखबार का स्तर गिराने लगे, वहीं मशीन, प्रिंटिंग और प्रसार व्यवस्था पर अधिकाधिक धन खर्च किया जा रहा है लेकिन समाचारों के संकलन और समर्पित पत्रकारों पर खर्च कम से कम करने की प्रवृत्ति बढ़ती गई है। इसका असर गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
इन दिनों मीडिया की शक्ति और स्वायत्तता को लेकर भी निरंतर सवाल उठ रहे हैं। जहां तक शक्ति का सवाल है, प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा सोशल मीडिया की बात है, उसके व्यापक असर के कारण ही हजारों करोड़ की पूंजी लग रही है और कोई भी सरकार हो उसका यथासंभव उपयोग करने का प्रयास भी करती है। यही नहीं, विदेशी शक्तियां भी भारतीय मीडिया को प्रभावित करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजी लगा रही हैं। बड़े कार्पोरेट घरानों के प्रभाव को लेकर बहुत शोर मचता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि 80 के दशक तक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तक मीडिया संस्थानों पर बिड़ला, डालमिया, टाटा के प्रभाव की चर्चा शक्तिशाली प्रधानमंत्री करते थे। इसे ‘जूट प्रेस’ कहा जाता था। सत्ता के दबाव तब भी थे।
मैंने पत्रकारिता पर अपनी पुस्तकों पावर, प्रेस एंड पॉलिटिक्स, कलम के सेनापति, भारत में पत्रकारिता, इंडियन जर्नलिज्मः कीपिंग इट्स क्लीन में इस मुद्दे पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ विवरण दिया है। सत्ता की राजनीति ने पत्रकारिता को पहले भी प्रभावित किया था और आज भी कर रही है। इसलिए मुद्दा यह भी है कि सरकारों को बनाने या हटाने की भूमिका जो अखबार या मीडिया निभाता है उसका असर विश्वसनीयता पर पड़ता है। यदि लक्ष्य केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या दल विशेष रहेगा तो स्वायत्तता कहां होगी अन्यथा प्रामाणिक तथ्यों के साथ सरकार की गड़बड़ियों या जनता की समस्याओं को प्रकाशित या प्रसारित करने पर दबाव नहीं पड़ सकता है।
खोजी रिपोर्ट के लिए संस्थानों को अधिक खर्च भी करना पड़ेगा। नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए मीडिया संस्थानों की वेबसाइट और प्रकाशित सामग्री के सोशल मीडिया पर उपलब्ध किए जाने के प्रयास किए जा सकते हैं और कुछ हद तक हो भी रहे हैं। इस दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के अखबारों की संभावना बनी रहेगी। यही बात वैकल्पिक मीडिया यानी सोशल मीडिया पर लागू होती है। जो अच्छी सामग्री उपलब्ध कराएगा उसका भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।
(लेखक पद्मश्री से सम्मानित और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)
यह 200 वर्षों की यात्रा केवल पत्रकारिता की कहानी या इतिहास का एक अध्याय भर नहीं है। यह एक गर्वीली इतिहास-कथा है उस विवेक और चैतन्य की, जो सत्ता के उन्माद और संस्कृति के मौन के बीच जन्मा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
त्रिभुवन, वरिष्ठ पत्रकार।
हर युग अपने भीतर सड़न छिपा रहा होता है तो कुछ स्वच्छताकर्मी मनुष्यों को जन्म भी देता है, जो साहस के साथ समाज के भीतर फैलाया गया अँधकार साफ़ करते हैं। नाना प्रकार की ग़ुलामियों से रूबरू ऐसी हर सभ्यता को उन विरले साहसी लोगों की ज़रूरत होती है, जो शासन सत्ता के भय से पैदा हुई चुप्पियों को तोड़ते हैं। शासन सत्ता, धर्मसत्ता और समाजसत्ता के साथ लड़ते हुए ये साहसिक लोग अंधकार के ख़िलाफ़ प्रकाश के लिए भ्रमित लोक को अवसन्न मूर्च्छा से जगाते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में जब आधुनिक राष्ट्रवाद का युग शुरू हुआ तो पत्रकारिता केवल लेखन नहीं रही। वह एक आह बन गई, जिसे काग़ज़-कलम ने समेटा और सियाही ने छापों तक पहुँच कर एक लपट में बदला। तलवारें पुरानी पड़ रही थीं और क़लम उन हाथों में थी, जिन्होंने अन्याय को देखा, महसूस किया; लेकिन जो चुप न रह सके। उन्होंने लफ़्ज़ों से ग़ुलामी की रूह में हर लम्हा ऐसी लपट भरी कि अंगरेज़ को काठ मार गया और उन्होंने दमन और अत्याचार बढ़ा दिए।
यह 200 वर्षों की यात्रा केवल पत्रकारिता की कहानी या इतिहास का एक अध्याय भर नहीं है। यह एक गर्वीली इतिहास-कथा है उस विवेक और चैतन्य की, जो सत्ता के उन्माद और संस्कृति के मौन के बीच जन्मा। भारतीय पत्रकारिता ने सत्ता को चेताया, लोक की करुणा को सहलाया और एक ऊबी हुई सरज़मीं को थपथपाया। बिना झुके, बिना टूटे। इस इतिहास में उसने गौरवशाली तरीके से आम लोगों के दु:खों और पीड़ाओं के लिए ही नहीं, इस मुल्क़ की मुक्ति के लिए अथक संघर्ष किया। यह एक गरिमा थी, जो तब उपजती है जब कोई आदमी निडर होकर अकेले होने के बावजूद कह उठता है, “नहीं, इस कालखंड और इस भूखंड में संपूर्ण गरिमा, साहस, न्याय और स्वतंत्रता के साथ जीना मेरा नैसर्गिक अधिकार है।”
भारत पत्रकारिता की यदि प्रयोगशाला रहा, तो राजस्थान वह स्थान था, जहाँ यह प्रयोग सबसे अधिक सघन, सबसे अधिक साहसी और सबसे अधिक चेतन रूप में प्रकट हुआ। यहाँ पत्रकारिता महज़ घटनाओं और सूचनाओं का संग्रह भर नहीं थी, रियासतों की क्रूरता, जागीरदारों के अत्याचारों और जनमानस की निष्पाप निरीह आकांक्षा के बीच पलने वाले संघर्ष की वह सांस्कृतिक भाषा थी, जो चुप रहते हुए भी सत्ता को चुनौती देती थी।
उस समय राजस्थान में पत्रकार होना केवल एक पेशा नहीं, एक निष्ठुर सन्नाटे में सच बोलने का आत्मघाती जोखिम उठाना था। लेकिन समाचार पत्र यहाँ आवाज़ नहीं, प्रतिरोध थे; शब्द नहीं, आग थे। हर संपादकीय एक घोषणा थी कि कोई है जो देख रहा है, जो समझ रहा है और जो चुप नहीं रहेगा। उस कालखंड में राजस्थान की पत्रकारिता नायक नहीं, एक जाग्रत आत्मा थी, जो क्रूरता के विरुद्ध, चापलूसी की भीड़ में अकेली खड़ी थी।
आज हम जब भारतीय पत्रकारिता के दो सौ वर्षों का उत्सव मना रहे हैं, यह जानना ज़रूरी है कि धुंधली आकांक्षाओं और मीठे सपनों के तानेबाने के बीच एक महान् राष्ट़्र की छवि को बनाने वाले अख़बार केवल ख़बरों का समूह भर नहीं थे। वे इतिहास की चेतावनी थे। वे इस तरह तैयार होते थे कि उनके पाठकों में सहज ही राष्ट्र स्वतंत्रता की विराट लालसा जगा देती थी। वे अख़बार असहमति और चेतना के दस्तावेज़ थे। उनके शब्दों का प्रभाव ऐसा था, जैसे किसी ने देह में कोई तेज़ चाकू घोंप दिया हो। वे बिलकुल गूँगी हुई शासन व्यवस्था के ख़िलाफ़ लोगों में स्वतंत्रता के लिए एक भभकती आकांक्षा पैदा कर देने वाले साहस का निर्माण कर रहे थे।
राजस्थान की पत्रकारिता सत्ता से टकराई, समाज से संवाद किया और सभ्यता को पुनर्परिभाषित किया। यह सिर्फ़ ख़बरों की बात नहीं थी, यह राज्य और समाज के बीच आत्मा की वह पुकार थी, जिसने समय को चेतना की छेनियों और निडरता के हथौड़े से एक नए रूपाकारों में ढाला। एक ऐसा आकार, जिसमें आवाज़ें दबाई नहीं जातीं, सवाल पूछे जाते हैं और सत्य, चाहे जितना असुविधाजनक हो, फिर भी प्रकाशित किया जाता है।
