इसके अलावा क्षेत्रीयता, अंधविश्वास, कुरीतियाँ, क्रूर अवैज्ञानिकता, एक वर्ग की लालची, स्वार्थी व्यवस्था जो स्वयं आंतरिक रूप में वर्गों और कर्मकांडों के आधार पर बँटी थी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
सोमनाथ मंदिर पर 1026 में हुए पहले आक्रमण के इस साल हजार साल पूरे हुए हैं और पीएम मोदी ने इसे “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” नाम दिया है। सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था। सवाल यह उठता है कि भारत अतीत में क्यों लुटता रहा और क्यों विदेशी आक्रांता भारत माता को कुचलते रहे।
पिछले 2000 वर्षों से इंग्लैंड की भूमि पर किसी विदेशी आक्रमणकारी के पैर नहीं पड़े, स्वतंत्रता के बाद से अमेरिका पर कोई आक्रमण नहीं हुआ और 1945 में अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु बम गिराए जाने से पहले भी जापान पर सैकड़ों वर्षों तक कोई हमला नहीं हुआ। चीन और रूस पर तातार और मंगोलों के हमले हुए, उनका शासन भी रहा लेकिन बहुत थोड़े समय के लिए, इन देशों का इतिहास स्वतंत्रता का रहा है, गुलामी का नहीं।
इसके विपरीत भारत का इतिहास गुलामी, विदेशी आक्रमण और अधिपत्य का रहा है, न कि एक स्वतंत्र, सार्वभौम और व्यवस्थित राष्ट्र का। भारत के पास पराजयों की एक लंबी श्रृंखला है और वे निर्णायक युद्ध, जिनमें हार के बाद देश विदेशी शासन में चला गया, कई बार कुछ ही घंटों में समाप्त हो गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस देश का समाज गहराई तक खंडित था, आपसी घृणा, द्वेष, जन्म आधारित भेदभाव, क्षेत्रीयता, अंधविश्वास, कुरीतियाँ और अवैज्ञानिक सोच मौजूद थी।
लालची और स्वार्थी सत्ता व्यवस्था, जो स्वयं वर्गों और कर्मकांडों में बंटी हुई थी, उसने देश को कभी संगठित नहीं होने दिया और भारत को राष्ट्र के रूप में विकसित नहीं होने दिया। समाज में समरसता, सामंजस्य और सद्भाव पनपने नहीं दिया गया, इसलिए हम विदेशी ताकतों से कभी एकजुट होकर नहीं लड़ सके। भारत कभी ऐसा राष्ट्र भी नहीं बन सका जिसने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर किसी विदेशी शासन पर आक्रमण किया हो, जैसा भारत पर फारस, ग्रीक, हण, शक, अरब, तुर्की, मंगोल, अफगानी, पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज करते रहे।
भारत में सिख, जाट, राजपूत, रोहिल्ले और मराठों की अपनी-अपनी छोटी सल्तनतें थीं, जिनका कोई राष्ट्रीय दृष्टिकोण नहीं था और कई बार भारतीय सैनिक धन के लिए विदेशी आक्रांताओं की ओर से भी लड़ जाते थे। इसी कारण छोटी लेकिन संगठित विदेशी सेनाएँ विशाल लेकिन असंगठित भारतीय सेनाओं को आसानी से हरा देती थीं, क्योंकि भारतीय राजाओं में देशभक्ति और सैनिकों में अपने राजा के प्रति निष्ठा का भाव नहीं था। हमारा इतिहास कुछ अपवादों को छोड़कर लालची, गद्दार, अय्याश, कायर और निकम्मे शासकों का रहा है और इन्हीं के कारण भारत बार-बार लुटता और पीटता रहा।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
असल में ट्रंप की धमकी के पीछे दो वजहें हैं। एक, अमेरिका की नज़र ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन पर हैं, दूसरा, ट्रंप को लगता है कि उत्तरी ध्रुव पर रूस और चीन का दबदबा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
रजत शर्मा, इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को जब न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित फेडरल कोर्ट में हथकड़ियों में पेश किया गया, तो यह दृश्य केवल एक अदालती कार्रवाई नहीं था, बल्कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका की ताकत और उसके इरादों का खुला प्रदर्शन बन गया। अदालत में पेशी के दौरान मादुरो ने साफ शब्दों में कहा कि वे अब भी वेनेजुएला के वैध राष्ट्रपति हैं और उन्हें उनके घर से जबरन उठा कर अमेरिका लाया गया है। वहीं, उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस ने भी खुद को बेगुनाह बताते हुए कहा कि वे वेनेजुएला की फर्स्ट लेडी हैं और उनके साथ अन्याय हुआ है। फ्लोरेस के माथे और कनपटी पर बंधी पट्टियां इस पूरे घटनाक्रम की हिंसक प्रकृति की ओर इशारा कर रही थीं।
कोर्ट ने दोनों को भरोसा दिलाया कि उन्हें बाद में अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलेगा। इस मामले में अगली सुनवाई 17 मार्च को तय की गई है। मादुरो और फ्लोरेस के वकीलों ने ज़मानत की अर्जी देने और वेनेजुएला के दूतावास से संपर्क कराने की मांग भी रखी है। इस गिरफ्तारी और पेशी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में रूस, ईरान, फ्रांस, डेनमार्क और कोलंबिया जैसे देशों ने इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की। इन देशों का कहना था कि किसी संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को इस तरह अगवा करना अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है। दूसरी ओर, अमेरिका ने अपना बचाव करते हुए दावा किया कि मादुरो ड्रग तस्करी, आतंकवाद और अमेरिका के खिलाफ साजिशों में लिप्त रहे हैं, इसलिए यह कार्रवाई जरूरी थी।
असल सवाल यह है कि क्या यह कानूनी कार्रवाई थी या फिर अमेरिकी ताकत की खुली नुमाइश? मादुरो को जिस तरह आम अपराधी की तरह कैमरों के सामने पेश किया गया, सुरक्षा कर्मियों द्वारा घसीटते हुए कोर्ट में ले जाया गया, उससे यही संदेश देने की कोशिश की गई कि अमेरिका के सामने कोई भी राष्ट्राध्यक्ष अछूता नहीं है। वेनेजुएला के भीतर इस घटना के बाद हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। मादुरो समर्थक सड़कों पर उतर आए हैं और उनकी रिहाई की मांग कर रहे हैं, जबकि विपक्षी खेमा इस घटनाक्रम को उत्सव की तरह मना रहा है। आम नागरिकों में डर और अनिश्चितता का माहौल है। लोगों को आशंका है कि देश में आवश्यक वस्तुओं की भारी किल्लत हो सकती है, इसलिए हजारों लोग रातभर दुकानों के बाहर लाइन लगाकर राशन और जरूरी सामान जमा कर रहे हैं।
इस बीच, उपराष्ट्रपति डेल्सी रॉडरिगेज़ ने वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली है। शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने अमेरिका के साथ सहयोग की इच्छा जताई, लेकिन इसके बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें भी खुली धमकी दे डाली। ट्रंप ने साफ कहा कि वेनेजुएला समेत पूरे उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका को अमेरिकी वर्चस्व स्वीकार करना होगा, वरना अंजाम मादुरो से भी बदतर होगा। ट्रंप यहीं नहीं रुके। वेनेजुएला के बाद उनकी नजर पड़ोसी देश कोलंबिया पर है। उन्होंने कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्ताव पेट्रो पर ड्रग तस्करी के गंभीर आरोप लगाए और सैन्य कार्रवाई की धमकी तक दे डाली। ट्रंप की यह रणनीति लगभग 200 साल पुरानी “मोनरो डॉक्ट्रिन” की याद दिलाती है, जिसके तहत अमेरिका ने पूरे पश्चिमी गोलार्ध को अपना प्रभाव क्षेत्र घोषित किया था।
