NDTV ने बताया कि ‘गुडटाइम्स’ (GoodTimes) चैनल के बिजनेस अंडरटेकिंग को Lifestyle & Media Broadcasting Limited (LMBL) से खरीदने की प्रक्रिया चल रही है।
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Vikas Saxena
केरल हाई कोर्ट में टीवी रेटिंग्स में "लैंडिंग पेज" की गिनती को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई और तेज हो गई है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई तक टाल दी।
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Samachar4media Bureau
केरल हाई कोर्ट में टीवी रेटिंग्स में "लैंडिंग पेज" की गिनती को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई और तेज हो गई है। शुक्रवार को हुई सुनवाई में अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई तक टाल दी। इस दौरान केंद्र सरकार ने अदालत से कहा कि जब तक इस विवाद पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक नए टीवी रेटिंग ढांचे के तहत रेटिंग्स जारी नहीं की जा सकतीं।
यह मामला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) की टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 के उस प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें लैंडिंग पेज से मिलने वाली व्युअरशिप को टीवी रेटिंग्स की गणना से बाहर रखा गया है। ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) ने इस प्रावधान को चुनौती दी है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि संशोधित रेटिंग व्यवस्था के तहत नई रेटिंग्स तब तक लागू नहीं हो सकतीं, जब तक अदालत इस मामले पर अपना फैसला नहीं सुना देती। इसके बाद न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई के लिए तय कर दी।
दरअसल, "लैंडिंग पेज" वे चैनल होते हैं जो टीवी ऑन करते ही अपने आप स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। पिछले कुछ समय से यह मुद्दा भारतीय प्रसारण उद्योग में बड़ा विवाद बना हुआ है, क्योंकि इसका सीधा असर टीवी रेटिंग्स, विज्ञापन राजस्व और चैनलों की रैंकिंग पर पड़ता है।
AIDCF ने अदालत में दायर अपने जवाब में केंद्र सरकार की उस मांग का विरोध किया है, जिसमें अंतरिम रोक हटाने की अपील की गई थी। फेडरेशन का कहना है कि रेटिंग्स से लैंडिंग पेज व्युअरशिप को बाहर करना उचित नहीं है।
इससे पहले केरल हाई कोर्ट ने विवादित प्रावधान पर अंतरिम रोक लगा दी थी। हालांकि अदालत ने पूरी टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन नए फॉर्मूले के आधार पर रेटिंग्स जारी होने पर प्रभावी रूप से रोक बनी हुई है।
यह विवाद ऐसे समय में और महत्वपूर्ण हो गया है, जब ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ने 11 जून से लंबे अंतराल के बाद साप्ताहिक न्यूज चैनल रेटिंग्स फिर से जारी करना शुरू किया है। हालांकि BARC ने साफ किया था कि फिलहाल लैंडिंग पेज से मिलने वाले इम्प्रेशन रेटिंग सिस्टम का हिस्सा नहीं होंगे।
केंद्र सरकार ने अदालत में दाखिल अपने विस्तृत हलफनामे में लैंडिंग पेज व्युअरशिप को बाहर रखने के फैसले का जोरदार बचाव किया है। सरकार का कहना है कि यह कदम टीवी रेटिंग सिस्टम की विश्वसनीयता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए जरूरी है।
मंत्रालय के अनुसार, टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 कई दौर की चर्चाओं और परामर्श के बाद तैयार की गई है। इसमें ब्रॉडकास्टर्स, डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स (DPOs), ऑडियंस मेजरमेंट एजेंसियों और नियामकों से राय ली गई थी। इसका उद्देश्य टीवी ऑडियंस मापन प्रणाली को अधिक पारदर्शी, स्वतंत्र और जवाबदेह बनाना है।
सरकार का तर्क है कि लैंडिंग पेज और बूट-अप स्क्रीन वर्षों से रेटिंग्स को प्रभावित करते रहे हैं। टीवी ऑन करते ही किसी चैनल का अपने आप दिखाई देना उसकी व्युअरशिप को कृत्रिम रूप से बढ़ा देता है, जिससे वास्तविक दर्शक पसंद का सही आकलन नहीं हो पाता।
मंत्रालय का कहना है कि लैंडिंग पेज पर दिखने वाली व्युअरशिप अक्सर दर्शकों की सक्रिय पसंद नहीं होती, बल्कि केवल स्क्रीन पर अपने आप दिखाई देने का परिणाम होती है। इसलिए इसे वास्तविक दर्शक व्यवहार का सही पैमाना नहीं माना जा सकता।
सरकार ने यह भी बताया कि लैंडिंग पेज के प्रभाव को लेकर चिंताएं नई नहीं हैं। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) भी पिछले कई वर्षों से इस मुद्दे पर अध्ययन और परामर्श करता रहा है। नियामकों ने बार-बार चेतावनी दी है कि लैंडिंग पेज रेटिंग्स को प्रभावित कर सकते हैं और बाजार में प्रतिस्पर्धा को असंतुलित बना सकते हैं।
हालांकि मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि टेलीविजन रेटिंग पॉलिसी 2026 लैंडिंग पेज के इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं लगाती। ब्रॉडकास्टर्स और DPOs इन्हें प्रमोशनल टूल के रूप में पहले की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। नीति केवल यह कहती है कि ऐसी व्युअरशिप को टीवी रेटिंग्स की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा।
केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस अलग विवाद से अलग है, जो TRAI के लैंडिंग पेज नियमों से जुड़ा हुआ है। सरकार के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का मामला चैनल प्लेसमेंट नियमों से संबंधित है, जबकि वर्तमान विवाद ऑडियंस मेजरमेंट यानी रेटिंग्स की गणना की पद्धति से जुड़ा है।
उद्योग के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। न्यूज ब्रॉडकास्टर्स का मानना है कि लैंडिंग पेज चैनलों को अनुचित रेटिंग लाभ देते हैं, जबकि डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटर्स का कहना है कि ये दर्शकों को नए चैनलों तक पहुंचाने और चैनल डिस्कवरी बढ़ाने का वैध माध्यम हैं।
टीवी रेटिंग्स विज्ञापन बजट, चैनलों की बाजार कीमत और कैरिज डील्स तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। ऐसे में इस मामले पर केरल हाई कोर्ट का अंतिम फैसला पूरे प्रसारण उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विज्ञापन सीजन नजदीक होने और न्यूज रेटिंग्स के दोबारा शुरू होने के बीच यह फैसला भारत के टीवी ऑडियंस मापन ढांचे की दिशा तय कर सकता है।
'ज़ी टीवी' (Zee TV) ने अपने लोकप्रिय सिंगिंग रियलिटी शो ‘सा रे गा मा पा’ (Sa Re Ga Ma Pa) के नए सीजन की घोषणा की है। देश के 12 शहरों में ऑडिशन आयोजित किए जाएंगे।
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'ज़ी टीवी' (Zee TV) ने अपने प्रतिष्ठित सिंगिंग रियलिटी शो ‘सा रे गा मा पा’ (Sa Re Ga Ma Pa) के नए सीजन की घोषणा कर दी है। चैनल ने बताया है कि आगामी सीजन के लिए देशभर के 12 शहरों में ऑडिशन आयोजित किए जाएंगे, जहां उभरते गायक अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर प्राप्त कर सकेंगे।
वर्षों से ‘सा रे गा मा पा’ (Sa Re Ga Ma Pa) भारतीय संगीत जगत के सबसे लोकप्रिय रियलिटी शोज़ में गिना जाता रहा है। इस मंच ने 'श्रेया घोषाल' (Shreya Ghoshal), 'शेखर रवजियानी' (Shekhar Ravjiani) और 'कुणाल गांजावाला' (Kunal Ganjawala) जैसे कई प्रसिद्ध गायकों को पहचान दिलाई है।
चैनल के अनुसार, नए सीजन में संगीत और प्रस्तुति के स्तर को और भव्य बनाया जाएगा। इसके लिए बड़े मंच, विस्तारित प्रोडक्शन सेटअप और कॉन्सर्ट जैसी प्रस्तुति शैली को शामिल किया गया है। शो में 100 से अधिक लाइव संगीतकार, गायक और वादक एक साथ प्रस्तुति देंगे, जिससे दर्शकों को अधिक प्रभावशाली संगीत अनुभव मिल सकेगा।
ऑडिशन दिल्ली, मुंबई, जयपुर, चंडीगढ़, नागपुर, इंदौर, कोलकाता, गुवाहाटी, अहमदाबाद, बेंगलुरु, लखनऊ और वाराणसी में आयोजित किए जाएंगे। इससे देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्रतिभाशाली गायकों को मंच तक पहुंचने का मौका मिलेगा।
'ज़ी टीवी' (Zee TV) का मानना है कि नया सीजन न केवल शो की विरासत को आगे बढ़ाएगा, बल्कि देश के अगले बड़े सिंगिंग स्टार की खोज में भी अहम भूमिका निभाएगा।
'न्यूज़18 इंडिया' (News18 India) ने अपने प्रमुख डिबेट शो ‘गूंज’ को नए फॉर्मेट और नई प्रस्तुति के साथ शुरू कर दिया है। 18 जून से अर्पिता आर्या शो की एंकरिंग संभाल ली हैं।
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'न्यूज़18 इंडिया' (News18 India) ने अपने प्रमुख डिबेट शो ‘गूंज’ (Goonj) को नए फॉर्मेट और नए संपादकीय दृष्टिकोण के साथ शुरू कर दिया है। 18 जून से शुरू हुए इस शो की कमान अब एंकर अर्पिता आर्या (Arpita Arya) ने संभाल ली हैं। चैनल का उद्देश्य तथ्य आधारित और अधिक संरचित समाचार बहसों के जरिए दर्शकों को बेहतर संदर्भ और विश्लेषण उपलब्ध कराना है।
सप्ताह के दिनों में शाम 4:50 बजे प्रसारित होने वाला ‘गूंज’ (Goonj) लंबे समय से राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा का प्रमुख मंच रहा है। नए संस्करण में सत्यापित आंकड़ों, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और विजुअल एक्सप्लेनर्स (Visual Explainers) पर विशेष जोर दिया गया है। इसके साथ ही जटिल विषयों को सरल तरीके से समझाने के लिए ग्राफिक्स आधारित स्टोरीटेलिंग को भी प्रमुखता दी गई है।
'न्यूज़18 इंडिया' (News18 India) के अनुसार, नए संस्करण में विश्वसनीय, तीखी और प्रभावशाली पत्रकारिता पर फोकस जारी रहेगा, जबकि तथ्यों और संदर्भों को और अधिक मजबूती से प्रस्तुत किया जाएगा। नए फॉर्मेट और नए प्रस्तुतीकरण के साथ ‘गूंज’ अब 'न्यूज़18 इंडिया' (News18 India) और उसके 'यूट्यूब' (YouTube) प्लेटफॉर्म पर दर्शकों तक पहुंच रहा है।
'फीफा' (FIFA) के अनुसार वर्ल्ड कप 2026 के मेजबान देशों के शुरुआती मुकाबलों को 5.4 करोड़ से अधिक लोगों ने देखा। कई मैचों ने अपने-अपने बाजारों में नए व्यूअरशिप रिकॉर्ड भी बनाए।
