मिस्टर मीडिया: अब तो हमारे मीडिया महारथियों को भी लाज नहीं आती

पाकिस्तान को तो हम 1992 से हराते आए हैं, आगे भी हराते रहेंगे

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 19 June, 2019
Last Modified:
Wednesday, 19 June, 2019
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

हम इन दिनों मीडिया का एक क्रूर, असंवेदनशील और खौफनाक चेहरा पेश कर रहे हैं। यह हिंदुस्तान की पाकिस्तान पर क्रिकेट विजय का जश्न मनाता है और आम अवाम बिहार के नौनिहालों की अकाल मौतों के मातम में डूबी है। बिहार का अमानवीय स्वास्थ्य मंत्री जीत पर मुबारकबाद देता है तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसकी बलैयां लेते हैं। एक-एक बच्चे की हत्या बिहार की हुकूमत के लिए सार्वजनिक शोक का भी सबब नहीं बनती। बिहार के इस प्रादेशिक शोक का असर दूसरे राज्यों तथा मीडिया में कितना दिखाई देता है? हम यह कैसे पथरीले समाज की रचना कर रहे हैं? अजीत अंजुम की अन्वेषणात्मक ख़बरें छोड़ दें तो किस चैनल ने बेहद संजीदगी और गहराई से इस मसले की पड़ताल की?

सत्ता प्रतिष्ठान भले ही रागरंग में डूबे रहें, मगर मीडिया पर आनंद की इन नशीली हवाओं का असर क्यों होना चाहिए? अपनी मौत की भविष्यवाणी करने वाले पंडित कुंजीलाल का ड्रामा दिखाने के लिए मीलों दूर अपनी ओबी वैन और कैमरा टीमें दौड़ाने वाले कितने चैनलों ने बिहार की इस भयावह त्रासदी पर गंभीरता से कवरेज़ की? उसके कारणों की तीखी और पैनी पड़ताल की। अखबारों के पन्नों पर कितनी जगह मिली? सरकारी रेडियो एक-एक सांसद की शपथ का आंखों देखा हाल सुनाता रहा, पर घरों के चिराग बुझने से हुए अँधेरे पर किस प्रसारण में पर्याप्त जगह मिली? मीडिया का यह कौन सा जिम्मेदारी भरा रूप है?  पाकिस्तान को तो हम 1992 से हराते आए हैं। आगे भी हराते रहेंगे। उसे सातवीं बार भी शिकस्त दे दी तो ऐसा उन्माद कितना जायज है? अब तो हमारे मीडिया महारथियों को भी लाज नहीं आती। घंटों तक परदे पर गाल बजाने वाले स्वनाम धन्य एंकर सरोकारों के साथ पत्रकारिता कब सीखेंगे?

क्या पत्रकार याद करेंगे कि इस देश ने एक दौर ऐसा भी देखा था, जब भागलपुर के आँख फोड़ कांड पर कवरेज से सत्ता हिल गई थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी सिलिकोसिस से तिल तिलकर मरने वाले भी पत्रकारिता के जरिए सरकार का सिरदर्द बन जाते थे। क्या पत्रकार याद करेंगे कि छत्तीसगढ़ के रिवई पंडों की भूख से मौत की खबरों ने प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया था। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी कालाहांडी की बदहाली भी कवरस्टोरी बनती थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी बुंदेलखंड के अपहरण भी आमुख कथा का विषय होते थे। क्या पत्रकार याद करेंगे कि देश की इकलौती ध्रुपद गायिका असगरीबाई के बीड़ी बनाकर गुजारा करने की खबरों के छपने पर उन्हें पद्मश्री से विभूषित किया गया था।

क्या पत्रकार याद करेंगे कि कभी राजस्थान में बाल विवाह को मानने के लिए बेटी को मजबूर करने पर मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था, क्योंकि मीडिया ने उसे प्रमुखता दी थी। क्या पत्रकार याद करेंगे कि दिवराला के सती कांड के बाद मीडिया के ग़ुस्से ने ही सती निरोधक नए कानून के लिए सरकार को मजबूर कर दिया था। आखिर कितनी घटनाएँ याद दिलाऊँ? क्या अचानक हिंदुस्तान में राम राज्य आ गया है? क्या अचानक हमारे सारे दुःख हवा हो गए हैं? क्या अब भारतीय समाज से सारी विसंगतियाँ, विद्रूपताएँ, असमानता, अत्याचार और व्यवस्था को निशाने पर लेने वाले मुद्दे दूर कहीं यूरोप या अमेरिका में जाकर बैठ गए हैं?

सरोकारों से मुँह मोड़ना मीडिया को बहुत महंगा पड़ेगा। एक ऐसे रोबोटिक पत्रकार की रचना करना कितना जायज होगा, जो सिर्फ़ अप मार्केट खबरों से रिश्ता रखता हो। आज की तथाकथित 'डाउन मार्केट' हिंदुस्तानी खबरें यानी आंचलिक खबरें उसे उद्वेलित न करती हों। व्यवस्था की आलोचना करने वाला भाव कहीं दम तोड़ चुका हो तो यकीन मानिए देश से लोकतंत्र को बिखरते देर नहीं लगेगी। इसे गहराई से समझिए मिस्टर मीडिया!

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पश्चिमी मीडिया सीमा पर तनाव व भारत में हिंसा की घटनाओं को इसलिए भी उछालता है: आलोक मेहता

हथियारों के बजाय हमलों के नए तरीके महाशक्तिशाली कहलाने वाले देश ही नहीं, आतंकवाद का सबसे बड़ा पोषक पाकिस्तान भी अपना रहा है।

आलोक मेहता by
Published - Saturday, 06 June, 2020
Last Modified:
Saturday, 06 June, 2020
Alok Mehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।  

सचमुच हथियारों के कारखाने घाटे में हो जाएंगे। हथियारों पर जंग लग जाएगी और तकनीक पुरानी पड़ जाएगी। हथियारों के बजाय हमलों के नए तरीके महाशक्तिशाली कहलाने वाले देश ही नहीं, आतंकवाद का सबसे बड़ा पोषक पाकिस्तान भी अपना रहा है। 1965 में झूठिस्तान शीर्षक के एक रेडियो कार्यक्रम से उसके झूठे दावों को बेनकाब किया जाता रहा। लेकिन अब हथियारों की तरह सबके पास युद्ध के नए  मन्त्र यानी प्रचार तंत्र के नए आधुनिक तरीके, साधन और अधिकाधिक धन का इंतजाम है। यही नहीं, खरीदे जा सकने वाले जयचंद की संख्या भी बढ़ती गई है।  उनके अलग-अलग रूप भी हैं।  उनमें जाहिल, निरक्षर, मूर्ख, शैतान भी हैं और शिक्षित-प्रशिक्षित चालाक कथित बुद्धिजीवी शामिल हैं। किसी भी युद्ध में रंग, जाति, धर्म की पहचान कहां हो पाती हैं। प्राचीन काल में दिन के उजाले में लड़ाइयां होती थीं। आधुनिक युग में रात के अंधेरे में हमले अधिक होते हैं। इन हमलों से दिन में मौत की काली परछाई से अंधेरा सा होता है और यदि प्रचार तंत्र के हथियार हों तो अज्ञान, असत्य, अफवाह, हिंसा की राख से अंधेरा फैलाया जाता है।

यह बात वर्तमान दौर में चीन और नेपाल की सीमा पर तनाव, कोरोना महामारी में भगदड़, जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 से मुक्ति, नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर दंगे, भारत के लिए लड़ाकू विमान राफेल की खरीदी के समझौते को लेकर विदेशी ताकतों के इशारे, समर्थन, भारी फंडिंग से हुए कुप्रचार, भोले मासूम लोगों को उकसाने, हिंसा, पुलिस और सुरक्षाकर्मियों की निर्मम हत्याओं की घटनाओं से साबित हो रही है। कई बार ऐसा लगता है कि लोकतान्त्रिक शक्तिशाली भारत सरकार भी इन हमलों के सामने कमजोर हो जाती है। वास्तव में भावनात्मक मुद्दों पर सामान्य लोगों के दिमाग में जहर घोलना आसान होता है। आपने देखा होगा कभी आंदोलन और प्रदर्शनों में फायरिंग से एक-दो लोगों की जान जाती है, लेकिन आंसू गैस के धुएं और भगदड़ से अधिक लोग घायल और मरते हैं। आतंकी का तो लक्ष्य ही भय और आतंक से लोगों की जान लेना होता है ।

इसमें कोई शक नहीं कि भारत के दुश्मन पहले नहीं थे या जासूसी, षड्यंत्र, हिंसा के लिए विदेशी धन का प्रयोग पहले नहीं होता था। अमेरिका, रूस, चीन और पाकिस्तान की जासूसी एजेंसियां सीआईए, केजीबी, एमएसएस तथा आईएसआई लगातार सक्रिय रही हैं और उनके सहयोग के लिए कभी सही, कभी फर्जी नामों की संस्थाओं या कंपनियों ने बिकाऊ देशद्रोहियों का इस्तेमाल भी किया। लेकिन हाल के वर्षों में पाकिस्तान के साथ चीन अधिक प्रभावी ढंग से भारत के चुनिंदा नेताओं, कथित सामाजिक-मानव अधिकार संगठनों के लोगों,  भटके रिटायर या कार्यरत अधिकारियों, नामी या गुमनाम मीडियाकर्मियों का भी इस्तेमाल  प्रचार तंत्र के हमलों के लिए कर रहा है। सबसे दुखद और दिलचस्प तथ्य यह है कि तीस साल पहले जो नेता या सक्रिय कार्यकर्ता स्वयं सीआईए या आईएसआई को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता जाहिर करते थे, वही या उनके साथी उन्हीं एजेंसियों और उनसे जुड़े संदिग्ध संस्थानों और चीनी जाल में फंसकर भारत में अफवाह, भ्रम, तनाव और हिंसा फैला रहे हैं। सबसे अधिक चिंता चीन के साथ टकराव को लेकर होती है।

कुछ वर्ष पहले भारत के तत्कालीन विदेश सचिव और बाद में सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन ने मुझे तथा चार अन्य वरिष्ठ संपादकों से अनौपचारिक बातचीत में समझाया था, ‘भारत-चीन सीमा के लम्बे अर्से से चले आ रहे द्विपक्षीय दावों और विवादों पर राजनयिक एवं उच्च सैन्य स्तर पर वार्ताएं तथा संपर्क रहता है। इसके अलावा कुछ इलाकों में अब तक कोई निश्चित सीमा तय नहीं होने से कभी चीनी सैनिक हमारे क्षेत्र में आ जाते हैं और इसी तरह हमारे सैनिक भी उनके दावे वाले सीमा क्षेत्र में चले जाते हैं। कभी-कभी कोई टुकड़ी तनाव में टकराने लगती है, लेकिन उच्च अधिकारी स्थिति संभाल लेते हैं। लेकिन पश्चिमी देशों का मीडिया ऐसी घटनाओं को अधिक उत्तेजक ढंग से प्रचारित करता है। भारतीय मीडिया के जिम्मेदार साथी इस बात को ध्यान में रखकर उसे अतिरंजित ढंग से प्रचारित-प्रसारित न करें तो अच्छा रहता है। जन मानस को सही सूचना समाचार और जानकारी देना सरकार के साथ मीडिया का भी कर्तव्य है।‘

