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'अब यहां खबरों के खरीदार बहुत हैं, झूठ बताने को अब अखबार बहुत है...'
बृजेश दुबे ।। अब यहां खबरों के खरीदार बहुत हैं बिकती रुह
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
अब यहां खबरों के खरीदार बहुत हैं
बिकती रुह, जिस्म के जमींदार बहुत हैं
अंधेरों में भटक रही आज की रोशनाई
झूठ बताने को अब अखबार बहुत है
कीमत कोई भी हो मायने नहीं रखती
कलम की जरूरत आखिरकार बहुत है
ठोंकपीट कर हर सौदा पट ही जाता है
उनकी जरूरतों के तलबगार बहुत हैं
मिरे चेहरे पर नकाब अब कई सारे हैं
अच्छे हो बुरे हों मिरे राजदार बहुत हैं
जेहन जमीर में सलवटें भी नहीं पड़ती
मिरे हर काम के अब सत्तार बहुत हैं
उंगलियों को जरा भी शिकन नहीं होती
मिरे लिखे हर्फों के करतार बहुत हैं
कलम की ताकत पर खुदा बना बैठा हूं
हर कदम पे मिरे फरमाबरदार बहुत हैं
(सत्तार - पर्दा डालने वाला या दोष छिपाने वाला), (करतार- सृष्टि करने वाला)
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