एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने इस पर सवाल किया, तो विजयवर्गीय ने आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया और ‘फोकट सवाल मत पूछो’ जैसा जवाब दे दिया, जिसका वीडियो वायरल हो गया।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मध्यप्रदेश के इंदौर में दूषित पानी से होने वाली मौतों और बीमारी को लेकर भाजपा नेता और नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय मीडिया में विवादित बयान देकर सुर्खियों में आ गए हैं। हालांकि बाद में उन्होंने अपने बयान पर खेद भी प्रकट किया। इस पूरे मामले पर वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स से एक पोस्ट कर कहा कि यह मामला सिर्फ माफ़ी का नहीं है।
उन्होंने लिखा, जिस शहर को लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर बताया जाता है, वहाँ जहरीला पानी पीने से लोगों की मौत पर सवाल उठाना कैलाश विजयवर्गीय को बेवजह का सवाल लगता है। वीडियो सामने आने के बाद उन्होंने माफी तो मांग ली, लेकिन सच्चाई यह है कि कैलाश विजयवर्गीय ऐसे बयान बार-बार देते आए हैं और इसलिए उन्हें ‘सीरियल ऑफेंडर’ कहा जाता है।
उनकी बदज़बानी और गैर-जिम्मेदार सोच के किस्से पहले से ही मशहूर हैं, इसलिए यह मामला सिर्फ माफी का नहीं है। इस पूरे प्रकरण में अनुराग द्वारी ने एक पत्रकार के रूप में अपना धर्म निभाया और यह भी ध्यान देने वाली बात है कि वह उसी एनडीटीवी इंडिया के पत्रकार हैं, जो अब गौतम अडानी समूह के स्वामित्व में है। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे व्यक्ति को न तो भाजपा कोई सख्त सज़ा दे पा रही है और न ही जनता। जनता उन्हें चुनकर भेज देती है और पार्टी मंत्री बना देती है। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
आपको बता दें, इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में जहरीले पानी के कारण अब तक कम से कम 8–10 लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से बीमार हैं, लेकिन जब एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने इस पर सवाल किया, तो विजयवर्गीय ने आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया और ‘फोकट सवाल मत पूछो’ जैसा जवाब दे दिया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
जिस शहर को देश में सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा लगातार मिला हो, वहां जहरीला पानी पीने से लोगों की मौत होने पर सवाल पूछना @KailashOnline को फोकट का सवाल लगता है। वीडियो सार्वजनिक हो गया तो कैलाश विजयवर्गीय ने माफी मांग ली, लेकिन सच यही है कि, कैलाश विजयवर्गीय “Serial Offender” है। इस… pic.twitter.com/fbpYwusAel
— हर्ष वर्धन त्रिपाठी ??Harsh Vardhan Tripathi (@MediaHarshVT) January 1, 2026
मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने 7 मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है, जबकि अन्य रिपोर्ट्स में यह संख्या 13 बताई जा रही है। 149 से अधिक लोग अभी भी अस्पतालों में भर्ती हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं। मौतों के आंकड़ों को लेकर विरोधाभास है। मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने 7 मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है, जबकि अन्य रिपोर्ट्स में यह संख्या 13 बताई जा रही है। 149 से अधिक लोग अभी भी अस्पतालों में भर्ती हैं।
हाल ही में, मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक पत्रकार द्वारा मौतों पर सवाल पूछे जाने पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया, जिसका वीडियो वायरल होने के बाद खूब हंगामा हुआ। इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स से एक पोस्ट की और अपनी राय दी।
उन्होंने लिखा, अब समय आ गया है कि भाजपा के नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए। जब असहज सवाल पूछे जाते हैं, तो कई अनुभवी मंत्री और नेता अपनी भाषा पर नियंत्रण खो देते हैं। यही नहीं, मध्य स्तर के कार्यकर्ताओं में भी घमंड और बदतमीज़ी बढ़ती दिख रही है। सवाल यह है कि क्या यह झुंझलाहट की निशानी है या फिर सत्ता का घमंड? सच्चाई यह है कि अहंकार अंत में नुकसान और पीड़ा ही देता है।
आपको बता दें, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने खुद अस्पताल जाकर मरीजों का हालचाल जाना और मुफ्त इलाज के निर्देश दिए। इलाके के मेयर ने माना कि ड्रेनेज का पानी लीकेज के कारण पीने के पानी की पाइपलाइन में मिल गया था, जिससे डायरिया और उल्टी का प्रकोप फैला।
I feel the time has come for the @BJP4India leadership to do some introspection over the way their experienced ministers and leaders are losing control over their language when confronted with uncomfortable questions. Even the middle level functionaries are become arrogant and… https://t.co/K5SfepWBgq
— PrabhuChawla (@PrabhuChawla) January 1, 2026
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों पर सवाल पूछने वाले पत्रकार से बदसलूकी के बाद मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को माफी मांगनी पड़ी। यह मामला मीडिया की ताकत और जवाबदेही की अहम मिसाल बन गया।
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मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर सवाल पूछना एक पत्रकार के लिए भारी पड़ गया था, लेकिन अब उसी सवाल ने सत्ता को झुकने पर मजबूर कर दिया। मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को आखिरकार सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी है।
सोशल मीडिया पर जारी बयान में उन्होंने स्वीकार किया कि मीडिया के सवाल के जवाब में उनके शब्द अनुचित थे और इसके लिए उन्होंने खेद जताया। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग द्वारी ने इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों और पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने को लेकर सवाल किया।
सवाल के जवाब में मंत्री द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा का वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। पत्रकार संगठनों और आम लोगों ने इस व्यवहार की कड़ी निंदा की। बढ़ते दबाव के बीच मंत्री विजयवर्गीय ने सफाई देते हुए कहा कि वे और उनकी टीम लगातार प्रभावित इलाकों में काम कर रही है और जनता की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि अगर मीडिया सवाल न पूछता, तो क्या जवाबदेही तय होती?यह माफी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता की जीत मानी जा रही है जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती है। यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना ही सबसे बड़ा हथियार है, और जब मीडिया एकजुट होता है, तो सत्ता को जवाब देना ही पड़ता है।
मैं और मेरी टीम पिछले दो दिनों से बिना सोए प्रभावित क्षेत्र में लगातार स्थिति सुधारने में जुटी हुई है। दूषित पानी से मेरे लोग पीड़ित हैं और कुछ हमें छोड़कर चले गए, इस गहरे दु:ख की अवस्था में मीडिया के एक प्रश्न पर मेरे शब्द गलत निकल गए। इसके लिए मैं खेद प्रकट करता हूँ।
— Kailash Vijayvargiya (@KailashOnline) December 31, 2025
लेकिन जब…
इसी वजह से कंपनियों ने डिलीवरी पार्टनर्स के लिए अतिरिक्त इंसेंटिव भी घोषित किये हैं, लेकिन वर्कर्स का कहना है कि यह असली समस्याओं का समाधान नहीं है और सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए।
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देशभर के गिग वर्कर्स यानी फूड और क्यूिक कॉमर्स डिलीवरी कर्मियों ने नए साल की पूर्व संध्या 31 दिसंबर 2025 को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया। गिग वर्कर्स यूनियन का कहना है कि 10 मिनट डिलीवरी मॉडल और भुगतान संरचना उनके लिए असुरक्षित व अनंत लाभकारी नहीं है, इसलिए इसे खत्म किया जाना चाहिए।
इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त ने भी अपनी राय दी। उन्होंने एक्स पर लिखा, मुझे एक भी वजह नहीं दिखती कि किसी चीज़ की डिलीवरी हमें दस मिनट में ही क्यों चाहिए। मैं गिग वर्कर्स की इस मांग का पूरी तरह समर्थन करती हूँ कि इस शर्त को खत्म किया जाए।
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे शहरों में ट्रैफिक और गड्ढों से जूझ रहे डिलीवरी कर्मियों के लिए यह अपेक्षा असुरक्षित है और उनकी जान को खतरे में डालने वाली है। आपको बता दें, पहले हुए हड़तालों में लगभग 40,000 डिलीवरी कर्मियों ने भाग लिया था और इस बार करीब 1.7 लाख से ज़्यादा कर्मचारियों के हड़ताल में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।
इसी वजह से कंपनियों ने डिलीवरी पार्टनर्स के लिए अतिरिक्त इंसेंटिव भी घोषित किये हैं, लेकिन वर्कर्स का कहना है कि यह असली समस्याओं का समाधान नहीं है और सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए।
Can’t see one reason why we need anything delivered to us in ten minutes. Completely support gig workers demand to lose this requisite. Above all, it’s an unsafe ask from delivery staff in our cities dogged as they are by traffic and potholes.
— barkha dutt (@BDUTT) December 31, 2025
भाजपा 137 और शिवसेना 90 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। यह समझौता राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है क्योंकि सीटों के इस बंटवारे से महायुति में भाजपा का प्रभुत्व साफ़ दिख रहा है।
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मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव 2026 की तैयारियाँ अंतिम चरण में हैं और सियासी हलचल तेज़ हो गई है। महाराष्ट्र की बृहन्मुंबई नगर निगम के 227 वार्डों पर चुनाव 15 जनवरी 2026 को होंगे और 16 जनवरी को नतीजे आएँगे, जिससे लंबे समय के बाद शहर में सत्ता की दिशा तय होगी।
इस बीच वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई का कहना है कि महाराष्ट्र जैसा राज्य शायद ही कोई हो, जहाँ गठबंधन इतनी तेजी से बदलते हों। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट कर लिखा, पवार परिवार जैसा उदाहरण भी राजनीति में कम ही मिलता है। लोकसभा और विधानसभा में एनसीपी (शरद पवार गुट) कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के साथ है, जबकि एनसीपी (अजित पवार गुट) एनडीए के साथ खड़ी है।
लेकिन पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के नगर निगम चुनावों में पवार परिवार एक साथ आकर भाजपा और कांग्रेस-शिवसेना दोनों के खिलाफ चुनाव लड़ने जा रहा है। मुंबई में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ रही है, जबकि पुणे में वह शिवसेना (यूबीटी) और मनसे के साथ गठबंधन कर रही है। भाजपा भी कहीं अकेले तो कहीं गठबंधन में चुनाव लड़ रही है। यही राजनीति की पुरानी सच्चाई है।
यहाँ न कोई स्थायी दोस्त होता है, न स्थायी दुश्मन, केवल स्थायी हित होते हैं। आपको बता दें, महायुति के घटक भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना (शिंदे गुट) ने सीट शेयरिंग फाइनल कर ली है—भाजपा 137 और शिवसेना 90 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। यह समझौता राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है क्योंकि सीटों के इस बंटवारे से महायुति में भाजपा का प्रभुत्व साफ़ दिख रहा है।
Political gyaan: No state quite like Maharashtra when it comes to shifting alliances and no one quite like Pawars. NCP (SP) with Cong and Shiv Sena (UBT) in Lok Sabha and Vidhan Sabha while NCP (Ajit Pawar) is with NDA. But in Pune and Pimpri Chinchwad municipal elections,…
— Rajdeep Sardesai (@sardesairajdeep) December 30, 2025
उन्होंने कहा कि सीमा पर कंटीली बाड़ लगाने के लिए राज्य सरकार द्वारा ज़मीन नहीं दी जा रही है, जिसकी वजह से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) अपना कार्य प्रभावी ढंग से नहीं कर पा रहा है।
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घुसपैठ को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में संदिग्ध घुसपैठ की बढ़ती घटनाओं को लेकर ममता बनर्जी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि असम, त्रिपुरा, राजस्थान, पंजाब, कश्मीर और गुजरात की सीमाओं पर घुसपैठ रुक गई है, लेकिन पश्चिम बंगाल में यह क्यों नहीं रुकती है।
इस मुद्दे पर बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद डॉक्टर सुधांशु त्रिवेदी ने एक टीवी डिबेट में अपनी बात कही। उन्होंने कहा, घुसपैठ कोई चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल है। अगर किसी को इसमें समस्या नहीं दिखती, तो उसे यूरोप के हालात देखने चाहिए, जहाँ सुरक्षा कारणों से कई शहरों में इस बार क्रिसमस तक के कार्यक्रम स्थगित करने पड़े।
गृह मंत्री का सीधा सवाल है कि घुसपैठ असम और त्रिपुरा में ही क्यों रुक जाती है, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में क्यों नहीं होती। हकीकत यह है कि घुसपैठिया पहले सीमावर्ती गांव में आता है तो क्या गांव, ग्राम पंचायत, पटवारी, थाना और तहसील में किसी को इसकी भनक तक नहीं लगती?
इसका मतलब साफ है: या तो सरकार सोई हुई और अक्षम है, या फिर वह इतनी घुसपैठिया-परस्त हो चुकी है कि अपनी जीत उन्हीं के सहारे देख रही है। आपको बता दें, गृह मंत्री शाह ने आरोप लगाया कि बंगाल में घुसपैठियों को संरक्षण दिया जा रहा है और यह चुनावी फ़ायदे के लिए किया जा रहा है, जिससे जनसांख्यिकी में बदलाव हो रहा है।
उन्होंने कहा कि सीमा पर कंटीली बाड़ लगाने के लिए राज्य सरकार द्वारा ज़मीन नहीं दी जा रही है, जिसकी वजह से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) अपना कार्य प्रभावी ढंग से नहीं कर पा रहा है।
घुसपैठ कोई चुनावी मुद्दा नहीं है, यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है यदि किसी को इसमें कोई समस्या दिखाई नहीं देती यूरोप के देशों में हालात देखिए, सुरक्षा कारणों से कई शहरों में इस बार क्रिसमस तक स्थगित करना पड़ा।
— Dr. Sudhanshu Trivedi (@SudhanshuTrived) December 30, 2025
गृह मंत्री जी का… pic.twitter.com/y7np4uICPI
आईटी अधिनियम और आईटी नियम, 2021 की याद दिलाकर सरकार ने साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया कंपनियां कानून से ऊपर नहीं हैं। डिजिटल आज़ादी का मतलब डिजिटल अराजकता नहीं हो सकता।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को अश्लील, अभद्र और विशेष रूप से बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ऐसे किसी भी गैरकानूनी कंटेंट को प्लेटफॉर्म पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स से एक पोस्ट की और अपनी राय दी।
उन्होंने लिखा, केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को अश्लील, अभद्र और बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री हटाने की कड़ी चेतावनी दी है और आदेश न मानने पर कानूनी कार्रवाई की बात कही है। यह चेतावनी समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है, क्योंकि आज सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर नग्नता, अश्लीलता और अभद्रता खुलेआम परोसी जा रही है।
जिस कंटेंट को कभी “सॉफ्ट पोर्न” कहा जाता था, वह अब बिना रोक-टोक रील, शॉर्ट्स और पोस्ट के रूप में आम लोग बना और फैला रहे हैं। एल्गोरिदम ऐसे कंटेंट को बढ़ावा दे रहे हैं और प्लेटफॉर्म्स मूकदर्शक बने हुए हैं। ऐसे माहौल में सरकार का सख्त रुख देर से सही, लेकिन बिल्कुल जरूरी कदम है।
आज देश में अधिकांश लोगों, खासकर बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन है और ऐसे कंटेंट का उनके मन पर पड़ने वाला असर गंभीर है। कम उम्र में अश्लील सामग्री देखने से बच्चों की सोच विकृत हो रही है, रिश्तों को देखने का नजरिया बदल रहा है और समाज में असंवेदनशीलता बढ़ रही है।
यह केवल नैतिकता नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक संतुलन और भविष्य की पीढ़ी का सवाल है। आईटी अधिनियम और आईटी नियम, 2021 की याद दिलाकर सरकार ने साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया कंपनियां कानून से ऊपर नहीं हैं। डिजिटल आज़ादी का मतलब डिजिटल अराजकता नहीं हो सकता।
अगर अभी लगाम नहीं लगी, तो आने वाली पीढ़ियां इसका खामियाज़ा भुगतेंगी। आपको बता दें, मंत्रालय के अनुसार, कई मामलों में कंपनियां लापरवाही बरत रही हैं, जो कानून का उल्लंघन है। चेतावनी में यह भी कहा गया है कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया तो सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ आईटी अधिनियम और अन्य आपराधिक कानूनों के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को अश्लील, अभद्र और बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री हटाने की कड़ी चेतावनी दी है. आदेश न मानने पर कानूनी कार्रवाई की बात भी कही गई है. सरकार की ये चेतावनी समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है. आज सोशल मीडिया जिस दिशा में जा रहा है, वहां अभिव्यक्ति की… pic.twitter.com/JMLDNbLY47
— Rana Yashwant (@RanaYashwant1) December 30, 2025
23 दिसंबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी उम्रकैद की सजा को निलंबित करते हुए उन्हें जमानत दी थी, लेकिन इसके खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और इसे चुनौती दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने उन्नाव रेप मामले में दोषी पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाईकोर्ट से मिली जमानत/रिहाई के आदेश पर रोक लगा दी है, ताकि वह जेल से बाहर न निकल सके। इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने अपने सोशल मीडिया हैंडल से एक पोस्ट की और अपनी राय व्यक्त की।
उन्होंने पोस्ट कर लिखा, कुलदीप सिंह सेंगर को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा दी गई रिहाई के आदेश पर जब सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है, तो यह सवाल भी गंभीरता से उठता है कि हमारी उच्च अदालतों की स्थिति आखिर क्या हो गई है। ट्रायल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक, बार-बार दिए जा रहे फैसले सुप्रीम कोर्ट द्वारा पलटे जा रहे हैं।
सेंगर मामले में भारी जनआक्रोश ने शायद शीर्ष अदालत को तुरंत हस्तक्षेप के लिए मजबूर किया, लेकिन असली और बुनियादी सवाल यह है कि आज देशभर के हाईकोर्ट की बेंचों पर आखिर कौन लोग बैठे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट की कभी शानदार साख हुआ करती थी, लेकिन पहले जस्टिस वर्मा प्रकरण, उससे पहले जस्टिस कांत ट्रांसफर मामला और अब यह चर्चित केस, इन सबने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
इस मामले में सिर्फ एक सुनवाई में ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। कई राजनीतिक रूप से संवेदनशील ज़मानत मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला करने के बजाय मामला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया है, जबकि सेंगर केस में उलटा हुआ। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट को रोकना पड़ा।
यह स्थिति न्यायिक प्रणाली पर गहरी चिंता पैदा करती है। आपको बता दें, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि यह मामला कानूनी रूप से गहन विचार का है। इस दौरान कोर्ट ने सेंगर की दूसरी सजा और हिरासत की परिस्थितियों पर भी ध्यान दिया है, और अगली सुनवाई बाद में होगी।
As Supreme Court stays the release order of #KuldeepSinghSengar given by a division bench of High court, isn’t it also time to critically ask what has become of our higher courts? From trial courts to high courts, repeatedly judgements delivered are set aside by the Supreme…
— bhupendra chaubey (@bhupendrachaube) December 29, 2025
इस हमले के बाद पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि एक आरोपी नेपाल भाग गया है और उसकी तलाश जारी है। पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की हत्या हो गई। एंजेल पर 9 दिसंबर 2025 को देहरादून के सेलाकुई इलाके में नस्लीय टिप्पणियों का विरोध करने के बाद हमला किया गया था। इस पूरे मामले पर वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा का कहना है कि हेट क्राइम्स को अलग-थलग घटनाएँ कहकर टालना गलत होगा।