तब से हम जैसे लोगों को यह बात समझ में आ गई। इतना अन्तर इस समय जरूर है कि सीमा पर हलचल बढ़ाकर चीन अपने कोरोनावायरस के पाप, अमेरिका से चल रहे आर्थिक व्यापारिक झगड़े और ट्रम्प के साथ हो रही तूतू-मैंमैं के कारण भारत को उलझाना चाहता है। इसी बात को समझते हुए भारत सरकार के प्रवक्ता ही नहीं, पुराने अनुभवी राजनयिकों तथा सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी कहा है कि सीमा पर हुई कुछ गतिविधियों से बनी स्थिति पर दोनों के बीच बातचीत हो रही है।  नेपाल के साथ भी बात हो रही है, जबकि उसके प्रदाहन मंत्री आंतरिक संकट के कारण चीन की कठपुतली जैसे हो गए हैं। बहरहाल, इस तरह की चर्चाएं कई बार हफ्तों चल सकती है। यदि चीन हठधर्मिता दिखाता है तो भारत भी अपने पक्ष पर दृढ़ रहता है।

पिछली बार भूटान भारत सीमा पर चीन की हरकत पर वार्ता का दौर 73 दिन चला था।  राहुल गांधी और उनके कांग्रेसी प्रवक्ता ने उनके राज में रहे सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन की हाल की इस टिपण्णी पर ध्यान देना चाहिए कि ' सीमा पर होने वाली हर घटना को अगले युद्ध की शुरुआत नहीं समझा जाना चाहिए।' मेनन या नारायणन संभवतः खुलकर अधिक नहीं कह सकते। लेकिन राजनयिक और सुरक्षा मामलों को समझने वाले जानते हैं कि पश्चिम का मीडिया सीमा पर तनाव या भारत में हिंसा व आतंक की घटनाओं को इसलिए भी उछालता है, ताकि उन देशों के हथियार अधिकाधिक खरीदें जाएं। यही नहीं, विदेशी ताकतें ऐसे प्रचार को बढ़ावा दिलवाती हैं , जिससे सरकार भले ही अटल, मनमोहन सिंह या नरेंद्र मोदी की हो,कमजोर रहे, अस्थिर रहे और सही मायने में भारत सामाजिक-आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो सके।

इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर जम्मू कश्मीर में 370  हटाए जाने पर पश्चिम ही नहीं भारतीय मीडिया के एक वर्ग का इस्तेमाल गलत सूचनाओं को प्रचारित प्रसारित करवाकर किया गया। नागरिकता संशोधन कानून केवल पड़ोसी पाकिस्तान, अफगानिस्तान से आने वाले गैर मुस्लिम कुछ लाख विस्थापितों को भारतीयता देने के लिए है, लेकिन महीनों तक विभिन्न जिम्मेदार, गैर जिम्मेदार लोगों और उनसे जुड़े समाचार विचार प्रचार तंत्र ने निरंतर यह भ्रम तक पैदा किया कि भारत में रहने वाले मुस्लिम ही नहीं, गरीब हिंदुओं की नागरिकता भी समाप्त हो जाएगी और उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा। इतना झूठा और घृणित प्रचार करने वालों को कोई संकोच शर्म महसूस नहीं हुई। तभी तो शंका हुई और कई प्रमाण भी मिले कि दुष्प्रचार वाले तत्वों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान और चीन के छद्म संस्थानों से हर संभव सहायता मिलती रहती है।

कोरोना संकट में भी मजदूरों के पलायन की दर्दनाक स्थिति में उनकी मदद के बजाय कुछ नेताओं और उनके समर्थकों ने ऐसा प्रचार किया कि कोरोना से बस मौत ही होने वाली है और सरकार न ही पर्याप्त टेस्ट करा रही और न ही सहायता करेगी। उनका साथ दे रहे मीडिया के एक वर्ग ने यह तथ्य नहीं प्रचारित किया कि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी या चीन में भी हर नागरिक के टेस्ट नहीं हुए और न ही हो रहे हैं। लंदन, बर्लिन, लॉस एंजिलिस में भी यही सलाह दी गई कि घर में रहा जाए और लगातार अधिक बुखार होने से खतरा बढ़ने पर अस्पताल के लिए आग्रह किया जाये। बिना टेस्ट किये लाखों लोग उन देशों में आजकल सड़कों पर आराम से घूमने लगे हैं। लेकिन भारत में लोगों को डराने, भड़काने वाले लोग अब भी अपना काम कर रहे हैं। आश्चर्य इस बात का अवश्य है कि भारत सरकार के सम्बंधित मंत्रालय और अधिकारी विदेशी ताकतों से प्रेरित तत्वों पर समय रहते कठोर कार्रवाई करके दुष्प्रचार को क्यों नहीं रोक पाते?

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मिस्टर मीडिया: इसलिए भी डराती है लोकतंत्र के चौथे खंभे पर लटकी यह तलवार

तो आशंकाएं सच होने लगी हैं। हिन्दुस्तान की पत्रकारिता पिछले 73 साल में अपने सबसे बुरे दौर में जा पहुंची है। कमर तो पहले ही टूटी हुई थी। रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी है।

राजेश बादल by
Published - Friday, 05 June, 2020
Last Modified:
Friday, 05 June, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।  

तो आशंकाएं सच होने लगी हैं। हिन्दुस्तान की पत्रकारिता पिछले 73 साल में अपने सबसे बुरे दौर में जा पहुंची है। कमर तो पहले ही टूटी हुई थी। रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी है। इस महामारी का संक्रमण भारतीय पत्रकारिता की देह में दिनोंदिन फैलता जा रहा है। प्रिंट हो या टेलिविजन, रेडियो हो अथवा डिजिटल-सारे रूप छटपटाते दिखाई देते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक छंटनी, वेतन में कटौती, नौकरी से बर्खास्तगी, पत्रकारों का मानसिक उत्पीड़न और संस्थाओं के दरवाजे पर लटके अलीगढ़ी ताले सारी व्यवस्था को चिढ़ाने लगे हैं। ख़ौफनाक यह है कि निकट भविष्य में इस खतरे से रिहाई की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है। लोकतंत्र के चौथे खंभे पर लटकी यह तलवार इसलिए भी डराती है, क्योंकि बाकी तीन स्तंभों के माथे पर इसकी शिकन या वेदना तक नहीं है। यह आत्मघाती है। इतना ही नहीं, उनके विरोध में इन दिनों पुलिस और सरकार बदले की भावना से कार्रवाई करने पर उतारू लगती है।

बीते दिनों असम की एक महिला पत्रकार पर उस समय गाज गिरी, जब वह मां बनने की तैयारी कर रही थी। उसे स्थानीय चैनल के प्रबंधन ने लॉकडाउन अवधि में हटाया। उसे कहा गया कि संस्थान में मातृत्व अवकाश की सुविधा नहीं दी जाती, न ही उसे वेतन मिलेगा। अगले दिन ही उससे इस्तीफा ले लिया गया। महिला पत्रकार संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया। इस कड़ी में उत्तरप्रदेश के सीतापुर ज़िले में पत्रकार रवींद्र सक्सेना के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया। सक्सेना ने क्वारंटाइन केंद्र में ख़राब भोजन बांटने पर रिपोर्ट-टुडे-24 में दिखाई थी। दिल्ली में एक राष्ट्रीय दैनिक के संवाददाता महेंद्र सिंह मनराल को भी दिल्ली पुलिस की ओर से उत्पीड़ित करने का मामला सामने आया था।

गुजरात में फेस ऑफ नेशन के संपादक धवल पटेल को राजद्रोह का आरोप लगाते हुए हिरासत में ले लिया गया, क्योंकि उन्होंने कोरोना महामारी से निपटने में सरकार की विफलता उजागर की थी और लिखा था कि इसके लिए जिम्मेदार नेतृत्व को बदला जा सकता है। पंजाब में रोजाना पहरेदार के एक पत्रकार मेजर सिंह पंजाबी की पुलिस ने बेरहमी से पिटाई कर दी, जब वे एक गुरुद्वारे में कवरेज के लिए गए थे। जब पत्रकार संघों ने मामला उठाया तो पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया। इसी राज्य में पंजाबी जागरण के पत्रकार जयसिंह छिब्बर के खिलाफ पुलिस ने प्रकरण पंजीबद्ध कर लिया, क्योंकि उन्होंने राज्य के एक मंत्री पर अंधविश्वास फैलाने का आरोप लगाया था। पिछले दिनों न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी भारत में पत्रकारों की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई थी।

दरअसल, टूटी आर्थिक रीढ़ लेकर भारत में निष्पक्ष पत्रकारिता की बात ठीक वैसी ही है कि कोई अपने हाथ में ऐसी म्यान लेकर दुश्मन के सामने खड़ा हो ,जिसमें तलवार ही न हो या सामने दहाड़ रहे शेर को बंदूक का लाइसेंस दिखा कर बचने की कोशिश की जाए। ऐसी रीढ़ विहीन पत्रकारिता लोकतंत्र में हमेशा सत्ता प्रतिष्ठानों को पोसाती है। उसे आलोचना का भय नहीं रहता और वह वित्तीय संजीवनी देकर किसी भी मरते मीडिया संस्थान को बचाकर अपने पक्ष में खरीद लेती है। संस्थान भी मजबूरी में बिकने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। तात्कालिक तौर पर भले ही यह प्रवृति हुकूमत कर रही पार्टी के भले में दिखाई दे मगर दूरगामी नतीजे उसी के खिलाफ जाते हैं।

आज अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने ही मुल्क में जिस आग का मुकाबला करने में असहाय नजर आ रहे हैं, उसके पीछे उनका मीडिया विरोधी स्वभाव ही है। वे कारोबारी रहे हैं और ऐसे दिमाग वाला व्यक्ति आलोचना से हमेशा डरता है। उसे आदत नहीं होती। वह समझता है कि पैसे से हर चीज खरीदी जा सकती है। पत्रकारिता भी। इस तरह वह अपना नुकसान करता है, क्योंकि जब पत्रकार निरपेक्ष आलोचना करते हैं तो वह उसे अपनी निंदा मानता है और हकीकत से आंख मूंदे रखता है। हो सकता है पत्रकारिता के कुछ प्रतिष्ठान पैसे से खरीदे जाएं, लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में दो चार पागल पत्रकार (आजकल उन्हें पागल ही कहा जाने लगा है) भी होते हैं, जो सरोकारों को जिंदा रखते हैं। एक देश के लिए दो-चार पागल पत्रकार ही पर्याप्त हैं। डोनाल्ड ट्रंप को यह तथ्य कभी तो समझ में आएगा। इस उदाहरण को सामने रखिए मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

पिछले दिनों पत्रकारों के साथ हुए अभद्र व्यवहार का असल कारण भी यही है मिस्टर मीडिया!

