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मिस्टर मीडिया: राजद्रोह की चाबुक अब बेमानी हो गई है!

सरकार के लिए सबक है। बड़ा सबक। वह सीखे या न सीखे। विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने समाप्त कर दिया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरकार के लिए सबक है। बड़ा सबक। वह सीखे या न सीखे। विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला आखिरकार देश की सर्वोच्च अदालत ने समाप्त कर दिया। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। इसके अलावा उसने आंध्र प्रदेश के दो टेलिविजन चैनलों के खिलाफ राज्य सरकार के राजद्रोह मामले पर भी सकारात्मक रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने तो यहां तक कहा है कि राजद्रोह से संबंधित धारा 124 ए की स्पष्ट व्याख्या करने की आवश्यकता है। संपादकों की सर्वोच्च संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान में सुप्रीम कोर्ट की इस भावना का सम्मान किया है। अब मीडिया में बहस छिड़ गई है कि वास्तव में अंग्रेजों के जमाने के इस कानून की इस देश को जरूरत है अथवा नहीं। इसके लिए इतिहास के कुछ पन्ने पलटने होंगे।

दरअसल जब 1857 का गदर नाकाम हो गया तो गोरी हुकूमत बौखला गई। बगावत की असफलता उस दौर के बुद्धिजीवियों की कुंठा का सबब बन गई थी। वे लिखत-पढ़त में अपना असंतोष खुलकर व्यक्त करने लगे थे। मौलाना बाकर अली पहले पत्रकार थे, जिन्हें गोरों ने 1858 में अभिव्यक्ति की आजादी से घबराकर फांसी दे दी थी। तब तक कोई राजद्रोह कानून भारत में नहीं था। इस फांसी का भी बड़ा विरोध हुआ। इसके बाद मैकाले ने 1860 में आज के राजद्रोह कानून की नींव रखी। इस कानून का उसी ने प्रारूप तैयार किया था। दस साल बाद यह कानून गुलाम हिन्दुस्तान में भारतीय दंड संहिता में शामिल किया गया। जाहिर है कि इसके पीछे मंशा यह थी कि अंग्रेजी राज के प्रति कोई अपने विचारों को खुलकर व्यक्त नहीं कर सके। क्रांतिकारी चाफेकर बंधुओं (दोनों सगे भाई थे) के खिलाफ इसी कानून का इस्तेमाल किया था। बाद में दो अंग्रेज अफसरों की हत्या के आरोप में उनको फांसी दी गई थी। चाफेकर बंधु महाराष्ट्र में गणपति समारोहों में गोरी सत्ता के खिलाफ प्रवचन -कीर्तन करते थे। बाल गंगाधर तिलक के विरुद्ध मुकदमा भी इसी कानून के अनुसार चलाया गया था। महात्मा गांधी के खिलाफ 1922 में कार्रवाई के लिए इसी का सहारा लिया गया। उन्होंने यंग इंडिया में लेखन से सरकार की नींद हराम कर दी थी। आजादी के बाद संविधान सभा की बैठकें हुईं तो नेहरू ने इसका विरोध किया लेकिन नेहरू विरोधियों ने इसका समर्थन किया। इस कारण यह आजाद भारत में भी बना रहा। यह भी याद रखने की बात है कि खुद अंग्रेजों ने अपने मुल्क में यह कानून समाप्त कर दिया है। 

यह तर्क तो समझ में आता है कि हिन्दुस्तान पर हुकूमत कर रही परदेसी बरतानवी सत्ता यहां के नागरिकों पर गुलामी की नकेल डाले रखने के लिए यह कानून बनाए रखे। मगर स्वतंत्र भारत में लोकतान्त्रिक ढंग से निर्वाचित सरकारों को अपने ही मतदाताओं से आखिर बगावत की आशंका क्यों है। सरकार से असहमति के लिए पत्रकारिता माध्यम अपने मंच का इस्तेमाल क्यों न करे और फिर हर पांच साल बाद तो मतदाताओं के पास यह अधिकार है कि वे अपने मत से सरकार को हटा दें। इस तरह राजद्रोह का चाबुक सरकार को चलाने की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती। फिर भी हमने देखा है कि पिछले पांच-छह साल में इस कानून का इस्तेमाल बढ़ा है। यदि सरकार अपनी नीतियों की तीखी आलोचना को राजद्रोह मानती है तो फिर एक जमाने में ‘ब्लिट्ज’, ‘इंडियन एक्सप्रेस’, ‘रविवार’ और ‘नई दुनिया’ ने जो पत्रकारिता की है, उनके संपादकों को तो फांसी पर लटका पर दिया जाना चाहिए था। संसार भर के कार्टूनिस्टों के आदर्श आरके लक्ष्मण यदि आज सक्रिय पारी खेल रहे होते तो उन्हें भी शायद सूली चढ़ा दिया जाता। समझ से परे है कि जो गठबंधन और पार्टी अपने दम पर स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई हो, उसे किसी तूती की आवाज से क्यों कांपना चाहिए?

बीते छह साल के आंकड़े डराने वाले हैं। एक साल में में विनोद दुआ के अलावा आठ पत्रकारों के विरुद्ध राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के दस्तावेज कहते हैं कि साल 2014 में 58, 2015 में 30, 2016 में 35, 2017 में 51, 2018 में 70 और 2019 में 93 राजद्रोह के मामले पंजीबद्ध किए गए थे। इनमें सिर्फ 10 लोगों को ही न्यायालय ने दोषी माना। अधिकतर मामलों में तो चार्जशीट तक ही दाखिल नहीं हो पाती।

शुभ संकेत है कि न्यायपालिका ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी भावना प्रकट की है। भारतीय पत्रकारिता यकीनन 124 ए जैसे अन्य कानूनों के समापन का स्वागत करेगी। सरकार को भी इस मुद्दे पर प्रगतिशील रवैया अपनाना चाहिए। लेकिन यदि उसका रुख नहीं बदलता तो राजद्रोह की तलवार तो मीडिया पर तनी ही है मिस्टर मीडिया!


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