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'फीफा' (FIFA) वर्ल्ड कप 2026 के शुरुआती मुकाबलों ने दर्शकों के बीच जबरदस्त उत्साह पैदा किया है। 'फीफा' (FIFA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार मेजबान देशों अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा के पहले मुकाबलों को कुल मिलाकर 5.4 करोड़ से अधिक दर्शकों ने देखा।
सबसे बड़ी दर्शक संख्या अमेरिका और पैराग्वे के बीच खेले गए मुकाबले को मिली। यह मैच 'फॉक्स' (FOX) और 'टेलीमुंडो' (Telemundo) पर औसतन 2.75 करोड़ दर्शकों तक पहुंचा। 'फीफा' (FIFA) के मुताबिक यह अमेरिका के टेलीविजन इतिहास में सबसे ज्यादा देखा गया फुटबॉल प्रसारण बन गया है। 'फॉक्स' (FOX) ने इसे अमेरिका में पुरुष फीफा वर्ल्ड कप के किसी भी अंग्रेजी भाषा प्रसारण की सर्वाधिक व्यूअरशिप बताया, जबकि स्ट्रीमिंग के मामले में भी यह नया रिकॉर्ड स्थापित करने में सफल रहा।
वहीं मेक्सिको की दक्षिण अफ्रीका पर जीत को औसतन 2.34 करोड़ दर्शकों ने देखा। 'फीफा' (FIFA) के अनुसार यह 21वीं सदी में मेक्सिको का सबसे ज्यादा देखा गया फीफा वर्ल्ड कप मुकाबला बन गया। मैच ने मेक्सिको में 72.1 प्रतिशत टेलीविजन मार्केट शेयर हासिल किया। अमेरिका में भी इस मुकाबले को लगभग 2 करोड़ दर्शकों ने देखा।
कनाडा और बोस्निया-हर्जेगोविना के बीच खेले गए मुकाबले को अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा प्रसारकों पर औसतन 31 लाख दर्शक मिले। 'फीफा' (FIFA) ने इसे इस सदी में कनाडा की पुरुष राष्ट्रीय टीम से जुड़ा तीसरा सबसे ज्यादा देखा गया वर्ल्ड कप मैच बताया।
'फीफा' (FIFA) अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो (Gianni Infantino) ने कहा कि शुरुआती आंकड़े दर्शाते हैं कि टूर्नामेंट को लेकर प्रशंसकों का उत्साह बेहद मजबूत है और वर्ल्ड कप 2026 वैश्विक स्तर पर नए दर्शक रिकॉर्ड स्थापित कर सकता है।
हिंदी न्यूज चैनलों का प्राइम टाइम लंबे समय से तेज-तर्रार बहसों, ऊंची आवाजों और राजनीतिक टकरावों के लिए जाना जाता रहा है।
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Vikas Saxena
हिंदी न्यूज चैनलों का प्राइम टाइम लंबे समय से तेज-तर्रार बहसों, ऊंची आवाजों और राजनीतिक टकरावों के लिए जाना जाता रहा है। रात 8 बजे से 10 बजे तक का समय अक्सर ऐसे कार्यक्रमों से भरा रहता था, जिनमें कई पैनलिस्ट एक साथ बहस करते दिखाई देते थे। लेकिन अब तस्वीर धीरे-धीरे बदलती नजर आ रही है। हिंदी न्यूज इंडस्ट्री में एक नया ट्रेंड उभर रहा है- 'एक्सप्लेनेर शोज' का ट्रेंड।
यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब दर्शकों की मीडिया आदतें तेजी से बदल रही हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, यूट्यूब, सोशल मीडिया और शॉर्ट वीडियो कंटेंट ने दर्शकों को केवल खबर सुनने के बजाय उसे समझने की आदत भी दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या हिंदी न्यूज चैनल अब डिबेट-प्रधान पत्रकारिता से आगे बढ़कर डेटा, रिसर्च और फैक्ट आधारित पत्रकारिता की ओर बढ़ रहे हैं?
16 जून 2026 को 'न्यूज18 इंडिया' अपना नया प्राइमटाइम शो "देश की पाठशाला" लॉन्च किया, जिसकी कमान सीनियर जर्नलिस्ट सुशांत सिन्हा के हाथ में है। शो रात 8:50 बजे टीवी, CTV और YouTube- तीनों प्लेटफॉर्म पर एक साथ प्रसारित होने लगा और लगभग इसी समय, Times Now Navbharat का "न्यूज की पाठशाला", जिसे सुशांत सिन्हा ही चलाते थे और उनके यहां से जाने के बाद से चैनल को इस प्रोग्राम के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी। लिहाजा रुबिका लियाकत के आने से यह तलाश अब पूरी हो गई, क्योंकि 17 जून यानी आज से वह "न्यूज की पाठशाला" की जिम्मेदारी उठाएंगी और वह भी नए अंदाज में।
यह संयोग नहीं, एक सिग्नल है। हिंदी न्यूज इंडस्ट्री, जो दशकों से "बड़ी बहस", "आर-पार", "दंगल" और "ताल ठोक के" जैसे डिबेट फॉर्मेट पर टिकी थी, अब करवट ले रही है। सवाल यह है- क्या यह बदलाव असली है, या सिर्फ पुरानी बोतल में नई शराब?
डिबेट कल्चर का वह सुनहरा दौर
2000 के दशक के बाद हिंदी न्यूज टीवी की पहचान काफी हद तक प्राइम टाइम डिबेट्स बन गई। एंकर माइक संभालता, कई पैनलिस्ट एक साथ अपनी बात रखते, स्क्रीन कई हिस्सों में बंट जाती और दर्शक उस शोर-शराबे के बीच अपनी पसंद की आवाज तलाशता। TRP की दौड़ में इस फॉर्मेट ने लंबे समय तक चैनलों को फायदा पहुंचाया। लेकिन अब यह मॉडल अपनी सीमाओं से जूझता नजर आ रहा है। हिंदी न्यूज मार्केट में प्रतिस्पर्धा पहले से कहीं ज्यादा कड़ी हो गई है और लगभग सभी बड़े चैनल मिलते-जुलते फॉर्मेट और प्रस्तुति शैली के साथ दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में जब कंटेंट और प्रस्तुति में बहुत ज्यादा अंतर न दिखे, तो दर्शकों के लिए एक चैनल को दूसरे से अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है।
डिजिटल क्रांति ने बदला खेल
असली धक्का आया डिजिटल से। FICCI-EY मीडिया एंड एंटरटेनमेंट रिपोर्ट 2026 के अनुसार, 2025 में पहली बार डिजिटल मीडिया ने भारत में टेलीविजन को पीछे छोड़ते हुए सबसे बड़े सेगमेंट का दर्जा हासिल किया। डिजिटल मीडिया ने ₹1 लाख करोड़ का आंकड़ा पार किया, जबकि पूरा M&E सेक्टर 9% बढ़कर ₹2.78 लाख करोड़ पर पहुंच गया।
भारत में ऑनलाइन वीडियो दर्शकों की संख्या 2025 में 57.2 करोड़ तक पहुंच गई। इसी दौरान Kantar Media Compass की 2025 की तीसरी तिमाही की रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया: भारत के 15+ आयु वर्ग में से 31.3 करोड़ लोग (26%) अब पूरी तरह डिजिटल-ओनली दर्शक हैं, यानी वे लिनियर टीवी देखते ही नहीं। यह संख्या 2024 की तुलना में 30% ज्यादा है।
ब्रॉडकास्ट सेक्टर का हाल भी चिंताजनक है। FICCI-EY रिपोर्ट 2026 के अनुसार 2025 में लिनियर TV विज्ञापन राजस्व में 10% से अधिक की गिरावट आई और सब्सक्रिप्शन में 8% की कमी हुई, जिसके चलते 1.1 करोड़ pay-TV घर कम हो गए।
YouTube पर न्यूज का नया अखाड़ा
टेलीविजन जहां सिकुड़ रहा है, वहीं YouTube पर हिंदी न्यूज का साम्राज्य फैल रहा है। Aaj Tak के YouTube चैनल पर 2026 तक 7.53 करोड़ से ज्यादा सब्सक्राइबर हो चुके हैं- यह किसी भी न्यूज चैनल का दुनिया में सबसे बड़ा YouTube फॉलोइंग है। ABP News ~5.09 करोड़, IndiaTV ~5.07 करोड़ और News18 India ~4.03 करोड़ सब्सक्राइबर के साथ खड़ा है।
लेकिन यहां एक और कहानी है- The Lallantop की। 2017 में शुरू हुए इस डिजिटल-फर्स्ट प्लेटफॉर्म के मार्च 2026 तक 3.48 करोड़ YouTube सब्सक्राइबर हो चुके हैं और कुल व्यूज 17.8 अरब के पार। The Lallantop की खासियत यही है कि यह डिबेट नहीं करता- यह समझाता है। लंबी स्क्रिप्ट, डेटा, इतिहास, संदर्भ, यही इसकी पहचान है। यह सफलता बाकी चैनलों के लिए आईना है।
'देश की पाठशाला' से शुरू हुआ नया ट्रेंड
'न्यूज18 इंडिया' के प्राइमटाइम लाइनअप में हुए ताजा बदलाव इस ट्रेंड का सबसे ठोस सबूत हैं। चैनल ने अपने नए एडिटोरियल आर्किटेक्चर में एक्सप्लेनर जर्नलिज्म को केंद्र में रखा है। रात 8:50 बजे का प्राइमटाइम स्लॉट अब डिबेट का नहीं, "देश की पाठशाला" का है- जहां राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का संदर्भ, पृष्ठभूमि और विश्लेषण प्रस्तुत किया जाएगा।
चैनल के मुताबिक, यह नया लाइनअप एक "इंटीग्रेटेड एडिटोरियल फ्रेमवर्क" है- स्ट्रैटेजी, राजनीति, ग्राउंड रिपोर्टिंग, एक्सप्लेनर और डिबेट, सभी अलग-अलग पर एक-दूसरे के पूरक।
उधर Times Now Navbharat का "न्यूज की पाठशाला", जो एक्सप्लेनर फॉर्मेट में पहले से मौजूद था, अब भी जारी रहेगा। सुशांत सिन्हा के जाने के बाद चैनल ने इसके लिए नए चेहरे की तलाश शुरू की, जोकि उसे अब रूबिका लियाकत के रूप में मिल चुका है, लेकिन शो एक नए अंदाज में पेश किया जाएगा, लेकिन बताया जा रहा है कि शो का फॉर्मेट नहीं बदला गया है। यह इस बात का संकेत है कि एक्सप्लेनर फॉर्मेट को अब "एंकर से बड़ा ब्रैंड" माना जाने लगा है।
एंकर की बदलती भूमिका
इस बदलाव को BBC Explainers, Vox और The Economist जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया से सीखा जा सकता है, जिन्होंने एक्सप्लेनर जर्नलिज्म को एक लाभदायक और विश्वसनीय मॉडल बनाया। Vox मीडिया का पूरा बिजनेस मॉडल ही "we explain the news" पर टिका है।
AI और डेटा पत्रकारिता का प्रवेश
FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के अनुसार, भारत का M&E सेक्टर तेजी से "डेटा-लेड और प्लेटफॉर्म-एग्नॉस्टिक" होता जा रहा है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंटेंट क्रिएशन, डिस्ट्रीब्यूशन और ऑडियंस एंगेजमेंट में बड़ी भूमिका निभा रहा है। न्यूजरूम अब AI टूल्स से रिसर्च, डेटा विजुअलाइजेशन और फैक्ट-चेकिंग तेज कर सकते हैं।
2025 में डिजिटल विज्ञापन 26% बढ़कर ₹94,700 करोड़ हो गया- कुल विज्ञापन खर्च का 63%। यह संख्या बताती है कि विज्ञापनदाता भी अब डिजिटल की ओर मुड़ चुके हैं। जो चैनल डेटा-आधारित एक्सप्लेनर कंटेंट के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मजबूत उपस्थिति बनाएगा, उसे इस विज्ञापन पाई में बड़ा हिस्सा मिलेगा।
टीआरपी की लड़ाई में डेटा बनेगा नया हथियार?
यक्ष प्रश्न यह है: क्या एक्सप्लेनर शो वाकई टीआरपी ला पाएंगे? FICCI-EY रिपोर्ट 2026 के अनुसार 2025 में भारत में कुल TV households 19.3 करोड़ थे, जो 2024 के 19 करोड़ से बढ़े हैं। यानी टेलीविजन की पहुंच अभी भी व्यापक है। लेकिन युवा दर्शक, जो डिजिटल-ओनली हैं, उनके लिए एक्सप्लेनर फॉर्मेट YouTube और पॉडकास्ट पर ज्यादा कारगर है।
FICCI-EY रिपोर्ट 2026 की एक अहम बात यह है कि "दर्शक अब केवल कंटेंट के निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार हैं।" वे वही देखते हैं जो उन्हें कुछ सिखाए, कुछ समझाए। भारत में लोगों ने 2025 में अपने स्मार्टफोन पर 1.23 ट्रिलियन (खरब) घंटे बिताए, यह संख्या कल्पना से परे है, जिसमें से 59% समय मीडिया व एंटरटेनमेंट में गया। इस विशाल ध्यान को खींचने के लिए सिर्फ शोर काफी नहीं, समझ भी देनी होगी।
नई पैकेजिंग या असली बदलाव?
