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आंचलिक पत्रकारों के लिए तालीम थे हरिशंकर नेमा 'मुन्ना'

<p style="text-align: justify;"><strong>अक्षय नेमा मेख ।।</strong></p> <p style="text-align: justify;">‘यूं तो पत्रकारिता बहुत से लोग करते हैं। पैसे देकर पत्रकार बनना, फिर उसकी आढ़ में लखपति-करोड़पति हो जाना यह पत्रकारिता नहीं है। पत्रकारिता कुर्बानी मांगती है।’ जैसे विचार रखने वाले हरिशंकर नेमा 'मुन्ना' गत 25 मार्च 2016 को इस दुनिया को अलविदा कह गए

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

अक्षय नेमा मेख ।।

‘यूं तो पत्रकारिता बहुत से लोग करते हैं। पैसे देकर पत्रकार बनना, फिर उसकी आढ़ में लखपति-करोड़पति हो जाना यह पत्रकारिता नहीं है। पत्रकारिता कुर्बानी मांगती है।’ जैसे विचार रखने वाले हरिशंकर नेमा 'मुन्ना' गत 25 मार्च 2016 को इस दुनिया को अलविदा कह गए। वे महज मेरे मामाजी नहीं थे बल्कि एक अच्छे मार्गदर्शक और पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पहलू समझाने वाले गुरु भी थे।

हरिशंकर नेमा 'मुन्ना' का जन्म नरसिंहपुर के पटेल वार्ड निवासी गया प्रसाद नेमा के घर 16 मई 1965 को हुआ था। वे मेरी माताजी के सबसे छोटे व लाड़ले भाई थे। मेरी छुट्टियों का अधिकांश समय या कहें मेरा बचपन उन्हीं के साथ बीता है। वे जब किसी खबर पर जाते मुझे भी साथ ले जाते। उस समय मैं लगभग 3-4 साल का रहा जब थानों, अस्पतालों, रेलवें स्टेशनों जैसी जगहों पर रात के 2-2 बजे उनके साथ घूमता रहा। यूं तो मैंने स्वर्गीय मामाजी की पत्रकारिता बहुत करीब से देखी मगर उनके बारे में, उनके न होने के बाद जान सका। उनकी साहसिक और निष्पक्ष पत्रकारिता का ज्ञान तब हुआ, जब उनके द्वारा सहेजी गई खबरें पढ़ने को मिली। इनकी पत्रकारिता उस समय की पत्रकारिता है जब जबलपुर एक्सप्रेस नरसिंहपुर में नंबर वन हुआ करता था। लालची धामेचा, राजेश नेमा जैसे वरिष्ठ व पुरोधा पत्रकारों द्वारा लिखी गई खबरों पर पाठक आंख बंद कर विश्वास करता था। यही छवि उस समय मामाजी की भी बन चुकी थी। रोजाना दर्जनों लोग घर पर ही अपनी व्यथाएं सुनाने और उन्हें अखबार में निकलवाने आया करते थे। उनकी आंचलिक पत्रकारिता का अनुमान इसी आधार पर लगाया जा सकता है कि उनकी हर खबर किसी न किसी तबके से जुड़ी हुई होती और उसमें शासन-प्रशासन पर गहरा तंज होता साथ ही एक समझाइश भरी युक्ति भी मिलती।

उनकी सारी खबरों का वर्णन करना बेहद मुश्किल जान पड़ता है। फिर भी मैं उन खबरों के बारे में बताना चाहता हूं जो वर्तमान में भी सटीक बैठती है। 27 अप्रैल 1998 की एक खबर 'गरीबी में पल-बढ़ रहे बच्चों की दिशा की किसे है फिक्र' शीर्षक से दी जिसमे उन्होनें गरीबी के कारण देश भर के उन लाखों परिवारों के बच्चों का जिक्र किया था जो 5 से 16 साल की उम्र में भीख मांगते है और होटलों, रेस्टोरेन्टों में काम करते है तथा मजदूरी कर अपना व अपने परिवार का पेट पालते है। इस खबर को लगभग दो दशक होने को आए पर आज भी उनके द्वारा उठाये गए प्रश्न, प्रश्न ही बने हुए है। नरसिंहपुर में आज अतिक्रमण मुक्त करने की कोशिशें की जा रही है लेकिन 28 जून 1998 को उनकी खबर 'कल्याणकारी योजना का बंटाढ़ार करने सक्रिय हैं स्वार्थी तत्व' प्रकाशित कर गरीबों के लिए पट्टे वितरण योजना में अतिक्रमणकारियों की पोल खोली थी। उनके पत्रकारिता जीवन में शायद ही ऐसी कोई खबर हो जो उनसे छूटी हो। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी खबरों पर उनके द्वारा काम किया गया था। फिर भले ही वह अपराध से जुड़ी हो या सियासत से।

यदि राजनैतिक खबरों पर गौर करें तो उनकी पत्रकारिता और वर्तमान पत्रकारिता में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है। ग्यारहवीं विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण है। जब भाजपा और कांग्रेस दोंनो ही भीतरघात की राजनीति से जूझ रही थी। तब उन्होनें जीत-हार का फैसला जनता की अपेक्षा कार्यकर्ताओं को निर्णायक ठहराते हुए 'भीतरघाती एवं असंतुष्ट कार्यकर्ता जीत-हार में होंगे निर्णायक' खबर से तत्कालीन प्रदेश प्रमुखों का ध्यान इस ओर खींचा था। पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की विजयी यात्रा का भी अच्छा कवरेज किया था। यही नहीं जब 16 जनवरी 2002 को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तेंदूपत्ता बोनस वितरण कार्यक्रम में शामिल होने लखनादौन आई तो आवागमन के साधनों के आभाव में उनकी पत्रकारिता नजर ने सोनिया का नहीं बल्कि यात्रियों की वेदना को प्रमुख खबर बनाया। और जब राष्ट्रीय त्यौहार 15 अगस्त आया तब उन्होंने अगस्त 2000 में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी देकर आजादी का अर्थ प्रस्तुत किया।

यदि राजनैतिज्ञों से उनके संबंधो की बात करें तो उन्हें हर दल से विशेष स्नेह मिलता रहा, बावजूद इसके उन्होनें कभी फायदा नहीं उठाया और न ही कभी संबंधों की वजह से कोई खबर रोकी। इसका उन्हें कई दफा नुकसान भी उठाना पड़ा और कई बार तो धमकियों से दो चार होना पड़ा। पर पत्रकारिता या कहें लोगों के विश्वास के प्रति वे जरा भी तस से मस नहीं हुए। इसका उदाहरण है तत्कालीन वित्तमंत्री श्री अजय मुशरान। जिनके पक्ष-विपक्ष में पत्रकारिता की मगर न तो मामाजी की और से सम्बन्धों में कोई कमी आई और न ही श्री मुशरान के। बल्कि स्वर्गीय मामाजी की पत्रकारिता को देखते हुए खुद तत्कालीन वित्तमंत्री  मुशरान ने 5 फ़रवरी 1995 में दैनिक भास्कर भोपाल के प्रधान संपादक रमेश अग्रवाल को पत्र लिख कर नरसिंहपुर में तत्कालीन एजेंसी संजय तिवारी की जगह स्वर्गीय मामाजी हरिशंकर नेमा 'मुन्ना' को देने की अनुशंसा की थी।

अपने नाम के पीछे 'मुन्ना' लिखने की उनकी एक रोचक कहानी है। दरअसल, मामाजी के बड़े पिताजी (ताऊ) के लड़के जो उनके चचेरे भाई थे का नाम भी हरिशंकर नेमा था। संयोग से वे भी उस समय पत्रकार हो गए थे। उन्हें स्वर्गीय मामाजी के नाम का बहुत फायदा मिला। हालांकि पिता, निवास स्थान और अखबार का नाम भिन्न होने की वजह से लोग पहचान तो जाते पर स्तिथि चाहे जब इसी तरह बनती। ऐसे में मामाजी के पास एक ही विकल्प था अपने नाम के साथ 'मुन्ना' जोड़ने का।

मामाजी ने एक बार मुझसे कहा था- ‘यदि पत्रकारिता करना तो कभी अपने लिए न करना।’ आज वे हमारे बीच नहीं पर उनके सिद्धांत अब भी मुझे याद है।

(लेखक युवा पत्रकार है)

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