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मिस्टर मीडिया: जिंदगी का गणित नहीं, अर्थशास्त्र भी समझना जरूरी है
अक्सर हम जिंदगी में रिश्तों का गणित नहीं समझ पाते, उमर भर पेट के भूगोल में उलझे रहते हैं
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
अक्सर हम जिंदगी में रिश्तों का गणित नहीं समझ पाते। उमर भर पेट के भूगोल में उलझे रहते हैं। अलबत्ता अर्थशास्त्र से बचते रहते हैं। पैसा कमाना चाहते हैं, लेकिन उसे खर्च करने और एक और एक मिलाकर ग्यारह करना अथवा दो दूनी चार करना सबके बस की बात नहीं।
हममें से कई लोग जीवन भर बेशुमार दौलत कमाते हैं, लेकिन हथेली हरदम खाली रहती है और कुछ ऐसे भी हैं, जो कम कमाते हैं, मगर उनकी अंटी में आड़े वक्त के लिए मुद्राएं भरपूर होती हैं। कारण हमारा समाज है, जो हमें जीवन में गणित का ज्ञान तो देता है, लेकिन जेब में बंद जिंदगी का तिलिस्म दिमाग से दूर रहता है। इसी कारण अर्थ नीति, बजट और आर्थिक चुनौतियों की बारीकियां बड़े-बड़े पत्रकारों के ऊपर से निकल जाती हैं।
इस बार इस कॉलम की शुरुआत भले ही आपको दार्शनिक अंदाज में लग रही होगी, पर यह सच्चाई है। हमारी इस बुनियादी मानसिक संरचना का असर पत्रकारिता के पेशे पर भी पड़ता है। अखबारों का व्यापार पन्ना हम चलताऊ अंदाज में देखकर पलट देते हैं और टेलिविजन पर कारोबारी खबरों को हम बिजनेस चैनलों की ठेकेदारी मान लेते हैं। आम खबरिया चैनलों में अर्थ जगत के समाचार बड़े बेमन से लिए जाते हैं। रेडियो पर भी मनी मंत्र जैसे कार्यक्रम उपेक्षित ही होते हैं। ऐसी सूरत में देश के बजट को गहराई से समझने वाले पत्रकार रेडियो, समाचारपत्र और टेलिविजन चैनलों के न्यूजरूम में न के बराबर ही होते हैं। मुल्क की आर्थिक सेहत पर इसका कितना नुकसान होता है, हम नहीं जानते।
चंद रोज बाद देश का बजट संसद में पेश होगा। दुनिया भर के देशों की इस बजट पर नजर है। बीते कुछ बरस भारत की आर्थिक सेहत के मद्देनजर बड़े मुश्किल भरे थे। सारे संसार की धुरी पर इन दिनों कारोबारी चकरी घूम रही है और हमारे मीडिया के तमाम रूपों में इस बजट को लेकर अभी तक कोई चिंता नहीं दिखाई देती। किसी किस्म का गंभीर और सिलसिलेवार मंथन नहीं होता दिखता।
देश का किसान, खेती के अलग-अलग रूप, मध्यवर्ग, सरकारी कर्मचारी, बड़े उद्योगपति, मंझोले कारोबारी, छोटे दुकानदार, गरीब, अमीर, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण, सुरक्षा, बेरोजगारी, महिलाओं और नौजवानों के मसले, आयात, निर्यात, बैंक, कर्ज़, खेल, विज्ञान, अंतरिक्ष, हथियार, टीवी इंडस्ट्री, अख़बार, औद्योगिक उत्पादन, सब कुछ इस बजट से नियंत्रित-प्रभावित होता है। फिर भी छोटे परदे और अखबारों में कोई धारावाहिक बजट श्रृंखला अभी तक नहीं दिखाई दे रही है।
बरसों से ऐसा ही देख रहा हूं। अपने राष्ट्र की जेब के हाल से हम इतने उदासीन क्यों हैं? क्या मीडिया के मूर्धन्य संपादक-मालिक इसे नहीं जान रहे? नहीं कहता कि हर पत्रकार को आर्थिक जानकार होना चाहिए, मगर अपने वित्तीय चेहरे की चमक को लेकर इतनी उदासीनता भी खतरे से खाली नहीं। इसे आपको समझना पड़ेगा मिस्टर मीडिया!
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