इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस का जोखिम केवल गोली या पत्थर तक सीमित नहीं है, बल्कि महामारी, संक्रमण, लंबी ड्यूटी और मानसिक तनाव भी उनकी सेवा का हिस्सा हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
दिल्ली में छात्र आंदोलन के अंतिम चरण में उग्र भीड़ और पुलिस के टकराव ने एक गंभीर विवाद पैदा कर दिया। छात्रों और उनके समर्थकों के अलावा असामाजिक तत्वों तथा अपराधियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर राहुल गांधी और उनके गठबंधन के नेताओं ने बर्बर लाठीचार्ज, गोलीबारी और हजारों लोगों के घायल होने जैसे अनर्गल आरोप संसद से लेकर सड़क तक लगाए। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के बाद अब देश के गृह मंत्री अमित शाह को भी पुलिस की कथित ज्यादती का दोषी ठहराकर उनका इस्तीफा मांगा जा रहा है।
असली निशाना तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। प्रतिपक्ष यह क्यों भूल जाता है कि यदि अगली बार पुलिस हिंसक भीड़ को संसद या विधानसभा में घुसने से रोकने के बजाय लाठी, आंसू गैस और बंदूक नीचे रख दे, तो क्या स्थिति होगी? यदि पुलिस किसी राज्य में अपनी सुरक्षा और सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतर जाए, तो नेताओं और जनता का क्या होगा?
राहुल गांधी को उनके पालतू सलाहकार या अमेरिकी अंकल शायद न जानते हों, लेकिन पुराने कांग्रेसी 1973 में कांग्रेस शासन के दौरान प्रादेशिक सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) के आंदोलन की जानकारी अवश्य रखते होंगे। तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सेना बुलाने की गुहार लगानी पड़ी थी। सेना की कार्रवाई में करीब 35 पुलिसकर्मी मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। अंततः मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और राष्ट्रपति शासन लगाकर स्थिति पर नियंत्रण किया गया।
दिल्ली का रामलीला मैदान और जंतर-मंतर लंबे समय से लोकतांत्रिक विरोध और असहमति की आवाज उठाने के प्रमुख स्थल रहे हैं। अन्ना आंदोलन से लेकर किसानों, पहलवानों, छात्रों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के आंदोलनों तक यहां प्रदर्शन होते रहे हैं।
इसलिए इन्हें लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। लेकिन हाल ही में अमेरिका से उतरी कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा छात्रों की परीक्षाओं में गड़बड़ियां रोकने की मांग को लेकर 20 जुलाई 2026 को आयोजित "संसद चलो" प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर और नई दिल्ली क्षेत्र में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच गंभीर टकराव हुआ। दिल्ली पुलिस के अनुसार इस हिंसा में 118 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे। बाद की रिपोर्टों में घायल पुलिसकर्मियों की संख्या 129 तक बताई गई। लगभग 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और करीब 60 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी रिपोर्ट सामने आई।
इसके बाद 31 जुलाई को घायल दिल्ली पुलिसकर्मियों के परिवारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। परिवारों के अनुसार अग्रिम पंक्ति में तैनात जवानों को भीड़ ने घेरा, उन पर पत्थर फेंके और शारीरिक हमला किया। कुछ पुलिसकर्मियों की गंभीर चोटों का भी उल्लेख किया गया।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और अन्य कार्रवाई के आरोप लगाए। राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के सक्रिय होने के बाद विदेशों में बैठे मानवाधिकार संगठनों ने भी भारतीय लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करते हुए इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया। इन संस्थाओं ने 20 जुलाई की कार्रवाई में अत्यधिक बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के उल्लंघन की आशंका जताई। इसलिए लोकतंत्र में मूल प्रश्न यह नहीं है कि पुलिस सही थी या प्रदर्शनकारी। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि राजधानी के सबसे संवेदनशील प्रदर्शन क्षेत्र में भी पुलिसकर्मी सीधे भीड़ के हमले का शिकार हो जाते हैं, तो कानून-व्यवस्था कैसे कायम रहेगी।
यदि पुलिसकर्मियों को हजारों लोगों की भीड़ नियंत्रित करनी है, तो उनके पास पर्याप्त अधिकार, संसाधन, आवश्यकता पड़ने पर रैपिड फोर्स का सहयोग तथा सरकार ही नहीं, प्रतिपक्ष और समाज का भी विश्वास एवं समर्थन होना चाहिए। उन्हें यह भरोसा भी होना चाहिए कि ड्यूटी के दौरान गंभीर चोट लगने या मृत्यु होने पर उनके परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता, बीमा और चिकित्सा सुविधा मिलेगी।
इसे संयोग ही कहा जाएगा कि हाल की घटना पर देशभर में बहस के बीच 2020 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान आम आदमी पार्टी के पार्षद की अगुवाई में दिल्ली पुलिस की सहायता कर रहे केंद्रीय खुफिया ब्यूरो (आईबी) के युवा अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या मामले में अदालत का फैसला आया। अदालत ने बताया कि नेता ताहिर हुसैन और चार अन्य आरोपियों ने अत्यंत क्रूरता के साथ अंकित शर्मा की हत्या कर उनका शव नाले में फेंक दिया।
घटना के समय अंकित शर्मा निहत्थे थे। सामान्यतः खुफिया विभाग के अधिकारी बिना हथियार के भीड़ और संवेदनशील क्षेत्रों में स्थिति का आकलन करने तथा अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने का कार्य करते हैं। अदालत ने उनके शरीर पर 51 चोटों और सात घातक घावों का उल्लेख करते हुए इसे अत्यंत क्रूर हत्या बताया और दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
अभियोजन पक्ष ने मृत्युदंड की मांग की थी। यह फैसला केवल 2020 के दिल्ली दंगों का मामला नहीं है, बल्कि यह भी प्रश्न उठाता है कि जब भीड़ कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले पुलिसकर्मियों, सुरक्षा कर्मियों और खुफिया अधिकारियों को ही निशाना बनाने लगे, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगी।
वर्तमान में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को 1973 के आंदोलन को भी याद करना चाहिए, जो छात्रों की समस्याओं, पुलिस के सम्मान, कार्य परिस्थितियों, आवास, अवकाश, संगठन बनाने के अधिकार और वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार से जुड़ी शिकायतों से जुड़ा था। उस समय मैं दिल्ली में हिन्दुस्थान समाचार समाचार एजेंसी का संवाददाता था और संसद तथा राजनीति को कवर करता था।
संसद में इस मुद्दे की गूंज स्वयं देखी और सुनी है। आज बढ़ती आबादी, बढ़ती अपेक्षाओं और देश-विदेश की भारत विरोधी ताकतों के इरादों के साथ-साथ डिजिटल और इंटरनेट माध्यमों से सही-गलत सूचनाओं तथा अफवाहों के तेजी से फैलने की स्थिति को भी समझना होगा।
मार्च 1973 में अधीनस्थ पुलिसकर्मियों के बीच संगठनात्मक गतिविधियां तेज हुईं। अप्रैल में अनुशासन संबंधी विरोध के संकेत मिले और मई आते-आते असंतोष खुली चुनौती में बदल गया। लखनऊ विश्वविद्यालय इस विस्फोट का केंद्र बना। विश्वविद्यालय में परीक्षाओं के दौरान पीएसी की तैनाती को लेकर छात्रों में भी असंतोष था। मई 1973 में पीएसी के कुछ असंतुष्ट जवानों और छात्रों के आंदोलन का संपर्क हुआ।
देखते-देखते "पीएसी-छात्र एकता" के नारे लगने लगे। स्थिति तब गंभीर हो गई, जब पीएसी के कुछ जवान छात्रों के साथ विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए और विश्वविद्यालय परिसर में हिंसा तथा आगजनी होने लगी। विश्वविद्यालय की कई इमारतों, परीक्षा शाखा, रजिस्ट्रार कार्यालय और अन्य परिसरों को नुकसान पहुंचा। हालात इतने बिगड़ गए कि भारतीय सेना को विश्वविद्यालय परिसर में बुलाना पड़ा। सेना ने परिसर को घेरकर छात्रावासों को नियंत्रित किया और प्रवेश पर निगरानी शुरू की।
पुलिस का असंतोष और विद्रोह अंततः दबा दिया गया। कई जवानों पर मुकदमे चले, अनेक मारे गए, सैकड़ों गिरफ्तार और बर्खास्त किए गए। लेकिन सरकार पर इतना राजनीतिक दबाव पड़ा कि मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी को पद छोड़ना पड़ा और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। 1973 की यह घटना केवल पुलिस इतिहास नहीं थी, बल्कि पुलिस असंतोष, छात्र आंदोलन, प्रशासनिक विफलता, हथियारबंद विद्रोह, सेना के हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन का संयुक्त उदाहरण थी।
पिछले लगभग 20 वर्षों में पुलिस और सुरक्षा बलों को प्रदर्शन, दंगों, सांप्रदायिक हिंसा और भीड़ की हिंसा के दौरान कई बार निशाना बनाया गया है। 16 दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद दिल्ली में हुए विशाल प्रदर्शन के दौरान कांस्टेबल सुभाष तोमर गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। दिसंबर 2018 में बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई।
इसी महीने गाजीपुर में प्रधानमंत्री की सभा से लौट रहे पुलिसकर्मियों पर भीड़ ने पथराव किया, जिसमें कांस्टेबल सुरेश वत्स की मृत्यु हो गई। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस को पर्याप्त सुरक्षात्मक उपकरण और संस्थागत संरक्षण प्राप्त है।
नवंबर 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक टकराव के बाद लगभग 2,000 पुलिसकर्मी और उनके परिवारजन पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन के लिए पहुंचे। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि पुलिसकर्मी स्वयं अपनी सुरक्षा और संस्थागत संरक्षण की मांग लेकर सड़क पर उतरे थे। यह सामान्य ट्रेड यूनियन आंदोलन नहीं, बल्कि पुलिस बल के भीतर बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्ति थी।
2020 में कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन लागू कराने की जिम्मेदारी पुलिस पर थी। इस दौरान कई राज्यों में पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। महाराष्ट्र में दायर एक जनहित याचिका में दावा किया गया कि लॉकडाउन लागू कराने के दौरान 97 पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। इससे स्पष्ट होता है कि पुलिस का जोखिम केवल गोली या पत्थर तक सीमित नहीं है, बल्कि महामारी, संक्रमण, लंबी ड्यूटी और मानसिक तनाव भी उनकी सेवा का हिस्सा हैं।
26 जनवरी 2021 के किसान ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली में 394 पुलिसकर्मी घायल हुए। कई स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हुआ तथा लाल किले में बैरिकेड तोड़कर प्रदर्शनकारियों के प्रवेश की घटनाएं सामने आईं। किसान आंदोलन के दौरान सिंघु बॉर्डर पर भी पुलिसकर्मियों पर हमले हुए। इन घटनाओं ने पुलिस के सामने यह कठिन चुनौती रखी कि एक ओर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार की रक्षा की जाए और दूसरी ओर हिंसा, पथराव तथा पुलिस पर हमलों की स्थिति में कानून-व्यवस्था भी बनाए रखी जाए।
इसलिए संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था और भारतीय समाज को लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर होने वाले अनियंत्रित आंदोलनों और उपद्रवों को समय रहते नियंत्रित करने के उपायों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो. संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की हिंदी सेवा एक नहीं, अनेक दृष्टियों से ध्यान देने योग्य है। मूलतः गुजरातीभाषी श्री शाह स्वयं हिंदी में काम करते हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर हिंदी में सरकारी कामकाज बढ़ा है। श्री शाह के कारण सरकारी पत्रावलियां हिंदी में बनती हैं। श्री शाह के मार्गदर्शन में केंद्रीय गृह मंत्रालय राजभाषा हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं, अनुवाद-कार्य और हिंदी-सलाहकार समितियों के माध्यम से लगातार प्रयासरत है। श्री शाह हिंदी को प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता और उच्च ज्ञान-विमर्श की भाषा बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण सामग्री, आधुनिक शब्दावली और अनुवाद की मजबूत व्यवस्था की अनवरत हिमायत करते हैं।
हिंदी के प्रति अमित शाह का लगाव केवल औपचारिक राजभाषा-नीति तक सीमित नहीं दिखाई देता। वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के अवसर पर उन्होंने हिंदी को स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से जोड़ा था। गत वर्ष 2025 में भी श्री शाह ने हिंदी दिवस पर आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में हिंदी के संवर्धन से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर बल दिया था।
पिछले एक वर्ष में माननीय गृह मंत्री जी के नेतृत्व में राजभाषा विभाग ने हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के लिए भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। जून 2025 में भारतीय भाषा अनुभाग की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाना और उन्हें तकनीक तथा प्रशासन से जोड़ना है। इस पहल से राजभाषा विभाग के काम का दायरा भी व्यापक हुआ है। विभाग ने नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों यानी नराकासों के काम को प्रोत्साहित करने के लिए ‘नराकास प्रोत्साहन सम्मान’ की व्यवस्था भी शुरू की है। इससे उन नराकासों को आगे आने का अवसर मिलेगा, जो अपने क्षेत्र में राजभाषा के काम को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा रही हैं।
तकनीक के क्षेत्र में भी राजभाषा विभाग ने नई पहल की है। ‘भारती - बहुभाषी अनुवाद सारथी’ के माध्यम से हिंदी से भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को आसान बनाने की दिशा में काम हुआ है। इसके साथ ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ जैसे शब्दकोश को भी विकसित किया गया है। ‘हिंदी शब्द-सिंधु’ में विभिन्न भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य हिंदी को दूसरी भारतीय भाषाओं से जोड़ना है, न कि उनसे अलग करना। इन प्रयासों से साफ है कि राजभाषा का काम अब केवल सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग तक सीमित नहीं है। यह भाषा, तकनीक और भारतीय भाषाओं के बीच नए संबंध बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
श्री शाह के हिंदी प्रेम का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि वे हिंदी को भारतीय भाषाओं की प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उनके साथ चलने वाली भाषा के रूप में देखते हैं। अमित शाह का हिंदी प्रेम हिंदी के विकास के साथ भारतीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के रूप में आगे बढ़ता है। कहना न होगा कि यह दृष्टि भारतीय भाषायी एकता को मजबूत करनेवाली है।
हिंदी की वास्तविक शक्ति उसकी आत्मीयता, समावेशिता और संवादधर्मिता में है। भारत में हिंदी का विस्तार तभी सार्थक होगा, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान और संवाद का भाव लेकर आगे बढ़े। हिंदी का भारतीय भाषाओं से संबंध वर्चस्व का नहीं, आदान-प्रदान का होना चाहिए। भारतीय भाषाओं का इतिहास भी प्रतिस्पर्धा का इतिहास नहीं, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान का इतिहास है।
हिंदी ने दूसरी भारतीय भाषाओं से असंख्य शब्द, मुहावरे, साहित्यिक संस्कार और विचार ग्रहण किए हैं। दूसरी ओर हिंदी के माध्यम से भी अनेक भारतीय भाषाओं का साहित्य व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचा है। इसलिए हिंदी को संपर्क और सेतु की भाषा के रूप में विकसित किया जा सका है।
श्री शाह का यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है कि हिंदी की समृद्धि भारतीय भाषाओं की समृद्धि से जुड़ी है। भारतीय भाषाओं की विविधता का सम्मान बनाए रखना ही भारत की भाषायी वास्तविकता के अनुरूप है। श्री अमित शाह का यह विचार आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। श्री शाह के लिए हिंदी का समर्थन किसी एक क्षेत्रीय पहचान का विस्तार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर संचार की एक साझा भाषा को मजबूत करने का प्रयास है।
भारत की भाषायी परंपरा में हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि उसे देश के बड़े भूभाग में समझा और बोला जाता है, बल्कि इसलिए भी है कि उसने विभिन्न प्रदेशों, समुदायों और भाषायी संस्कृतियों के बीच संवाद का माध्यम बनने की ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन अनुवाद, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रकाशन के दौर में हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर हैं।
यदि हिंदी में उच्चस्तरीय वैज्ञानिक, तकनीकी, दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान संबंधी सामग्री का पर्याप्त निर्माण होता है, तो वह ज्ञान की भाषा के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत कर सकती है। साथ ही यही तकनीक अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए भी इस्तेमाल की जानी चाहिए।
श्री शाह उन गुजरातीभाषी मनीषियों की पांत में आ गए हैं जिनमें स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक की हिंदी के प्रति आग्रह की एक ऐसी परंपरा दिखाई देती है, जिसमें हिंदी को राष्ट्रीय संवाद और जनजागरण की भाषा बनाने की आकांक्षा प्रमुख रही है।
हिंदी के अनेक हिंदीतरभाषियों ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी को अपनाया। दयानंद सरस्वती ने संस्कृत के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद अपने सामाजिक और धार्मिक सुधार के संदेश को केवल संस्कृत के विद्वत् वर्ग तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जनसाधारण तक पहुँचने के लिए हिंदी का सहारा लिया। उनकी प्रसिद्ध कृति सत्यार्थ प्रकाश मूलतः हिंदी में लिखी गई।
इसी तरह महात्मा गांधी मूलतः गुजरातीभाषी थे किंतु हिंदी में अखबार निकाले और हिंदी के महत्व को एक अलग राजनीतिक और राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए उन्होंने अपने पुत्र देवदास गांधी को भेजा और 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाया।
वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संवाद में हिंदी का व्यापक प्रयोग दिखाई देता है। वे देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से संवाद करते हुए हिंदी का प्रयोग करते हैं और भारतीय भाषाओं के महत्व पर भी जोर देते रहे हैं।
दयानंद सरस्वती, गांधी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह - इन चारों की हिंदी संबंधी दृष्टियों को एक साथ देखने पर हिंदी के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र निकलता है: हिंदी जितनी जनभाषा होगी, उतनी ही प्रभावी होगी; जितनी समावेशी होगी, उतनी ही स्वीकार्य होगी; और जितनी भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी, उतनी ही समृद्ध होगी।
हिंदी प्रेम का सर्वोच्च रूप हिंदी को दूसरों पर थोपना नहीं, बल्कि उसे ऐसा सक्षम माध्यम बनाना है जो भारत की विविध आवाजों को एक-दूसरे तक पहुँचाए। दयानंद ने हिंदी को जनजागरण का माध्यम बनाया, गांधी ने उसे राष्ट्रीय संवाद की शक्ति दी और आज हिंदी के सामने डिजिटल युग में विश्वव्यापी संवाद की नई संभावनाएँ हैं।
इन पड़ावों को जोड़कर देखा जाए तो हिंदी की यात्रा केवल एक भाषा की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में संवाद, जागरण और आत्मविश्वास की यात्रा भी है। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना को भी अपने भीतर संजोए रहती है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न इसलिए और अधिक संवेदनशील हो जाता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
पत्रकारिता के दौरान मैंने नेताओं को बनते, बदलते और वक्त के साथ राजनीतिक पहचान गढ़ते देखा है। मेरे लिए ‘ब्रैंड मोदी’ को छह शब्दों में समझा जा सकता है- व्यक्ति, कहानी, संदेश, संचार, संगठन और डिलीवरी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
शमशेर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।।
पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन मना रहा है। इस मौके पर पीछे मुड़कर देखें तो एक सवाल बेहद दिलचस्प है- आखिर कोई राजनेता सिर्फ नेता से एक राजनीतिक ब्रैंड कैसे बनता है?
