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वरिष्ठ पत्रकार भानु प्रताप सिंह को मातृशोक, उठावनी शुक्रवार को...
समाचार4मीडिया ब्यूरो आगरा के वरिष्ठ पत्रकार और जानकार भानु प्रताप सिंह की माता श्रीमती कस्तूरी देवी का निधन बीती रात हो गया। वे काफी दिनों से बीमार चल रही थी। उन्होंने अपने पीछे बेटे और बेटी का भरापूरा परिवार छोड़ा है। अपनी मां से साथ रह रहे भानु प्रताप ने उनकी सेवा में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। कई वरिष्ठ चिकित्सकों ने समय-समय पर
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो आगरा के वरिष्ठ पत्रकार और जानकार भानु प्रताप सिंह की माता श्रीमती कस्तूरी देवी का निधन बीती रात हो गया। वे काफी दिनों से बीमार चल रही थी। उन्होंने अपने पीछे बेटे और बेटी का भरापूरा परिवार छोड़ा है। अपनी मां से साथ रह रहे भानु प्रताप ने उनकी सेवा में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। कई वरिष्ठ चिकित्सकों ने समय-समय पर उनकी माताजी का इलाज किया। पर इस बार जब वे बीमार पड़ीं तो साथ छूट गया। भानु प्रताप की पत्नी, बेटा और बेटी सहित परिवार के सभी जन इस समय गहरी पीड़ा में है। माता जी का अंतिम संस्कार आज सुबह आगरा के विद्युत शवदाह ग्रह में किया गया। वहां आगरा के कई राजनेता, संपादक, पत्रकार, समाजसेवी, उद्यमी मौजूद थे। भानु प्रताप सिंह वर्तमान में हिंदी के प्रमुख समूह पत्रिका की वेबसाइट के ब्रज मंडल प्रभारी है। वे इससे पहले सी एक्सप्रेस के संपादक रह चुके है। आगरा के सभी बड़े अखबारों अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान में वे वरिष्ठ पद पर कार्यरत रह चुके हैं। मिली सूचना के मुताबिक उठावनी शुक्रवार शाम 4 बजे शांति सभागार, एम.डी.जैन कॉलेज हरिपर्वत, आगरा पर होगी। आगरा के वरिष्ठ पत्रकार विनोद भारद्वाज ने अपने फेसबुक पर लिखा है कि पत्रकारिता के सफ़र के अपने एक साथी भानु प्रताप सिंह की पूजनीय माताश्री की आज सवेरे ताजगंज के विद्युत् शवदाह गृह पर अंतिम बिदाई के समय भानु की मर्मान्तक पीड़ादायी स्थिति से रूबरू होना पड़ा । विद्युतदाह में भस्म होते एक माँ के शरीर को देखकर बर्वश ही कवि "चौहान " की मरघट शीर्षक से लिखी वे पंक्तिया अचानक दिमाग में कौंध गयी जो अक्सर ऐसे दृश्य देखकर हमेशा मुझे याद आ जाती हैं । कितना यथार्थ छिपा है इन शब्दों में ------ " पुरजन परिजन और पड़ौसी इतना ही कर पाये ...... नाड़ी छूट गयी तो घर से मरघट तक ले आये ...... लपटें उठ उठ पंच फैसला अपना सुना रही हैं ...... जिसकी थी जो चीज उसे हक़ उसका दिला रहीं हैं .... " हमसब जानते हैं कि राजा हो या रंक , अंत सबका यही है ..... , लेकिन फिर भी हम सच को भूलकर जीवन की आपाधापी और गलाकाट प्रतिस्पर्धा में जुट जाते हैं ........... ???
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