'जी टीवी' ने की बड़ी घोषणा: लौट रहा है लोकप्रिय शो ‘सा रे गा मा पा’

'ज़ी टीवी' (Zee TV) ने अपने लोकप्रिय सिंगिंग रियलिटी शो ‘सा रे गा मा पा’ (Sa Re Ga Ma Pa) के नए सीजन की घोषणा की है। देश के 12 शहरों में ऑडिशन आयोजित किए जाएंगे।

Last Modified:
Friday, 19 June, 2026
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'ज़ी टीवी' (Zee TV) ने अपने प्रतिष्ठित सिंगिंग रियलिटी शो ‘सा रे गा मा पा’ (Sa Re Ga Ma Pa) के नए सीजन की घोषणा कर दी है। चैनल ने बताया है कि आगामी सीजन के लिए देशभर के 12 शहरों में ऑडिशन आयोजित किए जाएंगे, जहां उभरते गायक अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्राप्त कर सकेंगे।

वर्षों से ‘सा रे गा मा पा’ (Sa Re Ga Ma Pa) भारतीय संगीत जगत के सबसे लोकप्रिय रियलिटी शोज़ में गिना जाता रहा है। इस मंच ने 'श्रेया घोषाल' (Shreya Ghoshal), 'शेखर रवजियानी' (Shekhar Ravjiani) और 'कुणाल गांजावाला' (Kunal Ganjawala) जैसे कई प्रसिद्ध गायकों को पहचान दिलाई है।

चैनल के अनुसार, नए सीजन में संगीत और प्रस्तुति के स्तर को और भव्य बनाया जाएगा। इसके लिए बड़े मंच, विस्तारित प्रोडक्शन सेटअप और कॉन्सर्ट जैसी प्रस्तुति शैली को शामिल किया गया है। शो में 100 से अधिक लाइव संगीतकार, गायक और वादक एक साथ प्रस्तुति देंगे, जिससे दर्शकों को अधिक प्रभावशाली संगीत अनुभव मिल सकेगा।

ऑडिशन दिल्ली, मुंबई, जयपुर, चंडीगढ़, नागपुर, इंदौर, कोलकाता, गुवाहाटी, अहमदाबाद, बेंगलुरु, लखनऊ और वाराणसी में आयोजित किए जाएंगे। इससे देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्रतिभाशाली गायकों को मंच तक पहुंचने का मौका मिलेगा।

'ज़ी टीवी' (Zee TV) का मानना है कि नया सीजन न केवल शो की विरासत को आगे बढ़ाएगा, बल्कि देश के अगले बड़े सिंगिंग स्टार की खोज में भी अहम भूमिका निभाएगा।

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रिपब्लिक वर्ल्ड से जुड़ीं निशा शर्मा : बनीं डिप्टी जनरल मैनेजर–टीवी एड सेल्स

निशा शर्मा (Nisha Sharma) ने रिपब्लिक वर्ल्ड (Republic World) में Deputy General Manager -TV Ad Sales की जिम्मेदारी संभाली है। वह टेलीविजन विज्ञापन बिक्री का नेतृत्व करेंगी।

Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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रिपब्लिक वर्ल्ड (Republic World) ने निशा शर्मा (Nisha Sharma) को डिप्टी जनरल मैनेजर–टीवी एड सेल्स, रिपब्लिक टीवी (Deputy General Manager – TV Ad Sales, Republic TV) नियुक्त किया है। निशा ने कंपनी में अपनी नई भूमिका जॉइन कर ली है और अब वह रिपब्लिक टीवी के विज्ञापन बिक्री कारोबार को मजबूत करने की जिम्मेदारी संभालेंगी।

निशा शर्मा के पास टेलीविजन विज्ञापन बिक्री (TV Advertising Sales), बिजनेस डेवलपमेंट (Business Development), रणनीतिक क्लाइंट पार्टनरशिप (Strategic Client Partnerships) और रेवेन्यू जनरेशन (Revenue Generation) का व्यापक अनुभव है। नई भूमिका में उनका फोकस विज्ञापन कारोबार को आगे बढ़ाने, क्लाइंट रिलेशनशिप मजबूत करने और नए कारोबारी अवसर विकसित करने पर रहेगा।

रिपब्लिक वर्ल्ड से पहले निशा शर्मा ने एनडीटीवी (NDTV), टीवी टुडे नेटवर्क (TV Today Network), जी मीडिया (Zee Media) और रेडियो टुडे (Radio Today) जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। इन भूमिकाओं के दौरान उन्होंने विज्ञापन राजस्व बढ़ाने, क्लाइंट संबंध मजबूत करने और प्रभावी मीडिया सॉल्यूशंस तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रिपब्लिक वर्ल्ड ने निशा शर्मा का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि उनका अनुभव और नेतृत्व क्षमता रिपब्लिक टीवी के टीवी एड सेल्स कारोबार को मजबूत करने और कंपनी की आगे की ग्रोथ में योगदान देगा।

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Sun TV Network का बड़ा ऐलान, 12 अगस्त को अंतरिम डिविडेंड पर बोर्ड की बैठक

साउथ इंडिया की प्रमुख मीडिया कंपनी Sun TV Network Limited ने वित्त वर्ष 2026-27 के पहले अंतरिम डिविडेंड (First Interim Dividend) को लेकर अहम जानकारी शेयर की है

Last Modified:
Saturday, 08 August, 2026
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साउथ इंडिया की प्रमुख मीडिया कंपनी सन टीवी नेटवर्क (Sun TV Network Limited) ने वित्त वर्ष 2026-27 के पहले अंतरिम डिविडेंड (First Interim Dividend) को लेकर अहम जानकारी शेयर की है। कंपनी ने शेयर बाजार को दी गई सूचना में बताया है कि अगर बोर्ड अंतरिम डिविडेंड को मंजूरी देता है, तो इसके लिए 18 अगस्त 2026 (मंगलवार) को रिकॉर्ड डेट तय की गई है।

कंपनी ने बताया कि 12 अगस्त 2026 (बुधवार) को होने वाली बोर्ड बैठक में पहले अंतरिम डिविडेंड पर विचार किया जाएगा। यदि इस बैठक में डिविडेंड घोषित किया जाता है, तो जिन निवेशकों के नाम 18 अगस्त तक कंपनी के रिकॉर्ड में होंगे, वे इस डिविडेंड के हकदार होंगे।

सन टीवी नेटवर्क ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर अंतरिम डिविडेंड घोषित होता है, तो कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुसार इसका भुगतान घोषणा की तारीख से 30 दिनों के भीतर कर दिया जाएगा।

कंपनी ने यह जानकारी सेबी (SEBI) के लिस्टिंग नियमों के तहत बीएसई और एनएसई को भेजी है। फिलहाल निवेशकों की नजर 12 अगस्त को होने वाली बोर्ड बैठक पर रहेगी, जहां अंतरिम डिविडेंड को लेकर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

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रिपब्लिक बांग्ला में स्वर्णाली सरकार व सुभ्रांग्शु चटर्जी का हुआ प्रमोशन

कंपनी के मुताबिक, दोनों वरिष्ठ पत्रकार अब संयुक्त रूप से रिपब्लिक बांग्ला के पूरे एडिटोरियल ऑपरेशन की कमान संभालेंगे।

Last Modified:
Friday, 07 August, 2026
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रिपब्लिक बांग्ला ने अपने एडिटोरियल विभाग में बड़ा नेतृत्व बदलाव किया है। चैनल ने घोषणा की है कि स्वर्णाली सरकार (Swarnali Sarkar) और सुभ्रांग्शु चटर्जी (Subhrangshu Chatterjee) को तत्काल प्रभाव से एग्जिक्यूटिव एडिटर नियुक्त किया गया है।

कंपनी के मुताबिक, दोनों वरिष्ठ पत्रकार अब संयुक्त रूप से रिपब्लिक बांग्ला के पूरे एडिटोरियल ऑपरेशन की कमान संभालेंगे। डेस्क, रिपोर्टर्स, एंकर्स, गेस्ट रिलेशंस, डिजिटल टीम और अन्य सभी एडिटोरियल विभाग व उनसे जुड़े प्रोजेक्ट्स अब इन्हीं के नेतृत्व में काम करेंगे।

रिपब्लिक बांग्ला ने कहा कि स्वर्णाली सरकार और सुभ्रांग्शु चटर्जी ने अब तक चैनल की सफलता में अहम योगदान दिया है। नई जिम्मेदारी में दोनों मिलकर एडिटोरियल गुणवत्ता को और मजबूत करेंगे, टीमों के बीच बेहतर तालमेल बनाएंगे और चैनल के अगले विकास चरण को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

कंपनी ने सभी कर्मचारियों से अपील की है कि वे नए नेतृत्व को पूरा सहयोग दें और साझेदारी की भावना के साथ काम करते हुए रिपब्लिक बांग्ला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में योगदान दें।

इस घोषणा के साथ रिपब्लिक बांग्ला ने स्वर्णाली सरकार और सुभ्रांग्शु चटर्जी को उनके प्रमोशन पर बधाई देते हुए कहा कि पूरा संगठन एक टीम और एक विजन के साथ आगे बढ़ते हुए दर्शकों पर और अधिक प्रभाव छोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

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रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क से मयूख रंजन घोष का इस्तीफा, बोले- अब कुछ अपना बनाने का वक्त

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के वरिष्ठ पत्रकार और सीनियर एडिटर एवं हेड ऑफ इनपुट, सीनियर एंकर (रिपब्लिक बांग्ला) मयूख रंजन घोष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

Last Modified:
Friday, 07 August, 2026
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रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के वरिष्ठ पत्रकार और सीनियर एडिटर एवं हेड ऑफ इनपुट, सीनियर एंकर (रिपब्लिक बांग्ला) मयूख रंजन घोष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वह पिछले करीब छह वर्षों से रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के साथ जुड़े हुए थे।

मयूख रंजन घोष ने अपने इस्तीफे की जानकारी सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट के जरिए साझा की। उन्होंने लिखा कि हर सार्थक सफर एक दिन खत्म होता है, इसलिए नहीं कि कुछ गलत है, बल्कि इसलिए कि जिंदगी एक नई दिशा की ओर बुला रही होती है।

उन्होंने कहा कि साल 2021 के बाद उनका पेशेवर सफर किसी रोलर-कोस्टर राइड से कम नहीं रहा। इस दौरान उन्होंने बंगाली हिंदुओं की आवाज उठाने और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों पर काम करने की बात कही। उन्होंने लिखा कि इस यात्रा में उन्होंने बहुत कुछ सीखा, खुद को बेहतर बनाया, कई बार गिरे लेकिन फिर संभलकर आगे बढ़े।

मयूख ने कहा कि अब उन्हें महसूस हो रहा है कि कुछ अपना बनाने का समय आ गया है। उन्होंने स्वीकार किया कि इस नए सफर में सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी, नुकसान और चुनौतियों का सामना भी करना पड़ सकता है, लेकिन उन्हें अनिश्चितता से डर नहीं लगता।

उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि जोखिम से ज्यादा उन्हें ठहराव का डर है। उन्होंने फिल्म 'द डार्क नाइट' के जोकर का एक मशहूर संवाद भी साझा किया और कहा कि कई बार विकास वहीं से शुरू होता है, जहां आराम का दायरा खत्म होता है।

मयूख रंजन घोष ने बताया कि वह कुछ समय के लिए ब्रेक लेकर यात्रा करेंगे। इसके बाद नए विचारों और नई ऊर्जा के साथ वापसी करेंगे। उन्होंने कहा कि जब वह लौटेंगे तो शायद ज्यादा सफल होंगे, शायद चुनौतियों के निशान साथ होंगे, लेकिन पहले से अधिक समझदार होंगे।

करीब 14 वर्षों के अपने पत्रकारिता करियर में मयूख रंजन घोष ने प्राइम टाइम एंकर, न्यूज एडिटर, मैनेजर और कंटेंट क्रिएटर के तौर पर काम किया है। रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क से पहले वह News18 Bangla, Times Network, ABP News और Star News जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से भी जुड़े रहे हैं।

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शेमारू को मिला MIB का ग्रीन सिग्नल, जल्द लॉन्च होगा नया हिंदी चैनल 'Mango TV'

शेमारू एंटरटेनमेंट (Shemaroo Entertainment Ltd) को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) से नए हिंदी टीवी चैनल 'Mango TV' के संचालन की मंजूरी मिल गई है।

Last Modified:
Friday, 07 August, 2026
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शेमारू एंटरटेनमेंट (Shemaroo Entertainment Ltd) को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) से नए हिंदी टीवी चैनल 'Mango TV' के संचालन की मंजूरी मिल गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी को इस चैनल के लिए अपलिंकिंग (Uplinking) और डाउनलिंकिंग (Downlinking) दोनों की अनुमति प्रदान की गई है।

रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि मंत्रालय की ओर से दी गई मंजूरी के अनुसार, Mango TV एक नॉन-न्यूज (Non-News) व करंट अफेयर्स कैटेगरी से बाहर का हिंदी चैनल होगा। इसका प्रसारण भारतीय उपग्रह GSAT-30 के जरिए किया जाएगा।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह लाइसेंस शेमारू Entertainment Limited के कॉर्पोरेट आइडेंटिटी नंबर (CIN) L67190MH2005PLC158288 के तहत जारी किया गया है।

मंत्रालय के दस्तावेजों में कंपनी के निदेशकों के रूप में सुनील बंसल, सीए रीता भारत शाह, जय मारू, हिरेन गडा, अतुल एच. मारू, रमन एच. मारू, अब्बास इस्माइल कॉन्ट्रैक्टर, राजेन हेमचंद गडा और कश्मीरा देढिया के नाम दर्ज हैं।

कंटेंट और लॉन्च डेट पर अभी सस्पेंस

MIB की मंजूरी मिलने के बाद अब शेमारू को Mango TV को हिंदी के नॉन-न्यूज चैनल के रूप में लॉन्च और डिस्ट्रीब्यूशन करने का रास्ता साफ हो गया है। बताया जा रहा है कि मंत्रालय के रिकॉर्ड में चैनल की कंटेंट रणनीति, लॉन्च की तारीख या यह किस तरह के मनोरंजन कार्यक्रम पेश करेगा, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई है।

टीवी और डिजिटल दोनों पर फोकस

यह मंजूरी ऐसे समय में मिली है, जब देश की मीडिया कंपनियां एक ओर अपने पारंपरिक टीवी नेटवर्क का विस्तार कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर डिजिटल और OTT प्लेटफॉर्म पर भी लगातार निवेश बढ़ा रही हैं।

शेमारू पहले से ही फिल्मों, भक्ति और क्षेत्रीय मनोरंजन से जुड़े कई टीवी चैनलों का संचालन करती है। इसके अलावा कंपनी डिजिटल स्ट्रीमिंग और कंटेंट सिंडिकेशन कारोबार में भी मजबूत मौजूदगी रखती है।

 

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सोशल मीडिया से क्यों रखते हैं दूरी, सईद अंसारी ने बतायी असली वजह

आजतक के मैनेजिंग एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) सईद अंसारी ने समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा के साथ फायरसाइड चैट में पत्रकारिता, जीवन-दर्शन, फिटनेस, सोशल मीडिया को लेकर बातचीत की।

Last Modified:
Thursday, 06 August, 2026
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समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में आजतक के मैनेजिंग एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) सईद अंसारी ने समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा के साथ फायरसाइड चैट में पत्रकारिता, जीवन-दर्शन, फिटनेस, सोशल मीडिया और व्यक्तिगत रिश्तों को लेकर खुलकर बातचीत की। बातचीत की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में हुई, लेकिन आगे चलकर कई गंभीर विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।

सवाल: आपकी फिटनेस, ऊर्जा और हमेशा मुस्कुराते रहने का राज क्या है?

चर्चा की शुरुआत में पंकज शर्मा ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से कई लोग उनसे यह सवाल पूछ रहे थे कि सईद अंसारी से उनकी फिटनेस, ऊर्जा और हमेशा मुस्कुराते रहने का राज जरूर पूछा जाए। उन्होंने कहा कि लोग जानना चाहते हैं कि आखिर इतनी व्यस्त जिंदगी के बावजूद वे खुद को इतना ऊर्जावान कैसे रखते हैं।

इस पर सईद अंसारी ने कहा कि उन्हें लोगों से मिलना-जुलना हमेशा अच्छा लगता है। चाहे संस्थान में उनका पद कुछ भी हो, वे आज भी खुद को एक इंटर्न की तरह ही मानते हैं। उनका कहना था कि उन्होंने पहली नौकरी जिस सीखने की भावना के साथ शुरू की थी, वही भावना आज भी कायम है।

सईद अंसारी ने कहा कि आज भी जब वे कैमरे के सामने माइक पकड़ते हैं या किसी मंच से बोलने जाते हैं तो घबराहट महसूस होती है। उन्हें हमेशा डर रहता है कि कहीं कोई गलती न हो जाए, कहीं ऐसा कुछ न कह दें जिससे किसी का मन दुखे या कोई नाराज हो जाए। यही डर और लगातार सीखने की इच्छा उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि वे आज भी खुद को पत्रकारिता का एक विद्यार्थी मानते हैं।

वहीं, अपनी फिटनेस, ऊर्जा और हमेशा मुस्कुराते रहने के राज के सवाल पर सईद अंसारी ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे खूब खाते हैं और भरपेट खाते हैं। उन्होंने बताया कि उनके खाने में मुख्य रूप से दाल-चावल होता है और वे किसी तरह की डाइटिंग नहीं करते।

उन्होंने कहा कि वे कभी जिम नहीं गए, न ही नियमित वॉक करने या स्टेप्स गिनने जैसी आदतें अपनाईं। उनकी ड्यूटी देर रात तक चलती है। कई बार वे रात 12 बजे, 12:30 बजे या एक बजे ऑफिस से निकलते हैं और करीब डेढ़ बजे घर पहुंचते हैं। इसलिए सुबह जल्दी उठने की बजाय आराम से उठते हैं और सीधे एडिटोरियल मीटिंग की तैयारी में लग जाते हैं।

उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि इंसान को खुश रहना चाहिए। वे बेवजह चिंता नहीं करते। उन्होंने हिंदी की कहावत 'चिंता चिता समान' का जिक्र करते हुए कहा कि बचपन में उनकी चिंता माता-पिता ने की, पढ़ाई के समय शिक्षकों ने की, लेकिन अब वे खुद चिंता करने में विश्वास नहीं रखते।

उन्होंने हंसते हुए यह भी कहा कि पढ़ाई में भी वे कभी बहुत अच्छे छात्र नहीं रहे। स्कूल से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक उनके अंक कभी 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं आए। 40-45 प्रतिशत अंक आ जाते थे तो उन्हें लगता था कि बहुत अच्छा कर लिया। वे हमेशा आखिरी बेंच पर बैठने वाले छात्र रहे और खूब डांट व मार भी खाते थे।

सवाल: जीवन को लेकर आप क्या सोच रखते हैं?

सईद अंसारी ने कहा कि उनका मानना है कि इंसान इस दुनिया में किसी उद्देश्य से आया है। इसलिए यह सोचने की जरूरत नहीं कि सारी उपलब्धियां उसी की वजह से हैं। उन्होंने कहा कि कोई न कोई ऐसी शक्ति जरूर है, जो पूरी दुनिया को चला रही है। इंसान तो सिर्फ इस रंगमंच का एक कलाकार है, जिसे अपना किरदार निभाकर आगे बढ़ जाना है। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी हो रहा है, वह उसी बड़ी शक्ति की योजना का हिस्सा है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि बेवजह डाइटिंग करने की बजाय अच्छा खाना खाएं। उन्होंने कहा कि आजकल लोग तेल, घी और रोटी तक छोड़ रहे हैं, जबकि शरीर को ताकत की जरूरत होती है। उन्होंने अपने दादा का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वे बचपन में एक रोटी ज्यादा खा लेते थे तो उनके दादा खुश हो जाते थे और कहते थे कि अच्छी खुराक ही अच्छी सेहत की पहचान है।

उन्होंने यह भी कहा कि समय-समय पर डॉक्टरों की सलाह भी बदलती रहती है। कभी कहा गया कि घी मत खाइए और अब वही डॉक्टर सीमित मात्रा में घी खाने की सलाह देते हैं। इसलिए उनका मानना है कि संतुलित भोजन करना सबसे बेहतर है।

सवाल: आप सोशल मीडिया से दूरी क्यों बनाए रखते हैं?

पंकज शर्मा ने इसके बाद उनसे पूछा कि लोग अक्सर यह जानना चाहते हैं कि वे सोशल मीडिया पर सक्रिय क्यों नहीं रहते। उन्होंने कहा कि आज लगभग हर पत्रकार के लाखों फॉलोअर्स हैं, लेकिन सईद अंसारी ने खुद को सोशल मीडिया से काफी हद तक दूर रखा है। क्या आज के समय में ऐसा करना संभव है और इसकी वजह क्या है?

इस सवाल के जवाब में सईद अंसारी ने कहा कि उनके कई साथी पत्रकारों के 30 से 50 लाख तक फॉलोअर्स हैं। लेकिन अगर रात दो बजे किसी मुश्किल समय में मदद की जरूरत पड़ जाए, तो उन लाखों फॉलोअर्स में से शायद ही कोई साथ खड़ा मिले।

उन्होंने कहा कि उनकी जिंदगी में सिर्फ चार-पांच ऐसे दोस्त हैं जो साल के 365 दिन, 24 घंटे उनके साथ खड़े रहते हैं। वे उनके लिए परिवार जैसे हैं। उनके घर में उनके लिए अलग कमरा तक है। अगर वे कई दिनों तक उनके घर नहीं जाएं तो परिवार वाले खुद फोन कर लेते हैं या उनके लिए खाना भेज देते हैं।

सईद अंसारी ने साफ कहा कि उन्हें वर्चुअल रिश्तों पर भरोसा नहीं है। वे वास्तविक और आत्मीय रिश्तों में विश्वास करते हैं। उनके मुताबिक, जिंदगी में चार-पांच सच्चे दोस्त होना लाखों सोशल मीडिया फॉलोअर्स से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वही लोग मुश्किल समय में आपके साथ खड़े होते हैं, चाहे वे दोस्त हों, पड़ोसी हों या रिश्तेदार।

पंकज शर्मा ने कहा कि सार्वजनिक मंच से इस तरह की बात कहकर सईद अंसारी ने उन लोगों के सवाल का जवाब दे दिया है, जो जानना चाहते थे कि आज के दौर में सोशल मीडिया से दूरी बनाकर रखना क्यों और कैसे संभव है।

सवाल: लगातार बदलती तकनीक के दौर में एक अच्छे पत्रकार की पहचान किन मूल्यों से होती है?

सोशल मीडिया और व्यक्तिगत जीवन पर चर्चा के बाद पंकज शर्मा ने बातचीत को पत्रकारिता के मूल विषय की ओर मोड़ा। उन्होंने सईद अंसारी से पूछा कि उन्होंने पत्रकारिता का लंबा दौर देखा है और इस दौरान तकनीक तथा माध्यम लगातार बदलते रहे हैं। ऐसे में आज एक अच्छे पत्रकार की पहचान किन मूल्यों से तय होती है।

इस पर सईद अंसारी ने कहा कि वास्तव में सिर्फ माध्यम बदले हैं, पत्रकारिता नहीं बदली है। उनके मुताबिक पत्रकार पहले भी पत्रकार था, आज भी है और आगे भी रहेगा। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के मूल सिद्धांत आज भी वही हैं जो वर्षों पहले थे।

उन्होंने कहा कि एक पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत सच बोलना है। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी समाज के प्रति जवाबदेह रहना और अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाना है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की कई परिभाषाएं पढ़ाई जाती हैं, लेकिन उनकी अपनी परिभाषा अलग है।

सईद अंसारी ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपने देश से प्रेम करता है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखता है तो वह पत्रकारिता की मूल भावना को समझता है। चाहे वह मुख्यधारा की मीडिया में काम करता हो, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हो या किसी दूसरे पेशे में हो, देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना ही पत्रकारिता का आधार है।

उन्होंने कहा कि कैमरे बदल गए, तकनीक बदल गई, AI आ गया और डिजिटल प्लेटफॉर्म आ गए, लेकिन पत्रकार की जिम्मेदारी नहीं बदली। आज भी उसका पहला कर्तव्य सच बोलना, लोगों का विश्वास बनाए रखना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना है।

सवाल: इतने सारे प्लेटफॉर्म आने के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया खुद को अलग कैसे बनाए रखे?

इस सवाल पर सईद अंसारी ने कहा कि मेनस्ट्रीम मीडिया को अलग दिखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उनका कहना था कि मीडिया का उद्देश्य किसी फिल्म की तरह चमक-दमक पैदा करना या खुद को हीरो साबित करना नहीं है।

उन्होंने कहा कि पत्रकार का काम सिर्फ इतना है कि जहां जो कुछ हो रहा है, उसे सही तरीके से लोगों तक पहुंचाया जाए। हालांकि उन्होंने माना कि आज दर्शकों की अपेक्षाएं पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। अब लोग सिर्फ खबर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पूरी सच्चाई भी जानना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि कई बार आंखों से देखी हुई चीज भी पूरी सच्चाई नहीं होती और कानों से सुनी हुई बात भी अंतिम सच नहीं होती। ऐसे में पत्रकार की जिम्मेदारी सिर्फ घटना बताने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उसके पीछे के तथ्य और वास्तविकता को सामने लाना भी उसका दायित्व है।

'न्यूज दिखाइए, व्यूज मत थोपिए'

बातचीत के दौरान सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी गलती तब शुरू होती है, जब न्यूज की जगह व्यूज को प्राथमिकता दी जाने लगती है।

उन्होंने कहा कि जैसे ही पत्रकार अपनी व्यक्तिगत राय या विचार दर्शकों पर थोपने लगता है, उसी क्षण वह एक पक्षकार बन जाता है और जब पत्रकार पक्षकार बन जाता है, तब वह अपने पत्रकारिता धर्म से भटक जाता है।

उनका कहना था कि मीडिया का काम तथ्य रखना है, न कि दर्शकों पर अपनी राय थोपना।

सवाल: सबसे पहले खबर दिखाने की होड़ में सटीकता कैसे बचाई जाए?

पंकज शर्मा ने अगला सवाल पूछा कि आज न्यूजरूम में सबसे पहले खबर देने की होड़ लगी रहती है। सोशल मीडिया पर खबरें पहले ही आ जाती हैं। ऐसे माहौल में सटीकता और विश्वसनीयता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। संपादकीय स्तर पर इसे कैसे संभाला जाए?

सईद अंसारी ने कहा कि यह चुनौती खासकर टीवी पत्रकारिता में सबसे ज्यादा है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर सबसे पहले खबर डालने की होड़ में अक्सर बड़ी गलतियां हो जाती हैं और वहां हर जानकारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि जरूरत पड़े तो खबर कुछ मिनट या कुछ घंटे बाद दिखाई जाए, लेकिन गलत खबर कभी नहीं दिखाई जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि लोग कुछ समय बाद यह भूल जाते हैं कि कौन-सा चैनल खबर सबसे पहले लेकर आया था, लेकिन अगर किसी चैनल या पत्रकार ने एक बार भी गलत खबर चला दी तो लोग उसे लंबे समय तक याद रखते हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार उनके दोस्त उन्हें बताते हैं कि जो खबर टीवी पर दिखाई जा रही है, वह तो दो घंटे पहले ही व्हाट्सऐप पर आ चुकी थी। ऐसे में टीवी का मुकाबला सोशल मीडिया की रफ्तार से नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता से होना चाहिए।

सईद अंसारी ने कहा कि रिपोर्टर को खबर भेजने से पहले स्वतंत्र रूप से उसकी पुष्टि करनी चाहिए। उसके बाद यदि प्रशासन या पुलिस भी उसकी पुष्टि कर दे, तभी उसे खबर माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को उतना इंतजार करना चाहिए, क्योंकि यही उनकी पेशेवर जिम्मेदारी है। अगर बिना पुष्टि के खबर दिखाई जाती है, तो यह पत्रकारिता की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा है।

सवाल: AI पत्रकारों के लिए अवसर है या चुनौती?

पंकज शर्मा ने इसके बाद AI पर सवाल किया और पूछा कि न्यूजरूम में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में क्या यह पत्रकारों के लिए अवसर साबित होगा या संपादकीय स्तर पर नई चुनौतियां पैदा करेगा?

इस पर सईद अंसारी ने कहा कि AI बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसा भी हो सकता है कि भविष्य में वे खुद स्टूडियो में मौजूद न हों और AI उनकी आवाज और चेहरा इस्तेमाल करके बुलेटिन पढ़ रहा हो, जबकि दर्शकों को इसका पता भी न चले।

उन्होंने कहा कि फिलहाल AI में सबसे बड़ी कमी भावनाओं की है। हालांकि भविष्य में AI भाव-भंगिमाएं भी सीख सकता है, लेकिन इंसानी संवेदनाओं की बराबरी करना उसके लिए आसान नहीं होगा।

उन्होंने कहा कि जब कोई अपना व्यक्ति बिना कुछ कहे भी आपके चेहरे को देखकर पूछ लेता है कि आज आप परेशान क्यों हैं या खुश क्यों हैं, तो वह संवेदनशीलता मशीन में नहीं आ सकती।

सईद अंसारी ने कहा कि AI पत्रकार का अच्छा सहयोगी और मददगार बन सकता है, लेकिन वह पत्रकार की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता। तकनीक इंसान की सहायता कर सकती है, लेकिन मानवीय संवेदनाएं, अनुभव और भावनात्मक समझ अभी भी पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत हैं।

इसी के साथ बातचीत का अगला दौर शुरू हुआ, जिसमें पंकज शर्मा ने युवा पत्रकारों, नई पीढ़ी, नशे की बढ़ती समस्या और पत्रकारिता के भविष्य को लेकर सईद अंसारी से विस्तार से सवाल पूछे।

सवाल: आज के युवा पत्रकारों की सबसे बड़ी ताकत क्या है और उन्हें किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है?

AI पर चर्चा के बाद समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा ने सईद अंसारी से पूछा कि वे लंबे समय से न्यूज़रूम में काम कर रहे हैं और लगातार युवाओं के साथ भी काम करते हैं। ऐसे में आज के युवा पत्रकारों की सबसे बड़ी ताकत क्या है और उन्हें किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत महसूस होती है।

इस सवाल का जवाब देते हुए सईद अंसारी ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन का एक उद्देश्य होता है और उनका अपना उद्देश्य सिर्फ एक है- देश के युवाओं को नशे से दूर रखना।

उन्होंने कहा कि आज नशा बहुत सामान्य बात बनता जा रहा है और यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने फिल्म सिटी का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मौजूद कई मीडिया और अन्य संस्थानों के छात्र दिन में खुलेआम सिगरेट पीते हैं और शाम को उसी सिगरेट में चरस और गांजा भरकर उसका सेवन करते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति उन्हें बेहद परेशान करती है।

सईद अंसारी ने बताया कि उन्होंने नोएडा में हुक्का संस्कृति के खिलाफ भी लंबे समय तक अभियान चलाया। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा हुक्का पर प्रतिबंध लगाने के लिए उन्होंने लगातार आवाज उठाई और आज भी उनका सबसे बड़ा प्रयास यही है कि युवाओं को किसी भी तरह के नशे से दूर रखा जाए।

उन्होंने कहा कि पत्रकार तो किसी भी हालत में नशे से दूर रहें, क्योंकि पत्रकार की जिम्मेदारी समाज के प्रति होती है। यदि नई पीढ़ी को सही दिशा नहीं मिली तो भविष्य भी प्रभावित होगा।

'अपने बच्चों पर भरोसा करें, लेकिन आंख बंद करके नहीं'

सईद अंसारी ने कहा कि आजकल आधुनिकता और Gen Z के नाम पर कई ऐसी चीजें सामान्य मानी जाने लगी हैं, जो भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बच्चों के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि आज माता-पिता बच्चों को संस्कार देने में पहले जैसी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं।

उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों पर भरोसा जरूर करें, लेकिन आंख मूंदकर नहीं। उन्होंने कहा कि जिस तरह उनके माता-पिता बचपन में इस बात पर नजर रखते थे कि वे किसके साथ उठते-बैठते हैं, कहां जाते हैं, क्या करते हैं और किन दोस्तों के साथ समय बिताते हैं, उसी तरह आज भी अभिभावकों को अपने बच्चों पर नजर रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज कई माता-पिता अपने बच्चों से यह तक पूछने में संकोच करते हैं कि वे कहां जा रहे हैं या किसके साथ समय बिता रहे हैं। जबकि यही सतर्कता बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से बचा सकती है।

'मोबाइल सबसे बड़ा साथी भी है और सबसे बड़ा दुश्मन भी'

सईद अंसारी ने कहा कि मोबाइल फोन आज जितना उपयोगी है, उतना ही खतरनाक भी साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज स्मार्टफोन में यह देखना आसान है कि कोई व्यक्ति कितना समय मोबाइल पर बिता रहा है।

उन्होंने अभिभावकों से कहा कि वे एक बार अपने बच्चों का स्क्रीन टाइम जरूर देखें। उन्हें पता चलेगा कि 12 घंटे के सक्रिय समय में कई बच्चे पांच से सात घंटे सिर्फ मोबाइल पर ही बिताते हैं। इस वजह से पढ़ने की आदत लगातार खत्म होती जा रही है और यही उन्हें सबसे ज्यादा चिंता में डालता है।

उन्होंने कहा कि आज का युवा अगर हिंदी नहीं जानता तो उसे शर्म नहीं आती। उसे सिर्फ यह लगता है कि अगर वह अच्छी अंग्रेजी बोल लेता है तो वही सबसे बड़ी योग्यता है। जबकि वास्तविक ज्ञान सिर्फ भाषा से नहीं आता, बल्कि पढ़ने और समझने की आदत से आता है।

सवाल: अगर आज आपको युवा पत्रकारों की भर्ती करनी हो तो किन बातों को सबसे ज्यादा महत्व देंगे?

इस सवाल के जवाब में सईद अंसारी ने कहा कि वे युवाओं की आलोचना नहीं कर रहे हैं। उन्होंने माना कि आज की पीढ़ी तकनीक के मामले में बेहद तेज और प्रतिभाशाली है। नई तकनीक को समझने और अपनाने की उनकी क्षमता शानदार है।

लेकिन उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन चीजों का ज्ञान एक पत्रकार के लिए जरूरी है, वही जानकारी युवाओं के पास नहीं है।

उन्होंने कहा कि आज बहुत से युवाओं को अपने देश के बारे में बुनियादी जानकारी तक नहीं होती। वे इतिहास, भूगोल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से दूर होते जा रहे हैं क्योंकि उन्होंने पढ़ना लगभग छोड़ दिया है।

सईद अंसारी ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि हाल ही में उन्होंने अपने संस्थान में फाइनल परीक्षा के बाद छात्रों का वाइवा लिया। उन्होंने सभी छात्रों से सिर्फ एक सवाल पूछा—भारत के उपराष्ट्रपति कौन हैं? उन्हें यह देखकर गहरा दुख हुआ कि 50 छात्रों में से केवल एक छात्र सही जवाब दे पाया।

उन्होंने कहा कि इसके बाद उन्होंने अपने संस्थान के प्रोफेसरों और डीन की बैठक बुलाई और साफ कहा कि यह छात्रों की नहीं, बल्कि शिक्षकों और उनकी भी जिम्मेदारी है कि वे छात्रों को सही दिशा नहीं दे पाए।

उन्होंने कहा कि आधुनिक और तकनीकी रूप से दक्ष होना अच्छी बात है, लेकिन अगर युवा अपने देश, संविधान, राजनीति और समाज की बुनियादी जानकारी से ही अनजान रहेंगे, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

युवा पत्रकारों को सईद अंसारी का मैसेज

चर्चा के अंत में इस हिस्से में सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता में आने वाले युवाओं को सिर्फ तकनीक सीखना ही काफी नहीं है। उन्हें इतिहास, भूगोल, विज्ञान, खेल, मनोरंजन और समसामयिक घटनाओं सहित हर विषय की जानकारी रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पत्रकार किसी एक विषय का विशेषज्ञ जरूर हो सकता है, लेकिन उसे एक ऑलराउंडर भी होना चाहिए। इंटरव्यू के दौरान उससे किसी भी विषय पर सवाल पूछा जा सकता है, इसलिए व्यापक अध्ययन और पढ़ने की आदत विकसित करना बेहद जरूरी है।

उन्होंने अभिभावकों से भी कहा कि यदि उनके बच्चे पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं तो समय-समय पर उनका सामान्य ज्ञान जांचते रहें। उनसे विंबलडन विजेता, देश के संवैधानिक पदों, राजनीति, खेल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर सवाल पूछें। इससे उनकी तैयारी मजबूत होगी और वे बेहतर पत्रकार बन सकेंगे।

सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता केवल कैमरे के सामने आने या तकनीक चलाने का नाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर सीखने, पढ़ने और समाज की गहरी समझ विकसित करने का पेशा है।

दर्शकों के सवालों में भी उठे पत्रकारिता और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे

फायरसाइड चैट के समापन की ओर बढ़ते हुए दर्शकों की ओर से भी कई सवाल पूछे गए। एक दर्शक ने सईद अंसारी से पूछा कि उन्होंने बातचीत के दौरान कहा था कि पत्रकार को "न्यूज़" पर ध्यान देना चाहिए, "व्यूज़" पर नहीं। ऐसे में क्या वे हाल की कुछ घटनाओं के संदर्भ में इसका कोई उदाहरण देना चाहेंगे?

इस सवाल के जवाब में सईद अंसारी ने कहा कि आज दर्शकों की अपेक्षाएं पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। अब लोग सिर्फ खबर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पूरी सच्चाई भी जानना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब वे "व्यूज़" की बात करते हैं तो उसका मतलब पत्रकार की व्यक्तिगत राय से होता है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पत्रकार है तो उसे अपनी व्यक्तिगत पहचान, राजनीतिक झुकाव और वैचारिक आग्रहों से ऊपर उठना होगा। पत्रकार के रूप में वह खुद को किसी धर्म, जाति, भाषा, राज्य या राजनीतिक दल के नजरिए से नहीं देख सकता।

सईद अंसारी ने कहा कि उन्होंने बहुत प्रयास करके खुद को हर तरह के वैचारिक पूर्वाग्रह से दूर रखने की कोशिश की है। उनका मानना है कि पत्रकार का सबसे बड़ा धर्म निष्पक्ष रहना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना है। उन्होंने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता आज देश के युवा हैं, क्योंकि आने वाले समय में वही देश और समाज की जिम्मेदारी संभालेंगे।

"कई बातें कहना चाहता हूं, लेकिन मंच और समय की अपनी सीमाएं होती हैं"

उन्होंने कहा कि युवाओं और समाज से जुड़े कई ऐसे विषय हैं, जिन पर वे विस्तार से बोलना चाहते हैं, लेकिन हर मंच और हर अवसर की अपनी सीमाएं होती हैं। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि समाज के लोगों, अभिभावकों और शिक्षकों को इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए और अपनी आवाज उठानी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया में काम करने वाले लोगों की अपनी पेशेवर सीमाएं होती हैं, इसलिए कई बार वे हर विषय पर खुलकर नहीं बोल पाते। ऐसे में समाज के अन्य लोगों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

सवाल: अगर आने वाले 10 साल में ऐसे ही युवा मीडिया की कमान संभालेंगे तो क्या होगा?

इस दौरान अनुराग बत्रा ने भी बातचीत में हिस्सा लेते हुए कहा कि सईद अंसारी ने खुद बताया कि उनके संस्थान में 50 छात्रों में से सिर्फ एक छात्र ही देश के उपराष्ट्रपति का नाम बता सका। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है कि अगर आने वाले दस वर्षों में यही युवा मीडिया की कमान संभालेंगे तो स्थिति कैसी होगी।

इस पर सईद अंसारी ने कहा कि यही उनकी सबसे बड़ी चिंता है। उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी सिर्फ रील्स, सोशल मीडिया और मोबाइल तक सीमित रह जाएगी और सामान्य ज्ञान, पढ़ाई तथा सामाजिक समझ से दूर होती जाएगी, तो पत्रकारिता के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि इस स्थिति से बचने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि माता-पिता अपने बच्चों पर नजर रखें। भरोसा जरूर करें, लेकिन आंख मूंदकर नहीं। उन्होंने कहा कि पहले माता-पिता को हमेशा पता रहता था कि उनका बच्चा कहां जा रहा है, किसके साथ रह रहा है और क्या कर रहा है। आज यह निगरानी लगभग खत्म हो गई है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज कई किशोर अपने माता-पिता से कहते हैं कि वे दोस्तों के साथ नाइट स्टे के लिए बाहर जाएंगे और माता-पिता बिना ज्यादा पूछताछ किए इसकी अनुमति दे देते हैं। उनका मानना है कि बच्चों को पूरी आजादी देने के साथ-साथ जिम्मेदार निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

उन्होंने एक और उदाहरण साझा करते हुए कहा कि उनके एक मित्र के आठवीं-नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे ने जन्मदिन मनाने के लिए माता-पिता से कहा कि वह दोस्तों के साथ मॉल जाएगा और वहां कोई अभिभावक मौजूद नहीं होगा। सईद अंसारी ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सिर्फ बच्चों को दोष देना ठीक नहीं है, बल्कि अभिभावकों की भी बराबर जिम्मेदारी बनती है।

उन्होंने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि उस समय माता-पिता अनुशासन के मामले में काफी सख्त होते थे। वे बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखते थे और जरूरत पड़ने पर डांटते या सजा भी देते थे। उनका मानना है कि आज के समय में भी बच्चों के जीवन में माता-पिता की सक्रिय भूमिका बेहद जरूरी है।

सवाल: युवा पत्रकारों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

इस पर सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता में आने वाले युवाओं को सिर्फ तकनीक सीखने तक खुद को सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें इतिहास, भूगोल, विज्ञान, खेल, मनोरंजन, राजनीति और देश-दुनिया की हर महत्वपूर्ण घटना की जानकारी रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को ऑलराउंडर होना चाहिए। जरूरी नहीं कि उसे हर विषय का विशेषज्ञ होना पड़े, लेकिन इतना ज्ञान जरूर होना चाहिए कि किसी भी विषय पर बुनियादी सवालों का जवाब दे सके। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि इंटरव्यू में किसी उम्मीदवार से विंबलडन चैंपियन, किसी अंतरराष्ट्रीय नेता, किसी राज्य की विधानसभा सीटों या संसद की बुनियादी व्यवस्था के बारे में पूछा जाए, तो वह पूरी तरह अनजान नहीं होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज कई युवाओं को यह तक नहीं पता कि लोकसभा और विधानसभा में क्या अंतर है या सांसद और विधायक की भूमिकाएं क्या होती हैं। यह स्थिति पत्रकारिता जैसे पेशे के लिए चिंता का विषय है।

सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता सिर्फ कैमरे के सामने बोलने या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने का नाम नहीं है। यह लगातार पढ़ने, सीखने, समाज को समझने और तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी निभाने का पेशा है।

 

 

 

 

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मीडिया की जवाबदेही सिर्फ जनता के प्रति है, किसी सत्ता या विपक्ष के प्रति नहीं: रंजीत कुमार

समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में 'टाइम्स नाउ नवभारत' के मैनेजिंग एडिटर रंजीत कुमार ने पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर खुलकर अपनी राय रखी।

Last Modified:
Thursday, 06 August, 2026
RanjitKumar5895

समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में 'टाइम्स नाउ नवभारत' के मैनेजिंग एडिटर रंजीत कुमार ने पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है और आज भी मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। हालांकि, एक सुनियोजित नैरेटिव के जरिए मेनस्ट्रीम मीडिया को बदनाम करने और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने की कोशिश की जा रही है।

अपने संबोधन की शुरुआत में रंजीत कुमार ने कहा कि उनसे पहले जिन मुद्दों और सवालों पर चर्चा हुई, उनका जवाब देने की वे पूरी कोशिश करेंगे। उन्होंने कहा कि जब भी पत्रकारिता के इतिहास, वर्तमान और भविष्य की बात होती है तो हमें अपने आज को अपने अतीत के आईने में देखकर समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत की पत्रकारिता का इतिहास स्वर्णिम रहा है। आजादी की लड़ाई के समय न तो आधुनिक संचार माध्यम थे और न ही लोगों को खुलकर बोलने या लिखने की आजादी थी। इसके बावजूद पत्रकारों और संपादकों ने हाथ से पर्चे लिखकर लोगों में आजादी की अलख जगाई। कई पत्रकारों और संपादकों ने अपने लेखों की कीमत वर्षों तक जेल में रहकर चुकाई। यही भारतीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत और विरासत रही है।

रंजीत कुमार ने कहा कि आज यह माहौल बनाया जा रहा है कि देश की पत्रकारिता, खासकर हिंदी मीडिया, पूरी तरह गिर चुकी है और अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट गई है। लेकिन उनका मानना है कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। उन्होंने कहा कि मीडिया को बदनाम करने का एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है, जबकि सच्चाई इससे अलग है।

उन्होंने हाल ही में जंतर-मंतर पर पत्रकारों के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उस दिन उनके संस्थान के पत्रकार भी वहां मौजूद थे। उन्होंने बताया कि उनके कई एंकरों और रिपोर्टर्स के साथ धक्का-मुक्की और गाली-गलौज की गई। एक महिला पत्रकार को करीब ढाई घंटे तक अपनी सुरक्षा के लिए एक बैंक में छिपकर रहना पड़ा, जबकि उनके एक एंकर को लगभग दो घंटे तक एक रेस्तरां में शरण लेनी पड़ी। उन्होंने कहा कि वहां भी प्रदर्शनकारी पहुंच गए और उन्हें बाहर निकालने की कोशिश की। अगर वह सड़क पर आ जाते तो उनके साथ क्या होता, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

रंजीत कुमार ने कहा कि वह पूरी जिम्मेदारी के साथ यह बात कहना चाहते हैं कि उस दिन उनके चैनल की कवरेज को कोई भी व्यक्ति खुद देखकर फैसला कर सकता है कि क्या उसमें ऐसी कोई भाषा, रिपोर्टिंग या प्रस्तुति थी, जिसकी वजह से पत्रकारों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिए था। उनके मुताबिक, ऐसा बिल्कुल नहीं था। इसके बावजूद पत्रकारों के साथ हिंसक व्यवहार हुआ, जो बेहद चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले मीडिया जगत के एक वरिष्ठ संपादक ने अनौपचारिक बातचीत में उनसे कहा था कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो एक दिन पत्रकारों को सड़कों पर दौड़ाकर पीटा जाएगा। उस समय यह बात अतिशयोक्ति लग सकती थी, लेकिन आज जो माहौल बन रहा है, उसे देखकर वह चेतावनी सच होती दिखाई दे रही है।

रंजीत कुमार ने कहा कि सोशल मीडिया पर लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जिसमें मेनस्ट्रीम मीडिया को खलनायक साबित करने की कोशिश की जाती है। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को अलग-अलग नामों और उपाधियों से पुकारा जाता है। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे सत्ता से सवाल नहीं करते और उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं बची है।

उन्होंने कहा कि यदि आज कोई पक्ष विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहा है तो वह मेनस्ट्रीम मीडिया नहीं, बल्कि राजनीति की दूसरी धारा है। उनका कहना था कि अपनी विश्वसनीयता के संकट को छिपाने के लिए मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं और यह उम्मीद की जाती है कि मीडिया विपक्ष की तरफ से लड़ाई लड़े और वही सवाल उठाए जो विपक्ष चाहता है।

रंजीत कुमार ने कहा कि कई बार ऐसे मुद्दों और सवालों को भी मीडिया से उठाने की अपेक्षा की जाती है, जो पूरी तरह सही या तथ्यपरक नहीं होते। यदि मीडिया आंख मूंदकर उनका समर्थन नहीं करता, तो उसे 'गोदी मीडिया' या 'दलाल मीडिया' कह दिया जाता है।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि देश के पत्रकारों की जवाबदेही किसी विपक्ष, किसी राजनीतिक दल या किसी सरकार के प्रति नहीं है। पत्रकारों की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ सच के प्रति है। मीडिया का काम किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि सही सवाल पूछना और सही तथ्यों को सामने लाना है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विपक्ष द्वारा उठाया गया हर मुद्दा ही अंतिम सच होता है? क्या हर सवाल सही होता है और क्या मेनस्ट्रीम मीडिया का काम बिना जांच-पड़ताल के उन सभी सवालों के साथ खड़ा हो जाना है? उनका कहना था कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

रंजीत कुमार ने कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि आज मीडिया सत्ता से ज्यादा विपक्ष से सवाल पूछता है। लेकिन उनका मानना है कि मीडिया का काम यह तय करना नहीं है कि सामने सत्ता है या विपक्ष, बल्कि यह देखना है कि सही सवाल कौन-सा है। पत्रकारिता की असली जिम्मेदारी जनता के प्रति है।

उन्होंने कहा कि मीडिया खुद को निष्पक्ष होने का दावा नहीं करता, बल्कि वह जनपक्षधर है। उसकी जवाबदेही किसी राजनीतिक दल, संगठन या विचारधारा के प्रति नहीं, बल्कि देश की जनता और सच के प्रति है। यही पत्रकारिता का मूल धर्म है और इसी सिद्धांत पर मीडिया को आगे भी काम करना चाहिए।

इसके बाद रंजीत कुमार ने कहा कि टीवी पत्रकारिता और उसके कंटेंट को लेकर भी कई तरह की धारणाएं बनाई जा रही हैं। अक्सर कहा जाता है कि आज के पत्रकारों और संपादकों में पहले जैसी सोच या कल्पनाशक्ति नहीं रही और टीवी का कंटेंट पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन उनका मानना है कि हर दौर में पत्रकारिता के सामने अलग-अलग तरह की चुनौतियां रही हैं और आज की चुनौतियां पहले से बिल्कुल अलग हैं।

उन्होंने कहा कि आज सूचना के अनगिनत स्रोत मौजूद हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक खबरें बहुत तेजी से पहुंच जाती हैं। कई बार ऐसा होता है कि टीवी स्क्रीन पर कोई खबर ब्रेक होने से पहले ही लोग उसके बारे में सोशल मीडिया या डिजिटल माध्यमों से जान चुके होते हैं। ऐसे में यह स्वीकार करना होगा कि आज टीवी और अखबार लोगों के लिए खबरों का पहला स्रोत नहीं रह गए हैं।

हालांकि, उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि टीवी मीडिया की भूमिका खत्म हो गई है। उनके अनुसार, आज जब फेक न्यूज और भ्रामक सूचनाओं की बाढ़ आई हुई है, तब भी किसी खबर की पुष्टि करने के लिए लोग सबसे पहले टीवी न्यूज चैनलों की ओर ही देखते हैं। चाहे किसी ने फेसबुक, एक्स (पूर्व ट्विटर) या किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई खबर देखी हो, लेकिन यह जानने के लिए कि खबर सही है या गलत, वह अंत में टीवी न्यूज चैनल ही खोलता है।

रंजीत कुमार ने कहा कि आज भी मेनस्ट्रीम मीडिया ही खबरों की पुष्टि का सबसे विश्वसनीय माध्यम है। इसकी वजह यह है कि टीवी और मुख्यधारा का मीडिया कई तरह के सेल्फ रेगुलेटरी नियमों और पेशेवर जिम्मेदारियों से बंधा होता है। मीडिया संस्थान किसी भी खबर को बिना जांच-पड़ताल के प्रसारित नहीं कर सकते। हर खबर को कई स्तर पर क्रॉस चेक और वेरिफाई किया जाता है, उसके बाद ही उसे दर्शकों तक पहुंचाया जाता है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सोशल मीडिया पर मौजूद हर व्यक्ति, जिसके हाथ में कैमरा है, उसे पत्रकार मान लिया जाना चाहिए? क्या ऐसे लोग भी वही जवाबदेही निभा सकते हैं, जो मुख्यधारा का मीडिया निभाता है? उनका कहना था कि ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि सोशल मीडिया पर खबर डालने वाले अधिकांश लोगों पर वैसी संस्थागत जिम्मेदारी नहीं होती जैसी पत्रकारिता से जुड़े संस्थानों पर होती है।

रंजीत कुमार ने कहा कि आज मीडिया में एक और बड़ा बदलाव आया है, जिसे समझने की जरूरत है। उन्होंने इसे 'न्यूज कन्फर्मेशन' और 'व्यू वैलिडेशन' का बदलाव बताया। उन्होंने कहा कि अब लोग सिर्फ खबर जानने के लिए टीवी नहीं देखते, क्योंकि खबर तो उन्हें पहले ही विभिन्न माध्यमों से मिल चुकी होती है। वे टीवी इसलिए देखते हैं ताकि जिस घटना को लेकर उनके मन में जो समझ या राय बनी है, उसकी पुष्टि हो सके। वे यह जानना चाहते हैं कि उनका नजरिया सही है या नहीं।

उन्होंने कहा कि आज टीवी पर प्रसारित होने वाली प्राइम टाइम डिबेट, एक्सप्लेनर शो और विश्लेषण आधारित कार्यक्रम इसी जरूरत को पूरा करते हैं। इन कार्यक्रमों के जरिए दर्शकों को किसी मुद्दे को बेहतर ढंग से समझने और अपनी राय को परखने का अवसर मिलता है। उनके मुताबिक, इसमें कोई बुराई नहीं है। यदि मुख्यधारा का मीडिया समय के साथ इस बदलाव को नहीं अपनाएगा, तो वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाएगा।

उन्होंने कहा कि अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए मीडिया को समय के अनुसार बदलाव करना ही होगा। लेकिन कई बार जनपक्षधर पत्रकारिता को गलत तरीके से सत्ता पक्ष का समर्थन बताकर पेश किया जाता है। यही वह जगह है, जहां भ्रम और गलत नैरेटिव पैदा होता है।

