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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का बड़ा सवाल, बाबरी मस्जिद किसने गिरवाई?
‘राव साहब से रात 10 बजे तक कई बार बात हुई। बार-बार वे कह रहे थे कि बड़ा धोखा हुआ। उनकी आवाज में कंपन था। गला भरा जा रहा था। रात को उन्हें बोलने में असुविधा हो रही थी। अपनी लगभग 30 साल के अनुभव में मैंने उन्हें इतना परेशान कभी नहीं देखा। दूसरे दिन सुबह उन्हें हल्का-हल्का बुखार था।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘राव साहब से रात 10 बजे तक कई बार बात हुई। बार-बार वे कह रहे थे कि बड़ा धोखा हुआ। उनकी आवाज में कंपन था। गला भरा जा रहा था। रात को उन्हें बोलने में असुविधा हो रही थी। अपनी लगभग 30 साल के अनुभव में मैंने उन्हें इतना परेशान कभी नहीं देखा। दूसरे दिन सुबह उन्हें हल्का-हल्का बुखार था।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
बाबरी मस्जिद किसने गिरवाई?
वह ढाचा 6 दिसंबर 1992 को गिरा था। उसी दिन ये आरोप राव-सरकार के प्रमुख मंत्री अर्जुनसिंह ने प्रधानमंत्री पर जड़ दिए थे। इन आरोपों को राव-विरोधी अन्य कांग्रेसियों ने भी जस का तस निगल लिया और आज भी उन्हें सही माना जाता है लेकिन उस वक्त का तथ्य अलग है। 6 दिसंबर 1992 को रविवार था। उन दिनों मैं पीटीआई-भाषा का संपादक था। सुबह 8.30 बजे तैयार होकर घर से दफ्तर के लिए निकलने के पहले मैंने राव साहब को फोन किया। मैंने उन्हें बताया कि मेरे संवाददाता योगेश माथुर बाबरी ढांचे के सामने ही खड़े हैं और वे थोड़ी-थोड़ी देर में फोन पर मुझे खबर दे रहे हैं। राव साहब ने कहा, गृह सचिव माधव गोडबोले मुझे अवगत रख रहे हैं। लगभग 11 बजे योगेश का फोन आया कि ढांचे का एक गुंबद टूटने ही वाला है। कारसेवक उस पर चढ़ गए हैं। राव साहब ने जैसे ही मेरा फोन लिया, उन्होंने कहा कि ‘रेक्स’ (विशेष फोन) पर गोडबोले हैं। वे भी यही कह रहे हैं।
राव साहब से रात 10 बजे तक कई बार बात हुई। बार-बार वे कह रहे थे कि बड़ा धोखा हुआ। उनकी आवाज में कंपन था। गला भरा जा रहा था। रात को उन्हें बोलने में असुविधा हो रही थी। अपनी लगभग 30 साल के अनुभव में मैंने उन्हें इतना परेशान कभी नहीं देखा। दूसरे दिन सुबह उन्हें हल्का-हल्का बुखार था।
यदि उनकी मिलीभगत से मस्जिद गिरी होती तो वे इतने व्यथित क्यों होते? मेरा संघ और भाजपा से सीधा संपर्क था। विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल ने कार-सेवा की अवधि तीन महीने आगे खिसकाई थी। उ.प्र. के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने मुझे आश्वस्त किया था कि ढांचे को छुआ नहीं जाएगा। बालासाहब देवरस, भाऊराव, रज्जू भय्या और सुदर्शन से भी मेरा सतत संपर्क था। वाजपेयी और आडवाणी से निरंतर बात चलती रहती थी।
भाजपा के श्वेत-पत्र में इसका जिक्र है। वाजपेयी से 6 दिसंबर को भी बात हुई। 7 दिसंबर को भेंट भी हुईं। इन सब नेताओं और साधु-संतों ने नरसिंहराव के दिल में यह बात बिठा दी थी कि वे एक चबूतरे पर सिर्फ सांकेतिक कार-सेवा करेंगे। ढांचे को नहीं छुएंगे। राव साहब ने उन पर विश्वास किया। शायद ज्यादातर साधु-संतों और नेताओं को भी पता नहीं होगा कि कुछ सिरफिरे कारसेवक क्या करने वाले हैं? लेकिन अर्जुनसिंहजी को पूरा विश्वास था कि बाबरी मस्जिद राव साहब ने ही गिरवाई थी।
(साभार: नया इंडिया)
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