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'सरकारें चाहतीं तो दूरदर्शन को 'वॉइस ऑफ अमेरिका' की तरह बना दिया जाता, लेकिन...'
बहुत पुरानी कहावत है- 'दुल्हन बड़ी प्यारी, लेकिन चौके में मत आना'। इन दिनों समाज, राजनीतिक-आर्थिक मंचों और मीडिया में इसी तरह के तर्क गंभीरता से उठ रहे हैं।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार।।
बहुत पुरानी कहावत है- 'दुल्हन बड़ी प्यारी, लेकिन चौके में मत आना'। इन दिनों समाज, राजनीतिक-आर्थिक मंचों और मीडिया में इसी तरह के तर्क गंभीरता से उठ रहे हैं। इसे स्वतंत्रता, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति के अधिकारों और स्वायत्तता पर सरकार के हस्तक्षेप के मुद्दे की तरह उठाया जा रहा है। मतलब यह कि अधिकतम पूंजी, वार्षिक बजट और हर संभव मदद सरकार के खजाने से मिले, लेकिन खर्च, प्रशासनिक अधिकार, संस्थान की गतिविधियों पर सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं हो। जब मूलभूत प्रावधान ही स्वायत्तता का है, तो कोई शक नहीं कि उसके दैनंदिन कामकाज में सरकार को पूरी छूट देनी चाहिए।
पेंच यह है कि जब सरकार की नीतियां और किसी संस्थान की मनमानी से संपूर्ण व्यवस्था ही प्रभावित होने लगे और संसद-विधान सभा में जवाबदेही की जिम्मेदारी हो तो क्या किया जाए? सरकारी खजाना किसी पार्टी या सत्ता में बैठे नेताओं का निजी नहीं होता, क्योंकि वह हमारे-आपके जैसे सामान्य करदाताओं द्वारा दी गई राशि से भरता है। मतलब, जनता के धन को किसी के मनमाने दुरुपयोग की छूट नहीं दी जानी चाहिए।
इन दिनों प्रसार भारती और समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के बीच सेवा शर्तों एवं भारी धनराशि के लेनदेन पर विवाद चर्चा में है। दोनों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता को लेकर केंद्र सरकार को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कभी आंच नहीं आनी चाहिए, लेकिन उसकी कोई लक्ष्मण रेखा है या नहीं? प्रसार भारती को भारत सरकार के खजाने से ही पूरा बजट मिलता है। शीर्ष संवैधानिक पदों पर सरकार ही नहीं, उप राष्ट्रपति और राष्ट्रपति तक की स्वीकृति ली जाती है। आकाशवाणी और दूरदर्शन के प्रसारण को लेकर संसद में सवालों के उत्तर सूचना प्रसारण मंत्री को देने पड़ते हैं। प्रसार भारती की स्थापना देश में कोई निजी टीवी चैनल नहीं होने और प्रसारण सेवा को पूरी तरह सरकारी व्यवस्था से अलग रखने के उद्देश्य से स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी। अब सैकड़ों विकल्प आने के बाद यदि सरकारें चाहतीं तो आकाशवाणी-दूरदर्शन को वॉइस ऑफ अमेरिका की तरह सरकारी बना दिया जाता, लेकिन उदार दृष्टिकोण अपनाकर थोड़ा पर्दा रखकर सरकार अपने ढंग से इसका उपयोग करती रही हैं।
इसी तरह प्रेस ट्रस्ट के लिए प्रसार भारती एक ग्राहक है और सर्वाधिक कमाई (लगभग आठ-नौ करोड़ रुपए सालाना) देने वाला संस्थान। भारत-चीन सीमा पर हाल में हुए सैन्य टकराव के समय एजेंसी की कुछ खबरों को लेकर भारत की किरकिरी होने से सरकार और प्रसार भारती को कष्ट होना स्वाभाविक था। संभव है पहले भी ऐसी कुछ खबरें रही हों या समाचार एजेंसी समुचित सेवा नहीं दे पा रही हो। इसलिए राष्ट्रहित के प्रतिकूल समाचार देने पर आपत्ति के साथ प्रसार भारती ने केवल चेतावनी दी कि इस तरह के रवैये पर एजेंसी की सेवाएं बंद करने पर विचार किया जा सकता है।
मात्र चेतावनी को समाचार एजेंसी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विवादस्पद मुद्दा बना दिया गया। सरकार न भी हो, क्या कोई भी गैर सरकारी व्यावसायिक संस्थान अपने व्यापक हितों पर कुठाराघात करने वाले समाचार प्रसारित करने वाली किसी एजेंसी को करोड़ों रुपया देना उचित समझेगा। फिर यहां तो चीन के भारत विरोधी दुष्प्रचार में भागीदारी का गंभीर मामला था। तर्क दिया गया कि पत्रकारिता में दोनों पक्ष रखे जाते हैं, लेकिन देश की जनता के धन से दूसरे पक्ष के नाम पर झूठी बातें दुनिया में फैलाने की छूट कैसे दी जा सकती है?
प्रेस ट्रस्ट की स्थापना ही विदेशी समाचार एजेंसियों के अपने पूर्वाग्रहों और स्वार्थों से बचाकर भारत के हितों की रक्षा करने वाली गैर सरकारी लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के अधिकाधिक सहयोग तथा सेवा लेने के लिए भी अधिक धनराशि देकर की गई थी।राज्य सरकारें भी संचार सेवा लेकर मोटा भुगतान करती हैं। एजेंसी के प्रबंधन में भारत के समाचार पत्र समूहों के मालिक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की प्रमुख भूमिका है। इसे उनके सहकारी संगठन की तरह माना जाता है। मजेदार बात यह है कि हाल के वर्षों में कई मीडिया संस्थान एजेंसी की सेवा तक लेना बंद करने लगे हैं। सेवा के बदले दिए जाने वाले भुगतान में भी भाव ताव चलता रहता है।फिर स्वतंत्र सहकारी संस्थान होते हुए सरकारी जमीन पर इमारत से अच्छी कमाई के बावजूद लीज की शर्तों पर वर्षों का बकाया मांगने को जुल्म, हस्तक्षेप कहकर अभिव्यक्ति का मुद्दा उठाना क्या उचित है?
मैंने स्वयं लगभग पांच वर्षों ( 1971 से 1975) तक हिंदी और भारतीय भाषाओं की समाचार एजेंसी में काम किया है। इसलिए यह जनता हूं कि अधिकृत समाचारों के लिए सरकारी स्रोतों पर निर्भर रहना होता है। यही नहीं उस एजेंसी का प्रबंधन कांग्रेस सरकार और पार्टी से विपरीत विचार रखने वाले लोगों और संपादकों के हाथ में था, तब भी अखबारों से अधिक केंद्र या राज्य सरकारों से मिलने वाले धन से खर्च चलता था। तब यह देखकर कुछ आश्चर्य सा होता था कि प्रेस ट्रस्ट के संवाददाता बनने के लिए स्टेनोग्राफर होना योग्यता की सबसे प्रमुख शर्त मानी जाती थी। इसलिए दक्षिण या पूर्वी भारत के लोग अधिक नियुक्त हो जाते थे। उत्तर भारतियों की संख्या कम होती थी। भारत सरकार के साउथ या नार्थ ब्लॉक के महत्वपूर्ण मंत्रालयों में बैठे या मंत्री एजेंसी के वरिष्ठ संवाददाता या संपादक को बुलाकर डिक्टेशन की तरह खबर लिखवा देते थे।
कुछ प्रादेशिक राजधानियों में तो मैंने देखा था कि शीर्ष नेता या अधिकारी एजेंसी और अखबार के प्रतिनिधियों को डेटलाइन सहित खबर लिखवा देते थे। शायद इसी सरकारी प्रभाव को काम करने के लिए कुलदीप नायर जैसे अनुभवी वरिष्ठ संपादक के नेतृत्व में यूनाइटेड न्यूज एजेंसी शुरू की गई। कई वर्षों तक इसने प्रेस ट्रस्ट का एक हद तक मुकाबला भी किया। लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों से उसे उतना आर्थिक सहयोग अथवा प्रश्रय नहीं मिला। इसलिए हाल के वर्षों में उसकी आर्थिक दशा खराब है।
जहां तक स्वतंत्रता की बात है, चीन या रूस की ही नहीं पश्चिमी देशों की प्रमुख समाचार एजेंसियों में विश्व युद्ध के दौर से अब तक अंतरराष्ट्रीय समाचारों विचारों के लिए अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों के व्यापक हितों को सर्वाधिक प्राथमिकता मिलती है। इस तथ्य के भी प्रमाण रहे है कि इन विदेशी समाचार एजेंसियों में उन देशों के चुनिंदा गुप्तचर भी संवाददाता बनाकर भेजे जाते रहे हैं। मतलब यह कि सारी स्वतंत्रता के बावजूद हर देश के अपने हित सर्वोपरि होते हैं। तो क्या भारत अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों और सही मायने में संवैधानिक स्वतंत्रता को ताक पर रखकर विदेशी दुष्प्रचार के लिए अपने ही संसाधन सौंप दे? यह मुद्दा केवल प्रसार भारती, सरकार और एक एजेंसी के लिए नहीं, सरकारी खजाने पर निर्भर अन्य स्वायत्त संस्थानों पर भी लागू होता है।
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