रंजीत कुमार ने कहा कि आज सबसे बड़ी चुनौती कंटेंट से ज्यादा परसेप्शन की है। एक सुनियोजित कोशिश के तहत यह धारणा बनाई जा रही है कि मेनस्ट्रीम मीडिया अब निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने कहा कि इस धारणा को बनाने वालों में सिर्फ सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग ही नहीं हैं, बल्कि मीडिया से जुड़े कुछ पुराने लोग भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब कुछ खास सवालों को दबा दिया जाता था। कई मुद्दों को सांप्रदायिक, बहुसंख्यकवादी या दूसरे नाम देकर खारिज कर दिया जाता था और उन पर चर्चा तक नहीं होने दी जाती थी। लेकिन आज वही सवाल सार्वजनिक रूप से पूछे जा रहे हैं। ऐसे में जिन लोगों ने पहले इन सवालों को दबाया था, उन्हें अब यह बदलाव स्वीकार करने में परेशानी हो रही है।

रंजीत कुमार ने दोहराया कि पत्रकारों की जिम्मेदारी किसी राजनीतिक दल, सरकार या विपक्ष के प्रति नहीं, बल्कि देश की जनता के प्रति है। मीडिया ने हमेशा इसी जिम्मेदारी के साथ अपना काम किया है और आगे भी करता रहेगा।

उन्होंने कहा कि जिस नैरेटिव के जरिए यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि आज की मीडिया जनता के साथ नहीं बल्कि सरकार के साथ खड़ी है, उसे मजबूती से खारिज करने की जरूरत है। उनका कहना था कि जनपक्षधर पत्रकारिता को जानबूझकर पक्षपात के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। इसलिए मीडिया को इस तरह की धारणाओं का तथ्य और जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए जवाब देना होगा।

अपने संबोधन के अंत में रंजीत कुमार ने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना और सच को सामने लाना है। जब तक मीडिया इस मूल भावना के साथ काम करता रहेगा, तब तक उसकी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता बनी रहेगी।

अपने संबोधन के अंत में रंजीत कुमार ने कहा कि आज मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अच्छी पत्रकारिता करना नहीं है, बल्कि उस गलत धारणा का भी सामना करना है जिसे लगातार फैलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि मुख्यधारा की मीडिया अब जनता के साथ नहीं, बल्कि सरकार के साथ खड़ी है। उनके अनुसार, इस धारणा को तथ्यों और जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए चुनौती देने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि जनपक्षधर पत्रकारिता को जानबूझकर पक्षपात के रूप में पेश किया जा रहा है। जबकि मीडिया का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, सरकार या विपक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हितों और सच के साथ खड़ा होना है। इसलिए जरूरी है कि पत्रकार अपने काम के जरिए यह साबित करें कि उनकी प्रतिबद्धता सिर्फ जनता और सत्य के प्रति है।

रंजीत कुमार ने कहा कि समय के साथ मीडिया का स्वरूप और काम करने का तरीका जरूर बदला है, लेकिन पत्रकारिता के मूल मूल्य नहीं बदले हैं। मुख्यधारा की मीडिया आज भी तथ्यों की जांच, खबरों की पुष्टि और जिम्मेदारी के साथ सूचना देने की अपनी भूमिका निभा रही है। इसी कारण फेक न्यूज और अफवाहों के दौर में भी लोग किसी खबर की पुष्टि के लिए विश्वसनीय मीडिया संस्थानों की ओर देखते हैं।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को लेकर जो गलत धारणाएं बनाई जा रही हैं, उन्हें सिर्फ बयान देकर नहीं, बल्कि बेहतर और जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए गलत साबित किया जा सकता है। मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता है और उसे हर हाल में बनाए रखना होगा।

अपने संबोधन का समापन करते हुए रंजीत कुमार ने दोहराया कि पत्रकारों की जवाबदेही किसी सत्ता, विपक्ष या राजनीतिक विचारधारा के प्रति नहीं है। पत्रकारिता का असली धर्म जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना और सच को सामने लाना है। उन्होंने कहा कि मीडिया को इसी मूल भावना के साथ आगे बढ़ना चाहिए और ऐसे हर नैरेटिव का मजबूती से विरोध करना चाहिए, जो मुख्यधारा की पत्रकारिता की साख और विश्वसनीयता पर बिना आधार के सवाल खड़े करता है।

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पत्रकारिता का अगला भविष्य छोटे शहरों और हाइपर लोकल रिपोर्टर्स के पास: शमशेर सिंह

टाइम्स नेटवर्क में डिजिटल (हिंदी व क्षेत्रीय भाषाएं) के मैनेजिंग एडिटर शमशेर सिंह ने मीडिया के बदलते दौर, पत्रकारिता की विश्वसनीयता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर खुलकर अपनी बात रखी।

Last Modified:
Thursday, 06 August, 2026
ShamsherSingh5210

समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में टाइम्स नेटवर्क में डिजिटल (हिंदी व क्षेत्रीय भाषाएं) के मैनेजिंग एडिटर शमशेर सिंह ने मीडिया के बदलते दौर, पत्रकारिता की विश्वसनीयता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), नई पीढ़ी (Gen Z) और पत्रकारों के भविष्य पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले 10-15 दिनों में जिस तरह पूरे देश में मीडिया को लेकर बहस हुई है, उससे पत्रकारिता को एक बार फिर आत्मचिंतन करने की जरूरत है। अब यह सोचने का समय है कि आगे कैसे बढ़ना है और अपनी साख कैसे बचानी है।

शमशेर सिंह ने कहा कि उन्होंने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम किया है। करीब 20-22 साल तक टीवी पत्रकारिता की और अब कई वर्षों से डिजिटल और टीवी दोनों में काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी शुरुआत रिपोर्टर के रूप में हुई थी और लगभग 20 साल तक मैदान में रिपोर्टिंग करने के बाद वे न्यूज़रूम का हिस्सा बने। इस लंबे अनुभव के दौरान उन्होंने मीडिया को लगातार बदलते देखा है और उन्हें साफ दिखाई दे रहा है कि पत्रकारिता का भविष्य किस दिशा में जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पहले जब कोई पत्रकार कहीं यात्रा करता था या किसी सार्वजनिक जगह पर होता था, तो गर्व से कहता था कि वह पत्रकार है। लेकिन आज हालात ऐसे हो गए हैं कि कई बार पत्रकारों को अपनी पहचान छिपानी पड़ती है। उन्होंने अपना एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि हाल ही में फ्लाइट में एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि वे क्या करते हैं। जब उन्होंने बताया कि वे पत्रकार हैं, तो सामने वाले का अगला सवाल ऐसा था जिसे वे सार्वजनिक रूप से भी साझा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि यही सबसे बड़ा फर्क है पहले और आज की पत्रकारिता में।

शमशेर सिंह ने कहा कि पहले मीडिया को जनता अपनी आवाज मानती थी। आंदोलन या प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को बुलाया जाता था क्योंकि लोगों को भरोसा होता था कि मीडिया उनकी बात भी सामने लाएगी और जरूरत पड़ने पर उनकी ढाल भी बनेगी। लेकिन आज स्थिति उलट गई है। जिन लोगों की आवाज कभी मीडिया हुआ करती थी, वही लोग आज मीडिया से दूरी बना रहे हैं और कई बार पत्रकारों को विरोध का सामना करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि मीडिया में अक्सर AI और नई पीढ़ी यानी Gen Z को नौकरी के लिए खतरा माना जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि नेटवर्क18 में रहते हुए उन्होंने एक नया वर्टिकल शुरू किया था, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत Gen Z युवाओं को मौका दिया गया था। उनके साथ काम करके यह महसूस हुआ कि अगर सही दिशा मिले तो नई पीढ़ी और AI पत्रकारिता को और मजबूत बना सकते हैं।

उन्होंने कहा कि पत्रकारों को यह सोच छोड़नी होगी कि AI उनकी नौकरी छीनने आया है। यदि कोई लगातार खुद को नई तकनीक के साथ अपडेट करता रहेगा, तो उसके लिए अवसर हमेशा बने रहेंगे। उन्होंने अपनी मिसाल देते हुए कहा कि उनकी उम्र रिटायरमेंट के करीब है, लेकिन वे अगले दस साल तक भी काम करने का भरोसा रखते हैं क्योंकि उन्होंने समय के साथ खुद को लगातार बदला है। रिपोर्टिंग सीखी, फिर आउटपुट, उसके बाद टीवी, न्यूज़रूम, डिजिटल और जब AI आया तो उन्होंने तीन महीने का AI कोर्स भी किया। उन्होंने Gen Z के युवाओं को अपनी टीम में शामिल किया और उनसे सीखने का भी प्रयास किया।

शमशेर सिंह ने कहा कि आज सबसे बड़ी जरूरत यह है कि पत्रकार खुद को बदलें। AI और नई तकनीकों का सही इस्तेमाल सीखें। जो लोग सिर्फ एक ही कौशल पर टिके रहेंगे, उनके लिए भविष्य मुश्किल हो सकता है।

उन्होंने वेबसाइट पत्रकारिता का उदाहरण देते हुए कहा कि आज कई वेबसाइटों का लगभग 80 प्रतिशत ट्रैफिक Google के बदलावों की वजह से खत्म हो गया है। जिन वेबसाइटों पर पहले करोड़ों व्यूज आते थे, वे अब बहुत कम ट्रैफिक पर आ गई हैं। ऐसे में जब नौकरी जाने के बाद लोग उनके पास आते हैं और वे पूछते हैं कि वेबसाइट के अलावा और क्या-क्या आता है, तो कई लोगों के पास कोई जवाब नहीं होता। न उन्होंने सोशल मीडिया सीखा, न YouTube की तकनीक और न ही AI। इसलिए केवल मीडिया संस्थानों को दोष देने के बजाय पत्रकारों को भी खुद में बदलाव लाना होगा।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का अगला बड़ा भविष्य अब दिल्ली, लखनऊ या बड़े शहरों में नहीं, बल्कि छोटे शहरों और हाइपर लोकल रिपोर्टर्स के पास है। वहीं से असली और मौलिक खबरें आएंगी। उन्होंने कहा कि स्थानीय रिपोर्टर्स की खबरों को आज Google भी प्राथमिकता देता है और दर्शक भी ऐसी खबरें देखना पसंद करते हैं।

शमशेर सिंह ने पत्रकारिता में रिपोर्टिंग की गुणवत्ता पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहले किसी भी बड़ी खबर को प्रसारित करने से पहले दूसरे पक्ष का जवाब जरूर लिया जाता था। कई बार अच्छी स्टोरी सिर्फ इसलिए रोक दी जाती थी क्योंकि संबंधित पक्ष का बयान नहीं मिला था। लेकिन आज कई जगह बिना दूसरे पक्ष का पक्ष लिए ही खबरें चला दी जाती हैं, जिससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है।

उन्होंने कहा कि आज कई एंकर उन विषयों पर लगातार बुलेटिन पढ़ते हैं जिनकी बुनियादी जानकारी भी उनके पास नहीं होती। पहले एंकर रिपोर्टर से बात करते थे, पूरी स्टोरी समझते थे और उसके बाद बुलेटिन पढ़ते थे। लेकिन अब कई बार रिपोर्टर को सिर्फ तैयार स्क्रिप्ट और निर्देश देकर मैदान में भेज दिया जाता है। इससे पत्रकारिता की गुणवत्ता पर असर पड़ा है।

उन्होंने कहा कि आज मीडिया के सामने AI से भी बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। दर्शकों का भरोसा तो कम हुआ ही है, लेकिन मीडिया संस्थानों के भीतर भी कर्मचारी अपने संपादकों और प्रबंधन पर पूरा भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। कई जगह कर्मचारियों को सुबह दफ्तर पहुंचने पर पता चलता है कि उनकी नौकरी खत्म हो गई है। इससे संस्थानों के भीतर भी विश्वास का संकट पैदा हुआ है।

उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी जरूरत अब यही है कि पहले अपने साथियों का भरोसा वापस जीता जाए और फिर दर्शकों का विश्वास लौटाया जाए। संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों को ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां कर्मचारी खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।

शमशेर सिंह ने कहा कि पहले कहा जाता था कि "खबर ही चेहरा है", लेकिन अब स्थिति बदल गई है और "चेहरा ही खबर" बन गया है। इससे भी पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा है।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि हर पत्रकार को समय के साथ खुद को बदलना होगा। AI और Gen Z को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयोगी मानना होगा। साथ ही पूरी मीडिया इंडस्ट्री को मिलकर यह प्रयास करना होगा कि पत्रकारिता की खोई हुई विश्वसनीयता और लोगों का भरोसा दोबारा हासिल किया जा सके।

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TRP की दौड़ ने बदली पत्रकारिता की तस्वीर, अब भरोसा वापस जीतने का वक्त: प्रो. वर्तिका नंदा

लेडी श्रीराम कॉलेज के कम्युनिकेशन विभाग की प्रमुख प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, तकनीक, एआई, टीआरपी की होड़ और मीडिया की गिरती विश्वसनीयता पर विस्तार से अपनी बात रखी।

Last Modified:
Wednesday, 05 August, 2026
VartikaNanda845

समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में लेडी श्रीराम कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के कम्युनिकेशन विभाग की प्रमुख प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), टीआरपी की होड़ और मीडिया की गिरती विश्वसनीयता पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ एआई नहीं, बल्कि लोगों का घटता भरोसा है। अगर पत्रकारिता को बचाना है तो उसे अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा।

अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने श्रोताओं के धैर्य की सराहना करते हुए की। उन्होंने कहा कि इतने लंबे कार्यक्रम में लगातार बने रहना आसान नहीं होता। उन्होंने माहौल को हल्का बनाते हुए कहा कि बीच-बीच में इलायची और पानी की चर्चा भी होती रही, जिसे सुनकर वह मुस्कुराए बिना नहीं रह सकीं।

उन्होंने 1980 की फिल्म 'आप तो ऐसे ना थे' के मशहूर गीत "तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है..." का जिक्र करते हुए कहा कि आज की इस महफिल में उन्हें ऐसा लगा कि हर तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ही चर्चा है। हालांकि उन्होंने कहा कि वह एआई से पहले पत्रकारिता के उस दौर की बात करना चाहेंगी, जिसे कई लोग आज भी याद करते हैं।

प्रो. नंदा ने 1995 में गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय अचानक टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ गई थी। इसके बाद हरियाणा के एक गांव में गड्ढे में गिरे 'प्रिंस' की घटना ने भी टीवी चैनलों को अभूतपूर्व टीआरपी दिलाई। उन्होंने कहा कि यहीं से यह समझ बनने लगी कि ऐसी घटनाओं से बड़ा मुनाफा कमाया जा सकता है और धीरे-धीरे पत्रकारिता का स्वरूप बदलने लगा।

उन्होंने 90 के दशक की पत्रकारिता को याद करते हुए कहा कि उस समय तकनीक नई-नई थी। एनडीटीवी के शुरुआती दिनों में जब न्यूज़रूम में पहला कंप्यूटर आया तो पत्रकार अपनी बारी तय करने के लिए उसके पास रूमाल रख देते थे। उसी दौर में लोगों ने पहली बार जीमेल अकाउंट बनाए और कंप्यूटर से जानकारी खोज पाना ही बड़ी उपलब्धि माना जाता था। उनके मुताबिक उस समय तकनीक ने पत्रकारों को सशक्त बनाया, लेकिन हर तकनीक अपने साथ अवसरों के साथ चुनौतियां भी लेकर आती है। इंसानी दिमाग जब उसका गलत इस्तेमाल करने लगता है तो वही तकनीक अलग रूप ले लेती है।

उन्होंने कहा कि 2000 के बाद पत्रकारिता में तकनीक तेजी से बदली। पेजर और पुराने मोबाइल फोन का दौर खत्म हुआ। उस समय एक फोन कॉल भी महंगी होती थी, इसलिए पत्रकार बेहद संक्षिप्त बातचीत करते थे। फोन उठाते ही पूछा जाता था—"क्या स्टोरी है?" और पांच डब्ल्यू तथा एक एच (5W1H) के आधार पर जरूरी जानकारी लेकर कॉल समाप्त कर दी जाती थी। उन्होंने कहा कि यह पत्रकारिता का बड़ा सबक था कि जब कोई चीज बहुत सस्ती या मुफ्त हो जाती है तो उसका इस्तेमाल कब दुरुपयोग में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता।

प्रो. नंदा ने कहा कि पत्रकारिता का मूल सिद्धांत हमेशा यही रहा है कि जो हुआ है, वही बताया जाए। राय देने के लिए अखबारों में अलग ओपिनियन पेज होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे खबरों में भी राय शामिल होने लगी और पत्रकारिता का संतुलन बिगड़ता चला गया।

उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी आया जब पत्रकारों और एंकरों के आसपास स्टार संस्कृति विकसित हो गई। उनके लिए अलग स्टाफ होता था, कार्यक्रम तय किए जाते थे, उनकी फीस और प्रचार की रणनीति बनाई जाती थी। लेकिन इसी दौरान पत्रकार जमीन से दूर होता चला गया। उन्होंने कहा कि जब पत्रकार जमीन छोड़कर "हवाई जहाज" में पहुंच गया और उसे नीचे उतरने में संकोच होने लगा, तभी समाज की नजर में पत्रकार की छवि बदलनी शुरू हो गई।

उन्होंने उस दौर का भी जिक्र किया जब कार पर लगा 'प्रेस' का स्टीकर सम्मान का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज कई पत्रकार खुद वह स्टीकर हटाते नजर आते हैं और कई बार उन्हें खुद को पत्रकार बताने से पहले भी सोचना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका खामियाजा पूरे पेशे को भुगतना पड़ रहा है।

प्रो. नंदा ने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता सिर्फ टीवी एंकरिंग नहीं है। पत्रकारिता में कैमरा पर्सन, वीडियो एडिटर, ग्राफिक डिजाइनर, संपादक और न्यूज़रूम के तमाम लोग बराबर की भूमिका निभाते हैं। लेकिन कुछ लोगों की वजह से पूरे पेशे की छवि प्रभावित होती है।

उन्होंने कहा कि पत्रकार का असली काम जमीन से जुड़े रहना है। पत्रकार के कान और पैर जमीन पर होने चाहिए और उसे समय की सही समझ होनी चाहिए। यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।

लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ाने के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जब छात्रों से पूछा जाता है कि वे सबसे ज्यादा कौन-सा न्यूज चैनल देखते हैं, तो ज्यादातर छात्र कहते हैं कि वे न्यूज चैनल देखते ही नहीं। दूरदर्शन का नाम शायद ही कोई लेता है। वहीं जब उनसे पसंदीदा पत्रकार का नाम पूछा जाता है तो पहले जहां पांच-सात नाम सामने आते थे, अब छात्रों के पास कोई जवाब नहीं होता। लेकिन अगर पूछा जाए कि कौन-सा पत्रकार पसंद नहीं है, तो जवाबों की कमी नहीं रहती। उन्होंने इसे पत्रकारिता के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।

उन्होंने कहा कि आज भी बड़ी संख्या में छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी बड़े संस्थान का नाम उनके पूरे करियर में काम आएगा। लेकिन उन्होंने हाल ही में एक मीडिया संस्थान से लगभग 120 कर्मचारियों की छंटनी का जिक्र करते हुए कहा कि यह भ्रम भी अब टूट रहा है।

उन्होंने कहा कि किसी पत्रकार की नौकरी जाना कभी बड़ी खबर नहीं बनती। किसी रिपोर्टर को अचानक बुलाकर टर्मिनेशन लेटर दे देना भी खबर नहीं बनती, जबकि उसे यह दर्द चुपचाप सहना पड़ता है।

उन्होंने मीडिया की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक समय दूरदर्शन छोटी-सी तकनीकी गलती पर भी "रुकावट के लिए खेद है" लिखकर दर्शकों से माफी मांगता था, लेकिन आज मीडिया अपनी गलतियों पर माफी मांगने से बचता है। उसे लगता है कि लोग कुछ समय बाद सब भूल जाएंगे, लेकिन इतिहास कुछ नहीं भूलता।

प्रो. नंदा ने कहा कि आज के छात्र पिछले 10 वर्षों की मुश्किल से दो-तीन बड़ी खबरें ही याद रख पाते हैं। उन्हें 2026, 2025 या 2024 की कुछ घटनाएं याद रहती हैं, लेकिन उससे पहले का इतिहास लगभग गायब हो चुका है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ नई पीढ़ी की समस्या नहीं है, बल्कि हमारी भी याददाश्त तकनीक पर निर्भर होती जा रही है।

उन्होंने मीडिया में बढ़ते प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज हेडलाइन से लेकर एंकर के लैपटॉप तक प्रायोजित हैं। बाथरूम क्लीनर जैसे उत्पाद भी समाचारों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। लेकिन इसके बावजूद कुछ चीजें अभी भी बिकी नहीं हैं और यही उम्मीद की सबसे बड़ी वजह है।

जेलों पर अपने लंबे शोध का जिक्र करते हुए प्रो. नंदा ने बताया कि वह अक्सर कैदियों से पूछती हैं कि उन्हें किस पर भरोसा है। ज्यादातर कैदी कहते हैं कि उन्हें सिर्फ खुद पर भरोसा है। जब उनसे पूछा जाता है कि किस पर भरोसा नहीं है, तो उनका जवाब अक्सर पत्रकार और न्यायपालिका होता है। उन्होंने कहा कि जेल के अंदर 24 घंटे न्यूज चैनल भले न चलते हों, लेकिन बाहर की खबरें वहां जरूर पहुंचती हैं और लोगों की सोच पर असर डालती हैं।

उन्होंने कहा कि हर पत्रकार सच जानता है। वह थका हुआ है, परेशान है और कई बार भीतर से टूटा हुआ भी है। बाहर से वह खुद को सफल दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन भीतर जानता है कि व्यवस्था में कई असमानताएं हैं। एक ही न्यूज़रूम में बराबर काम करने वालों की तनख्वाह में कई गुना अंतर है और यह भी पत्रकारिता की एक बड़ी सच्चाई है।

अपने संबोधन के अंत में प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा ने कहा कि आज उपयोग और दुरुपयोग के बीच की दूरी कम हो गई है। भाषा की मर्यादा घटी है और मीडिया पर लोगों का विश्वास भी कमजोर हुआ है। इसके बावजूद उन्हें उम्मीद है कि आने वाला समय बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि यदि उम्मीद खत्म हो गई तो सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं, हम भी नहीं बच पाएंगे।

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टीवी चैनलों को कटघरे में खड़ा करने वालों पर राहुल सिन्हा का पलटवार, कहा- पहले खुद को देखें

Zee News के मैनेजिंग एडिटर राहुल सिन्हा ने कहा कि आज मीडिया जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या नई तकनीक नहीं, बल्कि पत्रकारों की विश्वसनीयता और उनकी सुरक्षा का है।

Last Modified:
Tuesday, 04 August, 2026
RahulSinha41

समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में Zee News के मैनेजिंग एडिटर राहुल सिन्हा ने कहा कि आज मीडिया जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या नई तकनीक नहीं, बल्कि पत्रकारों की विश्वसनीयता और उनकी सुरक्षा का है। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर पत्रकारों के साथ जो हुआ, उसने मुख्यधारा की मीडिया के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।

राहुल सिन्हा ने कहा कि कार्यक्रम में आने से पहले उनके मन में यह विचार था कि वे मीडिया के कल, आज और कल पर बात करेंगे। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली बार भी इसी मंच पर उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और मीडिया के बदलते स्वरूप जैसे विषयों पर अपनी बात रखी थी। लेकिन इस बार उन्हें लगा कि अगर किसी एक मुद्दे पर सबसे पहले चर्चा होनी चाहिए, तो वह जंतर-मंतर पर हुआ वह विरोध प्रदर्शन है, जिसने खासतौर पर मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए बड़ा संकट पैदा कर दिया है।

उन्होंने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी) पर सवाल पिछले कई वर्षों से उठते रहे हैं, लेकिन जंतर-मंतर की घटना ने इस बहस को एक नए मोड़ पर ला दिया है। अपनी बात को समझाने के लिए राहुल सिन्हा ने दो पुराने अनुभव साझा किए।

उन्होंने बताया कि एक बार वह सूरत में बाढ़ की कवरेज के लिए पहुंचे थे। जैसे ही वह वहां उतरे, लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और कहा कि तीन दिन से लोग भूखे हैं, खाना नहीं मिल रहा और मीडिया अब पहुंच रही है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उस समय लोगों का गुस्सा पूरी तरह जायज था, क्योंकि उनकी मीडिया से उम्मीदें थीं। उन्हें भरोसा था कि मीडिया उनकी परेशानी देश तक पहुंचाएगी।

उन्होंने दूसरा उदाहरण केदारनाथ आपदा का दिया। उन्होंने कहा कि जब पत्रकार ऊपर की ओर जा रहे थे, तब नीचे लौट रहे लोग उनसे नाराज हो रहे थे। लोग कह रहे थे कि इतने लोग मारे गए और मीडिया अब पहुंच रही है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उस समय लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि वहां तक पहुंचना बेहद मुश्किल था और पत्रकारों को पैदल चढ़ाई करके जाना पड़ रहा था। इसके बावजूद लोगों का गुस्सा इसलिए था क्योंकि उन्हें मीडिया से उम्मीद थी कि वह उनकी आवाज बनेगी।

राहुल सिन्हा ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना इन दोनों घटनाओं से पूरी तरह अलग थी। वहां लोगों के मन में मीडिया से कोई अपेक्षा या उम्मीद नहीं थी, बल्कि सीधे-सीधे नफरत दिखाई दे रही थी। उन्होंने कहा कि वह इसे केवल गुस्सा नहीं कहेंगे, बल्कि यह मीडिया के प्रति नफरत थी।

उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोग रिपोर्टरों, एंकरों और एडिटरों को सिर्फ उनके हाथ में माइक देखकर गालियां दे रहे थे। उन्हें 'गोदी मीडिया' जैसे कई नामों से पुकारा जा रहा था। लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, तो उनके पास कोई ठोस तर्क नहीं था।

राहुल सिन्हा ने कहा कि पहले दिन वहां लगभग सभी बड़े न्यूज चैनलों के रिपोर्टर मौजूद थे। यह किसी एक चैनल का मामला नहीं था। Zee News, Aaj Tak, Times Now, Republic या किसी दूसरे चैनल के रिपोर्टर- लगभग हर चैनल के पत्रकारों के साथ वहां बदसलूकी हुई। उन्हें धक्का दिया गया, गालियां दी गईं और कई मामलों में मारपीट तक की गई।

उन्होंने कहा कि सबसे हैरानी की बात यह थी कि ये सभी पत्रकार वहां प्रदर्शनकारियों की आवाज देश तक पहुंचाने के लिए गए थे। किसी भी रिपोर्टर ने उनकी बात दबाने की कोशिश नहीं की थी। किसी ने उनके सामने से माइक हटाकर अपनी बात थोपने की कोशिश नहीं की। इसके बावजूद पत्रकारों को वहां से भगाया गया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया।

राहुल सिन्हा ने कहा कि यही सवाल सबसे ज्यादा गंभीर है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उस भीड़ का मामला नहीं है, बल्कि पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए भी गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से पत्रकारों के बीच आत्ममंथन और आत्म-आलोचना का दौर लगातार चल रहा है। मीडिया के भीतर ही लोग बार-बार कह रहे हैं कि टीवी पत्रकारिता खत्म हो गई है, टीवी में अब पत्रकारिता नहीं होती और वहां काम करने वाले लोगों के पास सोच या गंभीरता नहीं बची है। राहुल सिन्हा ने कहा कि इस सोच पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। 

राहुल सिन्हा ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना पर जितनी चर्चा उस भीड़ को लेकर होनी चाहिए, उतनी ही मीडिया जगत को भी अपने भीतर झांकने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से पत्रकारों के बीच आत्ममंथन और आत्म-आलोचना का दौर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। अक्सर यह कहा जाता है कि टीवी पत्रकारिता की हालत खराब हो गई है, टीवी पर अब पत्रकारिता नहीं होती और वहां काम करने वाले पत्रकार गंभीर नहीं रह गए हैं।

उन्होंने कहा कि यह सवाल उठाने वाले अधिकतर वही लोग हैं, जो लंबे समय तक मेनस्ट्रीम मीडिया का हिस्सा रहे और अब उसके बाहर निकलने के बाद लगातार यह कह रहे हैं कि टेलीविजन पत्रकारिता खत्म हो चुकी है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उन्हें यह सोच एकतरफा लगती है।

उन्होंने कहा कि उन्होंने वह दौर भी देखा है जब न्यूज चैनलों पर दिनभर अपराध की खबरें, फैशन टीवी की मॉडल्स, राखी सावंत, भूत-प्रेत, सांप, मदारी जैसे विषय खूब दिखाए जाते थे। उस समय भी यही पत्रकार इस इंडस्ट्री में काम कर रहे थे, लेकिन तब किसी ने यह नहीं कहा कि पत्रकारिता खत्म हो गई है। आज अचानक यह कहना कि टीवी पत्रकारिता में कुछ नहीं बचा, उचित नहीं है।

राहुल सिन्हा ने कहा कि अगर देश में मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर टीवी न्यूज इंडस्ट्री को लगातार निशाना बनाया जाएगा, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ पत्रकारों को नहीं होगा, बल्कि उन करोड़ों लोगों को होगा, जिनकी आवाज न्यूज चैनल देश तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि इस खतरे को सभी समाचार चैनलों को मिलकर समझना होगा।

उन्होंने कहा कि अगर जंतर-मंतर जैसी घटनाओं के बाद रिपोर्टर मैदान में जाने से डरने लगेंगे और उन्हें यह महसूस होने लगेगा कि भीड़ के बीच जाने पर उनकी लिंचिंग हो सकती है, तो यह पत्रकारिता के लिए बेहद खतरनाक स्थिति होगी। ऐसे माहौल में वही लोग सफल होंगे जो चाहते हैं कि सिर्फ उनका नैरेटिव चले और वही बातें दिखाई जाएं, जिनसे वे सहमत हों।

राहुल सिन्हा ने कहा कि आज सबसे बड़ा संकट यह है कि बिना किसी ठोस वजह के रिपोर्टरों और न्यूज चैनलों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब लिंचिंग सिर्फ सड़क पर नहीं हो रही, बल्कि सोशल मीडिया पर भी शब्दों के जरिए पत्रकारों की लिंचिंग की जा रही है। वहीं जमीन पर रिपोर्टरों के साथ धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और मारपीट जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।

उन्होंने कहा कि अगर मीडिया के कल, आज और आने वाले कल की बात करें तो सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कैसे बचाया जाए। उन्होंने कहा कि इसके लिए मीडिया को हर बार खुद को ही दोषी ठहराना बंद करना होगा। बार-बार यह कहना कि हम गलत दिखाते हैं, हम पत्रकारिता नहीं करते, हम नैतिकता का पालन नहीं करते- यह सोच भी सही नहीं है।

राहुल सिन्हा ने कहा कि लोग वही देखते हैं, जो उन्हें महत्वपूर्ण लगता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टीवी पत्रकारिता गंभीर मुद्दे नहीं उठाती। उन्होंने राणा यशवंत की बात का जिक्र करते हुए कहा कि पेपर लीक, नकल, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी या किसी बड़े मंत्री के बेटे से जुड़ा विवाद- ऐसा कौन-सा मुद्दा है जिसे टीवी चैनलों ने नहीं उठाया?

उन्होंने कहा कि वह किसी एक चैनल की नहीं, बल्कि पूरी टीवी इंडस्ट्री की बात कर रहे हैं। उन्होंने भरत तिवारी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब पुलिस गोलीकांड जैसी घटनाएं हुईं, तब न्यूज चैनलों ने उन्हें प्रमुखता से उठाया और उसके बाद कार्रवाई भी हुई। लेकिन इन सकारात्मक उदाहरणों का जिक्र शायद ही कभी किया जाता है।

राहुल सिन्हा ने कहा कि अक्सर सिर्फ यह नैरेटिव बनाया जाता है कि टीवी चैनल बिके हुए हैं और उनके अपने हित जुड़े हुए हैं। जबकि यह आरोप लगाने वाले कई लोग खुद सिर्फ अपने सब्सक्राइबर बढ़ाने और अपनी पहुंच बढ़ाने में लगे रहते हैं। अगर उनके सब्सक्राइबर बढ़ना बंद हो जाएं, तो उनका पूरा मॉडल ही प्रभावित हो जाएगा। इसलिए नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले हर किसी को खुद का भी आकलन करना चाहिए। 

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