क्या हिंदी न्यूज इंडस्ट्री वास्तव में डिबेट-प्रधान दौर से निकलकर डेटा और एक्सप्लेनर पत्रकारिता की ओर बढ़ रही है, या यह केवल प्राइम टाइम की नई पैकेजिंग है? आंकड़े साफ कहते हैं कि मजबूरी असली है। डिजिटल-ओनली दर्शकों में 30% की वृद्धि, लीनियर टीवी विज्ञापन राजस्व में 10% से अधिक की गिरावट- यह सब यों ही नहीं हो रहा।
The Lallantop जैसे प्लेटफॉर्म की सफलता यह साबित कर चुकी है कि हिंदी दर्शक "समझना" चाहते हैं, न सिर्फ "सुनना।" 'न्यूज18 इंडिया' का "देश की पाठशाला" और 'टाइम्स नाउ नवभारत' का "न्यूज की पाठशाला"- दोनों इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं।
लेकिन असली परीक्षा आगे है। क्या ये चैनल सिर्फ नाम बदलकर पुराना फॉर्मेट चलाएंगे, या सच में डेटा, ग्राफिक्स, टाइमलाइन और शोध-आधारित पत्रकारिता को अपना लेंगे? आने वाले कुछ साल इस सवाल का जवाब तय करेंगे और हिंदी न्यूज का चेहरा भी।
पिछले एक दशक में डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्ट्रीमिंग सेवाओं और दर्शकों की बदलती आदतों ने मीडिया इंडस्ट्री का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है, जबकि मौजूदा नियम आज भी पुराने दौर की सोच पर आधारित हैं।
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Samachar4media Bureau
इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
देश के टीवी ब्रॉडकास्टर्स ने विज्ञापन समय सीमा (Ad Cap) से जुड़े नियमों की समीक्षा की मांग एक बार फिर तेज कर दी है। उनका कहना है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) को ऐसी नई नीति बनानी चाहिए जो आज के मीडिया माहौल की वास्तविकताओं को ध्यान में रखे। पिछले एक दशक में डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्ट्रीमिंग सेवाओं और दर्शकों की बदलती आदतों ने मीडिया इंडस्ट्री का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है, जबकि मौजूदा नियम आज भी पुराने दौर की सोच पर आधारित हैं।
ब्रॉडकास्टर्स की यह नई पहल हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के बाद सामने आई है, जिसमें टीवी चैनलों पर विज्ञापन समय सीमा लागू करने के मुद्दे पर फैसला दिया गया था। इस फैसले के बाद उद्योग जगत में यह चिंता फिर बढ़ गई है कि अगर प्रति घंटे 12 मिनट की विज्ञापन सीमा को सख्ती से लागू किया गया तो टीवी चैनलों के कारोबार पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
मामले से जुड़े कई वरिष्ठ उद्योग अधिकारियों के मुताबिक, हाल ही में देश के बड़े ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क और इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) के प्रतिनिधियों ने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कहा कि मौजूदा नीति जिन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर 2013 में बनाई गई थी, आज का मीडिया बाजार उससे बिल्कुल अलग है और यह नियम अब मौजूदा हालात से मेल नहीं खाते।
ब्रॉडकास्टर्स ने मंत्रालय को बताया कि पिछले दस वर्षों में मीडिया और विज्ञापन उद्योग में बड़े संरचनात्मक बदलाव हुए हैं। डिजिटल विज्ञापन तेजी से बढ़ा है, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है, दर्शक कई प्लेटफॉर्म्स में बंट गए हैं और वैश्विक टेक कंपनियों से प्रतिस्पर्धा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
सूत्रों के अनुसार, बातचीत के दौरान मंत्रालय ने ब्रॉडकास्टर्स को भरोसा दिलाया कि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के तुरंत बाद टीवी चैनलों के खिलाफ कोई सख्त या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। इससे फिलहाल उद्योग को कुछ राहत मिली है और उसे कानूनी विकल्पों पर विचार करने तथा आगे की रणनीति तैयार करने का समय मिल गया है।
अब माना जा रहा है कि कोर्ट की छुट्टियां खत्म होने के बाद IBDF इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा। संगठन विज्ञापन सीमा से जुड़े नियमों की व्याख्या और उनके क्रियान्वयन को लेकर कानूनी स्पष्टता चाहता है।
एक वरिष्ठ ब्रॉडकास्टिंग अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि 2013 की तुलना में आज का मीडिया बाजार पूरी तरह बदल चुका है। उस समय टीवी विज्ञापन का सबसे बड़ा माध्यम था और डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरुआती दौर में थे। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल अलग है। अब टीवी चैनलों को उन वैश्विक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मुकाबला करना पड़ रहा है, जिनके पास लगभग असीमित विज्ञापन स्पेस है और जिन पर टीवी जैसे नियम लागू नहीं होते।
उन्होंने कहा कि आज भारतीय टीवी उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती दर्शकों का ध्यान बनाए रखना और अपने विज्ञापन स्लॉट भरना है। अगर कोई चैनल जरूरत से ज्यादा विज्ञापन दिखाएगा तो दर्शक तुरंत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर चले जाएंगे। कोई भी समझदार ब्रॉडकास्टर अपने दर्शकों को दूसरे चैनलों या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तरफ नहीं धकेलना चाहेगा। उनका मानना है कि अब समय आ गया है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और ट्राई (TRAI) दोनों नए मीडिया माहौल को समझें और उसी के अनुसार नीतियां बनाएं।
उद्योग का कहना है कि टीवी नेटवर्क इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। एक तरफ संचालन और कंटेंट निर्माण की लागत लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ विज्ञापन से होने वाली आय की वृद्धि धीमी पड़ गई है। ऐसे में कमाई के लिए लचीलापन पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
विज्ञापन सीमा का मुद्दा टीवी उद्योग के लिए लंबे समय से सबसे विवादित नियामकीय विषयों में से एक रहा है। उपभोक्ता समूहों का मानना है कि विज्ञापन सीमित करने से दर्शकों का अनुभव बेहतर होता है और अत्यधिक विज्ञापन से बचाव होता है। लेकिन ब्रॉडकास्टर्स लगातार कहते रहे हैं कि मौजूदा ढांचा विभिन्न प्रकार के चैनलों और उनके अलग-अलग बिजनेस मॉडल की वास्तविक जरूरतों को ठीक से नहीं समझता।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पिछले दस वर्षों में टीवी कारोबार की अर्थव्यवस्था काफी चुनौतीपूर्ण हो गई है। कंटेंट निर्माण की लागत तेजी से बढ़ी है, बड़े मनोरंजन कार्यक्रमों और खेल प्रसारण अधिकारों की कीमतें कई गुना बढ़ गई हैं और दर्शक अब अपना समय पारंपरिक टीवी, कनेक्टेड टीवी, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया ऐप्स के बीच बांट रहे हैं।
इसी दौरान विज्ञापनदाताओं का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर चला गया है। इसकी वजह डिजिटल माध्यमों की बेहतर टार्गेटिंग क्षमता, रियल-टाइम डेटा और प्रदर्शन आधारित विज्ञापन मॉडल हैं।
मीडिया उद्योग के अनुमानों के अनुसार, जब विज्ञापन सीमा का ढांचा बनाया गया था, उस समय की तुलना में आज भारत के कुल विज्ञापन खर्च में डिजिटल की हिस्सेदारी काफी ज्यादा हो चुकी है। ब्रॉडकास्टर्स का तर्क है कि ऐसे माहौल में टीवी पर सख्त विज्ञापन सीमा लागू करना उसकी प्रतिस्पर्धी स्थिति को और कमजोर कर सकता है।
एक वरिष्ठ मीडिया एजेंसी अधिकारी का कहना है कि इस मुद्दे को केवल पारंपरिक टीवी प्रसारण के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। अब मीडिया बाजार एकीकृत हो चुका है, जहां टीवी और डिजिटल वीडियो के बीच का अंतर लगातार कम होता जा रहा है। दर्शक कई स्क्रीन पर कंटेंट देख रहे हैं और विज्ञापनदाता भी एकीकृत मीडिया रणनीति के तहत अभियान चला रहे हैं। ऐसे में पुराने दौर के लिए बनाए गए नियमों की समीक्षा जरूरी हो सकती है ताकि वे आज भी प्रासंगिक और निष्पक्ष बने रहें।
ब्रॉडकास्टर्स का यह भी कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स अपनी जरूरत के अनुसार विज्ञापन की मात्रा और कमाई की रणनीति बदल सकते हैं, जबकि टीवी नेटवर्क बेहद नियंत्रित और नियमों से बंधे माहौल में काम करते हैं। इससे बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप प्रतिक्रिया देने की उनकी क्षमता सीमित हो जाती है।
इसी वजह से अब उद्योग के कई हितधारक नई परामर्श प्रक्रिया शुरू करने की मांग कर रहे हैं, जिसमें ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता, उपभोक्ता संगठन और नीति निर्माता सभी शामिल हों। उद्योग के भीतर ऐसी कई संभावनाओं पर चर्चा चल रही है, जिनमें अलग-अलग श्रेणी के चैनलों के लिए अलग नियम, विज्ञापन सीमा में संशोधन या ऐसा लचीला ढांचा शामिल है जो दर्शकों के हित और उद्योग की आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बना सके।
मीडिया नीति से जुड़े एक विशेषज्ञ का कहना है कि यह बहस सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया भर के नियामकों के सामने यही चुनौती है कि तकनीकी बदलावों और मीडिया के एकीकरण के दौर में पुराने नियमों को कैसे अपडेट किया जाए। उनके अनुसार, उपभोक्ताओं के हित में विज्ञापन सीमा का उद्देश्य आज भी सही है, लेकिन यह भी देखना होगा कि दस साल पहले बनाए गए नियम आज के प्रतिस्पर्धी माहौल को कितनी अच्छी तरह दर्शाते हैं। बाजार की संरचना, दर्शकों का व्यवहार और विज्ञापन उद्योग तीनों में भारी बदलाव आ चुका है।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि इस कानूनी लड़ाई का नतीजा भारतीय टीवी उद्योग के भविष्य पर दूरगामी असर डाल सकता है। उनका कहना है कि यह केवल विज्ञापन आय का मुद्दा नहीं है। इसका असर कंटेंट निवेश, क्षेत्रीय चैनलों की आर्थिक स्थिति, खेल प्रसारण के कारोबार और वैश्विक स्ट्रीमिंग तथा टेक कंपनियों से मुकाबला करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।
एक अन्य वरिष्ठ ब्रॉडकास्टिंग अधिकारी के अनुसार, असली सवाल सिर्फ विज्ञापन के मिनटों का नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या पुराने दौर के नियम उस बाजार को नियंत्रित कर सकते हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में पूरी तरह बदल चुका है। अब टीवी की प्रतिस्पर्धा सिर्फ दूसरे टीवी चैनलों से नहीं, बल्कि पूरे डिजिटल इकोसिस्टम से है।
IBDF के सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी और ब्रॉडकास्टर्स की सरकार के साथ बढ़ती बातचीत को देखते हुए यह विवाद अब सिर्फ विज्ञापन सीमा तक सीमित नहीं रहने वाला। आने वाले समय में यह इस बात पर व्यापक बहस का रूप ले सकता है कि डिजिटल और एकीकृत मीडिया युग में मीडिया नियमन को किस तरह बदला जाना चाहिए।
सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि वह दर्शकों के हितों और नियामकीय उद्देश्यों के साथ-साथ उस उद्योग की आर्थिक मजबूती भी बनाए रखे, जो आज भी देश के करोड़ों घरों तक पहुंचता है। वहीं ब्रॉडकास्टर्स के लिए यह मामला बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अंतिम परिणाम तय करेगा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते दबदबे वाले विज्ञापन बाजार में टीवी नेटवर्क कितनी प्रभावी ढंग से अपनी जगह बनाए रख पाते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जिस तरह एक्सप्लेनेर आधारित पत्रकारिता को लोकप्रिय बनाया है, उसने उन्हें हिंदी न्यूज के सबसे प्रभावशाली एंकरों में शामिल कर दिया है।
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Vikas Saxena
हिंदी न्यूज के प्राइम टाइम में एक दिलचस्प मुकाबला शुरू हो गया है, लेकिन इस मुकाबले का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित चेहरा वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जिस तरह एक्सप्लेनेर आधारित पत्रकारिता को लोकप्रिय बनाया है, उसने उन्हें हिंदी न्यूज के सबसे प्रभावशाली एंकरों में शामिल कर दिया है। अब उनकी नई पारी और उनकी पुरानी पहचान, दोनों एक-दूसरे के सामने खड़ी नजर आ रही हैं।
एक तरफ सुशांत सिन्हा न्यूज18 इंडिया पर "देश की पाठशाला" के साथ नई शुरुआत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर टाइम्स नाउ नवभारत ने अपने चर्चित शो "न्यूज की पाठशाला" की जिम्मेदारी रूबिका लियाकत को सौंप दी है। दिलचस्प बात यह है कि "न्यूज की पाठशाला" को लोकप्रिय बनाने और उसे दर्शकों के बीच स्थापित करने का श्रेय काफी हद तक सुशांत सिन्हा को जाता है। ऐसे में अब उनकी नई पाठशाला और उनकी पुरानी पाठशाला के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलेगा।
16 जून 2026 से न्यूज18 इंडिया "देश की पाठशाला" लॉन्च कर रहा है। शो का नेतृत्व सुशांत सिन्हा करेंगे और यह रात 8:50 बजे टीवी, CTV और यूट्यूब पर एक साथ प्रसारित होगा। चैनल इसे पारंपरिक डिबेट से अलग डेटा, फैक्ट्स, ग्राफिक्स और गहन विश्लेषण पर आधारित एक्सप्लेनेर फॉर्मेट के रूप में पेश कर रहा है।
सुशांत सिन्हा आज हिंदी न्यूज के उन चुनिंदा पत्रकारों में गिने जाते हैं जिनकी मजबूत टीवी उपस्थिति के साथ-साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी बड़ी फैन फॉलोइंग है। उनके वीडियो नियमित रूप से लाखों दर्शकों तक पहुंचते हैं और सोशल मीडिया पर भी उनकी प्रभावशाली मौजूदगी है। टाइम्स नाउ नवभारत पर "पाठशाला" और "राष्ट्रगर्व" जैसे कार्यक्रमों ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। करीब दो दशक के करियर में वह इंडिया टीवी, एनडीटीवी इंडिया, न्यूज24 और इंडिया न्यूज जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा चुके हैं।
उधर, टाइम्स नाउ नवभारत भी अपनी "न्यूज की पाठशाला" को नए अंदाज में पेश करने की तैयारी कर चुका है। सुशांत सिन्हा के चैनल छोड़ने के बाद यह सवाल लगातार उठ रहा था कि शो की कमान किसे सौंपी जाएगी। अब चैनल ने इस जिम्मेदारी के लिए रूबिका लियाकत पर भरोसा जताया है।
टाइम्स नेटवर्क ने रूबिका लियाकत को सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर और वाइस प्रेसिडेंट (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) नियुक्त किया है। वह 17 जून से "न्यूज की पाठशाला" की मेजबानी करेंगी। रूबिका हिंदी टीवी पत्रकारिता का एक स्थापित नाम हैं और राजनीतिक रिपोर्टिंग तथा प्राइम टाइम एंकरिंग में उनका लंबा अनुभव रहा है। उन्होंने नेटवर्क18 इंडिया, एबीपी न्यूज, ज़ी न्यूज, न्यूज24, भारत24 और लाइव इंडिया जैसे संस्थानों में काम किया है।
हालांकि इस पूरे मुकाबले में सबसे ज्यादा चर्चा सुशांत सिन्हा की नई पारी को लेकर है। इसकी वजह सिर्फ चैनल परिवर्तन नहीं, बल्कि वह दर्शक आधार भी है जो वर्षों से उनके साथ जुड़ा हुआ है। मीडिया इंडस्ट्री के जानकार मानते हैं कि एक्सप्लेनेर फॉर्मेट को हिंदी न्यूज के मुख्यधारा प्राइम टाइम में लोकप्रिय बनाने वालों में सुशांत सिन्हा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
दरअसल, यह मुकाबला सिर्फ दो एंकरों का नहीं है। यह हिंदी न्यूज में बदलती कंटेंट रणनीति का भी संकेत है। लंबे समय तक प्राइम टाइम बहस, शोर-शराबे और राजनीतिक टकराव के इर्द-गिर्द घूमता रहा, लेकिन अब दर्शक खबरों को समझने वाले कंटेंट की ओर बढ़ रहे हैं। डेटा, फैक्ट्स, रिसर्च और विजुअल स्टोरीटेलिंग तेजी से महत्व हासिल कर रहे हैं।
"देश की पाठशाला" और "न्यूज की पाठशाला" इसी बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों शो का मूल उद्देश्य खबरों को आसान भाषा में समझाना है, लेकिन इस फॉर्मेट के साथ सुशांत सिन्हा का जुड़ाव और उनकी स्थापित दर्शक स्वीकार्यता उन्हें इस मुकाबले में शुरुआती बढ़त देती नजर आती है।
आने वाले दिनों में दर्शक तय करेंगे कि उन्हें कौन-सी पाठशाला ज्यादा पसंद आती है, लेकिन फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि हिंदी न्यूज का यह नया मुकाबला काफी हद तक सुशांत सिन्हा की नई पारी के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई दे रहा है। प्राइम टाइम में अब डिबेट बनाम डिबेट नहीं, बल्कि ''एक्सप्लेनर'' बनाम 'एक्सप्लेनर'' की जंग होगी, और इस जंग में सबसे ज्यादा नजरें उस चेहरे पर होंगी, जिसने इस फॉर्मेट को सबसे ज्यादा पहचान दिलाई।
हिंदी न्यूज चैनलों के सबसे अहम माने जाने वाले 9 बजे के प्राइम टाइम स्लॉट में एक बार फिर हलचल तेज होती दिखाई दे रही है।
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Vikas Saxena
हिंदी न्यूज चैनलों के सबसे अहम माने जाने वाले 9 बजे के प्राइम टाइम स्लॉट में एक बार फिर हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में एंकरों की अदला-बदली, नए शो की लॉन्चिंग और टाइम स्लॉट में बदलाव ने इस मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
दर्शकों की नजरें अब 8:30 बजे से 9 बजे के बीच होने वाली उस प्रतिस्पर्धा पर टिकी हैं, जहां देश के दो चर्चित पत्रकार- रजत शर्मा और सुशांत सिन्हा अपने-अपने चैनलों के साथ नए अंदाज में मैदान में उतर रहे हैं।
इंडिया टीवी के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा का लोकप्रिय शो ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ का टाइम स्लॉच बदल दिया गया है, जोकि 15 जून से यानी आज रात 9 बजे की बजाय 8:30 बजे प्रसारित होगा। चैनल ने इसे अपनी प्राइम टाइम रणनीति को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया है।
वहीं, न्यूज18 इंडिया ने अपने प्राइम टाइम लाइनअप को मजबूत करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिन्हा के साथ नए फ्लैगशिप शो ‘देश की पाठशाला’ (Desh Ki Pathshala) की शुरुआत की है। यह शो 16 जून से रोजाना रात 8:50 बजे प्रसारित होगा। चैनल का दावा है कि यह पारंपरिक डिबेट फॉर्मेट से अलग डेटा, रिसर्च और विश्लेषण आधारित एक्सप्लेनर शो होगा, जो खबरों को सिर्फ बताएगा नहीं बल्कि समझाएगा भी।
मीडिया जगत के जानकारों का मानना है कि यह बदलाव केवल टाइम स्लॉट का फेरबदल नहीं है, बल्कि दर्शकों को आकर्षित करने की एक बड़ी रणनीतिक लड़ाई है। एक तरफ रजत शर्मा का शो वर्षों से हिंदी न्यूज के सबसे चर्चित प्राइम टाइम कार्यक्रमों में शामिल रहा है, वहीं दूसरी ओर सुशांत सिन्हा अपने विश्लेषणात्मक अंदाज और डिजिटल दर्शकों के बीच मजबूत पकड़ के लिए जाने जाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अब दोनों कार्यक्रम लगभग एक ही समयावधि में दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश करेंगे। ऐसे में 8:30 से 9 बजे का स्लॉट हिंदी न्यूज चैनलों के लिए नया रणक्षेत्र बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि दर्शक किस फॉर्मेट को ज्यादा पसंद करते हैं- रजत शर्मा का स्थापित और भरोसेमंद विश्लेषण या सुशांत सिन्हा का नया एक्सप्लेनर मॉडल।
फिलहाल इतना तय है कि हिंदी न्यूज का प्राइम टाइम एक बार फिर गर्म हो चुका है और टीआरपी की जंग में नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं।
टाइम्स नेटवर्क ने जानी-मानी पत्रकार रुबिका लियाकत की नियुक्ति का आधिकारिक ऐलान कर दिया है।
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Samachar4media Bureau
टाइम्स नेटवर्क ने जानी-मानी पत्रकार रुबिका लियाकत की नियुक्ति का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। उन्हें हिंदी न्यूज चैनल 'टाइम्स नाउ नवभारत' में सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके साथ ही वह नेटवर्क में वाइस प्रेजिडेंट (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) की अतिरिक्त भूमिका भी निभाएंगी। वह नोएडा स्थित नेटवर्क के कार्यालय से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगी।
रुबिका लियाकत के पास ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म, राजनीतिक रिपोर्टिंग, प्राइम-टाइम एंकरिंग और न्यूजरूम नेतृत्व का 19 वर्षों से अधिक का समृद्ध अनुभव है। पत्रकारिता जगत में उन्होंने अपनी मजबूत और प्रभावशाली पहचान बनाई है।
'टाइम्स नाउ नवभारत' से जुड़ने से पहले रुबिका लियाकत 'नेटवर्क18 इंडिया' में कंसल्टिंग एडिटर और प्राइम-टाइम एंकर के रूप में कार्यरत थीं, जहां उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों और विशेष कवरेज का नेतृत्व किया।
अपने लंबे पत्रकारिता करियर के दौरान उन्होंने देश के कई प्रमुख समाचार संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। इनमें एबीपी न्यूज, ज़ी न्यूज, न्यूज24, भारत24 और लाइव इंडिया जैसे बड़े मीडिया संस्थान शामिल हैं।
टाइम्स नेटवर्क में उनकी यह नई पारी हिंदी समाचार प्रसारण क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। उनके व्यापक अनुभव और संपादकीय नेतृत्व से टाइम्स नाउ नवभारत को अपनी कंटेंट रणनीति और दर्शकों के साथ जुड़ाव को और मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
जी मीडिया (Zee Media) ने 13 जून 2026 को आयोजित असाधारण आम बैठक में श्वेता गोपालन को कंपनी की स्वतंत्र महिला निदेशक के रूप में पुनर्नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
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Vikas Saxena
जी मीडिया (Zee Media) ने 13 जून 2026 को आयोजित असाधारण आम बैठक (Extra Ordinary General Meeting - EGM) में श्वेता गोपालन को कंपनी की स्वतंत्र महिला निदेशक के रूप में पुनर्नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
यह बैठक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) और अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यमों (OAVM) के जरिए आयोजित की गई थी। शेयरधारकों की मंजूरी के बाद श्वेता गोपालन का दूसरा लगातार पांच वर्षीय कार्यकाल 1 अगस्त 2026 से शुरू होकर 31 जुलाई 2031 तक रहेगा।
कंपनी ने सेबी (लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) रेगुलेशंस, 2015 के रेगुलेशन 30 के तहत यह जानकारी स्टॉक एक्सचेंज को दी।
कंपनी ने बताया कि 18 मई 2026 को हुई बोर्ड बैठक में निदेशक मंडल ने श्वेता गोपालन से प्राप्त पुष्टि के आधार पर यह भी नोट किया था कि उन्हें भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) या किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा निदेशक पद संभालने से प्रतिबंधित नहीं किया गया है।
श्वेता गोपालन को कंपनी के स्वतंत्र निदेशक के रूप में दूसरे कार्यकाल के लिए पुनर्नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति 1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2031 तक पांच वर्षों के लिए प्रभावी रहेगी। इस पुनर्नियुक्ति को 13 जून 2026 को आयोजित EGM में शेयरधारकों ने मंजूरी प्रदान की।
श्वेता गोपालन का दूसरा लगातार पांच वर्षीय कार्यकाल 1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2031 तक रहेगा। इस दौरान वे रोटेशन के आधार पर सेवानिवृत्त होने के लिए उत्तरदायी नहीं होंगी।
श्वेता गोपालन ने अन्ना यूनिवर्सिटी से इंडस्ट्रियल बायोटेक्नोलॉजी में बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी (B.Tech) की डिग्री हासिल की है। इसके अलावा उन्होंने सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम पूरा किया है और अमेरिका के केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट से मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (MBA) की डिग्री प्राप्त की है। उनके पास FITCH से क्वांटिटेटिव फाइनेंस में सर्टिफिकेशन भी है।
श्वेता गोपालन ने अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत वर्ष 2010 में अमेरिका स्थित Johns Hopkins Medicine International के साथ की थी। इसके बाद उन्होंने 2011-2012 के दौरान सिंगापुर की Parkway Health में और 2012-2013 के दौरान Noble Group, Singapore में कार्य किया।
बाद में वर्ष 2015 से 2016 के बीच उन्होंने अमेरिका में Tata Consultancy Services (TCS) में बिजनेस एनालिस्ट के रूप में अपनी सेवाएं दीं।