वरिष्ठ पत्रकार विनोद पुरोहित ने 'तलाश' को यूं दी आवाज

ब्रह्मांड में सभी को किसी न किसी की तलाश है। इस ‘तलाश’ को वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विनोद पुरोहित ने कविता के माध्यम से खूबसूरत अंदाज में बयां किया है।

Last Modified:
Friday, 30 August, 2019
Vinod Purohit

डॉ.विनोद पुरोहित

संपादक

अमर उजाला, आगरा संस्करण

रात सन्नाटे में रीत रही है,
कुछ तलाश चल रही है,
सुदूर चांद हरकारा है,
रात का संदेशा लेकर जा रहा है।

सूरज को उसका खत देकर,
एक ‘कला’ की घट-बढ़ पहन,
शाम नई पाती लेकर चल देगा,
राख लपेटी औघड़ रात पर,
चांदनी सा शुभ्र मल देगा।

सूरज को भी तो कहां चैन है,
चल रहा शून्य की तलाश है,
पेड़ ठहरे दिखते पर हैं नहीं,
दूर अटकी हवा की तलाश है।

पर्वतों को अल्हड़ नदियों की,
और नदियां सागर को व्यग्र हैं,
क्या मैं ही स्तब्ध...ठहरा हूं,
जो मुझे भेद आकाश में लटका है,
उस तारे को अपने की तलाश है।

मैं परछाई तो ये विचार कौन है,
नहीं...मैं भी तो चल रहा हूं,
मुझे खुद ही की तलाश है,
सबको कुछ तलाश.. इंतजार है,
ब्रम्हांड चल रहा, उसे ‘सत’ की तलाश है।

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क्यों हताश है, निराश है क्यों?

कवि ने इस कविता के द्वारा निराशा के भंवर से निकलकर आगे बढ़ने और जीवन में सफलता पाने के लिए प्रेरित किया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 14 September, 2019
Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Udhav Krishna

उधव कृष्ण, स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक।।

क्यों हताश है, निराश है क्यों?

चिन्ता क्यों तुझे घेरे है?

निराश जीवन में अंधियारा क्यों बिखेरे है?

चिंता को चिता पर रख दे, निराशा को रख जूते की नोंक पर!

जाग....! काम, क्रोध, मोह, त्याग!

ज्ञान का सूर्य उदय कर,

निराशा और चिन्ता को विजय कर।

खिल कर प्रकाश दे, जीवन को सदमार्ग दे!

बना रास्ता खुद का और चल उस पर

पथिक अविचल, अडिग, निर्भय होकर!

सारा अंधियारा छट जाएगा,

जीवन सरस बन जायेगा।

निराशा चिन्ता का जब क्षय होगा,

जीवन मे विजय ही विजय होगा..

मार्ग में जब तू चलेगा दुश्मन देख तुझे डरेगा!

ऐसा कुछ कमाल कर जीवन को इंकलाब कर!

आग में तप कर खुद को रौशन अपने आप कर।

गिरने से क्यों डरता है! उठ कर फिर प्रयास कर,

दीपक बन, प्रकाश कर,

दीपक बन,प्रकाश कर!

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'पांच सितारा बैठ, खाय के लौटे पिज्जा'

कविता के माध्यम से कवि ने नए मोटर कानून के परिप्रेक्ष्य में बताया है कि कैसे बिना हेलमेट के दोपहिया वाहन पर जाना भारी पड़ सकता है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Saturday, 14 September, 2019
Last Modified:
Saturday, 14 September, 2019
Rajendra Milan

डॉ. राजेन्द्र मिलन
वरिष्ठ साहित्यकार और कवि।।

पिज्जा खाने की तलब, लगी हमें श्रीनाथ।
हेलमेट बिन स्कूटर पर, ले के साली साथ।

साली ले के साथ, तिराहे पर दुकान थी।
नहीं रहा ये ख्याल, बिछी चौपड़ चालान की।

कटा मित्र चालान, कि साली बोली- जिज्जा।
पांच सितारा बैठ, खाय के लौटे पिज्जा।।

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‘हो सके तो लौट आओ’

टीवी पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने इस कविता के माध्यम से बीते दिनों से वापस आने की गुजारिश की है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Friday, 06 September, 2019
Last Modified:
Friday, 06 September, 2019
Abhishek Upadhyay Journalist

अभिषेक उपाध्याय, टीवी पत्रकार।।

जानता हूं
बीते दिन लौटकर नहीं आते
फिर भी गुजारिश है
हो सके तो एक बार जरूर लौटना
कि रात की घास के जुगनुओं को
फिर सुननी है
तुम्हारे पांवों की दस्तक
कि सर्दियों में ठिठुरती धूप को
फिर चाहिए थोड़ी गर्माहट
कि नाचती गौरेया के डैनों में
फिर से उतर आई है ठंडक
कि अब तो ख्वाब के दरवाजों पर भी
लगने लगी है दीमक
हो सके तो इसलिए भी लौटना
कि लौटने की तुमको थी आदत
भूला नहीं हूं वो फितरत!

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क्या वाकई तुम मेरे जैसा सोचते हो?

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. विनोद पुरोहित ने कविता के माध्यम से इस दुनिया को कहीं ऐसी जगह ले जाने की बात कही है, जहां पर हालात बेहतर हों

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 05 September, 2019
Last Modified:
Thursday, 05 September, 2019
Vinod Purohit

डॉ.विनोद पुरोहित, संपादक
अमर उजाला, आगरा संस्करण।।

तुम भी मेरे जैसा सोचते हो...
तो चलो...
धरती को कांधे पर उठाकर
कहीं और ले चलें,
जहां बांहे फैलाकर उसका
स्वागत हो और संकल्प हो
उसे सेहतमंद रखने का...

यहां तो बड़ी घुटन है,
नोंच-नोंच कर उसकी छाती-पसलियां
छलनी कर दीं...
खुद को ईश्वर
बनाने की होड़ में
सब कुछ ' आर्टिफिशियल' गढ़ लिया है...

सबके अपने सूरज-चांद
सबके अपनी हवा और पानी,
और तो और मूर्ति खुद की बना
चल रहा है गगनभेदी स्वस्ति गान,
घट रहा है कद, मन हो रहा गरिष्ठ।

तो चलो...
इस बोझ को कहीं उतार आएं
फिर वो सूरज बांध लाएं
वहीं गढ़ेगा फिर सौंधा मानव
यही वह गुनगुनी उम्मीद है
जिससे भुरभुरी होगी माटी।
...क्या वाकई तुम मेरे जैसा सोचते हो?

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‘हां, मैं एक पत्रकार हूं’

लेखक ने अपनी कविता के माध्यम से एक पत्रकार की मनोस्थिति का बखूबी वर्णन किया है

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 05 September, 2019
Last Modified:
Thursday, 05 September, 2019
Arjun Nirala

अर्जुन निराला, पत्रकार और कवि।।

पत्रकार और कवि अर्जुन निराला ने अपनी कविता के माध्यम से एक पत्रकार की मनोस्थिति का बखूबी वर्णन किया है। इस कविता में उन्होंने बताया है कि एक पत्रकार को किस तरह की परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और इन्हें लेकर कई बार उस पत्रकार के मन में किस तरह की बातें आती हैं।

मैं एक पत्रकार हूं
हां, मैं एक पत्रकार हूं।।

देख नहीं पाता उगता सूरज
देख नहीं पाता डूबता सूरज
देख नहीं पाता, बादलों से भरा आसमां
मैं, एक पत्रकार हूं।।

याद नहीं आ रहा, कैसे चमकती है बिजली
कैसे बरसती है बारिश
ये भी भूल गया हूं
कभी दोस्त के फोन
से जान पाता हूं
कि बारिश हो रही है
मैं, एक पत्रकार हूं।।

खिड़की पर लगे काले शीशे से बाहर झांकता हूं
सब कुछ दिखता है काला-काला
पर, बारिश नहीं...
बारिश की बूंदें भी नहीं
नीचे उतर नहीं सकता
बारिश से खेल नहीं सकता
क्योंकि, काम का है बोझ
बॉस का है डर
उससे भी ज्यादा
दसवें माले पर जो रहता हूं मैं
मैं, एक पत्रकार हूं।

अरे! देखा बारिश
दोस्त का फोन फिर बजता है
नहीं रे!...कहता हूं
अब, तो इंद्रधनुष भी निकल आया आसमान पर
मैं कैसे कहूं कि...
भूल चुका हूं इंद्रधनुष के रंग भी
जबकि पन्नों में रोज भरता हूं
तरह-तरह के रंग
मैं, पत्रकार हूं
हां, मैं एक पत्रकार हूं।।

कवि परिचय: 

नामः अर्जुन निराला
(पत्रकार, कवि, लेख  और अनुवादक )
पिताः स्व. श्री वी.बी.निराला
माताः स्व. श्रीमती सावित्री देवी
जन्मस्थलः डिगबोई, तिनसुकिया, असम)
पेशाः पत्रकारिता (अमर उजाला में समाचार संपादक और अमर उजाला फाउंडेशन में वरिष्ठ समन्वयक)
कार्यः 17 वर्षों से पत्रकारिता 
शिक्षाः प्रारंभिक गांव में, फिर गुरुकुल करतारपुर, जालंधर (पंजाब), प्रभाकर (पंजाब विश्वविद्यालय , चंडीगढ़), राजनीतिक शास्त्र ऑनर्स के साथ बीए (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र) और एम.ए. हिंदी (पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़) 
भाषाओं के जानकारः नेपाली, हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, संस्कृत सहित आठ भाषाओं की जानकारी 
अनुवादः नेपाली से हिंदी 
           असमिया से हिंदी
            पंजाबी से हिंदी
            बंगला से हिंदी

सद्यः माँ, मेरी कविता संग्रह (हिंदी में)
मान्यताः नेपाल सरकार द्वारा अनुवादक के रूप में मान्यता
सम्मानः रक्तदान और समाज सेवा के क्षेत्र में कई सम्मान

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‘उनको क्या पता कि कैसे जी रहे हैं ये बच्चे-बच्चियां’

कई बार इन बच्चों को कोई पैसा दे देता है तो इनकी आंखों में एकदम से चमक आ जाती है तो कई बार इन्हें निराश होना पड़ता है

Last Modified:
Friday, 30 August, 2019
Arjun Nirala

अर्जुन निराला, पत्रकार और कवि।।

आपने देखा होगा कि बड़े शहरों में लाल बत्ती पर वाहनों के रुकते ही बच्चे-बच्चियों का झुंड अचानक से सड़क पर इन वाहनों के बीच में आ जाता है। मैले-कुचैले कपड़े पहने ये बच्चे-बच्चियां अपने करतब दिखाकर अथवा छोटा-मोटा सामान बेचकर दो पैसे कमाने की उम्मीद में रहते हैं। इनमें से कई बच्चे तो भीख तक मांगते हैं। कई बार इन बच्चों को कोई पैसा दे देता है तो इनकी आंखों में एकदम से चमक आ जाती है तो कई बार इन्हें निराश होना पड़ता है। इसके बावजूद ये बच्चे पेट की खातिर हार नहीं मानते और दोबारा से रेड लाइट होने का इंतजार करते हैं। रेड लाइट पर मौजूद ऐसे ही बच्चे-बच्चियों की हालत को पत्रकार और कवि अर्जुन निराला ने अपनी कविता के माध्यम से कुछ यूं बयां किया है।    

गर न होतीं शहरों में ये लाल बत्तियां।
भूखे ही मर जाते हजारों बच्चे-बच्चियां।।

कुछ दे जाते हैं, अठन्नी एक रुपया।
कुछ को तकते ही रह जाते हैं बच्चे-बच्चियां।।

कुछ बुलाते हैं, तो कुछ बंद कर देते हैं खिड़कियां।
उनको क्या पता कि कैसे जी रहे हैं ये बच्चे-बच्चियां।।

तपती धूप में, नंगे पांव, ये कोमल-सी कलियां।
दिन-भर इधर से उधर भागते हैं बच्चे-बच्चियां।।

सुना है सरकार ने चला रखी हैं इनके लिए कई योजनाएं।
भूखे पेट योजना को क्या जानें ये बच्चे-बच्चियां।।

लाल बत्ती के पास, उग आया शहतूत ही है ठिकाना।
घर क्या होता है, क्या जानें 'निराले' ये बच्चे-बच्चियां।।

कवि परिचय: 

नामः अर्जुन निराला
(पत्रकार, कवि, लेख  और अनुवादक )
पिताः स्व. श्री वी.बी.निराला
माताः स्व. श्रीमती सावित्री देवी
जन्मस्थलः डिगबोई, तिनसुकिया, असम)
पेशाः पत्रकारिता (अमर उजाला में समाचार संपादक और अमर उजाला फाउंडेशन में वरिष्ठ समन्वयक)
कार्यः 17 वर्षों से पत्रकारिता 
शिक्षाः प्रारंभिक गांव में, फिर गुरुकुल करतारपुर, जालंधर (पंजाब), प्रभाकर (पंजाब विश्वविद्यालय , चंडीगढ़), राजनीतिक शास्त्र ऑनर्स के साथ बीए (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र) और एम.ए. हिंदी (पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़) 
भाषाओं के जानकारः नेपाली, हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, संस्कृत सहित आठ भाषाओं की जानकारी 
अनुवादः नेपाली से हिंदी 
           असमिया से हिंदी
            पंजाबी से हिंदी
            बंगला से हिंदी

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मान्यताः नेपाल सरकार द्वारा अनुवादक के रूप में मान्यता
सम्मानः रक्तदान और समाज सेवा के क्षेत्र में कई सम्मान

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वरिष्ठ पत्रकार अमर आनंद ने कुछ यूं बयां की 'अतर्मन की आवाज'

कवि ने इस कविता के माध्यम से देश व समाज कल्याण के लिए कई कार्य करने की इच्छा जताई है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by समाचार4मीडिया ब्यूरो
Published - Thursday, 29 August, 2019
Last Modified:
Thursday, 29 August, 2019
Amar Anand

अमर आनंद, वरिष्ठ पत्रकार।।

मैं अंतर के उजाले से बाहर के अंधेरे का सामना करता हूं।

ये उजाला पूरी दुनिया को रौशन करे, ऐसी कामना करता हूं।।

मैं भूखों के लिए रोटी का जरिया बनना चाहता हूं।

मैं युवाओं के लिए सकारात्मक नजरिया बनना चाहता हूं।।

चाहता हूं कि मैं प्रेम की भावना बनूं।

और चाहता हूं कि देश के लिए संभावना बनूं।।

मैं चाहता हूं कि लहराऊं तिरंगा बनकर आकाश में।

और भागीदार बनूं व्यक्ति और समाज के विकास में।।

मैं चाहता हूं कि दर्द बांटूं देश का।

और चाहता हूं कि गम छीन लूं परिवेश का।।

मैं वतन की आज़ादी का गान बनना चाहता हूं।

 मैं धरती मां का स्वाभिमान बनना चाहता हूं।।

गर बन सकूं तो हर होंठ पर खुशी के गीत बनूं मैं।

जिनके जीवन में है पीड़ा, उनका मीत बनूं मैं।।

मैं जालिमों के लिए जलजला बनना चाहता हूं।

हारे हुए का हौसला बनना चाहता हूं।।

दुनिया के लिए उम्मीद की आहट बनना चाहता हूं।

मेहनतकशों के लिए कामयाबी की छटपटाहट बनना चाहता हूं।।

बन सकूं तो सूरज का शौर्य बनूं मैं।

सबको अपनाती हूई धरती का धैर्य बनूं मैं।।

मैं जानता हूं कि मेरी ये जंग है बहुत भारी।

और इस राह में मुश्किलें हैं बहुत सारी।।

फिर भी ये सिलसिला मैं यूं ही बढ़ाना चाहता हूं।

चांद की चांदनी बनकर जमीं पर छा जाना चाहता हूं।।

दुआ कीजिए कि जीत जाऊं मैं हर समर में।

इतनी ताकत, इतना साहस हो आपके अमर में।।

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‘शायद सभी का यही हाल हो, जो भी पत्रकार बना’

कवि ने कविता के माध्यम से एक पत्रकार की शुरुआत से लेकर उसकी नौकरी जाने तक के बारे में वर्णन किया है

Last Modified:
Friday, 05 July, 2019
Bhanu Pratap

भानु प्रताप सिंह, पत्रकार।।

दर्जनों डिग्री लेकर जब मैं बेरोजगार बना।

संपादक की मेहरबानी से बिन तनख्वाह पत्रकार बना।।
 

जेब में कैमरा, गाड़ी में PRESS लिखा, मैं थोड़ा बना ठना।

मुहल्ले की खबर छपी तो लिखित पत्रकार बना।।
 

खबर छापकर सबका दुश्मन, एक का वफादार बना।

शायद सभी का यही हाल हो जो भी पत्रकार बना।
 

एक घटना का शिकार हुआ तो पहली बार लाचार हुआ।

जिम्मेदार लोग कहे तू तो बड़का पत्रकार बना।।
 

थाना, कचहरी एक कर मैं खबरों का सरदार बना।

बिन पेट्रोल गाड़ी, जेब हुई खाली, जब से मैं पत्रकार बना।।
 

सबके सामने सम्मान हुआ, पीठ पीछे अपमान हुआ।

फिर भी मैं पत्रकार बना।।
 

मोबाइल, फोन पर बुलावा सुन-सुनकर जीना मेरा दुश्वार बना।

रात की खबर कवरेज कर दिन-रात का मैं पत्रकार बना।।
 

नेता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाकर मैं थोड़ा समझदार बना।

नेता से जेब खर्च न लेकर मैं रसूलों वाला पत्रकार बना।।
 

हर पर्व भिखारी जैसे विज्ञापन मांगू।

मैं कैसा पत्रकार बना।।
 

विज्ञापन में कमीशन की झिकझिक हुई, अखबार से निकलना पड़ा।

अब तो मां-बाप भी पूछे, तू कैसा पत्रकार बना।।

(लेखक उत्तर प्रदेश के औरेया में TV100 चैनल में पत्रकार हैं।)

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राणा यशवंत की सोच: बात होनी ही चाहिए, जब बात ज़रूरी हो...

जो लोग कहते हैं कि टीवी न्यूज के पत्रकारों में रचनात्मकता नहीं होती...

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Thursday, 20 September, 2018
Last Modified:
Thursday, 20 September, 2018
rana yashwant

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

जो लोग कहते हैं कि टीवी न्यूज के पत्रकारों में रचनात्मकता नहीं होती। वे साहित्य और समाज को लेकर उदासीन है। लेकिन ऐसा नहीं है, आलोचकों के मिथक को आजकल टेलिविजन के पत्रकार लगातार तोड़ रहे हैं। इन पत्रकारों में इंडिया न्यूज के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत का नाम भी शुमार है, जो जाने-माने पत्रकार होने के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी हैं। और अमूमन कवि अपनी कविता के जरिए अपनी सोच को भी दर्शाता है। 2016 में उनका काव्य संग्रह ‘अंधेरी गली का चांद’ का विमोचन हुआ था, जो काफी लोकप्रिय रहा। उनकी द्वारा लिखी एक कविता आप यहां पढ़ सकते हैं-  

 

बात होनी ही चाहिए

जब बात ज़रूरी हो

कोई मसला हो, कोई मुसीबत हो

कोई संकट हो, कोई मजबूरी हो

बात होनी ही चाहिए

जब बात ज़रूरी हो

 

समय के पहले बात नहीं बनती

समय के बाद बात नहीं पचती

बात से बात निकल जाती है

बात से बात बन जाती है

बात होनी ही चाहिए

जब बात ज़रूरी हो

 

बात पर कोई टिक जाता है

बात पर कोई बिक जाता है

बात-बात में अंतर बन जाता है

बात का बतंगड़ बन जाता है

बात होनी ही चाहिए

जब बात ज़रूरी हो

 

 

 

 

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अभी साहित्य से बहुत दूर हूं मैं...!

दोस्तो, कविता लिखना तो बस अपने अंदर के और आसपास के विश्व को देखना भर है...

Samachar4media Bureau by Samachar4media Bureau
Published - Tuesday, 24 July, 2018
Last Modified:
Tuesday, 24 July, 2018
kunwar cp singh

कुंवर सी.पी. सिंह

युवा पत्रकार ।।

दोस्तो, कविता लिखना तो बस अपने अंदर के और आसपास के विश्व को देखना भर है। कविता, प्रेम से लेकर खलिहान के जंग लगे दरवाजे तक, किसी भी चीज के संबंध में लिखी जा सकती है। कविता लिखने से आप अधिक भावपूर्ण हो सकते हैं और आपकी भाषा शैली भी सुधर जाएगी, परंतु यह समझ पाना कठिन होता है कि शुरुआत कहां से की जाए। हालांकि, कविता लेखन निश्चय ही एक ऐसा कौशल है जो अभ्यास से सुधरता है...!!

क्या मैंने लिखा है मन के समंदर को,

क्या मैंने लिखा है टूटते गहन अंदर को...

क्या देह की देहरी से इतर कुछ लिख सका हूं मैं,

क्या मन की खिड़की से कुछ कह सका हूं...

क्या स्त्री की उपेक्षा मैंने लिखी है,

क्या बेटी की पीड़ा हमको दिखी है...

क्या कृष्ण के कर्षण को मैंने नचा है,

क्या राम के आकर्षण को मैंने रचा है...

क्या शरद के रास में खुद को भिगोया है,

क्या फाग के रंग में खुद को डुबोया है...

क्या क्रांति के स्वर हमारी कानों में पड़े हैं,

सुना है सत्य के मुंह पर ताले पड़े हैं...

हर शख्स खामोशी से सहमा यहां है,

हर रात ओढ़े गहरी कालिमा यहां है...

क्या मैंने पीड़ितों की आहों को शब्दों में उकेरा है,

सुना है चांद पर आजकल जालिम का बसेरा है...

क्या गिद्ध की गंदी निगाहों को मैंने पढ़ा है,

सच के मुंह पर ये तमाचा किसने जड़ा है...

अगर ये सभी हमारी कविता में नहीं है...

सरोकारों से गर हमारी संवेदनाएं नहीं हैं...

भले ही जमाने में कितने भी मशहूर हूं मैं,

सच मानो अभी साहित्य से बहुत दूर हूं मैं...!

 

 

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