इसी नीति के तहत ट्रंप क्यूबा, मेक्सिको और पनामा को भी निशाने पर ले रहे हैं। पनामा नहर को लेकर अमेरिका की पुरानी महत्वाकांक्षा एक बार फिर सामने आ गई है। क्यूबा को लेकर ट्रंप का दावा है कि वेनेजुएला की सप्लाई लाइन बंद होते ही वहां की सरकार अपने आप गिर जाएगी। मेक्सिको में अमेरिकी कार्रवाई के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। खुद मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबॉम सड़कों पर उतर चुकी हैं। इसके बावजूद ट्रंप ने मेक्सिको पर भी ड्रग माफिया के नियंत्रण का आरोप लगाते हुए सैन्य हस्तक्षेप की धमकी दी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप अब अमेरिका के पुराने सहयोगी देशों को भी नहीं बख्श रहे। ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी देकर उन्होंने डेनमार्क जैसे NATO सहयोगी को भी सकते में डाल दिया है। डेनमार्क ने इस धमकी का सख्त विरोध किया है और कहा है कि यह किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। इन सभी घटनाओं के पीछे असली कारण क्या है? अमेरिकी मीडिया और विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की असली दिलचस्पी वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों में है। अमेरिका नहीं चाहता कि वेनेजुएला डॉलर के अलावा किसी और मुद्रा, खासकर चीनी युआन में तेल बेचे। इतिहास गवाह है कि इराक और लीबिया ने जब पेट्रोडॉलर सिस्टम को चुनौती दी, तो उनके शासकों का क्या हश्र हुआ।
आज हथकड़ियों में पेश किए गए मादुरो को देखकर यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है—क्या वेनेजुएला की जनता किसी विदेशी ताकत को अपने देश की सत्ता और संसाधनों पर नियंत्रण करने देगी? क्या वहां के लोग यह स्वीकार करेंगे कि उनके तेल और संपदा का इस्तेमाल उनके भविष्य के बजाय अमेरिका की ताकत बढ़ाने के लिए हो? यह सिर्फ वेनेजुएला की कहानी नहीं है, यह उस वैश्विक व्यवस्था पर सवाल है, जहां ताकतवर देश अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और लोकतंत्र की सीमाओं को अपनी सुविधा के अनुसार तय करते हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
भ्रष्टाचार आसमान पर है। हर काम के दाम तय हैं और दाम देने पर काम होगा कि नहीं, पता नहीं। नीयत में घुला जहर एक्यूआई को डेढ़ सौ पार पहुंचा चुका है। मोहरे पिट रहे हैं, प्यादे घिस रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जयदीप कर्णिक, वरिष्ठ पत्रकार ( संपादक, अमर उजाला डिजिटल )
तीन बड़े नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई में कांग्रेस के हाथ से मध्यप्रदेश निकल गया। एक नेता भी निकल गया। दूसरा तैयारी में है। अब मध्यप्रदेश में कांग्रेस ना के बराबर है। चूंकि विपक्ष है ही नहीं इसलिए भाजपा ही भाजपा का विपक्ष है। इसी तरह नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई में दांव पर देश का हृदय स्थल और मध्यप्रदेश का सांस्कृतिक कलश इंदौर शहर लगा हुआ है।
मोहरे पिट रहे हैं, प्यादे घिस रहे हैं। व्यवस्था की सड़ांध भागीरथपुरा के पानी में मिलकर सोलह को वैकुंठ पहुंचा चुकी है और डेढ़ हजार को अस्पताल। भ्रष्टाचार आसमान पर है। हर काम के दाम तय हैं और दाम देने पर काम होगा कि नहीं, पता नहीं। नीयत में घुला जहर एक्यूआई को डेढ़ सौ पार पहुंचा चुका है। मास्टर प्लान की हरियाली तो कागजों से भी गायब करने की तैयारी है।
संगठन नेताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ाने में लगा है, मतलब ये कि सच मत बोलो, बोलो तो यों खुले आम मत बोलो। भागीरथपुरा में लोग तो मर गए, आप ज़मीर को क्यों ज़िंदा रखे हुए हो? साफ धुली हुई सड़कों के नीचे गटर में बहती गंदगी को अपनी गाढ़ी कमाई के पैसों से लगे पानी के फिल्टरों ने छुपा रखा था। नहीं तो इंदौर के 85 वार्डों में से 75 में गंदे पानी की शिकायत है। शहर के नर्मदा की लाइन में सीवरेज का पानी वैसे ही मिला हुआ है जैसे कि नीयत में खोट। पता करना ही मुश्किल है कि कहां मिला है और कहां नहीं !
अगर जीवन की दो बुनियादी आवश्यकताएं - साफ हवा और साफ पानी ही जनता को नहीं दिया जा सकता तो फिर तरक्की और विकास बेमानी है। हम चांद पर पानी ढूंढ रहे हैं और यहां आंख का पानी मर चुका है। सत्तर के दशक में नर्मदा को इंदौर लाने के भगीरथी प्रयत्न अब केवल इतिहास में दर्ज हैं। अब तो भागीरथपुरा के मासूमों की गूंज दुनिया में सुर्खियां बन चुकी हैं। उन युवाओं से पूछो जिन्होंने एक महीने तक पूरे शहर और प्रदेश में इसलिए आंदोलन किया ताकि शहर को नर्मदा का स्वच्छ जल मिले।
एक अधिकारी की ज़िद ने सबसे स्वच्छ शहर का तमगा दिया। बदबू मारती और उफन कर फैलती कचरा पेटियों वाला इंदौर शहर ऐसा बदला कि इस जिद को अपना जीवन बना लिया। सबसे स्वच्छ शहर के रूप में अपनी पहचान बनाई। सारे इंदौरी दिल से जानते हैं कि सड़कों पर लगती इस झाड़ू के नीचे एक सड़ांध मारती व्यवस्था तेजी से फैल रही है। वो कभी भी फट कर सतह पर आ सकती है। और भागीरथपुरा में ये डर सच हो गया।
इंदौर को लजाने वाले कारण मौजूद रहे हैं। लेकिन उन पर भारी पड़ी है शहर की जिंदादिली। सफाई की जिद। सामाजिक संस्थाएं। उत्सव प्रेम। प्रबुद्ध वर्ग। दाल- बाफले और पोहे जलेबी की मस्ती। ये सब ऐसी परतें हैं जिन्होंने सड़ांध को दबाए रखा। पर हर सच्चे इंदौरी को पता है कि काम कहां और कैसे हो रहे हैं और कैसे रुक रहे हैं। पिछले ढ़ाई दशक से इंदौर बस रुपया कमाने की मशीन बना हुआ है। हर अधिकारी की ललचाई नजर यहीं लगी रहती है। यहां की ट्रासंफर पोस्टिंग सबसे चर्चित है और इसीलिए हर मुख्यमंत्री का "प्यारा शहर" रहा है इंदौर।
वो तो शहर के प्रबुद्ध वर्ग और कुछ जनप्रतिनिधियों की सतर्कता और जीवट है जिससे शहर बचा रहा, नहीं तो कब का पूरा ही निचोड़ लिया जाता। पर पिछले कुछ समय में ये दोनों ही दबाव कम हुए हैं। सामाजिक संस्थाओं का दबाव कम होने और जनप्रतिनिधियों के कठपुतली बन जाने से अब वो विरोध के स्वर, वो गलत काम करने का डर वो सामाजिक दबाव ही कमज़ोर हो गया है। शहर पर मंडरा रहा खतरा जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज्यादा व्यापक है। इसलिए क्योंकि दांव पर इंदौर है और भागीरथपुरा एक चेतावनी। एक बड़े खतरे की घंटी। देर तो हो चुकी पर जब जागो तभी सवेरा।
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - अमर उजाला डिजिटल।
ओटीटी और वेबसीरीज का नाम आते ही गालियां,अश्लीलता और हिंसा की बात दिमाग में आती है। हाल ही में एक अपराध कथा आई है जिसने बगैर इन तत्वों के शानदार उदाहरण प्रस्तुत किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स पर चलने वाली वेबसीरीज की बात आते ही पहली प्रतिक्रिया होती है गालियों की भरमार होगी। जबरदस्ती ठूंसी गई यौनिकता या न्यूडिटी होगी। जबरदस्त हिंसा होगी। शरीऱ के अंगों को काटा जा रहा होगा और तड़पते हुए कटे अंग होंगे। प्रश्न आता है कि कोई अच्छी और साफ-सुथरी वेबसीरीज बताइए। उत्तर मिलता है पंचायत और गुल्लक।
अच्छी कहानी, साफ सुथरी प्रस्तुति, कम गाली-गलौच और न्यूमतम हिंसा जिस वेबसीरीज में हो उसकी संख्या कम है। हमारे देश में विशेषकर हिंदी में बनने वाली वेब सीरीज एक ऐसी राह पर चली गई जिसमें निर्माता और निर्देशकों को लगता है कि बगैर गालियों के, बिना यौनिकता और हिंसक दृष्यों के वेबसीरीज लोगों को पसंद नहीं आएंगी। लिहाजा सफलता के लिए ये तीन अवयव जबरदस्ती कहानी में ठूंसे जाते हैं।
अपराध कथा हो तो ये तो आवश्यक ही होते हैं। भले ही ये कहानी का सत्यानाश क्यों न कर हो जाए। पता नहीं निर्देशकों को क्या लगता है और वो भारतीय दर्शकों की मानिकता को किस तरह से विश्लेषित करते हैं। इनको पता नहीं ये बात कब समझ में आएगी कि दर्शकों को कहानी चाहिए। बेहतर कहानी और बेहतर ट्रीटमेंट ही किसी सीरीज को दर्शकों को पसंद बना सकती है।
एक जमाने में इसी तरह से हिंदी फिल्मों में अश्लीलता दिखाने के लिए तर्क गढ़े जाते थे। नायिकाओं को बिकिनी या अर्धनग्न दिखाने के लिए उसको कहानी का हिस्सा बनाया जाता था। कई ऐसी फिल्में दर्शकों ने पसंद भी की थीं लेकिन ये ट्रेंड लंबे समय तक नहीं चल सका और दर्शक जबरदस्ती ठूंसी गई नग्नता से ऊब गए। फिर हिंदी फिल्मों ने अपनी राह बदली।आज वेबसीरीज के निर्माताओं को इसपर विचार करने की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए। वेबसीरीज पर चूंकि किसी प्रकार के सेंसर या प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण वहां अराजकता जारी है।
इस स्तंभ में अनेकों बार इस ओर ध्यान दिलाया गया है। स्वनियंत्रण और स्वनियमन की आड़ में प्रमाणन को रोका गया है। सरकार इस कारण से इस दिशा में गति से नहीं बढ़ रही है क्योंकि अगर प्रसारण पूर्व प्रमाणन का निर्णय होता है तो एक अलग संस्था बनानी होगी। अलग संस्था नहीं बनाई जाती है और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को ये दायित्व दे दिया जाता है तब भी बहुत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी। मानव संसाधन की आवश्यकता तो होगी ही। इसलिए सरकार जल्द निणय लेने के मूड में नहीं दिखाई देती है।
सरकार ने एक व्यवस्था बनाई है और जब किसी वेबसीरीज को लेकर अधिक विवाद होता है या अधिक आलोचना आदि होती है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने स्तर से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हस्तक्षेप करके ममले को सुलझा देता है। आज चर्चा वेबसीरीज के प्रमाणन पर नहीं बल्कि एक ऐसी वेबसीरीज की करनी है जो बहुत ही साफ-सुथरी, न्यूनतम गाली गलौच के साथ और बगैर किसी अश्लीलता और जुगुप्साजनक हिंसा के बनाई गई है।
ये वेबसीरीज अपराध कथा है, उसमें मर्डर है, ग्लैमर और लड़कियां हैं, प्रेम-प्रसंग हैं, अश्लीलता दिखाने का अवसर भी है, लेकिन अश्लीलता या नग्नता कम से कम है। इस वेबसीरीज को परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर देख सकते हैं। रोचकता अपने चरम पर है और दर्शकों के दिमाग में इसको देखते हुए बस यही चलता रहता है कि आगे क्या? यही तो निर्माता निर्देशक की सफलता है।बात हो रही है एक वेबसीरीज मिसेज देशपांडे की। छह एपिसोड की ये सीरीज एक सीरीयल किलर को पकड़ने की कथा है। कहा गया है कि ये किसी फ्रेंच कहानी पर आधारित सीरीज है लेकिन इसके निर्देशक और लेखक नागेश कुकनूर ने जिस प्रकार से कहानी को भारतीय पुट दिया है वो प्रशंसनीय है।
अपने जमाने की सुपरस्टार रही माधुरी दीक्षित लीड रोल में हैं। उन्होंने अपने अभिनय कला से दर्शकों को बांधे रखा है। अधिक मेकअप के बिना और चेहरे पर बढ़ती उम्र के निशान के बावजूद माधुरी दीक्षित ने जिस तरह से मिसेज देशपांडे के पात्र को पर्दे पर जीवंत किया है वो उल्लेखनीय है। माधुरी दीक्षित अपनी परिस्थियों के कारण सीरीयल किलर बन जाती है। पकड़ ली जाती हैं और मिसेज देशपांडे को जेल में जीनत का नाम मिलता है। वो इस पहचान के साथ जेल में सूर्य नमस्कार करती है और साथी कैदियों को भोजन बनाकर खिलाती हैं।
सीरियल किलर होने के बावजूद अन्य कैदी, जो संभवत: उसके अपराध से परिचत नहीं है, माधुरी का सम्मान करती हैं। ये सीरीयल किलिंग पुणे में हुई थी। मिसेज देशपांडे के केस की फाइल किसी एक लड़की के हाथ लग जाती है। यहां भी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ है वो लड़की पहले लड़का होती है लेकिन अपनी मानसिक स्थिति के कारण वो चिकित्साकीय रास्ते से लड़की बनती है। ये लड़की पुणे की सीरियल किलर मिसेलज देशपांड की कापी कैट किलर बनती है। उसके ही अंदाज में अपने शिकार का नायलान की रस्सी से गला घोंटकर हत्या करती है और उसका आंख खोल देती है।
जब कापीकैट किलर ने मुंबई में कत्ल करना आरंभ किया तो पुलिस कमिश्नर ने मिसेज देशपांडे यानी जीनत की मदद लेना तय किया। कहानी में इतने चक्करदार घुमाव हैं कि मिसेज देशपांडे इस केस की जांच करनेवाले पुलिस आफिसर की मां होती है और कापीकैट किलर जांच अधिकारी की पत्नी की दोस्त। कहानी इतने दिलचस्प मोड़ लेती है कि दर्शक उससे बंधे रहने पर मजबूर होता है। जब दर्शक को लगता है कि पुलिस किलर के पास पहुंच गई है तो कहानी में एक नया मोड़ आता है और किलर की नए सिरे से तलाश आरंभ हो जाती है।
कोई नया क्लू मिलता है। जिसपर किलर होने का शक होता है या जिसको किलर की तरह पेश किया जाता है वो तो किसी और ही मानसिक स्थिति में होता है। दर्शक जब उसकी सचाई जानता है तो उसके प्रति संवेदना से भर उठता है। प्रश्न उठता है कि किलर कौन? निर्देशक ने कहानी को किसी तरह से लाउड नहीं होने दिया है। ना ही किसी प्रकार का छद्म वातावरण तैयार करके अपराध कथा को तिलस्मी स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया।
बगैर लाउड हुए कहानी का ट्रीटमेंट बेहतरीन है। बस कहानी में एक ही चीज खटकती है। अंत में भेद खुलता है कि मिसेज देशपांड को उसके पिता ने ही सेक्सुअली अबयूज किया था। वो अपने पिता की हत्या के लिए पहुंचती है। वो छत से कूदकर अपनी जान दे देते हैं। पश्चिम में इस तरह की कहानी होती होगी लेकिन भारतीय दर्शकों के लिए ये एक झटके की तरह है।
इस तरह की वेबसीरीज से एक उम्मीद जगती है कि ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री में परिपक्वता आनी आरंभ हो गई है। दूसरे निर्माता भी इसको देखकर प्रेरित होंगे और कहानी का इस तरह का ट्रीटमेंट करेंगे। मिसेज देशपांड को एक शुभ संकेत की तरह लिया जाना चाहिए। इसकी सफलता ने ये संकेत भी दिया है कि साफ सुथरी वेबसीरीज दर्शकों को भाती है। मिसेज देशपांडे उन निर्देशकों के लिए मिसाल है जो सेक्स और हिंसा दिखाकर सफल होना चाहते हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।
AI का असर सिर्फ़ White Collar Jobs तक सीमित नहीं रहेगा। महिंद्रा के चेयरमैन आनंद महिंद्रा का कहना है कि AI फैक्ट्री में काम करने वाले Blue Collar मज़दूरों को Gold Collar बनाएगा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
AI Agents 2026 का सबसे बड़ा बदलाव होने जा रहे हैं। अभी तक AI को हम ChatGPT जैसे चैटबॉट के रूप में समझते थे—Prompt दिया और जवाब मिला। लेकिन AI Agents इससे एक कदम आगे हैं; वे बिना Prompt के भी पूरा काम निपटा सकते हैं। फर्क समझने के लिए Google Map और Uber का उदाहरण काफी है।
Google Map रास्ता बताता है, गाड़ी आपको खुद चलानी पड़ती है, जबकि Uber में आपने सिर्फ़ लोकेशन दी और सिस्टम ने गाड़ी ढूंढकर आपको मंज़िल तक पहुँचा दिया। यही Chat Bot और AI Agent का फर्क है। यह बदलाव सिर्फ़ अमेरिका तक सीमित नहीं है, भारत में भी AI Agents तेज़ी से अपनाए जा रहे हैं।
बजाज फ़िनसर्व के चेयरमैन संजीव बजाज के अनुसार AI Voice Bots ₹400–500 करोड़ के लोन क्लोज़ कर रहे हैं और कस्टमर केयर का 10–15% काम AI संभाल रहा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने अपना AI Manifesto जारी किया है, जिसमें मुकेश अंबानी का कहना है कि AI की मदद से 6 लाख कर्मचारी 10 गुना ज़्यादा प्रभावी बनेंगे और इसका सीधा लाभ Jio, Reliance Retail और Jio Finance के ग्राहकों को मिलेगा।
AI का असर सिर्फ़ White Collar Jobs तक सीमित नहीं रहेगा। गाड़ियाँ बनाने वाली महिंद्रा के चेयरमैन आनंद महिंद्रा का कहना है कि AI फैक्ट्री में काम करने वाले Blue Collar मज़दूरों को Gold Collar बनाएगा—यानी उनकी जगह नहीं लेगा, बल्कि उनकी क्षमता बढ़ाएगा।
फिर भी नौकरी को लेकर चिंता बनी हुई है। जब संजीव बजाज से पूछा गया कि क्या उसी रफ्तार से भर्ती होती रहेगी, तो उनका जवाब साफ़ नहीं था। उन्होंने कहा कि काम का स्वरूप बदलेगा और ग्रोथ रही तो नौकरियाँ भी रहेंगी।इतना तय है कि आने वाले समय में नौकरी वैसी नहीं होगी जैसी आज है। AI का दौर आ चुका है और अब सवाल यह नहीं है कि AI आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि हम उसके साथ कैसे बदलेंगे।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब जैसे कई राज्यों में प्रदूषित पानी की समस्या से निपटने के लिए राज्यों और केंद्र सरकारों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
भारत के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में कई बार सम्मानित इंदौर, इस समय एक गंभीर दूषित पानी संकट का सामना कर रहा है। शहर के कई इलाकों में नल के पानी में गंदगी और सीवरेज मिला पानी मिलने की वजह से सैकड़ों लोग बीमार पड़े और कई जानें भी गईं। उल्टी-दस्त, बुखार, पेट दर्द जैसे गंभीर लक्षणों के साथ सैकड़ों लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया। हजारों लोग प्रभावित हैं, जिनमें बच्चों और बुजुर्गों सहित पूरे परिवार शामिल हैं।
यह मामला सिर्फ इंदौर का स्वास्थ्य संकट नहीं है, बल्कि पूरे देश में जल गुणवत्ता, जल प्रबंधन और नागरिक सुरक्षा तंत्र की मजबूती पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। राजधानी दिल्ली सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, पंजाब जैसे कई राज्यों में प्रदूषित पानी की समस्या से निपटने के लिए राज्यों और केंद्र सरकारों को मिलकर अधिक तेज़ी से काम करने की आवश्यकता है। दिल्ली को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
इंदौर की भयावह घटना ने भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ‘अमृत’ पेयजल परियोजना की ओर ध्यान खींचा है और संभव है कि इससे राज्यों के भी कान खड़े हों। अब केवल सरकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों को भी प्रदूषित पानी और हवा को लेकर अधिक सक्रिय निगरानी अभियान चलाने होंगे।
इंदौर की घटना प्रशासन, इंजीनियरिंग अधिकारियों और नागरिकों के बीच जिम्मेदारी, निगरानी और जवाबदेही की कमी को सामने लाती है। सुरक्षित पानी की कमी से स्वास्थ्य, जीवन और सामाजिक विश्वास को भारी नुकसान हो सकता है। अब समय है कि मजबूत सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी कोई त्रासदी दोबारा न हो।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया और मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख मुआवजा देने की घोषणा की। जांच के आदेश दिए गए और तीन सदस्यीय समिति गठित की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि पानी में मिलावट कैसे हुई। कुछ विभागीय अधिकारियों को बर्खास्त और निलंबित भी किया गया। जांच से पहले ही यह तथ्य सामने आया कि पाइपलाइन में लीकेज या खराब कनेक्शन के कारण सीवरेज का पानी पीने की सप्लाई लाइन में मिल गया। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि सीवरेज चैंबर का निर्माण गलत तरीके से मुख्य ड्रिंकिंग लाइन के ऊपर किया गया था, जिससे अपशिष्ट सीधे जल पाइप में मिला।
राजधानी दिल्ली में भी गर्मियों के दौरान न केवल पानी की कमी, बल्कि गुणवत्ता की समस्या भी एक बड़ी चुनौती रही है। इसका मुख्य कारण यमुना नदी का प्रदूषण, कच्चे पानी का अस्थिर स्रोत, जर्जर और पुरानी आपूर्ति नेटवर्क, सीवर मिलावट का जोखिम, नियमित गुणवत्ता जांच का अभाव और लैब प्रमाणन से जुड़ी समस्याएँ हैं। इन वजहों से कुछ इलाकों में गंदा, बदबूदार और स्वास्थ्य-खतरनाक पानी की आपूर्ति होती है, जिससे लोगों की दैनिक जरूरतें भी प्रभावित होती हैं।
पिछले वर्ष आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान पूर्वी दिल्ली के निवासियों ने लगभग तीन महीनों तक गंदा और दुर्गंधयुक्त पानी मिलने की शिकायत की। इस दौरान पानी पीने के अलावा त्वचा और पेट से जुड़ी बीमारियाँ भी सामने आईं। सुप्रीम कोर्ट ने भी अनियमित और दूषित पानी की आपूर्ति वाले इलाकों का निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे।
दिल्ली का पीने का पानी मुख्यतः यमुना नदी से आता है, जो अत्यधिक प्रदूषित है। रिपोर्टों में बताया गया कि अमोनिया जैसे प्रदूषकों का स्तर काफी अधिक है और यह जल उपचार संयंत्रों में आने से पहले ही दूषित होता है। कई इलाकों में 40 से 80 साल पुरानी पाइपलाइन हैं, जिनसे पानी की गुणवत्ता और अधिक बिगड़ती है। सप्लाई के दौरान सीवर और पानी की पाइपलाइन के पास लीकेज होने से सीवेज मिलावट की आशंका बनी रहती है। सरकार ने इन समस्याओं को पहचानते हुए जल और सीवर व्यवस्था में सुधार की योजनाएँ बनाई हैं।
अब भारतीय जनता पार्टी की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सरकार ने पानी सप्लाई, जल संरचना, यमुना नदी की सफाई और दिल्ली जल बोर्ड को मजबूत करने को प्राथमिकता बनाया है। बोर्ड को वित्तीय स्वायत्तता दी गई है, जिससे बड़े प्रोजेक्टों के लिए कैबिनेट से अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी और निर्णय तेज़ी से लिए जा सकेंगे। सरकार ने यमुना नदी के पर्यावरण सुधार और सफाई कार्यक्रम भी शुरू किए हैं।
भाजपा सरकार के पहले बजट में पेयजल, स्वच्छता और जल संरचना के लिए 9,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो नए बोरवेल, पाइपलाइन अपग्रेड, वर्षा जल संरक्षण और यमुना सफाई पर खर्च होंगे। दिल्ली जल बोर्ड ने 735 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जिससे पानी और सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का आधुनिकीकरण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त 300 करोड़ रुपये की नई पाइपलाइन परियोजना के तहत 11 किलोमीटर कनेक्शन पाइपलाइन की योजना शुरू की गई है। हालांकि, इन योजनाओं के परिणाम जनता तक पहुँचने में समय लगेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पहले कार्यकाल में ‘हर घर नल से जल’ के लक्ष्य के साथ जल जीवन मिशन शुरू किया। ग्रामीण भारत में हर घर नल कनेक्शन सुनिश्चित करने और शहरी क्षेत्रों के लिए ‘अटल मिशन फॉर रिजन्यूएशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत)’ जैसी योजनाएँ शुरू की गईं। केंद्रीय बजट 2025-26 में जल जीवन मिशन के लिए लगभग 67,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक हैं। मिशन का लक्ष्य अब 2028 तक बढ़ाया गया है।
पहले ग्रामीण क्षेत्रों में केवल लगभग 3.24 करोड़ घरों में नल कनेक्शन थे, लेकिन मिशन के लागू होने के बाद अब तक 15.5 करोड़ से अधिक घरों को नल से पानी मिल रहा है। 2.66 लाख से अधिक गांवों में हर घर तक नल जल पहुँचाया जा चुका है और कई क्षेत्रों में महिलाओं को पानी की गुणवत्ता जांच के लिए प्रशिक्षित किया गया है।
‘अमृत’ योजना 2015 में शुरू की गई थी और इसका दूसरा चरण अमृत 2.0 अक्टूबर 2021 में लागू हुआ। इसके तहत 4,700 से अधिक शहरों और नगरीय निकायों में पाइप जल आपूर्ति विकसित की जानी है। अमृत 2.0 का कुल अनुमानित बजट लगभग 2.77 से 2.99 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र सरकार का हिस्सा लगभग 86,760 करोड़ रुपये बताया गया है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में भी जल परियोजनाओं पर तेज़ी से काम हो रहा है। हालांकि, कुछ स्थानों पर क्रियान्वयन में देरी, बजट और संचालन संबंधी समस्याएँ सामने आई हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन, सख्त निगरानी और सामाजिक जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
मीडिया जैसी तेज रफ्तार, प्रतिस्पर्धा और जल्दबाजी वाली दुनिया में अतुल जी की विरासत इसलिए अलग दिखती है क्योंकि उसका असर भावनात्मक रूप से बहुत लंबे समय तक रहा।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सौरभ त्यागी, चीफ मार्केटिंग ऑफिसर, डीपस्पेशल ।।
श्री अतुल महेश्वरी की पुण्यतिथि पर, उनके जाने के करीब पंद्रह साल बाद, भारतीय मीडिया जगत सिर्फ एक बड़े प्रोफेशनल की उपलब्धियों को नहीं याद करता, बल्कि उस सोच और उस नेतृत्व को भी याद करता है, जिसने लोगों और संस्थानों दोनों को गहराई से प्रभावित किया। जो लोग उन्हें करीब से जानते थे, उनके लिए वह सिर्फ मेंटर या बॉस नहीं थे। वह ‘भाई साहब’ थे- ऐसे बड़े भाई, जिनका असर करुणा, अनुशासन और साफ सोच से बना था।
मीडिया जैसी तेज रफ्तार, प्रतिस्पर्धा और जल्दबाजी वाली दुनिया में अतुल जी की विरासत इसलिए अलग दिखती है क्योंकि उसका असर भावनात्मक रूप से बहुत लंबे समय तक रहा। आम तौर पर नेता नए प्रोडक्ट, बड़े बाजार या बढ़े हुए रेवेन्यू के लिए याद किए जाते हैं, लेकिन अतुल महेश्वरी को लोग इस बात के लिए याद करते हैं कि उन्होंने कैसे नेतृत्व किया- सख्ती के बिना, इंसानियत के साथ। यही वजह है कि आज भी लोग उन्हें सम्मान और अपनापन दोनों के साथ याद करते हैं।
वह एक बेहतरीन मीडिया प्रोफेशनल थे, जिनके पास सिर्फ काम की समझ नहीं बल्कि लोगों को समझने की गहरी क्षमता भी थी। उनके साथ काम करने वाले बताते हैं कि भाई साहब सबसे जूनियर कर्मचारी को भी यह एहसास दिला देते थे कि उसकी बात मायने रखती है और वह टीम के लिए जरूरी है। 90 के दशक और 2000 के शुरुआती दौर की सख्त हायरार्की वाली मीडिया दुनिया में उनका एक प्रोत्साहन भरा इशारा भी आत्मविश्वास बढ़ा देता था।
उन्होंने कई सीख दीं, लेकिन नेतृत्व की दो बातें सबसे ज्यादा याद की जाती हैं- सही संवाद की ताकत और फैसले लेने का साहस। जो लोग उनके साथ काम कर चुके हैं, उनका कहना है कि भाई साहब ध्यान से सुनते थे, हालात को समझते थे और फिर पूरे विश्वास के साथ फैसला लेते थे। मुश्किल समय में भी उनके फैसले संगठन को साफ दिशा देते थे। यह दृढ़ता दबाव से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता से आती थी और इसी वजह से टीमों में भरोसा पैदा होता था।
भाई साहब कभी पद या ओहदे के पीछे नहीं छिपे। वह सबसे पहले एक पत्रकार थे, जो अपने पेशे और उसके मकसद को लेकर गंभीर थे। उनका मानना था कि मजबूत संस्थाएं सिर्फ अधिकार से नहीं, बल्कि साझा मूल्यों और साफ उद्देश्य से बनती हैं। उनके नेतृत्व में अमर उजाला एक सम्मानित अख़बार से आगे बढ़कर एक मजबूत मीडिया समूह बना, जिसके नए संस्करण आए और जिसने बदलते दौर में खुद को प्रासंगिक बनाए रखा।
उनका मैनेजमेंट मंत्र बहुत सीधा था- नेतृत्व का मतलब आदेश देना नहीं, बल्कि दूसरों को आगे बढ़ने का मौका देना है। उनका लक्ष्य हमेशा यह रहा कि लोग सिर्फ काम करने वाले न बनें, बल्कि आगे चलकर खुद नेता बनें।
वह अक्सर बहुत शांत तरीके से कहते थे कि हमारी संस्था छोटी हो सकती है, लेकिन हमारी सोच कभी छोटी नहीं होनी चाहिए। उनके लिए आकार से ज्यादा महत्व महत्वाकांक्षा का था। उनका मानना था कि सपने बैलेंस शीट और कर्मचारियों की गिनती से कहीं आगे तक जाने चाहिए। वही बड़े सपने किसी भी संस्था को आगे खींचते हैं। यह बात वह बिना शोर-शराबे के कहते थे, लेकिन उसमें एक गहरी सोच छिपी होती थी कि तरक्की की शुरुआत कल्पना से होती है और एक छोटा न्यूजरूम भी भविष्य को आकार दे सकता है, अगर वह बड़ा सोचने की हिम्मत रखे।
नेतृत्व की कहानियों में अतुल महेश्वरी को अलग बनाता है सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने क्या हासिल किया, बल्कि यह कि उन्होंने उसे कैसे हासिल किया- विनम्रता, अपनापन और लोगों पर अटूट भरोसे के साथ। आज के KPI (Key Performance Indicators) और आंकड़ों से भरी दुनिया में भाई साहब ने एक बुनियादी लेकिन गहरी बात सिखाई, जिन लोगों को सम्मान मिलता है, वही ऐसी विरासत बनाते हैं जो संस्थापक के बाद भी जिंदा रहती है।
पंद्रह साल बाद भी अतुल महेश्वरी को लोग किसी दूर की मूर्ति की तरह नहीं, बल्कि अपनी यादों और करियर का हिस्सा मानते हैं। यही इस सच्चाई को साबित करता है। आज भी उनके प्रकाशन समूह अपने पुराने कर्मचारियों को फाउंडेशन डे पर मेहमान बनाकर नहीं बुलाते, बल्कि परिवार की तरह बुलाते हैं। यह वही संस्कृति है, जो भाई साहब ने बोई थी कि संस्थाएं पहले समुदाय होती हैं और बाद में कंपनियां।
आज के समय में, जब नेतृत्व को अक्सर दिखावे से जोड़ा जाता है, अतुल महेश्वरी की विरासत यह याद दिलाती है कि सबसे गहरा असर चुपचाप होता है, फैसलों में दिखता है, चरित्र में झलकता है और तब भी याद रहता है जब बाकी सब भुला दिया जाता है। आज उनकी याद सिर्फ सम्मान नहीं है, बल्कि यह सोचने का मौका है कि असली नेतृत्व क्या होता है- हिम्मत के साथ फैसला लेना, साफ तरीके से बात करना और दिल से नेतृत्व करना।
(सौरभ ने 1998 से 2005 के बीच अतुल महेश्वरी के साथ नजदीकी तौर पर काम किया। इस दौरान मेरठ ऑपरेशंस और हरियाणा तथा पंजाब में अमर उजाला के लॉन्च और विस्तार में वह शामिल रहे।)
पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और उद्योग के बीच लंबी प्रतीक्षा आज भी बनी हुई है। ऐसे में डिग्रीधारी बेरोजगार इस देश की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं और बने रहेंगें।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग में आचार्य और अध्यक्ष।
किसी राष्ट्र जीवन के प्रवाह में साल का बदलना कैलेंडर बदलने से ज्यादा कुछ नहीं होता। किंतु नए साल पर हम व्यक्ति और समाज के तौर कुछ संकल्प लेते ही हैं। नया साल हमें विहंगावलोकन का अवसर देता है और आगे क्या करना है इसका मार्ग भी दिखाता है। 2026 ऐसा ही एक साल है, जिसने हमें यह अवसर दिया है कि हम अपनी चुनौतियों को पहचानें और सपनों में रंग भरने के लिए आगे आएं। युवा देश होने के नाते अगर यह अवसरों का जनतंत्र है तो आकांक्षाओं का समुद्र भी लहलहा रहा है। लोग आगे बढ़ना चाहते हैं और अच्छी जिंदगी जीना चाहते हैं। यह संकट किसी भी समाज के संकट हो सकते हैं किंतु भारत को इससे जूझकर ही आगे बढ़ने का मार्ग मिलेगा।
रोजगार सृजन की गुणवत्ता -
भारत की युवा आबादी के सपने बहुत बड़े हैं। वे अच्छा रोजगार चाहते हैं।अस्थायी कम वेतन वाली नौकरियां समाज में असंतोष का ही कारण बनती हैं। गिग इकोनामी, कान्ट्रैक्ट वर्क और आटोमेशन के दौर में युवाओं का संकट गहरा किया है। देश में शिक्षा केंद्र बढ़ें हैं किंतु मुद्दा यह है कि क्या युवाओं को वहां शिक्षा मिल रही है। वे कौशल से युक्त हो रहे हैं या सिर्फ डिग्री उनके लिए बोझ बन रही है। ‘उद्योगों के लिए तैयार युवा’ कहां हैं। शिक्षा प्रणाली यह विवशता अभी खत्म होती नहीं दिखती। पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और उद्योग के बीच लंबी प्रतीक्षा आज भी बनी हुई है। ऐसे में डिग्रीधारी बेरोजगार इस देश की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। बने रहेंगें।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उपजे संकट -
एआई, मशीन लर्निंग और आटोमेशन हमारे जैसे बहुत बड़ी आबादी वाले समाज के लिए संकट भी है और अवसर भी। तकनीक से बढ़ती उत्पादकता और सक्षम मशीनें अंततः मनुष्य को हाशिए पर लगा रही हैं। बहुत सारा वर्कफोर्स बेमानी होने के आसार हैं। पारंपरिक कामों और नौकरियों पर खतरे के गहरे बादल हैं। कई जगह ये प्रारंभ भी हो गया है। इस साल हमें यह तय करना होगा कि हम सारा कुछ बाजार की शक्तियों के हवाले कर देंगे या अपेक्षित संवेदना के साथ मानवीय आवश्यक्ता के साथ संतुलन बनाएंगें।
कृषि संकट और ग्रामीण भारत -
पिछले अनेक सालों में नगर केंद्रित विकास के प्रयोगों ने हमारे शहरों को नरक और गांवों को खाली कर दिया। गांधी का ग्राम स्वराज्य का स्वप्न हाशिए पर लगा दिया गया। भारत माता ग्रामवासिनी सिर्फ गीतों का स्वर रह गया। उजड़ते गांवों ने ऐसी कथा लिखी है जिससे कहकर- सुनकर दर्द बढ़ता ही है। बावजूद इसके हमारी आधी से अधिक आबादी की निर्भरता आज भी खेती पर है। जलवायु परिर्वतन, बढ़ती लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिश्चितता और बाजार की अस्थिरता ने किसानों को गहरे संकट में डाल रखा है। खेती की उपज के मूल्य का अंतर किसान और बाजार के बीच कितना है,यह देखना जरूरी है। कृषि सुधार के अनेक प्रयासों के बाद भी खेती लाभ का व्यवसाय नहीं बन पा रही है। ऐसे में नई पीढ़ी खेती करने से दूर जा रही है और किसानों की जेब और आत्मसम्मान दोनों संकट में हैं।
इसके साथ ही जल संकट और पर्यावरण का सवाल हमारी बड़ी चुनौती है। महानगरों की फिजाओं में घुलता जहर हमने देखा है। इससे हमारी राष्ट्रीय राजधानी भी मुक्त नहीं है।कई राज्य गंभीर भूजल संकट से जूझ रहे हैं। अनियमित मानसून, प्रदूषण और अंधाधुंध शहरीकरण ने पर्यावरण संतुलन को चौपट कर दिया है। जल,जंगल और जमीन के सवाल हमें देर तक और दूर तक परेशान करते रहेंगें। इसके चलते समाज में गहरा असंतोष पैदा हो रहा है। नए साल में इन सवालों को संबोधित करने की जरूरत है।
स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट -
कोविड संकट ने हमें आईना दिखाया था कि हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल क्या है। उससे उबर कर हमने बहुत कुछ सीखा और खुद को कई मामलों में आत्मनिर्भर बनाया। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर शहर और गांव का खांई और भी गहरी होती जा रही है। आयुष्मान योजना जैसे प्रकल्प भी लगता है कि निजी क्षेत्र की लूट का कारण बन गए हैं। आयुष्मान और बीमा धारकों की हैसियत को देखकर इलाज करने वाले अस्पताल भी खड़े हो गए हैं। रोग के बजाए मरीज तलाशे जा रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा देने वाले कुछ लोग कई मायने में अमानवीयता की हदें पार कर रहे हैं। निजी सेवाएं महंगी होते जाने से सरकारी तंत्र पर दबाव बहुत बढ़ गया है। सरकारी अस्पतालों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है किंतु सर्वाधिक मरीज उन्हीं के पास हैं। ऐसे में भारत का मध्यवर्ग गहरे संकट का शिकार है। उसकी सुनने वाला कोई नहीं है। महंगाई, शिक्षा-स्वास्थ्य खर्च, ईएमआई, अस्थाई नौकरियां, करों का बोझ मध्यवर्ग के लिए चुनौती है। इससे सामाजिक अस्थिरता और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का संकट संभव है।
राज्यों की वित्तीय चुनौतियां -
लोकलुभावन वायदों को पूरा करने में राज्यों ने अपनी आर्थिक स्थिति चौपट कर ली है। संघीय ढांचा संतुलन और सहयोग की धुरी पर टिका हुआ है किंतु हालात संकटपूर्ण हैं।राज्यों के खस्ताहाल आर्थिक तंत्र, कर वितरण और योजनाओं के क्रियान्यवन से जुड़े संकटों को नए साल में हल करने की जरूरत है। इसके साथ ही भारत की जटिल भौगोलिक संरचना में वह हर तरफ विरोधी विचार के देशों से घिरा है। पाकिस्तान और चीन के बाद अब बांग्लादेश की शांत सीमा से भी संकट बढ़ रहा है। ऐसे में सुरक्षा चुनौतियां बहुत गंभीर हैं। ऐसे में गहरे रणनीतिक संतुलन, कूटनीति और धैर्य की जरूरत दिखती है। नए साल में हमें इन संकटों से दो-चार होना पड़ेगा।
सूचना का शोर और भरोसे का संकट -
मीडिया को चौथा स्तंभ कहकर लोक ने समादृत किया है। किंतु वह गहरे सूचना शोर से जूझ रहा है जहां भरोसे का संकट गहरा हुआ है। फेक न्यूज, प्रौपेगेंडा, एल्गोरिदमिक एजेंडा और टीआरपी संस्कृति ने समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 2026 का साल मीडिया के लिए खुद के आत्ममूल्यांकन और आत्मपरिष्कार का साल भी है। इसके साथ ही सोशल मीडिया ने नए संकट खड़े किए हैं। मुख्यधारा का मीडिया भी इससे आक्रांत है। सोशल मीडिया संवाद के बजाए विवाद का मंच बना हुआ है। सामाजिक समरसता और सद्भाव से परे हटकर दी जा रही सूचना और कथाएं हमारे लिए विचार का विषय हैं। इससे हमारी स्वाभाविक सद्भावना खतरे में हैं।
इन संकटों के बीच भी हम तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। हमें अपने संकटों के हल खुद खोजने होंगें। नया साल वह अवसर है कि हम आत्ममूल्यांकन कर सही दिशा में सामूहिक प्रयत्नों का सिलसिला आगे बढ़ाएं। 2026 हमारे लिए सिर्फ आर्थिक वृद्धि का साल नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय विवेक, सामाजिक संतुलन और संवेदनशीलता की परीक्षा भी है। अनेक गंभीर चुनौतियों के बाद भी हम नीति,नीयत और ताकतवर नेतृत्व से अपने संकटों का हल कर सकते हैं। आइए अपने भागीरथ हम स्वयं बनें और विकास के साथ करुणा को साधकर एक बार पुनः भारतबोध की यात्रा पर प्रयाण करें।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
ट्रम्प को सिर्फ़ डॉलर दिखता है। जेलेंस्की में भी उन्हें परेशान मुल्क का मुखिया नहीं, एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी नजर आ रही है। जेलेंस्की का हलाल होना तय है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की रूस के साथ जारी युद्ध और इस समस्या के समाधान के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से फ्लोरिडा में मिले हैं। ट्रम्प किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि ख़ुद अमेरिका और दुनिया के लिए भी एक बड़ी समस्या बन गए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक सनकी शख्स हैं। वह कब क्या करेंगे, वह ख़ुद भी नहीं जानते।
डोनाल्ड ट्रंप को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि मनमानी करके और तुगलकी फरमान जारी करके वे अपनी ही नहीं, अमेरिका की भी जगहंसाई करवा रहे हैं। टैरिफ को दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्द बताने वाले ट्रंप ने दुनिया को “टैरिफ टेरर” दिया है। ट्रम्प का व्यवहार याद दिला रहा है कि एक आत्ममुग्ध पूंजीवादी जब सर्वोच्च पद पर पहुंच जाता है तो वह किस हद तक तानाशाही भरा सलूक कर सकता है।
‘अमेरिका फर्स्ट’ कहने वाले ट्रंप के रहते-रहते अमेरिका में कई अमेरिका हो गए हैं, जो एक-दूसरे को हैरत से देख रहे हैं और यह सब सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप के होने का नतीजा है। प्रश्न यह भी उठता है कि अमेरिकी लोकतंत्र के भीतर किसी सनकी तानाशाह को रोकने के जो तरीक़े थे, वे ट्रंप के मामले में नाकाम क्यों रहे? ट्रंप पहले पूंजीपति नहीं हैं, जिनके भीतर अमेरिका का राष्ट्रपति होने की इच्छा पैदा हुई।
फोर्ड से लेकर कई पैसे वालों ने राष्ट्रपति होने का सपना देखा, लेकिन उनके मामले में लोकतंत्र के चौकीदार कहीं ज़्यादा सतर्क साबित हुए। कई बार अमेरिकी संविधान और चुनाव की प्रक्रिया में संशोधन भी किए गए, मगर इस बार लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की वह छन्नी ठीक से काम नहीं कर सकी और ट्रंप दूसरी बार सत्ता के शिखर पर पहुंच गए।
डोनाल्ड ट्रंप अब अपने विरोधियों को दुश्मन की तरह देखते हैं, स्वतंत्र प्रेस को डराते हैं और तीसरी बार राष्ट्रपति बनने की अपनी सनक के लिए संविधान संशोधन का रास्ता तलाश कर रहे हैं। ट्रंप लोकतंत्र की उन हर संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं, जो क्षरण रोकने के लिए हैं—अदालतों, ख़ुफ़िया एजेंसियों और एथिक्स ऑफिस तक को। लोकतंत्र के लिए जागरूक अमेरिकी जनता ने कैसे इतिहास में दूसरी बार, एक ऐसे आदमी को राष्ट्रपति चुना है, जिसके पास सार्वजनिक सेवा का कोई अनुभव नहीं है, संवैधानिक अधिकारों को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखती, और जिसमें बहुत साफ़ अधिनायकवादी प्रवृतियां हैं।
ट्रम्प राष्ट्रपति ऑफिस को अपनी निजी जायदाद की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और इसलिए ट्रम्प को लगता है कि अमेरिका का यह सर्वोच्च पद उनकी जायदाद है। लोकतंत्र के नाम पर ही लोकतंत्र को ख़त्म करने का काम ट्रम्प अमेरिका में कर रहे हैं। दुनिया के छोटे देश जो अमेरिका से सुरक्षा पाते थे आज ट्रंप उन्हें ही निगलने का मंसूबा पाल रहे हैं।
ट्रम्प ने अमेरिका का कितना नुक़सान किया है, यह ट्रम्प के जाने के बाद ही अमेरिका को समझ में आएगा। ट्रम्प को सिर्फ़ डॉलर दिखता है। जेलेंस्की में भी उन्हें परेशान मुल्क का मुखिया नहीं, एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी नजर आ रही है। जेलेंस्की का हलाल होना तय है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
अगले साल ब्रोकरेज हाउस Nifty के 28 हज़ार से 29 हज़ार की रेंज में जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। 10-12% रिटर्न मिलने की संभावना है। रिटर्न लार्ज कैप में ज़्यादा होने की संभावना है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
साल के आख़िर में छोटी सी खबर पर नज़र पड़ी कि इस साल रिटेल यानी छोटे निवेशकों ने शेयर बाज़ार के सेकेंडरी सेग्मेंट में बिकवाली कर डाली। अब तक शुद्ध बिक्री 8 हज़ार करोड़ रुपये की हुई है। 2020 के बाद से वो लगातार ख़रीदारी कर रहे थे। विदेशी निवेशकों ने पहले ही मुँह मोड़ रखा है। बाज़ार सिर्फ म्यूचुअल फंड SIP के भरोसे चल रहा है। हिसाब-किताब में चर्चा करेंगे कि छोटे निवेशकों का मोहभंग क्यों हो रहा है?
2020 में कोरोनावायरस लॉकडाउन के दौरान रिटेल निवेशकों ने शेयर बाज़ार में डायरेक्ट पैसे लगाने शुरू किए। Zerodha और Groww जैसे ऐप ने इन्वेस्टमेंट आसान कर दिया था। पिछले पाँच साल में पाँच लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा निवेश छोटे निवेशकों ने किया। इस साल यह सिलसिला टूट गया। इसका कारण रहा शेयर बाज़ार में गिरावट। ज़्यादातर निवेशक गिरावट को झेल नहीं पाए। लार्ज कैप और मिड कैप में रिटर्न सिंगल डिजिट में रहा जबकि स्मॉलकैप में तो निगेटिव हो गया। बाज़ार में गिरावट के कारणों की चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं। इसके तीन कारण हैं।
पहला, कंपनियों के मुनाफ़े में सुस्ती। दूसरा, शेयरों का महंगा होना और आखिरी कारण है अमेरिकी ट्रेड डील का फँसना। छोटे निवेशकों ने बाज़ार में बने रहने के बजाय मुनाफा कमाकर निकलना बेहतर समझा। शेयर बाज़ार में तीन बड़े खिलाड़ी हैं। पहला विदेशी निवेशक (FII), दूसरे म्यूचुअल फंड जैसे डोमेस्टिक इनवेस्टर्स (DII) और रिटेल निवेशक। इसमें से सिर्फ DII ख़रीददारी कर रहे हैं क्योंकि SIP के ज़रिए उनके पास पैसे आ रहे हैं। इस साल तीन लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा आ चुके हैं। यही पैसा बाज़ार को थामे हुए है। यह पैसा कम हो जाएगा तो बाज़ार मुश्किल में पड़ जाएगा।
अगले साल ब्रोकरेज हाउस Nifty के 28 हज़ार से 29 हज़ार की रेंज में जाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। ऐसा होने पर 10-12% रिटर्न मिलने की संभावना है। रिटर्न स्मॉल कैप के मुक़ाबले लार्ज कैप में ज़्यादा होने की संभावना है। यही वजह है कि निवेशक शेयर बाज़ार के बजाय सोने-चाँदी पर दाँव लगा रहे हैं। पिछले साल सोने ने 78% जबकि चाँदी ने 144% का ज़बरदस्त रिटर्न दिया है। 2026 में सोने-चाँदी के दाम ऊपर जाने का अनुमान तो है लेकिन रफ़्तार धीमी हो सकती है। रिटर्न 10-20% की रेंज में रहने की उम्मीद है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
धर्म और संस्कृति पर पूरी दुनिया आग्रही हो रही है। धर्म और परंपरा को प्रगतिशीलता का दुश्मन बतानेवाले इकोसिस्टम को अमेरिका को देखना चाहिए। धर्म, परिवार और बच्चों को लेकर वहां आकर्षण बढ़ा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब भी हिंदू धर्म या हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो विपक्षी दल विशेषकर वामपंथी और उनका इकोसिस्टम उछलने लगता है। वो धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत करने लग जाते हैं। इसी तरह से जब प्रधानमंत्री मोदी हिंदू धर्म की बात करते हैं या हिंदू या सनातन धर्म के प्रतीकों को रेखांकित करते हैं तो कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल के नेता इसको धर्म और राजनीति का घालमेल बताने लग जाते हैं।
संविधान और उसके अनुच्छेदों को उद्धृत करने लगते हैं। दुनिया के अन्य देशों का उदाहरण देने में प्राणपन से जुट जाते हैं। जहां तक मुझे स्मरण है कि कुछ वर्षों पूर्व जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो एक रिपोर्ट आई थी जिसमें भारत में धार्मिक असहिष्णुता की बात की गई थी। अब तो अमेरिका में भी बदलाव की बयार देखने को मिल रही है। वहां खुल कर ईसाई धर्म की और उसकी रक्षा की विस्तार से बातें की जा रही है।
पिछले दिनों अमेरिका में चार्ली किर्क की फ्रीडम टी शर्ट पहनने वाली एक महिला जेनी को जब सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया गया तो पूरे अमेरिका में उसके समर्थन की लहर दौड़ गई। देखते देखते जेनी के समर्थन में ढाई लाख डालर से अधिक की क्राउड फंडिंग हो गई। उनका अमेरिका फेस्ट के मंच पर अभिनंदन किया गया। चार्ली किर्क अमेरिका का दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता था जो अमेरिकी समाज की परंपराओं को लेकर निरंतर मुखर रहता था। इस वर्ष उनकी हत्या कर दी गई थी। अमेरिका में चार्ली किर्क को परंपरावादी माना जाता था। राष्ट्रपति ट्रंप से उनके करीबी रिश्ते थे।
अभी क्रिसमस बीता है। क्रिसमस के पहले अमेरिका में कमला हैरिस का एक वक्तव्य खूब वायरल हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनावी रैली में कमला ने कहा था ‘हाउ डेयर यू विश क्रिसमस’। करीब 15 दिनों तक कमला हैरिस के इस वीडियो को चलाकर उनकी आलोचना की गई। प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य कमला हैरिस और उनकी पार्टी को धर्म विरोधी बताने का था।
ऐसा इसलिए भी लगता है कि व्हाइट हाउस ने क्रिसमस के अवसर पर एक्स पर पोस्ट किया, वी आर सेइंग मेरी क्रिसमस अगेन। इसके बाद क्रिसमस ट्री की फोटो और अमेरिका का झंडा लगया गया है। इस पोस्ट में क्रिसमस ट्री के आगे डोनाल्ड ट्रंप की फोटो थी और उनके आफिशियल हैंडल को टैग किया गया। इस पोस्ट को कमला हैरिस के लिए संदेश के तौर पर देखा गया।
इतना ही नहीं डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक्स हैंडल से जो पोस्ट किया वो और भी मारक है- ‘सभी को मेरी क्रिसमस। उन नीच रैडिकल लेफ्ट को भी जो अमेरिका को ध्वस्त करने के हर संभव प्रयास से जुड़े हुए हैं लेकिन बुरी तरह असफल हो रहे हैं। अब हमारी कोई सीमा खुली हुई नहीं है, पुरुष महिलाओं के वस्त्र में नहीं हैं और कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियां कमजोर नहीं हैं।
हमारा स्टाक मार्केट रिकार्ड स्तर पर है। महंगाई नहीं है। बीते कल हमारी जीडीपी 4.3 पर थी जो उम्मीद से दो प्वाइंट अधिक है। टैरिफ से खरबों डालर मिले जिससे हम समृद्ध हुए। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा उच्चतम स्तर पर है। पूरी दुनिया में हमारा सम्मान बढ़ा है। भगवान! अमेरिका पर कृपा बनाए रखें।‘ ट्रंप का ये एक्स पोस्ट पूरी तौर पर राजनीतिक है और क्रिसमस और भगवान को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कल्पना कीजिए अगर हमारे देश में प्रधानमंत्री मोदी या राष्ट्रपति इस तरह की पोस्ट लिख दें तो कैसा बवाल मचता।
धर्म के नाम पर अमेरिका में इतना ही नहीं हो रहा है। व्हाइट हाउस ने 26 दिसंबर को राष्ट्रपति ट्रंप का एक वक्तव्य जारी किया जिसमें लिखा है कि आज रात को कमांडर इन चीफ के तौर पर मेरे निर्देश पर संयुक्त राज्य ने आई एस आई एस के नीच आतंकवादियों पर पूरी ताकत के साथ मारक हमला किया। ये वही आतंकवादी हैं जो पिछले कई दिनों से निर्दोष ईसाइयों पर हमला कर रहे हैं और उनकी जान ले रहे हैं।
इस संदेश से ये स्पष्ट है कि पूरी दुनिया में अगर ईसाइयों पर कहीं हमला होगा तो अमेरिका उसमें प्रभावी हस्तक्षेप करेगा। इसकी एक पृष्ठभूमि है। दो नवंबर को ट्रंप ने नाइजीरिया सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर वहां की सरकार इस्लामिक आतंकवादियों को ईसाई जनता को मारने से नहीं रोकेगी तो हर तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे। ट्रंप ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया था। अगर नाइजीरिया सरकार अपने देश में निर्दोष और मासूम ईसाइयों की हत्या नहीं रोकती है तो हमलावरों पर उससे अधिक त्वरा से हमला होगा जैसे आतंकवादी वारदात को अंजाम देते हैं।
ये वही दौर था जब ईसाई समुदाय के लोगों ने ट्रंप से नाइजीरिया में ईसाइयों की हत्या को रोकने की मांग की थी। अमेरिका के इस कदम को अगर कूटनीतिक स्तर पर देखा जाए तो जिस तरह से बंग्लादेश में हिंदूओं पर हमले हो रहे हैं वैसे में भारत को हिंदुओं की रक्षा का अधिकार मिलता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में कुटुंब प्रबोधन की बात कर रहा है। परिवार को जोड़ने और और परिवार की महत्ता पर बल देने का उपक्रम जारी है। इस कार्यक्रम से संघ विरोधियों के पेट में दर्द हो रहा है। कुछ लोग इसको आधुनिक सोच के विपरीत बताने में जुटे हैं। वो व्यक्तिगत अधिकारों और अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने के अधिकारों की बात करते हुए संविधान को बीच में लाते हैं।
जबकि संविधान कहीं से भी कुटुंब का विरोधी नहीं है। कुछ दिनों पहले सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू दंपति को तीन बच्चा पैदा करने की सलाह दी थी। उस समय इसको लेकर खूब हंगामा हुआ। खुद को प्रगतिशील समझने और घोषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषकों ने मोहन भागवत की आलोचना की थी। अनेक प्रकार के तर्क दिए गए थे जबकि मोहन भागवत ने विशेषज्ञों की राय के आधार पर कहा था कि जिस समुदाय में जन्म दर तीन से कम होते हैं वो विलुप्त हो जाते हैं।
प्रगतिशील और आधुनिकता का दंभ भरनेवालों को अमेरिका को देखना चाहिए। वहां परिवार, शादी, बच्चे की महत्ता पर खूब चर्चा हो रही है। एलान मस्क और अमेरिका के उफराष्ट्रपति जे डी वांस अपने बच्चों के साथ ओवल आफिस में देखे जाते हैं। गर्व से वो परिवार की बात करते हैं। प्रेस सेक्रेट्री कैरोलिन लेविट जब गर्भवती होती है तो इसकी घोषणा होती है।
वहां समलैंगिक अधिकारों या लिवइन का हो हल्ला अब नहीं मच रहा है। अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात हो रही है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं से तीन बच्चा पैदा करने की अपेक्षा कर रहा है तो न तो ये पुरातन सोच है और ना ही आधुनिकता विरोधी। आज वैश्विक स्तर पर अपनी परंपराओं और धर्म से जुड़ने का आग्रह बढ़ा है। इसको जो नहीं समझ पा रहे हैं वो हाशिए पर जा रहे हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )