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सलिल सरोज का बड़ा सवाल, क्या वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने गणतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि गणतंत्र लोगों का लोगों के लिए लोगों के द्वारा किया जाने वाला शासन है अर्थात अंत:रूप में जनता ही सर्वोपरि होती है। जिस शासक को शासन करने के लिए चुना जाता है, वह अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके तानाशह न बन जाए,इसलिए उसको चुनने और उसको हटाने की सारी संभावनाओं को जनता के हाथ में सौंपा गया है। अब्राहम लिंकन ने यह कथन अमेरिका के सन्दर्भ में जरूर कहा था, लेकिन दुनिया के तमाम देशों ने कतिपय इसी रूप में इसे अपनाया है । भारत और अमेरिका के बीच भाषा,संस्कृति,समाज समेत और भी कई तरह की असमानताएं हैं, लेकिन अमेरिका और भारत दोनों ही गणतंत्र की मजबूत नींव को पकड़कर आगे बढ़ रहे हैं और दूसरे राष्ट्रों को भी गणतंत्र होने के लिए सम्बल प्रदान कर रहे हैं।
भारतीय गणतंत्र को अभी आठ दशक से भी कम समय हुआ है, लेकिन इस समय अवधि में भारत के कई पड़ोसी मुल्क जैसे कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान, म्यांमार धार्मिक हिंसा, तानाशाही, जातीय नरसंहार या वंशवाद से अभिशप्त हो गए, लेकिन भारत एक जिम्मेदार गणतंत्र के रूप में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता ही चला गया। आखिर भारत ने भी इंग्लैंड से ही प्रेरित गणतंत्र को अपनाया, लेकिन किस तरह अपनाया कि यह विश्व के सबसे विशाल और सुदृढ़ गणतंत्र के रूप में परिणत हुआ, यह अवश्य जानकारी का विषय है। इसे बनाने में हमारे पूर्वजों और स्वतंत्रता सेनानियों ने किन बातों का ध्यान रखा, इसका अध्ययन परम आवश्यक है।
सन् 1929 के दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्तयोपनिवेश (डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित इकाई बन जाता, तो भारत अपने को पूर्णतः स्वतंत्र घोषित कर देगा। 26 जनवरी 1930 तक जब अंग्रेज सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा।
इसके पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। भारत के आजाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। संविधान निर्माण में कुल 22 समितियां थीं, जिनमें प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समिति थी और इस समिति का कार्य संपूर्ण ‘संविधान लिखना’ या ‘निर्माण करना’ था। प्रारूप समिति के अध्यक्ष विधिवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। प्रारूप समिति ने और उसमें विशेष रूप से डॉ. आंबेडकर ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण किया और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को 26 नवम्बर 1949 को भारत का संविधान सुपुर्द किया। इसलिए 26 नवम्बर को भारत में संविधान दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है।
संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के 308 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किये। इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को यह देश भर में लागू हो गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई।
भारत अपार संभावनाओं से परिपूर्ण राष्ट्र है और इसकी सबसे बड़ी शक्ति है इसकी विभिन्नता। यहां हर तरह के लोगों ने इस देश को विश्व में एक मुकम्मल गणतंत्र बनने में मदद की है। यह जमीन गौतम बुद्ध,महावीर,गुरु नानक,भीकाजी कामा,हेनरी लुइस विवियन दरोज़ीयो, महात्मा गांधी, वीर कुंवर सिंह, भगत सिंह, मौलाना अबुल कलाम, खां अब्दुल गफ्फार खां के द्वारा पाली और पोसी गई है। इसकी हवाओं में अनेकता में एकता का राग घुला है और हर विषम परिस्थिति में यह चीज रामबाण की तरह साबित हुई है। चाहे वह 1971 का पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध हो,चाहे भूख से निजात पाने की कोशिश हो,चाहे उत्तर पूर्व में अपनी अस्मिता को बचाने की चाह हो, चाहे बारिश से डूबते हुए चेन्नई और मुंबई की जनता की जान बचाने की गुहार हो या फिर निर्भया को इन्साफ दिलाने की अदम्य इच्छाशक्ति हो,हर बार हर जाति,धर्म,लिंग,प्रान्त,समुदाय के लोगों ने मिलकर यह जिम्मा उठाया है।
‘यूनान,मिश्र,रोमां सब मिट गए जहां से
बाकी मगर है फिर भी नामों-निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा।।’
आजादी के 73 सालों में हम खाद्य सम्पन्न राष्ट्र बने और दूसरे देशों को आज भुखमरी से निजात दिलाने में मदद कर रहे हैं। आज हम विश्व में इसरो जैसे संस्था के पुरोधा है दूसरे देशों के कृत्रिम उपग्रह छोड़ने में मदद पहुंचा रहे हैं। पूरे विश्व के लिए हम सबसे युवा और सस्ता वर्क फोर्स दे रहे हैं और पूरी दुनिया भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर, सॉफ्टवेयर टेक्निशियंस का लोहा मानती है। पूरे विश्व में एम्स, आईआईएम, आईआईटी ने भारत को एक ब्रैंड के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपनी कार्यशैली में बेहतरीन हैं। हमारी साक्षरता दर लगभग आजादी के समय की तिगुनी हो गई है। लोगों के जीवन स्तर में आमूल परिवर्तन हुआ है। हम प्राकृतिक संसाधन से परिपूर्ण राष्ट्र बन कर उभरे है। हम सबसे कम ऊष्मा उत्सर्जन और सबसे अधिक वन संरक्षण करने वालों देशों में शामिल होते हैं। दक्षिण अमेरिका,अफ्रीका,एशिया सहित हम विश्व के तमाम फोरम पर आज अगुवाई कर रहे हैं। जिस राष्ट्र की कल्पना महान देशप्रेमियों ने की थी, उसकी तरफ इंच दर इंच बढ़ते जा रहे हैं। परन्तु क्या यह सब आत्ममुग्धता के सिवाय कुछ भी नहीं है!
‘कहां तो तय था चिरागां हर घर के लिए,
पर आज रोशनी मयस्सर नहीं पूरे शहर के लिए।’
इतनी तरक्कियों के वाबजूद एक बहुत बड़ा भाग हर रात खाली पेट फुटपाथों पर सोने को बाध्य है। जवान पढ़े-लिखे बच्चे अपनी काबिलियत के अनुसार काम पाने को भटक रहे हैं। देश के कुछ समुदाय डर के साये में जीने को विवश हैं। स्वास्थ्य के नाम पर सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। सरकारी नियमों के नाम पर जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। वोट के नाम पर हर तरह के दुराचार फैलाए जा रहे है। 70 साल बाद भी चुनाव का मुद्दा रोटी,कपड़ा और मकान ही दिखता है। औरतों के प्रति बढ़ती हिंसा के कारण देश की राजधानी दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ की संज्ञा तक दे दी गई है। हमारे जल,जंगल,जमीन,हवा सब प्रदूषित हो चुके हैं। हम आज भी बाह्य आडम्बर से ज्यादा दूर नहीं निकल पाए हैं और रोज किसी ढोंगी साधु के पकड़े जाने की खबर पढ़ते हैं। हमारे बुजुर्ग एकाकी जीवन बिताने को संघर्षरत हैं। बच्चियां आज भी अपने हक के लिए बिलख रही हैं। हमारे अच्छे फल, फूल, सब्जी, कपड़े, पानी, पेट्रोल सब दूसरे राष्ट्र को निर्यात किए जाते हैं और हम अपने देश में ही द्वितीय नागरिक की तरह खराब और बचे-खुचे हुए सामान पाने की कतार में खड़े हैं। तो आखिर हम हैं कहां? क्या इस दिन के सपने देखे गए थे? क्या हमारे वीर सपूतों ने इसी आशा में खून बहाया था?
‘उतरा कहां स्वराज, बोल दिल्ली तू क्या कहती है
तू तो रानी बन गई,वेदना जनता क्यों सह्ती है
किसने किसके भाग्य दबा रखे हैं अपने कर में
उतरी थी जो विभा वन्दिनी,बोल हुई किस घर में’
एक गणतंत्र के रूप में हमने जितना हासिल किया है, अभी उससे ज्यादा हासिल करना बाकी है। राष्ट्र का निर्माण केवल गगनचुंबी मीनारों से नहीं होता, बल्कि देश के हर नागरिक की चाहतों की पूर्ति से होता है। हर एक को खुश रख पाना किसी के लिए सम्भव नहीं, लेकिन गणतंत्र संख्या का खेल है। यदि अधिकतम जनसंख्या की बातों को लेकर एक सहमति बनाई जा सकती है तो वास्तविकता में वही गणतंत्र की जीत है। सरकार हर तौर पर कई फैसले ले रही है, जो जनता की भलाई और इस राष्ट्र के उत्थान के लिए हैं। जनता को अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करना चाहिए।
‘हम ने बहुत सोच-समझ और देख-भाल के रखा है
अपने सीने में हमने गणतंत्र को पाल के रखा है।’
परिस्थितियां कितनी भी कठिन रही हों, भारतीय गणतंत्र ध्रुव तारे की तरह अटल रहा है। इसकी शास्वतता का कारण लोगों के दिलों में इस तंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है। जब तक यह विश्वास बना रह्ता है, इसको कोई भी हिला नहीं सकता। इस विश्वास को बनाए रखने की जिम्मेदारी सरकार और जनता दोनों की है और इसका मूल मंत्र बस एक है-
‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,
हम बुलबुले हैं इसकी, ये गुलिस्तां हमारा।’
(लेखक लोकसभा सचिवालय में कार्यकारी अधिकारी हैं)
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