समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में 'टाइम्स नाउ नवभारत' के मैनेजिंग एडिटर रंजीत कुमार ने पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर खुलकर अपनी राय रखी।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में 'टाइम्स नाउ नवभारत' के मैनेजिंग एडिटर रंजीत कुमार ने पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है और आज भी मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। हालांकि, एक सुनियोजित नैरेटिव के जरिए मेनस्ट्रीम मीडिया को बदनाम करने और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने की कोशिश की जा रही है।
अपने संबोधन की शुरुआत में रंजीत कुमार ने कहा कि उनसे पहले जिन मुद्दों और सवालों पर चर्चा हुई, उनका जवाब देने की वे पूरी कोशिश करेंगे। उन्होंने कहा कि जब भी पत्रकारिता के इतिहास, वर्तमान और भविष्य की बात होती है तो हमें अपने आज को अपने अतीत के आईने में देखकर समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत की पत्रकारिता का इतिहास स्वर्णिम रहा है। आजादी की लड़ाई के समय न तो आधुनिक संचार माध्यम थे और न ही लोगों को खुलकर बोलने या लिखने की आजादी थी। इसके बावजूद पत्रकारों और संपादकों ने हाथ से पर्चे लिखकर लोगों में आजादी की अलख जगाई। कई पत्रकारों और संपादकों ने अपने लेखों की कीमत वर्षों तक जेल में रहकर चुकाई। यही भारतीय पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत और विरासत रही है।
रंजीत कुमार ने कहा कि आज यह माहौल बनाया जा रहा है कि देश की पत्रकारिता, खासकर हिंदी मीडिया, पूरी तरह गिर चुकी है और अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट गई है। लेकिन उनका मानना है कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। उन्होंने कहा कि मीडिया को बदनाम करने का एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है, जबकि सच्चाई इससे अलग है।
उन्होंने हाल ही में जंतर-मंतर पर पत्रकारों के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उस दिन उनके संस्थान के पत्रकार भी वहां मौजूद थे। उन्होंने बताया कि उनके कई एंकरों और रिपोर्टर्स के साथ धक्का-मुक्की और गाली-गलौज की गई। एक महिला पत्रकार को करीब ढाई घंटे तक अपनी सुरक्षा के लिए एक बैंक में छिपकर रहना पड़ा, जबकि उनके एक एंकर को लगभग दो घंटे तक एक रेस्तरां में शरण लेनी पड़ी। उन्होंने कहा कि वहां भी प्रदर्शनकारी पहुंच गए और उन्हें बाहर निकालने की कोशिश की। अगर वह सड़क पर आ जाते तो उनके साथ क्या होता, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
रंजीत कुमार ने कहा कि वह पूरी जिम्मेदारी के साथ यह बात कहना चाहते हैं कि उस दिन उनके चैनल की कवरेज को कोई भी व्यक्ति खुद देखकर फैसला कर सकता है कि क्या उसमें ऐसी कोई भाषा, रिपोर्टिंग या प्रस्तुति थी, जिसकी वजह से पत्रकारों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिए था। उनके मुताबिक, ऐसा बिल्कुल नहीं था। इसके बावजूद पत्रकारों के साथ हिंसक व्यवहार हुआ, जो बेहद चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले मीडिया जगत के एक वरिष्ठ संपादक ने अनौपचारिक बातचीत में उनसे कहा था कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो एक दिन पत्रकारों को सड़कों पर दौड़ाकर पीटा जाएगा। उस समय यह बात अतिशयोक्ति लग सकती थी, लेकिन आज जो माहौल बन रहा है, उसे देखकर वह चेतावनी सच होती दिखाई दे रही है।
रंजीत कुमार ने कहा कि सोशल मीडिया पर लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जिसमें मेनस्ट्रीम मीडिया को खलनायक साबित करने की कोशिश की जाती है। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को अलग-अलग नामों और उपाधियों से पुकारा जाता है। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे सत्ता से सवाल नहीं करते और उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं बची है।
उन्होंने कहा कि यदि आज कोई पक्ष विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहा है तो वह मेनस्ट्रीम मीडिया नहीं, बल्कि राजनीति की दूसरी धारा है। उनका कहना था कि अपनी विश्वसनीयता के संकट को छिपाने के लिए मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं और यह उम्मीद की जाती है कि मीडिया विपक्ष की तरफ से लड़ाई लड़े और वही सवाल उठाए जो विपक्ष चाहता है।
रंजीत कुमार ने कहा कि कई बार ऐसे मुद्दों और सवालों को भी मीडिया से उठाने की अपेक्षा की जाती है, जो पूरी तरह सही या तथ्यपरक नहीं होते। यदि मीडिया आंख मूंदकर उनका समर्थन नहीं करता, तो उसे 'गोदी मीडिया' या 'दलाल मीडिया' कह दिया जाता है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि देश के पत्रकारों की जवाबदेही किसी विपक्ष, किसी राजनीतिक दल या किसी सरकार के प्रति नहीं है। पत्रकारों की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ सच के प्रति है। मीडिया का काम किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि सही सवाल पूछना और सही तथ्यों को सामने लाना है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विपक्ष द्वारा उठाया गया हर मुद्दा ही अंतिम सच होता है? क्या हर सवाल सही होता है और क्या मेनस्ट्रीम मीडिया का काम बिना जांच-पड़ताल के उन सभी सवालों के साथ खड़ा हो जाना है? उनका कहना था कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
रंजीत कुमार ने कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि आज मीडिया सत्ता से ज्यादा विपक्ष से सवाल पूछता है। लेकिन उनका मानना है कि मीडिया का काम यह तय करना नहीं है कि सामने सत्ता है या विपक्ष, बल्कि यह देखना है कि सही सवाल कौन-सा है। पत्रकारिता की असली जिम्मेदारी जनता के प्रति है।
उन्होंने कहा कि मीडिया खुद को निष्पक्ष होने का दावा नहीं करता, बल्कि वह जनपक्षधर है। उसकी जवाबदेही किसी राजनीतिक दल, संगठन या विचारधारा के प्रति नहीं, बल्कि देश की जनता और सच के प्रति है। यही पत्रकारिता का मूल धर्म है और इसी सिद्धांत पर मीडिया को आगे भी काम करना चाहिए।
इसके बाद रंजीत कुमार ने कहा कि टीवी पत्रकारिता और उसके कंटेंट को लेकर भी कई तरह की धारणाएं बनाई जा रही हैं। अक्सर कहा जाता है कि आज के पत्रकारों और संपादकों में पहले जैसी सोच या कल्पनाशक्ति नहीं रही और टीवी का कंटेंट पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन उनका मानना है कि हर दौर में पत्रकारिता के सामने अलग-अलग तरह की चुनौतियां रही हैं और आज की चुनौतियां पहले से बिल्कुल अलग हैं।
उन्होंने कहा कि आज सूचना के अनगिनत स्रोत मौजूद हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक खबरें बहुत तेजी से पहुंच जाती हैं। कई बार ऐसा होता है कि टीवी स्क्रीन पर कोई खबर ब्रेक होने से पहले ही लोग उसके बारे में सोशल मीडिया या डिजिटल माध्यमों से जान चुके होते हैं। ऐसे में यह स्वीकार करना होगा कि आज टीवी और अखबार लोगों के लिए खबरों का पहला स्रोत नहीं रह गए हैं।
हालांकि, उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि टीवी मीडिया की भूमिका खत्म हो गई है। उनके अनुसार, आज जब फेक न्यूज और भ्रामक सूचनाओं की बाढ़ आई हुई है, तब भी किसी खबर की पुष्टि करने के लिए लोग सबसे पहले टीवी न्यूज चैनलों की ओर ही देखते हैं। चाहे किसी ने फेसबुक, एक्स (पूर्व ट्विटर) या किसी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई खबर देखी हो, लेकिन यह जानने के लिए कि खबर सही है या गलत, वह अंत में टीवी न्यूज चैनल ही खोलता है।
रंजीत कुमार ने कहा कि आज भी मेनस्ट्रीम मीडिया ही खबरों की पुष्टि का सबसे विश्वसनीय माध्यम है। इसकी वजह यह है कि टीवी और मुख्यधारा का मीडिया कई तरह के सेल्फ रेगुलेटरी नियमों और पेशेवर जिम्मेदारियों से बंधा होता है। मीडिया संस्थान किसी भी खबर को बिना जांच-पड़ताल के प्रसारित नहीं कर सकते। हर खबर को कई स्तर पर क्रॉस चेक और वेरिफाई किया जाता है, उसके बाद ही उसे दर्शकों तक पहुंचाया जाता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सोशल मीडिया पर मौजूद हर व्यक्ति, जिसके हाथ में कैमरा है, उसे पत्रकार मान लिया जाना चाहिए? क्या ऐसे लोग भी वही जवाबदेही निभा सकते हैं, जो मुख्यधारा का मीडिया निभाता है? उनका कहना था कि ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि सोशल मीडिया पर खबर डालने वाले अधिकांश लोगों पर वैसी संस्थागत जिम्मेदारी नहीं होती जैसी पत्रकारिता से जुड़े संस्थानों पर होती है।
रंजीत कुमार ने कहा कि आज मीडिया में एक और बड़ा बदलाव आया है, जिसे समझने की जरूरत है। उन्होंने इसे 'न्यूज कन्फर्मेशन' और 'व्यू वैलिडेशन' का बदलाव बताया। उन्होंने कहा कि अब लोग सिर्फ खबर जानने के लिए टीवी नहीं देखते, क्योंकि खबर तो उन्हें पहले ही विभिन्न माध्यमों से मिल चुकी होती है। वे टीवी इसलिए देखते हैं ताकि जिस घटना को लेकर उनके मन में जो समझ या राय बनी है, उसकी पुष्टि हो सके। वे यह जानना चाहते हैं कि उनका नजरिया सही है या नहीं।
उन्होंने कहा कि आज टीवी पर प्रसारित होने वाली प्राइम टाइम डिबेट, एक्सप्लेनर शो और विश्लेषण आधारित कार्यक्रम इसी जरूरत को पूरा करते हैं। इन कार्यक्रमों के जरिए दर्शकों को किसी मुद्दे को बेहतर ढंग से समझने और अपनी राय को परखने का अवसर मिलता है। उनके मुताबिक, इसमें कोई बुराई नहीं है। यदि मुख्यधारा का मीडिया समय के साथ इस बदलाव को नहीं अपनाएगा, तो वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए मीडिया को समय के अनुसार बदलाव करना ही होगा। लेकिन कई बार जनपक्षधर पत्रकारिता को गलत तरीके से सत्ता पक्ष का समर्थन बताकर पेश किया जाता है। यही वह जगह है, जहां भ्रम और गलत नैरेटिव पैदा होता है।
रंजीत कुमार ने कहा कि आज सबसे बड़ी चुनौती कंटेंट से ज्यादा परसेप्शन की है। एक सुनियोजित कोशिश के तहत यह धारणा बनाई जा रही है कि मेनस्ट्रीम मीडिया अब निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने कहा कि इस धारणा को बनाने वालों में सिर्फ सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग ही नहीं हैं, बल्कि मीडिया से जुड़े कुछ पुराने लोग भी शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब कुछ खास सवालों को दबा दिया जाता था। कई मुद्दों को सांप्रदायिक, बहुसंख्यकवादी या दूसरे नाम देकर खारिज कर दिया जाता था और उन पर चर्चा तक नहीं होने दी जाती थी। लेकिन आज वही सवाल सार्वजनिक रूप से पूछे जा रहे हैं। ऐसे में जिन लोगों ने पहले इन सवालों को दबाया था, उन्हें अब यह बदलाव स्वीकार करने में परेशानी हो रही है।
रंजीत कुमार ने दोहराया कि पत्रकारों की जिम्मेदारी किसी राजनीतिक दल, सरकार या विपक्ष के प्रति नहीं, बल्कि देश की जनता के प्रति है। मीडिया ने हमेशा इसी जिम्मेदारी के साथ अपना काम किया है और आगे भी करता रहेगा।
उन्होंने कहा कि जिस नैरेटिव के जरिए यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि आज की मीडिया जनता के साथ नहीं बल्कि सरकार के साथ खड़ी है, उसे मजबूती से खारिज करने की जरूरत है। उनका कहना था कि जनपक्षधर पत्रकारिता को जानबूझकर पक्षपात के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। इसलिए मीडिया को इस तरह की धारणाओं का तथ्य और जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए जवाब देना होगा।
अपने संबोधन के अंत में रंजीत कुमार ने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना और सच को सामने लाना है। जब तक मीडिया इस मूल भावना के साथ काम करता रहेगा, तब तक उसकी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता बनी रहेगी।
अपने संबोधन के अंत में रंजीत कुमार ने कहा कि आज मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अच्छी पत्रकारिता करना नहीं है, बल्कि उस गलत धारणा का भी सामना करना है जिसे लगातार फैलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि मुख्यधारा की मीडिया अब जनता के साथ नहीं, बल्कि सरकार के साथ खड़ी है। उनके अनुसार, इस धारणा को तथ्यों और जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए चुनौती देने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि जनपक्षधर पत्रकारिता को जानबूझकर पक्षपात के रूप में पेश किया जा रहा है। जबकि मीडिया का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, सरकार या विपक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हितों और सच के साथ खड़ा होना है। इसलिए जरूरी है कि पत्रकार अपने काम के जरिए यह साबित करें कि उनकी प्रतिबद्धता सिर्फ जनता और सत्य के प्रति है।
रंजीत कुमार ने कहा कि समय के साथ मीडिया का स्वरूप और काम करने का तरीका जरूर बदला है, लेकिन पत्रकारिता के मूल मूल्य नहीं बदले हैं। मुख्यधारा की मीडिया आज भी तथ्यों की जांच, खबरों की पुष्टि और जिम्मेदारी के साथ सूचना देने की अपनी भूमिका निभा रही है। इसी कारण फेक न्यूज और अफवाहों के दौर में भी लोग किसी खबर की पुष्टि के लिए विश्वसनीय मीडिया संस्थानों की ओर देखते हैं।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को लेकर जो गलत धारणाएं बनाई जा रही हैं, उन्हें सिर्फ बयान देकर नहीं, बल्कि बेहतर और जिम्मेदार पत्रकारिता के जरिए गलत साबित किया जा सकता है। मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता है और उसे हर हाल में बनाए रखना होगा।
अपने संबोधन का समापन करते हुए रंजीत कुमार ने दोहराया कि पत्रकारों की जवाबदेही किसी सत्ता, विपक्ष या राजनीतिक विचारधारा के प्रति नहीं है। पत्रकारिता का असली धर्म जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना और सच को सामने लाना है। उन्होंने कहा कि मीडिया को इसी मूल भावना के साथ आगे बढ़ना चाहिए और ऐसे हर नैरेटिव का मजबूती से विरोध करना चाहिए, जो मुख्यधारा की पत्रकारिता की साख और विश्वसनीयता पर बिना आधार के सवाल खड़े करता है।
आजतक के मैनेजिंग एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) सईद अंसारी ने समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा के साथ फायरसाइड चैट में पत्रकारिता, जीवन-दर्शन, फिटनेस, सोशल मीडिया को लेकर बातचीत की।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में आजतक के मैनेजिंग एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) सईद अंसारी ने समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा के साथ फायरसाइड चैट में पत्रकारिता, जीवन-दर्शन, फिटनेस, सोशल मीडिया और व्यक्तिगत रिश्तों को लेकर खुलकर बातचीत की। बातचीत की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में हुई, लेकिन आगे चलकर कई गंभीर विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
सवाल: आपकी फिटनेस, ऊर्जा और हमेशा मुस्कुराते रहने का राज क्या है?
चर्चा की शुरुआत में पंकज शर्मा ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से कई लोग उनसे यह सवाल पूछ रहे थे कि सईद अंसारी से उनकी फिटनेस, ऊर्जा और हमेशा मुस्कुराते रहने का राज जरूर पूछा जाए। उन्होंने कहा कि लोग जानना चाहते हैं कि आखिर इतनी व्यस्त जिंदगी के बावजूद वे खुद को इतना ऊर्जावान कैसे रखते हैं।
इस पर सईद अंसारी ने कहा कि उन्हें लोगों से मिलना-जुलना हमेशा अच्छा लगता है। चाहे संस्थान में उनका पद कुछ भी हो, वे आज भी खुद को एक इंटर्न की तरह ही मानते हैं। उनका कहना था कि उन्होंने पहली नौकरी जिस सीखने की भावना के साथ शुरू की थी, वही भावना आज भी कायम है।
सईद अंसारी ने कहा कि आज भी जब वे कैमरे के सामने माइक पकड़ते हैं या किसी मंच से बोलने जाते हैं तो घबराहट महसूस होती है। उन्हें हमेशा डर रहता है कि कहीं कोई गलती न हो जाए, कहीं ऐसा कुछ न कह दें जिससे किसी का मन दुखे या कोई नाराज हो जाए। यही डर और लगातार सीखने की इच्छा उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि वे आज भी खुद को पत्रकारिता का एक विद्यार्थी मानते हैं।
वहीं, अपनी फिटनेस, ऊर्जा और हमेशा मुस्कुराते रहने के राज के सवाल पर सईद अंसारी ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे खूब खाते हैं और भरपेट खाते हैं। उन्होंने बताया कि उनके खाने में मुख्य रूप से दाल-चावल होता है और वे किसी तरह की डाइटिंग नहीं करते।
उन्होंने कहा कि वे कभी जिम नहीं गए, न ही नियमित वॉक करने या स्टेप्स गिनने जैसी आदतें अपनाईं। उनकी ड्यूटी देर रात तक चलती है। कई बार वे रात 12 बजे, 12:30 बजे या एक बजे ऑफिस से निकलते हैं और करीब डेढ़ बजे घर पहुंचते हैं। इसलिए सुबह जल्दी उठने की बजाय आराम से उठते हैं और सीधे एडिटोरियल मीटिंग की तैयारी में लग जाते हैं।
उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि इंसान को खुश रहना चाहिए। वे बेवजह चिंता नहीं करते। उन्होंने हिंदी की कहावत 'चिंता चिता समान' का जिक्र करते हुए कहा कि बचपन में उनकी चिंता माता-पिता ने की, पढ़ाई के समय शिक्षकों ने की, लेकिन अब वे खुद चिंता करने में विश्वास नहीं रखते।
उन्होंने हंसते हुए यह भी कहा कि पढ़ाई में भी वे कभी बहुत अच्छे छात्र नहीं रहे। स्कूल से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक उनके अंक कभी 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं आए। 40-45 प्रतिशत अंक आ जाते थे तो उन्हें लगता था कि बहुत अच्छा कर लिया। वे हमेशा आखिरी बेंच पर बैठने वाले छात्र रहे और खूब डांट व मार भी खाते थे।
सवाल: जीवन को लेकर आप क्या सोच रखते हैं?
सईद अंसारी ने कहा कि उनका मानना है कि इंसान इस दुनिया में किसी उद्देश्य से आया है। इसलिए यह सोचने की जरूरत नहीं कि सारी उपलब्धियां उसी की वजह से हैं। उन्होंने कहा कि कोई न कोई ऐसी शक्ति जरूर है, जो पूरी दुनिया को चला रही है। इंसान तो सिर्फ इस रंगमंच का एक कलाकार है, जिसे अपना किरदार निभाकर आगे बढ़ जाना है। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी हो रहा है, वह उसी बड़ी शक्ति की योजना का हिस्सा है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि बेवजह डाइटिंग करने की बजाय अच्छा खाना खाएं। उन्होंने कहा कि आजकल लोग तेल, घी और रोटी तक छोड़ रहे हैं, जबकि शरीर को ताकत की जरूरत होती है। उन्होंने अपने दादा का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वे बचपन में एक रोटी ज्यादा खा लेते थे तो उनके दादा खुश हो जाते थे और कहते थे कि अच्छी खुराक ही अच्छी सेहत की पहचान है।
उन्होंने यह भी कहा कि समय-समय पर डॉक्टरों की सलाह भी बदलती रहती है। कभी कहा गया कि घी मत खाइए और अब वही डॉक्टर सीमित मात्रा में घी खाने की सलाह देते हैं। इसलिए उनका मानना है कि संतुलित भोजन करना सबसे बेहतर है।
सवाल: आप सोशल मीडिया से दूरी क्यों बनाए रखते हैं?
पंकज शर्मा ने इसके बाद उनसे पूछा कि लोग अक्सर यह जानना चाहते हैं कि वे सोशल मीडिया पर सक्रिय क्यों नहीं रहते। उन्होंने कहा कि आज लगभग हर पत्रकार के लाखों फॉलोअर्स हैं, लेकिन सईद अंसारी ने खुद को सोशल मीडिया से काफी हद तक दूर रखा है। क्या आज के समय में ऐसा करना संभव है और इसकी वजह क्या है?
इस सवाल के जवाब में सईद अंसारी ने कहा कि उनके कई साथी पत्रकारों के 30 से 50 लाख तक फॉलोअर्स हैं। लेकिन अगर रात दो बजे किसी मुश्किल समय में मदद की जरूरत पड़ जाए, तो उन लाखों फॉलोअर्स में से शायद ही कोई साथ खड़ा मिले।
उन्होंने कहा कि उनकी जिंदगी में सिर्फ चार-पांच ऐसे दोस्त हैं जो साल के 365 दिन, 24 घंटे उनके साथ खड़े रहते हैं। वे उनके लिए परिवार जैसे हैं। उनके घर में उनके लिए अलग कमरा तक है। अगर वे कई दिनों तक उनके घर नहीं जाएं तो परिवार वाले खुद फोन कर लेते हैं या उनके लिए खाना भेज देते हैं।
सईद अंसारी ने साफ कहा कि उन्हें वर्चुअल रिश्तों पर भरोसा नहीं है। वे वास्तविक और आत्मीय रिश्तों में विश्वास करते हैं। उनके मुताबिक, जिंदगी में चार-पांच सच्चे दोस्त होना लाखों सोशल मीडिया फॉलोअर्स से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वही लोग मुश्किल समय में आपके साथ खड़े होते हैं, चाहे वे दोस्त हों, पड़ोसी हों या रिश्तेदार।
पंकज शर्मा ने कहा कि सार्वजनिक मंच से इस तरह की बात कहकर सईद अंसारी ने उन लोगों के सवाल का जवाब दे दिया है, जो जानना चाहते थे कि आज के दौर में सोशल मीडिया से दूरी बनाकर रखना क्यों और कैसे संभव है।
सवाल: लगातार बदलती तकनीक के दौर में एक अच्छे पत्रकार की पहचान किन मूल्यों से होती है?
सोशल मीडिया और व्यक्तिगत जीवन पर चर्चा के बाद पंकज शर्मा ने बातचीत को पत्रकारिता के मूल विषय की ओर मोड़ा। उन्होंने सईद अंसारी से पूछा कि उन्होंने पत्रकारिता का लंबा दौर देखा है और इस दौरान तकनीक तथा माध्यम लगातार बदलते रहे हैं। ऐसे में आज एक अच्छे पत्रकार की पहचान किन मूल्यों से तय होती है।
इस पर सईद अंसारी ने कहा कि वास्तव में सिर्फ माध्यम बदले हैं, पत्रकारिता नहीं बदली है। उनके मुताबिक पत्रकार पहले भी पत्रकार था, आज भी है और आगे भी रहेगा। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के मूल सिद्धांत आज भी वही हैं जो वर्षों पहले थे।
उन्होंने कहा कि एक पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत सच बोलना है। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी समाज के प्रति जवाबदेह रहना और अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाना है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की कई परिभाषाएं पढ़ाई जाती हैं, लेकिन उनकी अपनी परिभाषा अलग है।
सईद अंसारी ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपने देश से प्रेम करता है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखता है तो वह पत्रकारिता की मूल भावना को समझता है। चाहे वह मुख्यधारा की मीडिया में काम करता हो, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हो या किसी दूसरे पेशे में हो, देश के प्रति जिम्मेदारी की भावना ही पत्रकारिता का आधार है।
उन्होंने कहा कि कैमरे बदल गए, तकनीक बदल गई, AI आ गया और डिजिटल प्लेटफॉर्म आ गए, लेकिन पत्रकार की जिम्मेदारी नहीं बदली। आज भी उसका पहला कर्तव्य सच बोलना, लोगों का विश्वास बनाए रखना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना है।
सवाल: इतने सारे प्लेटफॉर्म आने के बाद मेनस्ट्रीम मीडिया खुद को अलग कैसे बनाए रखे?
इस सवाल पर सईद अंसारी ने कहा कि मेनस्ट्रीम मीडिया को अलग दिखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। उनका कहना था कि मीडिया का उद्देश्य किसी फिल्म की तरह चमक-दमक पैदा करना या खुद को हीरो साबित करना नहीं है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार का काम सिर्फ इतना है कि जहां जो कुछ हो रहा है, उसे सही तरीके से लोगों तक पहुंचाया जाए। हालांकि उन्होंने माना कि आज दर्शकों की अपेक्षाएं पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। अब लोग सिर्फ खबर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पूरी सच्चाई भी जानना चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि कई बार आंखों से देखी हुई चीज भी पूरी सच्चाई नहीं होती और कानों से सुनी हुई बात भी अंतिम सच नहीं होती। ऐसे में पत्रकार की जिम्मेदारी सिर्फ घटना बताने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उसके पीछे के तथ्य और वास्तविकता को सामने लाना भी उसका दायित्व है।
'न्यूज दिखाइए, व्यूज मत थोपिए'
बातचीत के दौरान सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी गलती तब शुरू होती है, जब न्यूज की जगह व्यूज को प्राथमिकता दी जाने लगती है।
उन्होंने कहा कि जैसे ही पत्रकार अपनी व्यक्तिगत राय या विचार दर्शकों पर थोपने लगता है, उसी क्षण वह एक पक्षकार बन जाता है और जब पत्रकार पक्षकार बन जाता है, तब वह अपने पत्रकारिता धर्म से भटक जाता है।
उनका कहना था कि मीडिया का काम तथ्य रखना है, न कि दर्शकों पर अपनी राय थोपना।
सवाल: सबसे पहले खबर दिखाने की होड़ में सटीकता कैसे बचाई जाए?
पंकज शर्मा ने अगला सवाल पूछा कि आज न्यूजरूम में सबसे पहले खबर देने की होड़ लगी रहती है। सोशल मीडिया पर खबरें पहले ही आ जाती हैं। ऐसे माहौल में सटीकता और विश्वसनीयता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। संपादकीय स्तर पर इसे कैसे संभाला जाए?
सईद अंसारी ने कहा कि यह चुनौती खासकर टीवी पत्रकारिता में सबसे ज्यादा है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर सबसे पहले खबर डालने की होड़ में अक्सर बड़ी गलतियां हो जाती हैं और वहां हर जानकारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि जरूरत पड़े तो खबर कुछ मिनट या कुछ घंटे बाद दिखाई जाए, लेकिन गलत खबर कभी नहीं दिखाई जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोग कुछ समय बाद यह भूल जाते हैं कि कौन-सा चैनल खबर सबसे पहले लेकर आया था, लेकिन अगर किसी चैनल या पत्रकार ने एक बार भी गलत खबर चला दी तो लोग उसे लंबे समय तक याद रखते हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार उनके दोस्त उन्हें बताते हैं कि जो खबर टीवी पर दिखाई जा रही है, वह तो दो घंटे पहले ही व्हाट्सऐप पर आ चुकी थी। ऐसे में टीवी का मुकाबला सोशल मीडिया की रफ्तार से नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता से होना चाहिए।
सईद अंसारी ने कहा कि रिपोर्टर को खबर भेजने से पहले स्वतंत्र रूप से उसकी पुष्टि करनी चाहिए। उसके बाद यदि प्रशासन या पुलिस भी उसकी पुष्टि कर दे, तभी उसे खबर माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को उतना इंतजार करना चाहिए, क्योंकि यही उनकी पेशेवर जिम्मेदारी है। अगर बिना पुष्टि के खबर दिखाई जाती है, तो यह पत्रकारिता की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा है।
सवाल: AI पत्रकारों के लिए अवसर है या चुनौती?
पंकज शर्मा ने इसके बाद AI पर सवाल किया और पूछा कि न्यूजरूम में AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में क्या यह पत्रकारों के लिए अवसर साबित होगा या संपादकीय स्तर पर नई चुनौतियां पैदा करेगा?
इस पर सईद अंसारी ने कहा कि AI बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसा भी हो सकता है कि भविष्य में वे खुद स्टूडियो में मौजूद न हों और AI उनकी आवाज और चेहरा इस्तेमाल करके बुलेटिन पढ़ रहा हो, जबकि दर्शकों को इसका पता भी न चले।
उन्होंने कहा कि फिलहाल AI में सबसे बड़ी कमी भावनाओं की है। हालांकि भविष्य में AI भाव-भंगिमाएं भी सीख सकता है, लेकिन इंसानी संवेदनाओं की बराबरी करना उसके लिए आसान नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि जब कोई अपना व्यक्ति बिना कुछ कहे भी आपके चेहरे को देखकर पूछ लेता है कि आज आप परेशान क्यों हैं या खुश क्यों हैं, तो वह संवेदनशीलता मशीन में नहीं आ सकती।
सईद अंसारी ने कहा कि AI पत्रकार का अच्छा सहयोगी और मददगार बन सकता है, लेकिन वह पत्रकार की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता। तकनीक इंसान की सहायता कर सकती है, लेकिन मानवीय संवेदनाएं, अनुभव और भावनात्मक समझ अभी भी पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत हैं।
इसी के साथ बातचीत का अगला दौर शुरू हुआ, जिसमें पंकज शर्मा ने युवा पत्रकारों, नई पीढ़ी, नशे की बढ़ती समस्या और पत्रकारिता के भविष्य को लेकर सईद अंसारी से विस्तार से सवाल पूछे।
सवाल: आज के युवा पत्रकारों की सबसे बड़ी ताकत क्या है और उन्हें किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है?
AI पर चर्चा के बाद समाचार4मीडिया के संपादक पंकज शर्मा ने सईद अंसारी से पूछा कि वे लंबे समय से न्यूज़रूम में काम कर रहे हैं और लगातार युवाओं के साथ भी काम करते हैं। ऐसे में आज के युवा पत्रकारों की सबसे बड़ी ताकत क्या है और उन्हें किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत महसूस होती है।
इस सवाल का जवाब देते हुए सईद अंसारी ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन का एक उद्देश्य होता है और उनका अपना उद्देश्य सिर्फ एक है- देश के युवाओं को नशे से दूर रखना।
उन्होंने कहा कि आज नशा बहुत सामान्य बात बनता जा रहा है और यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। उन्होंने फिल्म सिटी का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मौजूद कई मीडिया और अन्य संस्थानों के छात्र दिन में खुलेआम सिगरेट पीते हैं और शाम को उसी सिगरेट में चरस और गांजा भरकर उसका सेवन करते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति उन्हें बेहद परेशान करती है।
सईद अंसारी ने बताया कि उन्होंने नोएडा में हुक्का संस्कृति के खिलाफ भी लंबे समय तक अभियान चलाया। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा हुक्का पर प्रतिबंध लगाने के लिए उन्होंने लगातार आवाज उठाई और आज भी उनका सबसे बड़ा प्रयास यही है कि युवाओं को किसी भी तरह के नशे से दूर रखा जाए।
उन्होंने कहा कि पत्रकार तो किसी भी हालत में नशे से दूर रहें, क्योंकि पत्रकार की जिम्मेदारी समाज के प्रति होती है। यदि नई पीढ़ी को सही दिशा नहीं मिली तो भविष्य भी प्रभावित होगा।
'अपने बच्चों पर भरोसा करें, लेकिन आंख बंद करके नहीं'
सईद अंसारी ने कहा कि आजकल आधुनिकता और Gen Z के नाम पर कई ऐसी चीजें सामान्य मानी जाने लगी हैं, जो भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बच्चों के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि आज माता-पिता बच्चों को संस्कार देने में पहले जैसी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं।
उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों पर भरोसा जरूर करें, लेकिन आंख मूंदकर नहीं। उन्होंने कहा कि जिस तरह उनके माता-पिता बचपन में इस बात पर नजर रखते थे कि वे किसके साथ उठते-बैठते हैं, कहां जाते हैं, क्या करते हैं और किन दोस्तों के साथ समय बिताते हैं, उसी तरह आज भी अभिभावकों को अपने बच्चों पर नजर रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज कई माता-पिता अपने बच्चों से यह तक पूछने में संकोच करते हैं कि वे कहां जा रहे हैं या किसके साथ समय बिता रहे हैं। जबकि यही सतर्कता बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से बचा सकती है।
'मोबाइल सबसे बड़ा साथी भी है और सबसे बड़ा दुश्मन भी'
सईद अंसारी ने कहा कि मोबाइल फोन आज जितना उपयोगी है, उतना ही खतरनाक भी साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज स्मार्टफोन में यह देखना आसान है कि कोई व्यक्ति कितना समय मोबाइल पर बिता रहा है।
उन्होंने अभिभावकों से कहा कि वे एक बार अपने बच्चों का स्क्रीन टाइम जरूर देखें। उन्हें पता चलेगा कि 12 घंटे के सक्रिय समय में कई बच्चे पांच से सात घंटे सिर्फ मोबाइल पर ही बिताते हैं। इस वजह से पढ़ने की आदत लगातार खत्म होती जा रही है और यही उन्हें सबसे ज्यादा चिंता में डालता है।
उन्होंने कहा कि आज का युवा अगर हिंदी नहीं जानता तो उसे शर्म नहीं आती। उसे सिर्फ यह लगता है कि अगर वह अच्छी अंग्रेजी बोल लेता है तो वही सबसे बड़ी योग्यता है। जबकि वास्तविक ज्ञान सिर्फ भाषा से नहीं आता, बल्कि पढ़ने और समझने की आदत से आता है।
सवाल: अगर आज आपको युवा पत्रकारों की भर्ती करनी हो तो किन बातों को सबसे ज्यादा महत्व देंगे?
इस सवाल के जवाब में सईद अंसारी ने कहा कि वे युवाओं की आलोचना नहीं कर रहे हैं। उन्होंने माना कि आज की पीढ़ी तकनीक के मामले में बेहद तेज और प्रतिभाशाली है। नई तकनीक को समझने और अपनाने की उनकी क्षमता शानदार है।
लेकिन उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन चीजों का ज्ञान एक पत्रकार के लिए जरूरी है, वही जानकारी युवाओं के पास नहीं है।
उन्होंने कहा कि आज बहुत से युवाओं को अपने देश के बारे में बुनियादी जानकारी तक नहीं होती। वे इतिहास, भूगोल, विज्ञान और समसामयिक घटनाओं से दूर होते जा रहे हैं क्योंकि उन्होंने पढ़ना लगभग छोड़ दिया है।
सईद अंसारी ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि हाल ही में उन्होंने अपने संस्थान में फाइनल परीक्षा के बाद छात्रों का वाइवा लिया। उन्होंने सभी छात्रों से सिर्फ एक सवाल पूछा—भारत के उपराष्ट्रपति कौन हैं? उन्हें यह देखकर गहरा दुख हुआ कि 50 छात्रों में से केवल एक छात्र सही जवाब दे पाया।
उन्होंने कहा कि इसके बाद उन्होंने अपने संस्थान के प्रोफेसरों और डीन की बैठक बुलाई और साफ कहा कि यह छात्रों की नहीं, बल्कि शिक्षकों और उनकी भी जिम्मेदारी है कि वे छात्रों को सही दिशा नहीं दे पाए।
उन्होंने कहा कि आधुनिक और तकनीकी रूप से दक्ष होना अच्छी बात है, लेकिन अगर युवा अपने देश, संविधान, राजनीति और समाज की बुनियादी जानकारी से ही अनजान रहेंगे, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
युवा पत्रकारों को सईद अंसारी का मैसेज
चर्चा के अंत में इस हिस्से में सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता में आने वाले युवाओं को सिर्फ तकनीक सीखना ही काफी नहीं है। उन्हें इतिहास, भूगोल, विज्ञान, खेल, मनोरंजन और समसामयिक घटनाओं सहित हर विषय की जानकारी रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पत्रकार किसी एक विषय का विशेषज्ञ जरूर हो सकता है, लेकिन उसे एक ऑलराउंडर भी होना चाहिए। इंटरव्यू के दौरान उससे किसी भी विषय पर सवाल पूछा जा सकता है, इसलिए व्यापक अध्ययन और पढ़ने की आदत विकसित करना बेहद जरूरी है।
उन्होंने अभिभावकों से भी कहा कि यदि उनके बच्चे पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं तो समय-समय पर उनका सामान्य ज्ञान जांचते रहें। उनसे विंबलडन विजेता, देश के संवैधानिक पदों, राजनीति, खेल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर सवाल पूछें। इससे उनकी तैयारी मजबूत होगी और वे बेहतर पत्रकार बन सकेंगे।
सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता केवल कैमरे के सामने आने या तकनीक चलाने का नाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर सीखने, पढ़ने और समाज की गहरी समझ विकसित करने का पेशा है।
दर्शकों के सवालों में भी उठे पत्रकारिता और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे
फायरसाइड चैट के समापन की ओर बढ़ते हुए दर्शकों की ओर से भी कई सवाल पूछे गए। एक दर्शक ने सईद अंसारी से पूछा कि उन्होंने बातचीत के दौरान कहा था कि पत्रकार को "न्यूज़" पर ध्यान देना चाहिए, "व्यूज़" पर नहीं। ऐसे में क्या वे हाल की कुछ घटनाओं के संदर्भ में इसका कोई उदाहरण देना चाहेंगे?
इस सवाल के जवाब में सईद अंसारी ने कहा कि आज दर्शकों की अपेक्षाएं पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। अब लोग सिर्फ खबर नहीं, बल्कि उसके पीछे की पूरी सच्चाई भी जानना चाहते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब वे "व्यूज़" की बात करते हैं तो उसका मतलब पत्रकार की व्यक्तिगत राय से होता है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पत्रकार है तो उसे अपनी व्यक्तिगत पहचान, राजनीतिक झुकाव और वैचारिक आग्रहों से ऊपर उठना होगा। पत्रकार के रूप में वह खुद को किसी धर्म, जाति, भाषा, राज्य या राजनीतिक दल के नजरिए से नहीं देख सकता।
सईद अंसारी ने कहा कि उन्होंने बहुत प्रयास करके खुद को हर तरह के वैचारिक पूर्वाग्रह से दूर रखने की कोशिश की है। उनका मानना है कि पत्रकार का सबसे बड़ा धर्म निष्पक्ष रहना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना है। उन्होंने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चिंता आज देश के युवा हैं, क्योंकि आने वाले समय में वही देश और समाज की जिम्मेदारी संभालेंगे।
"कई बातें कहना चाहता हूं, लेकिन मंच और समय की अपनी सीमाएं होती हैं"
उन्होंने कहा कि युवाओं और समाज से जुड़े कई ऐसे विषय हैं, जिन पर वे विस्तार से बोलना चाहते हैं, लेकिन हर मंच और हर अवसर की अपनी सीमाएं होती हैं। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि समाज के लोगों, अभिभावकों और शिक्षकों को इन मुद्दों पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए और अपनी आवाज उठानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया में काम करने वाले लोगों की अपनी पेशेवर सीमाएं होती हैं, इसलिए कई बार वे हर विषय पर खुलकर नहीं बोल पाते। ऐसे में समाज के अन्य लोगों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
सवाल: अगर आने वाले 10 साल में ऐसे ही युवा मीडिया की कमान संभालेंगे तो क्या होगा?
इस दौरान अनुराग बत्रा ने भी बातचीत में हिस्सा लेते हुए कहा कि सईद अंसारी ने खुद बताया कि उनके संस्थान में 50 छात्रों में से सिर्फ एक छात्र ही देश के उपराष्ट्रपति का नाम बता सका। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है कि अगर आने वाले दस वर्षों में यही युवा मीडिया की कमान संभालेंगे तो स्थिति कैसी होगी।
इस पर सईद अंसारी ने कहा कि यही उनकी सबसे बड़ी चिंता है। उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी सिर्फ रील्स, सोशल मीडिया और मोबाइल तक सीमित रह जाएगी और सामान्य ज्ञान, पढ़ाई तथा सामाजिक समझ से दूर होती जाएगी, तो पत्रकारिता के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इस स्थिति से बचने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि माता-पिता अपने बच्चों पर नजर रखें। भरोसा जरूर करें, लेकिन आंख मूंदकर नहीं। उन्होंने कहा कि पहले माता-पिता को हमेशा पता रहता था कि उनका बच्चा कहां जा रहा है, किसके साथ रह रहा है और क्या कर रहा है। आज यह निगरानी लगभग खत्म हो गई है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज कई किशोर अपने माता-पिता से कहते हैं कि वे दोस्तों के साथ नाइट स्टे के लिए बाहर जाएंगे और माता-पिता बिना ज्यादा पूछताछ किए इसकी अनुमति दे देते हैं। उनका मानना है कि बच्चों को पूरी आजादी देने के साथ-साथ जिम्मेदार निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।
उन्होंने एक और उदाहरण साझा करते हुए कहा कि उनके एक मित्र के आठवीं-नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे ने जन्मदिन मनाने के लिए माता-पिता से कहा कि वह दोस्तों के साथ मॉल जाएगा और वहां कोई अभिभावक मौजूद नहीं होगा। सईद अंसारी ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सिर्फ बच्चों को दोष देना ठीक नहीं है, बल्कि अभिभावकों की भी बराबर जिम्मेदारी बनती है।
उन्होंने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि उस समय माता-पिता अनुशासन के मामले में काफी सख्त होते थे। वे बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखते थे और जरूरत पड़ने पर डांटते या सजा भी देते थे। उनका मानना है कि आज के समय में भी बच्चों के जीवन में माता-पिता की सक्रिय भूमिका बेहद जरूरी है।
सवाल: युवा पत्रकारों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
इस पर सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता में आने वाले युवाओं को सिर्फ तकनीक सीखने तक खुद को सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें इतिहास, भूगोल, विज्ञान, खेल, मनोरंजन, राजनीति और देश-दुनिया की हर महत्वपूर्ण घटना की जानकारी रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को ऑलराउंडर होना चाहिए। जरूरी नहीं कि उसे हर विषय का विशेषज्ञ होना पड़े, लेकिन इतना ज्ञान जरूर होना चाहिए कि किसी भी विषय पर बुनियादी सवालों का जवाब दे सके। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि इंटरव्यू में किसी उम्मीदवार से विंबलडन चैंपियन, किसी अंतरराष्ट्रीय नेता, किसी राज्य की विधानसभा सीटों या संसद की बुनियादी व्यवस्था के बारे में पूछा जाए, तो वह पूरी तरह अनजान नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज कई युवाओं को यह तक नहीं पता कि लोकसभा और विधानसभा में क्या अंतर है या सांसद और विधायक की भूमिकाएं क्या होती हैं। यह स्थिति पत्रकारिता जैसे पेशे के लिए चिंता का विषय है।
सईद अंसारी ने कहा कि पत्रकारिता सिर्फ कैमरे के सामने बोलने या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने का नाम नहीं है। यह लगातार पढ़ने, सीखने, समाज को समझने और तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी निभाने का पेशा है।
टाइम्स नेटवर्क में डिजिटल (हिंदी व क्षेत्रीय भाषाएं) के मैनेजिंग एडिटर शमशेर सिंह ने मीडिया के बदलते दौर, पत्रकारिता की विश्वसनीयता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर खुलकर अपनी बात रखी।
by
Vikas Saxena
समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में टाइम्स नेटवर्क में डिजिटल (हिंदी व क्षेत्रीय भाषाएं) के मैनेजिंग एडिटर शमशेर सिंह ने मीडिया के बदलते दौर, पत्रकारिता की विश्वसनीयता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), नई पीढ़ी (Gen Z) और पत्रकारों के भविष्य पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पिछले 10-15 दिनों में जिस तरह पूरे देश में मीडिया को लेकर बहस हुई है, उससे पत्रकारिता को एक बार फिर आत्मचिंतन करने की जरूरत है। अब यह सोचने का समय है कि आगे कैसे बढ़ना है और अपनी साख कैसे बचानी है।
शमशेर सिंह ने कहा कि उन्होंने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों माध्यमों में काम किया है। करीब 20-22 साल तक टीवी पत्रकारिता की और अब कई वर्षों से डिजिटल और टीवी दोनों में काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनकी शुरुआत रिपोर्टर के रूप में हुई थी और लगभग 20 साल तक मैदान में रिपोर्टिंग करने के बाद वे न्यूज़रूम का हिस्सा बने। इस लंबे अनुभव के दौरान उन्होंने मीडिया को लगातार बदलते देखा है और उन्हें साफ दिखाई दे रहा है कि पत्रकारिता का भविष्य किस दिशा में जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पहले जब कोई पत्रकार कहीं यात्रा करता था या किसी सार्वजनिक जगह पर होता था, तो गर्व से कहता था कि वह पत्रकार है। लेकिन आज हालात ऐसे हो गए हैं कि कई बार पत्रकारों को अपनी पहचान छिपानी पड़ती है। उन्होंने अपना एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि हाल ही में फ्लाइट में एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि वे क्या करते हैं। जब उन्होंने बताया कि वे पत्रकार हैं, तो सामने वाले का अगला सवाल ऐसा था जिसे वे सार्वजनिक रूप से भी साझा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि यही सबसे बड़ा फर्क है पहले और आज की पत्रकारिता में।
शमशेर सिंह ने कहा कि पहले मीडिया को जनता अपनी आवाज मानती थी। आंदोलन या प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को बुलाया जाता था क्योंकि लोगों को भरोसा होता था कि मीडिया उनकी बात भी सामने लाएगी और जरूरत पड़ने पर उनकी ढाल भी बनेगी। लेकिन आज स्थिति उलट गई है। जिन लोगों की आवाज कभी मीडिया हुआ करती थी, वही लोग आज मीडिया से दूरी बना रहे हैं और कई बार पत्रकारों को विरोध का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि मीडिया में अक्सर AI और नई पीढ़ी यानी Gen Z को नौकरी के लिए खतरा माना जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि नेटवर्क18 में रहते हुए उन्होंने एक नया वर्टिकल शुरू किया था, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत Gen Z युवाओं को मौका दिया गया था। उनके साथ काम करके यह महसूस हुआ कि अगर सही दिशा मिले तो नई पीढ़ी और AI पत्रकारिता को और मजबूत बना सकते हैं।
उन्होंने कहा कि पत्रकारों को यह सोच छोड़नी होगी कि AI उनकी नौकरी छीनने आया है। यदि कोई लगातार खुद को नई तकनीक के साथ अपडेट करता रहेगा, तो उसके लिए अवसर हमेशा बने रहेंगे। उन्होंने अपनी मिसाल देते हुए कहा कि उनकी उम्र रिटायरमेंट के करीब है, लेकिन वे अगले दस साल तक भी काम करने का भरोसा रखते हैं क्योंकि उन्होंने समय के साथ खुद को लगातार बदला है। रिपोर्टिंग सीखी, फिर आउटपुट, उसके बाद टीवी, न्यूज़रूम, डिजिटल और जब AI आया तो उन्होंने तीन महीने का AI कोर्स भी किया। उन्होंने Gen Z के युवाओं को अपनी टीम में शामिल किया और उनसे सीखने का भी प्रयास किया।
शमशेर सिंह ने कहा कि आज सबसे बड़ी जरूरत यह है कि पत्रकार खुद को बदलें। AI और नई तकनीकों का सही इस्तेमाल सीखें। जो लोग सिर्फ एक ही कौशल पर टिके रहेंगे, उनके लिए भविष्य मुश्किल हो सकता है।
उन्होंने वेबसाइट पत्रकारिता का उदाहरण देते हुए कहा कि आज कई वेबसाइटों का लगभग 80 प्रतिशत ट्रैफिक Google के बदलावों की वजह से खत्म हो गया है। जिन वेबसाइटों पर पहले करोड़ों व्यूज आते थे, वे अब बहुत कम ट्रैफिक पर आ गई हैं। ऐसे में जब नौकरी जाने के बाद लोग उनके पास आते हैं और वे पूछते हैं कि वेबसाइट के अलावा और क्या-क्या आता है, तो कई लोगों के पास कोई जवाब नहीं होता। न उन्होंने सोशल मीडिया सीखा, न YouTube की तकनीक और न ही AI। इसलिए केवल मीडिया संस्थानों को दोष देने के बजाय पत्रकारों को भी खुद में बदलाव लाना होगा।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का अगला बड़ा भविष्य अब दिल्ली, लखनऊ या बड़े शहरों में नहीं, बल्कि छोटे शहरों और हाइपर लोकल रिपोर्टर्स के पास है। वहीं से असली और मौलिक खबरें आएंगी। उन्होंने कहा कि स्थानीय रिपोर्टर्स की खबरों को आज Google भी प्राथमिकता देता है और दर्शक भी ऐसी खबरें देखना पसंद करते हैं।
शमशेर सिंह ने पत्रकारिता में रिपोर्टिंग की गुणवत्ता पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहले किसी भी बड़ी खबर को प्रसारित करने से पहले दूसरे पक्ष का जवाब जरूर लिया जाता था। कई बार अच्छी स्टोरी सिर्फ इसलिए रोक दी जाती थी क्योंकि संबंधित पक्ष का बयान नहीं मिला था। लेकिन आज कई जगह बिना दूसरे पक्ष का पक्ष लिए ही खबरें चला दी जाती हैं, जिससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है।
उन्होंने कहा कि आज कई एंकर उन विषयों पर लगातार बुलेटिन पढ़ते हैं जिनकी बुनियादी जानकारी भी उनके पास नहीं होती। पहले एंकर रिपोर्टर से बात करते थे, पूरी स्टोरी समझते थे और उसके बाद बुलेटिन पढ़ते थे। लेकिन अब कई बार रिपोर्टर को सिर्फ तैयार स्क्रिप्ट और निर्देश देकर मैदान में भेज दिया जाता है। इससे पत्रकारिता की गुणवत्ता पर असर पड़ा है।
उन्होंने कहा कि आज मीडिया के सामने AI से भी बड़ी चुनौती विश्वसनीयता की है। दर्शकों का भरोसा तो कम हुआ ही है, लेकिन मीडिया संस्थानों के भीतर भी कर्मचारी अपने संपादकों और प्रबंधन पर पूरा भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। कई जगह कर्मचारियों को सुबह दफ्तर पहुंचने पर पता चलता है कि उनकी नौकरी खत्म हो गई है। इससे संस्थानों के भीतर भी विश्वास का संकट पैदा हुआ है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी जरूरत अब यही है कि पहले अपने साथियों का भरोसा वापस जीता जाए और फिर दर्शकों का विश्वास लौटाया जाए। संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों को ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां कर्मचारी खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।
शमशेर सिंह ने कहा कि पहले कहा जाता था कि "खबर ही चेहरा है", लेकिन अब स्थिति बदल गई है और "चेहरा ही खबर" बन गया है। इससे भी पत्रकारिता की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा है।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि हर पत्रकार को समय के साथ खुद को बदलना होगा। AI और Gen Z को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयोगी मानना होगा। साथ ही पूरी मीडिया इंडस्ट्री को मिलकर यह प्रयास करना होगा कि पत्रकारिता की खोई हुई विश्वसनीयता और लोगों का भरोसा दोबारा हासिल किया जा सके।
लेडी श्रीराम कॉलेज के कम्युनिकेशन विभाग की प्रमुख प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, तकनीक, एआई, टीआरपी की होड़ और मीडिया की गिरती विश्वसनीयता पर विस्तार से अपनी बात रखी।
by
Vikas Saxena
समाचार4मीडिया की ओर से आयोजित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में लेडी श्रीराम कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के कम्युनिकेशन विभाग की प्रमुख प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), टीआरपी की होड़ और मीडिया की गिरती विश्वसनीयता पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ एआई नहीं, बल्कि लोगों का घटता भरोसा है। अगर पत्रकारिता को बचाना है तो उसे अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा।
अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने श्रोताओं के धैर्य की सराहना करते हुए की। उन्होंने कहा कि इतने लंबे कार्यक्रम में लगातार बने रहना आसान नहीं होता। उन्होंने माहौल को हल्का बनाते हुए कहा कि बीच-बीच में इलायची और पानी की चर्चा भी होती रही, जिसे सुनकर वह मुस्कुराए बिना नहीं रह सकीं।
उन्होंने 1980 की फिल्म 'आप तो ऐसे ना थे' के मशहूर गीत "तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है..." का जिक्र करते हुए कहा कि आज की इस महफिल में उन्हें ऐसा लगा कि हर तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ही चर्चा है। हालांकि उन्होंने कहा कि वह एआई से पहले पत्रकारिता के उस दौर की बात करना चाहेंगी, जिसे कई लोग आज भी याद करते हैं।
प्रो. नंदा ने 1995 में गणेश प्रतिमाओं को दूध पिलाने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय अचानक टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ गई थी। इसके बाद हरियाणा के एक गांव में गड्ढे में गिरे 'प्रिंस' की घटना ने भी टीवी चैनलों को अभूतपूर्व टीआरपी दिलाई। उन्होंने कहा कि यहीं से यह समझ बनने लगी कि ऐसी घटनाओं से बड़ा मुनाफा कमाया जा सकता है और धीरे-धीरे पत्रकारिता का स्वरूप बदलने लगा।
उन्होंने 90 के दशक की पत्रकारिता को याद करते हुए कहा कि उस समय तकनीक नई-नई थी। एनडीटीवी के शुरुआती दिनों में जब न्यूज़रूम में पहला कंप्यूटर आया तो पत्रकार अपनी बारी तय करने के लिए उसके पास रूमाल रख देते थे। उसी दौर में लोगों ने पहली बार जीमेल अकाउंट बनाए और कंप्यूटर से जानकारी खोज पाना ही बड़ी उपलब्धि माना जाता था। उनके मुताबिक उस समय तकनीक ने पत्रकारों को सशक्त बनाया, लेकिन हर तकनीक अपने साथ अवसरों के साथ चुनौतियां भी लेकर आती है। इंसानी दिमाग जब उसका गलत इस्तेमाल करने लगता है तो वही तकनीक अलग रूप ले लेती है।
उन्होंने कहा कि 2000 के बाद पत्रकारिता में तकनीक तेजी से बदली। पेजर और पुराने मोबाइल फोन का दौर खत्म हुआ। उस समय एक फोन कॉल भी महंगी होती थी, इसलिए पत्रकार बेहद संक्षिप्त बातचीत करते थे। फोन उठाते ही पूछा जाता था—"क्या स्टोरी है?" और पांच डब्ल्यू तथा एक एच (5W1H) के आधार पर जरूरी जानकारी लेकर कॉल समाप्त कर दी जाती थी। उन्होंने कहा कि यह पत्रकारिता का बड़ा सबक था कि जब कोई चीज बहुत सस्ती या मुफ्त हो जाती है तो उसका इस्तेमाल कब दुरुपयोग में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता।
प्रो. नंदा ने कहा कि पत्रकारिता का मूल सिद्धांत हमेशा यही रहा है कि जो हुआ है, वही बताया जाए। राय देने के लिए अखबारों में अलग ओपिनियन पेज होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे खबरों में भी राय शामिल होने लगी और पत्रकारिता का संतुलन बिगड़ता चला गया।
उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा भी आया जब पत्रकारों और एंकरों के आसपास स्टार संस्कृति विकसित हो गई। उनके लिए अलग स्टाफ होता था, कार्यक्रम तय किए जाते थे, उनकी फीस और प्रचार की रणनीति बनाई जाती थी। लेकिन इसी दौरान पत्रकार जमीन से दूर होता चला गया। उन्होंने कहा कि जब पत्रकार जमीन छोड़कर "हवाई जहाज" में पहुंच गया और उसे नीचे उतरने में संकोच होने लगा, तभी समाज की नजर में पत्रकार की छवि बदलनी शुरू हो गई।
उन्होंने उस दौर का भी जिक्र किया जब कार पर लगा 'प्रेस' का स्टीकर सम्मान का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज कई पत्रकार खुद वह स्टीकर हटाते नजर आते हैं और कई बार उन्हें खुद को पत्रकार बताने से पहले भी सोचना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसका खामियाजा पूरे पेशे को भुगतना पड़ रहा है।
प्रो. नंदा ने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता सिर्फ टीवी एंकरिंग नहीं है। पत्रकारिता में कैमरा पर्सन, वीडियो एडिटर, ग्राफिक डिजाइनर, संपादक और न्यूज़रूम के तमाम लोग बराबर की भूमिका निभाते हैं। लेकिन कुछ लोगों की वजह से पूरे पेशे की छवि प्रभावित होती है।
उन्होंने कहा कि पत्रकार का असली काम जमीन से जुड़े रहना है। पत्रकार के कान और पैर जमीन पर होने चाहिए और उसे समय की सही समझ होनी चाहिए। यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।
लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ाने के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जब छात्रों से पूछा जाता है कि वे सबसे ज्यादा कौन-सा न्यूज चैनल देखते हैं, तो ज्यादातर छात्र कहते हैं कि वे न्यूज चैनल देखते ही नहीं। दूरदर्शन का नाम शायद ही कोई लेता है। वहीं जब उनसे पसंदीदा पत्रकार का नाम पूछा जाता है तो पहले जहां पांच-सात नाम सामने आते थे, अब छात्रों के पास कोई जवाब नहीं होता। लेकिन अगर पूछा जाए कि कौन-सा पत्रकार पसंद नहीं है, तो जवाबों की कमी नहीं रहती। उन्होंने इसे पत्रकारिता के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।
उन्होंने कहा कि आज भी बड़ी संख्या में छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी बड़े संस्थान का नाम उनके पूरे करियर में काम आएगा। लेकिन उन्होंने हाल ही में एक मीडिया संस्थान से लगभग 120 कर्मचारियों की छंटनी का जिक्र करते हुए कहा कि यह भ्रम भी अब टूट रहा है।
उन्होंने कहा कि किसी पत्रकार की नौकरी जाना कभी बड़ी खबर नहीं बनती। किसी रिपोर्टर को अचानक बुलाकर टर्मिनेशन लेटर दे देना भी खबर नहीं बनती, जबकि उसे यह दर्द चुपचाप सहना पड़ता है।
उन्होंने मीडिया की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक समय दूरदर्शन छोटी-सी तकनीकी गलती पर भी "रुकावट के लिए खेद है" लिखकर दर्शकों से माफी मांगता था, लेकिन आज मीडिया अपनी गलतियों पर माफी मांगने से बचता है। उसे लगता है कि लोग कुछ समय बाद सब भूल जाएंगे, लेकिन इतिहास कुछ नहीं भूलता।
प्रो. नंदा ने कहा कि आज के छात्र पिछले 10 वर्षों की मुश्किल से दो-तीन बड़ी खबरें ही याद रख पाते हैं। उन्हें 2026, 2025 या 2024 की कुछ घटनाएं याद रहती हैं, लेकिन उससे पहले का इतिहास लगभग गायब हो चुका है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ नई पीढ़ी की समस्या नहीं है, बल्कि हमारी भी याददाश्त तकनीक पर निर्भर होती जा रही है।
उन्होंने मीडिया में बढ़ते प्रायोजन (स्पॉन्सरशिप) पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज हेडलाइन से लेकर एंकर के लैपटॉप तक प्रायोजित हैं। बाथरूम क्लीनर जैसे उत्पाद भी समाचारों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। लेकिन इसके बावजूद कुछ चीजें अभी भी बिकी नहीं हैं और यही उम्मीद की सबसे बड़ी वजह है।
जेलों पर अपने लंबे शोध का जिक्र करते हुए प्रो. नंदा ने बताया कि वह अक्सर कैदियों से पूछती हैं कि उन्हें किस पर भरोसा है। ज्यादातर कैदी कहते हैं कि उन्हें सिर्फ खुद पर भरोसा है। जब उनसे पूछा जाता है कि किस पर भरोसा नहीं है, तो उनका जवाब अक्सर पत्रकार और न्यायपालिका होता है। उन्होंने कहा कि जेल के अंदर 24 घंटे न्यूज चैनल भले न चलते हों, लेकिन बाहर की खबरें वहां जरूर पहुंचती हैं और लोगों की सोच पर असर डालती हैं।
उन्होंने कहा कि हर पत्रकार सच जानता है। वह थका हुआ है, परेशान है और कई बार भीतर से टूटा हुआ भी है। बाहर से वह खुद को सफल दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन भीतर जानता है कि व्यवस्था में कई असमानताएं हैं। एक ही न्यूज़रूम में बराबर काम करने वालों की तनख्वाह में कई गुना अंतर है और यह भी पत्रकारिता की एक बड़ी सच्चाई है।
अपने संबोधन के अंत में प्रो. (डॉ.) वर्तिका नंदा ने कहा कि आज उपयोग और दुरुपयोग के बीच की दूरी कम हो गई है। भाषा की मर्यादा घटी है और मीडिया पर लोगों का विश्वास भी कमजोर हुआ है। इसके बावजूद उन्हें उम्मीद है कि आने वाला समय बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि यदि उम्मीद खत्म हो गई तो सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं, हम भी नहीं बच पाएंगे।
Zee News के मैनेजिंग एडिटर राहुल सिन्हा ने कहा कि आज मीडिया जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या नई तकनीक नहीं, बल्कि पत्रकारों की विश्वसनीयता और उनकी सुरक्षा का है।
by
Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में Zee News के मैनेजिंग एडिटर राहुल सिन्हा ने कहा कि आज मीडिया जगत के सामने सबसे बड़ा सवाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या नई तकनीक नहीं, बल्कि पत्रकारों की विश्वसनीयता और उनकी सुरक्षा का है। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर पत्रकारों के साथ जो हुआ, उसने मुख्यधारा की मीडिया के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि कार्यक्रम में आने से पहले उनके मन में यह विचार था कि वे मीडिया के कल, आज और कल पर बात करेंगे। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली बार भी इसी मंच पर उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और मीडिया के बदलते स्वरूप जैसे विषयों पर अपनी बात रखी थी। लेकिन इस बार उन्हें लगा कि अगर किसी एक मुद्दे पर सबसे पहले चर्चा होनी चाहिए, तो वह जंतर-मंतर पर हुआ वह विरोध प्रदर्शन है, जिसने खासतौर पर मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए बड़ा संकट पैदा कर दिया है।
उन्होंने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी) पर सवाल पिछले कई वर्षों से उठते रहे हैं, लेकिन जंतर-मंतर की घटना ने इस बहस को एक नए मोड़ पर ला दिया है। अपनी बात को समझाने के लिए राहुल सिन्हा ने दो पुराने अनुभव साझा किए।
उन्होंने बताया कि एक बार वह सूरत में बाढ़ की कवरेज के लिए पहुंचे थे। जैसे ही वह वहां उतरे, लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और कहा कि तीन दिन से लोग भूखे हैं, खाना नहीं मिल रहा और मीडिया अब पहुंच रही है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उस समय लोगों का गुस्सा पूरी तरह जायज था, क्योंकि उनकी मीडिया से उम्मीदें थीं। उन्हें भरोसा था कि मीडिया उनकी परेशानी देश तक पहुंचाएगी।
उन्होंने दूसरा उदाहरण केदारनाथ आपदा का दिया। उन्होंने कहा कि जब पत्रकार ऊपर की ओर जा रहे थे, तब नीचे लौट रहे लोग उनसे नाराज हो रहे थे। लोग कह रहे थे कि इतने लोग मारे गए और मीडिया अब पहुंच रही है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उस समय लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि वहां तक पहुंचना बेहद मुश्किल था और पत्रकारों को पैदल चढ़ाई करके जाना पड़ रहा था। इसके बावजूद लोगों का गुस्सा इसलिए था क्योंकि उन्हें मीडिया से उम्मीद थी कि वह उनकी आवाज बनेगी।
राहुल सिन्हा ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना इन दोनों घटनाओं से पूरी तरह अलग थी। वहां लोगों के मन में मीडिया से कोई अपेक्षा या उम्मीद नहीं थी, बल्कि सीधे-सीधे नफरत दिखाई दे रही थी। उन्होंने कहा कि वह इसे केवल गुस्सा नहीं कहेंगे, बल्कि यह मीडिया के प्रति नफरत थी।
उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोग रिपोर्टरों, एंकरों और एडिटरों को सिर्फ उनके हाथ में माइक देखकर गालियां दे रहे थे। उन्हें 'गोदी मीडिया' जैसे कई नामों से पुकारा जा रहा था। लेकिन जब उनसे पूछा जाए कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, तो उनके पास कोई ठोस तर्क नहीं था।
राहुल सिन्हा ने कहा कि पहले दिन वहां लगभग सभी बड़े न्यूज चैनलों के रिपोर्टर मौजूद थे। यह किसी एक चैनल का मामला नहीं था। Zee News, Aaj Tak, Times Now, Republic या किसी दूसरे चैनल के रिपोर्टर- लगभग हर चैनल के पत्रकारों के साथ वहां बदसलूकी हुई। उन्हें धक्का दिया गया, गालियां दी गईं और कई मामलों में मारपीट तक की गई।
उन्होंने कहा कि सबसे हैरानी की बात यह थी कि ये सभी पत्रकार वहां प्रदर्शनकारियों की आवाज देश तक पहुंचाने के लिए गए थे। किसी भी रिपोर्टर ने उनकी बात दबाने की कोशिश नहीं की थी। किसी ने उनके सामने से माइक हटाकर अपनी बात थोपने की कोशिश नहीं की। इसके बावजूद पत्रकारों को वहां से भगाया गया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया।
राहुल सिन्हा ने कहा कि यही सवाल सबसे ज्यादा गंभीर है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उस भीड़ का मामला नहीं है, बल्कि पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए भी गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से पत्रकारों के बीच आत्ममंथन और आत्म-आलोचना का दौर लगातार चल रहा है। मीडिया के भीतर ही लोग बार-बार कह रहे हैं कि टीवी पत्रकारिता खत्म हो गई है, टीवी में अब पत्रकारिता नहीं होती और वहां काम करने वाले लोगों के पास सोच या गंभीरता नहीं बची है। राहुल सिन्हा ने कहा कि इस सोच पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना पर जितनी चर्चा उस भीड़ को लेकर होनी चाहिए, उतनी ही मीडिया जगत को भी अपने भीतर झांकने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से पत्रकारों के बीच आत्ममंथन और आत्म-आलोचना का दौर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। अक्सर यह कहा जाता है कि टीवी पत्रकारिता की हालत खराब हो गई है, टीवी पर अब पत्रकारिता नहीं होती और वहां काम करने वाले पत्रकार गंभीर नहीं रह गए हैं।
उन्होंने कहा कि यह सवाल उठाने वाले अधिकतर वही लोग हैं, जो लंबे समय तक मेनस्ट्रीम मीडिया का हिस्सा रहे और अब उसके बाहर निकलने के बाद लगातार यह कह रहे हैं कि टेलीविजन पत्रकारिता खत्म हो चुकी है। राहुल सिन्हा ने कहा कि उन्हें यह सोच एकतरफा लगती है।
उन्होंने कहा कि उन्होंने वह दौर भी देखा है जब न्यूज चैनलों पर दिनभर अपराध की खबरें, फैशन टीवी की मॉडल्स, राखी सावंत, भूत-प्रेत, सांप, मदारी जैसे विषय खूब दिखाए जाते थे। उस समय भी यही पत्रकार इस इंडस्ट्री में काम कर रहे थे, लेकिन तब किसी ने यह नहीं कहा कि पत्रकारिता खत्म हो गई है। आज अचानक यह कहना कि टीवी पत्रकारिता में कुछ नहीं बचा, उचित नहीं है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि अगर देश में मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर टीवी न्यूज इंडस्ट्री को लगातार निशाना बनाया जाएगा, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ पत्रकारों को नहीं होगा, बल्कि उन करोड़ों लोगों को होगा, जिनकी आवाज न्यूज चैनल देश तक पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि इस खतरे को सभी समाचार चैनलों को मिलकर समझना होगा।
उन्होंने कहा कि अगर जंतर-मंतर जैसी घटनाओं के बाद रिपोर्टर मैदान में जाने से डरने लगेंगे और उन्हें यह महसूस होने लगेगा कि भीड़ के बीच जाने पर उनकी लिंचिंग हो सकती है, तो यह पत्रकारिता के लिए बेहद खतरनाक स्थिति होगी। ऐसे माहौल में वही लोग सफल होंगे जो चाहते हैं कि सिर्फ उनका नैरेटिव चले और वही बातें दिखाई जाएं, जिनसे वे सहमत हों।
राहुल सिन्हा ने कहा कि आज सबसे बड़ा संकट यह है कि बिना किसी ठोस वजह के रिपोर्टरों और न्यूज चैनलों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब लिंचिंग सिर्फ सड़क पर नहीं हो रही, बल्कि सोशल मीडिया पर भी शब्दों के जरिए पत्रकारों की लिंचिंग की जा रही है। वहीं जमीन पर रिपोर्टरों के साथ धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और मारपीट जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं।
उन्होंने कहा कि अगर मीडिया के कल, आज और आने वाले कल की बात करें तो सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कैसे बचाया जाए। उन्होंने कहा कि इसके लिए मीडिया को हर बार खुद को ही दोषी ठहराना बंद करना होगा। बार-बार यह कहना कि हम गलत दिखाते हैं, हम पत्रकारिता नहीं करते, हम नैतिकता का पालन नहीं करते- यह सोच भी सही नहीं है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि लोग वही देखते हैं, जो उन्हें महत्वपूर्ण लगता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टीवी पत्रकारिता गंभीर मुद्दे नहीं उठाती। उन्होंने राणा यशवंत की बात का जिक्र करते हुए कहा कि पेपर लीक, नकल, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी या किसी बड़े मंत्री के बेटे से जुड़ा विवाद- ऐसा कौन-सा मुद्दा है जिसे टीवी चैनलों ने नहीं उठाया?
उन्होंने कहा कि वह किसी एक चैनल की नहीं, बल्कि पूरी टीवी इंडस्ट्री की बात कर रहे हैं। उन्होंने भरत तिवारी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब पुलिस गोलीकांड जैसी घटनाएं हुईं, तब न्यूज चैनलों ने उन्हें प्रमुखता से उठाया और उसके बाद कार्रवाई भी हुई। लेकिन इन सकारात्मक उदाहरणों का जिक्र शायद ही कभी किया जाता है।
राहुल सिन्हा ने कहा कि अक्सर सिर्फ यह नैरेटिव बनाया जाता है कि टीवी चैनल बिके हुए हैं और उनके अपने हित जुड़े हुए हैं। जबकि यह आरोप लगाने वाले कई लोग खुद सिर्फ अपने सब्सक्राइबर बढ़ाने और अपनी पहुंच बढ़ाने में लगे रहते हैं। अगर उनके सब्सक्राइबर बढ़ना बंद हो जाएं, तो उनका पूरा मॉडल ही प्रभावित हो जाएगा। इसलिए नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले हर किसी को खुद का भी आकलन करना चाहिए।
S4M 40 अंडर 40 कार्यक्रम में ITV Network के एग्जिक्यूटिव एडिटर मनोज मनु ने पत्रकारिता के बदलते दौर, मीडिया इंडस्ट्री में रोजगार के संकट और नई पीढ़ी की बदलती कार्यशैली पर विस्तार से अपनी बात रखी।
by
Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में ITV Network के एग्जिक्यूटिव एडिटर मनोज मनु ने पत्रकारिता के बदलते दौर, मीडिया इंडस्ट्री में रोजगार के संकट और नई पीढ़ी की बदलती कार्यशैली पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के भविष्य पर चर्चा करते समय सिर्फ मीडिया संस्थानों की चुनौतियों की बात करना काफी नहीं है, बल्कि उन हजारों युवाओं की चिंता भी करनी होगी, जो हर साल पत्रकार बनने का सपना लेकर इस क्षेत्र में आते हैं।
अपने संबोधन की शुरुआत में मनोज मनु ने कहा कि उनसे पहले सभी वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे हैं और हर किसी की अपनी सोच और अनुभव है। उन्होंने कहा कि वर्तिका जी ने बहुत कम समय में कई महत्वपूर्ण बातें रखीं और "गागर में सागर भरने" की कोशिश की। उनके मुताबिक, इस विषय पर अलग-अलग लोगों की राय अलग हो सकती है और सभी अपनी-अपनी जगह सही भी हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस होता है कि आज मीडिया जगत में एक तरह की दहशत का माहौल दिखाई देता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पीढ़ी और उनसे वरिष्ठ कुछ पत्रकारों के भीतर नई पीढ़ी को लेकर कहीं न कहीं ईर्ष्या का भाव भी नजर आता है।
मनोज मनु ने कहा कि अगर इस चर्चा में कुछ Gen Z के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाता, तो वे भी अपने विचार रखते और तस्वीर का दूसरा पक्ष सामने आता। उन्होंने कहा कि अक्सर हम नई पीढ़ी के बारे में अपनी राय बना लेते हैं, लेकिन उनकी बात सुनने की कोशिश कम करते हैं।
उन्होंने कहा कि मीडिया देश की एक बहुत बड़ी इंडस्ट्री है। देश के दूर-दराज़ गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से बड़ी संख्या में युवा पत्रकार बनने का सपना लेकर दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों में आते हैं। वे पत्रकारिता की पढ़ाई करते हैं, मेहनत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उन्हें मीडिया संस्थानों में अच्छी नौकरी मिलेगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कभी किसी ने यह गंभीरता से सोचा कि सिर्फ दिल्ली-एनसीआर में ही कितने पत्रकारिता संस्थान हर साल नए छात्र तैयार कर रहे हैं और उनके मुकाबले नौकरियां कितनी उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि हर साल हजारों छात्र पत्रकारिता की डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उनके लिए सैकड़ों नौकरियां भी उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने चर्चा के दौरान कही गई उस बात का भी जिक्र किया कि मीडिया संस्थानों में लगातार लोगों की छंटनी हो रही है और कई कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया जाता है, लेकिन इस पर न तो कोई गंभीर बहस होती है और न ही ज्यादा चर्चा होती है।
मनोज मनु ने कहा कि जो युवा बड़े सपने लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई करने आते हैं, उन्हें लगता है कि कोर्स पूरा होने के बाद उन्हें किसी अच्छे मीडिया संस्थान में नौकरी मिल जाएगी। लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक नौकरी की तलाश में भटकते हैं, तब उन्हें एहसास होता है कि नौकरियां हैं ही नहीं। यह स्थिति आज पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
हालांकि उन्होंने कहा कि आज की Gen Z पहले की पीढ़ियों से अलग है। उनके भीतर जबरदस्त ऊर्जा है, कुछ नया करने का उत्साह है और अपना रास्ता खुद बनाने का साहस है। उन्होंने कहा कि आज का युवा किसी मीडिया संस्थान के बाहर नौकरी का इंतजार करते हुए खड़ा नहीं रहता। डिजिटल युग ने उसे एक नया रास्ता दिखा दिया है। वह कैमरा उठाता है और सीधे YouTube या सोशल मीडिया पर अपना मंच बना लेता है। यही वजह है कि आज बड़ी संख्या में युवा पारंपरिक मीडिया के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपना करियर बना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है। कई बार इन युवाओं में अनुशासन की कमी दिखाई देती है। इसका कारण यह है कि या तो पत्रकारिता संस्थानों ने उन्हें पेशे की आचार संहिता और मर्यादाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी, या फिर वे उन बातों को ठीक तरह से समझ नहीं पाए। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में सिर्फ कैमरा उठाकर रिपोर्टिंग करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके साथ पेशेवर जिम्मेदारियां और नैतिक आचरण भी उतना ही जरूरी है। इसलिए नई पीढ़ी को पत्रकारिता की आचार संहिता से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
इसके बाद मनोज मनु ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री के भीतर आज हर कोई अपने हिस्से की लड़ाई लड़ रहा है। उनके मुताबिक, मौजूदा दौर की सबसे बड़ी लड़ाई हिस्सेदारी की है। इसी संदर्भ से उन्होंने सरकारों के दबाव, मीडिया की बदलती भूमिका और पुराने अनुभवों का जिक्र करते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई।
इस दौरान मनोज मनु ने कहा कि आज मीडिया इंडस्ट्री में सबसे बड़ी लड़ाई हिस्सेदारी की है। हर व्यक्ति और हर समूह अपना-अपना हिस्सा चाहता है। उन्होंने कहा कि सरकारों का दबाव मीडिया पर हमेशा से रहा है। यह कोई नई बात नहीं है और इसे कोई नकार भी नहीं सकता।
मनोज मनु ने कहा कि अभी कुछ दिन पहले उन्होंने एक सांसद के साथ पॉडकास्ट किया था। बातचीत के दौरान उन्होंने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते (न्यूक्लियर डील) के समय हुए उस चर्चित मामले का जिक्र किया, जब संसद में नोटों से भरा बैग लाया गया था और आरोप लगा था कि सांसदों को खरीदने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि उन्होंने उस सांसद से जानना चाहा कि उस पूरे मामले का आखिर क्या हुआ।
उन्होंने बताया कि सांसद ने कहा कि उस मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) भी बनाई गई थी, लेकिन आज तक यह साफ नहीं हो पाया कि उस जांच का नतीजा क्या निकला। संसद के पटल पर जो एक करोड़ रुपये रखे गए थे, उनका क्या हुआ और वे किसके पास गए, इसकी जानकारी आज तक सामने नहीं आई। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय एक बड़े मीडिया संस्थान ने स्टिंग ऑपरेशन किया था, लेकिन वह स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित ही नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि उस पूरे घटनाक्रम में मीडिया के साथ भी धोखा हुआ।
मनोज मनु ने कहा कि उस समय 'गोदी मीडिया' जैसा शब्द प्रचलन में नहीं था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सत्ता और मीडिया के रिश्तों को लेकर सवाल नहीं उठते थे। उनके मुताबिक, परिस्थितियां तब भी थीं और आज भी हैं, केवल शब्द बदल गए हैं।
उन्होंने कहा कि आज जो लोग पहले व्यवस्था का हिस्सा थे और अब सिस्टम से बाहर हो चुके हैं, उन्होंने अपनी अलग दुनिया बना ली है। अब वही लोग मौजूदा व्यवस्था की लगातार आलोचना कर रहे हैं। उनके मुताबिक, इसके पीछे कहीं न कहीं ईर्ष्या का भाव भी दिखाई देता है। उन्होंने हल्के अंदाज में कहा कि आज के समय में तो लोग मेट्रो, ट्रेन या बस में भी किसी दूसरे को सीट देने से बचते हैं। जब समाज के हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या मौजूद है, तो पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं रह सकती।
मनोज मनु ने कहा कि अगर "कल, आज और कल" की बात करें तो पहले का समय बिल्कुल अलग था। पहले जब किसी पत्रकार के साथ देश में कहीं भी कोई घटना होती थी, तो सभी पत्रकार संगठन एकजुट होकर उसके समर्थन में खड़े हो जाते थे। चाहे दिल्ली हो या कोई छोटा राज्य, पत्रकार एक साथ बैठते थे, चर्चा करते थे, ज्ञापन देते थे और जरूरत पड़ने पर प्रदर्शन भी करते थे। लेकिन आज ऐसा नहीं होता।
उन्होंने एक कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां किसी ने उनसे कहा कि एक प्रेस क्लब तो है, लेकिन वह एक विचारधारा विशेष का केंद्र बन चुका है, इसलिए दूसरा प्रेस क्लब बनाया जाना चाहिए। मनोज मनु ने कहा कि यह स्थिति बताती है कि पत्रकार भी अब अलग-अलग खेमों में बंट चुके हैं।
उन्होंने कहा कि पहले पत्रकार एक थे, लेकिन आज बंट गए हैं। अगर यही स्थिति जारी रही तो आगे और विभाजन होगा। उन्होंने कहा कि आजकल "बंटेंगे तो कटेंगे" जैसी बातें बहुत कही जा रही हैं, लेकिन उनका मानना है कि अगर समाज और मीडिया दोनों बंटेंगे, तो अंत में कोई भी सुरक्षित नहीं बचेगा। इसलिए जरूरत लोगों को जोड़ने की है, बांटने की नहीं।
मनोज मनु ने हाल ही में एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ हुई धक्का-मुक्की की घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस घटना के बाद एक वरिष्ठ पत्रकार ने सोशल मीडिया पर लिखा कि "बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहां से होय।" उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह हो गई है कि लोग एक-दूसरे के कपड़े फाड़ने तक पर उतर आए हैं। मीडिया बंट चुका है, संस्थान बंट चुके हैं और पत्रकारों के विचार भी अलग-अलग गुटों में बंट गए हैं। ऐसे में अगर विभाजन पहले से मौजूद है तो इस पर गंभीर मंथन और भी जरूरी हो जाता है।
उन्होंने समाचार4मीडिया की सराहना करते हुए कहा कि यह एक अच्छा और गुटनिरपेक्ष मंच है, जहां अलग-अलग विचारों वाले लोग एक साथ बैठकर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज सभी पत्रकार किसी न किसी गुट में हैं। सभी की अपनी-अपनी राय है। किसी पर दबाव हो सकता है, किसी पर प्रभाव हो सकता है। किसी ने उसका नाम 'गोदी मीडिया' रख दिया, लेकिन सच्चाई यह है कि पत्रकारिता के भीतर विभाजन मौजूद है।
मनोज मनु ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम लगातार होने चाहिए, जिनमें सभी विचारधाराओं और सभी गुटों के पत्रकार बिना किसी पूर्वाग्रह के एक मंच पर बैठें। उन्होंने कहा कि खुले मन से मंथन और चर्चा होगी, तभी पत्रकारिता के सामने खड़ी इन चुनौतियों का कोई समाधान निकल पाएगा। उनके मुताबिक, पहले इस तरह का माहौल नहीं था। पहले न तो इतनी वैचारिक दूरियां थीं और न ही पत्रकारिता के भीतर इतना विभाजन दिखाई देता था।
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में NDTV इंडिया के मैनेजिंग एडिटर रोहित विश्वकर्मा ने मीडिया के वर्तमान और भविष्य पर विस्तार से अपनी बात रखी।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में NDTV इंडिया के मैनेजिंग एडिटर रोहित विश्वकर्मा ने मीडिया के वर्तमान और भविष्य पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अच्छी खबरें बनाना नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि आखिर दर्शक कौन है, वह किस प्लेटफॉर्म पर है और आने वाले वर्षों में उसकी पसंद कैसे बदलने वाली है। उन्होंने कहा कि मीडिया, विज्ञापन और न्यूज रूम से जुड़ी लगभग हर चुनौती की जड़ दर्शकों के बदलते व्यवहार में छिपी हुई है।
रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि अक्सर मीडिया के बारे में तरह-तरह की बातें होती हैं। कोई कहता है कि मीडिया बदल गया है, कोई कहता है कि पत्रकारिता पहले जैसी नहीं रही। लेकिन दिन के आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या लोग आपको देख रहे हैं या नहीं? क्या लोग आपकी खबरें सुन रहे हैं या नहीं? अगर दर्शक ही नहीं हैं, तो फिर अच्छी पत्रकारिता का असर भी सीमित रह जाएगा। उन्होंने कहा कि यही आज टीवी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी दुविधा है।
उन्होंने बताया कि इसी सवाल का जवाब खोजने के लिए उन्होंने अपनी डेटा टीम से कहा कि वह यह पता लगाए कि आखिर न्यूज चैनल सबसे ज्यादा कौन देखता है। जो आंकड़े सामने आए, वे काफी चौंकाने वाले थे। उनके मुताबिक, न्यूज चैनलों का सबसे बड़ा दर्शक वर्ग 61 वर्ष से अधिक उम्र के लोग हैं, जिनकी हिस्सेदारी करीब 21 प्रतिशत है। इतना ही नहीं, यही वर्ग सबसे अधिक समय तक न्यूज चैनल देखता भी है। उन्होंने कहा कि घरों में अक्सर दादा-दादी या बुजुर्ग टीवी चलाकर छोड़ देते हैं, जिससे न्यूज चैनल लगातार चलता रहता है।
उन्होंने आगे बताया कि 51 से 60 वर्ष की उम्र का वर्ग लगभग 18 प्रतिशत है। यानी दोनों वर्गों को मिलाकर करीब 40 प्रतिशत दर्शक ऐसे हैं, जिनकी उम्र 51 वर्ष से अधिक है। उन्होंने कहा कि यह वही वर्ग है जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा देख लिया है। उसकी खरीदारी की क्षमता और समाज में निर्णय लेने की भूमिका कितनी प्रभावी है, यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन टीवी न्यूज का सबसे बड़ा दर्शक यही वर्ग है।
रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर जो युवा वर्ग न्यूज चैनलों की सबसे ज्यादा आलोचना करता था, वास्तविकता यह है कि वही वर्ग न्यूज चैनल सबसे कम देखता है। उन्होंने कहा कि 30 वर्ष तक की उम्र के दर्शकों की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत है और उनका देखने का समय भी बहुत कम है। यह वर्ग अपनी राय टीवी देखकर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स के वीडियो देखकर बनाता है। वहीं उसका पूरा न्यूज कंजम्पशन होता है। उन्होंने कहा कि इससे साफ पता चलता है कि आज न्यूज चैनलों का वास्तविक दर्शक कौन है और कौन उनसे दूर जा चुका है।
इसके बाद उन्होंने भविष्य की तस्वीर सामने रखी। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी टीम से आगामी चुनावों का डेटा भी मंगवाया। उनके मुताबिक, 2029 के लोकसभा चुनावों में Gen Z वोटरों की हिस्सेदारी करीब 34 प्रतिशत होगी, जबकि मिलेनियल्स करीब 32 प्रतिशत होंगे। यानी आने वाले समय में देश का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग वही होगा, जो आज टीवी न्यूज सबसे कम देख रहा है। उन्होंने कहा कि आज 51 से 80 वर्ष की उम्र के लोग टीवी न्यूज के सबसे बड़े दर्शक हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी संख्या स्वाभाविक रूप से घटती जाएगी, जबकि युवा वर्ग लगातार बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि यही टीवी न्यूज इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ा संकट है। मौजूदा दर्शक वर्ग धीरे-धीरे छोटा होता जाएगा, जबकि नया युवा दर्शक टीवी से दूर रहेगा। अगर मीडिया संस्थान अपने नए दर्शकों को पहचान ही नहीं पाएंगे तो उनके कंटेंट और उनके बाजार, दोनों पर सीधा असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यही आज सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
रेटिंग सिस्टम पर बात करते हुए रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि वह रेटिंग के विवाद में नहीं जाना चाहते, लेकिन इतना जरूर है कि रेटिंग एजेंसियां भी अपना गणित बदल रही हैं। उन्होंने कहा कि BARC भी अब डिजिटल व्यूअरशिप को शामिल करने की दिशा में काम कर रहा है। आने वाले समय में इसके पैरामीटर कैसे तय होंगे, यह देखना होगा।
उन्होंने एक विदेशी अखबार का उदाहरण देते हुए कहा कि जब डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ने लगे और अखबार का कारोबार प्रभावित होने लगा, तब उस संस्थान ने काफी रिसर्च की। आखिरकार उसे यह समझ आया कि "हम अखबार के बिजनेस में नहीं हैं, हम न्यूज के बिजनेस में हैं।" रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि यही सोच टीवी न्यूज चैनलों को भी अपनानी होगी। उन्होंने कहा कि हम टेलीविजन के बिजनेस में नहीं हैं, हम न्यूज के बिजनेस में हैं। स्क्रीन बदल रही है, दर्शकों का कंटेंट देखने का तरीका बदल रहा है और मीडिया को भी उसी हिसाब से खुद को बदलना होगा।
उन्होंने कहा कि आज लगभग हर घर में डिजिटल कंजम्पशन बढ़ चुका है। लोग मोबाइल और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ज्यादा समय बिता रहे हैं। ऐसे में केवल टीवी रेटिंग देखकर मीडिया की स्थिति नहीं समझी जा सकती। दर्शक बदल चुका है, रेटिंग का पैटर्न बदल चुका है और अब न्यूज रूम को भी बदलना होगा।
विज्ञापन बाजार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार आज करीब 65 से 67 प्रतिशत विज्ञापन खर्च डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हो रहा है, जबकि टीवी को लगभग 18 प्रतिशत, प्रिंट को करीब 12 प्रतिशत और बाकी हिस्सा रेडियो तथा अन्य माध्यमों को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि अगर टीवी न्यूज को अपना विज्ञापन बाजार बढ़ाना है तो उसे उस युवा दर्शक तक पहुंचना होगा, जो इस समय उससे दूर है।
रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि पिछले करीब दस वर्षों से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स लगातार मुख्यधारा के मीडिया को निशाना बनाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी पत्रकार, चैनल या संस्था की आलोचना करना हर व्यक्ति का अधिकार है और लोकतंत्र इसकी पूरी अनुमति देता है। लेकिन आलोचना और हिंसा में बहुत बड़ा फर्क है। उन्होंने कहा कि किसी को गालियां देना, विरोध करना या सवाल पूछना अलग बात है, लेकिन किसी पत्रकार के कपड़े फाड़ना, थप्पड़ मारना या धक्का देना किसी भी हालत में सही नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र किसी को ऐसा अधिकार नहीं देता।
NDTV इंडिया की संपादकीय नीति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि उनकी संस्था का स्पष्ट सिद्धांत है कि उनका काम सरकार का प्रवक्ता बनना नहीं है और न ही विपक्ष का प्रवक्ता या आलोचक बनना है। उनका काम सिर्फ इतना है कि जैसी खबर है, वैसी ही दर्शकों को दिखा दी जाए। उन्होंने कहा कि अपनी निजी राय या विचार खबरों पर थोपना पत्रकारिता का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि हर मीडिया संस्थान अपनी संपादकीय रणनीति खुद तय करता है और वह इस पर किसी को सलाह नहीं देना चाहते।
उन्होंने कहा कि किसी भी मीडिया संस्थान की संपादकीय नीति चाहे जैसी हो, उसके रिपोर्टरों और पत्रकारों को निशाना बनाना बिल्कुल गलत है। उन्होंने कहा कि हाल की कुछ घटनाओं में जिन लोगों ने पत्रकारों पर हमला किया, संभव है कि उन्होंने कभी न्यूज चैनल देखा भी न हो। उनका पूरा मीडिया उपभोग सोशल मीडिया के जरिए होता है। यही आज मुख्यधारा के मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। स्क्रीन बदल चुकी है, इसलिए दर्शकों को समझने का तरीका भी बदलना होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के दौर में मीडिया की प्रासंगिकता पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि आज हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है, हर कोई वीडियो बना सकता है और मशीनें भी खबरें लिख रही हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बड़े मीडिया संस्थानों की जरूरत खत्म हो गई है। उन्होंने कहा कि कोई भी इन्फ्लुएंसर या सोशल मीडिया टिप्पणीकार वह काम नहीं कर सकता जो एक संगठित न्यूज संगठन कर सकता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर देश के 100 गांवों में बाढ़ आ जाए या किसी बड़े हादसे की कवरेज करनी हो तो कोई अकेला इन्फ्लुएंसर वहां रिपोर्टर नहीं भेज सकता। बड़े मीडिया संस्थानों के पास रिपोर्टरों का नेटवर्क, संसाधन और व्यापक कवरेज की क्षमता होती है। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि टिप्पणी करना अलग बात है और घटनास्थल पर जाकर व्यापक कवरेज करना बिल्कुल अलग। यही वजह है कि भविष्य में भी बड़े न्यूज संगठन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगे।
अपने संबोधन के अंत में रोहित विश्वकर्मा ने कहा कि लोकतंत्र में हर मीडिया संस्थान को अपनी संपादकीय स्वतंत्रता है। जब तक कोई अपराध नहीं करता, तब तक अलग-अलग विचारों और संपादकीय दृष्टिकोण के लिए जगह है। यदि कोई कानून तोड़ता है तो उसके लिए कानूनी व्यवस्था मौजूद है। उन्होंने कहा कि मीडिया निष्पक्ष रहकर आज भी अच्छा काम कर सकता है, पहले भी करता था और आगे भी करता रहेगा। अंत में उन्होंने कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ और युवा पत्रकारों का धन्यवाद करते हुए कहा कि पत्रकारिता की यह यात्रा आने वाले समय में भी जारी रहेगी।
GTC नेटवर्क के फाउंडर, मैनेजिंग डायरेक्टर व प्रेजिडेंट रवींद्र नारायण के जन्मदिन पर उनके प्रेरणादायक और ऐतिहासिक उपलब्धियों से भरे सफर को याद करते हैं।
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Samachar4media Bureau
GTC नेटवर्क के फाउंडर, मैनेजिंग डायरेक्टर व प्रेजिडेंट रवींद्र नारायण के जन्मदिन के अवसर पर आइए एक ऐसे करियर पर नजर डालते हैं, जो कई ऐतिहासिक उपलब्धियों और क्षेत्रीय कहानियों की ताकत पर अटूट विश्वास से भरा रहा है।
उन्होंने इस विश्वास के साथ एक मीडिया साम्राज्य खड़ा किया कि पंजाबी कहानियां सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें पूरी दुनिया तक पहुंचना चाहिए। फिर उन्होंने इस सोच को एक और नए मुकाम तक पहुंचाया। आज उनके जन्मदिन पर मीडिया जगत रवींद्र नारायण को सम्मान के साथ याद कर रहा है। गैलेक्टिक टेलीविजन एंड कम्युनिकेशंस (GTC नेटवर्क) के संस्थापक, प्रबंध निदेशक और अध्यक्ष रवींद्र नारायण का नाम भारत में क्षेत्रीय प्रसारण (रीजनल ब्रॉडकास्टिंग) के विकास का पर्याय बन चुका है।
रवींद्र नारायण को व्यापक रूप से "फादर ऑफ पंजाबी टेलीविजन" के रूप में जाना जाता है। प्रसारण जगत में उनका सफर करीब दो दशकों का रहा है, जिसमें उन्होंने देश के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय मीडिया इकोसिस्टम में से एक का निर्माण किया। वर्ष 2007 से उन्होंने PTC नेटवर्क के मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रेसिडेंट के रूप में इसकी कमान संभाली और इसे दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा नेटवर्क बनाया, जो पंजाबी भाषा में फिल्मों और संगीत से अलग मौलिक (ओरिजिनल) कंटेंट का सबसे बड़ा निर्माता है।
उनके नेतृत्व में नेटवर्क का विस्तार सात टेलीविजन चैनलों तक हुआ। इसके साथ ही दर्जनों फेसबुक पेजों पर मजबूत डिजिटल मौजूदगी, फिल्म निर्माण इकाई (फिल्म प्रोडक्शन आर्म) और एक ऑडियो लेबल भी स्थापित किया गया। नेटवर्क का संचालन भारत के अलावा कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) तक फैल गया।
रवींद्र नारायण का करियर कई ऐतिहासिक उपलब्धियों से भी भरा रहा है। उनके नेतृत्व में दुनिया का पहला 360-डिग्री वर्चुअल रियलिटी (VR) लाइव टेलीकास्ट एक स्थायी स्थान से स्वर्ण मंदिर (गोल्डन टेंपल) से किया गया। इसके अलावा उन्होंने फेसबुक पर दुनिया का पहला 24x7 स्ट्रीमिंग टीवी चैनल भी लॉन्च किया। उनकी कहानी कहने की क्षमता सिर्फ टेलीविजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई और एक निर्माता के रूप में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (नेशनल फिल्म अवॉर्ड) भी हासिल किया।
पिछले वर्ष अगस्त में PTC नेटवर्क से अलग होने के बाद रवींद्र नारायण ने अपना नया उद्यम GTC नेटवर्क शुरू किया। अमृतसर में स्थापित यह नेटवर्क वैश्विक मीडिया के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित सोच के साथ तैयार किया गया है। GTC के तहत उन्होंने "दुनिया का सबसे बड़ा ग्लोबल इंडियन क्रिएटर्स हब" बनाने का लक्ष्य रखा है। यह नया नेटवर्क पारंपरिक टेलीविजन, OTT, कनेक्टेड टीवी (CTV) और FAST चैनलों तक फैला होगा, लेकिन इसकी जड़ें पंजाबी और भारतीय कहानियों से ही जुड़ी रहेंगी। उनके नेतृत्व में हाल ही में GTC पंजाबी ने ब्रिटेन के बाजार में प्रवेश किया है। इसके अलावा हाल ही में 'जसविंदर भल्ला मेमोरियल GTC कॉमेडी अवॉर्ड्स' की भी घोषणा की गई, जो दिवंगत कॉमेडी कलाकार जसविंदर भल्ला की विरासत को सम्मानित करेगा।
रवींद्र नारायण को उनके योगदान के लिए वैश्विक स्तर पर भी सम्मान मिला है। वर्ष 2022 में लंदन में आयोजित ग्लोबल बिजनेस समिट में उन्हें 'ग्लोबल इंस्पिरेशनल लीडर्स' में शामिल किया गया था। इसके अलावा वे TEDx और WAVES समिट जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर भी अपने विचार रख चुके हैं। उन्हें मानद पीएचडी (Honorary PhD) से भी सम्मानित किया जा चुका है। आज भी वे भारत में क्षेत्रीय प्रसारण और डिजिटल रेडियो नीति के भविष्य को लेकर मुखर आवाज बने हुए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने कहा कि आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि हर कंटेंट क्रिएटर खुद को पत्रकार और संपादक मानने लगेगा, तो मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।
उन्होंने हाल के आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि पूरे आंदोलन के दौरान मुख्यधारा के मीडिया को लगातार निशाना बनाया गया और उसकी आलोचना की गई। लेकिन जैसे ही आंदोलन सफल हुआ, वही लोग मुख्यधारा के न्यूज चैनलों पर इंटरव्यू देने पहुंच गए। सुधीर चौधरी ने कहा कि उन्होंने अपने शो में भी यह सवाल उठाया था कि जिन चैनलों के पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई, उन्हीं चैनलों पर आंदोलन से जुड़े लोग बैठकर अपनी बात रखते दिखाई दिए। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह टीआरपी और व्युअरशिप की होड़ है।
सुधीर चौधरी ने कहा कि मीडिया संस्थानों को यह तय करना होगा कि वे अपने सिद्धांतों के लिए कितना त्याग करने को तैयार हैं। अगर किसी मुद्दे पर मजबूत रुख अपनाना है, तो उसके लिए कुछ कीमत भी चुकानी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि यदि मीडिया संस्थान न व्यूअरशिप का नुकसान उठाना चाहते हैं, न आर्थिक नुकसान और न ही किसी संघर्ष का सामना करना चाहते हैं, तो फिर उनके बचाव के लिए कोई बाहरी व्यक्ति आगे नहीं आएगा। उनके अनुसार इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी समस्या यही है कि अधिकांश लोग कठिन रास्ता चुनने से बचते हैं और अपने नुकसान की कीमत पर कोई सिद्धांत आधारित फैसला नहीं लेना चाहते।
उन्होंने मीडिया संस्थानों से आत्ममंथन करने की अपील करते हुए कहा कि हर न्यूज रूम में यह चर्चा होनी चाहिए कि क्या वे किसी मुद्दे पर सामूहिक रूप से स्टैंड लेने के लिए तैयार हैं। उन्होंने अपने अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि जब वह जी न्यूज में थे, तब एक समय चैनल ने आम आदमी पार्टी के खिलाफ यह फैसला लिया था कि उसके नेताओं को मंच नहीं दिया जाएगा। उस समय आम आदमी पार्टी अपने सबसे मजबूत दौर में थी और लगातार चुनाव जीत रही थी। लेकिन इस फैसले में दूसरे मीडिया संस्थान साथ नहीं आए, क्योंकि इससे व्युअरशिप और विज्ञापन राजस्व प्रभावित होने का खतरा था।
इसके बाद सुधीर चौधरी ने मीडिया के बदलते स्वरूप पर बात करते हुए कहा कि आज मुख्यधारा के मीडिया का एजेंडा काफी हद तक सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं। पहले संपादक यह तय करते थे कि कौन-सी खबर महत्वपूर्ण है, लेकिन अब न्यूज मीटिंग में सबसे पहले यह देखा जाता है कि सोशल मीडिया पर क्या ट्रेंड कर रहा है। उन्होंने कहा कि जिस विषय पर सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा होती है, उसी पर खबरें और टीवी कार्यक्रम बनाए जाते हैं। यानी अब मुख्यधारा का मीडिया सोशल मीडिया को दिशा नहीं दे रहा, बल्कि सोशल मीडिया मुख्यधारा के मीडिया को चला रहा है।
उन्होंने कहा कि आज टीवी चैनलों के प्राइम टाइम कार्यक्रमों में भी बड़ी संख्या में वही वीडियो और विषय दिखाई देते हैं, जो पहले सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके होते हैं। इस कारण हैशटैग संपादकीय निर्णयों पर हावी हो गया है। पहले खबर का चयन संपादकीय समझ के आधार पर होता था, लेकिन अब ट्रेंड और वायरल कंटेंट ही खबरों का केंद्र बनते जा रहे हैं। यही वजह है कि टीवी और सोशल मीडिया दोनों पर एक जैसी सामग्री और एक जैसा प्रस्तुतीकरण दिखाई देता है।
हाल के आंदोलन का उल्लेख करते हुए सुधीर चौधरी ने कहा कि यदि कोई आंदोलन कैमरे और पत्रकारों से डरने लगे, तो इसका मतलब है कि वह सवालों से भी डरने लगा है। उन्होंने कहा कि उनके जीवन में यह सबसे डरपोक आंदोलन रहा, क्योंकि उसमें रिपोर्टरों और कैमरों का सामना करने से बचने की कोशिश की गई। इसके बावजूद सोशल मीडिया ने उस आंदोलन का इतना महिमामंडन किया कि मुख्यधारा का मीडिया भी उसी धारा में बह गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मुख्यधारा का मीडिया भी सोशल मीडिया से मिलने वाली व्युअरशिप और ट्रैफिक का हिस्सा चाहता था।
उन्होंने कहा कि आज मुख्यधारा के मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि सोशल मीडिया का कंटेंट हटा दिया जाए, तो उसके पास अपना मौलिक कंटेंट कितना बचता है। उन्होंने अपने शुरुआती पत्रकारिता के दिनों को याद करते हुए कहा कि जब सोशल मीडिया और इंटरनेट नहीं थे, तब संपादक और रिपोर्टर खुद सोचते थे, नए स्टोरी आइडिया खोजते थे और उन्हें न्यूज मीटिंग में लेकर आते थे। लेकिन अब सोशल मीडिया के प्रभाव ने मौलिक सोच को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया है।
उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया के कंटेंट में बहुत कम अंतर रह गया है। दोनों का लहजा, विषय और प्रस्तुति लगभग एक जैसी होती जा रही है। यह बदलाव पत्रकारिता की मौलिकता के लिए गंभीर चुनौती है और मीडिया को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
Zee Entertainment Enterprises (ZEEL) ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के अंतिम आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कंपनी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रही है।
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Samachar4media Bureau
Zee Entertainment Enterprises (ZEEL) ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के अंतिम आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कंपनी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रही है। साथ ही कंपनी का कहना है कि SEBI के इस आदेश का उसकी ₹3,144 करोड़ की फंड जुटाने की योजना पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा।
कंपनी के प्रवक्ता ने जारी बयान में कहा कि ZEEL को SEBI का अंतिम आदेश प्राप्त हो गया है और कंपनी इस मामले में कानूनी सलाह ले रही है। कंपनी का मानना है कि नियामक का यह आदेश प्रस्तावित फंड-रेजिंग प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करता।
ZEEL ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे स्टॉक एक्सचेंजों और 31 जुलाई 2026 को हुई असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों से फंड जुटाने की मंजूरी मिल चुकी है। ऐसे में कंपनी अब सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करते हुए इस फंड-रेजिंग योजना को सफलतापूर्वक पूरा करेगी। कंपनी का कहना है कि इस पूंजी जुटाने का उद्देश्य उसकी वित्तीय स्थिति को और मजबूत करना तथा सभी हितधारकों के लिए बेहतर मूल्य सृजित करना है।
कंपनी ने यह भी कहा कि उसके और उसके प्रमोटरों पर लगाए गए आरोपों के संबंध में वह कानून के मुताबिक सभी आवश्यक कदम उठाएगी, ताकि शेयरधारकों और अन्य हितधारकों के हित सुरक्षित रह सकें।
दरअसल, कुछ दिन पहले SEBI ने एक मामले में अपना अंतिम आदेश जारी किया था। यह मामला हैदराबाद स्थित ZEEL की एक अचल संपत्ति को प्रमोटर समूह से जुड़ी Essel Group की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के लिए कथित तौर पर गिरवी रखे जाने से जुड़ा है।
SEBI के मुताबिक, कंपनी की इस संपत्ति को बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, ऑडिट कमेटी और शेयरधारकों की जानकारी या मंजूरी के बिना गिरवी रखा गया। साथ ही इस व्यवस्था का आवश्यक खुलासा भी नहीं किया गया।
अपने अंतिम आदेश में SEBI ने ZEEL पर दो महीने तक प्रतिभूति बाजार में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है। वहीं कंपनी के संस्थापक एवं चेयरमैन एमेरिटस Subhash Chandra और मैनेजिंग डायरेक्टर एवं CEO Punit Goenka को एक वर्ष तक प्रतिभूतियों में कारोबार करने से प्रतिबंधित कर दिया है। इसके अलावा कंपनी और दोनों अधिकारियों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है।
हालांकि, ZEEL का कहना है कि वह कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे बढ़ेगी और उसकी फंड जुटाने की योजना तय कार्यक्रम के अनुसार जारी रहेगी।
समाचार4मीडिया पत्रकारिता 40 अंडर 40 कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने मीडिया जगत के सामने मौजूद चुनौतियों, पत्रकारों की एकजुटता की कमी और बदलते मीडिया परिदृश्य पर बेबाकी से अपनी बात रखी।
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Vikas Saxena
समाचार4मीडिया के 'पत्रकारिता 40 अंडर 40' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी ने मीडिया जगत के सामने मौजूद चुनौतियों, पत्रकारों की एकजुटता की कमी और बदलते मीडिया परिदृश्य पर बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी समस्या बाहर नहीं, बल्कि भीतर है। पत्रकार और मीडिया संस्थान अपने साथियों के साथ मजबूती से खड़े नहीं होते, जबकि दूसरे पेशों में ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया समय रहते नहीं चेता, तो आने वाले समय में रिपोर्टरों की जगह रोबोट कवरेज करते नजर आएंगे।
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए सुधीर चौधरी ने कहा कि सुबह से कई वक्ता पत्रकारिता के अलग-अलग पहलुओं पर अपनी बात रख चुके हैं, इसलिए वह उन्हीं बातों को दोहराना नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि वह सीधे उस मुद्दे पर आना चाहते हैं, जो इस समय मीडिया जगत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के दौरान भी वह अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन उनका मानना है कि मौजूदा हालात पर खुलकर बात होना जरूरी है।
उन्होंने हाल ही में जंतर-मंतर पर पत्रकारों के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह के मंचों पर अक्सर पत्रकार अपनी शिकायतें रखते हैं कि उनके साथ क्या हुआ, क्या नहीं होना चाहिए था और आगे क्या किया जाना चाहिए। लेकिन केवल शिकायत करने से कोई बदलाव नहीं आने वाला। उन्होंने बताया कि उन्होंने इस मुद्दे को अपने टीवी शो में भी उठाया था और साफ कहा था कि मीडिया की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि इस पेशे से जुड़े लोग एक-दूसरे का साथ नहीं देते।
सुधीर चौधरी ने दूसरे पेशों का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी डॉक्टर के साथ दुर्व्यवहार होता है, तो पूरे देश के डॉक्टर उसके समर्थन में खड़े हो जाते हैं। इसी तरह किसी वकील के साथ कोई घटना हो जाए, तो सभी वकील एकजुट होकर विरोध करते हैं। लेकिन मीडिया में तस्वीर बिल्कुल अलग है। उन्होंने कहा कि अगर किसी पत्रकार या किसी चैनल के साथ कोई गलत घटना हो जाए, तो बाकी लोग भीतर ही भीतर खुश होते हैं। उन्हें लगता है कि उनका एक प्रतिस्पर्धी कम हो गया। ऊपर से सहानुभूति दिखाई जाती है, लेकिन अंदर ईर्ष्या बनी रहती है। उनके मुताबिक मीडिया जगत की यही सबसे बड़ी कमजोरी है।
उन्होंने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री की सबसे बड़ी संस्था एनबीडीए (पहले एनबीए) है और वह स्वयं उसके सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले भी उन्होंने इसकी बैठकों में यही सुझाव दिया था कि जब भी पत्रकारों पर हमला हो या किसी मीडिया संस्थान के साथ दुर्व्यवहार हो, तब सभी चैनलों के प्रबंधन और संपादकों को एक साथ बैठकर सामूहिक निर्णय लेना चाहिए।
सुधीर चौधरी ने कहा कि जंतर-मंतर की घटना के बाद सभी चैनलों को एकजुट होकर संबंधित आंदोलन और उसके नेताओं के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि सभी चैनल मिलकर यह फैसला कर सकते थे कि जब तक पत्रकारों से माफी नहीं मांगी जाती, तब तक उनके आंदोलन की कवरेज नहीं होगी और न ही उनके बारे में कोई खबर दिखाई जाएगी। अगर सभी चैनल एक साथ ऐसा नहीं कर सकते थे, तो कम से कम वे चैनल यह फैसला लेते, जिनके पत्रकारों के साथ बदसलूकी हुई थी। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि केवल मंचों से शिकायत करने या सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख देने से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। जरूरत इस बात की है कि सभी चैनलों के संपादक, प्रबंधन और मालिक एक साथ बैठें और इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए ठोस नीति बनाएं। जब तक मीडिया खुद अपने लिए सामूहिक रणनीति नहीं बनाएगा, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।
अपने संबोधन में सुधीर चौधरी ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का जिक्र करते हुए भविष्य की एक गंभीर तस्वीर भी पेश की। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया इंडस्ट्री ने अपनी कार्यप्रणाली नहीं बदली, तो आने वाले एक-दो वर्षों में रिपोर्टरों की जगह रोबोट कवरेज करते दिखाई देंगे। उन्होंने कहा कि एआई बहुत तेजी से विकसित हो रहा है और जल्द ही ह्यूमनॉयड रोबोट भी मैदान में उतर सकते हैं। मीडिया संस्थान उन्हें अपने चैनल की जैकेट पहनाकर रिपोर्टिंग के लिए भेज देंगे। उन्होंने इस टिप्पणी के जरिए यह संदेश दिया कि यदि पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित नहीं किया गया, तो तकनीक इंसानी रिपोर्टिंग की जगह लेने लगेगी।
इसके बाद सुधीर चौधरी ने पत्रकारिता में प्रवेश के मौजूदा ढांचे पर सवाल उठाते हुए कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में एक बहुत बड़ा 'लूपहोल' है। उन्होंने कहा कि डॉक्टर, वकील, इंजीनियर या आईटी प्रोफेशनल बनने के लिए डिग्री और तय योग्यता जरूरी होती है। अगर कोई बिना डिग्री के डॉक्टर बनकर काम करे, तो उसे झोलाछाप डॉक्टर कहा जाता है और उसके खिलाफ कार्रवाई होती है। बिना डिग्री वाला व्यक्ति अदालत में वकालत नहीं कर सकता और न ही किसी बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी पा सकता है। लेकिन पत्रकारिता शायद ऐसा अकेला पेशा है, जहां कोई भी व्यक्ति कैमरा और माइक लेकर खुद को पत्रकार घोषित कर सकता है।
उन्होंने बताया कि जंतर-मंतर के प्रदर्शन के दौरान उन्होंने ऐसे कई लोगों को देखा, जिनका किसी स्थापित मीडिया संस्थान से कोई संबंध नहीं था। उनके पास केवल अपना यूट्यूब चैनल, एक छोटा कैमरा या मोबाइल फोन था और वे खुद को मीडिया बता रहे थे। पुलिस भी उन्हें मीडिया मानकर कवरेज की अनुमति दे रही थी। उनके अनुसार यह स्थिति पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए गंभीर चुनौती है।
सुधीर चौधरी ने कहा कि अब समय आ गया है कि मीडिया इंडस्ट्री अपने स्तर पर 'चेक्स एंड बैलेंस' तैयार करे। यह तय होना चाहिए कि कौन पत्रकार कहलाने का अधिकार रखता है, कौन फील्ड रिपोर्टिंग कर सकता है और किन लोगों के लिए स्पष्ट मानक होने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि मीडिया इंडस्ट्री सरकार के सामने प्रस्ताव रख सकता है कि जिस तरह झोलाछाप डॉक्टरों की पहचान की जाती है, उसी तरह 'झोलाछाप पत्रकारों' की भी पहचान होनी चाहिए और उनके लिए नियम बनाए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि उन्हें हैरानी होती है कि मीडिया इंडस्ट्री में इतने अनुभवी और बुद्धिमान लोग हैं, जो देश के प्रधानमंत्री और मंत्रियों को सलाह देते हैं कि क्या किया जाना चाहिए, लेकिन अपनी ही इंडस्ट्री की समस्याओं का समाधान निकालने में असफल दिखाई देते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी बातें कुछ लोगों को कड़ी या नाराज करने वाली लग सकती हैं, लेकिन उनका मानना है कि जो कदम बहुत पहले उठाए जाने चाहिए थे, वे अब तक नहीं उठाए गए हैं।