उन्होंने अपने एक्स हैंडल से एक पोस्ट कर लिखा, उत्तराखंड में 24 साल के छात्र की पीट-पीटकर हत्या, तमिलनाडु में 34 साल के महाराष्ट्र के प्रवासी मज़दूर की गला काटकर हत्या ये घटनाएँ समाज के चेहरे पर ऐसे बदनुमा दाग हैं जिन्हें मिटने में सालों लगेंगे। यह सोचना भी मुश्किल था कि साल इतनी शर्मनाक घटनाओं के साथ खत्म होगा।
साल के आख़िरी महीने में ही ऐसी चार घटनाएँ सामने आईं जो बेहद निंदनीय हैं। त्रिपुरा और तिरुवल्लुर में हत्यारे नशे में थे, इसी महीने ओडिशा में दो प्रवासी मज़दूरों की लिंचिंग हुई, और केरल में 31 साल के युवक को बांग्लादेशी बताकर मार दिया गया। इन सभी मामलों में सोशल मीडिया पर रील्स डाली गईं और अपराध करने वालों के दिमाग में नफरत का ज़हर भरा हुआ था।
नफरत फैलाने वाले सोशल मीडिया के ख़तरनाक प्रोपेगेंडा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इन हेट क्राइम्स को अलग-थलग घटनाएँ कहकर टालना गलत होगा। अगर राज्य सरकारें राजनीति से ऊपर उठकर इन्हें गंभीरता से नहीं लेंगी और अपने राज्यों में आए लोगों को सुरक्षा नहीं देंगी, तो ये ज़ख़्म और गहरे होते चले जाएंगे।
आपको बता दें, इस हमले के बाद पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि एक आरोपी नेपाल भाग गया है और उसकी तलाश जारी है। पुलिस ने जांच शुरू कर दी है, लेकिन प्रारंभिक जांच में नस्लीय कारणों पर स्पष्ट निष्कर्ष नहीं बताया गया है।
Uttarakhand में 24 साल के छात्र की पीट-पीट कर हत्या, Tamil Nadu में 34 साल के Maharashtrian migrant worker के गले पर छुरी, समाज के चेहरे पर ऐसे बदनुमा दाग हैं जिन्हें धुलने में कई बरस लग जाएंगे. ये साल इतने शर्मनाक तरीके से विदा होगा ये कभी सोचा नहीं था. साल के आखिरी महीने में 4… pic.twitter.com/f0DWcrZ96K
— Rajat Sharma (@RajatSharmaLive) December 29, 2025
देवभूमि की पहचान तो हमेशा से अतिथि-सत्कार, अपनापन, प्रेम और मिलजुलकर रहने की संस्कृति रही है। यही मूल्य हमारी रगों में बसे रहे हैं। लेकिन एंजेल पर हुआ हमला हमें सामूहिक रूप से शर्मसार करता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
उत्तराखंड के देहरादून (सेलाकुई) में नस्लीय टिप्पणी पर हुई हिंसक झड़प में त्रिपुरा के 21 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा गंभीर रूप से घायल हो गए। एंजेल ने इलाज के बाद 26 दिसंबर को दम तोड़ा। इस मामले पर पत्रकार और एंकर मीनाक्षी कंडवाल ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स से एक पोस्ट की और कहा कि आज वो दुखी और शर्मिंदा महसूस कर रही है।
उन्होंने लिखा, उत्तराखंड और देवभूमि की बेटी होने के नाते आज मन बेहद आहत है। भीतर एक गहरा दुख भी है और शर्म का एहसास भी। त्रिपुरा से आए एक छात्र के साथ मेरे राज्य में जो कुछ हुआ, वह किसी भी हाल में माफ़ किए जाने लायक नहीं है। देवभूमि की पहचान तो हमेशा से अतिथि-सत्कार, अपनापन, प्रेम और मिलजुलकर रहने की संस्कृति रही है।
यही मूल्य हमारी रगों में बसे रहे हैं। लेकिन एंजेल पर हुआ हमला हमें सामूहिक रूप से शर्मसार करता है। ऐसे अपराध में शामिल दोषियों को ऐसी सख्त सज़ा मिलनी चाहिए, जो आने वाले समय के लिए एक मिसाल बने। पहाड़ में अपराध, खासकर नफ़रत से उपजा अपराध, आखिर बढ़ कहां से रहा है? यह किन सामाजिक, प्रशासनिक और नैतिक विफलताओं का नतीजा है? जिस पहाड़ को कभी शांति, सहअस्तित्व और भरोसे की मिसाल माना जाता था, वहां यह ज़हर कैसे फैलता चला गया?
अंकिता केस में एक के बाद एक परतें खुल रही हैं, लेकिन उसके साथ जो रहस्यमयी खामोशी जुड़ी हुई है, वह बहुत कुछ कहती है। यह चुप्पी कहीं न कहीं अपराधियों को सत्ता का संरक्षण मिलने का संकेत तो नहीं दे रही? अगर ऐसा है, तो यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल है।
पहाड़ की बेलगाम लूट-खसोट ने आज हालात यहां तक पहुंचा दिए हैं कि हमारी परंपराएं और मूल्य-व्यवस्था लगभग ढह चुकी हैं। मिनी दिल्ली बनाने की होड़, मिनी पार्टी प्लेस की संस्कृति, रिसॉर्ट इकॉनमी के नाम पर पहाड़ों को ऐशगाह में बदलने की सोच, अगर इन सब पर अब भी लगाम नहीं लगी, तो फिर कुछ भी नहीं बचेगा।
वैसे भी, आज सच पूछिए तो बचाने को आखिर बचा ही क्या है? उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड आखिर क्या बन पाया? क्या हम वही राज्य बन सके, जिसका सपना देखा गया था? या फिर उत्तराखंड में गहराता लीडरशिप क्राइसिस ही इस देवभूमि को धीरे-धीरे भीतर से खोखला करता चला गया?
उत्तराखंड और देवभूमि की बेटी होने के नाते आज बहुत दुखी और शर्मिंदा महसूस कर रही हूँ। त्रिपुरा के छात्र के साथ जो मेरे राज्य में हुआ, उसकी कोई माफ़ी संभव नहीं। हमारे यहाँ तो अतिथि का मान-सम्मान, प्यार और मिलजुलकर रहना नसों में दौड़ता है। लेकिन एंजेल पर हमले ने शर्मसार कर दिया है।…
— Meenakshi Kandwal मीनाक्षी कंडवाल (@MinakshiKandwal) December 28, 2025
यह सोचकर ही डर लगता है कि अगर ऐसा ही कुछ किसी टेस्ट मैच में वानखेड़े या विशाखापट्टनम में हुआ होता तो क्या होता। तब भारतीय पिचों की खराब हालत पर ज़बरदस्त हंगामा मच जाता।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड की पिच पर बॉक्सिंग डे टेस्ट के पहले ही दिन 20 विकेट गिरे। ऑस्ट्रेलिया पहली पारी में 152 पर सिमटी तो इंग्लैंड की टीम 110 रन पर सिमट गई। इसके साथ ही पिच की आलोचना भी तेज हो गई है। भारतीय क्रिकेट कमेंटेटर और पत्रकार हर्षा भोगले ने एक पोस्ट में लिखा कि खेल को परखने के लिए आप चाहे कोई भी पैमाना अपनाएँ, टेस्ट मैच के पहले ही दिन दोनों टीमों का ऑलआउट हो जाना क्रिकेट के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता।
उनकी इस पोस्ट पर पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, यह सोचकर ही डर लगता है कि अगर ऐसा ही कुछ किसी टेस्ट मैच में वानखेड़े या विशाखापट्टनम में हुआ होता तो क्या होता। तब भारतीय पिचों की खराब हालत पर ज़बरदस्त हंगामा मच जाता। ग्राउंड्समैन को जमकर निशाना बनाया जाता और कहा जाता कि भारत जानबूझकर अनुचित और एकतरफा पिचें बनाता है।
तरह-तरह के आरोप लगाए जाते। लेकिन जब यही हाल ऑस्ट्रेलिया के भव्य और प्रतिष्ठित मैदानों में देखने को मिलता है, तो हम पिच की आलोचना करने के बजाय टेस्ट क्रिकेट की गुणवत्ता पर अफ़सोस जताने लगते हैं। यही दोहरा रवैया सबसे ज़्यादा खटकता है। आपको बता दें, मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड की पिच पर आखिरी बार किसी एशेज टेस्ट के पहले ही दिन 20 या उससे ज्यादा विकेट 1901-02 में गिरे थे। तब टेस्ट के पहले दिन 25 विकेट गिरे थे।
I shudder to think @bhogleharsha if this has happened say at the Wankhade or Vizag during a test match. All hell would have broken lose on the poor conditions of Indian wickets. The groundsman would have been taken to the cleaners, It would have been stated that India creates… https://t.co/WWNXXkKGZc
— bhupendra chaubey (@bhupendrachaube) December 26, 2025