होम / विचार मंच / ‘अगर देश ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कहां होगी?’

‘अगर देश ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कहां होगी?’

कोरोना की इस भीषण आपदा में पत्रकारिता के तमाम अवतार यदि व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करते हैं तो इसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार ।।

देश के हित और अभिव्यक्ति के सरोकार 

लोकतंत्र में कोई भी महत्वपूर्ण स्तंभ सौ फीसदी निर्दोष नहीं हो सकता। इस निष्कर्ष से शायद ही कोई असहमत हो। न कार्यपालिका, न विधायिका, न न्याय पालिका और न ही पत्रकारिता। वैसे तो पत्रकारिता को संवैधानिक तौर पर इस तरह का कोई दर्जा हासिल नहीं है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अभिव्यक्ति की आजादी का लाभ लेने वाले पत्रकार यदि अवाम का भरोसा जीतते हैं और अपना काम ईमानदारी से करते हैं तो फिर इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि पत्रकारिता संवैधानिक रूप से लोकतंत्र का स्तंभ है अथवा नहीं।

कोरोना की इस भीषण आपदा में पत्रकारिता के तमाम अवतार यदि व्यवस्था की नाकामियों को उजागर करते हैं तो इसे राष्ट्रीय हित से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। बीते दिनों पत्रकारिता का यह धर्म समाज के एक वर्ग में बहस का बिंदु बना हुआ है। उसका मानना है कि मुल्क के अस्पतालों में बिस्तरों की कमी, ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी, कोरोना के परीक्षण तथा बचाव के टीकों की गति में सुस्ती और जलती चिताओं के दृश्य दिखा कर भारतीय पत्रकार अच्छा नहीं कर रहे हैं। वे पश्चिम और यूरोप के देशों का हवाला देते हैं कि वहां भी मुर्दों की तस्वीरें और वीडियो नहीं दिखाए जाते। निस्संदेह वहां इस तरह के विचलित करने वाली सामग्री परदे और पन्नों पर नहीं परोसी जाती। मगर यह भी ध्यान देना होगा कि उन देशों में इलाज के अभाव में दम तोड़ना कितना अमानवीय और क्रूर माना जाता है। एक निर्दोष मौत भी अस्पताल में हो जाए तो सिस्टम को करोड़ों डॉलर का भुगतान करना पड़ जाता है। क्या भारत में हम इतनी सक्षम स्वास्थ्य प्रणाली बना पाए हैं, जो किसी पत्रकार को आलोचना का कोई अवसर ही नहीं दे।

बीते दिनों देखा गया कि एक तरफ तो कमोबेश सारे प्रदेशों में कोरोना के चलते लॉकडाउन की स्थिति है। धारा 144 लगी है, जिसमें चार से ज्यादा व्यक्ति एकत्रित नहीं हो सकते। अधिकांश शहरों में कर्फ्यू लगा है। मास्क जरूरी और दो गज की दूरी से बच्चा बच्चा वाकिफ है। इसके बावजूद चुनाव आयोग की अनुमति से पांच राज्यों में हजारों नागरिक रैलियों में मास्क के बगैर और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करते हुए सियासी पार्टियों में ले जाए गए। जब वे लौटे तो कोरोना का कई गुना विकराल रूप उनके साथ आया। गाँव गाँव में लोग संक्रामक महामारी के शिकार हो गए। इस खतरनाक हालत को देखते हुए यदि मद्रास हाई कोर्ट टिप्पणी करता है कि चुनाव आयोग के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए तो इसमें क्या अनुचित है? भारतीय पत्रकारों ने इस टिप्पणी को प्रकाशित और प्रसारित कर दिया तो इस पर चुनाव आयोग के खिसियाने की कोई वजह नजर नहीं आती। लेकिन आयोग इतना बौखलाया कि सीधे सुप्रीम कोर्ट चला गया। वह मद्रास उच्च न्यायालय की इस मौखिक टिप्पणी के प्रकाशित और प्रसारित होने से खफा था। उसका तर्क था कि जब वह टिप्पणी अदालत के रिकॉर्ड में नहीं रखी गई तो उसे पत्रकार कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय ने उसका अनुरोध ठुकरा दिया। इतना ही नहीं इस आला संस्था ने संवाददाताओं की रिपोर्टिंग को सही ठहराया। उसने कहा कि पत्रकारिता ने अपना धर्म निभाया है। अदालत रिपोर्टिंग नहीं रोक सकती। दरअसल पत्रकारिता की आजादी अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता का ही एक पहलू है। यह स्वतंत्रता तो भारत का संविधान ही देता है। बेहतर होगा कि चुनाव आयोग पत्रकारिता की शिकायत करने के बजाय कुछ बेहतर करे। सच तो यह है कि उच्च न्यायालयों ने कोरोना की जमीनी हकीकत पर लगातार नजर रखकर सराहनीय काम किया है।

उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी ने पिछले दिनों एक वर्ग से प्रायोजित उस बहस को भी विराम दे दिया है, जो कहता था कि कोरोना से निपटने में व्यवस्था की नाकामी उजागर करना देशहित में उचित नहीं है और संविधान प्रदत्त कुछ मौलिक अधिकारों को अस्थाई तौर पर निलंबित कर देना चाहिए। असल में यह चर्चा देशहित और पत्रकारिता का घालमेल कर रही थी। जब सारे संसार के अखबार और टीवी चैनल इस क्रूर काल में भारत की चुनावी  रैलियों और कुम्भ के जमावड़े की खिल्ली उड़ा रहे हैं तो भारत के पत्रकार इसे देश हित का मानकर चुप कैसे रह सकते हैं। यह भारत की सुरक्षा अथवा किसी शत्रु देश का हमला या कोई आतंकवादी वारदात नहीं है, जिसे मुल्क की हिफाजत से जोड़कर देखा जाए।

प्रसंग के तौर पर मुंबई में एक होटल पर आतंकवादी हमले को याद करना आवश्यक है। आतंकवादियों ने मुंबई के अनेक ठिकानों पर हमले किए थे। जवाब में सेना की कमांडो कार्रवाई की गई। उसे भारतीय टीवी चैनलों ने सीधा प्रसारित कर दिया था। पाकिस्तान में बैठे उग्रवादी आकाओं ने उस प्रसारण को देखकर अपने साथियों को निर्देश दिए थे। यह प्रसारण देश हित में कतई उचित नहीं था। इसीलिए भारत सरकार ने इन हमलों के बाद 27 नवंबर 2008 को सभी खबरिया चैनलों को दिशा निर्देश जारी किए थे। मैं स्वयं उन दिनों एक समूह के अनेक चैनलों का प्रमुख था और इन दिशा निर्देशों को जारी किया था। इनमें कहा गया था कि जन हित और राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर कोई भी चैनल इस तरह का कवरेज नहीं दिखाएगा, जिससे किसी स्थान और व्यक्ति की लोकेशन पता चलती हो। इतना ही नहीं, घायलों और मृतकों के शवों को भी प्रसारित नहीं किया जाएगा। अन्यथा उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। तब किसी ने सुप्रीम कोर्ट में जाने की नहीं सोची और ईमानदारी से पत्रकारिता के धर्म को निभाया और आज तक उसका पालन हो रहा है। देशहित अलग है और पत्रकारिता के कर्तव्य अलग। अगर देश ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कहां होगी?

(साभार: लोकमत समाचार)


टैग्स पत्रकार राजेश बादल सुप्रीम कोर्ट पत्रकारिता चुनाव आयोग कोरोना कोविड19
सम्बंधित खबरें

भविष्य को आकार देने की कोशिश कर रहा है भारत : राहुल कंवल

यदि कुछ समय के लिए राजनीति को अलग रख दें, तो एक बात स्पष्ट है। भारत की एआई रणनीति (AI strategy) की सफलता में हमारे सामूहिक भविष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निहित है।

1 hour ago

मधुसूदन आनंद हमेशा यादों में बने रहेंगे : अनिल जैन

आनंद जी ने जर्मनी में 'डायचे वेले' (द वाॅयस ऑफ जर्मनी) में कुछ सालों तक काम किया और वे 'वाॅयस ऑफ अमेरिका' के नई दिल्ली स्थित संवाददाता भी रहे।

20 hours ago

प्रवक्ता, अहंकार और संवाद की संवेदनहीनता का सबक: नीरज बधवार

चूंकि समाज के अवचेतन में अंग्रेज़ी को लेकर एक हीन भावना मौजूद है, इसलिए जो व्यक्ति अंग्रेज़ी में प्रभावशाली ढंग से बोल लेता है, वह अक्सर खुद को विद्वान भी मान बैठता है।

1 day ago

समस्य़ाओं को हल करने के लिए हो एआई का इस्तेमाल: रजत शर्मा

मेरा यह मानना है कि सबसे ज़रूरी है, AI का इस्तेमाल रोज़मर्रा की जिंदगी में आने वाली समस्य़ाओं को हल करने के लिए हो। भारी भरकम शब्दों से इसे परिभाषित करके उससे डराया न जाए।

2 days ago

मैट शूमर के लेख का मतलब क्या है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

मैट ने सबको सलाह दी है कि हर रोज AI का इस्तेमाल गंभीरता से शुरू करें। ChatGPT , Gemini जैसे टूल को गूगल सर्च की तरह इस्तेमाल नहीं करें। उससे अपने रोजमर्रा के काम करवाए।

4 days ago


बड़ी खबरें

PM मोदी ने लॉन्च किया ‘MANAV विजन’, इंसान-केंद्रित AI में भारत की नई पहल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में “MANAV- इंडिया’स ह्यूमन विजन फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” पेश किया।

21 hours ago

JioStar ने बदली अपनी रेवेन्यू स्ट्रैटजी, टीवी व डिजिटल सेल्स अब अलग-अलग

'जियोस्टार' (JioStar) ने एक बार फिर अपनी कमाई यानी रेवेन्यू की स्ट्रैटजी में बड़ा बदलाव किया है।

22 hours ago

सिर्फ सत्ता नहीं, बदलाव की कहानी है ‘Revolutionary Raj’: आलोक मेहता

वरिष्ठ संपादक (पद्मश्री) और जाने-माने लेखक आलोक मेहता ने अपनी कॉफी टेबल बुक “Revolutionary Raj: Narendra Modi’s 25 Years” से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

15 hours ago

ABP Network का दो दिवसीय ‘Ideas of India Summit’ 27 फरवरी से मुंबई में

यह इस कार्यक्रम का पांचवा एडिशन है। इस वर्ष समिट की थीम ‘The New World Order’ रखी गई है।

12 hours ago

Tips Films के ऑफिस में GST विभाग की जांच, कंपनी ने कहा– कामकाज सामान्य

मुंबई की फिल्म प्रोडक्शन कंपनी Tips Films Limited के दफ्तरों पर जीएसटी विभाग ने जांच शुरू की है।

22 hours ago