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मिस्टर मीडिया: पत्रकारों के खिलाफ आखिर यह किस तरह की मानसिकता है?
केंद्रीय गृह मंत्रालय के पिछले चालीस साल के परिपत्र देखिए। ऐसा लगता है कि सबकी होली जला दी गई है।
राजेश बादल 6 years ago
राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।
मत कहो आकाश में कोहरा घना है/ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है/प्रेस और पब्लिक तो अब इतने मुखर हैं/बात ये है कि नमक रोटी का भोजन बना है/बीहड़ों में छोड़ दो नन्हें चिराग/चेहरा इनका भी तो गुस्से से तना है/(छेड़छाड़ के लिए दुष्यंत कुमार से माफी के साथ)
खतरनाक दौर है। पत्रकारों के साथ सरकारी जुल्म की कथाएं सीमा पार कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में पुलिस बेलगाम दिखाई दे रही है। अनुभव तो यही कहता है कि जब तक लखनऊ से इशारा नहीं होता, तब तक पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं हो सकता। गृहमंत्री आंखें मूंदे हैं और मुख्यमंत्री कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। लगता है कि जैसे पुलिस और प्रशासन ने पत्रकारों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
यूपी में एक पत्रकार बच्चों के मध्यान्ह भोजन की पोल खोलता है तो उसी के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है। विडंबना है कि वह पत्रकार बाकायदा संबंधित अफसरों को बताकर जाता है। उसका विडियो फुटेज उन्हें दिखाता है और उसे ही अपराधी बना दिया जाता है। जिस देश में अगली पीढ़ियों को कुपोषण से मारने की साजिश खुद सरकारी कारिंदे करें, उसका भला कौन करेगा।
इसी राज्य के एक अन्य शहर में कवरेज के लिए गए पत्रकार के कपड़े फाड़ दिए जाते हैं तो तीसरे शहर में पत्रकारों को धरने पर बैठना पड़ जाता है। चौथे शहर में एक पत्रकार के दफ्तर पर दबंग नेताजी ने ताला जड़ दिया और उसकी जान के पीछे पड़े हैं। कसूर यह था कि उसने दबंग नेताजी की करतूतें उजागर की थीं। पांचवें वीआईपी बनारस में प्रेस फोटोग्राफर ने गंगा की सफाई करते बाल श्रमिकों की तस्वीरें निकाली तो कैमरा छीन लिया गया। अब उसे धमकाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश से इस तरह स्थानीय संवाददाताओं को यातनाएं देने की अनेक कहानियां मिल रही हैं। मैंने तो चंद बानगियां पेश की हैं।
देश के अन्य राज्य भी इन दिनों पत्रकारों को सताने के मामले में पीछे नहीं हैं। बिहार के शहर में पुलिस अफसर एक पत्रकार का मोबाइल तोड़कर धमकाता है। बंगाल में एक पुलिस अधिकारी पत्रकार को पीट देता है तो जम्मू-कश्मीर के एक पत्रकार को प्रशिक्षण शिविर के लिए जर्मनी जाने से ठीक पहले एयरपोर्ट पर रोक दिया जाता है। यह किस मानसिकता का नमूना है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के पिछले चालीस साल के परिपत्र देखिए। ऐसा लगता है कि सबकी होली जला दी गई है। अब तो किसी अफसर के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं होती।
याद आ रहा है-चालीस बरस पहले मैं जिला स्तर का संवाददाता था तो जनहित में एक गोपनीय मजिस्ट्रेटी जांच के अंश छापने के कारण सारे पत्रकारों के खिलाफ़ जिला कलेक्टर ( कहीं जिला मजिस्ट्रेट भी कहते हैं) ने अमानवीय उत्पीड़न का सिलसिला हम लोगों के खिलाफ खोल दिया था। हमने विधानसभा में एक तरह से धरना दिया। सात-आठ घंटे बहस चली और भारत में प्रेस को सताए जाने के मामले की पहली ज्यूडीशियल इन्कवायरी हुई। न्यायिक जांच आयोग ने हम पत्रकारों के सारे आरोप सच पाए और प्रशासनिक मशीनरी शर्मसार हुई। सलाम उस दौर के पुलिस अफसरों को, जिन्होंने कलेक्टर के निर्देश पर हम लोगों को गिरफ्तार करने से इनकारकर दिया और जांच आयोग में उनके विरोध में गवाही दी। यही नहीं,उस समय प्रेस काउंसिल ने सुओमोटो ( स्व प्रेरणा से ) जांच दल भेजा। प्रेस काउंसिल ने भी हम सारे पत्रकारों के आरोप सच पाए और हमारे हक में फ़ैसला दिया। बेहद तकलीफ़ होती है यह सोचकर कि वाकई हमने ये दौर देखा है?
अब तो दुष्यंत कुमार की ही याद आती है मिस्टर मीडिया!
चल भई गंगाराम भजन कर
सूखे ताल भरी दोपहरी/प्यासी मारी फिरे टिटहरी/गर्मी गहरी से भी गहरी/सहनी है, चुपचाप सहन कर/
घर के दरवाजों पर पहरा/ जलसों पर नारों पर पहरा/सारे अखबारों पर पहरा/खबरें आतीं हैं छन छनकर/
अपनी कलम उठाकर रख दे/ या इसको फिर इसका हक दे/तनिक सचाई की न झलक दे/सिर्फ़ उजालों का वर्णन कर/
पथ ऐसे सुनसान पड़े हैं/ जैसे लोग यहां लंगड़े हैं/कुछ जो राहें रोक खड़े हैं/हाथ जोड़कर इन्हें नमन कर/
वे जो प्रतिभावान बड़े हैं/उनके साथ बड़े लफड़े हैं/ अंतिम निर्णय का अवसर है/इन प्रश्नों पर आज मनन कर/
मैंने देखा यार निकट से/ कोई त्राण नहीं संकट से/यह सर ऊंचा है चौखट से/और फिर तू चलता है तनकर/ चल भई गंगाराम भजन कर/
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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