मिस्टर मीडिया: यह अपराध अनजाने में हुए, पर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया

क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

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डिजिटल माध्यमों से मिल रही हैं प्रिंट मीडिया को गंभीर चुनौतियां- प्रो. संजय द्विवेदी

उदारीकरण, साक्षरता, आर्थिक प्रगति ने मिलकर भारतीय अखबारों को शक्ति दी। भारत में छपे हुए शब्दों का मान बहुत है। अखबार हमारे यहां स्टेट्स सिंबल की तरह हैं।

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2020
sanjay-hindi-journalism

-प्रो. संजय द्विवेदी

दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों से सूचनाएं मिल रही हैं कि प्रिंट मीडिया पर संकट के बादल हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि बहुत जल्द अखबार लुप्त हो जाएंगे। वर्ष 2008 में जे. गोमेज की किताब ‘प्रिंट इज डेड’ इसी अवधारणा पर बल देती है। इस किताब के बारे में लाइब्रेरी रिव्यू में एंटोनी चिथम ने लिखा,“यह किताब उन सब लोगों के लिए ‘वेकअप काल’ की तरह है, जो प्रिंट मीडिया में हैं किंतु उन्हें यह पता ही नहीं कि इंटरनेट के द्वारा डिजिटल दुनिया किस तरह की बन रही है।”  बावजूद इसके क्या खतरा इतना बड़ा है। क्या भारतीय बाजार में वही घटनाएं दोहराई जाएंगी, जो अमरीका और पश्चिमी देशों में घटित हो चुकी हैं। इन्हीं दिनों में भारत में कई अखबारों के बंद होने की सूचनाएं मिली हैं तो दूसरी ओर कई अखबारों का प्रकाशन भी प्रारंभ हुआ है। ऐसी मिली-जुली तस्वीरों के बीच में आवश्यक है कि इस विषय पर समग्रता से विचार करें।

क्या वास्तविक और स्थाई है प्रिंट का विकासः

 भारत के बाजार आज भी प्रिंट मीडिया की प्रगति की सूचनाओं से आह्लादित हैं। हर साल अखबारों के प्रसार में वृद्धि देखी जा रही है। रोज अखबारों के नए-नए संस्करण निकाले जा रहे हैं। कई बंद हो चुके अखबार फिर उन्हीं शहरों में दस्तक दे रहे हैं, जहां से उन्होंने अपनी यात्रा बंद कर दी थी। भारतीय भाषाओं के अखबारों की तूती बोल रही है, रीडरशिप सर्वेक्षण हों या प्रसार के आंकड़े सब बता रहे हैं कि भारत के बाजार में अभी अखबारों की बढ़त जारी है।

भारत में अखबारों के विकास की कहानी 1780 से प्रारंभ होती है, जब जेम्स आगस्टस हिक्की ने पहला अखबार ‘बंगाल गजट’ निकाला। कोलकाता से निकला यह अखबार हिक्की की जिद, जूनुन और सच के साथ खड़े रहने की बुनियाद पर रखा गया। इसके बाद हिंदी में पहला पत्र या अखबार 1826 में निकला, जिसका नाम था ‘उदंत मार्तण्ड, जिसे कानपुर निवासी युगुलकिशोर शुक्ल ने कोलकाता से ही निकाला। इस तरह कोलकाता भारतीय पत्रकारिता का केंद्र बना। अंग्रेजी, बंगला और हिंदी के कई नामी प्रकाशन यहां से निकले और देश भर में पढ़े गए। तबसे लेकर आज तक भारतीय पत्रकारिता ने सिर्फ विकास का दौर ही देखा है। आजादी के बाद वह और विकसित हुई। तकनीक, छाप-छपाई, अखबारी कागज, कंटेट हर तरह की गुणवत्ता का विकास हुआ।

भूमंडलीकरण के बाद रंगीन हुए अखबारः

हिंदी और अंग्रेजी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों ने कमाल की प्रगति की। देश का आकार और आबादी इसमें सहायक बनी। जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ी और समाज की आर्थिक प्रगति हुई अखबारों के प्रसार में भी बढ़त होती गयी। केरल जैसे राज्य में मलयाला मनोरमा और मातृभूमि जैसे अखबारों की विस्मयकारी प्रसार उपलब्धियों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इसे ठीक से जानने के लिए राबिन जैफ्री के अध्ययन को देखा जाना चाहिए। इसी दौर में सभी भारतीय भाषाओं के अखबारों ने अभूतपूर्व विस्तार और विकास किया। उनके जिलों स्तरों से संस्करण प्रारंभ हुए और 1980 के बाद लगभग हर बड़े अखबार ने बहुसंस्करणीय होने पर जोर दिया। 1991 के बाद भूमंडलीकरण, मुक्त बाजार की नीतियों को स्वीकारने के बाद यह विकास दर और तेज हुई। पूंजी, तकनीक, तीव्रता, पहुंच ने सारा कुछ बदल दिया। तीन दशक सही मायने में मीडिया क्रांति का समय रहे। इसमें माध्यम प्रतिस्पर्धी होकर एक-दूसरे को को शक्ति दे रहे थे। टीवी चैनलों की बाढ़ आ गई। वेब-माध्यमों का तेजी से विकास हुआ। अखबारों के मुद्रण के लिए विदेशी मशीनें भारतीय जमीन पर उतर रही थीं। विदेशी कागजों पर अखबार छापे जाने लगे थे।

यह वही दौर था जब काले-सफेद अखबार अचानक से रंगीन हो उठे। नवें दशक में ही भारतीय अखबारों के उद्योगपति विदेश कंपनियों से करार कर रहे थे। विदेशी पूंजी के आगमन से अखबार अचानक खुश-खुश से दिखने लगे। उदारीकरण, साक्षरता, आर्थिक प्रगति ने मिलकर भारतीय अखबारों को शक्ति दी। भारत में छपे हुए शब्दों का मान बहुत है। अखबार हमारे यहां स्टेट्स सिंबल की तरह हैं। टूटती सामाजिकता, मांगकर पढ़ने में आती हिचक और एकल परिवारों से अखबारों का प्रसार भी बढ़ा। इस दौर में तमाम उपभोक्ता वस्तुएं भारतीय बाजार में उतर चुकी थीं जिन्हें मीडिया के कंधे पर लदकर ही हर घर में पहुंचना था, देश के अखबार इसके लिए सबसे उपयुक्त मीडिया थे, क्योंकि उनपर लोगों का भरोसा था और है।

डिजिटल मीडिया की चुनौतीः

डिजिटल मीडिया के आगमन और सोशल मीडिया के प्रभाव ने प्रिंट माध्यमों को चुनौती दी है, वह महसूस की जाने लगी है। उसके उदाहरण अब देश में भी दिखने लगे हैं। अखबारों के बंद होने के दौर में जी समूह के अंग्रेजी अखबार ‘डेली न्‍यूज एंड एनॉलिसि‍स’ (डीएनए) ने अपना मुद्रित संस्करण बंद कर दिया है। आगरा से छपने वाले अखबार डीएलए अखबार ने अपना प्रकाशन बंद कर दिया तो वहीं मुंबई से छपने वाला शाम का टैब्लॉइड अखबार ‘द ऑफ्टरनून डिस्पैच’ भी बंद  हो गया, 29 दिसंबर,2018 को अखबार का आखिरी अंक निकला। जी समूह का अखबार डीएन का अब सिर्फ आनलाइन संस्करण ही रह जाएगा। नोटिस के अनुसार, अगले आदेश तक मुंबई और अहमदाबाद में इस अखबार का प्रिंट एडिशन 10 अक्टूबर, 2019 से बंद कर दिया गया। वर्ष 2005 में शुरू हुए डीएनए अखबार ने इस साल के आरंभ में अपना दिल्ली संस्करण बंद कर दिया था, जबकि पुणे और बेंगलुरु संस्करण वर्ष 2014 में बंद कर दिए गए थे।

आगरा के अखबार डीएलए का प्रकाशन एक अक्टूबर, 2019 से स्थगित कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि एक वक्त आगरा समेत उत्तर प्रदेश के कई शहरों से प्रकाशित होने वाले इस दैनिक अखबार का यूं बंद होना वाकई प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री के लिए चौंकाने वाली घटना है। मूल तौर पर अमर उजाला अखबार के मालिकानों में शामिल रहे अजय अग्रवाल ने डीएलए की स्थापना अमर उजाला के संस्थापक स्व. डोरी लाल अग्रवाल के नाम पर की थी। अखबार ने शुरुआती दौर में अच्छा प्रदर्शन भी किया। पर उत्तर प्रदेश के कई शहरों में अखबार के विस्तार के बाद ये गति थम गई। धीरे-धीरे अखबार एक बार फिर आगरा में ही सिमट कर रह गया। अखबार ने मिड डे टैब्लॉइड से शुरू किया अपना प्रकाशन एक समय बाद ब्रॉडशीट में बदल दिया था। साथ ही मीडिया समूह ने अंग्रेजी अखबार भी लॉन्च किया था। सब कवायदें अंतत: निष्फल ही साबित हो रही थी। ऐसे में लगातार आर्थिक तौर पर हो रहे नुकसान के बीच प्रबंधन ने फिलहाल इसे बंद करने का निर्णय किया है।

इसी तरह तमिल मीडिया ग्रुप‘विहडन’अपनी चार पत्रिकाओं की प्रिंटिंग बंद कर दिया है। अब इन्हें सिर्फ ऑनलाइन पढ़ा जा सकेगा। जिन पत्रिकाओं की प्रिंटिंग बंद होने जा रही है उनमें ‘छुट्टी विहडन’, ‘डाक्टर विहडन’, ‘विहडन थडम’ और ‘अवल मणमगल’ शामिल हैं। गौरतलब है कि 1926 में स्थापित यह मीडिया ग्रुप तमिलनाडु का जाना-माना पत्रिका समूह है। इस ग्रुप के तहत 15 पत्रिकाएं निकाली जाती हैं। इस ग्रुप ने 1997 में अपने प्रिंट संस्करणों को ऑनलाइन रूप से पाठकों को उपलब्ध कराना शुरू कर दिया था। वर्ष 2005 में इसने ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन मॉडल को फॉलो करना शुरू कर दिया।

कारणों पर बात करना जरूरीः

किन कारणों से ये अखबार बंद हो रहे हैं। इसके लिए हमें जी समूह के अखबार डीएन के बंद करते समय जारी नोटिस में प्रयुक्त शब्दों और तर्कों पर ध्यान देना चाहिए। इसमें कहा गया है कि-“हम नए और चैलेजिंग फेस में प्रवेश कर रहे हैं। डीएनए अब डिजिटल हो रहा है। पिछले कुछ महीनों के दौरान डिजिटल स्पेस में डीएनए काफी आगे बढ़ गया है। वर्तमान ट्रेंड को देखें तो पता चलता है कि हमारे रीडर्स खासकर युवा वर्ग हमें प्रिंट की बजाय डिजिटल पर पढ़ना ज्यादा पसंद करता है। न्यूज पोर्टल के अलावा जल्द ही डीएनए मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया जाएगा, जिसमें वीडियो बेस्ट ऑरिजिनल कंटेंट पर ज्यादा फोकस रहेगा। कृपया ध्यान दें, सिर्फ मीडियम बदल रहा है, हम नहीं, अब अखबार के रूप में आपके घर नहीं आएंगे, बल्कि मोबाइल के रूप में हर जगह आपके साथ रहेंगे।” 