करीब तीन दशक की अपनी पत्रकारिता के दौरान मैंने नेताओं को बनते, बदलते और वक्त के साथ अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ते देखा है। इसी दौरान मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को भी सीधे तौर पर देखने, कवर करने और करीब से समझने का अवसर मिला है। गुजरात से दिल्ली, फिर दिल्ली से गुजरात और फिर गुजरात से दिल्ली। गुजरात की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक।
इस दौरान मैंने सिर्फ एक नेता को बदलते नहीं देखा, बल्कि बढ़ते, चमकते, एक राजनीतिक ब्रैंड को बनते और लगातार विकसित होते देखा है। लेकिन मोदी ने सिर्फ राजनीति नहीं की, अपने नाम को एक ब्रैंड में बदला। मेरे लिए ‘ब्रैंड मोदी’ को छह शब्दों में समझा जा सकता है- व्यक्ति, कहानी, संदेश, संचार, संगठन और डिलीवरी।
एक व्यक्ति के तौर पर उनकी एक अलग पहचान है, अपनी अलग शैली है और प्रेजेंटेशन भी बिल्कुल अलग है। उनकी कहानी और भी दिलचस्प और प्रेरणादायक है- वडनगर से दिल्ली तक का सफर, जो लगातार उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बना। संदेश भी साफ है- विकास, राष्ट्र निर्माण, गरीब कल्याण, आत्मनिर्भरता और विकसित भारत जैसे स्पष्ट और दोहराए जाने वाले नैरेटिव। संचार तो जबरदस्त है। भाषण, सभा से सोशल मीडिया तक, टीवी से ‘मन की बात’ तक।
संगठन, व्यक्ति की पहचान को कार्यकर्ता और बूथ स्तर तक पहुंचाने वाला मजबूत राजनीतिक नेटवर्क है। रही बात डिलीवरी की, तो वह दुनिया के सामने है। नीतियां, योजनाएं, फैसले, दुनिया के मंच पर भारत की छवि और बड़े राष्ट्रीय आयोजन। ब्रिक्स इसका ताजा उदाहरण है।
दरअसल, किसी नेता की असली कहानी सिर्फ उसके भाषणों में नहीं होती। लोगों के बीच उनकी मौजूदगी, लोगों से उनका संवाद, मीडिया से उनका रिश्ता और समय के साथ बदलती उनकी कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजी- ये सब मिलकर उनकी राजनीतिक पहचान बनाते हैं। और नरेंद्र मोदी के मामले में यह प्रक्रिया लगातार दिखाई देती रही है। तभी तो ‘मोदी’ अब सिर्फ एक नाम नहीं है; यह एक पूरा पॉलिटिकल कम्युनिकेशन आर्किटेक्चर है।
सिर्फ लोकप्रियता से कोई राजनेता ब्रैंड नहीं बन सकता। ब्रैंड बनने के लिए अपनी Identity, Credibility, Consistency, Visibility और Public Connection बेहद जरूरी है। ये Political Brand के Pillars हैं। इनमें एक भी कमजोर हो, तो ब्रैंड का लंबे समय तक टिकना मुश्किल होता है।
मोदी ने राजनीति को सिर्फ नीतियों और भाषणों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने सार्वजनिक संचार में एक ऐसी भाषा विकसित की, जो राजनीतिक मंच से निकलकर आम बातचीत का हिस्सा बनी। “मन की बात”, सोशल मीडिया, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम, रेडियो, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सीधे जनता से संवाद- इन सभी माध्यमों का लगातार इस्तेमाल इस ब्रैंड की पहचान बना।
ब्रैंड भाषणों से बन सकता है, लेकिन लंबे समय तक टिकता है तो उसके पीछे नीतियां, निर्णय, संगठन और जनता का अनुभव भी होना चाहिए। “ब्रैंड मोदी” की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह केवल एक नेता की कहानी नहीं है। यह भारतीय राजनीति के बदलते Communication Landscape की भी कहानी है। मजबूत Communication और Governance Experience के बीच लगातार तालमेल की कहानी है।
करीब 25 वर्षों की सार्वजनिक यात्रा को इसलिए केवल सत्ता और चुनावों की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा। यह भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व, संचार और राजनीतिक ब्रैंडिंग के बदलते स्वरूप की भी कहानी है। और एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए शायद यही ‘ब्रैंड मोदी’ का सबसे दिलचस्प पहलू है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक 'टाइम्स नेटवर्क' में मैनेजिंग एडिटर-डिजिटल (हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाएं) के पद पर कार्यरत हैं।)
नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। मेरी कामना है कि उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में शांति और समाज की प्रगति के लिए भी बड़ी सफलता मिले।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।।
राजनीति में 25 साल का समय काफी लंबा होता है। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक नारे गायब हो जाते हैं, मीडिया की तकनीक बदल जाती है और लोगों की धारणाएं लगातार बदलती रहती हैं। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी करीब ढाई दशक से भारत की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर 2026 में प्रधानमंत्री के तौर पर 12 साल पूरे करने तक उनकी राजनीतिक यात्रा लगातार चर्चा में रही है।
‘Brand Modi’ का विकास केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक कहानी नहीं है। यह राजनीतिक संचार, लेखन, संगठन, मीडिया संबंधों, तकनीक और एक ऐसी राजनीतिक पहचान को लगातार नए रूप में पेश करने की कहानी भी है, जिसमें मूल पहचान को बरकरार रखा गया।
नरेंद्र मोदी केवल ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं हैं, जिन्हें एक पत्रकार के तौर पर देखा गया है। उनसे और उनके परिवार के सदस्यों से लंबे समय से जुड़ाव रहा है। इस संबंध का एक साहित्यिक पक्ष भी रहा है। नरेंद्र मोदी ने ‘नमन नर्मदा’ और ‘सोशल रिफॉर्म इन इंडिया’ पुस्तकों की भूमिका लिखी। जनवरी 2026 में ‘रिवोल्यूशनरी राज: नरेंद्र मोदीज 25 इयर्स’ नामक कॉफी-टेबल बुक जारी हुई, जिसमें नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को तस्वीरों, घटनाओं और पत्रकारिता के अनुभवों के माध्यम से दर्ज किया गया है।
इसकी भूमिका गृहमंत्री अमित शाह ने लिखी है, जो नरेंद्र मोदी के करीबी राजनीतिक सहयोगियों में से एक और भाजपा के संगठनात्मक विस्तार से जुड़े महत्वपूर्ण नेताओं में रहे हैं। यह व्यक्तिगत जुड़ाव ‘Brand Modi’ को केवल चुनावी घटना के तौर पर नहीं, बल्कि एक बदलती संचार शैली के रूप में देखने का एक अलग नजरिया देता है।
लेखन में भी रही नरेंद्र मोदी की रुचि: नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है, जो उनकी राजनीतिक यात्रा के सामने अक्सर पीछे छूट जाता है और वह है लेखन में उनकी लंबे समय से रही रुचि। उनका शुरुआती लेखन मुख्य रूप से गुजराती में रहा, जो उनकी मातृभाषा है। उनकी पहली पुस्तक ‘संघर्ष मा गुजरात’ आपातकाल के बाद लिखी गई और 1978 में गुजराती में प्रकाशित हुई। इसमें आपातकाल के दौरान गुजरात में राजनीतिक संघर्ष से जुड़े उनके अनुभवों और टिप्पणियों को दर्ज किया गया था। बाद में इस पुस्तक के कई संस्करण भी आए। यह पहलू नरेंद्र मोदी की बाद की संचार शैली को समझने में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक कम्युनिकेटर बनने से पहले ही उनके अनुभव में लेखक की भूमिका जुड़ी हुई थी।
आपातकाल के दौरान नरेंद्र मोदी युवा आरएसएस प्रचारक के तौर पर भूमिगत रहकर काम कर रहे थे। उस समय गुप्त तरीके से संवाद करना, साहित्य का वितरण करना और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच संपर्क बनाए रखना उनके अनुभवों का हिस्सा रहा। बाद में इन अनुभवों ने उनकी नजर से उस दौर का एक राजनीतिक इतिहास भी तैयार किया।
2025 में अमित शाह ने ‘द इमरजेंसी डायरीज: ईयर्स दैट फोर्ज्ड अ लीडर’ पुस्तक का विमोचन किया। इसमें आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान नरेंद्र मोदी के अनुभवों को शामिल किया गया है। इस पुस्तक में सेंसरशिप, दमन और व्यापक आंदोलन से जुड़े अनुभवों के साथ एक युवा प्रचारक के भूमिगत जीवन का भी उल्लेख है। इस तरह नरेंद्र मोदी के टेलीविजन व्यक्तित्व या डिजिटल कम्युनिकेटर बनने से काफी पहले ही उनके राजनीतिक अनुभव में लेखक, संगठनकर्ता और भूमिगत कम्युनिकेटर की भूमिकाएं मौजूद थीं।
कविता और चिंतन से भी जुड़ा रहा लेखन: नरेंद्र मोदी का लेखन केवल राजनीतिक दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कविताएं, चिंतन और व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ समाज और सार्वजनिक जीवन से जुड़े विषयों पर भी लिखा। उनके गुजराती लेखन में प्रकृति, आध्यात्मिकता, अनुशासन, एकांत, सामाजिक सरोकार और व्यक्तिगत अनुभव जैसे विषय बार-बार दिखाई देते हैं। यह उनके व्यक्तित्व के उस चिंतनशील पक्ष को सामने लाता है, जो एक सामान्य राजनीतिक प्रचारक की छवि से अलग है।
नरेंद्र मोदी की ओर से ‘नमन नर्मदा’ और ‘सोशल रिफॉर्म इन इंडिया’ की भूमिकाएं लिखा जाना भी इस साहित्यिक संबंध का हिस्सा है। नर्मदा, सामाजिक सुधार और बदलता भारतीय समाज ऐसे विषय रहे, जिन पर एक राजनीतिक नेता और पत्रकार-लेखक के बीच पुस्तकों के माध्यम से संवाद हुआ।
गुजरात से शुरू हुआ मीडिया संवाद: जब नरेंद्र मोदी 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब राजनीतिक संचार का वातावरण आज से काफी अलग था। टेलीविजन न्यूज चैनल और अखबार राजनीतिक संवाद के प्रमुख माध्यम थे। उस दौर में पत्रकारों और संपादकों के साथ सीधे संवाद पर जोर दिया गया। इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जो भाजपा संगठन का हिस्सा नहीं थे। गुजरात में खासकर वाइब्रेंट गुजरात जैसे आयोजनों के दौरान पत्रकारों और संपादकों को आमंत्रित किया जाता था।
इन आयोजनों के जरिए गुजरात को निवेश और विकास के गंतव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। साथ ही, मीडिया के जरिए गुजरात के विकास की कहानी को राष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने और घटनाओं पर सीधे अपनी बात रखने का अवसर भी मिला। मीडिया के साथ यह संवाद कई स्तरों पर काम करता था। पत्रकारों को राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंच मिलती थी, गुजरात के विकास का नैरेटिव राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचता था और नरेंद्र मोदी को घटनाओं पर अपनी व्याख्या सीधे रखने का अवसर मिलता था। राजनीतिक संचार को उन लोगों के साथ संबंधों से अलग नहीं किया जा सकता, जो राजनीति को जनता तक पहुंचाते हैं।
विकास बना राजनीतिक पहचान का हिस्सा: गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पहचान में विकास एक केंद्रीय विषय बन गया। निवेश सम्मेलन, बुनियादी ढांचा, औद्योगीकरण, शासन और प्रशासनिक दक्षता जैसे विषय गुजरात की सार्वजनिक छवि का हिस्सा बनते गए।
वाइब्रेंट गुजरात एक अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में महत्वपूर्ण हुआ, जहां राज्य ने निवेश और अपनी पहचान को सामने रखा। इस संचार रणनीति की खासियत यह थी कि एक ही आयोजन सरकारी कार्यक्रम, आर्थिक बैठक, मीडिया इवेंट और राजनीतिक संदेश का रूप ले सकता था। 2014 के बाद यह तरीका राष्ट्रीय स्तर पर कहीं ज्यादा व्यापक रूप में सामने आया।
संगठन और व्यक्तित्व का मेल: ‘Brand Modi’ को भाजपा के संगठन से अलग करके नहीं समझा जा सकता। आरएसएस कार्यकर्ता और भाजपा संगठनकर्ता के रूप में नरेंद्र मोदी ने नेटवर्क बनाने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और जमीनी स्तर पर राजनीतिक संचार को समझने का अनुभव हासिल किया।
बाद के दौर में अमित शाह के साथ उनकी साझेदारी भी महत्वपूर्ण रही। एक तरफ नरेंद्र मोदी का बेहद पहचान योग्य सार्वजनिक चेहरा था, तो दूसरी तरफ संगठन के पास ऐसा नेटवर्क था जो संदेश को दिल्ली से राज्यों, जिलों, गांवों और डिजिटल समुदायों तक पहुंचा सकता था। संगठन और व्यक्तित्व का यह मेल मोदी दौर की भाजपा राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक रहा।
‘मन की बात’: रेडियो से राष्ट्रीय संवाद तक: नरेंद्र मोदी की संचार रणनीति का सबसे प्रमुख उदाहरण ‘मन की बात’ है। डिजिटल दौर में सोशल मीडिया को राजनीतिक संवाद का प्रमुख माध्यम माना जा रहा था, लेकिन नरेंद्र मोदी ने रेडियो की पहुंच और प्रभाव को भी पहचाना। 2014 में शुरू हुआ ‘मन की बात’ प्रधानमंत्री और नागरिकों के बीच नियमित सीधे संवाद का माध्यम बना। बाद में पत्रों, फोन कॉल, मायगव के सुझावों, ऐप पर आने वाली प्रतिक्रियाओं और सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं को भी इस संवाद का हिस्सा बनाया गया।
2023 में कार्यक्रम के 100वें एपिसोड के समय आईआईएम रोहतक की एक स्टडी में बताया गया कि सर्वे में शामिल 96 प्रतिशत आबादी ‘मन की बात’ से परिचित थी और 100 करोड़ लोगों ने इसे कम से कम एक बार सुना था। इसी अध्ययन में 23 करोड़ नियमित श्रोताओं का अनुमान लगाया गया। ये आंकड़े कार्यक्रम की पहुंच और जागरूकता को मापते हैं, राजनीतिक समर्थन को नहीं। इस तरह पारंपरिक मीडिया को डिजिटल माध्यमों से अलग करने के बजाय उन्हें एक साथ इस्तेमाल किया गया। रेडियो, टेलीविजन, अखबार, वेबसाइट, मोबाइल एप्लिकेशन, सोशल मीडिया और सीधे सार्वजनिक संवाद एक व्यापक संचार व्यवस्था का हिस्सा बने।
बदलती राजनीतिक भाषा, कायम रही पहचान: ‘Brand Modi’ की एक और विशेषता यह रही कि समय के साथ राजनीतिक भाषा और सार्वजनिक छवि बदलती रही, लेकिन मूल पहचान बनी रही। अलग-अलग दौर में नरेंद्र मोदी की पहचान गुजरात के प्रशासक, विकास पर जोर देने वाले मुख्यमंत्री, भाजपा संगठनकर्ता, चुनाव प्रचारक, ‘चायवाला’, प्रधानमंत्री, तकनीक-केंद्रित नेता, राष्ट्रवादी कम्युनिकेटर और वैश्विक नेता के रूप में सामने आई। इन बदलती पहचानों के बीच व्यक्तिगत प्रयास, अनुशासन, राष्ट्रसेवा, सीधे संवाद, आम नागरिकों से जुड़ाव और भारत की सभ्यतागत एवं राष्ट्रीय पहचान पर जोर जैसे तत्व लगातार बने रहे।
एक राजनीतिक नेता जो लिखता है, वह अपनी कहानी को शब्दों में रख सकता है। जो मीडिया को समझता है, वह उस कहानी को लोगों तक पहुंचा सकता है। राजनीतिक संगठन उस संदेश को जमीनी स्तर तक ले जा सकता है और डिजिटल तकनीक उसे बहुत तेजी से बड़े स्तर पर पहुंचा सकती है। नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा में ये चारों स्तर दिखाई देते हैं।
‘Brand Modi’ की जड़ें सोशल मीडिया से पहले की हैं: ‘Brand Modi’ को केवल सोशल मीडिया के दौर की उपज नहीं माना जा सकता। इसकी जड़ें गुजराती लेखन, राजनीतिक संगठन, आपातकाल के अनुभव, पत्रकारों के साथ संबंध, सार्वजनिक सभाओं और इस समझ में देखी जा सकती हैं कि संचार केवल भाषण देने का नाम नहीं है, बल्कि लोगों के साथ लगातार संबंध बनाने की प्रक्रिया है। ‘मन की बात’ इस सोच का एक प्रमुख उदाहरण है। इसमें रेडियो जैसे पुराने माध्यम को आधुनिक राजनीतिक संचार के मंच में बदला गया और टेलीविजन तथा डिजिटल मीडिया के जरिए उसका विस्तार किया गया।
नरेंद्र मोदी के साथ लंबे समय के जुड़ाव उनकी गुजराती और साहित्यिक रुचियों से लेकर उनकी पुस्तकों की भूमिकाओं और फिर ‘रिवोल्यूशनरी राज: नरेंद्र मोदीज 25 इयर्स’ तक—इस व्यापक यात्रा को देखने का एक व्यक्तिगत नजरिया भी देता है। यह कॉफी-टेबल बुक केवल तस्वीरों का संग्रह नहीं है, बल्कि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को तस्वीरों, राजनीतिक घटनाओं और पत्रकारिता के अनुभवों के जरिए दर्ज करने का प्रयास है। अमित शाह की भूमिका व्यक्तिगत नेतृत्व और राजनीतिक संगठन के बीच एक कड़ी का काम करती है।
25 साल की इस यात्रा को केवल किसी एक नारे, चुनाव या माध्यम से नहीं समझा जा सकता। इसमें लेखक, आरएसएस संगठनकर्ता, भाजपा रणनीतिकार, गुजरात के मुख्यमंत्री, विकास के कम्युनिकेटर, मीडिया व्यक्तित्व, प्रधानमंत्री, रेडियो ब्रॉडकास्टर और डिजिटल दौर के राजनीतिक कम्युनिकेटर जैसे कई स्तर शामिल हैं।
नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर यह यात्रा उस बदलाव को भी सामने रखती है, जिसमें भारत में राजनीतिक संचार प्रिंट और व्यक्तिगत मीडिया संबंधों से आगे बढ़कर रेडियो, टेलीविजन, स्मार्टफोन और सीधे डिजिटल संवाद तक पहुंचा है। नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। मेरी कामना है कि उन्हें भारत ही नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में शांति और समाज की प्रगति के लिए भी बड़ी सफलता मिले।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर डॉ. अनुराग बत्रा लिखते हैं कि ‘ब्रैंड मोदी’ की 25 साल की यात्रा बड़े स्तर पर काम करने, निरंतरता और नेतृत्व के बारे में क्या सीख देती है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
“जब सपने और संकल्प ऊंचे होते हैं, तो हमारी क्षमता की ऊंचाई भी बढ़ जाती है।” — नरेंद्र मोदी
राजनीति में कुछ करियर होते हैं, कुछ नेतृत्व की विरासत बनते हैं और कुछ ऐसी पहचान बन जाते हैं, जिन्हें उस दौर से अलग करना मुश्किल हो जाता है, जिसमें वे काम कर रहे होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी तीसरी श्रेणी में आते हैं।
नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के मौके पर दिलचस्प सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वह कितने लंबे समय से भारतीय राजनीति के केंद्र में हैं। बड़ा सवाल यह है कि गुजरात से शुरू हुई एक राजनीतिक पहचान किस तरह राज्य प्रशासन से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंची, चुनावी रैलियों से अंतरराष्ट्रीय मंचों तक गई और शासन की भाषा से निकलकर उस भाषा का हिस्सा बनी, जिसके जरिए भारत खुद को दुनिया के सामने पेश कर रहा है।
7 अक्टूबर 2026 को नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार पद संभालने के 25 साल पूरे हो जाएंगे। उन्होंने 7 अक्टूबर 2001 को मुख्यमंत्री पद संभाला था। इसके बाद 2014 में वह दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री बने। जून 2024 में उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली।
आज की सार्वजनिक जिंदगी में 25 साल बहुत लंबा समय होता है। इस दौरान कंपनियां खत्म हो जाती हैं, तकनीक पुरानी पड़ जाती है, लोगों की पसंद बदल जाती है, राजनीतिक मुद्दे बनते और खत्म होते हैं, नेतृत्व बदलता है और पूरे-पूरे उद्योग नई दिशा में चले जाते हैं, लेकिन मोदी की राजनीतिक पहचान ने अपना दायरा लगातार बढ़ाया है, जबकि उसके कुछ मूल तत्व लगातार बने रहे हैं। यही शायद ‘ब्रैंड मोदी’ की सबसे अहम कहानी है।
टिके रहने की ताकत
लंबे समय तक नेतृत्व में बने रहना सिर्फ मौजूद रहने का नाम नहीं है। असली चुनौती यह है कि आपके आसपास की दुनिया बदलती रहे और आप बदलते माहौल में प्रासंगिक बने रहें। 2000 के दशक की शुरुआत वाले गुजरात के मोदी और 2026 में देश का नेतृत्व कर रहे मोदी एक जैसे नहीं हो सकते। जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, लोगों का दायरा बदला है और दुनिया की राजनीति भी काफी बदल चुकी है। फिर भी विकास, आकांक्षा, राष्ट्रीय पहचान, प्रशासन का बड़ा स्तर, तकनीक, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और बदलाव जैसे कुछ विषय लगातार उनकी राजनीतिक भाषा में दिखाई देते हैं।
कारोबारी दुनिया के लिए भी इसमें एक सीख है। हर लंबे समय तक चलने वाली संस्था के सामने यही चुनौती होती है। बहुत ज्यादा बदलेंगे तो अपनी पहचान खो सकते हैं और बहुत कम बदलेंगे तो दुनिया आगे निकल सकती है। मोदी की राजनीतिक स्थिति ने बार-बार इन दोनों के बीच जगह बनाने की कोशिश की है।
परंपरा के साथ तकनीक, कल्याण योजनाओं के साथ आकांक्षाएं, सांस्कृतिक पहचान के साथ वैश्विक महत्वाकांक्षा और स्थानीय राजनीतिक समझ के साथ अंतरराष्ट्रीय पहचान—इन सभी को एक साथ रखने की कोशिश दिखाई देती है। यही संतुलन उनकी राजनीतिक पहचान को समझने में अहम है।
क्रिएटर, प्रिजर्वर और डिसरप्टर
मोदी के नेतृत्व मॉडल को समझने का एक और तरीका है—उसे तीन भूमिकाओं में देखना। क्रिएटर, प्रिजर्वर और डिसरप्टर। यह किसी धार्मिक तुलना के तौर पर नहीं, बल्कि नेतृत्व को समझने के एक तरीके के तौर पर देखा जा सकता है।
क्रिएटर यानी ऐसी चीज तैयार करना, जो पहले उस रूप में मौजूद नहीं थी। मोदी के मामले में इसका उदाहरण एक ऐसी व्यक्तिगत और बड़े पैमाने वाली राजनीतिक संचार शैली के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें सीधे संवाद, तकनीक, बड़े सार्वजनिक मंच और बार-बार दोहराए जाने वाले स्पष्ट संदेशों का इस्तेमाल होता है।
प्रिजर्वर यानी उन चीजों को बनाए रखना, जिन्हें लोग अपनी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। मोदी की राजनीतिक भाषा में भारतीय सभ्यता, परंपरा, सांस्कृतिक प्रतीकों और राष्ट्रीय पहचान की बात लगातार दिखाई देती है। इसी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, डिजिटल भुगतान, बुनियादी ढांचे और विकसित भारत जैसे विषय भी सामने आते हैं।
