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‘MRUCI’ बोर्ड ने ‘IRS’ के पायलट सर्वे को दिखाई हरी झंडी
आखिरी बार यह सर्वे वर्ष 2019 में किया गया था। इसके बाद कोविड महामारी और फंडिंग की चुनौतियों के चलते इसकी शुरुआत नहीं हो पाई।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 5 months ago
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
‘मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल ऑफ इंडिया (MRUCI) के बोर्ड ने छह साल के अंतराल के बाद आखिरकार पाठकों के बदलते व्यवहार पर नजर रखने के लिए पायलट को अपनी हरी झंडी दे दी है। इंडस्ट्री से जुड़े विश्वसनीय सूत्रों ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) को यह जानकारी दी है।
सोमवार सुबह MRUCI की वार्षिक आम बैठक (AGM) में सदस्यों ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी। अभी इस बारे में विस्तार से जानकारी आनी बाकी है। MRUCI के चेयरमैन शैलेश गुप्ता से इस मामले में संपर्क नहीं हो सका।
गौरतलब है कि 28 अगस्त को ‘e4m’ ने पायलट सर्वे की चर्चा की थी। बोर्ड मीटिंग में तीन मार्केट्स में यह पायलट सर्वे करने पर विचार हुआ था, जिसमें प्रिंट और डिजिटल दोनों तरह की न्यूज रीडरशिप को शामिल किया जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि इस पायलट सर्वे में शामिल किए जाने वाले मार्केट्स के नाम गुप्त रखे जा सकते हैं, ताकि पब्लिशर्स की ओर से किसी तरह की छेड़छाड़ न हो सके। इसमें एक अर्बन (शहरी) और एक सेमी-अर्बन (अर्ध-शहरी) आबादी को शामिल किए जाने की संभावना है।
जानकारी के मुताबिक, काउंसिल इस सर्वे को अंजाम देने के लिए ‘इंटेलिफाइल’ (Inteliphyle) नामक रिसर्च फर्म की मदद ले सकती है। इस फर्म का नेतृत्व प्रसून बसु कर रहे हैं, जो पहले Kantar और Nielsen से जुड़े रह चुके हैं।
गौरतलब है कि MRUCI ने पिछले एक साल में इस सर्वे को लेकर कई बैठकें कीं, लेकिन सहमति नहीं बन पाई। फंडिंग फॉर्मूला, सर्वे मेथडोलॉजी, एजेंसी का चुनाव और सर्वे का दायरा—इन सभी मुद्दों पर काफी बहस हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
‘e4m’ की पिछली रिपोर्ट्स के अनुसार, काउंसिल के कई सदस्य पारंपरिक डोर-टू-डोर सर्वे मॉडल को लेकर संशय में हैं। कोविड के बाद हाउसिंग सोसायटीज में एंट्री प्रतिबंध, गोपनीयता को लेकर बढ़ती चिंताओं और लंबे इंटरव्यूज के लिए लोगों की अनिच्छा को देखते हुए आशंका जताई गई थी कि इससे अर्बन डेटा की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है और IRS की क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठ सकते हैं।
पब्लिशर्स का यह भी तर्क था कि इस सर्वे को दोबारा शुरू करने की लागत और जटिलता इतनी ज्यादा है कि इसकी प्रासंगिकता पर ही सवाल उठने लगे हैं, खासकर ऐसे समय में जब डिजिटल-प्लानिंग तेजी से बढ़ रही है।
2019 में हुआ था आखिरी सर्वे
आखिरी बार यह सर्वे वर्ष 2019 में किया गया था। इसके बाद कोविड महामारी और फंडिंग की चुनौतियों के चलते इसकी शुरुआत नहीं हो पाई। इस बीच, भारत का विज्ञापन बाजार 2024 में 1.1 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है, जिसमें प्रिंट की हिस्सेदारी 15–16 प्रतिशत है। यानी प्रिंट इंडस्ट्री अब भी 15,000–16,000 करोड़ रुपये के विज्ञापन राजस्व पर काबिज है। ऐसे में विज्ञापनदाताओं के लिए यह करंसी बेहद अहम है, खासकर मौजूदा आर्थिक हालात में, जब हर मार्केटिंग रुपया बारीकी से देखा जा रहा है।
इस गतिरोध ने पूरे इंडस्ट्री में यह बहस छेड़ दी है कि क्या पारंपरिक रीडरशिप सर्वे आज की मीडिया खपत की सच्ची तस्वीर दिखा सकता है, जबकि डिजिटल न्यूज, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और सोशल मीडिया की खपत तेजी से बढ़ रही है। कई लोग इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि सर्वे का दायरा बढ़ाकर सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स को शामिल किया जाए।
अब देखना यह है कि IRS खुद को एक टेक-ड्रिवन हाइब्रिड मेजरमेंट सिस्टम में बदलता है, या फिर पुरानी प्रिंट-फर्स्ट पद्धति पर कायम रहता है और धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है।
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