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मोदी को आइना दिखाने की हिम्मत दिखाई है वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेंदु ने, लिखी ये किताब
यह दौर कुछ सियासी भ्रम का है। ऐसा ही दौर द्वापर का था। तब महाभारत हुआ था और गीता का पाठ भी
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
यह दौर कुछ सियासी भ्रम का है। ऐसा ही दौर द्वापर का था। तब महाभारत हुआ था और गीता का पाठ भी। वर्तमान में यह भी संभव नहीं है। वर्तमान दौर संघर्ष का है-न्याय के लिए, रोजगार के लिए, गरीबी से छुटकारे के लिए। इन सबके लिए केवल एक ही उपाय देखने-समझने के लिए बाध्य किया जा रहा है, ताकि हर कोई सिर्फ एक ही तरफ ध्यान दें और वह वर्तमान दौर की रूमानियत में लिपटी राजनीति और इसके तारणहार हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। वे बीते पांच वर्षों से देश को सपने दिखाते-बेचते आए है और यह सिलसिला अब भी जारी है।
निर्मलेंदु की पुस्तक ‘सपनों का सौदागर’ नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व, कृतित्व और व्यवहार की समीक्षा करती है। पुस्तक का लोकार्पण 26 अप्रैल, 2019 को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में किया जाएगा। इस मौके पर देश के कई वरिष्ठ पत्रकार व संपादक सहित कई नामचीन हस्तियां मौजूद होंगी। पुस्तक में निर्मलेंदु के अलावा कई अन्य पत्रकारों के आलेख सम्मिलित किये गये हैं। पुस्तक का संपादन वरिष्ठ पत्रकार श्रीराजेश ने किया है।
पुस्तक का अंश-
‘दरअसल, 16वीं लोकसभा चुनाव के बाद देश के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के अधिकांश फैसले ऐसे हैं, जो उनके अहंकार को परिलक्षित करते हैं तो स्वाभाविक है कि एक अहंकारी प्रधानमंत्री जनापेक्षा के अनुरूप नहीं, बल्कि सिर्फ अपने अहंकार की तुष्टि के लिए कार्य करता है, इससे जनकल्याण का उद्देश्य हांसिए पर चला जाता है। प्रधानमंत्री जैसे पद पर आसीन व्यक्ति देश और समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन जाता है, लेकिन जब वह महज एक ब्रैंड बन जाए, तो उससे संवैधानिक निष्ठा की उम्मीद बेमानी होने लगती है।
प्रधानमंत्री मोदी का सख्त व्यक्तित्व कभी-कभी अहंकार से भरा दिखता है लेकिन इसका सकारात्मक पहलू भी ये है कि वे अपने कार्य को मिशनमोड में करने के लिए जाने जाते हैं और जब उनके साथी इसमें कहीं पिछड़ते हैं तो वे उन्हें उन कमियों के बारे में बेबाक अंदाज में बताते-झिड़कते हुए टास्क को पूरा करने के लिए दबाब बनाते हैं। ऐसे में वे एक अच्छे शिक्षक के रूप में भी नजर आते हैं। मोदी एक मंझे हुए राजनीतिक अभिनेता है। वे अपने अभिनय से तो जनता को दीवाना बना लेते है लेकिन क्या उनके कार्य लोगों को अपना समर्थक बना पाने में सफल हुए हैं?
आजादी के बाद पहली बार नोटबंदी जैसा कठोर कदम उठाया गया, इसके निहितार्थ पूरे हुए या नहीं यह अलग मुद्दा है, लेकिन इस निर्णय को लागू करने से पूर्व उन मुश्किलों के बारे में नहीं सोचा गया, जिसका सामना देश के सवा सौ करोड़ लोगों को करना पड़ा। यह प्रधानमंत्री की अदूरदर्शिता को दर्शाता है। मोदी के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में राष्ट्रवाद के नारे तले छद्म राष्ट्रवाद मजबूत हुआ और इसके समानांतर असंतुलित विकास की धारा ने अपनी जगह बनायी। विकास के नारे और विचारधारा की अति वकालत ने विवेकशून्यता की स्थिति पैदा की, इसकी वजह से देश में मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक टकराव और कथित ‘राष्ट्रद्रोही’ प्रवृतियां बढ़ी। सत्ता के विकेंद्रीकरण के बजाय केंद्रीकरण हुआ, जो लोकतंत्र की भावना के बिलकुल विपरीत है।’
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