अटेंशन मेट्रिक्स (Attention Metrics) एक मजबूत और भरोसेमंद तर्क के साथ आए, लेकिन वे बहुत देर से आए। विज्ञापन उद्योग अब आगे बढ़ चुका है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रेमजीत सोढ़ी, ग्लोबल एनालिटिक्स लीड, WPP मीडिया ।।
अटेंशन मेट्रिक्स (Attention Metrics) एक मजबूत और भरोसेमंद तर्क के साथ आए, लेकिन वे बहुत देर से आए। विज्ञापन उद्योग अब आगे बढ़ चुका है। ऐसे में एजेंसियों और विज्ञापनदाताओं (क्लाइंट्स) के लिए बेहतर होगा कि वे यह मान लें कि बाजार अब इस मेट्रिक से आगे निकल चुका है, बजाय इसके कि वे ऐसे पैमाने का बचाव करते रहें जिसे बाजार चुपचाप पीछे छोड़ चुका है।
कई दशकों तक विज्ञापन उद्योग एक ऐसी धारणा पर चलता रहा, जो पूरी तरह सही नहीं थी। माना जाता था कि मशीनों द्वारा बताए गए इम्प्रेशन (Impressions) और व्यू (Views) ही विज्ञापन के असर का भरोसेमंद पैमाना हैं। यानी जितने ज्यादा लोगों तक विज्ञापन पहुंचा, उतना ही उसे सफल मान लिया गया। लोगों की नजरें (Eyeballs) गिनना ही अपने आप में एक बड़ा कारोबार बन गया। इम्प्रेशन, रीच, फ्रीक्वेंसी, व्यू और कॉस्ट पर थाउजेंड (CPM) जैसे शब्द मीडिया खरीद (Media Buying) की दुनिया की मुख्य भाषा बन गए। इन सभी का फोकस सिर्फ मात्रा (Volume) पर था।
सबसे ज्यादा महत्व इस बात को दिया जाता था कि कितना विज्ञापन दिखाया गया और उसे दिखाने में कितना खर्च आया, न कि इस बात को कि विज्ञापन का दर्शकों पर वास्तव में क्या असर पड़ा। यह मान लिया जाता था कि अगर विज्ञापन पहुंच गया है तो वह प्रभावी भी होगा।
अटेंशन मीजरमेंट (Attention Measurement) ने इसी सोच को सीधे चुनौती दी। इसमें आई-ट्रैकिंग (Eye-Tracking) जैसी तकनीक का इस्तेमाल करके यह समझने की कोशिश की गई कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म, विज्ञापन की जगह (Placement) और फॉर्मेट पर दर्शकों ने वास्तव में कहां और कितनी देर तक देखा। यानी यह सिर्फ विज्ञापन दिखने की संख्या नहीं गिनता, बल्कि यह मापता है कि क्या दर्शकों ने वास्तव में विज्ञापन पर ध्यान दिया या नहीं।
अटेंशन मेट्रिक्स के समर्थकों का कहना था कि ध्यान (Attention) ही विज्ञापन के प्रति उपभोक्ता की पहली वास्तविक प्रतिक्रिया होती है। यही वह कड़ी है जो विज्ञापन की डिलीवरी और उसके वास्तविक असर (Effect) को जोड़ती है। यह तर्क पूरी तरह सही और तार्किक था।
दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने इसका परीक्षण भी किया। विज्ञापन एजेंसियों ने अपनी मीडिया प्लानिंग में अटेंशन स्कोर को शामिल करना शुरू किया। इस क्षेत्र में कई नई कंपनियां और सेवाएं भी विकसित हो गईं। लेकिन शुरुआती उत्साह कभी पूरी तरह अपनाने (Commitment) में नहीं बदल सका और अब इसकी वजह भी साफ हो चुकी है।
अभी पूरी तरह तैयार नहीं Attention Metrics
विज्ञापन उद्योग की ओर से दिखाई जा रही सावधानी गलत नहीं है। आज जिस रूप में अटेंशन मीजरमेंट मौजूद है, उसने विज्ञापन उद्योग को कुछ नई और उपयोगी जानकारियां जरूर दी हैं, लेकिन इसे अभी केवल एक अच्छी शुरुआत या शुरुआती ड्राफ्ट ही कहा जा सकता है। अभी इसमें कई कमियां हैं।
दुनिया के अलग-अलग देशों और बाजारों में इसका डेटा समान रूप से उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा अलग-अलग तरह के दर्शकों (Audience Segments) और अलग-अलग उत्पाद श्रेणियों (Categories) के हिसाब से भी पर्याप्त और अलग-अलग विश्लेषण उपलब्ध नहीं है।
वर्तमान में Attention को केवल एक ही पहलू (Uni-dimensional) से मापा जाता है। जिस तरह से आज अटेंशन स्कोर तैयार किए जाते हैं, उसमें लंबे समय वाले कंटेंट (Long-form Content) को स्वाभाविक रूप से ज्यादा फायदा मिलता है। यह तरीका इस बात को ठीक से नहीं समझ पाता कि अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर लोग कंटेंट को अलग-अलग तरीके से देखते और इस्तेमाल करते हैं।
इसके अलावा, बड़े स्तर पर Market Mix Models में Attention Scores को शामिल करने के लिए कई वर्षों का लगातार इकट्ठा किया गया डेटा (Longitudinal Data) चाहिए, लेकिन फिलहाल इतनी मात्रा में ऐसा डेटा उपलब्ध नहीं है।
यही वजह है कि अभी यह साबित नहीं किया जा सका है कि Attention और वास्तविक कारोबारी नतीजों (Business Outcomes) के बीच सिर्फ संबंध (Correlation) ही नहीं, बल्कि सीधा कारण और परिणाम (Causation) भी है। यानी यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ज्यादा Attention मिलने से वास्तव में बिक्री या कारोबार में कितना बदलाव आता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मीडिया प्लानिंग के दौरान अटेंशन मेट्रिक्स का इस्तेमाल कैसे किया जाए, इसको लेकर अभी तक कोई स्पष्ट और सर्वमान्य ढांचा (Framework) तैयार नहीं हो पाया है। इसलिए पूरे मीडिया प्लान से जुड़े बड़े फैसले लेने में इसकी उपयोगिता अभी सीमित है।
फिलहाल की स्थिति में अटेंशन मेट्रिक्स, Impressions और Views जैसे पारंपरिक मेट्रिक्स के साथ जुड़ने वाला एक अतिरिक्त (Incremental) संकेतक भर है। अगर इसे इससे आगे ले जाना है, तो इसकी सभी कमियों को दूर करना होगा। इसके लिए विज्ञापनदाताओं को काफी समय और पैसा निवेश करना पड़ेगा।
लेकिन बाजार के पास इतना इंतजार करने का समय नहीं है, खासकर तब, जब एक दूसरा विकल्प (जैसे Market Mix Modelling और Sales-based Measurement) तेजी से अपनी जगह बना चुका है।
Advertisers have tasted blood
यानी विज्ञापनदाताओं को अब पहले से कहीं बेहतर और ज्यादा प्रभावी तरीका मिल गया है, इसलिए वे अब पुराने या कम प्रभावी तरीकों पर वापस नहीं जाना चाहते।
जब अटेंशन मेट्रिक्स अपनी उपयोगिता साबित करने की कोशिश कर रहे थे, उसी दौरान विज्ञापनदाताओं का ध्यान एक दूसरी दिशा में चला गया। डेटा प्राइवेसी से जुड़े नए नियमों के कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म से मिलने वाले कई संकेत (Digital Signals) कम हो गए, जिससे पुराने Attribution Models कमजोर पड़ने लगे। इसके बाद विज्ञापनदाताओं ने ऐसे तरीकों की तलाश शुरू की, जो उन्हें यह साफ-साफ बता सकें कि विज्ञापन पर खर्च किए गए पैसे का बिक्री पर क्या असर पड़ा।
लिहाजा, इसका जवाब Incrementality Testing और Market Mix Modelling में मिला। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वजह से इन तकनीकों का इस्तेमाल पहले की तुलना में काफी आसान और सस्ता हो गया। अब किसी कंपनी का CFO यह देख सकता है कि मीडिया पर खर्च किए गए पैसे और बिक्री के बीच क्या संबंध है। जब कंपनियों को सीधे यह दिखने लगा कि विज्ञापन से कितना राजस्व आया, तो उनकी रुचि ऐसे मेट्रिक में कम हो गई, जो सिर्फ यह बताता है कि लोगों ने विज्ञापन पर कितना ध्यान दिया।
अब विज्ञापनदाता यह अनुभव कर चुके हैं कि मीडिया निवेश को सीधे बिजनेस और राजस्व से जोड़ा जा सकता है। इसलिए अब वे किसी ऐसे मेट्रिक को स्वीकार नहीं करेंगे जो केवल बीच की एक कड़ी को मापे। Attention Metrics इस कमी को पूरा नहीं कर सकते, क्योंकि वे एक अलग सवाल का जवाब देते हैं। वे बताते हैं कि लोगों ने विज्ञापन पर कितना ध्यान दिया, लेकिन यह नहीं बताते कि उससे बिक्री कितनी बढ़ी।
अब बाजार ने लगभग अपना फैसला सुना दिया है। किसी भी नए मेट्रिक की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि तीन प्रमुख पक्ष- विज्ञापनदाता (Clients), एजेंसियां (Agencies) और मीडिया प्लेटफॉर्म (Media Platforms) उसे अपनाते हैं या नहीं। फिलहाल इनमें से कोई भी अटेंशन मेट्रिक्स को मुख्य मापदंड बनाने के पक्ष में नहीं दिख रहा।
विज्ञापनदाता अब ऐसे मॉडल चाहते हैं जो सीधे बिजनेस रिजल्ट और सेल्स से जुड़े हों। उनके पास पहले से ऐसे टूल मौजूद हैं जो विज्ञापन खर्च और बिक्री के बीच संबंध दिखाते हैं। इसलिए वे कोई नया मीडिया KPI जोड़ने में ज्यादा रुचि नहीं रखते। हालांकि वे अटेंशन मेट्रिक्स का परीक्षण जरूर कर रहे हैं, लेकिन बिक्री और अंतिम परिणाम मापने वाले मौजूदा तरीकों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।
मीडिया प्लेटफॉर्म की भी इसमें खास दिलचस्पी नहीं है। अटेंशन मेट्रिक्स उनके विज्ञापन स्पेस को सिर्फ इस आधार पर बांटते हैं कि कौन-सा स्पेस ज्यादा ध्यान खींचता है और कौन-सा कम, लेकिन इससे प्लेटफॉर्म को अतिरिक्त कमाई का कोई खास फायदा नहीं मिलता। कुछ प्लेटफॉर्म और Attention कंपनियों के बीच साझेदारी जरूर शुरू हुई है, लेकिन अभी वह इतनी मजबूत नहीं है कि पूरे उद्योग की दिशा बदल सके।
वहीं एजेंसियां भी, चाहे वे यह कहें कि अटेंशन मेट्रिक्स उनकी विशेषज्ञता का हिस्सा हैं, उन्हें भी ऐसा मेट्रिक आगे बढ़ाना मुश्किल है जिसे उनके ग्राहक पूरी तरह नहीं चाहते और जिस पर मीडिया प्लेटफॉर्म भी अपना कारोबार नहीं चलाना चाहते।
अब विज्ञापन उद्योग को अपनी ऊर्जा और संसाधन उस दिशा में लगाने चाहिए, जिस ओर बाजार वास्तव में बढ़ रहा है। वह दिशा है ऐसे मजबूत और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले मॉडल तैयार करना, जो यह स्पष्ट रूप से बता सकें कि मीडिया पर किए गए खर्च का बिक्री पर कितना असर पड़ा।
आज कंपनियां (Clients) इसी क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी (C-suite) भी इसी विषय पर ध्यान दे रहे हैं और इसके समर्थन में लगातार नए डेटा और सबूत सामने आ रहे हैं। यानी उद्योग का फोकस अब केवल विज्ञापन देखने या उस पर ध्यान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जानने पर है कि विज्ञापन से कारोबार में वास्तव में कितना फायदा हुआ।
मीडिया प्लेटफॉर्म भी इस बदलते रुझान को समझ चुके हैं। इसलिए वे ओपन-सोर्स मॉडलिंग टूल्स और नई तकनीकों में निवेश कर रहे हैं, ताकि विज्ञापन की प्रभावशीलता (Effectiveness) पर होने वाली चर्चा में उनकी भी अहम भूमिका रहे। वहीं मॉडलिंग से जुड़ी कंपनियां एजेंसियों और विज्ञापनदाताओं को प्रशिक्षण दे रही हैं और नए प्रोजेक्ट्स को प्रोत्साहित कर रही हैं।
विज्ञापन एजेंसियों के लिए अटेंशन मेट्रिक्स एक आसान और सुविधाजनक मेट्रिक है, क्योंकि यह सीधे मीडिया अभियान चलाने (Activation) से जुड़ा होता है। इसके विपरीत Media-to-Sales Modelling एजेंसियों के लिए ज्यादा कठिन है, क्योंकि इसमें बिक्री पर असर डालने वाले कई ऐसे कारक भी शामिल होते हैं जो एजेंसियों के नियंत्रण में नहीं होते। ऐसे में एजेंसियों की जवाबदेही भी बढ़ जाती है।
आज ग्राहक सबसे ज्यादा इसी बात पर चर्चा करना चाहते हैं कि विज्ञापन का बिक्री पर क्या असर पड़ा। इसलिए पूरे उद्योग को अपना समय और संसाधन ऐसे टूल्स, डेटा सिस्टम और प्लानिंग फ्रेमवर्क तैयार करने में लगाने चाहिए, जो मीडिया से होने वाली बिक्री को अधिक भरोसेमंद, विस्तृत और व्यावहारिक तरीके से माप सकें।
Attention Metrics के भविष्य पर अपनी राय देते हैं। उनके अनुसार, अटेंशन मेट्रिक्स उन पुराने मेट्रिक्स से बेहतर हैं जिन्हें वे बदलना चाहते हैं, लेकिन अब केवल इतना बेहतर होना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि बाजार की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।
लेखक मानते हैं कि कुछ कंपनियां भविष्य में भी मीडिया प्लानिंग को बेहतर बनाने और विज्ञापन की गुणवत्ता समझने के लिए Attention Metrics का इस्तेमाल करती रहेंगी। लेकिन चाहे Attention को कितनी भी अच्छी तरह मापा जाए, वह इस सबसे महत्वपूर्ण सवाल का जवाब नहीं देता कि क्या विज्ञापन से कारोबार या बिक्री पर वास्तविक असर पड़ा। इसी वजह से लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि अटेंशन मेट्रिक्स अच्छे विचार के साथ आए, लेकिन ऐसे समय आए जब बाजार पहले ही उससे आगे बढ़ चुका था।
(प्रेमजीत सोढ़ी न्यूयॉर्क स्थित WPP Media में ग्लोबल एनालिटिक्स लीड हैं और मीडिया निवेश को कारोबारी परिणामों से जोड़ने वाले मीजरमेंट सिस्टम विकसित करते हैं और यह उनके निजी विचार हैं।)
पहले सेल्सवुमन घर-घर जाकर प्रोडक्ट दिखाती थीं, लोगों के सवालों का जवाब देती थीं, उन्हें खरीदने के लिए तैयार करती थीं और बिक्री करती थीं। आज यही काम सोशल मीडिया पर क्रिएटर्स कर रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
यदि आपने 1980 के दशक में फिल्म 'चश्मे बद्दूर' (Chashme Buddoor) देखी है, तो आपको उसका एक मशहूर सीन जरूर याद होगा। उस सीन में अभिनेत्री दीप्ति नवल घर-घर जाकर Chamko डिटर्जेंट बेचती हैं। वह लोगों को प्रोडक्ट दिखाती हैं, उसके फायदे बताती हैं, उनके सवालों के जवाब देती हैं, उनकी शंकाएं दूर करती हैं और अगर लोग भरोसा कर लें, तो प्रोडक्ट खरीद लेते हैं। उस समय इसे सीधे तौर पर सेल्स कहा जाता था और उन्हें सेल्सवुमन कहा जाता था।
अब करीब 40 साल बाद तस्वीर बदल चुकी है। हिन्दुस्तान यूनिलीवर ने हाल ही में घोषणा की है कि वह दुनिया भर में 3 लाख क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स के साथ काम करेगी। इसे मार्केटिंग की दुनिया में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। आज लगभग हर बड़ी कंपनी Influencer Marketing को भविष्य की मार्केटिंग बता रही है और Community, Authenticity, Trust, Relevance और Creator Economy जैसे शब्दों का खूब इस्तेमाल हो रहा है।
लेकिन इस पूरे बदलाव को देखकर एक सवाल उठता है कि क्या वास्तव में कुछ नया हुआ है, या फिर पुराने समय की सेल्स तकनीक को सिर्फ नई तकनीक और नए नाम के साथ पेश किया जा रहा है?
अगर स्मार्टफोन, इंस्टाग्राम रील और खरीदारी के लिंक को अलग कर दिया जाए, तो दोनों तरीकों में काफी समानता दिखाई देती है। पहले सेल्सवुमन घर-घर जाकर प्रोडक्ट दिखाती थीं, लोगों के सवालों का जवाब देती थीं, उन्हें खरीदने के लिए तैयार करती थीं और बिक्री करती थीं। आज यही काम सोशल मीडिया पर क्रिएटर्स कर रहे हैं। वे वीडियो बनाकर प्रोडक्ट दिखाते हैं, कमेंट्स में लोगों के सवालों का जवाब देते हैं, प्रोडक्ट की सिफारिश करते हैं और खरीदने का लिंक भी देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ग्राहक के घर का दरवाजा था, आज स्मार्टफोन की स्क्रीन है। पहले कैटलॉग होता था, आज इंस्टाग्राम है। यानी तकनीक बदली है, लेकिन तरीका काफी हद तक वही है।
यूनीलिवर द्वारा 3 लाख इन्फ्लुएंसर्स के साथ काम करने की योजना भी चर्चा का विषय बनी हुई है। यदि किसी कंपनी का मकसद सिर्फ लोगों को प्रभावित करना होता, तो कुछ हजार भरोसेमंद इन्फ्लुएंसर्स ही काफी होते। फिर 3 लाख लोगों की जरूरत क्यों पड़ी?
इसका जवाब Coverage यानी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाने में छिपा है। पहले सेल्स टीमें हर इलाके, हर शहर और हर दुकान तक पहुंचने की योजना बनाती थीं। आज वही काम हजारों-लाखों क्रिएटर्स के जरिए डिजिटल तरीके से किया जा रहा है। इसलिए यह मॉडल किसी विज्ञापन अभियान से ज्यादा एक बड़े डिजिटल सेल्स नेटवर्क जैसा दिखाई देता है।
यह मॉडल नई D2C (Direct-to-Consumer) कंपनियों के लिए काफी उपयोगी हो सकता है। ऐसी कंपनियों के पास न ब्रैंड की पहचान होती है, न बड़ा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और न ही बड़ा विज्ञापन बजट। ऐसे में कोई क्रिएटर उनके प्रोडक्ट को लोगों तक पहुंचाता है, उसका डेमो देता है, भरोसा पैदा करता है और बिक्री बढ़ाने में मदद करता है। कई मामलों में क्रिएटर ही कंपनी की सेल्स टीम की तरह काम करता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यही तरीका पहले से स्थापित बड़ी FMCG कंपनियों पर भी लागू होता है?
Unilever जैसी कंपनियों के पास पहले से मजबूत ब्रैंड पहचान, दशकों का विज्ञापन अनुभव, बड़ा रिटेल नेटवर्क और बाजार में मजबूत पकड़ है। ऐसे में सिर्फ यह कहना कि Influencer Marketing काम करती है, काफी नहीं है।
असल सवाल यह होना चाहिए कि यह दूसरे विकल्पों की तुलना में कितना बेहतर काम करती है। क्या यह टीवी विज्ञापनों से ज्यादा असरदार है? क्या यह रिटेल एक्टिवेशन, स्टोर में होने वाले डेमो, फ्री सैंपलिंग या ट्रेड प्रमोशन से बेहतर नतीजे देती है?
रणनीति का मतलब सिर्फ यह नहीं होता कि कौन-सा तरीका काम करता है। लगभग हर मार्केटिंग टूल किसी न किसी रूप में काम करता है। असली सवाल यह होता है कि मौजूदा समय और कंपनी की जरूरत के हिसाब से कौन-सा तरीका सबसे ज्यादा प्रभावी है, क्योंकि क्रिएटर्स पर खर्च किया गया हर एक रुपया किसी दूसरे मार्केटिंग या सेल्स माध्यम पर खर्च नहीं किया जाएगा। इसलिए सिर्फ यह कहना कि Influencer Marketing सफल है, पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि यह उन तरीकों से बेहतर है या नहीं, जिनकी जगह यह ले रही है।
आज कंपनियां अक्सर Engagement, Community, Authenticity और Relevance जैसे आंकड़ों की बात करती हैं। लेकिन अगर क्रिएटर्स वास्तव में प्रोडक्ट बेच रहे हैं, ग्राहकों के सवालों का जवाब दे रहे हैं और खरीदारी बढ़ा रहे हैं, तो सबसे जरूरी सवाल बिक्री से जुड़े होने चाहिए। जैसे इससे कितनी अतिरिक्त बिक्री हुई? क्रिएटर नेटवर्क कितना प्रभावी रहा? और इस पर किए गए खर्च से कितना रिटर्न मिला?
पहले मार्केटिंग का काम ब्रैंड बनाना होता था और सेल्स टीम का काम प्रोडक्ट बेचना। दोनों की जिम्मेदारियां अलग थीं और उनके प्रदर्शन को भी अलग-अलग तरीके से मापा जाता था। लेकिन Creator Economy के दौर में इन दोनों के बीच का अंतर धीरे-धीरे खत्म होता दिखाई दे रहा है। फिर भी इस बदलाव की चर्चा अभी भी ज्यादातर मार्केटिंग के नजरिए से ही की जा रही है।
हो सकता है सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ शब्दों का हो। पहले इसे Direct Selling कहा जाता था, आज Influencer Marketing कहा जाता है। पहले Sales Representatives होते थे, आज Creators हैं। पहले बिक्री के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाता था, आज Engagement की बात होती है।
शायद तकनीक और भाषा बदल गई है, लेकिन काम वही है। हो सकता है Chamko कभी गायब ही नहीं हुई, उसने सिर्फ अपना रूप और कपड़े बदल लिए हों।
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)
नीलसन (Nielsen) के 2026 अध्ययन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अत्यधिक व्यक्तिगत विज्ञापनों की तुलना में संतुलित और सीमित पर्सनलाइजेशन वाले विज्ञापनों में खरीदारी की संभावना अधिक देखी गई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. संदीप गोयल, रेडिफ्यूजन के चेयरमैन और Mogae Group के फाउंडर व चेयरमैन।
विज्ञापन जगत में पिछले डेढ़ दशक तक "राइट पर्सन, राइट मैसेज, राइट टाइम" सबसे प्रभावी रणनीति मानी जाती थी। माना जाता था कि एल्गोरिद्म उपभोक्ताओं की पसंद-नापसंद को उनसे बेहतर समझ सकते हैं। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। वर्ष 2026 में उपभोक्ता अत्यधिक पर्सनलाइजेशन के खिलाफ प्रतिक्रिया दे रहे हैं, जिसे "रिबेलियन अगेंस्ट पर्सनलाइजेशन" का नाम दिया जा रहा है।
शुरुआत में लोगों की चिंता केवल निजता (Privacy) तक सीमित थी, लेकिन अब यह समस्या मनोवैज्ञानिक स्तर तक पहुंच गई है। यदि कोई व्यक्ति एक बार किसी उत्पाद की खोज करता है, तो महीनों तक उसी से जुड़े विज्ञापन उसका पीछा करते रहते हैं। कांतार (Kantar) इंडिया की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 54% शहरी उपभोक्ताओं का मानना है कि वे अपने ही डेटा के जाल में फंस चुके हैं, जबकि 41% लोग एल्गोरिद्म को भ्रमित करने के लिए सर्च हिस्ट्री हटाने, इनकॉग्निटो मोड इस्तेमाल करने या अलग-अलग गतिविधियां करने लगे हैं।
विज्ञापन उद्योग अब व्यक्तिगत डेटा आधारित टार्गेटिंग से हटकर "कॉन्टेक्स्ट" यानी संदर्भ आधारित विज्ञापनों की ओर बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, किसी क्रिकेट मैच के दौरान स्पोर्ट्स ड्रिंक का विज्ञापन दिखाना अधिक प्रभावी माना जा रहा है, बजाय किसी व्यक्ति के पुराने ऑनलाइन व्यवहार के आधार पर लगातार विज्ञापन दिखाने के। यूनिलीवर (Unilever) जैसे ब्रांडों ने भी संदर्भ आधारित विज्ञापनों में बेहतर ब्रांड रिकॉल दर्ज किया है।
इंस्टाग्राम, यूट्यूब और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म अब उपयोगकर्ताओं को रिकमेंडेशन रीसेट करने और कम व्यक्तिगत विज्ञापन देखने के विकल्प दे रहे हैं। वहीं विज्ञापनदाता व्यक्तिगत पहचान के बजाय समान रुचि वाले समूहों और समुदायों को लक्ष्य बना रहे हैं। क्रिएटिव विज्ञापनों में भी जानबूझकर अलग और अप्रत्याशित शैली अपनाई जा रही है ताकि उपभोक्ता उन्हें अधिक स्वाभाविक महसूस करें।
अधिक डेटा को अधिक प्रासंगिकता मानने की सोच भी अब चुनौती के दायरे में है। उपभोक्ताओं की पसंद, परिस्थितियां और जरूरतें तेजी से बदलती रहती हैं। नीलसन (Nielsen) के अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक व्यक्तिगत विज्ञापनों की तुलना में संतुलित पर्सनलाइजेशन वाले विज्ञापन खरीदारी की अधिक संभावना पैदा करते हैं।
क्रेड (CRED), नेटफ्लिक्स इंडिया (Netflix India) और मामाअर्थ (Mamaearth) जैसे ब्रांड अब अनुमान लगाने के बजाय उपभोक्ताओं की सहमति और भागीदारी को प्राथमिकता दे रहे हैं। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act 2023), थर्ड-पार्टी कुकीज़ के समाप्त होने और एआई आधारित सर्च प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने भी इस बदलाव को गति दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वही ब्रांड सफल होंगे जो उपभोक्ता की निजता, सहमति और संदर्भ को महत्व देंगे। भविष्य की विज्ञापन रणनीति "फॉर यू" से आगे बढ़कर "फॉर अस, व्हेन यू आर रेडी" की दिशा में जाती दिखाई दे रही है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्रूड ऑयल के दाम घट गए तो पेट्रोल महंगा क्यों? देखिए, जब क्रूड के दाम बढ़े तो पेट्रोलियम कंपनियों ने करीब ढाई महीने तक क़ीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
ईरान और अमेरिका में युद्धविराम के बाद क्रूड ऑयल के दाम वहीं पहुंच गए हैं, जहां फ़रवरी में युद्ध शुरू होने से पहले थे। लेकिन पेट्रोल और डीज़ल के दाम फ़रवरी के मुकाबले करीब ₹7.50 प्रति लीटर अधिक हैं। लोग पूछ रहे हैं कि दाम कब कम होंगे? इसका सीधा जवाब है कि दाम तुरंत कम नहीं होंगे। भारत में जिस क्रूड ऑयल से पेट्रोल और डीज़ल बनता है, उसका दाम युद्ध शुरू होने से पहले प्रति बैरल 73 डॉलर था। युद्ध के दौरान "स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ (Strait of Hormuz)" बंद हो गया था। इसी रास्ते से दुनिया का 20% क्रूड ऑयल गुजरता है। सप्लाई कम होने से दाम बढ़ते-बढ़ते मई में 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए थे।
अब स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ खुलने से दाम फिर पुराने स्तर पर पहुंच गए हैं। हालांकि, अब भी झड़पें होती रहती हैं। आपके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्रूड ऑयल के दाम घट गए, तो पेट्रोल महंगा क्यों बेचा जा रहा है? देखिए, जब क्रूड के दाम बढ़े तो पेट्रोलियम कंपनियों ने करीब ढाई महीने तक कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की। इस वजह से उन्हें करीब एक लाख करोड़ रुपये का घाटा होने का अनुमान है। अगर क्रूड ऑयल के दाम स्थिर रहते हैं, तो कंपनियों को इसकी भरपाई करने में दो से तीन महीने लग जाएंगे। तो फिर क्या दो-तीन महीने में दाम घटेंगे? इसमें एक और पेंच है।
विधानसभा चुनाव के कारण सरकारी कंपनियों ने पेट्रोल और डीज़ल के दाम नहीं बढ़ाए थे, लेकिन सरकार ने मार्च में एक्साइज ड्यूटी प्रति लीटर ₹10 घटा दी थी। यह टैक्स सरकार पेट्रोलियम कंपनियों से वसूलती है। इससे ग्राहकों को तो राहत नहीं मिली थी, लेकिन कंपनियों का घाटा कम हुआ था। इस वजह से सरकार को सालभर में करीब एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है। सरकार भी चाहेगी कि उसके नुकसान की भरपाई हो।
मतलब, कंपनियों का घाटा जब दो-तीन महीने में पूरा होगा, तो सरकार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर अपनी कमाई कर सकती है। फिर आपको और हमको सस्ता पेट्रोल कब मिलेगा? इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। पिछले पांच वर्षों में दाम चुनाव से पहले घटे हैं। 2022 में उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनाव से कुछ महीने पहले दाम कम हुए थे और फिर 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले। पुराना ट्रेंड देखें, तो साल के आखिर तक दाम कम हो सकते हैं, बशर्ते स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ खुला रहे या दुनिया के सामने कोई और बड़ा संकट न आए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अक्सर इस बहस में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह ट्रस्ट सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित किया गया था।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, शिक्षा, समाज सेवा और अर्थव्यवस्था के सबसे पुराने केंद्र रहे हैं। आज देश में एक बार फिर यह बहस तेज है कि क्या हिन्दू मंदिरों का प्रबंधन सरकार के हाथ में रहना चाहिए या उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र ट्रस्टों को सौंप दिया जाना चाहिए? यह प्रश्न केवल धर्म का नहीं, बल्कि संविधान, प्रशासन, पारदर्शिता, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति से जुड़ा हुआ है।
विशेष रूप से अयोध्या के श्रीराम मंदिर के निर्माण और उसके बाद देशभर में मंदिरों के प्रबंधन को लेकर चर्चा और भी तेज हुई है। कई धार्मिक संगठन यह मांग करते हैं कि जैसे मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों और जैन मंदिरों का संचालन उनके अपने धार्मिक निकाय करते हैं, उसी प्रकार हिन्दू मंदिरों को भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, कुछ लोग मानते हैं कि सरकार के नियंत्रण से पारदर्शिता, विरासत संरक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही बनी रहती है।
अयोध्या का श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अक्सर इस बहस में उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह ट्रस्ट सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित किया गया था और इसका उद्देश्य मंदिर निर्माण एवं प्रबंधन है। इसके समर्थक कहते हैं— सरकार दैनिक धार्मिक प्रबंधन नहीं करती। ट्रस्ट निर्णय लेता है। देशभर से दान आता है। बड़े पैमाने पर विकास कार्य हुए। वहीं आलोचक समय-समय पर पारदर्शिता, भूमि खरीद, प्रशासनिक निर्णयों या ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाते रहे हैं। इन मुद्दों पर ट्रस्ट ने विभिन्न अवसरों पर अपना पक्ष भी सार्वजनिक रूप से रखा है।
हजारों वर्षों से मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं रहे, बल्कि वे समाज के विकास की धुरी भी रहे हैं। प्राचीन भारत में मंदिरों के माध्यम से— शिक्षा दी जाती थी। वेद और शास्त्रों का अध्ययन होता था। संगीत और नृत्य का संरक्षण होता था। आयुर्वेद और चिकित्सा सेवाएं संचालित होती थीं। यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनती थीं। गरीबों को भोजन मिलता था। किसानों को सहायता दी जाती थी। अकाल के समय अन्न भंडार खोले जाते थे। दक्षिण भारत के अनेक मंदिर मध्यकाल में स्थानीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े संस्थान थे। उनके पास कृषि भूमि, जलाशय, बाजार और हजारों कर्मचारी होते थे। मंदिर अपने क्षेत्र के सबसे बड़े "नियोक्ता" भी होते थे।
22 जनवरी 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या विश्व के प्रमुख हिन्दू तीर्थों में तेजी से उभरा। बताया जाता है कि अब तक लगभग 15 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए हैं। जून 2026 में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े दान के गबन का मामला सामने आया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने अयोध्या के भाजपा नेता रजनीश सिंह की ओर से लिखे गए पत्र के आधार पर जवाब मांगा था। जब जिला प्रशासन ने राम मंदिर ट्रस्ट से आमदनी, खर्च, दान, बैंक खातों, जमीन के लेन-देन और संपत्ति के बारे में जानकारी मांगी, तो ट्रस्ट के सचिव चंपत राय ने जानकारी देने से इनकार कर दिया।
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी मामले को लेकर भाजपा नेता रजनीश सिंह ने दो बार पत्र लिखा था। पहला पत्र 9 जून को लिखा गया था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि मंदिर ट्रस्ट को निर्देश दिया जाए कि वह अपनी शुरुआत से लेकर अब तक के वित्तीय लेन-देन और संपत्ति की पूरी जानकारी सार्वजनिक करे। प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में भाजपा नेता ने कई जानकारियों को सार्वजनिक करने की मांग की थी।
इनमें 'समर्पण निधि' अभियान के जरिए इकट्ठा किए गए पैसे, अलग-अलग तरीकों से मिले दान, सोना, चांदी और गहनों के तौर पर मिले योगदान, बैंक खाते और वित्तीय लेन-देन, जमीन की खरीद-बिक्री, मंदिर निर्माण और प्रशासन पर खर्च, ऑडिट तथा निरीक्षण रिपोर्ट शामिल हैं। दूसरा पत्र 12 जून को लिखा गया। 13 जून को पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी (SIT) का गठन हो गया।
जिला प्रशासन ने इस मामले को लेकर श्रीराम मंदिर ट्रस्ट से संपर्क किया। चंपत राय ने यह कहकर कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया कि फिलहाल एसआईटी (SIT) की जांच चल रही है। जांच पैनल सभी जरूरी रिकॉर्ड और जानकारी एकत्र कर रहा है। इसलिए अभी मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने चढ़ावा चोरी मामले को बेहद गंभीर माना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि दान की गिनती में 'शून्य निगरानी' थी और इसे 'चोरी' नहीं, बल्कि एक 'खुला डाका' कहा जाना चाहिए। मिश्रा जी ने बताया कि ट्रस्ट और बैंक के बीच हुए समझौते के अनुसार दान की गिनती की पूरी जिम्मेदारी बैंक की है। बैंक ने अपने स्थायी कर्मचारियों को लगाने के बजाय नियमों की अनदेखी की और प्रक्रिया में बड़ी लापरवाही बरती। गिनती वाले कमरे में निगरानी नाम की कोई व्यवस्था नहीं थी। लोग अपनी जेबों में नोटों के बंडल छिपाकर बाहर ले जाते थे।
इसके अलावा, दान पेटी में आए आभूषणों की कोई रसीद नहीं काटी जा रही थी। उन्होंने माना कि दान कक्ष का सीसीटीवी फुटेज 45 दिनों के बाद स्वतः (ऑटोमैटिक) डिलीट हो जाता था और उसका कोई बैकअप नहीं रखा जाता था, जिससे एसआईटी की जांच में मुश्किलें आ रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दान प्रणाली में हुई इस अनियमितता को लेकर काफी चिंतित हैं। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उन्होंने मंदिर प्रशासन में एक वरिष्ठ नौकरशाह (आईएएस) को पूर्णकालिक सीईओ नियुक्त करने की वकालत की है, जिसका अयोध्या से भावनात्मक जुड़ाव हो।
इस महाघोटाले को लेकर राम मंदिर आंदोलन के फायरब्रांड नेता और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद विनय कटियार ने अयोध्या में इस समय बनी मौजूदा स्थिति पर अपनी गहरी नाराजगी और गुस्सा जाहिर किया है। कटियार का आरोप है कि चंपत राय कई बार मंदिर के चढ़ावे को लेकर अपने निजी निवास, कारसेवकपुरम, गए थे, जो नियमों के खिलाफ और एक गंभीर अपराध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि परंपरा और नियम के अनुसार मंदिर में आने वाला दान वहीं गिना जाता है और सीधे बैंक भेजा जाता है। ऐसे में उस धन को किसी के निजी निवास स्थान पर ले जाने की क्या आवश्यकता थी, यह एक बहुत बड़ा सवाल है।
पूर्व सांसद ने यह भी उजागर किया कि जब उन्हें इस बात का पता चला, तो उन्होंने इस संबंध में सीधे चंपत राय से जवाब मांगा था, जिसके बाद दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस भी हुई थी। कटियार ने बताया कि प्रधानमंत्री के दखल के बाद अब इस पूरे प्रकरण की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर दिया गया है। चूंकि प्रधानमंत्री स्वयं इस मामले की निगरानी कर रहे हैं, इसलिए बहुत जल्द सच सबके सामने आ जाएगा।
चंपत राय पर सीधा हमला बोलते हुए कटियार ने कहा कि उन्हें उनके पद से बर्खास्त किया जाना चाहिए। मंदिर का चढ़ावा निवास स्थान पर ले जाने के अपराध का जवाब उन्हें देना ही होगा। उन्होंने आम प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि हर दिन मंदिर में लाखों-करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, जिसकी गिनती बैंक अधिकारियों के सामने होती है और उसे सीधे बैंक में जमा किया जाता है। इस तय व्यवस्था के बावजूद पैसे को बाहर ले जाना पूरी तरह से गलत है।
विनय कटियार ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि राम मंदिर करोड़ों देशवासियों की अटूट आस्था का प्रतीक है, इसलिए मंदिर परिसर के भीतर अनुशासन, मर्यादा और पारदर्शिता बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मंदिर की पूरी व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कड़े कदम उठाए जाने चाहिए। अयोध्या की पावन भूमि पर चढ़ावे के पैसों के साथ ऐसी गंभीर वित्तीय अनियमितता की खबर से वह बेहद आहत हैं।
प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने दान राशि के कथित गबन के संबंध में एफआईआर दर्ज की और कई कर्मचारियों तथा संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की। अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप है कि मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए नकद दान के एक हिस्से का कथित गबन किया गया।
पुलिस ने आरोपियों के विरुद्ध चोरी, आपराधिक विश्वासघात, आपराधिक षड्यंत्र सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया। पुलिस ने जांच के दौरान लगभग ₹79.85 लाख की बरामदगी की भी जानकारी दी है। अंतिम राशि और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा। विपक्षी दलों ने मांग की है कि सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में जांच हो।
यह मामला केवल राम मंदिर तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। देश में मंदिरों की कोई एक आधिकारिक राष्ट्रीय गणना उपलब्ध नहीं है। विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी आकलनों के अनुसार, देश में 20 लाख से अधिक हिन्दू मंदिर हैं। इनमें अधिकांश छोटे ग्राम-स्तरीय मंदिर हैं, जबकि कुछ हजार मंदिर ऐतिहासिक, आर्थिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें से केवल सीमित संख्या—बड़े, आय-संपन्न या ऐतिहासिक मंदिर—राज्य सरकारों के अधीन विभिन्न कानूनों के तहत आते हैं।
ब्रिटिश शासन के समय कई बड़े मंदिरों में आय और संपत्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हुए। औपनिवेशिक प्रशासन ने कुछ क्षेत्रों में धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के लिए कानून बनाए। यदि किसी राज्य में सबसे अधिक हिन्दू मंदिर सरकारी विभाग के अधीन हैं, तो वह तमिलनाडु है। राज्य सरकार का एक विभाग हजारों मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थानों का प्रशासन देखता है। चिदंबरम नटराज मंदिर का प्रशासन समय-समय पर न्यायिक विवादों का विषय भी रहा है। वहीं सरकार का तर्क है कि उसने अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, भूमि वापस दिलाई और डिजिटल रिकॉर्ड बनाए।
आंध्र प्रदेश का तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् एक स्वतंत्र वैधानिक ट्रस्ट-जैसी संस्था है, लेकिन इसके बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। इसलिए इसे पूर्णतः निजी ट्रस्ट नहीं माना जाता है। यह विश्व के सबसे समृद्ध मंदिर संस्थानों में से एक है। केरल का मॉडल पूरे देश में अलग माना जाता है। यहाँ मंदिर सीधे सरकार द्वारा नहीं, बल्कि देवस्वम बोर्डों द्वारा संचालित होते हैं। इन बोर्डों में सरकार की भूमिका नियुक्तियों और प्रशासनिक ढाँचे में होती है, लेकिन वे स्वतंत्र वैधानिक संस्थाएँ हैं।
प्रमुख मंदिर सबरीमला, गुरुवायूर (अलग वैधानिक व्यवस्था) और पद्मनाभस्वामी (विशेष न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत) हैं। ओडिशा में पुरी का जगन्नाथ मंदिर विशेष कानून के अंतर्गत संचालित होता है। राज्य सरकार की प्रशासनिक निगरानी, रथयात्रा व्यवस्था, सुरक्षा और वित्तीय नियंत्रण के कुछ पहलू उसके अधीन हैं, लेकिन धार्मिक परंपराओं का संचालन सेवायत समुदाय द्वारा किया जाता है। जम्मू-कश्मीर में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड एक वैधानिक बोर्ड है, जिसकी अध्यक्षता परंपरागत रूप से उपराज्यपाल (पूर्व में राज्यपाल) करते हैं।
भारत में प्रतिवर्ष करोड़ों लोग तीर्थयात्रा करते हैं। कई प्रमुख मंदिरों में प्रतिदिन 50 हजार से लेकर 2 लाख तक श्रद्धालु पहुँचते हैं, जबकि प्रमुख पर्वों पर यह संख्या कई लाख तक पहुँच जाती है। इन मंदिरों के आसपास होटल, परिवहन, प्रसाद, हस्तशिल्प, भोजन, फूल, पूजा सामग्री और स्थानीय व्यापार का विशाल नेटवर्क विकसित हो चुका है। सरकार पिछले कुछ वर्षों से धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है।
रामायण सर्किट, कृष्ण सर्किट, बौद्ध सर्किट, चारधाम परियोजना, काशी कॉरिडोर, महाकाल लोक और अयोध्या विकास जैसी योजनाओं ने मंदिरों के आसपास भारी निवेश आकर्षित किया है। मंदिरों के सरकारी नियंत्रण की बहस केवल पूजा-पद्धति की नहीं है, बल्कि हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति, लाखों एकड़ भूमि, श्रद्धालुओं के दान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी है।
संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करता है। लेकिन भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी देशों जैसी "राज्य और धर्म के पूर्ण पृथक्करण" की अवधारणा नहीं है। भारत में राज्य आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक संस्थाओं के प्रशासनिक पहलुओं को विनियमित कर सकता है, जबकि धार्मिक आस्था और आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की रक्षा भी संविधान करता है।
कई निर्णयों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य का उद्देश्य स्थायी रूप से धार्मिक संस्थाओं पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि आवश्यकता होने पर प्रशासनिक सुधार करना हो सकता है। यदि किसी मंदिर में गंभीर कुप्रबंधन हो, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है; परंतु यह हस्तक्षेप अनिश्चितकाल तक चलता रहे, यह संवैधानिक बहस का विषय बना रहा है।
अन्य धार्मिक केंद्रों में अधिकांश मस्जिदें वक्फ संपत्तियों के ढाँचे से जुड़ी होती हैं। वक्फ बोर्ड कानून द्वारा स्थापित वैधानिक निकाय हैं, जो वक्फ संपत्तियों का प्रशासन देखते हैं। हालाँकि मस्जिदों की धार्मिक गतिविधियों का संचालन स्थानीय इमाम, मुतवल्ली और संबंधित समुदाय की भूमिका के साथ चलता है। प्रमुख गुरुद्वारों का संचालन निर्वाचित समितियों द्वारा होता है।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी इसका प्रमुख उदाहरण है। इन संस्थाओं में सरकार प्रत्यक्ष दैनिक प्रबंधन नहीं करती, हालांकि उनका संचालन विशेष कानूनों के अधीन होता है। अधिकांश चर्च संबंधित ईसाई संप्रदायों, डायोसीज़ या चर्च ट्रस्टों द्वारा संचालित होते हैं। वे भी लागू नागरिक, कर और चैरिटी कानूनों के अधीन रहते हैं।
मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने वाले हिन्दू संगठनों की मुख्य आपत्तियाँ और प्रमुख तर्क हैं कि यदि सभी धर्म समान हैं, तो केवल हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण क्यों? दान श्रद्धालु भगवान को देता है, सरकार को नहीं। मंदिर की आय मंदिर पर ही खर्च होनी चाहिए। सरकार बदलने से मंदिर प्रशासन नहीं बदलना चाहिए। राजनीतिक नियुक्तियाँ नहीं होनी चाहिए।
वहीं राज्य सरकारें कहती हैं कि मंदिरों में सार्वजनिक धन आता है, इसलिए ऑडिट आवश्यक है। हजारों एकड़ भूमि की सुरक्षा करनी पड़ती है। यदि प्रशासन भ्रष्ट हो, तो सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। छोटे मंदिरों को भी सहायता चाहिए। पुरातात्विक धरोहर की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी भी है। कई विधि विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि भारत में एक राष्ट्रीय मंदिर प्रशासन मॉडल बनाया जा सकता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग, सन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त न थे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो.संजय द्विवेदी, राजनीतिक विश्वेषक और वरिष्ठ पत्रकार।
उत्तर प्रदेश एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह ख्यात था कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह अपनी पकड़ बनाई है और देश में एक अलग माडल खड़ा दिया है, वह सर्वत्र चर्चा का विषय है।
इससे यह भी साबित हो रहा है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है। वहीं असम में हेमंत विश्वशर्मा उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे हैं, असम में तीसरी बार सरकार बनाकर भाजपा ने पूर्वोत्तर में इतिहास रच दिया है। इसी तरह गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति से पश्चिम बंगाल की विजय ऐतिहासिक कही जा रही है और वहां बने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के ताबड़तोड़ फैसलों ने जनविश्वास की हिलोरें पैदा की हैं। जड़ता को तोड़कर एक नई उम्मीद बनी है। केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के आगमन ने भारतीय राजनीति के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है।
वैचारिक हीनग्रंथि से बाहर आई भाजपा-
भाजपा का आज तक का ट्रैक हिंदुत्व का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल कर सत्ता में आने का रहा है। देश की राजनीति में चल रहे विमर्श में भाजपा बड़ी चतुराई से इस कार्ड का इस्तेमाल तो करती थी, किंतु उसके नेतृत्व में इसे लेकर एक हिचक बनी रहती थी। वो हिचक अटल जी से लेकर आडवानी तक हर दौर में दिखी है। भाजपा का हर नेता सत्ता पाने के बाद यह साबित करने में लगा रहता है वह अन्य दलों के नेताओं के कम ‘सेकुलर’ नहीं है। उत्तर प्रदेश की ‘आदित्यनाथ परिघटना’ दरअसल भाजपा की वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति को स्थापित करती नजर आती है।
नरेंद्र मोदी के राज्यारोहण के बाद योगी आदित्यनाथ का उदय भारतीय राजनीति में एक अलग किस्म की राजनीति की स्वीकृति का प्रतीक है। एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग, सन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त न थे। धर्म और धर्माचार्यों का इस्तेमाल, धार्मिक आस्था का दोहन और सत्ता पाते ही सभी धार्मिक प्रतीकों से मुक्ति लेकर सारी राजनीति सिर्फ तुष्टीकरण में लग जाती थी। प्रधानमंत्रियों समेत जाने कितने सत्ताधीशों के ताज जामा मस्जिद में झुके होगें, लेकिन हिंदुत्व के प्रति उनकी हिचक निरंतर थी।
यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं की एक समय में दीनदयाल जी उदार थे, तो अटलजी और बलराज मधोक अपनी वक्रता के चलते उग्र नेता माने जाते थे। अटलजी का दौर आया तो लालकृष्ण आडवाणी उग्र कहे जाने लगे, फिर एक समय ऐसा भी आया जब आडवानी उदार हो गए और नरेंद्र मोदी उग्र मान जाने लगे। आज की व्याख्याएं सुनें- नरेंद्र मोदी उदार हो गए हैं और योगी आदित्यनाथ और गृहमंत्री अमित शाह उग्र माने जाने लगे हैं। अब तो असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वशर्मा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी आदित्यनाथ की परंपरा के मुख्यमंत्री कहे जाने लगे हैं।
सेकुलर संक्रमण से मुक्ति से मिली नई पहचान-
यह मीडिया, बौद्धिकों की अपनी रोज बनाई जाती व्याख्याएं हैं। लेकिन सच यह है कि अटल, मधोक, आडवानी, मोदी, अमित शाह या आदित्यनाथ, हेमंत विश्वशर्मा और शुभेंदु अधिकारी कोई अलग-अलग लोग नहीं है। एक विचार के प्रति समर्पित राष्ट्रनायकों की सूची है यह। इसमें कोई कम जा ज्यादा उदार या कठोर नहीं है। किंतु भारतीय राजनीति का विमर्श ऐसा है जिसमें वास्तविकता से अधिक ड्रामे पर भरोसा है।
भारतीय राजनेता की मजबूरी है कि वह टोपी पहने, रोजा भले न रखे किंतु इफ्तार की दावतें दे। आप ध्यान दें सरकारी स्तर पर यह प्रहसन लंबे समय से जारी रहा है। भाजपा भी इसी राजनीतिक क्षेत्र में काम करती है। उसमें भी इस तरह के रोग हैं। वह भी राष्ट्रनीति के साथ थोड़े तुष्टिकरण को गलत नहीं मानती। जबकि उसका अपना नारा रहा है सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं। उसका एक नारा यह भी रहा है-“राम, रोटी और इंसाफ। ”
लंबे समय के बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का बोध दिख रहा है। असरे बाद वे भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़े दिख रहे हैं। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाए उनमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनताग्रंथि के भाव कम हुए हैं। अब वे अन्य दलों की नकल के बजाए एक वैचारिक लाइन लेते हुए दिख रहे हैं।
दिखावटी सेकुलरिज्म के बजाए वास्तविक राष्ट्रीयता के उनमें दर्शन हो रहे हैं। मोदी जब एक सौ चालीस करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो बात अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक से ऊपर चली जाती है। यहां देश सम्मानित होता है, एक नई राजनीति का प्रारंभ दिखता है। एक भगवाधारी सन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह एक नया संदेश देता है। वह संदेश त्याग का है, परिवारवाद के विरोध का है, तुष्टिकरण के विरोध का है, सबको न्याय का है।
भारतीयता का विमर्श अब केंद्रीय विमर्श-
आजादी के बाद के सत्तर सालों में देश की राजनीति का विमर्श भारतीयता और उसकी जड़ों की तरफ लौटने के बजाए घोर पश्चिमी और वामपंथी रह गया था। जबकि बेहतर होता कि आजादी के बाद हम अपनी ज्ञान परंपरा की और लौटते और अपनी जड़ों को मजबूत बनाते। किंतु सत्ता,शिक्षा, समाज और राजनीति में हमने पश्चिमी तो, कहीं वामपंथी विचारों के आधार पर चीजें खड़ी कीं। इसके कारण हमारा अपने समाज से ही रिश्ता कटता चला गया।
सत्ता और जनता की दूरी और बढ़ गयी। सत्ता दाता बन बैठी और जनता याचक। सेवक मालिक बन गए। ऐसे में लोकतंत्र एक छद्म लोकतंत्र बन गया। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हम सत्तर साल के बाद सड़कें बना रहे हैं। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हमारे अपने नौजवानों ने भारतीय राज्य के खिलाफ बंदूकें उठा रखी थीं। गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़संकल्प की बदौलत आज माओवादी आतंक का अंत भी हमने देखा।
पिछले सत्तर सालों में लोकतंत्र की विफलता की ये कहानियां सर्वत्र बिखरी पड़ी हैं। राजनीतिक तंत्र के प्रति उठा भरोसा भी साधारण नहीं था। आज ऐसा लगता है कि राजनीति से कुछ हो सकता है। मोदी,शाह, आदित्यनाथ भरोसे के प्रतीक बन गए। इसका मतलब यह भी है कि ये कुछ कह रहे हैं तो करेंगें भी।
नरेंद्र मोदी, अमित शाह, आदित्यनाथ देश की इन्हीं उम्मीदों के चेहरे हैं। तीनों अंग्रेजी नहीं बोलते। तीनों जन-मन-गण के प्रतिनिधि हैं। यह भारतीय राजनीति का बदलता हुआ चेहरा है। क्या सच में भारत खुद को पहचान रहा है ? वह जातियों, पंथों, क्षेत्रों की पहचान से अलग एक बड़ी पहचान से जुड़ रहा है- वह पहचान है भारतीय होना, राष्ट्रीय होना।
एक समय में राजनीति हमें नाउम्मीद करती हुयी नजर आती थी। बदले समय में वह उम्मीद जगा रही है। कुछ चेहरे ऐसे हैं जो भरोसा जगाते हैं। एक आकांक्षावान भारत बनता हुआ दिखता है। यह आकांक्षाएं राजनीति दलों के एजेंडे से जुड़ पाएं तो देश जल्दी और बेहतर बनेगा। राजनीतिक विमर्श और जनविमर्श को साथ लाने की कवायद हमें करनी ही होगी। जल्दी बहुत जल्दी। यह जितना और जितना जल्दी होगा भारत अपने भाग्य पर इठलाता दिखेगा।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
वरिष्ठ विज्ञापन विशेषज्ञ प्रभाकर मुंदकर का मानना है कि भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री के पास रचनात्मक प्रतिभा की कोई कमी नहीं है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रभाकर मुंदकुर, वरिष्ठ विज्ञापन विशेषज्ञ ।।
हर साल जून में दुनिया भर की विज्ञापन इंडस्ट्री की नजरें प्रतिष्ठित कान्स लायंस (Cannes Lions) पुरस्कारों पर टिकी रहती हैं। इन पुरस्कारों को विज्ञापन जगत में रचनात्मक उत्कृष्टता का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है। ऐसे में जब किसी देश का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहता, तो पूरी इंडस्ट्री में इसकी वजहों को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है।
इसी क्रम में विज्ञापन विशेषज्ञ प्रभाकर मुंदकर ने अपने गेस्ट कॉलम में भारत के कान्स लायंस 2026 प्रदर्शन का विश्लेषण करते हुए कहा है कि इसे संकट के रूप में देखने के बजाय आत्ममंथन का अवसर माना जाना चाहिए। मुंदकर के अनुसार, इस वर्ष भारत के अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन को लेकर दो तरह की बातें सामने आई हैं।
एक पक्ष का मानना है कि भारत की ओर से कम प्रविष्टियां भेजी गईं, जबकि दूसरा पक्ष इसे वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा के अनुरूप पर्याप्त मजबूत काम न होने से जोड़ता है। हालांकि उनका कहना है कि वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं है। उन्होंने लिखा कि असली सवाल यह नहीं है कि भारत ने कम 'लायंस' जीते, बल्कि यह है कि क्या वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट रचनात्मकता की परिभाषा भारत की तुलना में अधिक तेजी से बदल गई है।
मुंदकर के मुताबिक, पहले विज्ञापन पुरस्कारों में मौलिकता, प्रस्तुति और कहानी कहने की कला को प्रमुखता मिलती थी, लेकिन अब बेहतरीन काम वही माना जा रहा है, जिसमें रचनात्मकता के साथ टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, सांस्कृतिक प्रासंगिकता और स्पष्ट व्यावसायिक परिणाम भी दिखाई दें।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को भारत के प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार, AI केवल एक टूल है। पुरस्कार जीतने वाले विचार मशीन नहीं, बल्कि इंसान तैयार करते हैं। सफल अभियान इसलिए नहीं जीतते कि उनमें AI का इस्तेमाल हुआ है, बल्कि इसलिए कि वे वास्तविक समस्याओं का नए तरीके से समाधान प्रस्तुत करते हैं।
मुंदकर ने कहा कि अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो चुकी है। लैटिन अमेरिकी देशों का लगातार मजबूत प्रदर्शन, एशियाई बाजारों का बढ़ता आत्मविश्वास और यूरोपीय एजेंसियों का तकनीक के साथ उत्कृष्ट क्राफ्ट का संतुलन यह दिखाता है कि प्रतिस्पर्धा का स्तर काफी ऊपर जा चुका है।
उन्होंने यह भी कहा कि केवल कम प्रविष्टियां भारत के प्रदर्शन की वजह नहीं हो सकतीं। अतीत में कई देशों ने सीमित प्रविष्टियों के बावजूद उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। पुरस्कारों का निर्णय अंततः गुणवत्ता और सफलता दर पर निर्भर करता है, केवल संख्या पर नहीं।
हालांकि उन्होंने माना कि अब एजेंसियां पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां भेजने के मामले में अधिक चयनात्मक हो रही हैं। ग्राहक भी पुरस्कारों पर होने वाले खर्च और उसके प्रतिफल को लेकर पहले से अधिक सवाल पूछ रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में प्रविष्टियां भेजने का दौर धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है।
मुंदकर का मानना है कि भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री के पास रचनात्मक प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भारत पहले भी ऐसे अभियान तैयार कर चुका है, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई और यह साबित किया कि भारतीय विचार दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कामों से मुकाबला कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष के नतीजों से घबराने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने की जरूरत है। इंडस्ट्री को यह सोचना होगा कि क्या वह पुरस्कार जीतने वाले अभियानों पर अधिक ध्यान दे रहा है या फिर ऐसे कामों पर, जो व्यवसाय और समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करें। साथ ही यह भी देखना होगा कि रणनीतिक सोच, डेटा, तकनीक, नवाचार तथा इंजीनियरिंग, व्यवहार विज्ञान और प्रोडक्ट डिजाइन जैसी बहु-विषयक विशेषज्ञता में पर्याप्त निवेश हो रहा है या नहीं।
अपने लेख के अंत में मुंदकर ने कहा कि जो रचनात्मक काम वास्तव में बिजनेस बदलते हैं, संस्कृति को प्रभावित करते हैं और मापने योग्य परिणाम देते हैं, वही अंततः पुरस्कार भी जीतते हैं। उनके अनुसार, महान रचनात्मकता का उद्देश्य ट्रॉफियां हासिल करना नहीं होता, बल्कि उत्कृष्ट काम करना होता है और पुरस्कार स्वयं उसके पीछे आते हैं।
उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि यदि भारतीय विज्ञापन इंडस्ट्री बदलते वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को विकसित करती है, तो कान्स लायंस 2026 का यह प्रदर्शन भविष्य में किसी असफलता के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय रचनात्मकता के अगले दौर की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
करीब 25 वर्षों तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े रहे प्रियदर्शन को याद करते हुए रवीश रंजन शुक्ला ने उनके साथ बिताए अनुभवों, मार्गदर्शन और कार्यशैली का जिक्र किया है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
वरिष्ठ पत्रकार और ‘एनडीटीवी इंडिया’ (NDTV India) में एसोसिएट एडिटर रवीश रंजन शुक्ला ने वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन के संस्थान से सेवानिवृत्त होने पर एक भावुक फेसबुक पोस्ट साझा की है। करीब 25 वर्षों तक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े रहे प्रियदर्शन को याद करते हुए रवीश रंजन शुक्ला ने उनके साथ बिताए अनुभवों, मार्गदर्शन और कार्यशैली का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि प्रियदर्शन न सिर्फ बेहतरीन पत्रकार और साहित्यकार रहे, बल्कि अपनी सादगी, शालीनता और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए भी हमेशा सम्मानित रहे। अपनी पोस्ट में उन्होंने प्रियदर्शन के साथ जुड़े कई संस्मरण साझा किए हैं।
मैच खत्म होने के बाद स्टेडियम की सफाई करते जापानी प्रशंसकों की तस्वीरें और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन,
मैच खत्म होने के बाद स्टेडियम की सफाई करते जापानी प्रशंसकों की तस्वीरें और वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं। दुनिया भर के लोग इसे देखकर हैरान होते हैं, लेकिन जापान में यह कोई असाधारण बात नहीं है। वहां के लोगों के लिए यह एक सामान्य सामाजिक जिम्मेदारी है, जो "Osoji" नाम की एक सांस्कृतिक सोच से जुड़ी हुई है।
Osoji का शाब्दिक अर्थ है "बड़ी सफाई"। पारंपरिक रूप से यह नए साल के स्वागत से पहले घरों और कार्यस्थलों की गहरी सफाई करने की परंपरा है, लेकिन इसकी भावना सिर्फ सालाना सफाई तक सीमित नहीं है। यह जापानी जीवनशैली का हिस्सा है और तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है।
Shared Responsibility (साझी जिम्मेदारी) : सार्वजनिक जगहों जैसे स्टेडियम, पार्क, सड़क या रेलवे स्टेशन को साफ रखना केवल सफाई कर्मचारियों की जिम्मेदारी नहीं है। वहां आने वाले हर व्यक्ति की भी यह जिम्मेदारी है कि वह जगह को साफ-सुथरा रखे।
Atarimae (अतारिमाए – बिल्कुल स्वाभाविक बात) : जब जापानी लोगों से पूछा जाता है कि वे सफाई क्यों करते हैं, तो उनका जवाब होता है कि यह तो एक सामान्य और स्वाभाविक काम है। यानी सफाई करना उनके लिए कोई खास उपलब्धि या दिखावा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी है।
Leaving No Trace (कोई निशान या गंदगी पीछे न छोड़ना) : यह एक जापानी कहावत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि जब आप किसी जगह से जाएं तो उसे गंदा छोड़कर न जाएं। कोशिश करें कि वह जगह आपको जैसी मिली थी, उससे भी ज्यादा साफ हालत में छोड़ें।
कहां से आती है यह आदत
जापान में सफाई और जिम्मेदारी की आदत सिर्फ दिखावे या कैमरे के लिए नहीं होती, बल्कि यह बचपन से सिखाई जाने वाली एक गहरी संस्कृति है। वहां बच्चों को बहुत छोटी उम्र से यह सिखाया जाता है कि स्कूलों में खुद ही अपनी कक्षा, गलियारे और यहां तक कि बाथरूम तक साफ करना उनकी जिम्मेदारी है। इसके लिए अलग से सफाई कर्मचारी नहीं रखे जाते। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बच्चों में यह भावना विकसित हो कि हर कोई बराबर है, किसी काम को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए और अपने आसपास की चीजों का सम्मान करना चाहिए। यह आदत उन्हें विनम्र बनाती है और उनके भीतर अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना पैदा करती है। इसके पीछे जापान की धार्मिक सोच भी जुड़ी हुई है, खासकर शिंटो धर्म की परंपराएं, जिनमें सफाई को पवित्रता माना जाता है, और जेन बौद्ध धर्म की वह सीख जिसमें शारीरिक काम को ध्यान और आत्म-अनुशासन का हिस्सा माना जाता है।
स्टेडियम में सफाई की परंपरा
जापानी लोगों की यही आदत अंतरराष्ट्रीय खेलों में भी दिखाई देती है, खासकर वर्ल्ड कप जैसे बड़े आयोजनों में। दुनिया ने पहली बार यह दृश्य 1998 के फ्रांस वर्ल्ड कप में देखा था और तब से हर बड़े टूर्नामेंट में यह देखने को मिलता है। जापानी फैंस मैच देखने आते हैं और साथ में बड़े नीले प्लास्टिक बैग लाते हैं, जिन्हें वे मैच के दौरान हवा भरकर उत्साह दिखाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन मैच खत्म होने के बाद वही बैग वे कचरा इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं और स्टेडियम पूरी तरह साफ कर देते हैं।
खास बात यह है कि वे यह काम सिर्फ अपनी टीम के लिए नहीं करते। चाहे जापान जीते या हारे, या उनका मैच हो या किसी और टीम का, वे हमेशा स्टैंड्स को साफ करके ही जाते हैं। उदाहरण के तौर पर 2026 वर्ल्ड कप में नीदरलैंड्स के साथ 2-2 ड्रॉ के बाद जापानी फैंस ने डलास स्टेडियम के अपने पूरे हिस्से को साफ कर दिया, और यह घटना सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई।
यह आदत सिर्फ जापानी फैंस तक सीमित नहीं है, बल्कि खिलाड़ी भी इसी सोच को अपनाते हैं। जापान की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम, जिसे “समुराई ब्लू” कहा जाता है, मैच या टूर्नामेंट खत्म होने के बाद अपने ड्रेसिंग रूम को पूरी तरह साफ करके छोड़ती है। वे अपने कपड़े अच्छे से तह करके रखते हैं और कई बार आयोजकों के लिए हाथ से लिखा धन्यवाद संदेश और ओरिगामी (कागज से बनी क्रेन) भी छोड़ जाते हैं। इसका मतलब यह है कि जापान में अनुशासन और साफ-सफाई की संस्कृति सिर्फ दिखावे की चीज नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की आदत का हिस्सा है, चाहे वह खिलाड़ी हो या आम नागरिक।
जब उसने कई सालों तक जापान का दौरा किया, तो उसे यह बात बहुत खास लगी कि वहां लोगों की यह नागरिक जिम्मेदारी वाली आदत सिर्फ किसी बड़े अवसर या साल में एक बार होने वाली सफाई (ओसोजी) तक सीमित नहीं है। यह आदत उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल है। यह सोच जापान के शिंटो धर्म और बौद्ध धर्म से जुड़ी हुई है, जहां “पवित्रता” और “साफ-सफाई” को बहुत महत्व दिया जाता है। इन आदतों के जरिए लोगों को यह सिखाया जाता है कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, दूसरों का ध्यान रखना जरूरी है और अपने काम को पूरी जागरूकता (mindfulness) के साथ करना चाहिए।
अलग-अलग आदतों का मतलब:
Sōji (स्कूल की सफाई की जिम्मेदारी) : जापान में स्कूलों में बच्चे खुद अपनी कक्षा, गलियारे और टॉयलेट साफ करते हैं। सफाई के लिए अलग से कर्मचारी नहीं होते। इससे बच्चों में विनम्रता, टीमवर्क और अपनी जगह की जिम्मेदारी सीखने को मिलती है।
Gomi Hiroi (कचरा अपने साथ ले जाना) : जापान में लोग अक्सर सार्वजनिक जगहों पर कचरा नहीं छोड़ते, बल्कि उसे अपने साथ घर ले जाते हैं। इसलिए स्टेडियम में भी लोग मैच के बाद अपना कचरा खुद उठाते हैं और साफ करके जाते हैं।
Mottainai (चीजों की बर्बादी न करना) : यह सोच कहती है कि किसी भी चीज़ को बेकार नहीं करना चाहिए। हर संसाधन का पूरा उपयोग करना चाहिए और कचरे को सही तरीके से अलग-अलग करके रीसायकल करना चाहिए।
Meiwaku wo Kakenai (दूसरों को परेशानी न देना) : इसका मतलब है कि ऐसा कोई काम नहीं करना जिससे दूसरों को असुविधा हो। इसलिए जापान में लोग शांति से रहते हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में शोर नहीं करते और जगहें साफ-सुथरी रहती हैं।
अंत में 5S सिस्टम का मतलब : इन सभी आदतों को मिलाकर एक तरीका बनता है जिसे 5S कहा जाता है। इसमें काम और जीवन को इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि जगह साफ, सुरक्षित और अच्छी बनी रहे।
इन सभी आदतों का प्रभाव जापान की प्रसिद्ध 5S कार्यप्रणाली में भी दिखाई देता है, जिसमें चीजों को व्यवस्थित रखना, सफाई बनाए रखना और अच्छी आदतों को लगातार जारी रखना शामिल है।
खेल के मैदान से परे, जापानी प्रशंसकों और खिलाड़ियों का व्यवहार दुनिया को यह संदेश देता है कि खेल सिर्फ जीत और हार का नाम नहीं है। यह सम्मान, अनुशासन, कृतज्ञता और अच्छे नागरिक होने का भी प्रतीक है।
जापानी प्रशंसकों की इस पहल से अन्य देशों के समर्थक भी प्रेरित हुए हैं। मोरक्को, सऊदी अरब और फ्रांस जैसे देशों के प्रशंसक भी अब मैचों के बाद अपने स्टैंड्स की सफाई करते दिखाई देते हैं। उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में भारत में भी ऐसी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा और शायद एक दिन आईपीएल मैचों के बाद भी दर्शक स्टेडियम साफ करते नजर आएं।
जापान की यह परंपरा दुनिया को बताती है कि बदलाव के लिए बड़े अभियानों की नहीं, बल्कि छोटी-छोटी जिम्मेदार आदतों की जरूरत होती है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
लंबे समय तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद हर साल करीब एक लाख युवाओं को इन कंपनियों में नौकरी मिल जाती थी। लेकिन पिछले दो वर्षों से भर्ती लगभग रुकी हुई है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
केंद्र सरकार के चीफ इकोनॉमिक एडवाइज़र वी. अनंत नागेश्वरन की ट्रोलिंग हो रही है। उन्होंने ANI को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि सॉफ़्टवेयर और MBA डिग्री के आधार पर आसानी से नौकरी मिलने के दिन अब ढल रहे हैं। आने वाले समय में वेल्डिंग, प्लंबिंग और इलेक्ट्रिकल कार्यों से जुड़े कुशल लोगों की मांग बढ़ने वाली है। उनकी आलोचना इस आधार पर की जा रही है कि सरकार अब बेरोज़गार युवाओं को वेल्डिंग और प्लंबिंग करने की सलाह दे रही है। लेकिन यह आलोचना सही नहीं है। अगर हम आंकड़ों और बदलती अर्थव्यवस्था को देखें तो समझ सकते हैं कि नौकरियों का स्वरूप किस तरह बदल रहा है।
भारत की पांच बड़ी आईटी कंपनियों में 15 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। लंबे समय तक सॉफ़्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद हर साल करीब एक लाख युवाओं को इन कंपनियों में नौकरी मिल जाती थी। लेकिन पिछले दो वर्षों से भर्ती लगभग रुकी हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) है। सॉफ़्टवेयर कोडिंग जैसे कई कार्य अब AI पहले से बेहतर और तेज़ी से कर रहा है, जिससे बड़ी संख्या में कर्मचारियों की आवश्यकता कम होती जा रही है।
टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियां वर्षों से दूसरी कंपनियों के सॉफ़्टवेयर और कंप्यूटर सिस्टम की देखरेख करके कमाई करती रही हैं। लेकिन AI के बढ़ते उपयोग के कारण ऐसे ऑर्डर्स में कमी आने लगी है। दुनिया की प्रमुख आईटी सेवा कंपनी Accenture ने भी आने वाले महीनों के लिए अपने बिक्री अनुमान को घटा दिया है। इसके बाद न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (NYSE) में उसके शेयरों में 18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसका असर भारतीय आईटी कंपनियों पर भी पड़ा और निफ्टी आईटी इंडेक्स तीन वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया।
चीफ इकोनॉमिक एडवाइज़र की बातों को शेयर बाज़ार भी अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराता दिखाई देता है कि आईटी कंपनियों के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आईटी कंपनियां बंद हो जाएंगी, बल्कि उनके काम का स्वरूप बदल सकता है और कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो सकती है।
टीसीएस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने हाल ही में कहा है कि अगले तीन वर्षों में कंपनी में कर्मचारियों के बराबर AI एजेंट काम कर सकते हैं। उनके अनुसार, टीसीएस में लगभग 5 लाख AI एजेंट कार्य करेंगे, जबकि वर्तमान में कंपनी में करीब 5.4 लाख कर्मचारी हैं।
AI को लेकर यह धारणा बन रही है कि कंप्यूटर के सामने बैठकर किए जाने वाले अधिकांश कार्य AI कर सकता है, लेकिन हाथों से किए जाने वाले तकनीकी और व्यावहारिक कार्य फिलहाल उसकी पहुंच से बाहर हैं। भारतीय समाज में लंबे समय से हाथ से किए जाने वाले कामों को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जाता रहा है, जबकि आज इलेक्ट्रिशियन, एसी टेक्नीशियन और अन्य तकनीकी पेशों से जुड़े लोग कई व्हाइट-कॉलर एंट्री-लेवल नौकरियों से अधिक आय अर्जित कर रहे हैं।
Randstad India की एक रिपोर्ट के अनुसार, डेटा एंट्री ऑपरेटर या जूनियर अकाउंटेंट जैसी एंट्री-लेवल व्हाइट-कॉलर नौकरियों में औसतन ढाई लाख रुपये सालाना वेतन मिलता है, जबकि एसी टेक्नीशियन तीन लाख रुपये से अधिक सालाना कमाते हैं। दूसरी ओर, टीसीएस और इंफोसिस जैसी कंपनियों में एंट्री-लेवल कर्मचारियों का वेतन पिछले लगभग 20 वर्षों से तीन से साढ़े तीन लाख रुपये वार्षिक के आसपास ही बना हुआ है। महंगाई को ध्यान में रखें तो वास्तविक रूप से यह आय पहले की तुलना में काफी कम हो चुकी है।
स्पष्ट है कि AI के कारण व्हाइट-कॉलर नौकरियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। लेकिन इस चुनौती का समाधान ट्रोलिंग नहीं, बल्कि नई तकनीकों को अपनाने और AI जैसी उभरती तकनीकों को सीखने में है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
गृह मंत्री और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बैठक का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात और समुद्री मार्गों के माध्यम से होने वाली ड्रग्स तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
सीमा पर आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण और माओवादी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुक्त करने के बाद भारत सरकार अब मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी तथा उसके ज़हर को समाज में फैलने से रोकने के लिए व्यापक अभियान चला रही है। पिछले दिनों एक अनौपचारिक बातचीत में मैंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से इसी संबंध में सवाल किया तो उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि, “हम पिछले वर्षों से इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठा रहे हैं और अब नारकोटिक्स पर नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करेंगे। यह आतंकवाद की तरह पूरी दुनिया के लिए और खासकर भावी नई पीढ़ी को सुरक्षित करने के लिए प्राथमिकता का मुद्दा है।”
इसी लक्ष्य से गृह मंत्री अमित शाह ने इस सप्ताह भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की। इस बैठक में आतंकवाद-रोधी सहयोग, सीमा सुरक्षा तथा मादक पदार्थों (नारकोटिक्स) की तस्करी के विरुद्ध संयुक्त प्रयासों पर विशेष चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार अब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और गृह मंत्री अमित शाह की इस सप्ताह की बैठक केवल एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बढ़ती वैश्विक चिंता का प्रतीक है, जिसमें ड्रग्स तस्करी, संगठित अपराध और आतंकवाद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल के वर्षों में विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों के साथ हुई बैठकों में आतंकवाद के साथ नारकोटिक्स के मुद्दे की गंभीरता पर चर्चा करते रहे हैं। अमेरिका के साथ आर्थिक और व्यापार के नए समझौते पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भी निर्णायक बातचीत हो चुकी है।
गृह मंत्री अमित शाह और अमेरिकी राजदूत के बीच हुई बैठक का महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत पंजाब, राजस्थान, गुजरात और समुद्री मार्गों के माध्यम से होने वाली ड्रग्स तस्करी की चुनौती का सामना कर रहा है। गृह मंत्री अमित शाह पहले भी कई मंचों पर चेतावनी दे चुके हैं कि “मादक पदार्थों का व्यापार और नार्को-टेररिज्म भारत के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा खतरा बन सकता है।”
इस वर्ष जनवरी 2026 में भारत और अमेरिका ने संयुक्त ड्रग नीति कार्य समूह की बैठक भी आयोजित की थी, जिसमें दोनों देशों ने मादक पदार्थों और उनके उत्पादन में प्रयुक्त रसायनों की तस्करी रोकने के लिए सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया था।
भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वह दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है, दूसरी ओर यही युवा वर्ग ड्रग्स माफिया का सबसे बड़ा लक्ष्य भी है। पंजाब सीमा से होने वाली तस्करी, ड्रोन के जरिए भेजे जा रहे नशीले पदार्थ, अंतरराष्ट्रीय अपराध सिंडिकेट और नार्को-टेरर नेटवर्क भारत के सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
अमित शाह ने पिछले महीने भी एक बैठक में कहा था कि ड्रग्स का खतरा सीमाहीन है और इसके खिलाफ वैश्विक गठबंधन आवश्यक है। उन्होंने देशों के बीच वास्तविक समय की खुफिया साझेदारी और समन्वित कानूनी ढांचे की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। भारत का मानना है कि अकेला कोई देश ड्रग्स माफिया को समाप्त नहीं कर सकता। इसलिए आवश्यक है संयुक्त राष्ट्र स्तर पर सहयोग, साझा खुफिया नेटवर्क, वित्तीय निगरानी, समुद्री सुरक्षा और सीमा प्रबंधन।
पिछले वर्षों (2020–2024) के दौरान भारत की विभिन्न एजेंसियों—विशेषकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), डीआरआई, बीएसएफ, कोस्ट गार्ड तथा राज्यों की पुलिस—ने सीमा क्षेत्रों, बंदरगाहों और समुद्री मार्गों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की है। यदि 2020–2024 में भारत की चुनौती मुख्यतः पंजाब सीमा और बंदरगाहों तक सीमित दिखाई देती थी, तो 2025 ने दिखाया कि समुद्री मार्ग राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रमुख मोर्चा बन चुका है।
2025 में गुजरात तट के पास 1,800 करोड़ रुपये मूल्य की मेथामफेटामाइन पकड़ी गई। 33 करोड़ रुपये का हशीश ऑयल जहाज़ से बरामद हुआ। भारतीय नौसेना ने पश्चिमी हिंद महासागर में 2.5 टन से अधिक मादक पदार्थ जब्त किए। इससे यह संकेत स्पष्ट रूप से मिलता है कि ड्रग्स तस्कर भूमि सीमाओं के साथ-साथ समुद्री मार्गों का भी बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियों को अब “नार्को-टेरर” के खिलाफ समुद्र में भी उतनी ही बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
ड्रग्स की समस्या केवल सीमावर्ती राज्यों या अपराध जगत तक सीमित नहीं रह गई है। पिछले कुछ वर्षों में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, हॉस्टलों, पब, बार, रिसॉर्ट, होटल और नाइटलाइफ़ से जुड़े इलाकों में भी नशीले पदार्थों की पहुँच बढ़ने को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है।
विभिन्न अध्ययनों और सरकारी अभियानों से संकेत मिलता है कि ड्रग्स का प्रयोग कम उम्र में शुरू हो रहा है और युवाओं को प्रभावित कर रहा है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा 10 शहरों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि कुछ बच्चों में नशीले पदार्थों के प्रयोग की शुरुआत औसतन 12.9–13 वर्ष की आयु के आसपास हो रही है, जबकि कुछ मामलों में शुरुआत 11 वर्ष की आयु तक देखी गई। अध्ययन में लगभग 15 प्रतिशत विद्यार्थियों द्वारा किसी न किसी मनःप्रभावी पदार्थ को आज़माने की बात सामने आई।
प्रकाशित एक अन्य सर्वेक्षण में कक्षा 8 से 12 तक के छात्रों में 10 प्रतिशत से अधिक द्वारा पिछले वर्ष किसी न किसी प्रकार के पदार्थ सेवन की जानकारी सामने आई थी। विशेषज्ञों के अनुसार इसके प्रमुख कारण हैं—साथियों का दबाव, सोशल मीडिया और डिजिटल प्रभाव, परिवार में तनाव, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, जिज्ञासा और प्रयोग करने की प्रवृत्ति तथा आसान उपलब्धता।
कॉलेजों में स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है क्योंकि छात्रों को अधिक स्वतंत्रता, हॉस्टल जीवन और नाइटलाइफ़ का संपर्क मिलता है। पुलिस और जनप्रतिनिधियों ने कॉलेज परिसरों के आसपास नशे की उपलब्धता को लेकर चिंता व्यक्त की है। नागपुर में स्थानीय प्रशासन ने कॉलेजों से निगरानी बढ़ाने की अपील की और छात्र समुदाय में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। कर्नाटक के बेलगावी में पुलिस ने कॉलेज परिसरों के आसपास विशेष अभियान चलाया और बड़ी संख्या में युवाओं के नशीले पदार्थों के संपर्क में होने की बात सामने आई।
सामुदायिक चर्चाओं और छात्र अनुभवों में भी यह चिंता दिखाई देती है कि कुछ हॉस्टलों और विश्वविद्यालय क्षेत्रों में गांजा, सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य पदार्थों की उपलब्धता पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है। बड़े महानगरों—जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गोवा, पुणे और हैदराबाद—में पुलिस समय-समय पर होटल, पब, फार्महाउस पार्टियों और निजी आयोजनों पर छापे मारती रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार अब केवल हेरोइन या अफीम ही समस्या नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में एमडीएमए, एलएसडी, मेफेड्रोन, मेथम्फेटामिन और पार्टी ड्रग्स का खतरा बढ़ा है। इनका उपयोग अक्सर पार्टी संस्कृति, नाइट क्लब, निजी पार्टियों और कुछ मामलों में कॉलेज नेटवर्क से जुड़ा पाया जाता है।
2025–26 के दौरान पंजाब के नशामुक्ति कार्यक्रमों में 90,000 से अधिक लोगों का उपचार किया गया। यह बताता है कि समस्या कितनी व्यापक हो चुकी है। कश्मीर के स्थानीय अध्ययनों में युवाओं के बीच नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बताया गया है। गोवा लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और नाइटलाइफ़ के कारण ड्रग्स नियंत्रण एजेंसियों की विशेष निगरानी में रहा है। स्थानीय समुदायों ने भी स्कूलों और युवाओं तक ड्रग्स पहुँचने पर चिंता व्यक्त की है।
युवाओं में ड्रग्स की लत केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं है। इसके कारण पढ़ाई में गिरावट, स्कूल छोड़ना, मानसिक अवसाद, चिंता विकार, हिंसक व्यवहार, सड़क दुर्घटनाएँ, अपराध में शामिल होना और पारिवारिक संबंधों के टूटने जैसी स्थितियाँ बन रही हैं। एम्स और अन्य स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती हस्तक्षेप न किया जाए तो ड्रग्स का प्रयोग धीरे-धीरे निर्भरता और फिर लत में बदल जाता है।
बहरहाल, भारत अभी अमेरिका या कनाडा जैसी ओपिऑयड महामारी की स्थिति में नहीं है, लेकिन कई विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि शुरुआत की आयु कम हो रही है, सिंथेटिक ड्रग्स बढ़ रही हैं, कॉलेज और शहरी युवा अधिक प्रभावित हो रहे हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ और नशा एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।
इसलिए स्कूल स्तर से जागरूकता, कॉलेजों में काउंसलिंग, परिवारों की भागीदारी, नशामुक्ति केंद्रों का विस्तार और तस्करी नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई अत्यंत आवश्यक मानी जा रही है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ड्रग्स की तस्करी नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को नशे की गिरफ्त में जाने से बचाना है। यदि स्कूल, कॉलेज, परिवार, समाज और कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ मिलकर समय रहते कार्रवाई करें, तो भारत उस बड़े सामाजिक संकट से बच सकता है जिसका सामना कई पश्चिमी देशों ने पिछले दशकों में किया है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )