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पुण्य प्रसून बाजपेयी बोले, बीजेपी की जीत ने दे दिए हैं भविष्य के ये संकेत

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों का किया विश्लेषण

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

पुण्य प्रसून बाजपेयी, वरिष्ठ पत्रकार।।

न मुद्दे, न उम्मीदवार सिर्फ मोदी सरकार

गुलाब की पंखुडियों से पटी पड़ी जमीन। गेंदा के फूलों से दीवार पर लिखा हुआ धन्यवाद। दरवाजे से लेकर छत तक लड्डू बांटते हाथ। सड़क पर एसयूवी गाड़ियों की कतार और पहली बार पांचवीं मंजिल तक पहुंचने का रास्ता भी खुला हुआ, ये नजारा कल दिल्ली के नये बीजेपी हेडक्वार्टर का था। दीनदयाल मार्ग पर बने इस पांच सितारा हेडक्वार्टर को लेकर कई बार चर्चा यही रही कि दीनदयाल के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की सोच के उलट आखिरी व्यक्ति तो दूर, बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिये हेडक्वार्टर एक ऐसा किला है, जिसमें कोई आसानी से दस्तक दे नहीं सकता, जबकि अशोक रोड के बीजेपी हेडक्वार्टर में तो हर किसी की पहुंच हमेशा से होती रही।

2014 की जीत का नजारा कैसे 2019 में कहीं ज्यादा बड़ी जीत के जश्न के साथ अशोका रोड से दीनदयाल मार्ग में इस तरह तब्दील हो जायेगा कि बीजेपी को समाज का पहला और आखिरी व्यक्ति एक साथ वोट देंगे, ऐसा कभी पहले हुआ नहीं था। ये कभी किसी ने सोचा नहीं होगा कि बहुमत की सरकार दूसरी बार अपने बूते करीब 50 फीसदी वोट के साथ सत्ता में बरकरार रहेगी और सिर्फ चार राज्य छोड़कर (तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश,केरल और पंजाब) हर जगह बीजेपी ऐसी धमक के साथ सत्ता की डोर अपने हाथ रखेगी कि न सिर्फ क्षत्रप बल्कि राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को भी अपनी राजनीति को बदलने या फिर नये सिरे से सोचने की जरूरत पड़ेगी, जबकि देश के सामने सारे मुद्दे बरकरार हैं।

बेरोजगारी, किसान, मजदूर, उत्पादन कुछ इस तरह गहराया हुआ है कि आर्थिक हालात बिगड़े हुये हैं। उस पर घृणा, पाकिस्तान से युद्ध, हिंदू राष्ट्र की सोच और गोडसे को ‘जिंदा’ भी किया गया, लेकिन फिर भी जनादेश के सामने मुद्दे-उम्मीदवार मायने रखे ही नहीं। जातियां टूटती नजर आयीं। उम्मीद और आस हिंदुत्व का चोगा ओढ़कर देशभक्ति व राष्ट्रवाद में इस तरह खोया कि न सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक सोच, बल्कि अतीत की समूची राजनीतिक थ्योरी ही काफूर हो गई।

पश्चिम बंगाल में धर्म को अफीम कहने-मानने वाले वामपंथी वोटर खिसककर धर्म का जाप करने वाली बीजेपी के साथ आ खड़े हुये। जिस तरह 22 फीसदी वामपंथी वोट एकमुश्त बीजेपी के साथ जुड़ गया, उसने तीन संदेश साफ दे दिये। पहला, वामपंथी जमीन पर जब वर्ग संघर्ष के नारे तले काली पूजा मनायी जाती है तो फिर वही काली पूजा, दशहरा और राम की पूजा तले धार्मिक होकर मानने में क्या मुश्किल है। दूसरा, वाम जमीन पर सत्ता विरोध का स्वर हमेशा रहा है। वाम के तेवर-संगठन-पावर खत्म हुआ तो फिर विरोध के लिये बीजेपी के साथ ममता विरोध में जाने से कोई परेशानी है नहीं। तीसरा, मुस्लिम के साथ किसी जाति का कोई साथ न हो तो फिर मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम के हक के सवाल भी मुस्लिमों के एकमुश्त वोट के साथ सत्ता दिला नहीं सकते या फिर सत्ता को चुनौती देने की स्थिति में नहीं आ सकते हैं।

दरअसल, जनादेश तले कुछ सच उभरकर आ गये और कुछ सच छुप भी गये। क्योंकि 2019 का जनादेश इतना स्थूल नहीं है कि उसे सिर्फ मोदी सत्ता की ऐतिहासिक जीत बताकर खामोशी बरती जाये। लालू यादव की गैरमौजूदगी में लालू परिवार के भीतर के झगड़े और महागठबंधन के तौर तरीके ने उस मिथ को तोड़ दिया, जिसमें यादव सिर्फ आरजेडी से बंधा हुआ है और मुस्लिमों को ठौर महागठबंधन में ही मिलेगी, ये मान लिया गया था। चूंकि तेजस्वी, राहुल, मांझी, कुशवाहा, साहनी के एक साथ होने के बावजूद अगर महागठबंधन की हथेली खाली रह गयी तो ये सिर्फ नीतीश-मोदी-पासवान की जीत भर नहीं है, बल्कि सामाजिक समीकरण के बदलने के संकेत भी हैं।

