2026 का प्रिंट मीडिया परिदृश्य: विज्ञापन, लागत और डिजिटल युग की जंग

भारत में प्रिंट मीडिया की स्थिति वैश्विक ट्रेंड से थोड़ा अलग दिख रही है, जहां यह अभी भी स्थिरता और कुछ हद तक विकास की ओर अग्रसर है।

Vikas Saxena by
Published - Wednesday, 07 January, 2026
Last Modified:
Wednesday, 07 January, 2026
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2026 में प्रिंट मीडिया की स्थिति वैश्विक और घरेलू दोनों स्तरों पर परिवर्तनशील है। वैश्विक रूप से पारंपरिक समाचार पत्रों की गिरती रुझान की बात हो या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दबदबे का सामना, यह इंडस्ट्री एक संवेदनशील संक्रमण काल से गुजर रही है। इसके बावजूद भारत में प्रिंट मीडिया की स्थिति वैश्विक ट्रेंड से थोड़ा अलग दिख रही है, जहां यह अभी भी स्थिरता और कुछ हद तक विकास की ओर अग्रसर है। आइए एक नजर डालते हैं विषय-वार वर्तमान तथ्यों और हाल के आंकड़ों के आधार पर प्रिंट मीडिया की स्थिति पर-

प्रिंट मीडिया का वैश्विक परिदृश्य

वैश्विक स्तर पर प्रिंट समाचार पत्र और पत्रिकाओं का मार्केट आज पूरी तरह समाप्त नहीं हो रहा, लेकिन यह एक मंदी की ओर बढ़ता हुआ सेक्टर है। उदाहरण के लिए, Statista के आंकड़ों के अनुसार 2025 में वैश्विक प्रिंट समाचारपत्र एवं मैगजीन का राजस्व लगभग USD 108.38 बिलियन रहने का अनुमान है, और 2025‑2030 के बीच इसका CAGR लगभग ‑3.05 % रहने की संभावना है, जिससे 2030 तक यह मार्केट लगभग USD 92.85 बिलियन तक गिर सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राजस्व में समग्र गिरावट जारी रहेगी, न कि बड़ी वृद्धि। 

इसी तरह, IBISWorld की रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल न्यूजपेपर पब्लिशिंग इंडस्ट्री का राजस्व पिछले पांच वर्षों में CAGR ‑3.8 % की दर से घटा है, और आगे भी इस गिरावट की प्रवृत्ति जारी रहने की संभावना है, मुख्यतः प्रिंट पाठकों और विज्ञापनदारों के डिजिटल प्लेटफॉर्मों की ओर शिफ्ट होने के कारण।  

दूसरी ओर, कुछ मार्केट रिसर्च (जैसे Mordor Intelligence) थोड़ा अलग परिप्रेक्ष्य देता है कि विश्व के समाचार पत्र उद्योग का आकार 2025 में लगभग USD 82.17 बिलियन था और 2030 तक इसे लगभग USD 89.85 बिलियन तक बढ़ने का अनुमान है, जिसका मतलब है कि कुल मार्केट वैल्यू कुछ हद तक स्थिर या मामूली वृद्धि दिखा सकता है, लेकिन यह वृद्धि मुख्यतः डिजिटल और प्रीमियम मॉडल के जोड़ से है, न कि केवल पारंपरिक प्रिंट से। 

इन आंकड़ों से वास्तविक और व्यापक निष्कर्ष यह है कि वैश्विक प्रिंट मीडिया उद्योग प्रिंट सर्कुलेशन और विज्ञापन राजस्व दोनों में दबाव का सामना कर रहा है, और डिजिटल उपभोग तथा ऑनलाइन विज्ञापन प्लेटफॉर्म्स की ओर शिफ्टिंग की वजह से पारंपरिक राजस्व संरचना कमजोर हो रही है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इंडस्ट्री पूरी तरह समाप्त होने वाली है बल्कि वह समायोजन और संक्रमण के दौर से गुजर रही है, जिसमें डिजिटल और प्रिंट का मिश्रण, सस्क्रिप्शन मॉडल और नए राजस्व स्रोत शामिल हैं।

भारत में प्रिंट मीडिया का वर्तमान परिदृश्य

भारत में प्रिंट मीडिया का हाल कुछ हद तक मजबूत और स्थिर दिख रहा है, जो दुनिया के रुझान से अलग है। WARC की रिपोर्ट के अनुसार भारत न्यूज ब्रैंड पर विज्ञापन खर्च में 6% सालाना वृद्धि दर्ज कर रहा है, जबकि विश्व स्तर पर न्यूज ब्रैंड विज्ञापन खर्च गिरने की प्रवृत्ति में है। 

प्रिंट समाचार पत्रों की प्रतियां (सरकारी आंकड़ों के अनुसार) 2026 तक 139 मिलियन प्रतियों तक पहुंचने की संभावना रखती हैं, जो भारतीय बाजार को चीन के आगे दुनिया का सबसे बड़ा प्रिंट संस्करण पाठक बाज़ार बनाती है।  

प्रिंट मीडिया में विज्ञापन राजस्व की स्थिति

2026 के लिए भारत का विज्ञापन बाजार बढ़ने की उम्मीद में है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुल विज्ञापन राजस्व लगभग ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है, जिसमें प्रिंट विज्ञापन लगभग ₹17,090 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है- लगभग 4.5% की वृद्धि के साथ।  

इसका मतलब है कि भले ही डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ रहे हैं, प्रिंट अभी भी वित्तीय रूप से एक मजबूत आधार बना हुआ है। विशेष रूप से बड़े शहरों और राज्य स्तरीय अखबारों के लिए विज्ञापन राजस्व एक महत्वपूर्ण आय का स्रोत है। छोटे शहरों और क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों में विज्ञापन की पकड़ धीरे‑धीरे बढ़ रही है, जो इंडस्ट्री के लिए संतुलित विकास का संकेत देती है।

इसके अलावा, विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार द्वारा हाल ही में विज्ञापन दरों में की गई बढ़ोतरी ने प्रिंट मीडिया के लिए राजस्व स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद की है। हालांकि प्रिंट में वृद्धि डिजिटल की तुलना में धीमी है, फिर भी यह माध्यम अभी भी पाठकों और विज्ञापनदाताओं के लिए विश्वसनीय विकल्प बना हुआ है, और आने वाले वर्षों में इसका महत्व कम नहीं होने वाला।

सरकार की नीतियां और समर्थन

हालांकि प्रिंट विज्ञापन दरों में 26% की वृद्धि कई महीने पहले की गई थी, इसके प्रभाव अब तक प्रिंट मीडिया पर दिखने लगे हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने डीएवीपी/सीबीसी के माध्यम से सरकारी विज्ञापनों के लिए प्रिंट मीडिया की दरें ₹47.40 से ₹59.68 प्रति वर्ग सेमी तक बढ़ाई थीं। इस कदम का उद्देश्य बढ़ती उत्पादन लागत, विशेषकर न्यूजप्रिंट और मुद्रण खर्च के दबाव को कम करना था। साथ ही यह छोटे और मध्यम स्तर के प्रकाशकों को वित्तीय राहत और स्थानीय पत्रकारिता की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करने के लिए भी लिया गया था। हालांकि इंडस्ट्री बॉडीज का मानना है कि यह सुधार अपेक्षाकृत देर से आया और पर्याप्त नहीं है, क्योंकि विभागीय बजट की वृद्धि दर इसके अनुरूप नहीं रही, जिससे वास्तविक राजस्व वृद्धि केवल 10‑15% के आसपास ही रही।

नीति निर्माण के व्यापक पहलू पर सरकार ने केवल विज्ञापन दर बढ़ाने तक ही सीमित नहीं रहकर अन्य मीडिया क्षेत्रों की भी समीक्षा शुरू की है। रेडियो, टीवी और DTH जैसे पारंपरिक मीडिया पर भी नीतिगत सुधारों की संभावना तलाशी जा रही है ताकि डिजिटलीकरण के बढ़ते दबाव के बीच प्रिंट मीडिया की स्थिरता बनी रह सके। विशेषज्ञों का कहना है कि इस दिशा में और ठोस कदम, जैसे मुद्रण इनपुट पर कर राहत, सब्सिडी और डिस्ट्रीब्यूशन ढांचे में सुधार, आने वाले वर्षों में प्रिंट मीडिया को अधिक मजबूत बना सकते हैं।

प्रिंट मीडिया पर बढ़ती लागत का दबाव

प्रिंट की लागत का सबसे बड़ा हिस्सा न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमत, इंपोर्ट शुल्क, वेतन वृद्धि, मुद्रास्फीति और डिस्ट्रीब्यूशन खर्च (फ्यूल, लॉजिस्टिक्स) से आता है। इन इनपुट लागतों में लगातार वृद्धि ने छोटे और बड़े दोनों प्रकार के प्रकाशकों पर गंभीर दबाव डाला है, जिससे राजस्व और लाभ की मार्जिनें कम हुई हैं। खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों तक पेपर पहुंचाने में लगने वाला खर्च तेजी से बढ़ा है, जिससे डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क चलाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

सरकार द्वारा हाल ही में विज्ञापन दरों में वृद्धि का बड़ा आधार इसी निरंतर लागत वृद्धि की चुनौती को मानना है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन लागतों का संतुलित समाधान नहीं मिला तो प्रिंट मीडिया के लिए लंबे समय तक टिकना मुश्किल हो सकता है। साथ ही, कच्चे माल की कीमतों और मुद्रास्फीति के चलते अखबार की खुद की बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी होना भी अनिवार्य हो गई है, जिससे पाठकों पर भी आर्थिक दबाव बढ़ता है।

पाठक व्यवहार और डिजिटल प्रतिस्पर्धा

भारत में पाठकों की खबरें पढ़ने की आदतें तेजी से बदल रही हैं और इसका सीधा असर प्रिंट मीडिया पर दिखाई दे रहा है। डिजिटल मीडिया का दबदबा लगातार बढ़ रहा है और आज डिजिटल विज्ञापन कुल विज्ञापन बाजार का लगभग आधा हिस्सा अपने कब्जे में ले चुका है। इससे विज्ञापनदाताओं का झुकाव तेजी से ऑनलाइन और मोबाइल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ा है, जिसका दबाव पारंपरिक प्रिंट मीडिया पर साफ नजर आता है।

युवा वर्ग की प्राथमिकताएं भी इस बदलाव को और तेज कर रही हैं। नई पीढ़ी के पाठक खबरों के लिए मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल न्यूज ऐप्स पर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं। त्वरित अपडेट, वीडियो कंटेंट और इंटरएक्टिव फॉर्मेट की वजह से युवा पाठकों को प्रिंट की तुलना में डिजिटल प्लेटफॉर्म ज्यादा आकर्षक लगते हैं, जिससे प्रिंट मीडिया की प्रतिस्पर्धा और कठिन होती जा रही है।

हालांकि इसके बावजूद प्रिंट मीडिया की लोकप्रियता और विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में आज भी अखबार को भरोसेमंद सूचना का स्रोत माना जाता है। नियमित रूप से अखबार पढ़ने की आदत, स्थानीय खबरों की गहराई और तथ्यात्मक प्रस्तुति के कारण प्रिंट मीडिया अब भी बड़ी संख्या में पाठकों के दैनिक जीवन का अहम हिस्सा बना हुआ है।

डिस्ट्रीब्यूशन की चुनौतियां

भारत के विविध भौगोलिक और लॉजिस्टिक नेटवर्क की वजह से छोटे मीडिया हाउसों के लिए डिस्ट्रीब्यूशन लागत और नेटवर्क विस्तार, खासकर पूर्वोत्तर, हिमालयी और दूरदराज ग्रामीण इलाकों में, एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। ईंधन की बढ़ती कीमतें, परिवहन खर्च और स्थानीय एजेंटों की कमी के कारण अखबार समय पर और किफायती तरीके से पहुंचाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।

इसके साथ ही शहरी इलाकों में भी डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल पर दबाव बढ़ा है, जहां हाकर कमीशन और रिटर्न कॉपी का बोझ प्रकाशकों की लागत को और बढ़ा देता है। इन आवागमन और डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़ी खर्चीली व्यवस्थाओं को संतुलित करना आज हर प्रिंट प्रकाशक के लिए एक गंभीर आर्थिक चुनौती बन चुका है।

2026 में स्थिति का निष्कर्ष

2026 में भारत का प्रिंट मीडिया विज्ञापन के मोर्चे पर सीमित लेकिन सकारात्मक स्थिरता की स्थिति में दिखाई देता है। सरकारी विज्ञापन दरों में हालिया बढ़ोतरी के चलते विज्ञापन राजस्व में हल्की वृद्धि के संकेत मिल रहे हैं, जिससे खासकर छोटे और मध्यम अखबारों को कुछ राहत मिली है। हालांकि यह वृद्धि इतनी मजबूत नहीं है कि उसे तेज ग्रोथ कहा जा सके, लेकिन मौजूदा हालात में यह प्रिंट मीडिया के लिए एक सहारा जरूर बनी हुई है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते दबाव और ऑनलाइन न्यूज कंजम्पशन में तेजी के बावजूद प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्थानीय पकड़ बनी हुई है। छोटे शहरों और कस्बों में पाठकों की वफादारी अभी भी मजबूत है, जहां अखबार न केवल सूचना का स्रोत है बल्कि भरोसे और आदत का हिस्सा भी है। यही कारण है कि पूरी तरह डिजिटल शिफ्ट के बावजूद प्रिंट मीडिया अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

इसके साथ ही लागत से जुड़ी चुनौतियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं। कागज, प्रिंटिंग, लॉजिस्टिक्स और मानव संसाधन की बढ़ती लागत के सामने विज्ञापन से होने वाली आय अकेले पर्याप्त साबित नहीं हो रही है। यही वजह है कि कई प्रकाशक मार्जिन के दबाव में काम कर रहे हैं और खर्च नियंत्रण उनकी प्राथमिकता बनता जा रहा है।

सरकार की ओर से नीति समर्थन और दरों में सुधार की दिशा में कदम जरूर उठाए गए हैं, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए अभी और ठोस नीतियों की जरूरत है। कागज और प्रिंटिंग इनपुट्स पर कर राहत, टैक्स प्रोत्साहन, डिस्ट्रीब्यूशन और मुद्रण से जुड़ी सब्सिडी जैसे उपाय अगर लागू होते हैं, तो प्रिंट मीडिया आने वाले वर्षों में कहीं ज्यादा मजबूती के साथ अपनी भूमिका निभा सकेगा।

वित्तीय दबाव में संतुलन की कोशिश

भारत के बड़े प्रिंट मीडिया समूहों के हालिया वित्तीय नतीजे यह साफ दिखाते हैं कि भले ही कुल रेवेन्यू ग्रोथ सीमित रही हो, लेकिन कॉस्ट कंट्रोल और मल्टी-प्लेटफॉर्म स्ट्रैटेजी के जरिए कई कंपनियां खुद को संतुलित रख पाने में सफल रही हैं। अखबार कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा अभी भी विज्ञापन से आता है, लेकिन प्रिंट विज्ञापनों की ग्रोथ धीमी होने के कारण मैनेजमेंट का फोकस अब ऑपरेशनल एफिशिएंसी, पेज ऑप्टिमाइजेशन और एड रेट्स के बेहतर इस्तेमाल पर है। न्यूजप्रिंट, ट्रांसपोर्टेशन और मैनपावर की बढ़ती लागत ने मार्जिन पर दबाव डाला है, हालांकि सरकारी विज्ञापन दरों में हालिया बढ़ोतरी से कुछ राहत जरूर मिली है।

डिजिटल अब सपोर्ट नहीं, मुख्य रणनीति

डिजिटल के मोर्चे पर लगभग सभी बड़े अखबार समूह अब इसे सहायक प्लेटफॉर्म नहीं बल्कि कोर बिजनेस मानकर आगे बढ़ रहे हैं। वेबसाइट, मोबाइल ऐप, ई-पेपर और सोशल मीडिया के जरिए रीडर एंगेजमेंट बढ़ाने पर खास जोर है। कई मीडिया हाउस डिजिटल सब्सक्रिप्शन, प्रीमियम कंटेंट और ब्रैंडेड कंटेंट जैसे मॉडल अपना रहे हैं, ताकि केवल विज्ञापन पर निर्भरता कम की जा सके। हालांकि डिजिटल से होने वाली कमाई अभी प्रिंट की भरपाई नहीं कर पा रही, लेकिन भविष्य की ग्रोथ का रास्ता यहीं से निकलता दिख रहा है।

हाइब्रिड मॉडल पर टिका भविष्य

आने वाले समय को देखते हुए प्रिंट मीडिया कंपनियां हाइब्रिड मॉडल को सबसे व्यावहारिक रास्ता मान रही हैं, जहां प्रिंट अपनी विश्वसनीयता और स्थानीय पकड़ बनाए रखेगा और डिजिटल उसकी पहुंच और विस्तार बढ़ाएगा। छोटे शहरों और क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों के लिए यह रणनीति खास तौर पर फायदेमंद मानी जा रही है। इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि 2026 का साल प्रिंट मीडिया के लिए केवल अस्तित्व बचाने का नहीं बल्कि खुद को नए रूप में ढालने का साल होगा, जहां कंटेंट की गुणवत्ता, टेक्नोलॉजी और बिजनेस मॉडल का संतुलन सबसे अहम साबित होगा।

भविष्य की दिशा

आने वाले समय में प्रिंट मीडिया के लिए सबसे बड़ी जरूरत समेकन और डिजिटल एकीकरण की होगी। प्रिंट को अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ मजबूती से जोड़ना अनिवार्य हो गया है ताकि बदलती पाठक आदतों और विज्ञापन बाजार के बीच न तो पाठक छूटें और न ही विज्ञापनदाता। डिजिटल और प्रिंट के साझा मॉडल ही आगे चलकर इसकी प्रासंगिकता और पहुंच को बनाए रख सकते हैं।

इसी क्रम में सब्सक्रिप्शन-आधारित मॉडल की भूमिका भी बढ़ती जा रही है। कई बड़े प्रकाशक पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं, जहां पाठकों को प्रीमियम कंटेंट के साथ डिजिटल और प्रिंट का संयुक्त सब्सक्रिप्शन ऑफर किया जा रहा है। इससे एक तरफ नियमित और स्थिर आमदनी का रास्ता खुलता है और दूसरी तरफ गंभीर पाठकों से सीधा जुड़ाव भी मजबूत होता है।

स्थानीय सामग्री पर फोकस प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत बना रहेगा। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में आज भी स्थानीय खबरों की मांग मजबूत है, जहां डिजिटल माध्यमों की पहुंच और भरोसा दोनों सीमित हैं। यही स्थानीय पत्रकारिता भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता का जीवंत आधार बनी हुई है, जिसे प्रिंट मीडिया आने वाले समय में और मजबूती दे सकता है।

सरकारी नीतियों की भूमिका भी इस भविष्य को तय करने में अहम होगी। विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी एक जरूरी कदम जरूर है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए केवल यही पर्याप्त नहीं है। GST में राहत, कागज के आयात शुल्क में सुधार और डिस्ट्रीब्यूशन ढांचे को सशक्त करने जैसे ठोस नीतिगत फैसले ही प्रिंट मीडिया को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं और इसे आने वाले वर्षों की चुनौतियों के लिए तैयार कर सकते हैं।

2026 में प्रिंट मीडिया पूरी तरह से समाप्त होने वाला नहीं है, बल्कि बदलते आर्थिक, तकनीकी और उपभोक्ता व्यवहार के बीच एक मजबूती से संघर्षरत लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में अपनी भूमिका बना रहा है। विश्लेषण यह संकेत देता है कि अगर यह डिजिटल और पारंपरिक रणनीतियों का सही मिश्रण अपनाता है और नीतिगत समर्थन के और कदम मिलते हैं, तो 2026 और उसके बाद यह अपने पाठकों और विज्ञापनदाताओं दोनों की आवश्यकताओं के अनुरूप खुद को ढाल सकता है। 

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अमर उजाला के मैनेजिंग डायरेक्टर तन्मय माहेश्वरी बने INS के डिप्टी प्रेजिडेंट

तन्मय माहेश्वरी INS में पहले भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। इससे पहले वह 2025-26 के कार्यकाल में INS के वाइस प्रेजिडेंट की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 07 September, 2026
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Monday, 07 September, 2026
Tanmay Maheshwari

अमर उजाला लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर तन्मय माहेश्वरी को इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) का डिप्टी प्रेजिडेंट चुना गया है। इससे पहले वह 2025-26 के कार्यकाल में INS के वाइस प्रेजिडेंट की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

माहेश्वरी INS में पहले भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। 2025-26 में वाइस प्रेजिडेंट बनने से पहले वह कई कार्यकाल तक सोसाइटी के ऑनरेरी ट्रेजरर रहे हैं।

तन्मय माहेश्वरी वर्ष 2022 से अमर उजाला लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। वह प्रिंट और डिजिटल, दोनों प्लेटफॉर्म पर मीडिया ग्रुप के विकास और बदलाव से जुड़े रहे हैं।

मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े अन्य संगठनों में भी उनकी भूमिका रही है। वह वर्तमान में इंटरनेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन (INMA) के साउथ एशिया डिवीजन बोर्ड में भी शामिल हैं।

तन्मय माहेश्वरी का डिप्टी प्रेजिडेंट के पद पर चयन ऐसे समय में हुआ है, जब न्यूजपेपर इंडस्ट्री में पाठकों की बदलती आदतों, डिजिटल बदलाव, ऑडियंस मेजरमेंट, विज्ञापन से जुड़े बदलाव और बढ़ती इनपुट लागत जैसी कई चुनौतियां बनी हुई हैं।

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BAG Convergence से अलग हुए तनवीर आजम

समाचार4मीडिया से बातचीत में तनवीर आजम ने बताया कि उन्होंने कुछ समय पहले इस संस्थान को बाय बोल दिया है। वह जल्द ही नई पारी की शुरुआत करेंगे और फिर इस बारे में अपडेट देंगे।

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Published - Monday, 07 September, 2026
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Monday, 07 September, 2026
Tanweer Azam

सीनियर मीडिया प्रोफेशनल तनवीर आजम ने BAG Convergence को अलविदा कह दिया है। उन्होंने इस संस्थान में पिछले साल दिसंबर में जॉइन किया था और चीफ कंटेंट ऑफिसर (CCO) व इवेंट्स हेड के पद पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे।

अपनी इस भूमिका में वे न्यूज24 (News24) और E24 समेत संगठन के सभी न्यूज और एंटरटेनमेंट ब्रैंड्स और डिजिटल-फर्स्ट प्लेटफॉर्म्स पर काम कर रहे थे। समाचार4मीडिया से बातचीत में तनवीर आजम ने बताया कि उन्होंने कुछ समय पहले इस संस्थान को बाय बोल दिया है। वह जल्द ही नई पारी की शुरुआत करेंगे और फिर इस बारे में अपडेट देंगे।

 तनवीर ने 2006 में अपने करियर की शुरुआत की थी और उन्हें पत्रकारिता, डिजिटल कंटेंट लीडरशिप और ब्रैंड डेवलपमेंट में 20 साल का अनुभव है। वे Zee Media, India.com, DNA और Microsoft जैसी बड़ी कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं। इन संस्थानों में उन्होंने डिजिटल ग्रोथ, कंटेंट इनोवेशन और ऑडियंस एंगेजमेंट बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी एडिटोरियल विशेषज्ञता इंफोटेनमेंट, लाइफस्टाइल, टेक, एंटरटेनमेंट और फीचर स्टोरीटेलिंग तक फैली हुई है, जिसमें SEO, डेटा-ड्रिवन स्ट्रैटेजी और यूजर-सेंट्रिक कंटेंट पर खास ध्यान शामिल है।

Zee Media और India.com में तनवीर ने इंफोटेनमेंट और एंटरटेनमेंट वर्टिकल्स को मजबूत बनाया और ऐसी टीमों का नेतृत्व किया, जिनके कंटेंट ने लगातार उच्च ट्रैफिक और बेहतर इम्पैक्ट हासिल किया। DNA में उन्होंने अंग्रेजी और हिंदी- दोनों प्लेटफॉर्म्स को संभाला और तेज-तर्रार डिजिटल न्यूज माहौल के हिसाब से कंटेंट डेप्थ और स्पीड का संतुलन बनाए रखा। माइक्रोसॉफ्ट में उनके अनुभव ने उन्हें कंटेंट थिंकिंग में प्रॉडक्ट और टेक्नोलॉजी का बेहतर नजरिया दिया, जिससे वे प्लेटफॉर्म बिहेवियर, एनालिटिक्स और UX को एडिटोरियल और ब्रैंड स्ट्रैटेजी में जोड़ सके।

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लोकमत मीडिया ग्रुप के करण दर्डा बनेंगे INS के नए प्रेजिडेंट

फिलहाल वह INS में डिप्टी प्रेजिडेंट के पद पर हैं। वह सन्मार्ग के विवेक गुप्ता की जगह लेंगे, जिन्होंने 2025-26 के दौरान INS के प्रेजिडेंट के तौर पर जिम्मेदारी संभाली।

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Published - Monday, 07 September, 2026
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Monday, 07 September, 2026
Karan Darda

लोकमत मीडिया ग्रुप के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर और एडिटोरियल डायरेक्टर करण राजेंद्र दर्डा 2026-27 के कार्यकाल के लिए इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) के प्रेजिडेंट बनेंगे। वह सन्मार्ग के विवेक गुप्ता की जगह लेंगे, जिन्होंने 2025-26 के दौरान INS के प्रेजिडेंट के तौर पर जिम्मेदारी संभाली।

करण दर्डा की नियुक्ति INS की 87वीं वार्षिक आम बैठक (Annual General Meeting) के बाद औपचारिक रूप से होने की उम्मीद है। फिलहाल वह INS में डिप्टी प्रेजिडेंट के पद पर हैं। इससे पहले 2024-25 के दौरान वह सोसाइटी के वाइस प्रेजिडेंट रह चुके हैं। इस तरह INS के नेतृत्व में उनकी जिम्मेदारी लगातार आगे बढ़ी है।

लोकमत में करण दर्डा ऑपरेशंस, सर्कुलेशन, एडिटोरियल स्ट्रैटेजी और मार्केटिंग से जुड़ी पहलों की अवधारणा तैयार करने में सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं। वह प्रिंट रीडरशिप, ऑडियंस मेजरमेंट और अखबारों के प्रति विज्ञापनदाताओं का भरोसा मजबूत करने जैसे मुद्दों पर भी अपनी बात रखते रहे हैं।

करण दर्डा 2026-27 के लिए ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) की काउंसिल ऑफ मैनेजमेंट का भी हिस्सा हैं। प्रमुख इंडस्ट्री संस्थानों में उनकी यह भूमिका प्रिंट मीडिया से जुड़े अहम मुद्दों में उनकी सक्रिय भागीदारी को दर्शाती है।

INS के अध्यक्ष के तौर पर उनका कार्यकाल ऐसे समय में शुरू होगा, जब अखबार इंडस्ट्री बदलती पाठक आदतों, डिजिटल बदलाव, बढ़ती इनपुट लागत और अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर ऑडियंस की विश्वसनीय माप व्यवस्था जैसी चुनौतियों से गुजर रहा है।

बता दें कि इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी देशभर के अखबारों, मैगजीन और पीरियॉडिकल्स का प्रतिनिधित्व करती है और अपने सदस्य प्रकाशनों के कारोबारी हितों को बढ़ावा देने तथा उनकी सुरक्षा के लिए काम करती है। प्रेजिडेंट के तौर पर करण दर्डा प्रकाशकों, विज्ञदाताओं, सरकारी संस्थाओं और अन्य संबंधित पक्षों के साथ प्रिंट मीडिया से जुड़े मुद्दों पर INS की भागीदारी का नेतृत्व करेंगे।

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इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के प्रेजिडेंट के तौर पर विवेक गुप्ता का कार्यकाल पूरा

2025-26 के उनके कार्यकाल के दौरान सरकारी विज्ञापन दरों में 26% बढ़ोतरी, ‘Ink Doesn’t Lie’ अभियान और AI-कॉपीराइट व न्यूजप्रिंट जैसे मुद्दों पर INS ने की पैरवी

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Published - Monday, 07 September, 2026
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Monday, 07 September, 2026
Vivek Gupta

‘सन्मार्ग ग्रुप’ के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर विवेक गुप्ता ने इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) के प्रेजिडेंट के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है। उनके 2025-26 के कार्यकाल में प्रिंट मीडिया से जुड़े कई अहम मुद्दों पर नीति स्तर पर पैरवी, इंडस्ट्री के साथ संवाद और पाठकों व विज्ञापनदाताओं के बीच प्रिंट की विश्वसनीयता को मजबूत करने की दिशा में कई पहल हुईं।

विवेक गुप्ता को सोसाइटी की 86वीं वार्षिक आम बैठक में 2025-26 के लिए प्रेजिडेंट चुना गया था। उन्होंने ‘मातृभूमि’ के एमवी श्रेयम्स कुमार का स्थान लिया था। गुप्ता ने INS की 87वीं वार्षिक आम बैठक में अपने कार्यकाल का समापन संबोधन दिया।

सरकारी विज्ञापन दरों में 26% की बढ़ोतरी: विवेक गुप्ता के अपने कार्यकाल के दौरान प्रिंट मीडिया के लिए सरकारी विज्ञापन दरों में 26% की बढ़ोतरी प्रमुख नीतिगत घटनाक्रमों में रही। यह फैसला 9वीं रेट स्ट्रक्चर कमेटी की सिफारिशों के आधार पर लिया गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नवंबर 2025 में विज्ञापन दरों में संशोधन की घोषणा की थी। INS और अन्य समाचार पत्र संगठनों की करीब चार साल की लगातार मांग और सरकार के साथ बातचीत के बाद यह फैसला आया।

इसके तहत एक लाख प्रतियों के सर्कुलेशन वाले दैनिक समाचार पत्रों के लिए ब्लैक एंड व्हाइट विज्ञापन की दर 47.40 रुपये से बढ़ाकर 59.68 रुपये प्रति वर्ग सेंटीमीटर कर दी गई। इसके साथ ही कलर विज्ञापनों और प्राथमिकता वाली जगहों के लिए प्रीमियम दरों को भी मंजूरी दी गई।

विवेक गुप्ता ने इस फैसले को प्रकाशकों के सामने मौजूद आर्थिक दबावों की स्वीकारोक्ति बताया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि बढ़ी हुई दरों के साथ सरकारी विज्ञापन का पर्याप्त आवंटन भी जरूरी है। गुप्ता ने कहा, ‘बढ़ी हुई दरों के साथ पर्याप्त विज्ञापन आवंटन भी होना चाहिए। प्रिंट के लिए सरकार का विज्ञापन बजट संशोधित दरों और प्रिंट की पहुंच के निरंतर महत्व को पर्याप्त रूप से दर्शाने वाला होना चाहिए।’

‘Ink Doesn’t Lie’ अभियान की शुरुआत: विवेक गुप्ता के अध्यक्षीय कार्यकाल की एक अन्य प्रमुख पहल INS का देशव्यापी ‘Ink Doesn’t Lie’ अभियान रहा। जुलाई 2026 में INS के सदस्य प्रकाशनों के बीच शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य ऐसे समय में प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता को सामने लाना था, जब गलत सूचनाओं, हेरफेर किए गए कंटेंट और AI से तैयार सामग्री के कारण पाठकों के लिए तथ्य और मनगढ़ंत जानकारी के बीच अंतर करना मुश्किल होता जा रहा है। अभियान के तहत 27 जुलाई 2026 को INS के सदस्य प्रकाशनों में साझा विज्ञापन प्रकाशित किया गया था।

गुप्ता के मुताबिक, यह अभियान केवल प्रिंट मीडिया को बढ़ावा देने की कोशिश नहीं था, बल्कि पाठकों, विज्ञापनदाताओं और नीति-निर्माताओं को उस संपादकीय जिम्मेदारी की याद दिलाने का प्रयास था, जो प्रकाशित शब्दों के पीछे होती है। उन्होंने कहा, ‘गलत सूचनाओं और कृत्रिम तरीके से तैयार सामग्री के दौर में छपा हुआ शब्द जवाबदेही का प्रतीक है। ‘Ink Doesn’t Lie’ यानी स्याही झूठ नहीं बोलती, क्योंकि छपे हुए शब्द के पीछे जिम्मेदारी और जवाबदेही होती है।’ यह अभियान INS की सालभर चलने वाली उस व्यापक पहल का हिस्सा था, जिसके जरिए प्रिंट मीडिया की प्रभावशीलता, विश्वसनीयता, ब्रांड सुरक्षा और विज्ञापन के मंच के तौर पर उसकी उपयोगिता को सामने लाने की कोशिश की गई।

AI और कॉपीराइट पर भी उठाई आवाज: गुप्ता के कार्यकाल के दौरान जनरेटिव AI और कॉपीराइट को लेकर भी महत्वपूर्ण नीतिगत बहस हुई। सोसाइटी की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, INS ने फरवरी 2026 में डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) को जनरेटिव AI और कॉपीराइट पर उसके वर्किंग पेपर के जवाब में विस्तृत सुझाव दिए।

सोसाइटी ने ऐसे कानूनी ढांचे की वकालत की, जिसमें तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के साथ प्रकाशकों और मूल कंटेंट तैयार करने वालों के बौद्धिक संपदा अधिकारों की भी सुरक्षा हो। दिसंबर 2025 में INS ने कॉपीराइट उल्लंघन और मजबूत एंटी-पायरेसी व्यवस्था को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भी सुझाव दिए थे।

गुप्ता ने माना कि AI का इस्तेमाल अनुवाद, ट्रांसक्रिप्शन, डेटा विश्लेषण और प्रकाशन से जुड़े कामकाज को बेहतर बनाने में किया जा सकता है, लेकिन उनका कहना था कि तकनीक रिपोर्टिंग, संपादकीय निर्णय और जवाबदेही की जगह नहीं ले सकती।

न्यूजप्रिंट पर 5% कस्टम ड्यूटी हटाने की मांग: न्यूजप्रिंट की लागत भी INS के एजेंडे में एक प्रमुख मुद्दा बनी रही। सोसाइटी ने आयातित न्यूजप्रिंट पर 5% कस्टम ड्यूटी हटाने की अपनी मांग जारी रखी। इसके साथ ही घरेलू उत्पादन की सीमाओं, गुणवत्ता से जुड़ी कमियों और विशेष ग्रेड के न्यूजप्रिंट की सीमित उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई।

गुप्ता ने कहा कि प्रिंट मीडिया के लिए न्यूजप्रिंट सिर्फ कोई सामान्य औद्योगिक कच्चा माल नहीं है, बल्कि यह सबसे जरूरी इनपुट में से एक है। उन्होंने सरकार से एक बार फिर इस ड्यूटी को हटाने की अपील की। उन्होंने कहा, ‘प्रिंट मीडिया उद्योग के लिए न्यूजप्रिंट सिर्फ कोई दूसरा औद्योगिक कच्चा माल नहीं है। यह सबसे जरूरी इनपुट में से एक है।’

टेक कंपनियों के रेवेन्यू हिस्से पर चिंता: डिजिटल मोर्चे पर गुप्ता ने समाचार संगठनों द्वारा तैयार किए गए कंटेंट से वैश्विक टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म्स द्वारा हासिल किए जाने वाले रेवेन्यू के हिस्से को लेकर चिंता जताई।

गूगल के खिलाफ INS की भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) में शिकायत गुप्ता के अध्यक्ष बनने से पहले की है, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान सोसाइटी ने इस मामले की जांच पर नजर बनाए रखी। INS की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इस जांच के नतीजे का इंतजार है। गुप्ता ने कहा, ‘टेक्नोलॉजी कंपनियां सूचनाओं को एक जगह इकट्ठा कर उनका वितरण कर सकती हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सूचनाओं को ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन पत्रकारिता प्रकाशनों द्वारा तैयार की जाती है।’ उन्होंने पाठकों से अपील की कि वे समाचार सीधे प्रकाशकों की वेबसाइटों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए पढ़ें।

इंडस्ट्री के साथ संवाद पर भी रहा जोर: गुप्ता के अध्यक्षीय कार्यकाल में INS ने कोलकाता, दिल्ली, मुंबई और पुणे में प्रकाशनों तथा विज्ञापन एजेंसियों के साथ इंटरैक्टिव सेशन आयोजित किए। वित्तीय वर्ष के दौरान INS की एग्जीक्यूटिव कमेटी की सात बैठकें हुईं, जबकि एडवरटाइजिंग कमेटी की छह बैठकें आयोजित की गईं। 31 मार्च 2026 तक INS की सदस्यता 801 प्रकाशनों की थी।

अपने समापन संबोधन में गुप्ता ने जुलाई-दिसंबर 2025 के ABC आंकड़ों का भी उल्लेख किया। इन आंकड़ों के मुताबिक INS के सदस्य प्रकाशनों का सर्कुलेशन करीब 2.91 करोड़ प्रतियां रहा, जिसमें समान आधार पर करीब 2% की वृद्धि दर्ज की गई। उन्होंने इन आंकड़ों के जरिए बदलते मीडिया उपभोग के दौर में प्रिंट मीडिया की मजबूती को रेखांकित किया।

‘हम आज भी प्रासंगिक हैं’: अपना कार्यकाल पूरा करते हुए विवेक गुप्ता ने प्रकाशकों से अपनी ताकत को कम करके न आंकने की अपील की। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री ने आर्थिक दबाव और कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना किया है, लेकिन इसके बावजूद प्रिंट मीडिया आज भी प्रासंगिक है।

गुप्ता ने कहा, ‘हमने आर्थिक दबाव और कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना किया है। और फिर भी हम आज यहां हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम आज भी प्रासंगिक हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘भारतीय प्रिंट मीडिया का भविष्य हमारे पीछे नहीं है, बल्कि अभी हमारे आगे है। आइए, हम सब मिलकर उस भविष्य की ओर बढ़ें और एकजुट रहें।’

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‘BAG Convergence’ में इस बड़े पद से अलग हुए अरुण कुमार चौबे

समाचार4मीडिया से बातचीत में अरुण कुमार चौबे ने अपने इस्तीफे की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्होंने निजी कारणों से यह फैसला लिया।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 07 September, 2026
Last Modified:
Monday, 07 September, 2026
Arun Kumar Chaubey BAG

सीनियर मीडिया प्रोफेशनल अरुण कुमार चौबे ने ‘BAG Convergence’ (न्यूज24 डिजिटल) में अपनी पारी को विराम दे दिया है। उन्होंने पिछले साल इस संस्थान में एडिटर (Synergy and Brand Solutions) के पद पर जॉइन किया था। अपनी इस भूमिका में अरुण कुमार चौबे समूह के डिजिटल और टीवी चैनलों के बीच बेहतर सिनर्जी स्थापित करने, कंटेंट को मल्टीप्लेटफॉर्म्स पर मजबूत करने और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ब्रैंडेड कंटेंट को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में अहम भूमिका निभा रहे थे।

समाचार4मीडिया से बातचीत में अरुण कुमार चौबे ने अपने इस्तीफे की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्होंने कुछ दिनों पहले निजी कारणों से यह फैसला लिया। अरुण कुमार चौबे का कहना था कि उनकी कुछ संस्थानों से बातचीत चल रही है, वह जल्द ही नई पारी शुरू करेंगे और तब उसके बारे में बताएंगे।

अरुण कुमार चौबे को प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का 25 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने मीडिया में अपने करियर की शुरुआत लखनऊ में ‘द पायनियर’ के साथ बतौर ट्रेनी जर्नलिस्ट की थी और बाद में हिन्दुस्तान टाइम्स (रांची एडिशन) से जुड़ गए। डिजिटल मीडिया की दुनिया में उनका सफर वर्ष 2004 में zeenews.com के साथ शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने दैनिक जागरण, इंडिया टुडे ग्रुप, और डेक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स के बिजनेस वर्टिकल फाइनेंशियल क्रॉनिकल जैसे कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया।

वर्ष 2017 में अरुण कुमार चौबे ने एक बार फिर ‘जी मीडिया’ समूह को जॉइन किया और zeebiz.com में बतौर एसोसिएट एडिटर अपनी नई पारी की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने zeenews.com, mylord.in (एक लीगल वेबसाइट) और india.com जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया।

अरुण कुमार चौबे ने India.com के यूट्यूब पेज के लिए Pol.Punch और Foodshaala जैसे नए आईपी (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) कॉन्सेप्ट भी विकसित किए। यहां अपनी पारी को विराम देने से पहले वह Digital 2C यूनिट के प्रमुख थे, जहां उन्होंने जी मीडिया के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय टीवी चैनलों तथा समूह की वेबसाइटों के बीच तालमेल (synergy) को और मजबूत किया।

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अमृतराज ब्रदर्स: दुनिया के मंच पर भारत का नाम रोशन करने वाला परिवार

यह कहानी 1960 के दशक से शुरू होती है। मद्रास, जिसे आज चेन्नई के नाम से जाना जाता है, के एक मध्यमवर्गीय रोमन कैथोलिक परिवार के तीन भाइयों ने टेनिस खेलना शुरू किया।

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Published - Monday, 07 September, 2026
Last Modified:
Monday, 07 September, 2026
Amritraj Brothers

भुवन लाल ।।

नई दिल्ली में 23 जून 2026 की शाम राष्ट्रपति भवन का गणतंत्र मंडप एक खास समारोह का गवाह बना। यहां आयोजित अलंकरण समारोह में देश की राजनीतिक और न्यायिक हस्तियों के साथ वरिष्ठ अधिकारी, रक्षा क्षेत्र के लोग और कई जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं। इसी दौरान जब भारत के महान टेनिस खिलाड़ियों में शुमार विजय अमृतराज का नाम पुकारा गया तो वह हाथ जोड़कर लाल कालीन से होते हुए मंच की ओर बढ़े। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया। समारोह में मौजूद लोगों ने तालियों के साथ भारत के इस महान टेनिस खिलाड़ी का स्वागत किया।

विजय अमृतराज की उपलब्धियों पर काफी कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन उनकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है। यह कहानी एक ऐसे युवा की है, जिसने उस दौर में दुनिया के बड़े-बड़े टेनिस खिलाड़ियों के सामने खड़े होने का सपना देखा, जब भारत में टेनिस के लिए न तो बहुत ज्यादा सुविधाएं थीं और न ही कोई मजबूत व्यवस्था। उनके पास था तो सिर्फ हुनर, आगे बढ़ने की भूख और यह भरोसा कि वह दुनिया के सबसे बड़े टेनिस मंच पर अपनी जगह बना सकते हैं।

मां ने गैराज से चल रहे कारोबार से जुटाए टेनिस के पैसे

यह कहानी 1960 के दशक से शुरू होती है। मद्रास, जिसे आज चेन्नई के नाम से जाना जाता है, के एक मध्यमवर्गीय रोमन कैथोलिक परिवार के तीन भाइयों ने टेनिस खेलना शुरू किया। उनकी मां मैगी अमृतराज ने गैराज से चलने वाले पैकेजिंग कारोबार से टेनिस की ट्रेनिंग का खर्च उठाया। 

उनके पिता रॉबर्ट रेलवे में काम करते थे। तीनों भाइयों (आनंद, विजय और अशोक अमृतराज) ने आगे चलकर भारत को प्रोफेशनल टेनिस की दुनिया में एक नई पहचान दिलाई। उनके दादा की इच्छा थी कि परिवार का कम से कम एक बेटा विंबलडन खेले। लेकिन उनकी यह इच्छा एक नहीं, बल्कि तीनों भाइयों ने पूरी कर दी। 

तीनों भाई एक ही विंबलडन टूर्नामेंट में खेलने वाले भारत के पहले भाई-बहन नहीं, बल्कि तीन सगे भाइयों का ऐसा परिवार बने, जिन्होंने एक ही संस्करण में हिस्सा लिया और सेंटर कोर्ट पर भी साथ उतरे। तीनों ने जूनियर स्तर पर भी भारत का नाम रोशन किया। सबसे बड़े भाई आनंद ने 1965 से 1967 तक भारत का जूनियर खिताब अपने नाम रखा। इसके बाद विजय ने 1968 से 1970 तक यह परंपरा आगे बढ़ाई। सबसे छोटे भाई अशोक भी भारत के शीर्ष जूनियर चैंपियन बने।

बीमारी से जूझने वाला बच्चा बना दुनिया का स्टार

विजय का बचपन भी आसान नहीं था। एक समय वह बीमार रहने वाले बच्चे थे और उनकी मां अस्पताल में उनके बिस्तर के पास बैठकर उनकी पढ़ाई की चीजें लिखती थीं। लेकिन यही बच्चा आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय टेनिस के बड़े-बड़े खिलाड़ियों को हराने लगा।

जुलाई 1973 में महज 21 साल की उम्र में विजय ने अमेरिका के ब्रेटन वुड्स में वोल्वो इंटरनेशनल खिताब जीतकर टेनिस की दुनिया को चौंका दिया। यह जीत इस बात का बड़ा संकेत थी कि भारत अब विश्व टेनिस के नक्शे पर अपनी जगह बना चुका है। इसके बाद विजय ने अपने दौर के कई दिग्गज खिलाड़ियों को हराया। इनमें ब्योर्न बोर्ग, जिमी कॉनर्स, जॉन मैकेनरो, इवान लेंडल, रॉड लेवर और स्टैन स्मिथ जैसे नाम शामिल थे। उनकी सफलता इतनी चर्चा में रही कि एक पत्रकार ने टेनिस के महान खिलाड़ियों के लिए ABC of Tennis शब्द का इस्तेमाल किया- Amritraj, Borg और Connors। 

विजय ने विंबलडन और यूएस ओपन दोनों में कई बार क्वार्टर फाइनल तक पहुंचकर यह साबित किया कि वह दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों के बीच अपनी जगह बना चुके हैं।

23 साल तक चला शानदार प्रोफेशनल करियर

विजय अमृतराज का प्रोफेशनल करियर 1970 में शुरू हुआ और 1993 में खत्म हुआ। इस दौरान उन्होंने 16 सिंगल्स खिताब जीते। उनका करियर का सर्वोच्च एटीपी सिंगल्स रैंकिंग विश्व नंबर 18 रहा, जो उन्होंने 1980 में हासिल की। वह तीन बार राष्ट्रीय सिंगल्स चैंपियन रहे और दो दशक से ज्यादा समय तक भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने भारत को 1974 और 1987 में डेविस कप फाइनल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

1988 के सियोल ओलंपिक में उन्हें ओलंपिक टॉर्च बियरर के रूप में भी चुना गया। करीब 6 फीट 4 इंच लंबे विजय जब कोर्ट पर उतरते थे तो उनके साथ सिर्फ उनकी अपनी महत्वाकांक्षा नहीं होती थी, बल्कि भारत और विदेशों में बसे लाखों भारतीयों का गर्व भी जुड़ा होता था।

विजय ने एक बार बताया था कि मैच खत्म होने के बाद भारतीय मूल के लोग उन्हें नोट देकर धन्यवाद करते थे। इनमें डॉक्टर और इंजीनियर जैसे प्रोफेशनल भी शामिल थे। जब विजय ने उनसे पूछा कि वे उन्हें धन्यवाद क्यों दे रहे हैं, तो उनका जवाब था कि विजय को खेलते देखने के बाद उनके विदेशी नियोक्ताओं को अपनी कंपनी में एक भारतीय के होने पर गर्व महसूस होता था।

टेनिस के बाद फिल्मों में भी बनाई पहचान

1980 के दशक में विजय ने टेनिस कोर्ट से आगे बढ़कर फिल्मों की दुनिया में भी कदम रखा। उन्होंने जेम्स बॉन्ड की फिल्म Octopussy में MI6 एजेंट की भूमिका निभाई। फिल्म में वह जेम्स बॉन्ड के साथ नजर आए। इसके बाद वह हॉलीवुड से भी जुड़े रहे। आज भी उनकी आवाज दुनिया भर में होने वाली टेनिस कमेंट्री में सुनाई देती है।

आनंद अमृतराज के साथ बनी शानदार जोड़ी

विजय के बड़े भाई आनंद अमृतराज भी अपने आप में एक शानदार टेनिस खिलाड़ी रहे। उन्होंने सिंगल्स में विश्व रैंकिंग में 74वां स्थान हासिल किया। लेकिन उनकी सबसे खास पहचान विजय के साथ बनी डबल्स जोड़ी थी। दोनों भाइयों ने मिलकर आठ डबल्स खिताब जीते और 1976 में विंबलडन के सेमीफाइनल तक पहुंचे।

दोनों भाइयों ने दुनिया के कई दिग्गज खिलाड़ियों का सामना किया और कभी पीछे नहीं हटे। उनकी जोड़ी मेहनत, आत्मविश्वास और मजबूत प्रतिस्पर्धी भावना का उदाहरण बन गई।

1974 में डेविस कप फाइनल से हटना पड़ा

1974 में भारत के पास पहली बार डेविस कप जीतने का बड़ा मौका था। आनंद और विजय अमृतराज के कंधों पर भारत को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जीत दिलाने की जिम्मेदारी थी। लेकिन उस समय दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद यानी अपार्थाइड की आधिकारिक नीति लागू थी। जोहान्सबर्ग के एलिस पार्क में होने वाले मुकाबले के दौरान दक्षिण अफ्रीका ने भारतीय दर्शकों के लिए अलग व्यवस्था की मांग की।

भारत सरकार नस्लभेदी अपार्थाइड व्यवस्था के खिलाफ थी। ऐसे में भारत ने डेविस कप फाइनल का बहिष्कार करने का फैसला किया। यह फैसला खिलाड़ियों के लिए बेहद मुश्किल था, क्योंकि उनके सामने पहली बार भारत को डेविस कप जिताने का मौका था। इसके बावजूद इस सिद्धांत आधारित फैसले की दुनिया भर में सराहना हुई। बाद में आनंद अमृतराज ने भारतीय डेविस कप टीम के गैर-खिलाड़ी कप्तान के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली।

अशोक अमृतराज ने हॉलीवुड में बनाया बड़ा नाम

तीनों भाइयों में सबसे छोटे अशोक अमृतराज ने टेनिस के बाद एक अलग क्षेत्र चुना। 1974 में वह विंबलडन जूनियर फाइनल तक पहुंचे और प्रोफेशनल स्तर पर चार जीत भी दर्ज कीं। लेकिन इसके बाद उन्होंने मनोरंजन की दुनिया में कदम रखा।

अशोक ने हॉलीवुड में Hyde Park Entertainment की स्थापना की। इस कंपनी ने दुनिया के लिए फिल्मों और मनोरंजन परियोजनाओं के विकास, वित्तपोषण और निर्माण का काम किया। उनकी फिल्मों में हॉलीवुड के कई बड़े और ऑस्कर विजेता कलाकार नजर आए। इनमें एंजेलिना जोली, एंटोनियो बैंडेरास, ब्रूस विलिस, केट ब्लैंचेट, डस्टिन हॉफमैन, जेनिफर एनिस्टन, इदरीस एल्बा, रिचर्ड गेयर, रॉबर्ट डी नीरो, सुसान सारंडन और सिल्वेस्टर स्टेलोन जैसे नाम शामिल हैं। 

उनकी चर्चित फिल्मों में Ghost Rider: Spirit of Vengeance में निकोलस केज, Walking Tall में ड्वेन जॉनसन, Premonition में सैंड्रा बुलॉक और स्टीव मार्टिन व क्वीन लतीफा की Bringing Down the House शामिल हैं।इसके अलावा Shopgirl, जिसमें स्टीव मार्टिन और क्लेयर डेन्स थे, और 99 Homes, जिसमें एंड्रयू गारफील्ड और लॉरा डर्न नजर आए, को भी आलोचकों की सराहना मिली। 100 से ज्यादा फिल्मों के बाद अशोक अमृतराज को हॉलीवुड में सबसे सफल भारतीयों में गिना जाता है। उनकी फिल्मों ने कुल मिलाकर 2 अरब डॉलर से ज्यादा का कारोबार किया है। उन्हें इंटरनेशनल एमी से भी सम्मानित किया जा चुका है और गोल्डन ग्लोब्स व कान्स में भी उनकी फिल्मों को पहचान मिली। फ्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें प्रतिष्ठित Chevalier सम्मान से भी नवाजा।

विजय को विंबलडन और इंटरनेशनल टेनिस हॉल ऑफ फेम में मिली जगह

टेनिस से जुड़ाव विजय का आज भी कायम है। वह ऑल इंग्लैंड लॉन टेनिस क्लब, विंबलडन की मानद सदस्यता के लिए सर्वसम्मति से चुने जाने वाले एकमात्र एशियाई हैं। 2024 में वह International Tennis Hall of Fame में Contributor श्रेणी में शामिल होने वाले पहले एशियाई पुरुष बने। यह सम्मान खिलाड़ी, कमेंटेटर, प्रशासक और टेनिस के समर्थक के तौर पर उनके पूरे योगदान की पहचान है। करीब चार दशक से दक्षिणी कैलिफोर्निया में रहने के बावजूद विजय ने अपना भारतीय पासपोर्ट बरकरार रखा है।

तीन भाइयों ने दुनिया में बनाई भारत की पहचान

अमृतराज भाइयों की कहानी सिर्फ खेल और मनोरंजन की सफलता की कहानी नहीं है। तीनों भाइयों ने अलग-अलग क्षेत्रों में भारत का नाम दुनिया तक पहुंचाया। विजय और आनंद ने टेनिस कोर्ट पर भारत का प्रतिनिधित्व किया, जबकि अशोक ने हॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। इसके साथ ही तीनों भाई उस देश से जुड़े रहे, जहां उनका जन्म हुआ था और अब परोपकार के जरिए समाज को वापस देने की कोशिश भी कर रहे हैं।

विजय अपनी सफलता का बड़ा श्रेय अपनी मां मार्गरेट (मैगी) अमृतराज को देते हैं। उन्होंने ही बच्चों को मुश्किल परिस्थितियों से घबराने के बजाय उनका सामना करना सिखाया। अपनी आत्मकथा में विजय ने अपनी मां को याद करते हुए लिखा कि आखिर किस तरह एक महिला में यह भरोसा था कि वह अपने तीन बेटों को ऑल इंग्लैंड क्लब यानी विंबलडन के मैदान तक पहुंचा सकती है।

मद्रास के छोटे से घर से सेंटर कोर्ट और हॉलीवुड तक का सफर

अमृतराज भाइयों की कहानी यह बताती है कि सफलता के लिए हमेशा बड़े संसाधनों या मजबूत पृष्ठभूमि की जरूरत नहीं होती। एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार, एक मां का विश्वास, परिवार का साथ और खुद पर भरोसा भी बड़ी से बड़ी मंजिल तक पहुंचा सकता है।

मद्रास के एक साधारण घर से शुरू हुई यह कहानी विंबलडन के सेंटर कोर्ट से होती हुई हॉलीवुड तक पहुंची। विजय, आनंद और अशोक अमृतराज ने सिर्फ अपने लिए नाम नहीं बनाया, बल्कि दुनिया के सामने भारतीय प्रतिभा की एक अलग तस्वीर पेश की।

इन तीनों भाइयों की जिंदगी से सबसे बड़ी सीख शायद प्रसिद्धि नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, परिवार के मूल्यों, मेहनत और विनम्रता की है। यही वे चीजें हैं, जिन्होंने तीन साधारण भारतीय भाइयों को दुनिया में एक पहचान दी।

(भुवन लाल एक फिल्म निर्माता, उपन्यासकार, लेखक, बॉयोग्राफर और रचनात्मक क्षेत्र में काम करने वाले उद्यमी हैं।)

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Jio के 10 साल: फ्री कॉल से 53.33 करोड़ ग्राहक तक, अब ग्लोबल विस्तार की तैयारी

Jio की शुरुआती सफलता के आंकड़े आज भी काफी बड़े हैं। कंपनी ने सिर्फ 83 दिनों में 5 करोड़ ग्राहक जोड़ लिए थे। इसके बाद छह महीने के भीतर ही ग्राहकों की संख्या दस करोड़ के पार पहुंच गई।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 07 September, 2026
Last Modified:
Monday, 07 September, 2026
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दस साल पहले इसी महीने भारत के टेलीकॉम बाजार में एक ऐसा बदलाव आया, जिसने पूरी इंडस्ट्री को चौंका दिया था। 5 सितंबर 2016 को रिलायंस जियो इन्फोकॉम ने अपनी व्यावसायिक सेवाएं शुरू कीं और ऐसा कदम उठाया, जिसकी उस समय किसी भारतीय टेलीकॉम कंपनी ने कल्पना भी नहीं की थी- वॉयस कॉल बिल्कुल फ्री कर दी गईं।

इसके बाद दूसरी टेलीकॉम कंपनियों को भी अपने प्लान और टैरिफ बदलने पड़े। कॉल और डेटा की कीमतों में तेजी से गिरावट आई। जिस देश में लोग इंटरनेट डेटा बहुत संभालकर इस्तेमाल करते थे, वहां अचानक लोगों के पास इस्तेमाल करने के लिए भरपूर डेटा उपलब्ध हो गया। अब दस साल बाद Jio इस कहानी का अगला अध्याय लिखने की तैयारी में है। इस बार उसका लक्ष्य सिर्फ भारत नहीं, बल्कि दुनियाभर का बाजार है।

83 दिनों में 5 करोड़ ग्राहक

Jio की शुरुआती सफलता के आंकड़े आज भी काफी बड़े हैं। कंपनी ने सिर्फ 83 दिनों में 5 करोड़ ग्राहक जोड़ लिए थे। इसके बाद छह महीने के भीतर ही ग्राहकों की संख्या दस करोड़ के पार पहुंच गई। यह उस समय टेलीकॉम इंडस्ट्री में बहुत तेज रफ्तार मानी गई थी। पिछले दस साल में Jio ने करीब 50 करोड़ नए ग्राहक जोड़े हैं।

कंपनी के मुताबिक, चीन के बाहर Jio दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले कनेक्टिविटी सब्सक्राइबर बेस में शामिल है। Jio ने पिछले दस साल में जितने ग्राहक जोड़े हैं, वह अमेरिका की तीन सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों के मिलाकर जोड़े गए ग्राहकों से भी ज्यादा है। वहीं, यह संख्या भारत में उसके सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी द्वारा जोड़े गए ग्राहकों की करीब 1.3 गुना है।

30 जून 2026 तक Jio के कुल ग्राहकों की संख्या 53.33 करोड़ पहुंच गई थी। कंपनी हर महीने 23 एक्साबाइट से ज्यादा डेटा ट्रैफिक संभाल रही है। इस वजह से Jio दुनिया के सबसे बड़े डेटा ऑपरेटरों में शामिल हो गया है।

2015 में शुरू हुआ था ट्रायल

Jio की शुरुआत अचानक नहीं हुई थी। इसकी कहानी 28 दिसंबर 2015 से जुड़ी है, जब कंपनी ने पहले अपने कर्मचारियों के साथ नेटवर्क का ट्रायल शुरू किया था। इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज के कर्मचारियों और उनके दोस्तों के लिए नेटवर्क का विस्तार किया गया। व्यावसायिक लॉन्च के बाद भी करीब छह महीने तक कंपनी की सेवाएं एक योजना के तहत मुफ्त रहीं। यह Jio की रणनीति का बड़ा हिस्सा था। इससे कंपनी तेजी से बाजार में अपनी जगह बनाने में सफल रही, जबकि दूसरी टेलीकॉम कंपनियां उस समय अपने बढ़ते नुकसान का हिसाब लगा रही थीं।

नवंबर 2019 में रिलायंस जियो को Jio Platforms में शामिल किया गया। यह रिलायंस के व्यापक कॉरपोरेट पुनर्गठन का हिस्सा था और इसी के साथ कंपनी के अगले चरण की नींव तैयार हुई।

अब भारत की टेक्नोलॉजी दुनिया तक पहुंचाने का लक्ष्य

Jio Platforms के मैनेजिंग डायरेक्टर और Reliance Jio के चेयरमैन आकाश अंबानी के मुताबिक, अब कंपनी का अगला लक्ष्य सिर्फ टेलीकॉम तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि Jio अब ऐसी टेक्नोलॉजी तैयार कर रहा है, जिसे भारत से दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है।

दसवीं सालगिरह के मौके पर कर्मचारियों को लिखे पत्र में आकाश अंबानी ने कहा कि Jio टेलीकॉम से काफी आगे बढ़ चुका है। कंपनी कनेक्टिविटी, डिजिटल प्रोडक्ट्स, एंटरप्राइज सॉल्यूशंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे क्षेत्रों में अपनी टेक्नोलॉजी तैयार कर रही है।

अब कंपनी की कोशिश इन टेक्नोलॉजी को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने की है। कंपनी के एक अधिकारी ने शनिवार को कहा कि Jio अब मेड-इन-इंडिया टेक्नोलॉजी स्टैक के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।

भारत में जो किया, क्या दुनिया में भी कर पाएगा Jio?

Jio की मौजूदा रणनीति में एक दिलचस्प समानता दिखाई देती है। दस साल पहले कंपनी ने भारत में यह सोच रखी थी कि देश को सस्ती कनेक्टिविटी के लिए पश्चिमी देशों का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। भारत अपनी टेक्नोलॉजी तैयार कर सकता है और कम कीमत पर लोगों तक पहुंचा सकता है। अब आकाश अंबानी इसी सोच को अगले चरण में ले जाने की बात कर रहे हैं। उनका फोकस भारत को सिर्फ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने वाला देश नहीं, बल्कि दुनिया के लिए टेक्नोलॉजी बनाने वाला देश बनाने पर है।

हालांकि, विदेशों में Jio के लिए यह काम आसान नहीं होगा। टेलीकॉम नेटवर्क को दूसरे देशों में उसी तरह ले जाना आसान नहीं है। अलग-अलग देशों में स्पेक्ट्रम और नियम अलग हैं। इसके अलावा भारत में Jio को रिलायंस की मजबूत वित्तीय क्षमता और 140 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले बड़े बाजार का फायदा मिला, जो दूसरे देशों में उसी रूप में उपलब्ध नहीं होगा।

AI और एंटरप्राइज टेक्नोलॉजी पर ज्यादा जोर

ऐसे में विदेशों में टेलीकॉम नेटवर्क खड़ा करने के बजाय AI और एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर पर फोकस करना Jio के लिए ज्यादा बेहतर रणनीति हो सकती है। डिजिटल प्रोडक्ट्स और क्लाउड जैसी एंटरप्राइज टेक्नोलॉजी को अलग-अलग देशों में पहुंचाना टेलीकॉम टावर और स्पेक्ट्रम लाइसेंस की तुलना में काफी आसान होता है। इसके अलावा भारत का विशाल बाजार Jio को नई टेक्नोलॉजी को बड़े स्तर पर आजमाने का मौका देता है। ऐसे बाजार की बराबरी दुनिया की बहुत कम कंपनियां कर सकती हैं।

दस साल पहले जब Jio ने भारतीय टेलीकॉम बाजार में कदम रखा था, तब कई लोगों को शक था कि कोई नई कंपनी इस पूरे कारोबार की अर्थव्यवस्था को बदल सकती है या नहीं। लेकिन Jio ने ऐसा करके दिखाया। अब सवाल कंपनी की महत्वाकांक्षा पर नहीं, बल्कि भौगोलिक विस्तार पर है। हालांकि, Jio के पिछले दस साल के रिकॉर्ड को देखते हुए आकाश अंबानी को एक बार फिर गलत साबित करने की संभावना को पूरी तरह खारिज करना भी आसान नहीं है।

Jio का पहला दशक भारत को बड़े पैमाने पर जोड़ने के नाम रहा। अब उसका दूसरा दशक उन टेक्नोलॉजी को तैयार करने का हो सकता है, जो आने वाले समय में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाएं।

 

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आजतक को बाय बोलकर नृपेंद्र सिंह ने अब इस दिशा में बढ़ाए कदम

नृपेंद्र सिंह इससे पहले हिंदी न्यूज चैनल ‘आजतक’ (AajTak) में करीब छह साल से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे, जहां से उन्होंने हाल ही में इस्तीफा दे दिया था।

Samachar4media Bureau by
Published - Sunday, 06 September, 2026
Last Modified:
Sunday, 06 September, 2026
Nripendra Singh

टीवी की दुनिया में लंबे समय तक विभिन्न पदों पर अपनी भूमिका निभाने के बाद पत्रकार नृपेंद्र सिंह ने अब डिजिटल मीडिया की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

समाचार4मीडिया के साथ बातचीत में नृपेंद्र सिंह ने बताया कि उन्होंने अब डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘न्यूज पिंच’ (News Pinch) के साथ अपनी नई पारी शुरू की है।   

बता दें कि नृपेंद्र सिंह इससे पहले ‘इंडिया टुडे’ (India Today) में कार्यरत थे। वह इस मीडिया समूह के हिंदी न्यूज चैनल ‘आजतक’ (AajTak) में करीब छह साल से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे, जहां से उन्होंने हाल ही में इस्तीफा दे दिया था।

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए अपने इस सफर के खत्म होने की जानकारी साझा की थी। नृपेंद्र सिंह ने अपनी पोस्ट में 16 दिसंबर 2020 से 4 सितंबर 2026 तक के अपने आजतक के सफर को याद करते हुए लिखा था, ‘आजतक’ में अब तक के लिए इतना ही। बहुत कुछ सीखकर, सीखने के अब नए सफर पर…

मूल रूप से प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले के रहने वाले नृपेंद्र सिंह को मीडिया में काम करने का करीब 19 साल का अनुभव है। पूर्व में वह ‘इंडिया टीवी’, ‘जी न्यूज’, ‘स्टार न्यूज’ और ‘एबीपी न्यूज’ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

नृपेंद्र सिंह ने बताया कि एबीपी न्यूज़ में काम करने के दौरान उन्होंने घंटी बजाओ शो शुरु किया, जिसकी बहुत चर्चा रही। इसके अलावा आजतक में 10तक और खबरदार शो की जिम्मेदारी लगातार उठाई।  उन्हें दो बार बेस्ट हिंदी टीवी प्रोड्यूसर गोल्ड के enba अवॉर्ड के अलावा उनके शो को हर साल बेस्ट शो का अवॉर्ड मिलता रहा।

नृपेंद्र सिंह ने लखनऊ और फैजाबाद से अपनी पढ़ाई पूरी की है। समाचार4मीडिया की ओर से नृपेंद्र सिंह को उनकी नई पारी के लिए ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।  

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एन चंद्रशेखरन के बाद कौन बनेगा टाटा संस का चेयरमैन? सामने आए तीन नाम

टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन का कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होगा। उनके बाद पद संभालने के लिए टी वी नरेंद्रन, सौरभ अग्रवाल और आशीष चौहान के नाम चर्चा में हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 05 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 05 September, 2026
tataceo

टाटा संस (Tata Sons) के अगले चेयरमैन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी ने संभावित उम्मीदवारों की सूची को तीन नामों तक सीमित कर लिया है।

इनमें टाटा स्टील (Tata Steel) के सीईओ और एमडी टी वी नरेंद्रन, टाटा संस के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और ग्रुप सीएफओ (Group CFO) सौरभ अग्रवाल और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange) के एमडी और सीईओ आशीष चौहान शामिल हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, टी वी नरेंद्रन को टाटा ग्रुप (Tata Group) के भीतर से सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। वह लंबे समय से ग्रुप से जुड़े हैं और टाटा स्टील जैसे बड़े कारोबार को संभालने का अनुभव रखते हैं।

सौरभ अग्रवाल भी इस रेस में बताए जा रहे हैं। उनका अनुभव इन्वेस्टमेंट बैंकिंग (Investment Banking), फाइनेंस (Finance) और ग्रुप स्तर पर पूंजी प्रबंधन (Capital Allocation) से जुड़ा है।

वहीं, आशीष चौहान बाहरी उम्मीदवार के तौर पर देखे जा रहे हैं। वह भारतीय वित्तीय बाजार (Financial Markets) के अनुभवी नाम हैं और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की शुरुआत से जुड़े अधिकारियों में रहे हैं। उनके पास कैपिटल मार्केट, टेक्नोलॉजी और संस्थागत प्रबंधन का लंबा अनुभव है।

हालांकि, चेयरमैन पद को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। टाटा संस का बोर्ड और कंपनी में नियंत्रक हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) इस नियुक्ति में अहम भूमिका निभाएंगे।

एन चंद्रशेखरन ने 2017 में टाटा संस के चेयरमैन का पद संभाला था और फिलहाल अपने दूसरे पांच साल के कार्यकाल में हैं। उन्होंने हाल ही में संकेत दिया था कि 20 फरवरी 2027 को कार्यकाल पूरा होने के बाद वह एक और टर्म नहीं लेंगे।

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'ख्याति मल्टीमीडिया' के प्रमोटर यश पटेल ने बेचे 18,000 शेयर, हिस्सेदारी हुई शून्य

ख्याति मल्टीमीडिया एंटरटेनमेंट (Khyati Multimedia Entertainment) के प्रमोटर यश कार्तिकभाई पटेल ने कंपनी के 18,000 इक्विटी शेयर ओपन मार्केट में बेच दिए हैं।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 05 September, 2026
Last Modified:
Saturday, 05 September, 2026
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ख्याति मल्टीमीडिया एंटरटेनमेंट (Khyati Multimedia Entertainment) के प्रमोटर यश कार्तिकभाई पटेल ने कंपनी के 18,000 इक्विटी शेयर ओपन मार्केट में बेच दिए हैं। यह बिक्री 2 सितंबर 2026 को की गई। कंपनी के मुताबिक, यह सौदा ₹3.01 प्रति शेयर के भाव पर हुआ और इसकी कुल कीमत ₹54,180 रही।

इस बिक्री से पहले यश कार्तिकभाई पटेल के पास कंपनी के 18,000 शेयर थे, जो कंपनी की कुल मतदान पूंजी का 0.17% हिस्सा था। 18,000 शेयर बेचने के बाद अब कंपनी में उनकी हिस्सेदारी शून्य हो गई है।

कंपनी ने इस लेनदेन की जानकारी 3 सितंबर 2026 को BSE Limited को दी। यह जानकारी संबंधित नियामकीय नियमों के तहत साझा की गई है।

SEBI के नियमों के तहत दी जानकारी

कंपनी की ओर से दी गई जानकारी SEBI (Substantial Acquisition of Shares and Takeovers) Regulations, 2011 के Regulation 29(2) और SEBI (Prohibition of Insider Trading) Regulations, 2015 के Regulation 7 और Regulation 6 के तहत जारी की गई है।

यश कार्तिकभाई पटेल को कंपनी के प्रमोटर समूह के साथ मिलकर काम करने वाले व्यक्ति (Person Acting in Concert यानी PAC) के तौर पर माना जाता है। वह कंपनी के प्रमोटर और चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक Kartik J Patel के बेटे हैं।

₹54,180 में हुई शेयरों की बिक्री

2 सितंबर को हुए इस लेनदेन में यश कार्तिकभाई पटेल ने कुल 18,000 इक्विटी शेयर बेचे। इन शेयरों की बिक्री ₹3.01 प्रति शेयर के भाव पर हुई। इस तरह लेनदेन की कुल कीमत ₹54,180 रही। शेयर बेचने के बाद अब कंपनी में यश कार्तिकभाई पटेल की कोई हिस्सेदारी नहीं बची है।

कंपनी के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक Kartik J Patel हैं। प्रमोटर समूह के साथ मिलकर काम करने वाले अन्य लोगों में जिग्नाबेन के. पटेल और जसुभाई एम. पटेल शामिल हैं। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस लेनदेन के संबंध में शेयर बेचने वाले व्यक्ति की ओर से डेरिवेटिव कारोबार नहीं किया गया।

 

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