यह पत्रकारिता सूचनाओं का यांत्रिक संकलन नहीं थी, नैतिक आभा का वह उच्छवास थी, जो पृष्ठों पर दर्ज़ होकर जनता की स्मृति में उतरती जाती है। इसने सत्ता की दीवारों पर दस्तक दी, सामाजिक रूढ़ियों को टटोला और जनता को यह विश्वास दिलाया कि उनकी पीड़ा, उनकी आशा और उनका प्रतिरोध कोई दर्ज़ कर रहा है। राजस्थान की यह पत्रकारिता उस काल की सबसे साहसी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति थी। एक ऐसा दस्तावेज़, जो न केवल इतिहास को गढ़ता है, आने वाले युगों को यह सिखाता है कि जब सब चुप हों, तब बोलना कितना ज़रूरी होता है।
रियासती सन्नाटों में संवाद की पहली चीख: 1849–1885
उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत अंगरेज़ी हुकूमत की कठोर संरचना में जकड़ता जा रहा था। एक ओर ब्रिटिश शासन केंद्रीय भारत में अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत कर रहा था, वहीं दूसरी ओर राजस्थान की रियासतें अपने पारंपरिक वैभव और सत्ता संरचना को बचाए रखने के लिए प्रयत्नशील थीं। इन रियासतों में संवाद के नाम पर केवल सत्ता की घोषणा होती थी, जनता की कोई प्रतिध्वनि नहीं थी। शासन का स्वर एकालाप था और समाज मौन।
ऐसे समय में जब राजमहलों की दीवारें ऊँची थीं और चौक-चौराहे चुप, तब मज़हरुल सरूर (भरतपुर, 1849) और रोज़तुल तालीम (जयपुर, 1856) जैसे समाचार पत्रों का प्रकाशन केवल सूचनाओं का प्रचार नहीं था, वह एक राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का नवांकुर था।
ये समाचारपत्र न तो पूर्ण स्वतंत्र थे, न ही प्रतिरोध के मुखर उपकरण; फिर भी, उन्होंने उस सन्नाटे में पहली चीख का काम किया, जो संवाद की आवश्यकता को जन्म दे चुकी थी। इन पत्रों ने दोहरे काम किए। एक ओर वे शासक वर्ग की इच्छाओं और नीतियों को जनमानस तक पहुँचाने का माध्यम बने, वहीं दूसरी ओर उन्होंने प्रजा की दबाई हुई आकांक्षाओं को, भले ही सीमित भाषा में सही, किंतु एक सार्वजनिक मंच पर पहली बार स्थान दिया। यह कोई शोरगुल नहीं था, यह एक धीमा, किंतु स्पष्ट संकेत था कि राजस्थान संवाद की एक नूतन राह उलीक रहा है।
यह वह क्षण था जब राजपूताना की हवाओं में पहली बार शब्दों की गूंज सुनाई दी, नीतियों की नहीं, ज़रूरतों की; आदेशों की नहीं, संवाद की। सत्ता के एकालाप के बीच यह पहली दो पंक्तियाँ थीं, जिनमें जनता की उपस्थिति दर्ज हुई। यही वह ऐतिहासिक पड़ाव था, जहाँ राजस्थान में पत्रकारिता, धीरे-धीरे ही सही, परंतु एक सांस्कृतिक और सामाजिक शक्ति के रूप में आकार लेने लगी।
राजपत्रों ने जो लिखा, वह इतिहास नहीं था। वह दरअसल इतिहास के नाम पर शासन की स्मृतियों को संरक्षित करने का प्रयास मात्र था। यह स्मृतियाँ, शासन की दृष्टि से क्रमबद्ध की गईं थीं, लेकिन वे जनता के अनुभवों और पीड़ाओं से प्रायः असंबद्ध रहीं। इनमें शासकों की योजनाएँ, घोषणाएँ और उपलब्धियाँ तो थीं, पर जनता की बेचैनी, आकांक्षाएँ और असहमति का कोई स्वर नहीं था। इस प्रकार राजपत्र एकतरफा संवाद के दस्तावेज़ बनकर रह गए।
मारवाड़ राजपत्र, मरुधर मित्र और उदयपुर राजपत्र जैसे प्रकाशनों ने अपने-अपने क्षेत्र में प्रशासनिक पारदर्शिता की आड़ में वास्तव में सामंती नियंत्रण को सशक्त किया। ये पत्र सामंती सत्ता की भाषा बोलते थे, उसकी छाया में चलते थे और इसीलिए उन्होंने आलोचना या असहमति के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा। फिर भी, इन्हीं पत्रों के माध्यम से पहली बार समाज ने शब्दों की ताक़त को पहचाना और ‘जनमत’ या पब्लिक ओपिनियन जैसी अवधारणा धीरे-धीरे आकार लेने लगी।
सत्ता नियंत्रित इन पत्रों को पढ़ते हुए जनता ने यह अनुभव करना शुरू किया कि जो लिखा जा रहा है, वह पूरा सच नहीं है और यही एहसास पत्रकारिता के भीतर आलोचना, असहमति और विवेक के बीज बो गया। ये पत्र भले ही जनता की आवाज़ न बने हों, पर उन्होंने पहली बार जनता को यह चेताया कि उनके पास भी कहने के लिए कुछ है, जिसे अब छुपाया नहीं जा सकता। यही वह ऐतिहासिक अंगड़ाई थी, जहाँ राजस्थान की पत्रकारिता सत्ता के उपकरण से समाज के आईने की ओर मुड़ने लगी।
ब्रिटिश सत्ता और सामाजिक आत्मा के बीच आकार लेते शब्द: 1885–1920
1857 के विद्रोह के बाद भारत में राजनैतिक संघर्ष की जो चेतना पनपी, उसने पत्रकारिता को भी एक नई दिशा दी। राजस्थान में यह चेतना उस समय और तीव्र हो गई, जब स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे विचारक और सुधारक इस भूमि को अपनी क्रांतिकारी विचारधारा के लिए रणभूमि के रूप में चुना। वे केवल एक धार्मिक सुधारक नहीं थे, भारत की आत्मा को विदेशी सत्ता के सामने पुनर्जीवित करने वाले प्रथम विचारक थे, जिन्होंने स्वराज, स्वभाषा और स्वदेश के मंत्र दिए और इन तीनों का सबसे सशक्त उपकरण बना, मुद्रित शब्द, यानी पत्रकारिता।
स्वामी दयानंद का उदयपुर आगमन मात्र एक संत या संन्यासी का प्रवास नहीं था। वे आज के योगियों या भगवा वस्त्र पहनने वालों जैसे कुटिल, कुत्सित और संकीर्ण जड़बुद्धि रूढिवादी नहीं थे। उन्हें सांप्रदायिक वैमनस्य छू तक नहीं गया था। वह एक वैचारिक विस्फोट था। उन्होंने यहीं सत्यार्थ प्रकाश की रचना की एक ग्रंथ, जिसमें न केवल धार्मिक विमर्श था, बल्कि समाज के भीतरी ताने-बाने को समझने और बदलने की गहरी लालसा भी थी। सत्यार्थ प्रकाश में कुछ ऐसे वर्णन मिलते हैं जिन्हें आज की भाषा में रिपोर्ताज या सोशल ऑब्ज़र्वेशन कहा जा सकता है यानी यह पत्रकारिता के उस नूतन संभाव्य का बीज था, जो सत्ता से संवाद करने का साहस और उन्हें बौद्धक रूप से ग़लत साबित करने का विवेक धारण किए था।
उन्हीं के प्रभाव में दीवान श्यामजीकृष्ण वर्मा जैसे उदयपुर के कुलीन शिक्षित वर्ग के व्यक्ति, केवल रियासत के अधिकारी न रहकर अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी बन गए। उन्होंने न केवल ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस में रहते हुए स्वतंत्रता की अलख जगाई, ‘इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ जैसे प्रभावशाली पत्रों के ज़रिए भारत की स्थिति को वैश्विक विमर्श का विषय बनाया। वे पत्रकारिता को एक शस्त्र की तरह प्रयोग कर रहे थे, शब्दों की गोली बनाकर।
स्वामी दयानंद ने अजमेर को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। यहाँ उन्होंने परोपकारिणी सभा की स्थापना की, जो सिर्फ़ एक संस्था नहीं, विचारों की प्रयोगशाला बनी। इस सभा के प्रभाव से अजमेर पत्रकारिता और सामाजिक आंदोलन का ऐसा केंद्र बना, जहाँ विचारों की आँच पर जनजागरण की रोटियाँ पकने लगीं। यहीं से राजपूताना गजट, राजस्थान समाचार और राजपूताना हेराल्ड जैसे पत्रों की नींव पड़ी, जो धीरे-धीरे सत्ता की आलोचना करने और जनता की आवाज़ बनने लगे।
इस दौर की पत्रकारिता में एक अनोखा द्वंद्व था। एक ओर यह ब्रिटिश प्रशासन की आँखों में आंखें डालकर संवाद करना चाहती थी, तो दूसरी ओर यह समाज के भीतर फैले अंधविश्वास, जातिवाद और स्त्री-विरोधी प्रवृत्तियों के विरुद्ध भी आवाज़ उठाने लगी थी। यह वह समय था जब पत्रकारिता ने पहली बार अपने भीतर सत्ता के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध और समाज के भीतर आत्मसुधार का आग्रह एक साथ साधना शुरू किया। यह वह काल था जहाँ शब्द केवल छपते नहीं थे, वे चेतना को आकार देने लगे थे। राजस्थान में पत्रकारिता अब सूचना नहीं, संघर्ष का औजार बन चुकी थी।
दयानंद सरस्वती के निधन (1883) से ठीक पहले, वर्ष 1880 में अजमेर ब्रिटिश भारत का वह दुर्लभ केन्द्र बन चुका था जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता ने अपनी आंखें खोलनी शुरू कर दी थीं। यह वह ऐतिहासिक घड़ी थी जब छपने वाला हर शब्द, राजसत्ता की गूंज को चुनौती देने की क्षमता रखता था। इसी काल में राजपूताना गजट (1885) ने जन्म लिया और इसके माध्यम से मौलवी मुराद अली ‘बीमार’ ने प्रशासन की नीतियों पर साहसपूर्वक सवाल उठाए। उनकी लेखनी इतनी प्रखर थी कि उन्हें कारावास का दंड भुगतना पड़ा, पर यह क़ैद एक व्यक्ति की नहीं थी, एक नए पत्रकारिता युग की गर्जना थी, जो अब चुप रहने को तैयार नहीं था।
इसी दौरान राजपूताना हेराल्ड के रूप में राजस्थान को पहला अंग्रेज़ी समाचारपत्र मिला, जिसने केवल सूचना नहीं दी, बल्कि सीधे एजेंट टु गवर्नर जनरल जैसे ब्रिटिश अधिकारियों की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया। यह पत्र महज़ भाषा का अनुवाद नहीं, विचार का हस्तक्षेप था। यह वह क्षण था जब राजस्थान की पत्रकारिता ‘वफादार सूचनाओं’ के सीमित दायरे से निकलकर असहमति की राजनीति और जनचेतना की ओर निर्णायक क़दम बढ़ा रही थी। इस समय की पत्रकारिता ने न सिर्फ़ रियासतों को आईना दिखाया, जनता को यह बताया कि सत्ता की आलोचना कोई राजद्रोह नहीं, एक नैतिक और लोकतांत्रिक आवश्यकता है। समाचार पत्र अब सत्ता की दर्पण छवि नहीं, समाज की विवेकशील आत्मा के प्रतिनिधि बन चुके थे।
और सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि यह चेतना केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रही। राजपूताना गजट से जुड़ी मोती बेग़म जैसी महिला पत्रकारों की सक्रिय उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि राजस्थान में पत्रकारिता उस समय भी केवल पुरुषों के हाथों की सत्ता नहीं थी। यह नारी चेतना की अभिव्यक्ति का भी माध्यम बन रही थी, वह चेतना जो बंद परदों और सघन परंपराओं को चीरती हुई संवाद के मंच पर आई और अपनी उपस्थिति से यह जता दिया कि असहमति केवल पुरुषों की विशेषाधिकार प्राप्त भाषा नहीं है। यह वह कालखंड भी था जब राजस्थान की पत्रकारिता एक निर्णायक मोड़ पर थी, जहाँ वह केवल सूचना नहीं, विचार बनने लगी थी; केवल शासन की छाया नहीं, समाज की आत्मा बनने लगी थी।
पत्रकारिता का क्रांतिकाल: 1920–1947
बीसवीं शताब्दी का तीसरा दशक जब भारतीय स्वाधीनता संग्राम की आंच से तप रहा था, तब राजस्थान की पत्रकारिता भी एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी थी। अब वह केवल सत्ता की आलोचना या सामाजिक विसंगतियों का दस्तावेज़ भर नहीं रही थी, वह खुद एक आंदोलन बन चुकी थी। 1920 के बाद की पत्रकारिता ने सामंती सत्ता, उपनिवेशवाद और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध न सिर्फ़ स्वर उठाया, बल्कि वह युद्धघोष का रूप ले चुकी थी। इस दौर में पत्रकारिता जनांदोलन की आत्मा बन गई।
विजय सिंह पाथिक द्वारा संपादित राजस्थान केसरी (1920) और नवीन राजस्थान (1922) केवल समाचारपत्र नहीं थे, वे राजनीतिक संगठन के जीवित दस्तावेज़, विचारधारा के निर्माण की प्रयोगशाला, और किसान चेतना के प्रशिक्षण शिविर बन चुके थे। इन पत्रों ने न केवल बिजोलिया किसान आंदोलन को वैचारिक ज़मीन दी, बल्कि उसे राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ा। जहाँ बंदूकें नहीं थीं, वहाँ लेखनी ने युद्ध लड़ा, राजस्थान की पत्रकारिता की यह भूमिका भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में अद्वितीय है।
तरुण राजस्थान, त्यागभूमि, आर्य मार्तण्ड, दैनिक नवज्योति, यंग राजस्थान, प्रजा सेवक जैसे अनेक पत्रों ने मिलकर उस समय दोहरी लड़ाई लड़ी। एक ओर विदेशी शासन के विरुद्ध, और दूसरी ओर स्थानीय सामंतों, ज़मींदारों और जातिवादी सामाजिक ढाँचों के खिलाफ़। इन्होंने रियासतकालीन शासकों की क्रूरता, जागीरदारों के अत्याचार और समाज में फैले अंधविश्वास व अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त चेतना खड़ी की।
त्यागभूमि जैसे पत्र ने पत्रकारिता को केवल राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक और वैज्ञानिक बनाम अवैज्ञानिक विमर्श का भी मंच बना दिया। इस पत्र के कुल 64 पृष्ठों में 16 पृष्ठ ‘आधी दुनिया’ शीर्षक से केवल महिलाओं को समर्पित थे। यह दर्शाता है कि राजस्थान की पत्रकारिता स्त्री चेतना की वाहक भी बन रही थी। वह स्त्रियों की पीड़ा, आकांक्षाओं और अधिकारों को भी स्वर देने लगी थी।
यह दौर पत्रकारिता का क्रांतिकाल था, जब हर अख़बार एक मोर्चा था, हर संपादकीय एक घोषणापत्र और हर संवाद एक प्रतिरोध। पत्रकारिता अब सत्ता से भयभीत नहीं थी; वह जनता के साथ खड़ी थी, उसके दुख-दर्द की साक्षी भी, और उसकी आवाज़ भी। यह वह युग था जब शब्दों ने संघर्ष का वरण किया और राजस्थान की भूमि पर विचारों ने इतिहास को दिशा दी।
राजस्थान की पत्रकारिता: एक सभ्यता की प्रभावी पुकार
हर वह समय जब इतिहास अपनी दिशा खो देता है, वह विचार को पुकारता है और विचार शब्द में ढलता है। राजस्थान की पत्रकारिता उन शब्दों की शृंखला है, जो किसी क्रांति से नहीं, भीतर उठती एक अस्तित्वगत पीड़ा से जन्मीं। यह पत्रकारिता, सत्ता से असहमति मात्र नहीं थी। यह उस असहमति की एकाकी और असह्य स्वीकृति थी, जो मनुष्य को सत्य के अकेलेपन में खड़ा करती है। जिस समय राष्ट्र राज्य की कल्पनाएँ बन रही थीं, राजस्थान की रियासतों में शब्द अंधेरे की दीवार पर हथौड़े की तरह गिर रहे थे। प्रचार जब कहता है: "चोर, पापी और उल्लू चाहते हैं अंधकार, लेकिन प्रचार है जनता की खोजबीन की रोशनी," तो यह कोई काव्यात्मक पंक्ति नहीं, बल्कि एक दार्शनिक ध्वनि है, यह मानवीय विवेक की अंतिम चमक है, जो उस अंधकार से जूझ रही है, जिसे सत्ता 'व्यवस्था' कहती है।
राजपत्रों ने जो लिखा, वह इतिहास नहीं था। वह स्मृति को नियंत्रित करने का कुटिल प्रयास था। और जब रियासती ने जोधपुर के पाकिस्तान में विलय की खबर प्रकाशित की, तो वह केवल पत्रकारिता नहीं, वह नियति में हस्तक्षेप था। शब्द अब सूचना नहीं रहे, वे भाग्य बदलने वाले औजार बन चुके थे। पर यह संघर्ष 'राज्य बनाम समाज' का नहीं था। यह उससे कहीं अधिक गहरा और मूलभूत था। यह सभ्यता बनाम साम्राज्यवाद का संघर्ष था। एक ऐसा संघर्ष जिसमें पत्रकार की कलम, युद्ध के मैदान में उस सैनिक की तरह थी, जिसके पास न शस्त्र था, न सेना। सिर्फ़ विवेक था और मौन में गूंजता हुआ सत्य।
इसलिए राजस्थान की पत्रकारिता को महज़ राजनीतिक आंदोलनों का मुखपत्र कह देना, उसके अर्थ को सीमित कर देना है। वह उन सभ्यताओं की अंतिम पुकार थी, जो ब्रिटिश नहीं बनना चाहती थीं, पर साथ ही अपने अतीत के पत्थरों में दफ़न भी नहीं होना चाहती थीं। वे सभ्यताएँ जो जीना चाहती थीं एक नई नैतिकता के साथ, एक नई रोशनी में, अपनी शर्तों पर। और इस सबके बीच, राजस्थान की पत्रकारिता एक पुल बनी, पुल ही नहीं, एक उफनती लहर, जो अतीत और भविष्य के बीच जलती हुई चेतना थी। वह परंपरा को विसर्जित नहीं करती, लेकिन आधुनिकता को विवेकहीन भी नहीं होने देती। वह संवाद करती है, टकराती है और अंततः एक नई पहचान की ओर ले चलती है।
यह पत्रकारिता इतिहास की सेवा में नहीं थी, यह इतिहास को तोड़कर नया समय रचने की प्रक्रिया में थी। यह वह शब्द थे जो चुप्पियों से उपजे, और जो हर बार उस प्रश्न से टकराए : "क्या मनुष्य न्याय के बिना जी सकता है?" राजस्थान की पत्रकारिता ने उस प्रश्न का उत्तर शब्दों से नहीं, साहस से दिया।
आज जब हम राजस्थान की पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा को देखते हैं तो उस स्वप्न को याद करते हैं, जिसमें शब्दों ने सत्ता से टकराने का साहस किया था। आज हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि वही पत्रकारिता अब एक गहरे नैतिक संकट में है। यह संकट बाहर से थोपा नहीं गया है; इसे आमंत्रित किया गया है, मेज़ों पर बैठकर, सम्मेलनों में भाग लेकर, विज्ञापन की चुप्पियों में सहमति देकर। यह वह दौर है, जहाँ कलम, जो कभी चेतना का हथियार थी, अब वह राजकीय संवाद की चुप भाषा बन चुकी है। एक समय जो पत्रकारिता सत्य के अकेलेपन में खड़ी होती थी, वह आज भीड़ के साथ घुटनों के बल खड़ी है। अपनी रीढ़ खो चुकी, लेकिन चेहरा मुस्कुराता हुआ।
यह वही विडंबना है जिसे आचार्य नरेंद्र देव, विष्णु पराड़कर, डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे हमारे बहुत से प्रखर मनीषियों और युगांतरकारी समाजचेताओं ने आज़ादी से बहुत पहले देख लिया था। हम जानते हैं कि सत्य और सुविधा में चुनाव करना हो तो मोहक सफलताओं की दौड़ती सभ्यताएं अक्सर शासकीय ग़ुलामियाँ, भीतर नाड़ियों में सुविधाओं का नशा और रीढ़ की हड्डी पर जनविमुखता की बर्फ़ीली ठंड को चुनती हैं और उस युग की आत्मा को गूंगा बनाने में मदद करती हैं। राजस्थान की पत्रकारिता आज उसी मौन की गिरफ्त में है, जहाँ असहमति अपराध है और प्रश्न पूछना व्यावसायिक आत्महत्या।
यह युग ‘संघर्ष’ का नहीं, ‘सहज समर्पण’ का है। और यही वह क्षण है जहाँ इतिहास करवट लेने के लिए अकुलाता है, जहाँ स्वातंत्र्य आधारित और लोक करुणामुखी पत्रकारिता की एक पगली और अर्थवान् अभिव्यक्ति लेती है। लेकिन जाने कब इस नियति और बदनीयत को चुनौती देता हुआ पत्रकारिता का साहस छलछलाकर एक नए रूप में आएगा? कब वह जनसंवाद की प्रतीक्षा को सच में बदलेगा? और कब नई कलम को धार देगा? लेकिन अब सत्ता सुंदरी के घने बालों की लंबी लटें इतनी उलझ गई हैं कि उन्हें सुलझाने के लिए निर्भय पत्रकारिता को अपने विवेक का पीढ़ा इस अंधकार में ढाल ही लेना चाहिए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
ऐसा नहीं है कि जो आज हो रहा है, वह पहले कभी नहीं हुआ। सामाजिक परिवर्तन के दौर में समाज के हर अंग में बदलाव होते हैं। पत्रकारिता ने सदियों से अपने भीतर कई बदलाव देखे हैं।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अजय कुमार, वरिष्ठ पत्रकार।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक जनसभा में जब यह बात कही कि वैश्विक परिस्थितियों की वजह से इस दशक में भारत कई बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तो उनका वक्तव्य सिर्फ अर्थव्यवस्था और आर्थिक मसलों तक सीमित नहीं था-उनके कथन के कई मायने हैं। कोरोना काल के बाद से भारतीय पत्रकारिता के तौर-तरीकों और प्रस्तुतिकरण में मूलभूत परिवर्तन आया है। सनसनी, हाहाकार, सुर्ख हेडलाइन, क्लिकबेट कंटेंट, एकतरफा नैरेटिव बनाने वाले संपादकीय और भ्रमात्मक रिपोर्ट्स या कमेंट-इन सबने पत्रकारिता की आत्मा को सिरे से झकझोर कर उसे एक नया जामा पहना दिया है।
आज स्थिति यह है कि आम जनता को खबरों पर यक़ीन ही नहीं है। क्या सही है, क्या फरेब है, क्या अतिशयोक्ति है और क्या विचारपूर्ण पक्षपात है-इसकी परख ही नहीं बची है। सोशल मीडिया के प्रसार और प्रचार ने इस प्रक्रिया को इतनी तेजी से लोगों के बीच फैला दिया कि अब तो नौजवानों को हर बात फर्जी लगने लगी है-बिकाऊ लगने लगी है। भरोसा उठ जाने से कहीं ज्यादा खतरनाक होता है ‘भरोसे के भ्रम’ का भी टूट जाना।
हम पत्रकारों ने अपने पाठकों और दर्शकों के साथ यह घिनौना अपराध किया है और वह भी बड़ी निर्लज्जता और निर्ममता के साथ। लोकतंत्र में विचारों की विमुखता, सत्ता से सवाल, विपक्ष का मूल्यांकन, देश में प्रचलित सिस्टम में मौजूद खामियों पर चिंतन, राजनीतिक दलों के दाँव-पेंच का आकलन, अंतरराष्ट्रीय परिवेश में अपने देश के राष्ट्रहित पर विमर्श और सामुदायिक सौहार्द पर विशेष जोर-ये पत्रकारिता के मूल मुद्दे रहे हैं। लेकिन जब सत्ता की उगाही, लोलुपता और आर्थिक लाभ पत्रकारों का मकसद बन जाए, तो विकार सामने आएँगे ही और यह सब आजकल हम भरपूर मात्रा में देख भी रहे हैं।
विपक्ष से सवाल और सत्ता के साथ मिलकर नैरेटिव गढ़ने में पत्रकारों की जमात लग गई है। ऐसे में क्या कोई सिस्टम पर सवाल उठाएगा? क्यों कोई राजनीतिक दलों की चालों के बारे में जनता को सूचित करेगा? आखिर क्यों कोई देशहित के मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय परामर्श में अपनी आवाज बुलंद कराएगा? आज हम पत्रकार अपने बीच इस जघन्य चुनौती का सामना कर रहे हैं और एक-दूसरे पर ही निशाना साध रहे हैं-बेइज्जत कर रहे हैं। आज यह तय कर पाना असंभव है कि कौन पत्रकार राजनीतिक धारा के किस छोर को पकड़े, किसके नैरेटिव का हिस्सा बना बैठा है। लिहाजा, अविश्वास की गंगा में जनता हिंडोले खा रही है और किसी को किनारा दिख नहीं रहा है।
ऐसा नहीं है कि जो आज हो रहा है, वह पहले कभी नहीं हुआ। इतिहास गवाह है कि सामाजिक परिवर्तन के दौर में समाज के हर अंग में बदलाव होते हैं। पत्रकारिता ने सदियों से अपने भीतर कई बदलाव देखे हैं। आज भी दुनिया के विभिन्न देशों में तरह-तरह के पत्रकारिता मॉडल उपलब्ध हैं-जैसी सत्ता, वैसी राजनीति और वैसी ही पत्रकारिता। कह सकते हैं कि भारत में दशकों बाद पत्रकारिता के मूल स्वरूप में बुनियादी बदलाव हो रहा है।
गुलामी की जंजीरें टूट रही हैं-मानसिकता भी बदली है। अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे सिद्धांतों की जगह भारतीय मूल और नई खोजी गई भारतीय अवधारणाओं के प्रभाव साफ दिखाई दे रहे हैं। फिलहाल एक घालमेल जैसी स्थिति है- अविश्वास और अकल्पनीयता उसके दो खंभे हैं। उम्मीद है, फरेबपन का यह धुआँ जल्द छटेगा। जल्द ही एक स्वच्छंद और उन्मुक्त पत्रकारिता के दौर का आरंभ होगा। हाँ, लेकिन इस बदलाव के दौर में कई मानक टूटेंगे और कई नए आयाम जुड़ेंगे। मुझे पूरा यकीन है कि हम बीते दो दशकों के उहापोह से बाहर निकलकर एक मजबूत धरातल पर दो-एक सालों में जरूर खड़े होंगे।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
अब लोगों को शुद्ध और कठिन भाषा की जगह सरल, तेज और असरदार भाषा ज्यादा पसंद आ रही है। अब हिंदी पत्रकारिता पारंपरिक शैली से निकलकर डिजिटल हिंदी की तरफ तेजी से बढ़ रही है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
शमशेर सिंह, मैनेजिंग एडिटर, टाइम्स नेटवर्क।
हिंदी पत्रकारिता आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसके सामने चुनौती भी है और अभूतपूर्व अवसर भी। हिंदी भी बदल रही है और पाठक-दर्शकों की सोच भी तेजी से बदल रही है। पहले पत्रकारिता को मिशन माना जाता था, फिर यह प्रोफेशन बनी और अब यह रियल-टाइम पत्रकारिता के दौर में प्रवेश कर चुकी है। सही मायने में हिंदी पत्रकारिता दिवस आत्ममंथन का अवसर है। यह सोचने का समय है कि खबरों की भीड़, ब्रेकिंग न्यूज़ की होड़ और तेज़ डिजिटल प्रतिस्पर्धा के बीच पत्रकारिता की आत्मा और उसकी विश्वसनीयता को कैसे बचाकर रखा जाए।
आज हिंदी पत्रकारिता प्रिंट माध्यम से निकलकर मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और एआई न्यूज़रूम तक पहुँच चुकी है। अब खबरें केवल अखबार के पन्नों या टेलीविज़न स्क्रीन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि रील, शॉर्ट्स, पॉडकास्ट, लाइव स्ट्रीम और नोटिफिकेशन के रूप में हर पल लोगों तक पहुँच रही हैं। इस बदलाव ने पत्रकारिता को तेज, प्रभावशाली और व्यापक बनाया है, लेकिन इसके साथ कई गंभीर चुनौतियाँ भी सामने आई हैं।
अब खबर का अर्थ केवल सूचना देना नहीं, बल्कि कम समय में ज्यादा लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुँचना भी है। पत्रकारिता अब पूरी तरह मल्टी-स्किल प्रोफेशन बन चुकी है, जहाँ रिपोर्टर को लिखने के साथ वीडियो, डिजिटल एडिटिंग और सोशल मीडिया की समझ भी जरूरी हो गई है। सबसे बड़ी चुनौती भरोसा बचाने की है।
नई पीढ़ी की हिंदी पहले जैसी नहीं रही। अब लोगों को शुद्ध और कठिन भाषा की जगह सरल, तेज और असरदार भाषा ज्यादा पसंद आ रही है। यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता पारंपरिक शैली से निकलकर डिजिटल हिंदी की तरफ तेजी से बढ़ रही है। आने वाले समय में हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत मोबाइल-फर्स्ट कंटेंट, हाइपरलोकल रिपोर्टिंग, एआई और ऑटोमेशन का बढ़ता इस्तेमाल होगा।
आज पाठक तेज खबर के साथ सही और विश्वसनीय खबर भी चाहता है। अगर हिंदी पत्रकारिता अपनी साख और निष्पक्षता बचाने में सफल रही, तो उसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और अधिक बढ़ेगा। लेकिन यदि टीआरपी, क्लिक और सनसनी की दौड़ हावी रही, तो भरोसे का संकट और गहरा सकता है।
अगला भविष्य छोटे शहरों का है। हिंदी पत्रकारिता अब केवल दिल्ली और मुंबई तक सीमित नहीं रहेगी। आने वाले समय में पटना, लखनऊ, इंदौर, जयपुर, रांची, गोरखपुर और देहरादून जैसे शहर पत्रकारिता के नए केंद्र बनेंगे। स्थानीय मुद्दों को समझने वाले पत्रकार और क्षेत्रीय संवेदनाओं से जुड़ा कंटेंट अधिक प्रभावी साबित होगा।
कुल मिलाकर हिंदी पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है, क्योंकि हिंदी बोलने और समझने वाली आबादी लगातार बढ़ रही है। लेकिन यह भविष्य उन्हीं संस्थानों और पत्रकारों का होगा, जो तेजी से बदलती तकनीक, डिजिटल व्यवहार और पाठकों की नई जरूरतों को समय रहते समझेंगे। आने वाला दौर केवल खबर देने का नहीं, बल्कि विश्वसनीय, संवेदनशील और प्रभावी संवाद का होगा और हिंदी पत्रकारिता उसके केंद्र में खड़ी दिखाई देगी।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 30 मई 1826 को प्रकाशित पहले हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड से मानी जाती है। इसे पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से प्रकाशित किया था।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो.(डॉ) पवित्र श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष, जनसंपर्क विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल।
हिंदी पत्रकारिता भारतीय समाज, संस्कृति और लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण धुरी रही है। यह केवल समाचारों के प्रसार का माध्यम नहीं, बल्कि जनचेतना, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति का सशक्त साधन भी रही है। आज जब संचार तकनीक तेजी से बदल रही है और डिजिटल मीडिया का विस्तार हो रहा है, तब हिंदी पत्रकारिता का भविष्य एक महत्वपूर्ण विमर्श का विषय बन गया है। बदलते समय में हिंदी पत्रकारिता के सामने चुनौतियाँ भी हैं और अपार संभावनाएँ भी।
हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 30 मई 1826 को प्रकाशित पहले हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तण्ड से मानी जाती है। इसे पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से प्रकाशित किया था। उस समय हिंदी भाषी समाज तक समाचार पहुँचाने का कोई प्रभावी माध्यम नहीं था। उदंत मार्तण्ड ने हिंदी भाषा को पत्रकारिता की अभिव्यक्ति दी और भारतीय समाज में जनसंचार की नई चेतना जगाई। आर्थिक कठिनाइयों और संसाधनों की कमी के कारण यह समाचार पत्र अधिक समय तक नहीं चल सका, लेकिन उसने हिंदी पत्रकारिता की जो नींव रखी, वही आज 200 वर्ष चलकर विशाल वृक्ष के रूप में विकसित हुई है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनमत तैयार किया। पत्रकारिता उस समय केवल व्यवसाय नहीं थी, बल्कि राष्ट्रसेवा का माध्यम थी। यही आदर्श हिंदी पत्रकारिता की आत्मा बने।
आज हिंदी पत्रकारिता एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने समाचारों के स्वरूप और प्रस्तुति को पूरी तरह बदल दिया है। अब पाठक केवल अखबार पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि मोबाइल फोन पर तत्काल समाचार प्राप्त करना चाहता है। इस बदलाव ने हिंदी पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं।
सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। डिजिटल युग में समाचारों की गति तो बढ़ी है, लेकिन सत्यता और तथ्यपरकता पर कई बार प्रश्नचिह्न लग जाते हैं। फेक न्यूज और अपुष्ट सूचनाएँ तेजी से फैलती हैं। ऐसे समय में हिंदी पत्रकारिता का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी विश्वसनीयता और नैतिक मूल्यों को किस प्रकार बनाए रखती है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सही और निष्पक्ष जानकारी देना है। यदि यह उद्देश्य कमजोर पड़ता है, तो पत्रकारिता केवल मनोरंजन या प्रचार का माध्यम बनकर रह जाएगी।
हिंदी पत्रकारिता के भविष्य की एक बड़ी संभावना उसकी व्यापक पहुँच है। हिंदी विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। भारत में करोड़ों लोग हिंदी समझते और पढ़ते हैं। इंटरनेट और स्मार्टफोन के प्रसार के कारण अब गाँवों और छोटे शहरों तक डिजिटल पत्रकारिता पहुँच रही है। इससे हिंदी पत्रकारिता के पाठकों और दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
भविष्य में हिंदी पत्रकारिता केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बनाएगी। आज विदेशों में रहने वाले भारतीय भी हिंदी समाचार और डिजिटल सामग्री में रुचि ले रहे हैं। यूट्यूब चैनल, पॉडकास्ट, ब्लॉग और डिजिटल न्यूज़ पोर्टल हिंदी पत्रकारिता के नए स्वरूप बनकर उभर रहे हैं।
हालाँकि, व्यावसायीकरण भी हिंदी पत्रकारिता के सामने एक गंभीर चुनौती है। टीआरपी और क्लिक की होड़ में कई बार समाचारों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। सनसनीखेज प्रस्तुति और पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग पत्रकारिता की गरिमा को नुकसान पहुँचाती है। भविष्य में वही हिंदी पत्रकारिता सफल होगी जो व्यावसायिक हितों और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
तकनीकी विकास भी हिंदी पत्रकारिता के भविष्य को प्रभावित करेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा पत्रकारिता, मोबाइल पत्रकारिता और मल्टीमीडिया प्रस्तुति आने वाले समय में पत्रकारिता का स्वरूप बदल देंगे। हिंदी पत्रकारों को नई तकनीकों के साथ स्वयं को तैयार करना होगा। केवल भाषा का ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि डिजिटल कौशल और तथ्य जाँच की क्षमता भी आवश्यक होगी।
हिंदी पत्रकारिता के भविष्य का एक महत्वपूर्ण पक्ष भाषा की गुणवत्ता भी है। आज कई डिजिटल मंचों पर हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का अत्यधिक प्रयोग देखा जा रहा है। यदि हिंदी पत्रकारिता अपनी भाषा की सरलता, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की शक्ति को बनाए रखती है, तो उसकी लोकप्रियता और अधिक बढ़ेगी। हिंदी की आत्मा उसकी सहजता और जनसंपर्क में निहित है।
आज हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते है कि हिंदी पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते वह अपने मूल आदर्शों—सत्य, निष्पक्षता और जनहित—को बनाए रखे। उदंत मार्तण्ड से शुरू हुई यह यात्रा आज डिजिटल युग तक पहुँच चुकी है। समय बदल गया है, माध्यम बदल गए हैं, लेकिन पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है—समाज को जागरूक करना और लोकतंत्र को मजबूत बनाना। यदि हिंदी पत्रकारिता तकनीकी विकास के साथ नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी को संतुलित कर सके, तो भविष्य में उसकी भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण होगी।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति इन्हीं प्रयासों से मिलेगी। यह सिर्फ भाषा-प्रेम का सवाल नहीं, भारतप्रेम और सामाजिक न्याय का भी विषय है। अपनी भाषाओं में बोलता, पढ़ता भारत अभी भी प्रतीक्षित है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो. संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी (200 वर्ष) पर समारोहों की धूम है। दिल्ली, भोपाल, जयपुर, कोलकाता, रायपुर, कानपुर से लेकर अनेक शहरों और विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभागों में विमर्श व संवाद के अनेक आयोजन हो रहे हैं। जाहिर है, हिंदी का गौरव और आत्मविश्वास दोनों बढ़ा है। उसकी लोकस्वीकृति बढ़ी है। वह भारत में मीडिया, मनोरंजन जगत और वोट माँगने की सबसे बड़ी भाषा है। हिंदी देश के ताकतवर प्रधानमंत्री से लेकर सामान्यजन तक की भाषा बन गई है। राजनीतिक संचार की सबसे बड़ी भाषा वह पहले से थी, किंतु नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे नेताओं की केंद्रीय उपस्थिति में वह सत्ता की भी भाषा बन गई है। जाहिर है, उसके मीडिया का भी अपना जलवा है। आज वह सत्ताधीशों की प्रिय भाषा है, जनभाषा तो वह पहले से थी।
क्या हमारी भाषा बचेगी?
द्विशताब्दी वर्ष का उत्सव मनाते हुए कई सवाल मथ रहे हैं। हिंदी प्रेमियों के सत्तारूढ़ होने, राजनीतिक परिवर्तनों के कारण हिंदी की ताकत सामने दिख रही है। किंतु हमें उन सवालों पर भी सोचना होगा, जिससे हमारी पत्रकारिता और मीडिया को शक्ति मिलती है। पत्रकारिता को शक्ति देने वाली पहली ताकत है ‘भाषा’। क्या हमारी आने वाली पीढ़ी हिंदी के साथ सहज है? वह पढ़ना, लिखना, समझना और बोलना हिंदी में कर रही है? उसकी शिक्षा का माध्यम क्या धीरे-धीरे अंग्रेजी नहीं हो गया है? ऐसे कठिन समय में हिंदी और भारतीय भाषाओं के सामने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती है। हिंदी के पाठक ही न होंगे तो हिंदी के प्रिंट माध्यमों का भविष्य क्या है? इसी तरह हिंदी सुनी जाने वाली भाषा में बदल रही है। उसके गंभीर अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं और अन्य माध्यमों के सामने गहरा संकट है।
अकादमिक विमर्श की भाषा बनने की चुनौती
हिंदी का उपयोग बड़ी मात्रा में मनोरंजन, राजनीतिक संचार या बाजार में ही हो रहा है। गंभीर अकादमिक विमर्श की भाषा बने बिना उसे लंबे समय तक टिकाए रखना कठिन होगा। जनसंचार की वह सबसे लोकप्रिय भाषा हो सकती है, किंतु ज्ञान-विज्ञान के हर अनुशासन की भाषा बने बिना उसे वह महत्व नहीं मिल सकता, जो दुनिया की ताकतवर भाषाओं को मिल रहा है। मीडिया लोकप्रिय को साधता है, सबसे संवाद करता है, मनोरंजन करता है, सूचना देता है। किंतु भाषा के अनेक रूप हैं, जिनमें भाषा को साबित करना होता है। ऐसे में गंभीर प्रकाशनों की हालत अच्छी नहीं है। हिंदी विमर्श की नहीं, प्रचार की भाषा ज्यादा बन गई है। जिस तरह के गंभीर अखबार और पत्रिकाएँ आज भी कम पाठक संख्या के बावजूद अंग्रेजी भाषा के पास हैं, हिंदी के पास नहीं हैं। हिंदी वैचारिक दारिद्र्य से जूझ रही भाषा है, जिसके पास गौरवशाली अतीत है, बहुत आत्मविश्वास है, किंतु गहराई कम हो रही है। हम लोकप्रियता को साधने वाली पत्रकारिता तक सीमित हो रहे हैं, जिसमें गंभीर अनुसंधान, माटी की सुगंध कम होती जा रही है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जूझती भाषा
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में, जब भाषाएँ तेजी से मशीनीकृत हो रही हैं, हिंदी अपना रूप, रस, गंध और आस्वाद गँवा सकती है। तमाम माध्यमों की एआई पर बढ़ती निर्भरता भाषा के साथ खिलवाड़ जैसा ही है। एआई के मशीनी-तकनीकी इस्तेमालों से आगे जब एआई भाषा की ओर बढ़ रही है, तो उसकी सीमाएँ बहुत स्पष्ट हैं। भाषा का समाज में फलना-फूलना और विकसित होना बहुत सहज और स्वाभाविक है। किंतु मशीनों द्वारा बन रही भाषा क्या रूप लेगी, कहा नहीं जा सकता। सबसे बड़ी चिंता इसलिए भाषा की है, क्योंकि भाषा ही नहीं बचेगी तो भाषा पर आधारित विधाएँ, जिनमें पत्रकारिता भी एक है, कैसे बचेंगी?
ऐसे कठिन समय में, जब मीडिया में मूल्यबोध, भाषा की शुचिता के सवाल बेमानी लगने लगे हों, गंभीरता के साथ इस विधा में काम करने वालों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। स्कूलों से लेकर पूरे अकादमिक जगत में हिंदी लगभग बहिष्कृत भाषा बन गई है। आने वाले दिनों में क्या हिंदी सिर्फ बोलने की भाषा रह जाएगी, जैसा वह पहले कभी थी? हमारे यशस्वी संपादकों बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, सखाराम गणेश देउस्कर, माधवराव सप्रे जैसे नायकों की बदौलत आज हम यहाँ तक पहुँचे हैं।
समाज में अलग-अलग तरह से बरती जा रही भाषा ने न सिर्फ अनुशासन और व्याकरण पाया, बल्कि वह शानदार गद्य की भाषा बनी। हिंदी पत्रकारिता के संपादकों का यह योगदान हमें पता है कि कैसे उन्होंने एक शानदार भाषा हमें सौंपी। यह ऐसी भाषा बनी, जो सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं थी, बल्कि समाज-जीवन के विविध अनुशासनों को व्यक्त करने वाली भाषा थी। उसकी ताकत दिखने लगी। पत्रकारिता में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘प्रभा’, ‘कल्पना’ जैसी पत्रिकाओं ने जो किया, उसकी मिसाल खोजने पर नहीं मिलेगी। भाषा का आत्मविश्वास और सामर्थ्य हिंदी पत्रकारिता ने उसे अनुभव करवाया।
संकल्प से मिलेगी सिद्धि
200 साल पूरे करने के बाद अब हमें कुछ संकल्प लेने ही चाहिए। पं. युगलकिशोर शुक्ल ने ‘उदंत मार्त्तण्ड’ के रूप में जो दीप जलाया, उसे हमें प्रज्ज्वलित रखना है। यह कर्तव्य और उत्तराधिकार दोनों हमें मिला है। हम अपनी भाषा को कैसे बचाएँ, कैसे उसे हर अनुशासन की भाषा बनाएँ, यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। अकादमिक, प्रशासनिक, न्याय व्यवस्था, वित्त और व्यवसाय तक विविध क्षेत्रों में हिंदी का प्रभावी हस्तक्षेप अभी शेष है। हिंदी और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता इसे मिलकर ही कर सकती हैं। इससे स्वत्व की पहचान होगी और भारतबोध प्रखर होगा। हमें अपने लोगों को न्याय दिलाना है, तो यह उनकी अपनी भाषा में ही संभव है।
वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति इन्हीं प्रयासों से मिलेगी। यह सिर्फ भाषा-प्रेम का सवाल नहीं, भारतप्रेम और सामाजिक न्याय का भी विषय है। अपनी भाषाओं में बोलता, पढ़ता, सुनता, सीखता भारत अभी भी प्रतीक्षित है। मीडिया की इसमें बड़ी भूमिका है। हमें पता है कि आज के युग में जिस तरह मीडिया का विस्तार हुआ है, भूगोल की सीमाएँ डिजिटल मीडिया के नाते टूट गई हैं। उसमें जो श्रेष्ठ होगा, वही टिकेगा। अपनी भाषा में हम श्रेष्ठतम सृजन करें। हिंदी को इतना ताकतवर बनाएँ कि दुनिया के ज्ञान-क्षेत्र में सक्रिय जन हमारी पत्रकारिता से संदर्भ ग्रहण करें।
उधार और जूठन पर आधारित लेखन और पत्रकारिता का कोई मूल्य नहीं है, इसे हम जानते हैं। गंभीर रिपोर्टिंग और गंभीर विश्लेषण आज की जरूरत है। इससे ही हमें मौलिक सृजनकर्ता के रूप में स्वीकार किया जाएगा। भारत का विचार श्रेष्ठता का विचार है, विश्वमंगल का विचार है। हमारी पत्रकारिता अगर इसकी वाहक बन रही है, तो यह बात हमारे संकल्पों को और दृढ़ करेगी। 200 साल पूरे करने की बधाई देते हुए मीडिया जगत से यह आग्रह भी है कि वे हिंदी पत्रकारिता के ध्वज को गुणवत्ता के आधार पर और ऊँचा ले जाएँ।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
हिंदी पत्रकारिता सिर्फ खबरें देने का माध्यम नहीं रही, बल्कि इसने आजादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक जागरूकता और जनमत तैयार करने तक देश को दिशा देने का काम किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
हर साल 30 मई को पूरे भारत में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। यह दिन हिंदी भाषा की पत्रकारिता के इतिहास, उसके संघर्ष, समाज में उसकी भूमिका और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में उसके योगदान को याद करने का अवसर होता है। हिंदी पत्रकारिता सिर्फ खबरें देने का माध्यम नहीं रही, बल्कि इसने आजादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक जागरूकता और जनमत तैयार करने तक देश को दिशा देने का काम किया है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि 30 मई 1826 को हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ प्रकाशित हुआ था। इस अखबार की शुरुआत पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता (अब कोलकाता) से की थी। यही दिन हिंदी पत्रकारिता की औपचारिक शुरुआत माना जाता है।
‘उदन्त मार्तण्ड’ से शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता
19वीं सदी के शुरुआती दौर में अंग्रेजी और बंगाली भाषाओं में कई अखबार निकल रहे थे, लेकिन हिंदी भाषी लोगों के लिए कोई समाचार पत्र नहीं था। उस समय हिंदी बोलने और समझने वाले लोगों की संख्या बड़ी थी, लेकिन उनकी भाषा में सूचना का कोई मजबूत माध्यम मौजूद नहीं था। ऐसे समय में पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी में समाचार पत्र निकालने का साहसिक फैसला लिया।
30 मई 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ। इसका अर्थ होता है, “समाचार सूर्य” (उगता हुआ सूर्य)। यह साप्ताहिक अखबार था और इसे हर मंगलवार प्रकाशित किया जाता था। उस दौर में न तो आधुनिक प्रिंटिंग तकनीक थी और न ही आर्थिक संसाधन। फिर भी इस अखबार ने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी।
हालांकि आर्थिक समस्याओं और सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण यह अखबार 4 दिसंबर 1827 को बंद हो गया, लेकिन उसने जो शुरुआत की, वही आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता का बड़ा आंदोलन बन गई।
स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता की बड़ी भूमिका
हिंदी पत्रकारिता का इतिहास सिर्फ खबरों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों का भी इतिहास है। आजादी की लड़ाई के दौरान हिंदी अखबारों ने अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया और लोगों में जागरूकता फैलाने का काम किया।
उस दौर में कई पत्रकारों और संपादकों ने जेल तक की सजा झेली। अखबारों पर प्रतिबंध लगाए गए, प्रेस एक्ट लाए गए, लेकिन पत्रकारिता का मिशन नहीं रुका। हिंदी समाचार पत्रों ने जनता को जोड़ा और राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया।
उस समय पत्रकारिता व्यवसाय कम और समाज सेवा ज्यादा मानी जाती थी। पत्रकार सच लिखने के लिए जोखिम उठाते थे। यही वजह है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस क्यों महत्वपूर्ण है?
हिंदी पत्रकारिता दिवस सिर्फ एक औपचारिक दिन नहीं है। यह पत्रकारों के योगदान को सम्मान देने और पत्रकारिता की जिम्मेदारियों को याद करने का अवसर भी है। यह दिन हमें बताता है कि मीडिया की भूमिका सिर्फ खबर दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को सही दिशा देना भी उसकी जिम्मेदारी है।
आज जब सोशल मीडिया पर फेक न्यूज और अधूरी जानकारी तेजी से फैल रही है, तब विश्वसनीय पत्रकारिता की जरूरत पहले से ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे समय में हिंदी पत्रकारिता दिवस पत्रकारों को उनकी जिम्मेदारी का एहसास कराता है।
यह दिन नई पीढ़ी को भी प्रेरित करता है कि पत्रकारिता सिर्फ टीआरपी या वायरल कंटेंट का खेल नहीं है, बल्कि यह समाज के प्रति जवाबदेही वाला पेशा है।
डिजिटल दौर में बदलती हिंदी पत्रकारिता
पिछले कुछ वर्षों में हिंदी पत्रकारिता में बड़ा बदलाव आया है। पहले अखबार और टीवी ही खबरों का मुख्य स्रोत थे, लेकिन अब मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने पूरी तस्वीर बदल दी है।
आज लोग WhatsApp, YouTube, Instagram, Facebook और न्यूज ऐप्स के जरिए खबरें पढ़ते और देखते हैं। वीडियो पत्रकारिता तेजी से बढ़ी है। छोटे शहरों और गांवों तक डिजिटल मीडिया पहुंच चुका है।
हिंदी भाषा का डिजिटल विस्तार भी तेजी से हुआ है। इंटरनेट पर हिंदी कंटेंट की मांग लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि लगभग हर बड़ा मीडिया संस्थान अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ज्यादा फोकस कर रहा है।
हालांकि इस बदलाव के साथ चुनौतियां भी आई हैं। सबसे बड़ी चुनौती है, स्पीड और सटीकता के बीच संतुलन। कई बार सबसे पहले खबर देने की होड़ में गलत जानकारी भी वायरल हो जाती है।
AI और सोशल मीडिया का बढ़ता असर
2026 में पत्रकारिता की दुनिया में Artificial Intelligence यानी AI की चर्चा तेजी से बढ़ी है। कई मीडिया संस्थान खबरों की हेडलाइन लिखने, वीडियो बनाने, ट्रांसलेशन और डेटा विश्लेषण में AI का इस्तेमाल कर रहे हैं।
लेकिन इसके साथ ही डीपफेक वीडियो, फर्जी तस्वीरें और AI जनरेटेड गलत खबरें भी चिंता का कारण बन गई हैं। आज पत्रकारों के सामने सिर्फ खबर लिखने की चुनौती नहीं है, बल्कि सही और गलत जानकारी के बीच फर्क बताने की जिम्मेदारी भी है।
हिंदी पत्रकारिता के सामने मौजूदा चुनौतियां
आज हिंदी पत्रकारिता कई बड़े बदलावों और चुनौतियों के दौर से गुजर रही है। इनमें आर्थिक दबाव, डिजिटल प्रतिस्पर्धा, फेक न्यूज, राजनीतिक ध्रुवीकरण और टीआरपी की दौड़ प्रमुख हैं।
कई मीडिया संस्थानों का बिजनेस मॉडल बदल रहा है। प्रिंट मीडिया पर डिजिटल प्लेटफॉर्म का दबाव बढ़ रहा है। वहीं सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स भी अब सूचना के बड़े स्रोत बन चुके हैं।
इसके अलावा पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है। कई बार दबाव, ट्रोलिंग और कानूनी विवादों का सामना भी करना पड़ता है।
इन सबके बीच निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकारिता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
नई पीढ़ी और हिंदी पत्रकारिता का भविष्य
आज की युवा पीढ़ी तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रही है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता के लिए यह एक बड़ा अवसर भी है। हिंदी देश की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है और इंटरनेट पर हिंदी पाठकों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
नई पीढ़ी अब सिर्फ खबर नहीं चाहती, बल्कि उसे आसान भाषा, तेज अपडेट, वीडियो फॉर्मेट और भरोसेमंद जानकारी चाहिए। यही वजह है कि हिंदी पत्रकारिता का भविष्य डिजिटल और मल्टीमीडिया आधारित माना जा रहा है।
डेटा जर्नलिज्म, मोबाइल रिपोर्टिंग, पॉडकास्ट और एक्सप्लेनर वीडियो जैसे नए फॉर्मेट तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
हिंदी पत्रकारिता दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय मीडिया के संघर्ष, विकास और जिम्मेदारी का प्रतीक है। 30 मई 1826 को शुरू हुई यह यात्रा आज डिजिटल और AI के दौर तक पहुंच चुकी है। समय बदला है, तकनीक बदली है, माध्यम बदले हैं, लेकिन पत्रकारिता का मूल उद्देश्य आज भी वही है, सच को समाज तक पहुंचाना।
आज जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता, निष्पक्षता और जनहित की भावना को बनाए रखे। क्योंकि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब मीडिया मजबूत, स्वतंत्र और जिम्मेदार होगा।
हिंदी पत्रकारिता दिवस हमें यही याद दिलाता है कि पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक बड़ी जिम्मेदारी है।
पूरी इंडस्ट्री के बोर्डरूम्स में एक सवाल लगातार बढ़ती नाराजगी के साथ पूछा जा रहा है: आखिर कैंपेन ने असल में क्या परिणाम दिया?
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रेमजीत सोढ़ी।।
पूरी इंडस्ट्री के बोर्डरूम्स में एक सवाल लगातार बढ़ती नाराजगी के साथ पूछा जा रहा है: आखिर कैंपेन ने असल में क्या परिणाम दिया? इसका जवाब अक्सर निराशाजनक रूप से एक प्रेजेंटेशन डेक के रूप में मिलता है, जिसमें रीच के आंकड़े, CPM की तुलना और व्यू-थ्रू रेट शामिल होते हैं। इसके बाद अक्सर चार शब्द आते हैं, जो अब इंडस्ट्री का सबसे महंगा 'कम्फर्ट ब्लैंकेट” बन चुके हैं: “क्लाइंट खुश है”। लेकिन सच्चाई यह है कि क्लाइंट शायद अब लंबे समय तक खुश नहीं रहने वाले हैं।
गलत चीजों को मापने वाला पेशा
मीडिया और बिज़नेस के नतीजों के बीच का रिश्ता धीरे-धीरे टूटता गया है। एजेंसियां दशकों से इस आधार पर बनीं कि वे कम से कम कीमत में ज्यादा से ज्यादा रीच और फ्रीक्वेंसी दें। उन्हें इसी आधार पर परखा गया, इसी पर भुगतान मिला और इसी पर सराहा गया। हर डैशबोर्ड, हर पोस्ट-कैंपेन रिव्यू और हर ऑप्टिमाइजेशन कॉल का एक ही सवाल होता था: हमने कितना मीडिया खरीदा और कितनी सस्ती कीमत पर खरीदा? उस समय जब टीवी पर आना सफलता माना जाता था, तब यह सोच सही लगती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कैंपेन ने काम किया या नहीं, बल्कि यह है कि उसने कितना अच्छा काम किया। एजेंसियों के पास इसे मापने की क्षमता तो है, लेकिन उनके पास डेटा तक पहुंच, संरचनात्मक अधिकार और सही बिज़नेस मॉडल की कमी है जिससे वे इसे लगातार कर सकें।
रिपोर्टिंग बनाम मेजरमेंट
एक बड़ा फर्क यह है कि मीडिया डिलीवरी को रिकॉर्ड करना “रिपोर्टिंग” है, जबकि उन डिलीवरी को बाजार के असली नतीजों से जोड़ना “मेजरमेंट” है। जैसा कि कंसल्टिंग क्षेत्र के एक विशेषज्ञ ने कहा था कि “रिपोर्टिंग जानकारी देती है, लेकिन मेजरमेंट बदलाव लाता है।” इंडस्ट्री लंबे समय से पहला काम कर रही है, लेकिन दूसरा बहुत कम।
कॉन्ट्रैक्ट बदल गया, सिस्टम नहीं
क्लाइंट अब सिर्फ डिलीवरी को परफॉर्मेंस नहीं मानते। अब भुगतान मॉडल आउटपुट से हटकर आउटकम की ओर जा रहे हैं। कुछ साल पहले एक सीनियर क्लाइंट ने कहा था: “हम GRPs देने के बिजनेस में नहीं हैं।”
आज हर क्लाइंट इसी तरह की बात करता है। वे जानना चाहते हैं:
ये मांगें गलत नहीं हैं, बल्कि बिजनेस निवेश के लिए जरूरी हैं। समस्या एजेंसी की इच्छा की नहीं है, बल्कि सिस्टम, भुगतान संरचना और डेटा संबंधों की है जो पुराने मॉडल पर बने हैं।
क्लाइंट भी पूरी तरह सही नहीं हैं
अगर इसे सिर्फ एजेंसी की असफलता कहा जाए, तो यह पूरी कहानी नहीं होगी। क्लाइंट्स भी उन्हीं एजेंसियों से आउटपुट की जिम्मेदारी मांग रहे हैं, जिन्हें वे जरूरी डेटा उपलब्ध नहीं कराते।
अधिकतर मामलों में: ट्रांजैक्शन डेटा कुछ हद तक मिलता है, डिजिटल बिहेवियर डेटा सीमित होता है, लेकिन पूरा कस्टमर जर्नी डेटा लगभग कभी नहीं मिलता। और कई बार यह डेटा एजेंसियों के साथ साझा ही नहीं किया जाता। अगर असली उद्देश्य आउटकम मापना है, तो डेटा साझा करना जरूरी है। बिना डेटा के जवाबदेही एक विरोधाभास है।
दो अलग सिस्टम साथ-साथ चल रहे हैं
क्लाइंट अपनी इन-हाउस मापने की क्षमता बना रहे हैं—फर्स्ट पार्टी डेटा, ब्रांड ट्रैकिंग और एनालिटिक्स। लेकिन यह सिस्टम अक्सर एजेंसियों से अलग बनाया जा रहा है, साथ नहीं। इससे एजेंसी उस नतीजे के लिए जिम्मेदार होती है जिसे वह देख ही नहीं सकती।
सही मेजरमेंट सिस्टम कैसा होना चाहिए
जो एजेंसियां आगे बढ़ रही हैं, वे मेजरमेंट को सिर्फ रिपोर्टिंग टूल नहीं बल्कि शुरुआती स्ट्रैटेजी का हिस्सा बना रही हैं। इसके लिए एक फ्रेमवर्क बनता है जिसमें:
बिक्री सीधे मीडिया से नहीं आती, बल्कि कई चरणों से गुजरती है-जैसे नए क्लाइंट्स, बढ़ी हुई जागरूकता, और बेहतर ब्रांड रिकॉल। अगर यह संबंध स्पष्ट नहीं होगा, तो सफलता को मापा नहीं जा सकता।
मेजरमेंट प्लानिंग और टेक्नोलॉजी
एक सही मेजरमेंट प्लानिंग में तय होता है कि क्या मापा जाएगा, कौन मापेगा और कब मापेगा। इसमें तीन प्रमुख तकनीकें हैं:
इन तीनों को मिलाकर एक मजबूत विश्लेषण प्रणाली बनती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत
इसके लिए एक अलग डेटा प्लेटफॉर्म चाहिए, जहां आउटकम डेटा मीडिया डिलीवरी सिस्टम से अलग रखा जाए। इसके ऊपर एक एनालिटिक्स सिस्टम हो जो रियल टाइम में जानकारी दे सके, न कि सिर्फ कैंपेन खत्म होने के बाद रिपोर्ट बनाए।
बदलाव के तीन जरूरी कदम
यह बदलाव तभी संभव है जब:
क्यों यह बदलाव देर से हो रहा है
डिजिटल, ई-कॉमर्स और AI जैसे बड़े बदलाव आ चुके हैं और उन्होंने मीडिया को बदल दिया है। लेकिन मेजरमेंट प्रणाली अभी भी धीरे बदल रही है। इसी वजह से एजेंसियां पीछे हो रही हैं, और कंसल्टेंसी और इन-हाउस टीमें उनकी जगह ले रही हैं। आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि:
एजेंसियां पहले से तैयारी कर रही हैं, लेकिन उन्हें क्लाइंट्स की साझेदारी चाहिए। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि मेजरमेंट गैप कोई अकेली एजेंसी की समस्या नहीं है। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे क्लाइंट और एजेंसी मिलकर ही हल कर सकते हैं। एजेंसियां आगे बढ़ रही हैं, अब क्लाइंट्स को भी उसी दिशा में आना होगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक न्यूयॉर्क में WPP Media के ग्लोबल एनालिटिक्स लीड हैं, जहां वे मीडिया और बिजनेस आउटकम को जोड़ने वाले मेजरमेंट सिस्टम बनाते हैं।)