यह अकेला वक्तव्य पूरे परिदृश्य को समझने में मदद करता है। दूसरी ओर डीएलए–आगरा के मालिक जिन्हें अमर उजाला जैसे अखबार को एक बड़े अखबार में बदलने में मदद की आज अपने अखबार को बंद करते हुए जो कह रहे हैं, उसे भी सुना जाना चाहिए। अपने अखबार के आखिरी दिन उन्होंने लिखा,“परिर्वतन प्रकृति का नियम है और विकासक्रम की यात्रा का भी। सूचना विस्फोट के आज के डिजिटल युग में कागज पर मुद्रित (प्रिंटेड) शब्द ही काफी नही। अब समय की जरूरत  है सूचना-समाचार पलक झपकते ही लोगों तक पहुंचे। इसी उद्देश्य से डीएलए प्रिंट एडिशन का प्रकाशन एक अक्टूबर, 2019 से स्थगित किया जा रहा है।”

इस संदर्भ में वरिष्ठ पत्रकार और कई अखबारों के संपादक रहे श्री आलोक मेहता का आशावाद भी देखा जाना चाहिए। हिंदी अखबार प्रभात खबर की 35वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में रांची के रेडिशन ब्लू होटल में आयोजित मीडिया कॉन्क्लेव आयोजन  में उन्होंने कहा, “बेहतर अखबार के लिए कंटेंट का मजबूत होना जरूरी है। ऐसा नहीं है कि टेक्नोलॉजी बदलने अथवा टीवी और सोशल मीडिया के आने से अखबारों का भविष्य खतरे में है। ऐसा होता, तो जापान में अखबार नहीं छपते, क्योंकि वहां की तकनीक भी हमसे बहुत आगे है और मोबाइल भी वहां बहुत ज्यादा हैं। अखबारों को उस कंटेंट पर काम करना चाहिए, जो वेबसाइट या टीवी चैनल पर उपलब्ध नहीं हैं। प्रिंट मीडिया का भविष्य हमेशा रहा है और आगे भी रहेगा।”

उपरोक्त विश्वेषण से लगता है कि आने वाला समय प्रिंट माध्यमों के लिए और कठिन होता जाएगा। ई-मीडिया, सोशल मीडिया और स्मार्ट मोबाइल पर आ रहे कटेंट की बहुलता के बीच लोगों के पास पढ़ने का अवकाश कम होता जाएगा। खबरें और ज्ञान की भूख समाज समाज में है और बनी रहेगी, किंतु माध्यम का बदलना कोई बड़ी बात नहीं है। संभव है कि मीडिया के इस्तेमाल की बदलती तकनीक के बीच प्रिंट माध्यमों के सामने यह खतरा और बढ़े। यहां यह भी संभव है कि जिस तरह मीडिया कंनवरर्जेंस का इस्तेमाल हो रहा है उससे हमारे समाचार माध्यम प्रिंट में भले ही उतार पर रहें पर अपनी ब्रैंड वैल्यू, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता के कारण ई-माध्यमों, मोबाइल न्यूज ऐप, वेब मीडिया और सोशल मीडिया पर सरताज बने रहें। तेजी से बदलते इस समय में कोई सीधी टिप्पणी करना बहुत जल्दबाजी होगी, किंतु खतरे के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं, इसमें दो राय नहीं है।

 (लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक व माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर व कुलपति हैं और ये उनके निजी विचार हैं) 

 

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पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है आंचलिक पत्रकारिता

कल्पना कीजिए कि आपके शरीर में रीढ़ की हड्डी ना हो तो आपका जीवन कैसा होगा? क्या आप सहज जी पाएंगे? शायद जवाब ना में होगा। वैसे ही पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी आंचलिक पत्रकारिता है

Last Modified:
Saturday, 30 May, 2020
manoj

मनोज कुमार

संपादक, ‘समागम’ पत्रिका ।।

कल्पना कीजिए कि आपके शरीर में रीढ़ की हड्डी ना हो तो आपका जीवन कैसा होगा? क्या आप सहज जी पाएंगे? शायद जवाब ना में होगा। वैसे ही पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी आंचलिक पत्रकारिता है। आप चार पेज का अखबार प्रकाशित करें या 24 घंटे का न्यूज चैनल चलाएं, बिना आंचलिक पत्रकारिता, आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। समाचार संकलन से लेकर प्रसार तक में आंचलिक पत्रकारिता की भूमिका अहम होती है। दिल्ली की पत्रकारिता देहात से होकर ही जाती है। दिल्ली से आशय यहां पर महानगरों की पत्रकारिता से है। महानगरों की पत्रकारिता का जो ओज और तेज आपको दिखता है, वह आंचलिक पत्रकारिता की वजह से है।

पीने की पानी की समस्या से लेकर खंदक की लड़ाई आंचलिक पत्रकारिता लड़ती है और इस लड़ने और जूझने की खबर महानगरों की पत्रकारिता के लिए खुराक का काम करती है। हरसूद की कहानी बहुत पुरानी नहीं हुई है। इस पूरी लड़ाई को आंचलिक पत्रकारिता ने लड़ा लेकिन महानगरों की पत्रकारिता ने जब इसे अपनी हेडलाइन में शामिल किया तो वे हीरो बन गए। आंचलिक पत्रकारिता का दुख और दुर्भाग्य यह है कि वह बार बार और हर बार बुनियाद की तरह नीचे दबा रह जाता है और महानगर की पत्रकारिता कलश की तरह खुद को स्थापित कर लेता है। हरसूद ही क्यों, भोपाल की भीषण गैस त्रासदी को किसी बड़े अखबार ने नहीं बल्कि तब के एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने उठाया था। आज उस विभीषिका से वास्ता पड़ा लेकिन महानगर की पत्रकारिता छा गई। इस घटना में उस साप्ताहिक की भूमिका को इसलिए दरकिनार नहीं किया जा सका क्योंकि उसके सम्पादक आज के रसूखदार पत्रकार राजकुमार केशवानी हैं। यही अखबार डिंडौरी, सिलवानी, बडऩगर, इछावर, कोतमा या ऐसी किसी जगह से प्रकाशित होता तो शायद आज उसका कोई नामलेवा भी नहीं होता।

आंचलिक पत्रकारिता की अपनी गमक है। इस बात को हम लोग अक्सर भूल जाते हैं और महानगर की पत्रकारिता की ओर टकटकी लगाए देखते हैं। कुपोषण को लेकर महानगर के पत्रकार सेसईपुरा, डिंडौरी और मंडला के गांवों में आते हैं और हमारे स्थानीय पत्रकारों की मदद से रिपोर्ट तैयार करते हैं लेकिन उनका नाम कहीं नहीं आता है। देश और विदेश के सारे बड़े नाम और सम्मान महानगर के पत्रकारों के खाते में चला जाता है और हमारा साथी इस बात को लेकर संतोष कर लेता है कि चलो, हमारी समस्या तो सरकार की नजर में आयी। गांवों में स्टोरी करना महानगर के पत्रकारों के लिए एक फैशन की तरह है। स्थानीय पत्रकारों की मदद से स्टोरी तैयार करते हैं और जब उसका प्रकाशन-प्रसारण बड़े बैनर पर होता है तो स्थानीय पत्रकार लापता होते हैं। किसी भी अखबार की हेडलाइन या किसी चैनल की ब्रेकिंग खबर गांव से निकलकर ही आती है। वैष्विक बीमारी कोरोना को लेकर जो स्टोरी अखबार, चैनल और सोशल मीडिया पर चल रही है उसके केन्द्र में गांव, ग्रामीण ही हैं। मुसीबत उनके हिस्से में है और खबरों का पेट भी वही भर रहे हैं जो भूखे पेट कोसों पैदल चलकर घर पहुंचने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। 

पत्रकारिता की रीढ़ भले ही आंचलिक पत्रकारिता हो लेकिन आंचलिक पत्रकारिता के साथी सबसे ज्यादा समस्याओं से जूझते हैं। यह बात भी तय है कि बुनियाद का यह भाग्य ही होता है कि वह सबका भार उठाये। उसके कंधे पर चढ़कर दूसरे कलश बन जाएं और इतरायें लेकिन आंचलिक पत्रकारिता बुनियाद बनना ही पसंद करता है। यही कारण है कि हिन्दी पत्रकारिता में आंचलिकता हमेशा से मील का पत्थर बना हुआ है। पत्रकारिता का प्रथम पाठ आंचलिक पत्रकारिता से ही आरंभ होता है। आंचलिक पत्रकारिता ने कभी अपना ओज नहीं खोया। बदलते समय में वह और भी सामयिक होता गया। आज देश के नामचीन पत्रकारों की फेहरिस्त ढूंढ़ेंगे तो आपको उनमें से ज्यादतर किसी अनजान या छोटे गांव-कस्बे के मिलेंगे। दुर्भाग्य यही है कि कोई अपनी पहचान नहीं बताना चाहता है। अपनी देशज बोली-बानी को भूलकर अंग्रेजियत का चोला पहन रखा है कि वह खुद में गुम हो गया है।

जब हम गांव की ओर लौटते हैं। आंचलिक पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो हम गर्व से भर उठते हैं। इस बदलती दुनिया में वे नहीं बदले हैं और ना उनका दर्द बदला है। सबकुछ यथावत है। कुछेक लोगों की बात छोड़ दें तो पत्रकारिता के लिए समर्पित साथियों के घरों में ना तो ठीक से रहने का इंतजाम है और ना ही उनके बच्चे उन बड़े स्कूलों में पढ़ पाते हैं जिनका सपना हर माता पिता का होता है। हर दीवाली पर हमारे इन साथियों के पास पैसा नहीं, आश्वासन होता है। अगली दीवाली पर टीवी आ जाएगी। इस बार इन्हीं कपड़ों से काम चला लो। हर दीवाली यही वादे। भीषण गर्मी में साथियों के तपते घरों में पंखा भी रूक रुक कर चलता है। कूलर की बात भी अगली गर्मी तक टाल दी जाती है। एयर कंडिशन तो सपने में भी नहीं है। घर पर जमाने पुरानी सायकल है। अपने काम को गति देने के लिए सेकंडहेंड स्कूटर तो खरीद लिया लेकिन सौ गज में कब धोखा दे जाए, यह ना तो स्कूटर जानता है और ना ही चलाने वाला। हमारे एक साथी शहर में आए। अच्छी सेलरी मिलने लगी तो दबे सपने बाहर आ गए। नई कार लेने की हिम्मत नहीं थी सो कार सेकंडहेंड ले ली। अब हर दो दिन बाद गैरेज में उनकी कार खड़ी रहती थी। दूसरी सुविधाओं को लेकर तर्क होता है कि इस बार जरूर ले आएंगे लेकिन आता कभी नहीं है। अपने परिवार को आश्वासन देने में हमारे साथी जितने आगे होते हैं, उसके आगे तो राजनेता भी मत्थे टेक लेते हैं। अक्सर खबरों को लेकर पटवारी और थानेदार या भी स्थानीय नेता के कोप का भाजन आंचलिक पत्रकार को बनना पड़ता है। गांव की सरहद में आज भी पटवारी और थानेदार से बड़ा कोई नहीं होता है। इनसे जूझते हुए हमारे साथी हिम्मत नहीं हारते हैं। खबरें जुटाते हैं और बेखौफ लिखते हैं। लोभ-लालच से दूर होने के कारण पटवारी और थानेदारी की आवाज भी भोथरी हो जाती है। 

आंचलिक पत्रकारिता के आय का मुख्य स्रोत है स्थानीय स्तर पर मिलने वाले विज्ञापनों से प्राप्त होने वाला कमीशन, वह भी तब जब विज्ञापनदाता पूरी राशि चुकता कर दे। एक और सोर्स है अखबारों के विक्रय से होने वाला कमीशन लेकिन इसके लिए भी पहले धनराशि जमा कराना होती है। टेलीविजन चैनल ऐसी जगहों पर स्ट्रिंगर बनाते हैं जिनसे बहुत ही मामूली मानदेय मिलता है। अधिकांश स्थानों पर तो खबरों के आधार पर मानदेय का भुगतान किया जाता है। ऐसा भी नहीं है कि आंचलिक पत्रकारिता का परिदृश्य नहीं बदला है। बदला है और बदल रहा है हमारी नई पीढ़ी के कारण। उन्हें लगता है कि महानगर सुविधाओं में डूबा रहे और हम अंधेरे में। यह सच है कि सुविधा का स्तर बढ़ा है तो आंचलिक पत्रकारिता का विश्वास भी कम होने लगा है। सुविधा पाने का अर्थ है समझौता और समझौते का अर्थ है विश्वास को खो देना। हालांकि बिगड़ती स्थिति के बाद भी आंचलिक पत्रकारिता का वजूद इसलिए बना रहेगा क्योंकि वह एक हद तक समझौता कर लेता है लेकिन कहीं न कहीं उसकी कलम आग उगल देती है। पत्रकारिता को प्रोफेशन बनाइए क्योंकि ऐसा नहीं करेंगे तो प्रतिबद्ध पत्रकार की श्रृंखला खत्म हो जाएगी। स्वाभाविक है तब पत्रकारिता के स्थान पर मीडिया प्रोफेशनल्स आएंगे और आंचलिक पत्रकारिता का गौरव कहीं ना कहीं लांछित होगा, जैसा कि हम राजनीति में देख रहे हैं। आंचलिक पत्रकारिता की पीड़ा, उसके दर्द और तकलीफ से मैं बाबस्ता हूं लेकिन जरूरी है कि देहात की आवाज दिल्ली तक पहुंचाने के लिए हम पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के सपनों को अपनी आंखों में जगाए रखें। महात्मा की पत्रकारिता आंचलिक पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है। कबीराना ही आंचलिक पत्रकारिता का स्वभाव है और उसकी पहचान भी।

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पिछले दिनों पत्रकारों के साथ हुए अभद्र व्यवहार का असल कारण भी यही है मिस्टर मीडिया!

पत्रकारिता को अगर लोकतंत्र में चौथा स्तंभ कहा जाता है, तो प्रश्न यह है कि इस महत्वपूर्ण स्थान की क्या हम रक्षा कर पा रहे हैं?

राजेश बादल by
Published - Wednesday, 27 May, 2020
Last Modified:
Wednesday, 27 May, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

पत्रकारिता को अगर लोकतंत्र में चौथा स्तंभ कहा जाता है, तो प्रश्न यह है कि इस महत्वपूर्ण स्थान की क्या हम रक्षा कर पा रहे हैं? यह कोई कानूनी अधिकार नहीं है न ही यह कोई गाड़ियों पर प्रेस लिखकर घूमने की तरह वीआईपी सुविधा है अथवा कोई अधिमान्यता पत्र। यह वास्तव में अवाम की ओर से अपने हितों के लिए सौंपा गया एक ऐसा वचन पत्र है, जिसका अर्थ हर संकट-काल में आम आदमी के साथ खड़ा हो जाना है। ठीक वैसा ही, जैसा आपातकाल के समय कमोबेश समूची पत्रकारिता ( अपवादों को छोड़कर) प्रतिपक्ष और जनता के साथ खड़ी हो गई थी।

कोरोना काल भी ठीक वैसा ही है। विडंबना यह है कि आज की समूची पत्रकारिता (अपवादों को छोड़कर) अवाम से दूर खड़ी नजर आ रही है। अनेक स्थानों पर बीते दिनों पत्रकारों के साथ हुए अभद्र व्यवहार का असल कारण भी यही है। जन धारणा यही है कि जब कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका अवाम के दिल और दिमाग की जबान पढ़ने में नाकाम रहे तो पत्रकारिता को उनकी पीड़ा को मुखरित करना चाहिए। इस अपेक्षा में कुछ भी गलत नहीं है। दुनिया भर में और हिन्दुस्तान में इस पवित्र पेशे की यही प्रचलित परिभाषा है। आजादी के आंदोलन से लेकर आज तक अनेक अवसरों पर पत्रकार दुखी और तकलीफज़दा लोगों के लिए हमसफर बने हैं।

मगर बीते दिनों एक बड़ा वर्ग अवाम से पल्ला झाड़ता दिखाई दे रहा है। वह सिक्के का एक ही पहलू देख रहा है। अगर पटरियों पर श्रमिक कटते हैं तो यह कुतर्क दिया जाता है कि वे रेल लाइन पर सोए ही क्यों? अगर नंगे पांव धूप में पैरों में छाले पड़ जाएं, वे पत्थर की तरह सख़्त हो जाएं, उनकी संवेदना चली जाए तो कहा गया कि तेज गर्मी में निकलेंगे तो ऐसा ही होगा। कोई भूखा सड़क पर चलते-चलते दम तोड़ दे तो कहा गया कि गर्मी के दिनों में खाली पेट निकलने से तो लू लगती ही है। किसी गर्भवती श्रमिक महिला को सड़क पर प्रसव हो गया तो यह समाचार प्रकाशित हुआ कि वह अस्पताल क्यों नहीं गई? पैंतालीस बरस पहले अदम के इस अहसास को अपने भीतर आज अनुभव कीजिए-

भुखमरी की जद में है या दार के साये में है/अहले हिन्दुस्तान अब तलवार के साये में है

छा गई है जेहन की परतों पर मायूसी की धूप/ आदमी गिरती हुई दीवार के साये में है

बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ/ और कश्ती कागजी पतवार के साये में है

क्या कोई सामूहिक शर्म हमारे अंदर शेष है? श्रमिक सड़क पर इसलिए उतरे हैं क्योंकि उनके डेरों से मालिकों ने किराया नहीं देने के कारण बाहर कर दिया है। वे इसलिए भूखे हैं क्योंकि काम देने वालों ने बकाया मजदूरी नहीं दी है। घर बैठे पैसे देने का तो सवाल ही नहीं उठता। वे नंगे पांव इसलिए हैं क्योंकि हजार किलोमीटर चलने लायक चप्पल उनके पैरों में नहीं थी। चप्पलें टूटती गईं, श्रमिक उन्हें फेंकते गए और आगे बढ़ते गए। सड़क पर प्रसव इसलिए हुआ क्योंकि अस्पतालों में कोरोना के अलावा अन्य बीमारी का इलाज नहीं हो रहा है। वह भी केवल पैसे वालों का। वे रेल पटरियों पर इसलिए सोते हैं क्योंकि उन्हें इस हाल में पहुंचाने वालों ने छत और बिस्तर मुहैय्या नहीं कराए। वे अपने अस्थायी ठिकानों से पुश्तैनी गांव के लिए इसलिए निकले हैं क्योंकि गांव अभी महानगरों की तरह क्रूर और संवेदनहीन नहीं हुए हैं। सोच यह है कि महानगर में मौत लिखी है-चाहे भूख से हो या कोरोना से। कोरोना से भी गांव में मरना है। जब दोनों जगह मौत लिखी है तो अपने पुरखों के गांव में जाकर क्यों न मरें? कम से कम चार कंधे तो मिल जाएंगे। यानी करोड़ों श्रमिक जीने की चाह लेकर नहीं निकले हैं। वे सुकून से मरना चाहते हैं। संसार में क्या कोई दूसरा उदहारण याद है, जब मरने के लिए इतनी बड़ी तादाद में मजदूर निकले हों? इस पीड़ित मानवता को पत्रकारिता के मंच पर कितना स्थान मिला है? याद रखिए राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी और सुरेंद्र प्रताप सिंह भी परीक्षा की घड़ी में अवाम के साथ ही खड़े होते थे। 

हम अपने रंगीन परदों पर उत्तर कोरिया के तानाशाह की कथाएं दिखाते हैं।लेकिन अपने मुल्क़ की स्याह और बदरंग हो रही तस्वीर नहीं दिखाते। हम अजगर और शेर की जंग दिखाते हैं। हम चीन को सबक सिखाना चाहते हैं। हम पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहते हैं। हम नेपाल को सबक सिखाना चाहते हैं। हम सबक़ सिखाना चाहते हैं, लेकिन खुद सबक नहीं सीखना चाहते। यह बहुत भारी पड़ेगा मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

मिस्टर मीडिया: यह अपराध अनजाने में हुए, पर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया

क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

हालात तो खतरे की घंटी बजा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!  

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मिस्टर मीडिया: यह अपराध अनजाने में हुए, पर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया

सोशल मीडिया के अनेक अवतारों पर इन दिनों कोरोना से जुड़ी बेहद संवेदनशील खबरों की बाढ़ आई हुई है। पड़ताल करने के बाद इनमें आए कई वीडियो पुराने निकलते हैं।

राजेश बादल by
Published - Tuesday, 19 May, 2020
Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2020
Rajesh Badal

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

सोशल मीडिया के अनेक अवतारों पर इन दिनों कोरोना से जुड़ी बेहद संवेदनशील खबरों की बाढ़ आई हुई है। पड़ताल करने के बाद इनमें आए कई वीडियो पुराने निकलते हैं। यानी वे असली वीडियो हैं, लेकिन कोरोना के संदर्भ में फर्जी हैं। पिछले दिनों घर लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के कुछ वीडियो देखकर मेरा भी मन विचलित हो गया। मैंने एक-दो वीडियो अपने फेसबुक मंच पर साझा कर दिए। बाद में कुछ मित्रों ने उन पर संदेह किया। खोज की तो पाया कि वे वीडियो वाकई ताजे नहीं थे। मैंने फेसबुक प्लेटफॉर्म पर इसके लिए माफी भी मांगी।

इसी क्रम में ऐसे ही चंद वीडियो कुछ टेलिविजन चैनलों ने भी दिखा दिए। बाद में उन्हें भी असलियत पता चली और उन्होंने वीडियो गिरा दिए (चैनल की भाषा में हटाने के लिए गिराना ही प्रचलित है) लेकिन तब क्या हो सकता था। तीर कमान से निकल चुका था। यह अपराध अनजाने में हुए, मगर दर्शक समझते हैं कि चैनल ने जानबूझकर ऐसा किया है।

मुश्किल यह है कि जो लोग इस तरह के वीडियो का दुरुपयोग करते हैं, उनमें से अधिकतर पत्रकार नहीं होते। वे बस इरादतन ऐसा करते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इससे एक समूचे प्रोफेशन की साख पर सवाल खड़ा हो जाता है। हो सकता है कि किसी स्तर पर कोई पत्रकार भी इसमें शामिल हो जाता हो, पर ज्यादातर तो ऐसा करने से बचते हैं। सोशल मीडिया पर इस प्रवृति पर कैसे लगाम लगाईं जा सकती है?

कुछ चैनल वायरल का सच या वायरल वीडियो की पड़ताल करते हैं मगर इससे दर्शक के मन में पत्रकारिता के बारे में जो छवि बनती है, वह नहीं बदलती। क्योंकि यह जरूरी नहीं कि जब वायरल का सच दिखाया जा रहा हो तो वास्तव में वही दर्शक बैठा हो। जब इस गंभीर अनैतिक कृत्य को आप आधा घंटे के कार्यक्रम की शक्ल देते हैं, तो फिर वह भी एक शो हो जाता है। हमें इससे आगे कुछ सोचना होगा। इसके विरोध में कानूनी तौर पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकती, जब तक कि उससे समाज या देश को कोई बहुत बड़ी हानि नहीं हो। हालिया वर्षों में ऐसे भी मामले आए हैं, जब सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए अथवा दंगे भड़काने के लिए उनका दुरुपयोग किया गया, किन्तु उससे इस सिलसिले पर पूरी तरह पाबंदी नहीं लगी। पाया गया कि इनमें भी पत्रकारों का हाथ नहीं था।

इसका अर्थ यह है कि कुछ ऐसे असामाजिक तत्व भारतीय मीडिया के कंधे का सहारा लेकर अपनी मंशा पूरी करना चाहते हैं। इन्हें रोकना ही होगा। चैनलों की एसोसिएशन इस बात पर तय कर सकती है कि इस बारे में लगातार स्क्रॉल (पट्टी) चलाई जाती रहे,  ब्रेक के दौरान बीस-तीस सेकंड के संदेश प्रसारित किए जाएं और न्यूज एंकर हर दो तीन घंटे बाद इन नक़ली आपराधिक खबरों से दर्शकों को आग़ाह करें। यदि प्रतिदिन कुल आधा घंटे का ऐसा प्रसारण हो और यह सिलसिला कम से कम साल भर तक चले तो ऐसे कुटेवों पर काबू पाया जा सकता है।

इस मामले में समाचार पत्रों और रेडियो से भी सहयोग लिया जा सकता है। इन प्रसारण संदेशों में कहा जाए कि एक व्यक्ति की इस हरकत से समूचा ताना बाना चरमरा सकता है तो शायद कुछ रोक लगे। कुछ तो जागरूक होंगे ही। ये तो महज कुछ सुझाव हैं। इनसे भी अलग कदम उठाए जा सकते हैं। प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब, प्रेस एसोसिएशन, श्रमजीवी पत्रकार संघ, नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट, भारतीय पत्रकार संघ, आंचलिक पत्रकार संघ और अन्य जितने भी संगठन हैं, उन्हें आगे आना होगा। यदि आज इस पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले कल में यह चुनौती विकराल रूप ले लेगी मिस्टर मीडिया!

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की 'मिस्टर मीडिया' सीरीज के अन्य कॉलम्स आप नीचे दी गई हेडलाइन्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं-

क्या सरकारी प्रसारणों में इन सभी बातों का ध्यान रखा जा रहा है मिस्टर मीडिया!

यह अपने अंदर झांकने का भी दौर है मिस्टर मीडिया!

हालात तो खतरे की घंटी बजा ही रहे हैं मिस्टर मीडिया!   

मिस्टर मीडिया: पत्रकारिता के लिए ये वाकई मुश्किल दौर है

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'इस प्रश्न पर संवाद का साहस न राजनीति में है, न विचारकों में'

कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द, उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी, आर्तनाद और संकट सब कुछ खुलकर सामने आ गए हैं। इन सात दशकों में जैसा देश बना या बनाया गया है

Last Modified:
Monday, 18 May, 2020
corona

-प्रो. संजय द्विवेदी

कोरोना संकट के बहाने भारत के दुख-दर्द, उसकी जिजीविषा, उसकी शक्ति, संबल, लाचारी, बेबसी, आर्तनाद और संकट सब कुछ खुलकर सामने आ गए हैं। इन सात दशकों में जैसा देश बना या बनाया गया है, उसके कारण उपजे संकट भी सामने हैं। दिनों दिन बढ़ती आबादी हमारे देश का कितना बड़ा संकट है यह भी खुलकर सामने है, किंतु इस प्रश्न पर संवाद का साहस न राजनीति में है, न विचारकों में। संकटों में भी राजनीति तलाशने का अभ्यास भी सामने आ रहा है। मीडिया से लेकर विचारकों के समूह कैसे विचारधारा या दलीय आस्था के आधार पर चीजों को विश्लेषित और व्याख्यायित कर रहे हैं कि सच कहीं सहम कर छिप गया है। देश के दुख, देश के लोगों के दुख और संघर्ष भी राजनीतिक चश्मों से देखे और समझाए जा रहे हैं।

ऐसे कठिन समय में सच को व्यक्त करना कठिन है, बहुत कठिन। क्योंकि सभी विचारवंतों के ‘अपने अपने सच’ हैं। जो राजनीतिक आस्थाओं के आधार देखे और परखे जा रहे हैं। भारतीय बौद्धिकता और मीडिया के शिखर पुरुषों ने इतना निराश कभी नहीं किया था। साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल बताने वाले देश ने राजनीतिक आस्थाओं को ही सच का पर्याय मान लिया है। संकटों के समाधान खोजने, उनके हल तलाशने और देश को राहत देने के बजाए जख्म को कुरेद-कुरेद कर हरा करने में मजा आ रहा है। यह सडांध तब और गहरी होती दिखती है, जब कुछ लोग पलायन की पीड़ा भोग रहे हिंदुस्तान के दुख में भी आनंद की अनुभूति सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि देश के नेता के सिर उसका ठीकरा फोड़ा जा सके।

केंद्र की मजबूत सरकार और उसके मजबूत नेता को विफल होते देखने की हसरत इतनी प्रबल है कि वह लोगों की पीड़ा और आर्तनाद में भी आनंद का भाव खोज ले रही है। हमारी केंद्र और राज्य की सरकारों की विफलता दरअसल एक नेता की विफलता नहीं है। यह समूचे लोकतंत्र और इतने सालों में विकसित तंत्र की भी विफलता है। सामान्य संकटों में भी हमारा पूरा तंत्र जिस तरह धराशाही हो जाता है वह अद्भुत है। बाढ़, सूखा, भूकंप और अन्य दैवी आपदाओं के समय हमारे आपदा प्रबंधन के सारे इंतजाम धरे रह जाते हैं। सामान्यजन इसकी पीड़ा भोगता है। यह घुटनाटेक रवैया निरंतर है और इस पर लगाम कब लगेगी कहा नहीं जा सकता। व्यंग्य कवि स्व. प्रदीप चौबे ने लिखा – बाढ़ आए या सूखा मैं खाऊं तू खा। यानि जहां बाढ़ आ रही है, वहां सालों से हर साल आ रही। फिर उसी इलाके में सूखा भी हर साल आ रहा है। यानि इस संकट ने उस इलाके में एक इको सिस्टम बना लिया है और उसके साथ लोग जीना सीख गए हैं। हमारा महान प्रशासनिक तंत्र इन संकटों से निजात पाने के उपाय नहीं खोजता, उसके लिए हर संकट में एक अवसर है।

हम अपने संकटों को चिन्हिंत करें तो वे ज्यादा नहीं हैं, वे आमतौर पर विपुल जनसंख्या और उससे उपजे हुए संकट ही हैं। उत्तर भारत के राज्यों के सामने यह कुछ ज्यादा विकराल हैं क्योंकि यहां की राजनीति ने राजनेता और राजनीतिक योद्धा तो खूब दिए किंतु जमीन पर उतरकर संकटों के समाधान तलाशने की राजनीति यहां आज भी विफल है। ये इलाके आज भी जातीय दंभ, अहंकार, माफियाराज, लूटपाट, गुंडागर्दी के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसलिए उत्तर भारत के राज्य इस संकट में सबसे ज्यादा परेशानहाल दिखते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बंगाल जिस तरह पलायन की पीड़ा से बेहाल हैं, उसे देखकर आंखें भर आती हैं। एक बार दक्षिण और पश्चिम के राज्यों महाराष्ट्र,गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल की ओर हमें देखना चाहिए। आखिर क्या कारण हैं हमारे हिंदी प्रदेश हर तरह के संकट का कारण बने हुए हैं।पलायन, जातिवाद, सांप्रदायिकता, माफिया,भ्रष्टाचार, ध्वस्त स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था सब इनके हिस्से हैं। यह संभव है कि समुद्र के किनारे बसे राज्यों की व्यवस्थाएं, अवसर और संभावनाएं बलवती हैं। किंतु उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य भी उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी संभावनाओं को जमीन पर उतारा है। प्रधानमंत्रियों का राज्य रहा उत्तर प्रदेश आज भी देश और दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। अपनी विशाल आबादी और विशाल संकटों के साथ। जमाने से कभी गिरिमिटिया मजदूरों के रूप में विदेशों में ले जाए जाने की पीड़ा तो आजादी के बाद मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, रंगून जैसे महानगरों में संघर्ष करते, पसीना बहाते लोग एक सवाल की तरह सामने हैं। यही हाल बिहार का है। एक जमाने में गांवों में गाए जाने वाले लोकगीत भी इसी पलायन के दर्द का बयान करते हैं-

रेलिया बैरन पिया को लिए जाए हो, रेलिया बैरन।

(रेल मेरी दुश्मन है जो मेरे पति को लेकर जा रही है)

मेरे पिया गए रंगून किया है वहां से टेलीफून,

तुम्हारी याद सताती है जिया में आग लगाती है।

आजादी के बाद भी ये दर्द कम कहां हुए हैं? स्वदेशी, स्वावलंबन का ‘गांधी पथ’ छोड़कर सत्ताधीश नए मार्ग पर दौड़ पड़े जो गांवों को खाली करा रहे थे और शहरों को बेरोजगार युवाओं की भीड़ से भर रहे थे। एक समय में आत्मनिर्भर रहे हमारे गांव अचानक ‘मनीऑर्डर एकोनामी’ पर पलने लगे। गांवों में स्वरोजगार के काम ठप पड़ गए। कुटीर उद्योग ध्वस्त हो गए। भारतीय समाज को लांछित करने के लिए उस पर सबसे बड़ा आरोप वर्ण व्यवस्था का है। जबकि वर्ण व्यवस्था एक वृत्ति थी, टेंपरामेंट थी। आपके स्वभाव, मन और इच्छा के अनुसार आप उसमें स्थापित होते थे। व्यावसायिक वृत्ति का व्यक्ति वहां क्षत्रिय बना रहने के मजबूर नहीं था, न ही किसी को अंतिम वर्ण में रहने की मजबूरी थी। अब ये चीजें काल बाह्य हैं। वर्ण व्यवस्था समाप्त है।

जाति भी आज रूढ़ि बन गयी किंतु एक समय तक यह हमारे व्यवसाय से संबंधित थी। हमारे परिवार से हमें जातिगत संस्कार मिलते थे-जिनसे हम विशेषज्ञता प्राप्त कर‘जाब गारंटी’भी पाते थे। इसमें सामाजिक सुरक्षा थी और इसका सपोर्ट सिस्टम भी था। बढ़ई, लुहार, सोनार, निषाद, माली, धोबी, कहार ये जातियां भर नहीं है। इनमें एक व्यावसायिक हुनर और दक्षता जुड़ी थी। गांवों की अर्थव्यवस्था इनके आधार पर चली और मजबूत रही। आज यह सारा कुछ उजड़ चुका है। हुनरमंद जातियां आज रोजगार कार्यालय में रोजगार के लिए पंजीयन करा रही हैं या महानगरों में नौकरी के लिए धक्के खा रही हैं। जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था दोनों ही अब अपने मूल स्वरूप में काल बाह्य हो चुके हैं। अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसे में जाति के गुण के बजाए, जाति की पहचान खास हो गयी है। इसमें भी कुछ गलत नहीं है। हर जाति का अपना इतिहास है, गौरव है और महापुरुष हैं। ऐसे में जाति भी ठीक है, जाति की पहचान भी ठीक है, पर जातिभेद ठीक नहीं है। जाति के आधार भेदभाव यह हमारी संस्कृति नहीं। यह मानवीय भी नहीं और सभ्य समाज के लिए जातिभेद कलंक ही है।

हमें हमारे गांवों की ओर देखना होगा। मनीषी धर्मपाल की ओर देखना होगा, उन्हें पढ़ना होगा, जो बताते हैं कि किस तरह हमारे गांव स्वावलंबी थे। जबकि आज नई अर्थव्यवस्था में किसान आत्महत्या करने लगे और कर्ज को बोझ से दबते चले गए। 1991 के लागू हुयी नई आर्थिक व्यवस्था ने पूरी तरह से हमारे चिंतन को बदलकर रख दिया। संयम के साथ जीने वाले समाज को उपभोक्ता समाज में बदलने की सचेतन कोशिशें प्रारंभ हुयीं। 1991 के खड़ा हुआ यह अर्थतंत्र इतना निर्मम है कि वह दो महीने भी आपको संकटों में संभाल नहीं सकता। आप देखें तो छोटे उद्यमियों की छोड़ें,बड़ी कंपनियों ने भी अपने कर्मियों के वेतन में तत्काल कटौती करने में कोई कमी नहीं की। यहां से जो गाड़ी पटरी से उतरी है,संभलने को नहीं है। ईएमआई के चक्र ने जो जाल बुना है, समूचा मध्यवर्ग उससे जूझ रहा है। निम्न वर्ग उससे स्पर्धा कर रहा है। इससे समाज में बढ़ती गैरबराबरी और स्पर्धा की भावना एक बड़े समाज को निराशा और अवसाद से भर रही है। जाहिर है संकट हमारे हैं, इसके हल हम ही निकालेगें। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, कृषकों के संकट, बढ़ती जनसंख्या के सवाल हमारे सामने हैं। इनके ठोस और वाजिब हल निकालना हमारी जिम्मेदारी है। कोरोना संकट ने हमें साफ बताया है कि हम आज भी नहीं संभले तो कल बहुत देर हो जाएगी। अंधे पूंजीवाद और निर्मम कॉरपोरेट की नीतियों से अलग एक मानवीय,संवेदनशील समाज बनाने की जरूरत है जो भले महानगरों में बसता हो उसकी जड़ों में संवेदना और आत्मीयता हो। सिर्फ हासिल करने और हड़पने की चालाकी न हो। देने का भाव भी हो। भरोसा कीजिए हम इस दुखों की नदी को पार कर जाएंगें।

 (लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक व माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर व कुलसचिव हैं) 

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‘सुधीर सर, दुनियाभर के पत्रकारों के लिए आपका ये साहस नए जज्बे का प्रतीक है’

कर्तव्य के साथ चुनौतियों को स्वीकारना होता ही है। प्रभु आपके और हमारे सभी साथियों के साथ है। सब जल्द ही सामान्य होगा।

Last Modified:
Saturday, 16 May, 2020
Sudhir Chaudhary

सुधीर चौधरी सर, आपके साथ काम करते हुए सिर्फ चार महीने ही हुए हैं, पर जिस तरह का साहस आपने कल दिखाया, उसने ये अहसास दिलाया कि एक संपादक का साहस क्या होता है। रीढ़विहीन पत्रकारिका का आरोप झेल रहे दुनियाभर के पत्रकारों के लिए आपका ये साहस नए जज्बे का प्रतीक है। जिस तरह आपने कोरोना वायरस की न्यूजरूम एंट्री से डटकर मुकाबला करने की ठानी, वो बहुत DARING है।

चूंकि आप ‘जी न्यूज’ का नेतृत्व कर रहे हैं, ऐसे में हम सबका मानना था कि आपको ऑफिस आकर अपना लोकप्रिय शो ‘डीएनए’ (DNA) नहीं करना चाहिए, आप चाहते तो इस सर्वमान्य निवेदन को स्वीकार कर सकते थे, पर आपने अपने परिवार और हितैषियों की इच्छा के विरुद्ध जाकर लगातार न्यूजरूम में साथियों के साथ कंधा मिलाकर खड़े होने को चुना। वाकई ये हमारे लिए किसी पुलित्जर अवॉर्ड से कहीं ज्यादा है, कि कठिन समय में हमारे नेतृत्वकर्ता ने हमें मझधार में नहीं छोड़ा।

मुझे याद है होली के बाद की वो पहली मीटिंग जिसमें आपने ये कहा था कि हमें न्यूजरूम व मीटिंग में गैदरिंग नहीं करनी है। उसी दिन से सिर्फ अतिआवश्यक टीम ही ऑफिस आ रही थी, डिजिटल की पूरी टीम 40 दिन से ज्यादा समय से वर्क फ्रॉम होम कर रही है। आपने कोरोना की गंभीरता को समय से पहले भांपा था और लगातार इससे बचने के हरसंभव उपाय पर बात की, पर होनी को कौन टाल सकता है।

कर्तव्य के साथ चुनौतियों को स्वीकारना होता ही है। प्रभु आपके और हमारे सभी साथियों के साथ है। सब जल्द ही सामान्य होगा। आप और न्यूजरूम के साथी अपना पूरा ध्यान रखिएगा, वर्क फ्रॉम होम की टीम भी अपने न्यूजरूम के हर साथी के प्रति चिंतित है। कोरोना के साथ हम ये लड़ाई जल्दी ही जीतेंगे, ये मन में विश्वास है।

(वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक मेहरोत्रा की फेसबुक वॉल से साभार)

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ऐसे कठिन समय में PM मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश की भावनाओं को समझा जाना चाहिए

संकट कितने भी बड़े, गहरे और लाइलाज हों। एक नायक को उम्मीदों और सपनों के साथ ही होना होता है। वह चाहकर भी निराशा नहीं बांट सकता। अवसाद नहीं फैला सकता।

Last Modified:
Thursday, 14 May, 2020
Pro. Sanjay Dwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी।।

संकट कितने भी बड़े, गहरे और लाइलाज हों। एक नायक को उम्मीदों और सपनों के साथ ही होना होता है। वह चाहकर भी निराशा नहीं बांट सकता। अवसाद नहीं फैला सकता। उसकी जिम्मेदारी है कि टूटे हुए मनों, दिलों और आत्मा पर लग रही खरोंचों पर मरहम ही रखे। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 मई,2020 के राष्ट्र के नाम संदेश की भावनाओं को समझा जाना चाहिए। कोरोना के अंधेरे समय में जब दुनिया की तमाम प्रगतिशील अर्थव्यवस्थाएं संकटों से घिरी हैं और घबराई हुई हैं, तब भी वे उम्मीदों और सपनों का साथ नहीं छोड़ते। एक समर्थ नेता की तरह वे लोगों में निराशा नहीं भरते, बल्कि भरोसा जगाते हैं। वे निराश और हताश नहीं हैं, बल्कि संकटों में अवसर की तलाश कर रहे हैं। वे कोरोना महामारी के व्यापक प्रसार के क्षणों में भी कहते हैं कि ‘हम कोरोना से लड़ेंगें और आगे बढेंगे।’

कोरोना संकट के बाद अखबार बुरी खबरों से भरे पड़े हैं। गांव जाते हुए ट्रेन से कटते श्रमिक, भूख से बिलखते हुए बच्चे, गहरी असुरक्षा से घिरे छोटी गाड़ियों,साइकिलों, मोटरसाइकिलों और पैदल ही गांव को जाते लोग जैसी तमाम छवियां मन को दुखी कर जाती हैं। इस नकारात्मकता के संसार में सोशल मीडिया पर अखंड विलाप करते लोग भी हैं, जो लोकतंत्र की बेबसी और हमारे सरकारी तंत्र की विफलताओं की रूदाली कर रहे हैं। इस गहरे अंधकार, नकारात्मक सूचनाओं के संसार में एक राष्ट्रनायक का काम क्या है? सही मायने में एक राष्ट्र के नायक का यही कर्तव्य है कि वह राष्ट्रजीवन में निराशा और अवसाद के बादल न चढ़ने दे। वह दुखी जनों को और संतप्त न करे। कठिनतम जीवन संघर्ष में लगी जनता को प्रेरित कर उन्हें रास्ता दिखाए।

देश की विशाल आबादी हमारा संकट है। बावजूद इसके इस प्रश्न पर बोलना खतरे से खाली भी नहीं है। सारे संसाधन पैदा होते ही अगर कम हो जाते हैं तो इसका कारण हमारी विशाल जनसंख्या ही है। शायद इसलिए मोदी यह कहते नजर आ रहे हैं कि ‘अर्थ केंद्रित वैश्वीकरण या मनुष्य केंद्रित वैश्वीकरण?’ उनका यह प्रश्न खुद से भी है, देश से भी और नीति-निर्माताओं से भी है। उन देशों से भी है जो तमाम चमकीली प्रगति के बाद भी गहरी निराशा में हैं। मोदी मानते हैं कि आपदा को अवसर में बदला जा सकता है। लोगों के दुख कम किए जा सकते हैं। उन्होंने भुज के उदाहरण से समझाने की कोशिश भी की है कि कैसे खत्म हुए इलाके फिर सांस लेने लगते हैं, धड़कने लगते हैं।

प्रधानमंत्री के इस भाषण की सबसे बड़ी बात है कि उन्होंने ‘आत्मनिर्भर भारत’ शब्द का कई बार इस्तेमाल किया। यह आत्मनिर्भर भारत ही दरअसल अपने पैरों पर खड़ा भारत, स्वावलंबी भारत है। जहां अपने जरूरत की चीजें और उनका निर्माण हम कर पाते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ‘वन डिस्ट्रिक वन प्रोडक्ट’ जैसे अभियान के माध्यम से इसे संभव भी कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री जो उदार आर्थिक नीतियों के पक्ष में रहे हैं, अगर आज आत्मनिर्भर भारत को एकमात्र मार्ग बता रहे हैं, तो इसके विशिष्ट अर्थ हैं। यानी अब वह स्थिति है जिसमें भारत एक ग्लोबल लीडर बनने की आतुरता दिखा रहा है। वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने यह भी कहा कि ‘लोकल ने हमें बचाया है, लोकल के लिए वोकल बनिए और यही हमारा जीवन मंत्र होना चाहिए।’ 

कोरोना के वैश्विक संकट ने भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के सामने जैसे प्रश्न खड़े किए हैं, उनके उत्तर हमेशा सकारात्मक नहीं हो सकते। सरकारों और उसके तंत्र को कोसते आए हम लोग अचानक उसकी श्रेष्ठता और जनपक्षधरता का बखान नहीं कर सकते। यह तंत्र जैसा भी है, बना और बनाया गया है। यह जितना भी उपयोगी या अनुपयोगी है, सच यह है कि वही हमारे काम आ रहा है। बहुनिंदित पुलिस, सरकारी डॉक्टर, नर्स, सफाई और स्वच्छता से जुड़ा सरकारी तंत्र ही इस महान संकट में अपनी जान जोखिम में डालकर आपके पास पहुंच रहा है। बावजूद इसके कि हर जगह उनके लिए फूल नहीं बरस रहे। कहीं पत्थर हैं तो कहीं व्यापक असहयोग। आप सोचें कि जिस तरह निजीकरण की अंधी आंधी 1991 से चली और यह लगा कि सरकार का काम स्कूल, अस्पताल और सेवा के तमाम काम करना नहीं है, ये सारे काम तो निजी क्षेत्र में ही गुणवत्ता से संभव हैं। आप कल्पना करें कि अगर यह बुरे और खराब सेवाएं देने वाले सरकारी अस्पताल भी हमारे पास न होते क्या होता?     

हम जानते हैं कि कभी भी नायक उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ते। देश की विशाल आबादी जो अपने संकटों के कारण अब महानगरों से पलायन कर रही है। उसकी उम्मीदें टूट रही हैं और वह किसी भी हाल में अपने गांव या घर पहुंचना चाहती है। ऐसे में सरकारों का दायित्व क्या है? राष्ट्रनायकों का दायित्व क्या है? यही कि वे भरोसे को दरकने न दें। उम्मीदों को टूटने न दें। सपनों को मरने न दें। हमें यह मान लेना चाहिए कि देश की इतनी विशाल आबादी के लिए कोई भी तंत्र या व्यवस्था द्वारा बनाए गए इंतजाम नाकाफी ही साबित होंगे। किंतु जहां जैसे संकट खड़े हो रहे हैं, सरकारें और समाज पीड़ित जनों के साथ खड़े होते ही हैं। सरकारी तंत्र की सबसे बड़ी विफलता है कि उसके प्रति विश्वास खत्म हो चुका है। वे कुछ भी करें, अब वह भरोसा हासिल नहीं कर सकते। यह भरोसा धीरे-धीरे तोड़ा गया है। सरकार, मीडिया, समाज आदि सबने मिलकर सरकारी संस्थाओं, सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, सरकारी सेवाओं से लोगों का भरोसा डिगाया है। सरकारी फोन से लेकर सरकारी पीडीएस की दुकानों की तरफ देखने की हमारी खास दृष्टि है।

आप यह भी देखें कि प्राइवेट विश्वविद्यालय, प्राइवेट फोन कंपनियां, प्राइवेट अस्पताल भी तमाम गलतियां करते हैं पर निशाने पर सरकारी संस्थाएं ही होती हैं। मीडिया के निशाने पर भी सरकारी संस्थाएं ही होती हैं, जैसे निजी क्षेत्र में रामराज्य कायम हो। सरकारों की जड़ता, नीति-नियंताओं की स्वार्थपरता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। अपनी ही संस्थाओं के प्रति सरकारें अनुदार होती गयीं और निजी क्षेत्र पर उनकी कृपा और संवेदना बरसने लगी। किंतु जब संकट आन पड़ा तो वही बहुनिंदित, लापरवाह और कथित तौर पर भ्रष्ट तंत्र ही हमारे काम आया। आज भी नीचे के स्तर पर हमारे सफाई कामगारों, नर्स बहनों से लेकर, सेनिटाइजेशन के काम से जुड़े लोग, पुलिसकर्मियों से लेकर आंगनबाड़ी की बहनों की सेवाओं की ओर देखना चाहिए।

सही मायनों में मोदी सपनों के सौदागर हैं। वे निराश नहीं होते, निराशा नहीं बांटते। अवसाद की परतें तोड़ते हैं और उजास जगाते हैं। वे इसीलिए अपने इस भाषण में एक नायक की तरह बात करते हैं। वे कहते हैं ‘कर्मठता की पराकाष्ठा और कौशल(क्राफ्ट) की पूंजी से ही भारत आत्मनिर्भर बनेगा।’ वे जोड़ते हैं कि मिट्टी की महक से बनेगा नया भारत। हम देखें तो एक नायक तौर पर मोदी संभावनाओं में ही निवेश कर रहे हैं। वे मुख्यमंत्रियों के साथ सतत संवाद कर रहे हैं। उन्हें नेतृत्व दे रहे हैं। अपनी ओर से विविध वर्गों से संवाद कर रहे हैं।

एक लोकतंत्र में संवाद से ही दुनिया बनती और अवसर सृजित होते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि संकट गहरा है, इंतजाम नाकाफी हैं, सेवाएं गुणवत्तापूर्ण नहीं है, रामराज्य अभी भी प्रतीक्षित ही है, ईमानदारी से कर्तव्य निर्वहन करने वालों की संख्या सीमित है। फिर भी हिंदुस्तान का मन मरा नहीं है। अपनी विशाल आबादी, विशाल संकटों के बाद उसका हौसला टूटा नहीं है। उसकी संवेदनाएं मरी नहीं है। हमारे श्रमदेव और श्रमदेवियों की अपार उपेक्षा के बाद भी, हमारे किसानों के लाख संकटों के बाद भी भारत फिर उठ खड़ा होगा और सपनों की ओर दौड़ लगाएगा, भरोसा कीजिए। कोरोना संकट के बाद का भारत एक नई तरह से सोचेगा, व्यवहार करेगा। साथ ही ज्यादा आत्मनिर्भर और ज्यादा समर्थ होगा।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर और कुलसचिव हैं)

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'हैप्पी बर्थडे चित्रा त्रिपाठी, यही खूबियां बनाती हैं आपको दूसरों से खास'

चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं।

Last Modified:
Monday, 11 May, 2020
MALVIKA HARIOM

मालविका हरिओम, कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता।।

उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर गोरखपुर से निकलने वाली एक बड़ी शख्सियत के रूप में चित्रा त्रिपाठी ने न सिर्फ अपने शहर और अपने प्रदेश का ही नाम रोशन किया, बल्कि उन सभी लोगों को गर्व की अनुभूति भी करवाई, जो कभी न कभी, किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े रहे। उनकी मम्मी पढ़ी-लिखी होने के बावजूद तमाम दूसरी भारतीय महिलाओं की तरह घर पर ही रहीं। सिर्फ परिवार को देखा और अपने सपनों को तिलांजलि दे दी, लेकिन वे अपनी बेटी चित्रा में लगातार कुछ अच्छा करने और आगे बढ़ने की ललक को भरती रहीं। यही कारण है कि कुछ अच्छा करने का जज्बा जन्म के साथ ही मां के आशीर्वाद के रूप में चित्रा को मिल गया और फिर उस सफर को देखें तो जिन छोटी जगहों के बच्चे ठीक से शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर पाते, वहां से एक लड़की अपने दम पर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और एक दिन उस ऊंचाई पर पहुंच जाती है, जहां से दुनिया उसे आसानी से देख सके।

सुंदर चेहरा, विनम्र स्वभाव, संवेदनशील हृदय और कुछ कर गुजरने का जज्बा, इन सबको मिलाकर चित्रा की एक ऐसी तस्वीर तैयार होती है जो श्रोताओं और दर्शकों को एक अपनत्व और जुड़ाव का अहसास कराती है। चित्रा सिर्फ रिपोर्टिंग ही नहीं करतीं, बल्कि उसके माध्यम से आम जनता के बीच जाकर उनके दुख-दर्द को टटोलती हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करती हैं। सोशल मीडिया पर उनके भावनात्मक लाइव प्रसारण उनकी सकारात्मक छवि को स्थापित और पुख्ता करते हैं।

आज चित्रा एक सेलिब्रिटी हैं। लेकिन मुझे याद आती है वो प्यारी चित्रा, जिसे मैंने गोरखपुर में उसके संघर्ष के दिनों में देखा था। वहां कई नए लड़के-लड़कियां जो बतौर रिपोर्टर अखबारों में काम करते थे, घर आया करते थे। पतिदेव डॉ. हरिओम उन दिनों जिलाधिकारी गोरखपुर के पद पर तैनात थे और हम दोनों ही चूंकि सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि लेते थे, इसलिए कोई न कोई घर पर इंटरव्यू लेने या बातचीत करने जरूर आ जाता था। इसी सिलसिले में एक दिन चित्रा का भी आना हुआ। लॉन में दो कुर्सियाँ लगाई गईं। उन दिनों वहां एक लोकल चैनल 'सत्या' हुआ करता था। चित्रा उसी में खबरें पढ़ती थीं। सुंदर चेहरा, चमकती आंखें, गर्दन तक कटे हुए छोटे-छोटे बाल, नई उम्र का उत्साह, गज़ब का आत्मविश्वास और कुछ कर गुजरने का जज्बा, ये सबकुछ एकसाथ मुझे उस लड़की में नज़र आया। ज़िलाधिकारी का इंटरव्यू लेने के नाते चित्रा पूरी तैयारी के साथ आई थी। हाथ में ढेर सारे पन्ने, उन पर लिखे हुए सवाल और चेहरे पर हमेशा की तरह एक प्यारी-सी मुस्कुराहट। इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ। चित्रा ने साबित कर दिया कि ख़ूबसूरत चेहरे के साथ-साथ उसमें क़ाबिलियत भी भरपूर है।

फिर एक दिन किसी काम से जब ‘सत्या’ चैनल पर जाना हुआ तो गर्मी के दिनों में दूसरे फ्लोर पर, एक कमरे के छोटे-से स्टूडियो में चित्रा खबरें पढ़ने के लिए तैयार खड़ी थी। गर्मी की वजह से चेहरे पर काफ़ी पसीना आ रहा था। मैंने देखा कि वो खबरों की तैयारी के साथ-साथ, अपने मेकअप का काम भी ख़ुद ही देख रही थी। हम दोनों मिले, थोड़ी-सी बात हुई और उसके बाद वो अपने समाचार प्रसारण की तैयारी में लग गई। मैं देखती ही रह गई कि इतनी छोटी-सी लड़की में कितना आत्मविश्वास है और काम के प्रति कितनी लगन और ईमानदारी है। समाचार पढ़ने में अभी वक़्त था लेकिन चित्रा को खाली बैठना गंवारा नहीं था। वह कुर्सी पर बैठ गयी और समाचार पढ़ने की रिहर्सल करने लगी। जब मैंने उसकी ओर देखा तो वो मुस्कुराई। वो मुस्कुराहट मुझे आज तक याद है।

आज चित्रा मेरी छोटी बहन की तरह है। हम लोग फोन पर बात करते हैं, मिल भी लेते हैं। जब भी उसको देखती हूं तो यही लगता है कि लड़कियां अब किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। अच्छी सोच हो, काम के प्रति निष्ठा हो और कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो छोटे शहरों से आई लड़कियां भी देश-दुनिया की तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा बन सकती हैं। चित्रा ने यह कर दिखाया। आज 'चित्रा त्रिपाठी' सिर्फ़ एक नाम नहीं बल्कि एक 'प्रेरणा' है, उन तमाम लड़कियों के लिए जो न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं बल्कि समाज-दुनिया की बेहतरी के लिए कुछ अच्छा और सकारात्मक भी करना चाहती हैं।

जन्मदिन की अनंत शुभकामनाओं के साथ प्रिय चित्रा के लिए मेरी ये पंक्तियां-

ऊंची लहरों पे चढ़ के आई हूं
मैं जमाने से लड़ के आई हूं
मुफ्त का ज्ञान ना थोपो मुझपर
अपने हिस्से का पढ़ के आई हूं

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