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इस तरह न तो हिंदी का भला हुआ है और न होने वाला है: आशुतोष चतुर्वेदी
हम एक बार फिर हिंदी दिवस मनाने जा रहे हैं। सरकारी दफ्तरों में फिर हिंदी पखवाड़े के बैनर छाड़-पोंछकर निकाले और लटकाये जाएंगे। इसके बाद उनको सहेजकर अगले साल के लिए रख दिया जाएगा।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
आशुतोष चतुर्वेदी, प्रधान संपादक, प्रभात खबर।।
हम एक बार फिर हिंदी दिवस मनाने जा रहे हैं। सरकारी दफ्तरों में फिर हिंदी पखवाड़े के बैनर छाड़-पोंछकर निकाले और लटकाये जाएंगे। इसके बाद उनको सहेजकर अगले साल के लिए रख दिया जाएगा। जाहिर है, इससे न तो हिंदी का भला हुआ है और न होने वाला है। इस पखवाड़े पूरे देश में हिंदी पर कार्यक्रम होंगे, लेकिन कैसे हिंदी को जन-जन की भाषा बनाना है, उस पर कोई सार्थक विमर्श नहीं होगा।
मैं कहता रहा हूं कि कम-से-कम हम हिंदी पट्टी के लोगों को तो हिंदी भाषा को लेकर जागृत हो जाना ही चाहिए। सरकारी प्रयासों से तो मुझे हिंदी का भला होता नजर नहीं आता है। मेरा मानना है कि हमारे कथित हिंदी प्रेमियों और सरकारी हिंदी ने हिंदी को भारी नुकसान पहुंचाया है। आम बोलचाल की हिंदी के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ हिंदी का दुराग्रह आप करेंगे, तो आप हिंदी को ही नुकसान पहुंचाएंगे।
अंग्रेजी भाषा में ऑक्सफर्ड डिक्शनरी हर साल यह घोषित करती है कि वह अंग्रेजी में विभिन्न भाषाओं से कौन-कौन से शब्द शामिल कर रही है। हिंदी के लूट से लेकर गुरु शब्द तक आज अंग्रेजी भाषा का हिस्सा हैं। इससे भाषा समृद्ध होती है, कमजोर नहीं, लेकिन एक तो हिंदी में ऐसा कोई प्रयास नजर नहीं आता है और अगर हो तो कथित हिंदी प्रेमी सोटा लेकर उसके पीछे पड़ जाएंगे।
इससे इतर, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि अगर हिंदी का ऐसा शब्द उपलब्ध है, जिससे बात स्पष्ट हो जाती है, तो बेवजह अंग्रेजी का शब्द इस्तेमाल करना उचित नहीं है। हिंदी में अद्भुत माधुर्य है। मुहावरे और लोकोक्तियां उसे और समृद्ध करते हैं। फिर भी हम अंग्रेजी का दुराग्रह पाले हुए हैं। स्थिति यह है कि हम घर-दफ्तर में हिंदी बोलते हैं, लिखते-पढ़ते हैं, मगर अपने बच्चों से हिंदी के साहित्यकारों का नाम पूछ कर देख लीजिए।
मेरा दावा है कि 90 फीसदी बच्चे नहीं बता पाएंगे और जो बाकी 10 फीसदी होंगे, उनमें से अधिकांश प्रेमचंद से आगे नहीं बढ़ पाएंगे। कुछेक ही हैं, जो इस परीक्षा में खरे उतरेंगे। युवाओं से कहें कि वे अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल किए बिना दो पैरा शुद्ध हिंदी में लिखकर दिखा दें।
अधिकांश इस परीक्षा में भी असफल हो जाएंगे। इसमें इनका दोष नहीं है। हमने इन्हें अपनी भाषा पर गर्व करना नहीं सिखाया है, इनका सही मार्गदर्शन नहीं किया है। मैं इसमें कुछ हद तक गुरुजनों का भी दोष मानता हूं। अभी पितृपर्व चल रहा है।
हम पितरों को यादकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महावीर प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हजारी प्रसाद द्विवेदी, उपेंद्र नाथ अश्क, धर्मवीर भारती, राजेंद्र यादव, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, श्रीलाल शुक्ल, काशीनाथ सिंह जैसे हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ पितरों ने हिंदी की विकास-यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पितृपर्व पर हम उन्हें याद कर सकते हैं और युवाओं को यह बता सकते हैं कि जिस हिंदी भाषा में आप लिख-पढ़ रहे हैं, उसे इन पितरों ने आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान किया है।
तमिलनाडु को तो छोड़ दीजिए, वे तो हिंदी को कोसने का कोई अवसर नहीं गंवाते हैं, मगर हम हिंदीवाले भी कब अपनी भाषा पर गर्व करते हैं? हिंदी पट्टी में भी हम कहां हिंदी पर ध्यान दे रहे हैं। ज्यादा साल पुरानी बात नहीं है, जब उत्तर प्रदेश बोर्ड की हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा में लगभग आठ लाख विद्यार्थी हिंदी में फेल हो गए थे। यूपी के आंकड़े तो हमें उपलब्ध हैं, इसलिए हम उस पर विमर्श कर पा रहे हैं।
