भारत में एफएम रेडियो दशकों तक मनोरंजन, खबर और जागरूकता का एक भरोसेमंद माध्यम रहा है। हालांकि डिजिटल तकनीकों और इंटरनेट-आधारित ऑडियो की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता के बीच एफएम रेडियो एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। 2026 में स्थितियों का मूल्यांकन करने के लिए इसके वर्तमान डेटा, विज्ञापन बाजार, श्रोता व्यवहार और संभावित भविष्य को समझना जरूरी है।
वर्तमान परिदृश्य: आंकड़े व रुझान
भारत में 30 जून 2025 तक 32 निजी एफएम रेडियो ऑपरेटरों द्वारा 113 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो चैनल संचालित किए जा रहे थे। 30 सितंबर 2025 को खत्म होने वाली तिमाही के दौरान, मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में आईटीए सॉफ्टवेयर एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के 'सिंगल एफएम' रेडियो स्टेशन का संचालन बंद हो गया है। अब, सितंबर 2025 तक, 113 शहरों में 387 निजी एफएम रेडियो चैनल कार्यरत हैं, जिनका संचालन 31 निजी एफएम रेडियो ऑपरेटरों द्वारा किया जा रहा है। वहीं, 2025 तक, देश में 548 कम्युनिटी रेडियो स्टेशन चालू हैं। यह आंकड़ें दर्शाते हैं कि एफएम रेडियो का भौगोलिक कवरेज अभी भी व्यापक बना हुआ है, हालांकि पिछले कुछ वर्षों में नई लाइसेंसिंग और विस्तार की दर अपेक्षाकृत मध्यम रही है।
ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू यानी विज्ञापन आय भी एक महत्वपूर्ण संकेतक है। TRAI के अनुसार, 30 सितंबर 2025 को खत्म होने वाली तिमाही के दौरान FM रेडियो ऑपरेटरों ने 387 प्राइवेट एफएम रेडियो चैनलों से 399.96 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व बताया, जबकि पिछली तिमाही यानी 30 जून 2025 को 388 प्राइवेट एफएम रेडियो चैनलों से 383.14 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व आया था। इससे पता चलता है कि विज्ञापन-आधारित आय में उतार-चढ़ाव मौजूद है, जो दर्शाता है कि रेडियो को राजस्व मॉडल में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
वर्ष 2024-25 के लिए कुछ रिपोर्ट्स में रेडियो विज्ञापन का बाजार हिस्सा लगभग 2.3% तक बताया गया है और कुल विज्ञापन बाजार में इसका योगदान सीमित रहने का संकेत मिलता है। यह निराशाजनक नहीं है, लेकिन दर्शाता है कि डिजिटल विज्ञापन बाजार की तुलना में एफएम रेडियो की हिस्सेदारी छोटा है।
इसके अलावा, डिजिटल ऑडियो फॉर्मैट जैसे पॉडकास्ट और स्ट्रीमिंग सर्विसेज तेजी से बढ़ रहे हैं। एक शोध के अनुसार, डिजिटल ऑडियो उपभोक्ता 524 मिलियन तक पहुंच रहे हैं, जबकि एफएम रेडियो श्रोता लगभग 260 मिलियन तक सीमित हैं, जिससे पता चलता है कि श्रोता ध्यान अब डिजिटल दिशाओं की ओर अधिक आकर्षित हो रहा है।
श्रोता व्यवहार में बदलाव
भारत में इंटरनेट यूजर की संख्या लगातार बढ़ रही है; अनुमान है कि 2025 तक यह संख्या 90 करोड़ से अधिक हो जाएगी। स्मार्टफोन और डेटा की सस्ते दरों के कारण लोग ऑन-डिमांड कंटेंट जैसे यूट्यूब, Spotify, JioSaavn आदि पर स्थानांतरित हो रहे हैं। राजनीतिक विज्ञापन, लोकल कॉन्टेंट और खास समय के कार्यक्रमों को छोड़कर, एफएम रेडियो के नियमित श्रोता युवा वर्ग में घट रहा है और वे अधिक व्यक्तिगत, चुनिंदा ऑडियो कंटेंट चाहते हैं।
कार उपयोग के दौरान रेडियो अभी भी लोकप्रिय है, खासकर यदि श्रोता ड्राइविंग करते समय म्यूजिक, संवाद और स्थानीय जानकारी सुनना चाहते हैं। हालांकि कुछ यूजर ऑनलाइन विकल्पों को अधिक सुविधाजनक मानते हैं क्योंकि वे नियंत्रित प्लेलिस्ट, बिना विज्ञापन या कस्टम कंटेंट पसंद करते हैं।
एफएम रेडियो के सामने प्रमुख चुनौतियां
(a) विज्ञापन राजस्व और आर्थिक दबाव
एफएम रेडियो की प्रमुख आय विज्ञापन से आती है, लेकिन जैसे-जैसे विज्ञापनदाता डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर रुख कर रहे हैं, एफएम रेडियो के लिए राजस्व बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। डिजिटल माध्यम डेटा-ड्रिवन विज्ञापन, टार्गेटिंग और मापने योग्य परिणाम प्रदान करते हैं, जिससे ब्रांड्स उन्हें प्राथमिकता देने लगे हैं।
कुछ बड़े नेटवर्क्स जैसे TV Today Network ने अपने एफएम रेडियो व्यवसाय को बंद करने या बेचना पसंद किया क्योंकि यह आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रहा। इस तरह की स्ट्रेटेजिक री-ऑलोकेशन से साफ संकेत मिलता है कि कुछ क्षेत्रीय और राष्ट्रीय रेडियो ऑपरेटर वित्तीय रूप से दबाव में हैं।
(b) डिजिटल संक्रमण और नई तकनीक
डिजिटल रेडियो या DRM (Digital Radio Mondiale) जैसी तकनीकें अधिक क्षमता और बेहतर ऑडियो गुणवत्ता प्रदान करती हैं, लेकिन इनका रोल-आउट धीमा है। इसकी वजह है सस्ते डिजिटल रिसीवर्स की कमी और लाइसेंसिंग, रॉयल्टी जैसे कॉस्ट फैक्टर, जो नए निवेश के लिए बाधा बन रहे हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रेडियो स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन ऑडियो की कमी-सी कमी नहीं है, लेकिन नियंत्रण, कंटेंट अधिकार और राजस्व विभाजन जैसे मुद्दे अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। TRAI ने इस संदर्भ में सुझाव दिया है कि ऑनलाइन स्ट्रीमिंग से होने वाली आय को कुल राजस्व में शामिल किया जाए, ताकि इसकी आर्थिक आकृतियों को बेहतर प्रतिबिंबित किया जा सके।
(c) कंटेंट प्रासंगिकता और श्रोता जुड़ाव
आज के समय में रेडियो को सिर्फ गानों के प्लेलिस्ट तक सीमित रहने से आगे निकलकर लोकल कंटेंट, लाइव शो, श्रोता सहभागिता, सामाजिक संदेश और सूचना प्रसारण जैसे पहलुओं को अपनाना होगा। पारंपरिक ढांचे, बिना समाचार की अनुमति जैसी बाधाओं के कारण एफएम रेडियो कुछ क्षेत्रों में पिछड़ सकता है। सरकार ने कुछ स्थितियों में समाचार ब्रॉडकास्टिंग की अनुमति दी है, लेकिन यह लागू होने के बाद ही संभावित प्रभाव पैदा करेगा।
2026 का परिदृश्य: अवसर और खतरे
(a) ग्रामीण और स्थानीय बाजार में मजबूती
भारत में ग्रामीण और छोटे शहरों में इंटरनेट पहुंच अभी भी शहरी क्षेत्रों जितनी व्यापक नहीं है। यहां एफएम रेडियो का सिग्नल और पहुंच अनिवार्य सूचना स्रोत बना हुआ है, खासकर खेती, मौसम, स्थानीय खबर और सरकारी योजनाओं के प्रसारण के लिए। इस लोकल कनेक्टिविटी के कारण रेडियो गांव-गाँव तक मजबूत बना रहेगा।
(b) कंटेंट में विविधीकरण
2026 तक रेडियो नेटवर्क केवल म्यूजिक और विज्ञापनों तक सीमित नहीं रहेंगे। पॉडकास्ट-स्टाइल शो, लोकल इंटरव्यू, ऑन-डिमांड ऑडियो प्रसारण और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग के साथ संयोजन उनके लिए संभावनाएं बढ़ा सकते हैं। कई रेडियो स्टेशन पहले से डिजिटल कंटेंट, सोशल मीडिया इंटीग्रेशन और लाइव लाइव पोडकास्ट शो दे रहे हैं, जिससे रेडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सह-अस्तित्व संभव होता है।
(c) सरकारी नीतियां और फेज-III नीलामी
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने 730 नए एफएम चैनलों की नीलामी के लिए प्रक्रिया जुलाई, 2025 से शुरू की। हालांकि नए एफएम रेडियो चैनलों की नीलामी की ये प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जुलाई 2025 में इस नीलामी की औपचारिक शुरुआत की थी, जिसमें डीबी कॉर्प और एचटी मीडिया सहित कुल 19 कंपनियां भाग ले रही हैं। इस विस्तार योजना के तहत देश के 234 नए शहरों में निजी एफएम रेडियो की पहुंच बढ़ाई जा रही है, जिससे न सिर्फ स्थानीय रेडियो नेटवर्क को मजबूती मिलेगी बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर रोजगार और निवेश के नए अवसर भी पैदा होंगे। हालांकि, अब तक यह प्रक्रिया प्रतिस्पर्धी रहने के बावजूद इसके अंतिम परिणाम यानी किस कंपनी को कौन-से चैनल आवंटित किए गए, सार्वजनिक रूप से जारी नहीं किए गए हैं।
इस नीलामी प्रक्रिया की नींव अगस्त 2024 में पड़ी थी, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एफएम रेडियो के इस बड़े विस्तार को मंजूरी दी। इसके बाद अक्टूबर 2024 में इच्छुक कंपनियों से आवेदन आमंत्रित किए गए। नीलामी को अधिक व्यावहारिक और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए नियमों में भी कुछ बदलाव किए गए, जिनमें प्रत्येक बोली दौर की अवधि को 30 मिनट से बढ़ाकर 60 मिनट करना शामिल है, ताकि बोलीदाताओं को बेहतर निर्णय लेने का समय मिल सके। इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने अहम भूमिका निभाई और नए चैनलों के लिए आरक्षित मूल्य को लेकर अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपीं।
इस विस्तार का मुख्य उद्देश्य उन छोटे और मझोले शहरों तक निजी एफएम रेडियो की पहुंच सुनिश्चित करना है, जो अब तक इस माध्यम से वंचित रहे हैं। सरकार और उद्योग दोनों को उम्मीद है कि इससे स्थानीय भाषा और संस्कृति आधारित कंटेंट को बढ़ावा मिलेगा, स्थानीय विज्ञापन बाजार को गति मिलेगी और रेडियो के माध्यम से जमीनी स्तर पर संचार और रोजगार के अवसर पैदा होंगे। फिलहाल, चूंकि नीलामी प्रक्रिया चल रही है, इसलिए उद्योग की नजर इसके अंतिम नतीजों और उनके वास्तविक प्रभाव पर टिकी हुई है।
2026 में एफएम रेडियो का भविष्य
2026 में भारत में एफएम रेडियो का भविष्य मिश्रित तस्वीर पेश करता दिखाई देगा। एक ओर यह माध्यम ग्रामीण इलाकों और वाहन-चालित श्रोताओं के बीच अपनी मजबूती बनाए रखेगा, जहां रेडियो आज भी सहज, सुलभ और भरोसेमंद साथी माना जाता है। दूसरी ओर, विज्ञापन बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण एफएम रेडियो के राजस्व पर दबाव बना रहेगा, क्योंकि ब्रांड्स तेजी से डिजिटल और डेटा-आधारित प्लेटफॉर्म्स की ओर झुक रहे हैं। इसके साथ ही डिजिटल संक्रमण और श्रोताओं की बदलती प्राथमिकताओं ने रेडियो के पारंपरिक प्रोग्रामिंग मॉडल को चुनौती दी है। ऐसे माहौल में कंटेंट में कुछ नयापन, स्थानीय जुड़ाव और नए फॉर्मेट अपनाना ही वह रास्ता होगा, जिसके जरिए एफएम रेडियो 2026 में खुद को प्रासंगिक और प्रभावी बनाए रख सकेगा।
एफएम रेडियो न तो समाप्त होगा और न ही अपने पुराने स्वरूप में स्थिर रहेगा। वह एक हाइब्रिड मॉडल की ओर बढ़ेगा, जिसमें एयरवेव, डिजिटल स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और लोकल फोकस मिलकर उसकी पहचान बनाएंगे। इसके लिए जरूरी है कि रेडियो इंडस्ट्री नियमों, कमाई के तरीकों और श्रोताओं की बदलती जरूरतों के मुताबिक खुद को बदले। तभी एफएम रेडियो 2026 में ही नहीं, बल्कि उसके बाद भी भारतीय ऑडियो दुनिया में अपनी मजबूत मौजूदगी बनाए रख सकेगा।