इसके बाद आता है डिसरप्टर यानी पुरानी धारणाओं को चुनौती देना। मसलन, यह धारणा कि तकनीक मुख्य रूप से शहरों में रहने वाले संपन्न लोगों तक सीमित है। या यह सोच कि बड़े पैमाने पर कल्याण योजनाओं और डिजिटल व्यवस्था को एक साथ नहीं चलाया जा सकता। इसी तरह विदेशों में भारतीय राजनीतिक संवाद के पारंपरिक तरीके से अलग बड़े और व्यापक सार्वजनिक कार्यक्रम भी देखने को मिले।
यह बदलाव की एक अहम सोच को दिखाता है। बदलाव सिर्फ कुछ नया बनाने का नाम नहीं है। कई बार बदलाव की शुरुआत यह तय करने से होती है कि पुरानी सीमा को अब सीमा मानने की जरूरत नहीं है।
‘स्केल’ है ब्रैंड मोदी की बड़ी भाषा
अगर मोदी के दौर से जुड़ा एक शब्द चुना जाए तो वह ‘स्केल’ यानी बड़े स्तर पर काम करना हो सकता है।
वित्तीय समावेशन को ही देखें। अगस्त 2026 तक प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 59.09 करोड़ खाते खोले जा चुके थे। वित्त मंत्रालय के मुताबिक, इनमें 55.7 फीसदी खाताधारक महिलाएं थीं और 77.8 फीसदी खाते ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में थे।
डिजिटल भुगतान की बात करें तो अगस्त 2026 में यूपीआई के जरिए 24.51 अरब लेनदेन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 29.82 लाख करोड़ रुपये रही। यह यूपीआई के जरिए एक महीने में हुए लेनदेन का रिकॉर्ड स्तर था। इन योजनाओं को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और नीतिगत नजरिए हो सकते हैं, लेकिन प्रबंधन के नजरिए से एक बात साफ दिखाई देती है- भारत में किसी भी विचार को बहुत बड़े स्तर पर काम करने की चुनौती से गुजरना पड़ता है।
10 हजार लोगों के लिए काम करने वाला समाधान एक प्रयोग हो सकता है। 10 लाख लोगों तक पहुंचने वाला समाधान एक बड़ी उपलब्धि बन जाता है। लेकिन जब कोई व्यवस्था करोड़ों लोगों के लिए बनाई जाती है तो मामला सिर्फ योजना का नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था तैयार करने का हो जाता है। मोदी के दौर में इस बड़े पैमाने को भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की कोशिश भी हुई है।
2023 के जी20 शिखर सम्मेलन में डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को नई दिल्ली नेताओं की घोषणा में जगह मिली। इसमें ऐसे डिजिटल सिस्टम की क्षमता को सेवा पहुंचाने और बड़े स्तर पर नवाचार में उपयोगी माना गया। यहीं घरेलू नीतियां वैश्विक पहचान से जुड़ने लगती हैं। बात सिर्फ यह कहने की नहीं रह जाती कि ‘देखिए हमने क्या बनाया।’ बल्कि संदेश यह बनता है कि ‘देखिए, हमारे जैसे बड़े स्तर पर क्या बनाया जा सकता है।’
स्थानीय नेता से वैश्विक मंच तक
मोदी के अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संवाद ने भी भारतीय प्रधानमंत्रियों की पारंपरिक सार्वजनिक छवि से अलग एक नया तरीका दिखाया। 2014 में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में उनके भारतीय समुदाय के कार्यक्रम में 18 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। इसके पांच साल बाद ह्यूस्टन में हुए ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में 50 हजार से ज्यादा लोगों की मौजूदगी रही। इन कार्यक्रमों की अहमियत सिर्फ भीड़ की संख्या में नहीं थी। इनके जरिए भारतीय प्रवासी समुदाय को भारत की वैश्विक राजनीतिक मौजूदगी के एक बड़े हिस्से के रूप में पेश किया गया।
प्रधानमंत्री अब सिर्फ राजनयिकों से मुलाकात, संसदों में भाषण या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लेने तक सीमित नहीं थे। भारतीय राजनीतिक संवाद खुद एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का हिस्सा बनता दिखाई दिया। यहीं मोदी की वैश्विक पहचान कुछ अलग नजर आती है।
योग और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे की बात, भारतीय सभ्यता और सेमीकंडक्टर की महत्वाकांक्षा, मंदिर और तकनीक, ग्लोबल साउथ और वैश्विक निवेश- इन सभी विषयों को एक ही व्यापक राजनीतिक कहानी में जोड़ा गया। परंपरा और आधुनिकता को एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय उन्हें एक-दूसरे के साथ जोड़ने की कोशिश की गई। यही ‘ब्रैंड मोदी’ के केंद्र में दिखाई देने वाला संतुलन है।
समावेश को व्यवस्था का हिस्सा बनाना
मोदी की राजनीतिक पहचान को बड़े स्तर पर बनाने में एक और चीज महत्वपूर्ण रही है- समावेशन को सिर्फ कल्याण योजना के रूप में नहीं, बल्कि लोगों को व्यवस्था से जोड़ने के रूप में पेश करना। जैसे- एक बैंक खाता, एक डिजिटल पहचान, एक मोबाइल कनेक्शन, एक भुगतान व्यवस्था और सीधे लाभ पहुंचाने की व्यवस्था।
जी20 की भारत की अध्यक्षता के दौरान भी डिजिटल सार्वजनिक ढांचे को समावेशी विकास के एक माध्यम के तौर पर सामने रखा गया और भारत के अनुभव को दूसरे विकासशील देशों के लिए उपयोगी बताया गया। इससे समावेशन का मतलब भी बदलता है। यह सिर्फ लोगों तक सहायता पहुंचाने की बात नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें व्यवस्था में शामिल करने की बात बन जाती है। जितने ज्यादा लोग व्यवस्था से जुड़ते हैं, व्यवस्था का आकार उतना ही बड़ा होता जाता है।
कॉरपोरेट जगत के लिए भी इसमें एक महत्वपूर्ण सीख है। अगले एक अरब उपभोक्ताओं को सिर्फ पहले 10 करोड़ उपभोक्ताओं का छोटा रूप मानकर नहीं देखा जा सकता। उत्पाद, भुगतान व्यवस्था, वितरण, इंटरफेस और कीमतों को बड़े स्तर पर लोगों की भागीदारी को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।
लगातार एक जैसी पहचान की ताकत
राजनीति में ‘बैंकएबिलिटी’ का मतलब कारोबार से अलग है। यह उस भरोसे से जुड़ा है कि किसी खास नाम के सामने आने पर लोगों को मोटे तौर पर पता होता है कि उस नाम से किस तरह की राजनीतिक सोच और संदेश जुड़े हैं।
आज की भारतीय राजनीति में मोदी की पहचान लगातार दोहराए गए संदेशों और एक तय राजनीतिक भाषा के साथ बनी है। समय के साथ शब्द बदले हैं। महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं। चुनावी अभियान बदले हैं। सरकार की प्राथमिकताएं भी बदली हैं। लेकिन विकास, बदलाव, राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और बड़े भविष्य की ओर बढ़ने की बात लगातार दिखाई देती रही है। इस निरंतरता का असर चुनावी राजनीति में भी दिखाई दिया। मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 और 2019 में केंद्र में सरकार बनाई और 2024 में एनडीए गठबंधन के नेतृत्व में उन्होंने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद संभाला। लेकिन लंबे समय तक किसी राजनीतिक पहचान को बनाए रखने के लिए सिर्फ चुनावी सफलता काफी नहीं होती। उसके लिए लगातार भविष्य की एक नई तस्वीर भी सामने रखनी पड़ती है।
भविष्य इस कहानी का अहम हिस्सा है
मोदी के संचार की एक खास बात यह रही है कि कहानी अक्सर वर्तमान पर खत्म नहीं होती। आगे का कोई न कोई लक्ष्य हमेशा दिखाई देता है। जैसे- डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, विकसित भारत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मैन्युफैक्चरिंग, बुनियादी ढांचा, ग्लोबल साउथ में भारत की बड़ी भूमिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की ज्यादा दिखाई देने वाली मौजूदगी। यानी मंजिल लगातार आगे बढ़ती रहती है।
सीईओ, संस्थापक और संस्थाएं बनाने वाले लोगों के लिए मोदी की यात्रा से एक महत्वपूर्ण बात समझी जा सकती है। नेतृत्व सिर्फ आज की जरूरतें पूरी करने का नाम नहीं है। इसमें निरंतरता बनाए रखना और लोगों को अगले अध्याय के लिए उत्साहित रखना भी शामिल है। यही हमें फिर उन तीन भूमिकाओं पर ले आता है- क्रिएटर, प्रिजर्वर, डिसरप्टर।
नई संभावना तैयार करना, लोग जिस पहचान को जानते हैं, उसे बनाए रखना और यह चुनौती देना कि जो स्तर अभी तक सबसे बड़ा माना जाता था, वही आखिरी सीमा है।
नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार पद संभालने के 25 साल पूरे होने के मौके पर उनकी राजनीतिक पहचान को सिर्फ एक चुनाव, एक योजना, एक नारे या एक दौर तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसकी कहानी लगातार अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश में दिखाई देती है। गुजरात से दिल्ली तक, राष्ट्रीय राजनीति से वैश्विक मंच तक, कल्याण योजनाओं से डिजिटल बुनियादी ढांचे तक, सभ्यता और संस्कृति की भाषा से तकनीकी महत्वाकांक्षा तक।
अगर ‘ब्रैंड मोदी’ को सिर्फ एक नेतृत्व केस स्टडी के तौर पर देखा जाए तो दिलचस्प बात सिर्फ यह नहीं है कि यह पहचान इतने लंबे समय तक बनी रही। दिलचस्प बात यह है कि जैसे-जैसे मंच बड़ा होता गया, यह पहचान भी खुद को उस बड़े मंच के मुताबिक ढालती गई।
“सुधार करके व्यवस्था को आसान बनाओ, काम करके नतीजे दो और बदलाव के जरिए असर पैदा करो।” — नरेंद्र मोदी
संदेश के अंत में सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उन्हें ‘India’s pride’ बताया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके जन्मदिन पर खास अंदाज में शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपने संदेश में नरेंद्र मोदी के वडनगर से वाराणसी तक के सफर का जिक्र किया और चाय की दुकानों से लेकर सेमीकंडक्टर के सपनों तक की यात्रा को याद किया।
सुधीर चौधरी ने अपने संदेश में जनधन, UPI, GST, अनुच्छेद 370, CAA, तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट, राम मंदिर, महिला आरक्षण और नए संसद भवन का जिक्र किया। इसके साथ ही उन्होंने G20, मेक इन इंडिया, स्पेस और सेमीकंडक्टर जैसे विषयों को भी अपने पोस्ट में शामिल किया।
उन्होंने लिखा कि कुछ फैसलों ने इतिहास बनाया, कुछ ने सुर्खियां बटोरीं और कुछ ने विपक्ष को निश्चित तौर पर अतिरिक्त मेहनत करने पर मजबूर किया। संदेश के अंत में सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए उन्हें ‘India’s pride’ बताया।
From Vadnagar to Varanasi, from tea stalls to semiconductor dreams - what a journey!
— Sudhir Chaudhary (@sudhirchaudhary) September 17, 2026
Jan Dhan, UPI, GST,
Article 370, CAA, Triple Talaq,
Surgical strikes, Balakot,
Ram Mandir, Women’s Reservation, New Parliament.