मेरा मानना है कि यदि बिहार और झारखंड के आंकड़ों का भी सही तरीके से विश्लेषण कर दिया जाए तो कोई बेहतर स्थिति सामने नहीं आएगी। हिंदीभाषी राज्यों में जिनमें बोलचाल व लिखने-पढ़ने की भाषा केवल हिंदी हो, यह खबर चिंताजनक है। इसकी विपरीत बांग्ला या दक्षिण की किसी भी भाषा को बोलने वालों को लें, वे जब भी मिलेंगे अपनी मातृभाषा में ही बात करेंगे। उनमें अपनी भाषाओं के प्रति मोह है। यही वजह है कि ये भाषाएं प्रगति कर रही हैं। उनमें स्तरीय साहित्य रचा जा रहा है।
अगर आप बाजार अथवा मनोरंजन उद्योग को देखें, तो उन्हें हिंदी की ताकत का एहसास है। यही वजह है कि अमेजॉन हो या फिर फ्लिपकार्ट, दोनों की साइट हिंदी में उपलब्ध है। हॉलीवुड की लगभग सभी बड़ी फिल्में हिंदी में डब होती हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं के साहित्य अथवा फिल्मों को देखें, तो गिनी-चुनी कृतियां ही हिंदी में उपलब्ध हैं।
यह सच्चाई है कि प्रभुत्व वर्ग की भाषा आज भी अंग्रेजी है और जो हिंदी भाषी हैं भी, वे अंग्रेजीदां दिखने की पुरजोर कोशिश करते नजर आते हैं। गुलामी के दौर की यह ग्रंथि आज भी देश में बरकरार है। हमें अंग्रेजी बोलने, पढ़ने-लिखने और अंग्रेजियत दिखाने में बड़प्पन नजर आता है, जबकि हिंदी भारत के लगभग 40 फीसदी लोगों की मातृभाषा है।
अंग्रेजी, मंदारिन और स्पेनिश के बाद हिंदी दुनियाभर में बोली जाने वाली चौथी सबसे बड़ी भाषा है। इसे राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है। राजभाषा वह भाषा होती है, जिसमें सरकारी कामकाज किया जाता है, लेकिन आज भी नौकरशाही की भाषा अंग्रेजी है। कोरोना काल में आपने देखा होगा कि हिंदी भाषी राज्यों में भी लॉकडाउन के सारे दिशा-निर्देश अंग्रेजी में निकलते हैं।
अखबार हिंदी में न छापें, तो जनता की समझ में ही न आए कि निर्देश क्या है। कुछ साल पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक आदेश तो खासा चर्चा में रहा था, जिसमें ऐसी अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जो किसी को समझ में नहीं आई थी।
उसको समझाने के लिए मंत्रालय को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। बॉलीवुड को ही लें, जिसमें अधिकांश हीरो-हीरोइन रोजी-रोटी हिंदी की खाते हैं, लेकिन बातचीत में मजाल है कि कोई हिंदी में बात कर ले। एक हिंदी भाषी सुशांत सिंह राजपूत बॉलीवुड में सफल हुआ था, उसे भी भाई लोगों ने घेराबंदी कर हमसे छीन लिया।
मैं अपने अनुभव की बात साझा करता हूं। मैंने दिल्ली में हिंदी इंडिया टुडे के संपादकीय विभाग में नौकरी ज्वाइन की थी। सीमित वेतन था और मैं दक्षिण दिल्ली के साकेत इलाके में एक कमरा देख रहा था, क्योंकि कई भाई-बंधु इस इलाके में रहते थे। हर शनिवार और रविवार को क्लासीफाइड विज्ञापन की मदद से कमरा देखने निकलता था, जिसे दिल्ली की भाषा में बरसाती भी कहते हैं।
मैंने पाया कि मुझे सबसे बड़ी समस्या भाषा को लेकर आ रही थी। दक्षिण दिल्ली का यह इलाका अभिजात्य वर्ग का है और हर मकान मालिक केवल अंग्रेजी में बात करता था। हम ठहरे ठेठ हिंदी भाषी और छोटे जिले से आया व्यक्ति, जिसका अंग्रेजी में हाथ तंग था। मैंने पाया कि केवल हिंदी भाषी होने के कारण मुझे कमरा किराये पर नहीं मिल पा रहा था।
बाद में यूपी के एक मित्तल साहब की कृपा हुई, जिन्होंने हमें पनाह दी। यह सही है कि भारत विविधता भरा देश है और इसमें अनेक भाषाएं व बोलियां बोली जाती हैं और हरेक का अपना महत्व है, लेकिन पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने वाली एक भाषा का होना बेहद जरूरी है। यह बात दीगर है कि राजनीतिक कारणों से तमाम नेताओं को यह पसंद नहीं है।
(‘प्रभात खबर’ से साभार)
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