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रामबहादुर राय-पत्रकारिता क्षेत्र में शुचिता और पवित्रता के जीवंत व्यक्तित्व
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के वे शीर्ष नेताओं में थे। जब पत्रकारिता में आए तो शीर्ष पत्रकार बने। आज की भारतीय पत्रकारिता में उन सरीखे सम्मानित और सर्वस्वीकार्य नाम बहुत कम हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 day ago
प्रो.संजय द्विवेदी, संप्रति विभागाध्यक्ष, जनसंचार, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,भोपाल।
कभी जनांदोलनों से जुड़े रहे, पदम भूषण और पद्मश्री सम्मानों से अलंकृत श्री रामबहादुर राय का समूचा जीवन रचना, सृजन और संघर्ष की यात्रा है। उनकी लंबी जीवन यात्रा में सबसे ज्यादा समय उन्होंने पत्रकार के रूप में गुजारा है। इसलिए वे संगठनकर्ता, आंदोलनकारी, संपूर्ण क्रांति के नायक के साथ-साथ महान पत्रकार हैं और लेखक भी। अपने समय के नायकों से निरंतर संवाद और साहचर्य ने उनके लेखन को समृद्ध किया है। हमारे समय में उनकी उपस्थिति ऐसे नायक की उपस्थिति है, जिसके सान्निध्य का सुख हमारे जीवन को शक्ति और लेखन को खुराक देता है।
उनका समावेशी स्वभाव, मानवीय संवेदना से रसपगा व्यक्तित्व भीड़ में उन्हें अलग पहचान देता है। ‘दिल्ली’ में ‘भारत’ को जीने वाले बौद्धिक योद्धा के रूप में पूरा देश उन्हें देखता, सुनता और प्रेरणा लेता है। जिस दौर की पत्रकारिता की प्रामणिकता और विश्वसनीयता पर ढेरों सवाल हों, ऐसे समय में श्री रामबहादुर राय की उपस्थिति हमें आश्वस्त करती है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। सही मायने में उनकी मौजूदगी हिंदी पत्रकारिता की उस परंपरा की याद दिलाती है, जो बाबूराव विष्णुराव पराड़कर से होती हुई राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी तक पहुंचती है।
वे शब्दों की दुनिया में रचे-बसे ऐसे कलमकार हैं, जिनमें आज भी एक आंदोलनकारी, एक सजग नागरिक जिंदा है। वे चीजों को देखकर चुप नहीं रह सकते, इसलिए उनमें वैचारिक और विचारधारात्मक अतिक्रमण भी निरंतर दिखता है। कई बार यह लगता है कि यही ‘हिंदु स्वभाव’ है। समावेशिकता उनका नारा नहीं, स्वभाव है। वे ही हैं जो नरसिंहराव, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, प्रणव मुखर्जी, गोविंदाचार्य से लेकर आज के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे राजनीतिज्ञों और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय तमाम लोगों से संवाद बना सकते हैं। कभी छात्र आंदोलनों के माध्यम से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करनेवाले राय साहब जब पत्रकारिता में आए तो उनका पत्रकार उतना ही महत्वपूर्ण बना।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के वे शीर्ष नेताओं में थे। जब पत्रकारिता में आए तो शीर्ष पत्रकार बने। आज की भारतीय पत्रकारिता में उन सरीखे सम्मानित और सर्वस्वीकार्य नाम बहुत कम हैं। अपने धवल चरित्र, सादगी, साफगोई और अपनी शर्तों पर जीने वाले राय साहब कितनों के प्रेरणापुरुष और मार्गदर्शक हैं, गिनना मुश्किल है। उनकी पत्रकारिता में गहरा एक्टिविज्म दिखता है। वे खुद कहते हैं-“सार्थक पत्रकारिता वही कर सकता है, जिसमें समाज के प्रति सरोकार और विचार हो। जो सो काल्ड प्रोफेशनल जर्नलिस्ट हैं, वे नौकरी करते हैं। हो सकता है अच्छा काम करते हों, लेकिन अपने यहां पत्रकारिता की जो कसौटी है,वह उसमें फिट नहीं बैठते हैं। इसलिए एक पत्रकार को एक्टिविस्ट होना ही चाहिए।”
श्री राय सही मायने में पत्रकारिता क्षेत्र में शुचिता और पवित्रता के जीवंत उदाहरण हैं। वे एक अध्येता, लेखक, दृष्टि संपन्न संपादक, मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में प्रेरक छवि रखते हैं। भारतीय जीवन मूल्यों और पत्रकारिता के उच्च आदर्शों को जीवन में उतारने वाले रामबहादुर राय ने राजनीति के शिखर पुरुषों से रिश्तों के बावजूद कभी कलम को ठिठकने नहीं दिया। उन्होंने वही लिखा और कहा जो उन्हें सच लगा। राय साहब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए, ऐतिहासिक जयप्रकाश आंदोलन के नायकों में रहे। दैनिक 'आज' में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का आंखों देखा वर्णन लिखकर आपने अपनी पत्रकारीय पारी की एक सार्थक शुरुआत की।
युगवार्ता फीचर सेवा, हिन्दुस्तान समाचार संवाद समिति में कार्य करने के बाद आप 'जनसत्ता' से जुड़ गए। 'जनसत्ता' में एक संवाददाता के रूप में कार्य प्रारंभ कर वे उसी संस्थान में मुख्य संवाददाता, समाचार ब्यूरो प्रमुख, संपादक, जनसत्ता समाचार सेवा के पदों पर रहे। आप नवभारत टाइम्स, दिल्ली में विशेष संवाददाता भी रहे। आप देश की अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं जिनमें प्रज्ञा संस्थान, युगवार्ता ट्रस्ट, दशमेश एजुकेशनल चेरिटेबल ट्रस्ट, इंडियन नेशनल कमीशन फॉर यूनेस्को, प्रभाष परंपरा न्यास, भानुप्रताप शुक्ल न्यास के नाम प्रमुख हैं।
जेपी आंदोलन को धार देने वाले रामबहादुर राय ने जयप्रकाश आंदोलन की विरासतों और मूल्यों को बिखरते हुए भी देखा। राजनीतिक मूल्यों का पराभव भी दिल्ली में रहते हुए देखा। किंतु इसका कसैलापन उनमें नहीं है। वे आज भी निराश नहीं हैं। “चैरेवेति.. चैरेवेति यही तो मंत्र है अपना…” उनके जीवन का असल राग है। अपने समय को दर्ज करते हुए उनमें कोई कसैलापन नहीं है। वे आज भी निराश नहीं हैं। बदलाव और परिवर्तन को लेकर उनकी यात्रा अविराम जारी है। वे हर अंधेरे में एक मशाल की तरह नौजवानों को दिशा देते रहते हैं।
आयु के इस मोड़ पर भी उनके विचारों में ताजापन है, नवाचारों को लेकर उत्साह है। मेरे मन में राय साहब की अनेक छवियां हैं। वे एक्टिविस्ट हैं, साफ-कहने और लिखने में भरोसा रखते हैं। रिश्तों को निभाना और उसकी मर्यादा रखना, उन्हें भली-भांति आता है। देश भर में उनको चाहने, मानने वाले और भरोसा करने वाले लोग हैं। वे जाने कब से लोगों से मिल रहे हैं, उनकी सुन रहे हैं और सुना रहे हैं। इतने लंबे समय तक सामाजिक स्वीकृति और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना भी कम नहीं हैं। राय साहब एक साथ नए और पुराने दोनों हैं।
परंपरा को छोड़ते नहीं और नए समय से संवाद करते हैं। राजनीति और राजनेताओं के बहुत निकट रहकर भी उनके विचार बहुत अलग हैं। एक इंटरव्यू में वे कहते हैं-“राजनीति में जाकर अपना कल्याण होता है, जनता का भला नहीं होता। जो लोग बदलाव लाने के लिए राजनीति में गए उनका हश्र सबने देखा है। इस राजनीतिक व्यवस्था की बुनियाद में पार्टी सिस्टम है। हमने संसदीय व्यवस्था को अपनाया है। अगर चुनाव लड़ना है तो पहले पार्टी में शामिल होना होगा। आज की राजनीतिक पार्टियां गिरोह की तरह काम कर रही हैं।” जाहिर है वे राजनीतिक तंत्र की सीमाओं को समझते हैं।
शायद इसलिए वे सीधे राजनीतिक मैदान में उतरने से परहेज करते रहे। जबकि हमें पता है कि उन्हें कई बार लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कहा गया। मीसा कानून के अस्तित्व में आने के बाद वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनकी इस कानून के तहत गिरफ्तारी हुई थी। संघर्ष के पथ पर चलकर ही उन्होंने लोगों का भरोसा पाया है।
राय साहब से मेरी मुलाकात वाराणसी में पहली बार हुई और माध्यम बने मेरे मार्गदर्शक डा. सुरेश अवस्थी। डा. अवस्थी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक थे। वे मेरे स्थानीय अभिभावक सरीखे थे। यारों के यार और बिंदास। सर अब इस दुनिया में नहीं हैं। किंतु उनकी यादें बनारस और बनारस से गुजरे हुए लोगों के दिलों में ताजा हैं।राय साहब और उनकी दोस्ती के क्या कहने। डा. अवस्थी से राय साहब के महान व्यक्तित्व के बहुत सारे पक्ष पता चले। मन में उनके प्रति श्रद्धा पैठ गयी। यह शायद 1993 का साल था।
तब से आजतक राय साहब मेरे लिए श्रद्धाकेंद्र हैं। बाद के दिनों में पत्रकारिता में आने के बाद उनके बारे में प्रायः उनके लेख,विमर्श और आंदोलनों की चर्चा होती। उन दिनों ‘जनसत्ता’ के दिन थे। ‘नवभारत टाइम्स’ के दिन थे। इन दोनों अखबारों से गुजरकर ही हम पत्रकारिता को देखते थे। मध्यप्रदेश में वह जगह ‘नई दुनिया’ की थी। अखबारों में छपने वालों नामों को हम हसरत से देखते। लेकिन इनमें सिर्फ एक नाम था, जिसे हमने सालों पहले से जान लिया था- राय साहब। वे दिल से दिमाग तक आ गए थे। जिसे जानते हैं उसे पढ़ने का सुख विरल है।
राय साहब ऐसे ही थे। फिर एक दिन हमने आदरणीय प्रभाष जी को देखा और सुना भोपाल में। वे राय साहब के संपादक थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं राय साहब को जानता हूं। प्रभाष जी माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से बहुत प्रेम करते थे। विश्वविद्यालय की महापरिषद के सदस्य भी थे। राय साहब का नाम लेकर हम अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान अनेक खास पत्रकारों से मिले और हमें उन्हें जानने के नाते इज्जत मिली। उन-सा होना कठिन है। राजनीति के निकट, सत्ता के निकट रहकर भी इतना निरपेक्ष होना वही सिखाते हैं।
श्री रामबहादुर राय की जीवन यात्रा हमें बताती है जिंदगी कैसे जी सकती है। अपने समय, समाज और राजनीति से संवाद करते हुए वे एक साधक और संत में बदल जाते हैं। विचारों की लोकतांत्रिकता के साथ वे अपनी जड़ों और अपने अधिष्ठान पर जमकर खड़े हैं। वे शतायु हों, देर तक और दूर तक अपने साथ हमें लेकर चलते रहें।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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