G20, Make in India, Space, Semiconductors…
Some decisions made… pic.twitter.com/CDut7YQPss
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
विनोद अग्निहोत्री,
सलाहकार संपादक, अमर उजाला।।
आज हिंदी दिवस है। हर साल की तरह इस बार भी हिंदी के प्रचार प्रसार के दावों और वादों के साथ देश में सरकारी गैर सरकारी कार्यक्रम आयोजित हैं। रविवार की छुट्टी होने के कारण इस बार सरकारी दफ़्तरों में हिंदी में कामकाज का ढोंग नहीं हो पा रहा है वरना एक दिन के लिए ये भी हो जाता और साल भर के लिए हिंदी के प्रयोग को विदा कह दिया जाता।
हिंदी की स्वीकार्यता और प्रसार में दो तीन बड़ी बाधायें हैं। पहली हिंदी को कथित सरकारी सरंक्षण जिसने हिंदी को न सिर्फ़ सरकारों पर आश्रित बना कर उसे वैसा लाड़ला बच्चा बना दिया जिसकी संघर्ष क्षमता कमजोर पड़ती है साथ ही वो दूसरों की ईर्ष्या का पात्र भी बनता है। हिंदी के साथ यही हुआ। कथित सरकारी सरंक्षण ने उसे सरकारी कामकाज और संस्थानों में अनुवाद की भाषा बना कर उसके विकास को पंगु कर दिया और अन्य भारतीय भाषा भाषी उसे अपने ऊपर थोपे जाने के भय से उसके अकारण विरोधी हो गये। सरकारी शब्दकोषीय अनुवाद की भाषा ने हिंदी के प्रयोग को दुरूह और अरुचिकर बना दिया।
इसके साथ ही कथित सरकारी सरंक्षण ने हिंदी के विकास के नाम पर भाषायी ठेकेदारों की ऐसी जमात भी पैदा की जो सरकारी अनुदानों पद और सम्मानों के लिए हिंदी की नहीं अपनी चिंता गुटबाज़ी में उलझे रहे। इसने हिंदी को कई मठों में बदल दिया और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं की अस्मिता भी हिंदी से टकराने लगी। उनके समर्थकों का आग्रह हिंदी से ज़्यादा अपनी बोलियों और भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए हो गया। जब देश में मुस्लिम बादशाहों और अंग्रेजों का राज था तब हिंदी स्वाभाविक और सहज ढंग से फूली फली।
कालजयी कवियों, लेखकों, भक्तों, विद्वानों ने हिंदी भाषा और साहित्य को नई ऊंचाई दी विस्तार दिया और लोकप्रिय बनाया। हिंदी संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा बनी। गांधी, पटेल, सुभाष, नेहरू जैसे नेताओं ने हिंदी को संवाद और संप्रेषण की भाषा के रूप में स्वीकार किया। अनेक कालजयी रचनाओं ने हिंदी और हिंदी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं को एक सूत्र में पिरोया।
अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी का स्वाभाविक रिश्ता बना। कोई टकराव नहीं बहनों जैसा प्रेम विकसित होने लगा। ये सिलसिला आज़ादी के कुछ वर्षों तक जारी रहा। लेकिन जैसे-जैसे हिंदी को सरकारी सरकारी सरंक्षण और उसे राष्ट्रभाषा बनाने का आग्रह बढ़ा हिंदी का विरोध और उसकी दुर्दशा का दौर भी शुरू हो गया। भाषाई राजनीति और मठवाद ने हिंदी को सिर्फ़ हिंदी क्षेत्र की भाषा में बदल दिया और रही सही कसर बाज़ार की भाषा के नाम पर शुरू हुए हिंग्लिश के प्रयोग ने हिंदी को बाजारू भाषा में बदलना शुरू कर दिया।
हिंदी के सहज शब्दों की जगह ज़बरन अंग्रेज़ी के शब्दों को ठूँसने से भाषा का वर्ण संकरीकरण होने लगा।बचाव की जगह रेस्क्यू और विस्फोट या धमाके की जगह ब्लास्ट जैसे शब्दों का प्रयोग इसका उदाहरण है। हिंदी की रचनाओं को अंग्रेज़ी रचनाओं की तुलना में कमतर मानना अंग्रेज़ी ज्ञान से ज़्यादा अंग्रेज़ीयत झाड़ना हिंदी भाषी मध्यवर्ग की आम प्रवृत्ति है। जब तक हिंदी क्षेत्र इस हीन भावना से मुक्त होकर बिना सरकारी सरंक्षण के हिंदी के समृद्ध रचना संसार को अपनी पूँजी और थाती नहीं बनाता तब तक कितने भी हिंदी दिवस मना लीजिए हिंदी की दशा नहीं सुधरेगी।
इसकी पहल हिंदी भाषियों को अपने घरों परिवारों से करनी होगी। अपने घरों परिजनों के साथ बोलचाल पठन पाठन में हिंदी का प्रयोग बेहिचक करना होगा। बच्चे अंग्रेज़ी और अन्य भाषायें सीखें पर हिंदी न छोड़ें। हिंदी अख़बार पढ़ें हिंदी साहित्य जानें और हिंदी में कामकाज में हीनता नहीं गौरव का भाव रखें। सिर्फ़ मजबूरी में सब्ज़ी वाले रिक्शे वाले से हिंदी में बात न करें बल्कि जब तक मजबूरी और ज़रूरी न हो अंग्रेज़ी न बोलें। हिंदी भाषियों से हिंदी में ही बात करें। अपने अध्ययन कक्ष में तुलसी कबीर प्रेमचंद प्रसाद दिनकर समेत सभी हिंदी के महान रचनाकारों की रचनाएँ प्रमुखता से रखें।
हिंदी क्षेत्र की बोलियों भाषाओं को हिंदी के मुक़ाबले खड़ा करने की बजाय उन्हें सहोदरी बनायें।जिस दिन से हम हिंदी भाषी ये सब करने लगेंगे तब हिंदी को किसी सरकारी सरंक्षण दिवस मनाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। वरना मानते रहिए हिंदी दिवस का कर्मकांड। वैसे भी पितृ पक्ष चल रहा है जो कर्मकांड का ही समय है। आख़िर में हिंदी कर्मकांड दिवस की बधाई।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
भारतीय संस्कृति अपने नायकों, प्रतीकों और उनकी कथाओं से जीवन रस लेकर ही आज तक प्राणवान है। जीवंत है। उसके नायक चिरयुवा हैं और संकटों से जूझकर सुंदर दुनिया बनाने की आकांक्षा से भरे-पूरे हैं। राम, कृष्ण, शिव, गणेश और ऐसे न जाने कितने देव हमें प्रेरित करते हैं। सबका जीवन सरल नहीं है। सब जूझते हैं और समाधान पाते हैं। आदर पाते हैं। लोकमंगल ही सबका ध्येय है। इन सबमें श्री गणेश की महिमा सबसे अलग है। गणेश चतुर्थी के प्रसंग पर उनकी पूजा के साथ यह जानना जरूरी है कि आखिर उनमें ऐसा क्या खास है, जो उन्हें सबसे अलग बनाता है।
वे असाधारण संचारकर्ता और कुशल प्रबंधक की तरह हमारे सामने आते हैं। गणेश जी के बड़े कान इस बात की गवाही हैं कि वे हर बात को ध्यान से सुनते हैं। सुनना एक साधना है। ध्यान से सुनना उससे बड़ी साधना है। उन्होंने श्रवण कौशल को साध लिया है। दूसरों को ध्यान से सुने बिना न आप समझ सकते हैं, न ही उचित निदान तक पहुंच सकते हैं। फैसले लेने हों या न लेने हों, सुनना तो पड़ेगा। गणेश जी ने इसे साध लिया है।
इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता कहा गया, वे सुनकर हमारी समस्याओं का हल करने की क्षमता से लैस हैं। नजर से ही नजरिया बनता है। आंखें सबके पास होती हैं, किंतु दृष्टि सबके पास नहीं होती। सूक्ष्म विश्लेषण का गुण ऐसे ही अर्जित नहीं होता। संकट या सामान्य दिनों में भी बारीक और पैनी नजर रखना व्यक्ति का विलक्षण गुण है। गणेश जी इसी गुण से समादृत हुए। उनकी छोटी आंखें पैनी नजर और तीक्ष्ण एकाग्रता का प्रतीक हैं। वे किसी भी संकट का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। श्री गणेश समय के साथ चलते हैं। मौके पर वे अनुकूलन कर लेते हैं और लचीलापन उनका स्वभाव है।
कलाकारों को देखिए, वे उनकी कितनी तरह की प्रतिमाएं बनाते हैं। उनका व्यक्तित्व ऐसा है कि उनमें प्रयोग संभव है। उनकी लचीली सूंड यह बताती है कि एक अच्छा कम्युनिकेटर (संचारक) कभी भी अपने रवैये में कठोर नहीं होता। लचीलापन, स्वीकार्यता और समावेशिता उसका मूल गुण है। समय और वातावरण को पहचान कर आचरण ही एक सफल संचारक की पहचान होती है। लोगों को प्रभावित करने में वे इसीलिए सफल होते हैं। आप देखें तो गणेश जी सकारात्मक संचार करते हैं। उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं इसलिए भेंट की जाती हैं, क्योंकि वे शुभ और सकारात्मकता का संचार करती हैं।
कम से कम संसाधनों के उपयोग से वे बेहतर जिंदगी का पाठ पढ़ाते हैं। उनके माता-पिता पूज्य शिव और मां पार्वती उनके सामने ब्रह्मांड का चक्कर लगाने की शर्त रखते हैं तो कार्तिक अपने तेज वाहन मयूर से तत्काल यात्रा पर निकल जाते हैं। किंतु श्री गणेश अपनी अप्रतिम बुद्धिमत्ता और सीमित संसाधनों के प्रयोग के संकल्प पर कायम रहते हुए अपने वाहन मूषक (चूहा) की सीमाओं को भी समझते हुए 'आउट ऑफ बॉक्स' निर्णय लेते हैं। वे अपने माता-पिता की परिक्रमा करके ही स्मार्ट वर्क और रिसोर्स मैनेजमेंट का उदाहरण देते हैं।
ऐसे कौशल ने उन्हें अप्रतिम बना दिया। वे रुकना नहीं जानते, निरंतर काम पर हैं। बाधाएं आती हैं तो आएं, इससे वे प्रभावित नहीं होते। महाभारत लिखने की कथा को आप याद करें। उस समय महर्षि वेदव्यास तेज गति से बोल रहे थे। गणेश जी उनके सहयोगी लेखक हैं। उनकी लेखनी (कलम) टूट जाती है। वे पल भर का समय नहीं देखते। तत्काल अपना एक दांत तोड़कर लिखना प्रारंभ कर देते हैं। इसलिए उनको 'एकदंत' के रूप में भी पूजा जाता है। अपनी समय सीमा में रहते हुए काम को वक्त पर पूरा करना ऐसी ही प्रतिबद्धता है, जिसके वे उदाहरण बने।
अपने ऐसे प्रबंधकीय और लेखकीय गुणों से उन्होंने मानवता की सेवा की। वे सब करते हैं। सब जानते हैं। संकटों के समाधान का रास्ता बताने वाले हैं, किंतु सबके प्रिय गणेश जी कभी भी अपनी जमीन नहीं छोड़ते। पद और ज्ञान का अहंकार उन्हें छू तक नहीं गया है। वे जो हैं, वह होना कठिन है। उनका विशाल शरीर है, वे असीम बुद्धिमत्ता से भरे हैं। इसके बाद भी वे छोटे से वाहन मूषक पर चल रहे हैं। आज जरा सी पद-प्रतिष्ठा पाते ही लोग बड़े वाहनों पर चलने लगते हैं। हवाई यात्राओं में ही उनका जीवन और समय बीतता है। गणेश जी के पास सब कुछ है।
लक्ष्मी साथ ही विराजमान हैं, किंतु वे अपने पुराने वाहन और पुराने सहयोगियों को नहीं भूलते। अहंकार उनके आसपास भी नहीं है। लोगों का मंगल करते हुए, लोगों के कष्ट दूर करते हुए वे सतत प्रवास करते हैं। संवाद करते हैं। उनका बड़ा उदर (पेट) साधारण नहीं है। वे सब कुछ पचा जाते हैं। समाज और संगठन में हो रही हर अच्छी-बुरी बातों को संभालते हैं। उनका बड़ा पेट इस बात को बताता है कि कैसे लीडर को काम करना चाहिए। किस तरह उसको बिना विचलित हुए बहुत सारी निंदा, आलोचना और सुझावों को आत्मसात करते हुए पचा जाना चाहिए।