जिस तरह बिहार से सटे यूपी में अखिलेश-मायावती के साथ आने के बावजूद यादव-जाटव तक के वोट ट्रांसफर नहीं हुये, उसने भविष्य के संकेत तो दे ही दिये कि अखिलेश यादव ओबीसी के नेता हो नहीं सकते और मायावती का सामाजिक विस्तार अब सिर्फ जाटव भर है और उसमें भी बिखराव हो रहा है। फिर बीजेपी ने जिस तरह हिंदू राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नाम पर वोट का ध्रुवीकरण किया, उसने भी संकेत उभार दिये कि कांग्रेस जिस तरह सपा-बसपा से अलग होकर ऊंची जातियों के वोट बैंक को बीजेपी से छीनकर अपने अनुकुल करने की सोच रही थी कि जिससे 2022 (यूपी विधानसभा चुनाव) तक उसके लिये जमीन तैयार हो जाये और संगठन खड़ा हो जाये, उसे भारी धक्का लगा है।

जाहिर है बीजेपी और कांग्रेस के लिये भी बड़ा संदेश इस जनादेश में छुपा है। एक तरफ बीजेपी का संकट ये है कि अब वह संगठन वाली पार्टी कम कद्दावर नेता की पहचान के साथ चलने वाली सफल पार्टी के तौर पर ज्यादा है। यानी यहां पर बीजेपी कार्यकर्ता और संघ के स्वयंसेवक की भूमिका भी मोदी के सामने लुप्त सी हो गई। यह वाजपेयी-आडवाणी युग से आगे और बहुत ज्यादा बदली हुई सी पार्टी है, क्योंकि वाजपेयी काल तक नैतिकता का महत्व था। मौरल राजनीति के मायने थे। तभी तो मोदी को भी राजधर्म बताया गया और भ्रष्ट यदुरप्पा को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया। लेकिन मोदी काल में महत्वपूर्ण सिर्फ जीत है, इसलिये महात्मा गांधी का हत्यारा गोडसे भी देशभक्त है और सबसे ज्यादा कालाधन खर्च कर चुनाव जीतने का शाह मंत्र भी मंजूर है।

इसके समानांतर कांग्रेस के लिये संभवतः ये सबसे मुश्किल दौर है, क्योंकि बीजेपी तो मोदी सरीखे लारजर दैन लाइफ वाले नेता को साथ लेकर भी पार्टी के तौर पर लड़ती दिखायी दी, लेकिन कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी होकर भी सिर्फ अपने नेता राहुल गांधी को ही देखकर मंद-मंद खुश होती रही। लड़ सिर्फ राहुल रहे थे। प्रियंका गांधी का जादुई स्पर्श अच्छा लग रहा था, लेकिन कांग्रेस कहीं थी ही नहीं। शायद 2019 के जनादेश में जिस तरह की सफलता जगन रेड्डी को आंध्र प्रदेश में मिली, उसने कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी को भी उभार दिया कि उसे न तो अपनों को सहेजना आता है और न ही राजनीतिक दल के तौर पर संभालना आता है।

एक वक्त ममता भी कांग्रेस से निकलीं और जगन रेड्डी भी कांग्रेस से निकले। दोनों वक्त गांधी परिवार में सिमटी कांग्रेस ने दिल बड़ा नहीं किया, उल्टे अपने ही पुराने नेताओं के सामने कांग्रेस के ऐतिहासिक सफर के अहंकार में खुद को डुबो लिया। जिस मोड़ पर राहुल गांधी ने कांग्रेस संभाली, वह पार्टी को कम, नेताओं को ही ज्यादा तरजीह दे मान बैठे कि नेताओं से कांग्रेस चलेगी। इसी का असर है कि कांग्रेस शासित किसी भी राज्य में नेता को इतनी पावर नहीं कि वह बाकियों को हांक सके। मध्य प्रदेश में कमलनाथ के समानांतर दिग्विजय हों या सिंधिया या फिर राजस्थान में गहलोत हो या पायलट या फिर छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल हों या ताम्रध्वज साहू व टीएस सिंह देव, सभी अपने-अपने तरीके से अपने ही राज्य में कांग्रेस को हांकते रहे।

कार्यकर्ता भी इसे ही देखता रहा कि कौन सा नेता कितना पावरफुल है और किसके साथ खड़ा हुआ जा सकता है या फिर अपनी-अपनी कोटरी में सिमटे कांग्रेसी नेताओं को संघर्ष की जरूरत क्या है। ये सवाल न तो किसी ने जानना चाहा और न किसी ने पूछा। तीन महीने पहले अपने ही जीते राज्य में कांग्रेस की 2014 से भी बुरी गत क्यों हो गई, इसका जवाब कांग्रेसी होने में ही छिपा है, जो मानकर चलते हैं कि वे सत्ता के लिये ही बने हैं।

आखिरी सवाल है,  इस जनादेश के बाद होगा क्या? क्योंकि देश न तो विज्ञान को मान रहा है। न ही विकास को समझ सका। न ही सच जानना चाह रहा है। न ही प्रेम या सौहार्द उसकी रगों में दौड़ रहा है। वह तो हिंदू होकर, देशभक्त बनकर कुछ ऐसा करने पर आमादा है, जहां शिक्षा-स्वास्थ्य-पानी-पर्यावरण बेमानी से लगे। देश का प्रधानमंत्री उस राजा की तरह नजर आये, जिसे जनता की फिक्र इतनी है कि वह दुश्मन के घर में घुसकर वार करने की ताकत रखता हो। राजा किसी देवता सरीखा नजर आये, जहां संविधान, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग भी बेमानी हो जाये, क्योंकि तीन महीने पहले ‘इस बार 300 पार’ का ऐलान करते हुये तीन महीने बाद तीन सौ पार कर देना किसी पीएम के लिये चाहे मुश्किल हो, लेकिन किसी राजा या देवता के लिये कतई मुश्किल नहीं है।

साभार: http://prasunbajpai.itzmyblog.com/


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