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भारत को सही ठहरा गए कनाडा के PM: अखिलेश शर्मा
कार्नी का ये भाषण भारत की दूरदर्शिता की तस्दीक करता है। हमने रणनीतिक स्वायत्तता अपनाने और ऐसे ढोंगी ढाँचों पर भरोसा न करने का जो रास्ता चुना था वह आज सही साबित हो रहा है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने मंगलवार को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम' में 'नए वर्ल्ड ऑर्डर' पर एक भाषण दिया और इस बात पर ज़ोर दिया कि कनाडा जैसे मिडिल पावर वाले देश आपसी सहयोग से लाभ उठा सकते हैं। मार्क कार्नी का दावोस में दिया भाषण वायरल हो रहा है। लोगों का कहना है कि पहली बार पश्चिम के किसी नेता ने इतना कड़वा सच कहा है।
इस बीच वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने भी अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स से एक पोस्ट कर अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने लिखा, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का डावोस में दिया गया भाषण चर्चा में है। यह अलग बात है कि उनका यह भाषण भारत के स्टैंड को एकदम सही साबित कर गया है।
भारत सालों से कहता आ रहा है कि यह जो कथित "नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था" की बात की जाती है, वो असल में पश्चिमी ताकतों का मुखौटा भर है और इसमें विशेष रूप से आतंकवाद के मामलों में दोहरा रवैया साफ़ दिखता है। भारत का मानना रहा है कि ये नियम सबके लिए एक जैसे नहीं लागू होते।
जब बात शक्तिशाली देशों की आती है, तो वे सुविधानुसार इन्हें तोड़-मरोड़ लेते हैं, लेकिन दूसरों से पूरे नियम मानने की उम्मीद करते हैं। आतंकवाद इसका सबसे बड़ा सबूत है। पिछले 40 साल से ज़्यादा वक़्त से भारत कनाडा में बसे खालिस्तानी अलगाववादियों की तरफ इशारा करता रहा है। भारत ने जिन्हें आतंकवादी घोषित किया, बार-बार जिनके प्रत्यर्पण की माँग की कनाडा और अमेरिका ने "अभिव्यक्ति की आज़ादी" या "मानवाधिकार" का हवाला देकर उन आतंकवादियों का प्रत्यर्पण नकार दिया।
इसी कथित "नियम-आधारित" ढील ने भारत-विरोधी तत्वों को सुरक्षित ठिकाना दिया और वैश्विक आतंकवादरोधी समझौतों को कमज़ोर किया। अब मज़ेदार बात ये है कि ख़ुद मार्क कार्नी, जो कभी पश्चिमी सिस्टम के अंदरूनी खिलाड़ी थे और आज कनाडा के प्रधानमंत्री हैं, उसी व्यवस्था के टूटने पर अफ़सोस जता रहे हैं।
अमेरिका अब टैरिफ़, प्रतिबंध और सप्लाई-चेन को हथियार बनाकर अपने ही सहयोगियों, कनाडा और यूरोप, को भी निशाना बना रहा है। कार्नी ने इसे "विच्छेद या रप्चर" कहा है और माना है कि सबसे ताकतवर ख़ुद को नियमों से छूट दे देते हैं, और नियमों का पालन शक्ति के हिसाब से होता है।
यह पूरी कहानी पश्चिमी देशों के दोहरे चरित्र को बेनकाब करती है। जब भारत आतंकवाद की बात करता था, तब "नियम" याद दिलाए जाते थे और हमारी चिंताओं को नज़रअंदाज़ किया जाता था। लेकिन अब जब अमेरिका ने उसी व्यवस्था को तोड़कर उन्हें "सज़ा" देनी शुरू की, तो वही लोग रोने लगे। कार्नी का ये भाषण भारत की दूरदर्शिता की तस्दीक करता है। हमने रणनीतिक स्वायत्तता अपनाने, मल्टी अलाइनमेंट करने और ऐसे ढोंगी ढाँचों पर भरोसा न करने का जो रास्ता चुना था वह आज सही साबित हो रहा है।
— Akhilesh Sharma (@akhileshsharma1) January 21, 2026
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