वे निरंतर परिशुद्ध होते जाते हैं। समस्याओं का समाधान करते हुए लोकमंगल का व्रत निभाते हुए। वे कड़े भी हैं, सरल भी। उनके हाथ में अंकुश भी है और पाश भी है। वे जानते हैं कि कब उन्हें कठोर होना है और कब सामान्य जनों को अपने प्रेम पाश में बांध कर रखना है। इसलिए देखिए तो गणेश जी बच्चों के सबसे प्रिय देवता हैं, वे अपने से लगते हैं। तो श्रेष्ठ जनों में उनको लेकर अलग पूज्य भाव दिखते हैं। इस तरह गणेश जी का कवरेज एरिया बहुत व्यापक है। गणेश जी संकटों से घबराते नहीं, रास्ता दिखाते हैं। वे ही हैं जिन्हें विघ्नहर्ता कहा गया।
'रिस्क मैनेजमेंट' उनकी विशेषज्ञता का क्षेत्र है। उनको समाधान ही दिखते हैं, संकट नहीं। वे संकट को भांपकर उपयुक्त समाधान देते हैं। विविधता की स्वीकार्यता उनका गुण है। वे अपने पिता शिव के समस्त गणों से भी संवाद रखते हैं, जिनमें भूत, प्रेत, पशु, देवता सभी शामिल हैं। इतने विविध समुदायों से संवाद और उनका साहचर्य प्राप्त करते हुए वे विविधता को साधने वाले देवता बन जाते हैं, जिनके लिए कोई भी अलग नहीं है, पराया नहीं है। सभी उनके हैं।
महान प्रबंधक कैसे विविध लोगों को साधते हैं, गणेश इसके उदाहरण हैं। वे माता-पिता दोनों के प्रिय हैं। दुलारे हैं। वे सभी के लिए गणपति हैं। सभी उन्हें प्रथम पूज्य मानते हैं। अपने जीवन के आरंभ में ही हुई महान दुर्घटना से उन्होंने खुद को उबार लिया। उसका दुख उन्होंने कभी प्रकट नहीं किया। वे बताते हैं, जिंदगी रुकती नहीं, आगे भी चलती है। आइए, हम अपने देवों की सिर्फ प्रतीकात्मक पूजा न करें, बल्कि उनके जीवन से सीखें भी और अनुसरण भी करें।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आज जब हम हिंदी दिवस मना रहे हैं, यह सवाल बार-बार दिल और दिमाग में गूंजता है कि स्वतंत्रता के इतने दशकों बाद भी हिंदी को उसका वास्तविक स्थान क्यों नहीं मिला। यह वही हिंदी है, जिसने करोड़ों लोगों को जोड़ने का सेतु बनाया, जिसने हमारी मिट्टी की खुशबू और हमारी संस्कृति की आत्मा को दुनिया तक पहुंचाया। लेकिन अफसोस की बात यह है कि वही हिंदी आज भी अंग्रेजी की छाया में जीने को मजबूर है, कभी उसकी अधीन बनकर, तो कभी उसकी सहायिका बनकर।
नीति-नियंताओं ने हमेशा हिंदी को सम्मान देने और उसके प्रचार-प्रसार की बात जरूर की, लेकिन उनके प्रयास अधूरे ही रहे। हकीकत यह है कि हिंदी ने हमारे समाज और अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, रोजगार दिया, उद्योगों को खड़ा किया, लेकिन स्वयं अपने हक से वंचित रही। हिंदी फिल्मों से लेकर हिंदी पत्रकारिता और मीडिया उद्योग तक- सबकी नींव हिंदी पर खड़ी है। इनसे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी चल रही है, फिर भी विडंबना यह है कि हिंदी आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी।
प्रिंट, टीवी या डिजिटल- मीडिया का हर माध्यम हिंदी की ताकत से फल-फूल रहा है, लेकिन संवैधानिक रूप से हिंदी आज भी राजभाषा होकर एक “सहायिका” भर है। यह स्थिति हर उस भारतीय को चुभती है, जो अपनी मातृभाषा को सिर्फ संवाद का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रतीक मानता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान और सम्मान दिलाने का जो साहसिक कदम उठाया है, वह काबिले-तारीफ है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या यही सरकार आने वाले समय में हिंदी को राष्ट्रभाषा का संवैधानिक दर्जा दिलाने की हिम्मत दिखाएगी? अगर इस हिंदी दिवस पर यह बड़ा फैसला हो जाता है, तो न सिर्फ हिंदी दिवस सफल होगा बल्कि यह देश के हर उस दिल को तसल्ली देगा, जो वर्षों से हिंदी के हक की प्रतीक्षा कर रहा है।
समाचार4मीडिया ने इस अवसर पर मीडिया में हिंदी की बदलती भूमिका पर विशेष आलेखों का संग्रह प्रस्तुत किया है। यह प्रयास केवल लेखों का संग्रह नहीं है, बल्कि हिंदी के उत्थान और उपेक्षा के बीच के संघर्ष का आईना है। उद्देश्य यही है कि पाठकों तक हिंदी की ताकत, उसकी चुनौतियां और उसके भविष्य की दिशा एक ही मंच पर पहुंच सके।
जैकब की आशंका पर Anthropic के CEO और फाउंडर डारियो अमोडेई ने भी एक तरह से मुहर लगा दी है। उन्होंने जैकब के आरोपों पर सीधे जवाब तो नहीं दिया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
Artificial Intelligence (AI) ने चार साल में हमारी दुनिया बदल कर रख दी है। कभी वो गणित के अनसुलझे सवालों को सुलझा लेता है तो कभी हमारी नौकरी खाने पर आ जाता है। अब Anthropic AI के रिसर्चर ने यह कहकर इस्तीफा दिया है कि AI दस साल में मानवता को खत्म कर सकता है। इस दावे से सनसनी फैल गई है कि क्या AI की अंधी दौड़ में सावधानी से मुंह मोड़ लिया जा रहा है? हिसाब-किताब AI के खतरे का।
जैकब कॉक्सन Anthropic (Claude) में रिसर्च का काम करते थे। यह कंपनी दावा करती रही है कि OpenAI (ChatGPT) के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदार है, बल्कि Claude बनाने वाले डारियो अमोडेई ने OpenAI को यह कहकर छोड़ा था कि वो पैसे बनाने के लिए जल्दबाजी कर रही है। जैकब भी OpenAI में काम कर चुके हैं। उन्होंने Anthropic से पिछले हफ्ते इस्तीफा दे दिया। उनका आरोप है कि मानवता पर खतरे को लेकर AI कंपनियां गंभीर नहीं हैं।
जैकब की आशंका पर Anthropic के CEO और फाउंडर डारियो अमोडेई ने भी एक तरह से मुहर लगा दी है। उन्होंने जैकब के आरोपों पर सीधे जवाब तो नहीं दिया है, लेकिन उन्होंने AI के खतरे पर ब्लॉग लिखा है। उन्होंने AI कंपनियों से अपील की है कि डेवलपमेंट के काम को धीमा करें। AI के खतरे को देखकर सुरक्षा चाक-चौबंद की जानी चाहिए, वरना 6 से 12 महीनों में AI एजेंट का झुंड इंटरनेट को ठप करने की ताकत रखता है। OpenAI के फाउंडर सैम अल्टमन और xAI के फाउंडर एलन मस्क ने डारियो का समर्थन किया है।
डारियो के ब्लॉग से पहले Anthropic की सुरक्षा रिपोर्ट भी आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि Claude AI का दुरुपयोग करने की कोशिश कैसे और कहाँ की गई है। Claude की मदद से Bio Weapon बनाने की कोशिश भी हुई है। चिकनगुनिया और एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस के साथ छेड़छाड़ की गई थी। इसका इस्तेमाल बीमारी फैलाने के लिए हो सकता था। मतलब मानवता को नष्ट करने की कोशिश में AI की मदद लेने के सबूत मिले हैं।
जैकब जिस खतरे की बात कर रहे हैं, वो यह नहीं है। अभी तो आदमी ही AI का इस्तेमाल करते हुए खतरे पैदा कर रहा है, लेकिन AI हमसे तेज हो गया तो क्या होगा? अभी तो वो हमारे कहने पर चल रहा है, लेकिन साथ में वो खुद भी सीख रहा है। जब वो हमारे काबू से बाहर निकल जाएगा तो दो तरह के खतरों की बात हो रही है।
AI खुद Bio Weapon बनाकर हमें खत्म कर सकता है, मानो कोई वायरस ही बनाकर छोड़ दे। दूसरा खतरा है कि AI हमारी जिंदगी के हर हिस्से में है। बिजली सप्लाई हो, एयरपोर्ट, रेलवे, सेना। वहाँ से भी AI तबाही मचा सकता है।
सबको इन खतरों के बारे में पता है, लेकिन कोई इस रेस में पीछे नहीं छूटना चाहता है। एक रेस अमेरिका और चीन में चल रही है। दूसरी रेस अमेरिकी कंपनियों जैसे OpenAI और Anthropic में चल रही है। ये कंपनियां IPO लाने की तैयारी कर रही हैं। अमेरिका की सरकार भी कंपनियों को कसने के मूड में नहीं है, क्योंकि चीन के आगे बढ़ने का डर है। एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ दुनिया को खतरे में डाल सकती है और यह बात तो अब डारियो ही कह रहे हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
ताजा प्रमाण ब्रिक्स (पांच देशों का संगठन) शिखर सम्मेलन में 12 देशों की उपस्थिति और भारत की भूमिका की स्वीकार्यता मोदी की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
इस साल फरवरी में जब मेरी किताब 'रिवालूशनरी राज - नरेंद्र मोदी रूल ऑफ 25 इयर्स' प्रकाशित हुई, तो कुछ कार्यक्रमों में मुझसे इस क्रांतिकारी राज में विश्व राजनीति में भारत को मोदी के कार्यकाल में कोई बड़ी उपलब्धि के सवाल हुए, तो मैंने उन्हें 1971 से अब तक अपनी पत्रकारिता और तथ्यों के आधार पर उत्तर दिए। इसमें सबसे बड़ा तर्क यही है कि इंदिरा गांधी से मनमोहन सिंह के राज तक संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत को 'गुट निरपेक्षता' का ठप्पा लगाकर पेश किया जाता था, लेकिन मुझे 1983 के प्रारम्भ में दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन के कवरेज के समय ही लगा था कि यह ठप्पा केवल अमेरिका और चीन से नाराज या सोवियत रूस समर्थक देशों का समूह है।
इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालने के साथ असली निर्गुट नीति अपनाकर रूस, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, अफ्रीका, मध्य पूर्व, पश्चिम और पूर्वी एशिया और यूरोपीय समुदाय के देशों के शीर्ष नेताओं से सीधे कूटनीतिक और कुछ हद तक अपनत्व के साथ संबंध जोड़ने शुरू कर दिए।
ताजा प्रमाण ब्रिक्स (पांच देशों का संगठन) शिखर सम्मेलन में 12 देशों की उपस्थिति और भारत की भूमिका की स्वीकार्यता मोदी की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ कहा जा सकता है। भारत ने 2016 में ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी की थी और अब 2026 में अध्यक्षता की है। 2026 के सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन जैसे नेताओं के साथ भारत का संवाद इस रणनीति को और महत्वपूर्ण बनाता है। दुनिया की लगभग आधी आबादी और अर्थव्यवस्था का करीब 40 प्रतिशत इस समूह से जुड़ा है।
अमेरिका या उससे जुड़े देश थोड़े विचलित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें भारत के सहारे ही चीन, रूस, ईरान से भी आर्थिक संबंध रखने की तमन्ना है। ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता केवल चीन, रूस, ईरान, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के राष्ट्र प्रमुखों द्वारा स्वीकार किए गए घोषणा पत्र में पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर में अप्रैल 2025 में किए गए आतंकी हमले की भर्त्सना किया जाना है।
यही नहीं, किसी भी सत्ता द्वारा आतंकियों की फंडिंग और आतंकवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ने का संकल्प लिया गया। यह मोदी की कूटनीतिक सफलता है, क्योंकि चीन, सऊदी अरब तो पाकिस्तान के सबसे प्रमुख समर्थक रहे हैं। टैरिफ की बंदर घुड़की देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आने और उससे पहले नवंबर में चीन-रूस के राष्ट्रपतियों से मिलने के इंतजार में हैं।
इसलिए यहाँ निराश पिटे हुए चिदंबरम जैसे कुछ कांग्रेसी नेता भले ही ब्रिक्स या किसी से कुछ न मिलने का रुदन करें, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, विश्व मुद्रा कोष भारत के नेतृत्व और आर्थिक विकास में सबसे अग्रणी होने की सराहना सम्मेलन में ही कर रहे हैं। मोदी के लिए ब्रिक्स का महत्व ग्लोबल साउथ की अवधारणा, पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाले संगठनों में सुधार, वैकल्पिक वित्तीय मेकेनिज्म, व्यापार, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, विकास के वित्तीय प्रबंध, बहुध्रुवीय विश्व के लिए है।
इसे संयोग कहा जाए अथवा मोदी के सलाहकारों की रणनीति कि ब्रिक्स में मोदी की जयकार उनके जन्मदिन (17 सितंबर) से तीन दिन पहले से हो रही है। वहीं उनकी भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक के सफल 25 वर्षों के सत्ता काल के उत्सव मनाने जा रही है। मैंने अपनी किताब और लेखों में तो इस तथ्य को रेखांकित किया है कि पुतिन, शी जिनपिंग या ट्रंप सहित दुनिया के किसी देश के नेता के पास एकसाथ 25 वर्ष सत्ता चलाने का अनुभव नहीं है। ध्यान देने की बात यह है कि मोदी की अंतरराष्ट्रीय समझ 2014 के बाद अचानक पैदा नहीं हुई।
वे लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और बाद में भाजपा संगठन में आए। 1978 में वे संघ के क्षेत्रीय स्तर के प्रचारक बने और 1979 में दिल्ली में संघ के काम से जुड़े। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में भाजपा संगठन में उनकी भूमिका बढ़ी। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा और 1991–92 में मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा के संगठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। यही वह दौर था, जिसमें मोदी ने देश के अलग-अलग हिस्सों को संगठन की दृष्टि से समझा और बाद में विदेशों में भारतीय समुदाय से संपर्क का अनुभव भी प्राप्त किया। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि 1993 में नरेंद्र मोदी अमेरिका गए थे, उस समय वे न मुख्यमंत्री थे, न सांसद और न ही केंद्र सरकार में कोई पद था।
वे भाजपा-संघ संगठन से जुड़े नेता थे। उनका पहल प्रशिक्षण दौरा अमेरिकन कौंसिल ऑफ यंग पॉलिटिकल लीडर्स संस्था के निमंत्रण पर हुआ था। यह संगठन अमेरिकी सरकार के सहयोग से दुनिया, खासकर उस समय के विकासशील देशों के चुनिंदा युवा नेताओं को एक महीने के लिए आमंत्रित करता रहा है। इस अवधि में अमेरिका भ्रमण के दौरान विचारों के आदान-प्रदान, नेताओं और प्रशासन के वरिष्ठ नेताओं के साथ संवाद आदि के कार्यक्रम होते हैं। यह वही दौर था, जब राव राज में भारत ने उदार अर्थव्यवस्था के लिए खिड़की-दरवाजे खोलने शुरू हुए थे। इस तरह मोदीजी को अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था, नेतृत्व, चुनावी राजनीति और संस्थागत कामकाज देखने का अवसर मिला।
दिलचस्प बात यह है कि उस समय का यह अनुभव बाद के मोदी में दिखाई देता है—विदेश जाकर केवल सरकारों से बात नहीं करना, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था, कारोबारी समुदाय और प्रवासी भारतीयों को भी समझना। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में विदेश नीति का पहला प्रयोग शुरू किया। 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने मुख्यमंत्री के पद को केवल प्रशासनिक पद नहीं माना।
उन्होंने गुजरात को एक सफल आर्थिक प्रगति वाले मॉडल प्रदेश के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। उनका लक्ष्य था: विदेशी निवेश, उद्योग, तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाह, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल, हीरा उद्योग, ऑटोमोबाइल, प्रवासी भारतीयों को निवेश से जोड़ना रहा। इसी रणनीति के केंद्र में वाइब्रेंट गुजरात के अंतरराष्ट्रीय आयोजन शुरू किए। इन आयोजनों को अहमदाबाद, गांधीनगर में जाकर मैंने स्वयं देखा है। देश-विदेश के उद्यमी और संबंधित नेताओं के आने से मोदी को राजनीतिक-आर्थिक क्षेत्र में पैर मजबूत करने में सुविधा हुई।
भारत में उनके विरोधियों और केंद्र में कांग्रेस की सरकार के कारण 2005 में अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार किया। इसके बावजूद उन्होंने अपनी विदेश नीति को रोकने के बजाय एशिया की ओर ज्यादा केंद्रित किया। वे चीन, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ताइवान, मलेशिया, थाईलैंड और अन्य एशियाई केंद्रों से आर्थिक संपर्क बढ़ाते रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी यात्राओं में रूस और चीन की तीन-तीन यात्राएँ, इजरायल, स्विट्जरलैंड, युगांडा और केन्या जैसी यात्राएँ भी शामिल थीं। मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने चीन को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं देखा।
उन्होंने चीन की विशेष इकोनॉमिक जोन, इंफ्रास्ट्रक्चर, पोर्ट्स, लघु-मध्यम श्रेणी के उद्यम, शहरी विकास जैसे कार्यों का अध्ययन किया। उनकी 2006, 2007 और 2011 में चीन की यात्राओं का उल्लेख मिलता है। 2011 की यात्रा में बीजिंग, शंघाई और चेंगडु शामिल थे तथा उनके साथ कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी था। यानी मोदी का संदेश था: “जिस देश से प्रतिस्पर्धा करनी है, उससे भी सीखो।” यही शायद उनकी विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।
जापान से चीन तक—मुख्यमंत्री के रूप में विकास की कूटनीति सार्थक होती गई। 2007 और 2012 में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ उनकी मुलाकातों ने व्यक्तिगत संबंध बनाने में भूमिका निभाई। गुजरात में जापानी निवेश आकर्षित करने की कोशिशें आगे बढ़ीं। बाद में प्रधानमंत्री बनने पर यही सोच मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के रूप में सामने आई। मुख्यमंत्री मोदी विदेश यात्रा को केवल औपचारिक यात्रा नहीं बनाते हैं, वे वहाँ से नए आइडिया लेकर लागू करने की कोशिश करते हैं।
26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। उनकी पहली विदेश यात्रा जून 2014 में भूटान की थी। इसके बाद ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल हुए। इसके बाद उनकी विदेश यात्राओं की गति असाधारण रही। सितंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ की हैं और 80 से अधिक देशों तक पहुँचे हैं। मोदी की विदेश नीति का मूल मंत्र: “सबसे संबंध, किसी से गुलामी नहीं।” मोदी की विदेश नीति को केवल “अमेरिकी या रूसी ओरिएंटेड” नहीं कही जा सकती है।
वे एक साथ अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, आसियान, अफ्रीका के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करते हैं। यही स्ट्रैटिजिक ऑटोनोमी जैसा मॉडल है। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से संबंध नहीं तोड़े, लेकिन यूक्रेन के साथ भी संवाद रखा। पश्चिम एशिया में इजराइल के साथ रणनीतिक संबंध हैं, लेकिन ईरान और खाड़ी के देशों से भी भारत के संबंध जारी रहे। चीन के साथ सीमा विवाद गंभीर है, लेकिन ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर संवाद जारी है।
अगर मोदी के प्रधानमंत्री काल की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता चुननी हो तो 2023 में जी-20 की अध्यक्षता सबसे महत्वपूर्ण कही जा सकती है। नई दिल्ली में जी-20 सम्मेलन के दौरान भारत ने अफ्रीकन देशों के संगठन यानी अफ्रीकी देशों को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाने में भूमिका निभाई। दिल्ली घोषणा पत्र पर सहमति बनाने में सफलता पाई। भारत मध्य पूर्व-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर की घोषणा में भूमिका निभाई।
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के कारण जी-20 के भीतर मतभेद बहुत गहरे थे। फिर भी भारत ने सर्वानुमति से घोषणा जारी करवाई। सबसे बड़ा काम भारत की पाकिस्तान के आतंकवाद पर हर मंच से न केवल भर्त्सना की, नाम लिए बिना सबको साथ देने का संकल्प करवाया। भारत जी-7 का सदस्य नहीं है। लेकिन मोदी को कई वर्षों में जी-7 के विशेष सत्रों में आमंत्रित किया गया। यानी मोदी ने जी-7 की सदस्यता प्राप्त नहीं की—बल्कि जी-7 के बाहर रहकर भारत को उस बातचीत का आवश्यक पक्ष बना दिया।
क्वाड यानी अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के लिए भारत-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति कारगर है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की भूमिका को भी अधिक सक्रिय बनाया। उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग दोहराई। उनकी विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा यह रहा है कि भारत केवल नियमों का पालन करने वाला देश नहीं, बल्कि नियम बनाने में भाग लेने वाली शक्ति बने। इसी सोच के तहत संयुक्त राष्ट्र सुधार, आतंकवाद से संघर्ष, पर्यावरण संरक्षण, सौर ऊर्जा अलायंस, योग से स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को विश्वव्यापी बना दिया। इसलिए चाहें उन्हें न कहें, लेकिन मोदी के भारत को विश्व गुरु के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए। तभी उनके जन्मदिन और 25 वर्षों के सत्ता काल की बधाई और शुभकामनाएं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )