‘इतिहास की कोई सरहद नहीं होती’: क्रिएटिव हिस्ट्री व्याख्यान में गूंजे इतिहास के स्वर

इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार-इतिहासकार विवेक शुक्ल ने दिल्ली के स्थापत्य इतिहास का उल्लेख करते हुए कई ऐसे नामों की चर्चा की, जिनसे दिल्ली का गौरवशाली इतिहास बना।

Last Modified:
Sunday, 10 May, 2026
History Event


‘इतिहास की कोई सरहद नहीं होती। नया इतिहास हमेशा सरहदों के बाहर ही बना है। यह अजीब विडंबना है कि जब-जब इतिहास रूढ़ हुआ है, तब-तब एक नई विचारधारा, सामूहिक आंदोलनों और एक नयी शैली (पद्धति) ने इतिहास को जकड़न से मुक्त किया है। एक नया इतिहास रचा है।’

ये बातें 1857 की मई क्रांति दिवस के दिन 10 मई 2026 को दिल्ली के सेक्युलर हाउस के सभागार में क्रिएटिव हिस्ट्री ट्रस्ट द्वारा समाजवादी शिक्षा संस्थान, रंगश्री, परम्परा/जेएनयू स्कॉलर ग्रुप और बक्सर स्कूल ऑफ़ हिस्ट्री के सौजन्य से आयोजित तीसरे क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक व्याख्यान 2026 में उभरकर आईं।

इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार-इतिहासकार विवेक शुक्ल ने दिल्ली के स्थापत्य इतिहास का उल्लेख करते हुए कई ऐसे नामों की चर्चा की, जिनसे दिल्ली का गौरवशाली इतिहास बना। उन्होंने गांधी और दिल्ली के रिश्तों, इमारतों के नक्शे, सड़कों, पुलों, कनॉट प्लेस, दरियागंज, विभाजन आदि के बनने की बारीकियों के इतिहास का उल्लेख किया और कहा कि ‘बिना इन छोटे-छोटे सन्दर्भ के किसी भी राष्ट्र या समाज का इतिहास पूरा नहीं होता है। ये सन्दर्भ इतिहास के बनने की प्रक्रियाओं की तरफ संकेत करते हैं। हो सकता है, इतिहासकार इन्हें इतिहास मानने से इंकार कर दें, पर ये भी इतिहास के जनक हैं।’

इस अवसर पर इतिहासकार सलिल मिश्र, रश्मि चौधरी, राजनीतिक समाजशास्त्री मणीन्द्र नाथ ठाकुर और लेखक अख़लाक़ अहमद आहन ने कहा कि इतिहास की कोई सरहद नहीं होती। एक बहुलतावादी संस्कृति, भाषा, विचार आदि की ऐतिहासिक यात्रा में बने मोर्चों ने चीजों को खण्ड-खण्ड में बांटकर देखना शुरू किया। लेकिन इतिहास ने बताया कि अतीत को सिर्फ शासकों के नज़रिये से नहीं समझा जा सकता है, बल्कि जनता और जनसमूह के विचार भी इतिहास की सरहदें तय करते हैं। इतिहास रोज बनता है, वह स्थिर नहीं होता है, पर उसकी स्पष्ट रेखा पचास वर्ष बाद समझ में आती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इतिहासकार एस. एन. आर. रिज़वी ने कहा कि ‘विषय और विचार चीजों की सीमाओं को तय करते हैं।’ कार्यक्रम के पूर्व उद्घाटन सत्र में इतिहासकार एस. एन. आर. रिज़वी की किताब एक इतिहासकार की आत्मकथा, रश्मि चौधरी और देवेंद्र चौबे की पुस्तक इतिहास की सरहदें और सोनिका भारती की किताब डिअर इडियट, दिस इज लाइफ का लोकार्पण हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत में अभिषेक पाण्डेय ने 1857 पर केंद्रित एक आदिवासी लोकगीत का पाठ किया और समापन सत्र में धीरेश तिवारी ने 1857 के नायक कुंवर सिंह पर केंद्रित नाटक सुराज के अंश का एकल मंचन किया। इतिहास केंद्रित व्याख्यान एवं परिसंवाद का संचालन युवा आलोचक अजय कुमार यादव ने किया  जबकि धन्यवाद ज्ञापन युवा अध्येता आशीष कुमार पाण्डेय ने दिया।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य और इतिहास के अध्येताओं ने भाग लिया, जिनमें अनिल कुमार सिंह, वेद प्रकाश सोनी, अदिति शरण, प्रदीप कुमार, सुदर्शन लाल, सुशील कुमार, अशोक यादव, बृजभूषण चौबे, संजय कुमार, मीरा कुमारी, डॉ उज़्मा, देवेंद्र चौबे आदि शामिल थे। 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मीडिया इंडस्ट्री के लिए चुनौती बना AI सर्च, क्या खतरे में है भविष्य?

मान लीजिए आपने गूगल पर सवाल सर्च किया और AI बॉक्स में तुरंत जवाब मिल गया, बिना किसी लिंक पर जाए आपने पढ़ा और पेज बंद कर दिया—यही बदलाव अब पब्लिशर्स के लिए बड़ी चुनौती है।

Last Modified:
Friday, 26 June, 2026
AISearch7845

मान लीजिए आपने गूगल पर सर्च किया- “भारत में महंगाई क्यों बढ़ रही है?” और कुछ ही सेकंड में आपके सामने एक बड़े AI बॉक्स में पूरा जवाब आ गया। न आपको किसी लिंक पर क्लिक करना पड़ा, न किसी वेबसाइट पर जाना पड़ा। आपने बस जवाब पढ़ा और पेज बंद कर दिया। देखने में यह कितना आसान लगता है, लेकिन यही बदलाव अब दुनिया भर के पब्लिशर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

2026 में मीडिया इंडस्ट्री एक ऐसी जंग के दौर में है, जो न कोर्टरूम में पूरी तरह लड़ी जा रही है और न ही संसद की बहसों में—बल्कि सर्च इंजन के रिजल्ट पेज पर ही इसका असली मुकाबला हो रहा है। एक तरफ अखबार, न्यूज पोर्टल, ब्लॉग और कंटेंट क्रिएटर्स हैं, जिन्होंने सालों मेहनत से अपनी जगह बनाई है, और दूसरी तरफ Artificial Intelligence (AI) है, जो उन्हीं के कंटेंट से सीखकर यूजर्स को सीधे, संक्षिप्त जवाब देने लगा है—और कई बार मूल वेबसाइट तक जाने की जरूरत ही खत्म कर देता है।

Zero-Click का जमाना: जब Click ही नहीं हुई तो पैसा कहां से आएगा?

गूगल ने मई 2024 में अमेरिका में AI Overview (AIO) लॉन्च किया था। मई 2025 तक यह फीचर 200 से ज्यादा देशों और 40 भाषाओं तक पहुंच गया। इसमें भारत की हिंदी, तमिल और तेलुगू जैसी भाषाएं भी शामिल हैं। नतीजा? मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका।

प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) ने मार्च 2025 में अमेरिका के 900 लोगों की इंटरनेट इस्तेमाल करने की आदतों को ट्रैक किया और गूगल पर की गई 68 हजार से ज्यादा सर्च का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में सामने आया कि जब AI Overview दिखाई देता है, तो लोग सिर्फ 8 फीसदी मामलों में ही किसी लिंक पर क्लिक करते हैं। जबकि बिना AI Overview के यह आंकड़ा 15 फीसदी था। यानी क्लिक में करीब 47 फीसदी की गिरावट आई। सबसे बड़ी बात यह कि AI Overview में दिए गए स्रोतों पर सिर्फ 1 फीसदी लोगों ने क्लिक किया।

Similarweb के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2024 से मई 2025 के बीच खबरों से जुड़ी सर्च में “जीरो-क्लिक” सर्च का हिस्सा 56 फीसदी से बढ़कर 69 फीसदी हो गया। आसान शब्दों में कहें तो खबरों से जुड़ी 10 में से करीब 7 सर्च ऐसी रहीं, जिनमें लोग किसी भी वेबसाइट पर नहीं पहुंचे।

वहीं, रॉयटर्स इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ जर्नलिज्म (Reuters Institute for the Study of Journalism) की जनवरी 2026 की रिपोर्ट और ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है। दुनिया के 51 देशों के 280 मीडिया लीडर्स का सर्वे किया गया, जिनमें 64 एडिटर-इन-चीफ और 64 चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर्स (CEO) शामिल थे। उनका मानना है कि अगले तीन साल में सर्च इंजन से आने वाला ट्रैफिक औसतन 43 फीसदी तक गिर सकता है।

चार्टबीट ने 2,500 से ज्यादा न्यूज वेबसाइट्स के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि नवंबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच गूगल सर्च से आने वाले विजिटर्स में 33 फीसदी की गिरावट आई। वहीं, गूगल डिस्कवर से आने वाला ट्रैफिक 21 फीसदी घट गया। अमेरिका में यह गिरावट और ज्यादा, यानी 38 फीसदी रही।

छोटे पब्लिशर्स का हाल सबसे बुरा

इस नुकसान का असर सभी पर एक जैसा नहीं पड़ा। बड़े पब्लिशर्स- जैसे The New York Times, जिसके 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स थे, अभी भी किसी तरह टिके हुए हैं। लेकिन छोटे पब्लिशर्स को सबसे बड़ा झटका लगा। 2025 में छोटे पब्लिशर्स का गूगल रेफरल ट्रैफिक करीब 60 फीसदी तक गिर गया, जबकि बड़े पब्लिशर्स में यह गिरावट 22 फीसदी रही।

Business Insider का ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच 55 फीसदी तक गिर गया। हालत ऐसी हुई कि कंपनी को मई 2025 में अपने 21 फीसदी एम्प्लॉयीज की छंटनी करनी पड़ी।

वहीं HuffPost की डेस्कटॉप और मोबाइल साइट्स पर सर्च से आने वाले विजिटर्स की संख्या आधी रह गई। यहां तक कि The New York Times का सर्च ट्रैफिक शेयर भी 2022 के 44 फीसदी से घटकर 2025 में 37 फीसदी पर आ गया।

DMG Media , जो MailOnline और Metro जैसे बड़े ब्रिटिश प्रकाशन चलाती है, ने सितंबर 2025 में बताया कि कुछ खास सर्च में क्लिक-थ्रू रेट 89 फीसदी तक गिर गई।

शिक्षा प्लेटफॉर्म Chegg को तो और बड़ा नुकसान हुआ। जनवरी 2024 से जनवरी 2025 के बीच कंपनी का गैर-सब्सक्राइबर ट्रैफिक 49 फीसदी तक गिर गया। इसके बाद कंपनी ने गूगल के खिलाफ प्रतिस्पर्धा विरोधी कानून (एंटीट्रस्ट) का मुकदमा भी दायर कर दिया।

Google की AI और SEO का बदलता मॉडल

कभी SEO यानी सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन का सीधा मतलब होता था- सही कीवर्ड ढूंढो, अच्छा कंटेंट लिखो, गूगल पर ऊपर जगह बनाओ, ट्रैफिक आएगा और विज्ञापनों से कमाई होगी। यह मॉडल कई सालों तक चलता रहा। लेकिन 2026 तक आते-आते यह मॉडल बुरी तरह बदल चुका है।

Seer Interactive ने जून 2024 से सितंबर 2025 के बीच 42 संस्थाओं की 3,119 जानकारी आधारित सर्च को ट्रैक किया। रिपोर्ट में पाया गया कि जिन सर्च में AI Overview दिखाई देता था, वहां ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 1.76 फीसदी से गिरकर सिर्फ 0.61 फीसदी रह गई। यानी करीब 61 फीसदी की गिरावट। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 19.7 फीसदी से टूटकर 6.34 फीसदी पर आ गई, यानी 68 फीसदी की भारी गिरावट।

Semrush के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की तीसरी तिमाही तक गूगल की करीब 20 से 25 फीसदी सर्च में AI Overview दिखने लगा था। वहीं Gartner का अनुमान है कि 2026 के आखिर तक ऑर्गेनिक सर्च ट्रैफिक का 25 फीसदी हिस्सा AI चैटबॉट्स और वॉइस असिस्टेंट्स की तरफ चला जाएगा।

भारत में भी तेजी से बदलाव दिख रहा है। AI सर्च इंजन Perplexity ने 2024-25 के दौरान 640 फीसदी की बढ़त दर्ज की, खासकर Airtel के साथ साझेदारी के बाद। वहीं ChatGPT अब भारत में प्रोफेशनल्स के बीच दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है।

टियर-2 और टियर-3 शहरों में 58 फीसदी सर्च अब आवाज के जरिए हो रही हैं। लोग हिंदी, तमिल, तेलुगू और बंगाली जैसी भाषाओं में सवाल पूछ रहे हैं।

इस बदलाव ने SEO इंडस्ट्री की दिशा ही बदल दी है। पहले कीवर्ड रैंकिंग सबसे ज्यादा मायने रखती थी, लेकिन अब “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” यानी GEO का दौर शुरू हो गया है। इसका मतलब है कि AI के जवाबों में आपके ब्रैंड या कंटेंट का जिक्र हो, चाहे यूजर आपकी वेबसाइट पर आए या नहीं।

अहरेफ्स की दिसंबर 2025 की स्टडी के मुताबिक, जिन कीवर्ड्स पर AI Overview दिखती है, वहां पहले नंबर पर आने वाली वेबसाइट की क्लिक-थ्रू रेट में 34.5 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई।

Ad Revenue की तस्वीर: पब्लिशर्स का दर्द

पब्लिशर्स का बिजनेस मॉडल काफी सीधा था — ज्यादा ट्रैफिक आएगा, ज्यादा विज्ञापन दिखेंगे और ज्यादा कमाई होगी। लेकिन गूगल के AI सिस्टम ने इस पूरे खेल को बदल दिया है।

अब जब लोग वेबसाइट पर पहुंच ही नहीं रहे, तो विज्ञापन कौन देखेगा? पेज व्यूज कहां से आएंगे? और क्लिक कैसे गिने जाएंगे?

पब्लिशर्स की विज्ञापन कमाई पर दो तरफ से असर पड़ रहा है। पहला, वेबसाइट्स पर ट्रैफिक लगातार घट रहा है। दूसरा, विज्ञापन देने वाली कंपनियां खुद गूगल और Meta जैसे बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तरफ जा रही हैं, क्योंकि वहां ग्राहकों को ज्यादा सटीक तरीके से टारगेट किया जा सकता है।

मार्च 2026 की फिक्की-ईवाई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर 2025 में 9 फीसदी बढ़कर 2.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। लेकिन इस बढ़त का सबसे ज्यादा फायदा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को मिला, पारंपरिक टीवी और न्यूज पब्लिशर्स को नहीं।

डिजिटल विज्ञापन बाजार 26 फीसदी बढ़कर 947 अरब रुपये तक पहुंच गया। यानी ब्रैंड्स का पैसा डिजिटल दुनिया में जा रहा है, लेकिन न्यूज वेबसाइट्स पर नहीं, बल्कि गूगल और Meta जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स के इकोसिस्टम में।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की ‘जर्नलिज्म एंड टेक्नोलॉजी ट्रेंड्स 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल पब्लिशर्स ने कहा कि अब कमाई के लिए सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप उनकी पहली प्राथमिकता बन चुकी है। 76 फीसदी पब्लिशर्स ने इसे सबसे अहम बताया, जबकि डिस्प्ले विज्ञापन को 68 फीसदी ने दूसरी प्राथमिकता माना। 

पब्लिशर्स भी चुप नहीं बैठे हैं। वे इस संकट से निपटने के लिए कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ रहे हैं।

  1. AI Licensing Deals: कंटेंट का दाम वसूलो

    बड़े पब्लिशर्स अब AI कंपनियों के साथ समझौते कर रहे हैं। मतलब- AI कंपनियां उनका कंटेंट इस्तेमाल करें और बदले में उन्हें पैसा दें।

    News Corp ने OpenAI के साथ 5 साल की 25 करोड़ डॉलर से ज्यादा की डील की है। वहीं The New York Times को Amazon की एलेक्सा और रूफस शॉपिंग असिस्टेंट सेवाओं से हर साल करीब 2 से 2.5 करोड़ डॉलर मिल रहे हैं।

    इसके अलावा Associated Press, Time, Fortune, CNN, The Washington Post और Condé Nast जैसी कई बड़ी मीडिया कंपनियां किसी न किसी AI कंपनी के साथ समझौते कर चुकी हैं।

    लेकिन यह मॉडल फिलहाल सिर्फ बड़े खिलाड़ियों के लिए फायदेमंद दिख रहा है। मिड-साइज पब्लिशर्स को 10 लाख से 50 लाख डॉलर तक की डील मिल सकती है, जो उनके ट्रैफिक नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं है। वहीं छोटे पब्लिशर्स और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स के लिए अभी ऐसे समझौतों के दरवाजे लगभग बंद हैं।

    इसी बीच Cloudflare ने “पे पर क्रॉल” नाम का एक मार्केटप्लेस शुरू किया है। इसमें पब्लिशर्स तय कर सकते हैं कि AI कंपनियां उनके कंटेंट को स्कैन करने के बदले कितना पैसा देंगी।

    जून 2025 में Cloudflare के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाली तस्वीर दिखाई। गूगल हर 9 से 14 पेज स्कैन करने पर एक विजिटर वेबसाइट को भेजता है। लेकिन OpenAI करीब 1,700 पेज स्कैन करने के बाद सिर्फ एक विजिटर भेजता है। वहीं Anthropic का अनुपात तो 73,000 पेज पर सिर्फ एक विजिटर का रहा।

    यही वजह है कि दुनिया की 79 फीसदी बड़ी न्यूज वेबसाइट्स ने कम से कम एक AI ट्रेनिंग बॉट को ब्लॉक कर दिया है।

  1. सब्सक्रिप्शंस और डायरेक्ट ऑडियंस: प्लेटफॉ़र्म पर नहीं, खुद पर भरोसा

जो पब्लिशर्स AI की मार से बचे हैं, उनका एक कॉमन सिक्रेट है- उन्होंने गूगल पर निर्भरता कम की।

The New Yorker ने 2025 में रिकॉर्ड कमाई, रिकॉर्ड मुनाफा और रिकॉर्ड सब्सक्राइबर्स हासिल किए। वहीं The New York Times के 2025 के आखिर तक 1.278 करोड़ सब्सक्राइबर्स हो चुके थे। कंपनी का लक्ष्य 2027 तक इसे बढ़ाकर 1.5 करोड़ तक पहुंचाने का है।

Time मैगजीन का अनुमान है कि 2026 में उसकी कुल कमाई का 50 फीसदी हिस्सा इवेंट्स से आएगा, जबकि 2023 में यह हिस्सा 28 फीसदी था। वहीं Bloomberg Media के ग्लोबल फोरम्स से 2025 में स्पॉन्सरशिप कमाई में 30 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 76 फीसदी मीडिया लीडर्स का कहना है कि अब वे चाहते हैं कि उनके कर्मचारी “क्रिएटर्स” की तरह काम करें। यानी सिर्फ खबर लिखना नहीं, बल्कि ऑडियंस के साथ सीधा जुड़ाव बनाना भी जरूरी हो गया है।

इसके अलावा 50 फीसदी पब्लिशर्स अब क्रिएटर पार्टनरशिप्स पर काम कर रहे हैं, ताकि नए दर्शकों तक पहुंच बनाई जा सके।

  1. SEO का नया अवतार: GEO (Generative Engine Optimization)
पहले SEO का मतलब था — गूगल के टॉप 10 रिजल्ट्स में जगह बनाओ। लेकिन अब दौर GEO यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” का है। अब कोशिश यह होती है कि AI के जवाबों में आपकी वेबसाइट या कंटेंट का जिक्र आए।

रिसर्च बताती है कि जिन वेबसाइट्स का नाम AI ओवरव्यू में आता है, उनकी ऑर्गेनिक क्लिक-थ्रू रेट 35 फीसदी ज्यादा रहती है। वहीं पेड क्लिक-थ्रू रेट 91 फीसदी तक बढ़ जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जिस कंटेंट का ढांचा साफ और व्यवस्थित होगा — जैसे सवाल-जवाब फॉर्मेट, छोटे हेडिंग्स और लिस्ट्स — उसे AI ज्यादा आसानी से समझता है और अपने जवाबों में ज्यादा इस्तेमाल करता है।

ग्रोथ मेमो के फरवरी 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, किसी आर्टिकल के शुरुआती 30 फीसदी हिस्से से ही 44 फीसदी AI सिटेशंस आती हैं। यानी अब आर्टिकल की शुरुआती लाइनें पहले से कहीं ज्यादा अहम हो गई हैं।

भारत में यह बदलाव एक बड़े मौके की तरह भी देखा जा रहा है। हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में AI द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कंटेंट की अभी कमी है। गूगल का AI सिस्टम अब हिंदी में भी जवाब देने लगा है, लेकिन हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स अभी GEO के हिसाब से कंटेंट तैयार नहीं कर रहे। ऐसे में जो लोग जल्दी इस दिशा में काम करेंगे, उन्हें सबसे बड़ा फायदा मिल सकता है।

ChatGPT से Traffic: उम्मीद कम, हकीकत और कम

कुछ लोगों को लगता है कि अगर गूगल से ट्रैफिक कम हो रहा है, तो उसकी भरपाई ChatGPT जैसे AI प्लेटफॉर्म्स से हो जाएगी।

सितंबर से नवंबर 2025 के बीच ChatGPT ने पब्लिशर्स को करीब 1.2 अरब आउटगोइंग रेफरल्स भेजे, जो पिछले साल के मुकाबले 52 फीसदी ज्यादा थे। सुनने में यह आंकड़ा अच्छा लगता है, लेकिन असली तस्वीर अलग है।

कंडक्टर की रिसर्च के मुताबिक, सभी AI प्लेटफॉर्म्स मिलकर भी पब्लिशर्स के कुल ट्रैफिक का सिर्फ 1 फीसदी हिस्सा ही भेज पा रहे हैं।

वहीं रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि अकेला गूगल, ChatGPT के मुकाबले 500 गुना ज्यादा रेफरल्स भेजता है। अगर गूगल सर्च और गूगल डिस्कवर को साथ जोड़ दें, तो यह अंतर 1,300 गुना तक पहुंच जाता है।

यानी AI सर्च अभी नया ट्रैफिक स्रोत नहीं बन पाया है। उल्टा, उसने पब्लिशर्स का पुराना ट्रैफिक कम कर दिया है।

भारत के पब्लिशर्स के लिए क्या मायने रखता है?

भारत में internet users की संख्या 2025 के अंत तक 1.03 billion यानी एक अरब तीन करोड़ पार कर गई। यहाँ digital news market 2026 के अंत तक $1 billion revenue generate करने का अनुमान है।

लेकिन AI का असर भारत पर भी उतना ही गहरा है। Perplexity अब India में US से भी बड़ा market बन गया है। ChatGPT फरवरी 2026 तक 900 मिलियन वीकली एक्टिव यूजर्स तक पहुंच गया और भारत में भी 10 करोड़ weekly users। Google AI Overviews 40 भाषाओं में हैं जिनमें हिंदी भी शामिल है।

भारत के हिंदी न्यूज़ पोर्टल्स, regional language sites और छोटे digital पब्लिशर्स — जो Google Search से अपना ज़्यादातर traffic पाते थे — अब एक बड़े transition के मुहाने पर खड़े हैं।

असली सवाल: कंटेंट बनाने वाले को पैसा कौन देगा?

यह सिर्फ बिजनेस मॉडल का मामला नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के अस्तित्व का सवाल बन चुका है।

अगर पब्लिशर्स कमाई नहीं कर पाएंगे, तो वे रिपोर्टर्स नहीं रख पाएंगे। रिपोर्टर्स नहीं होंगे, तो ग्राउंड रिपोर्टिंग कम हो जाएगी। और जब ग्राउंड रिपोर्टिंग ही नहीं होगी, तो एआई के पास इस्तेमाल करने के लिए ओरिजिनल कंटेंट भी नहीं बचेगा। बिना ओरिजिनल कंटेंट के एआई सिस्टम भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।

यानी यह एक खतरनाक चक्र बनता जा रहा है, जो पूरे कंटेंट इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है।

Cloudflare के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Matthew Prince ने जुलाई 2025 में पब्लिशर्स को ऐसे टूल्स दिए, जिनकी मदद से वे एआई बॉट्स को ब्लॉक कर सकते हैं। नए Cloudflare ग्राहकों के लिए यह सुविधा डिफॉल्ट रूप से शुरू की गई।

इसका मतलब है कि अब पब्लिशर्स अपने कंटेंट को एआई कंपनियों के लिए मुफ्त में उपलब्ध नहीं कराना चाहते। वे अपने कंटेंट की अहमियत और कमी दोनों बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन गूगल को पूरी तरह ब्लॉक करना आसान नहीं है, क्योंकि सर्च बाजार में उसकी हिस्सेदारी 90 फीसदी से ज्यादा है। अगर कोई पब्लिशर गूगल को ब्लॉक कर दे, तो उसकी वेबसाइट इंटरनेट पर लगभग गायब जैसी हो सकती है।

आगे का रास्ता

Dotdash Meredith के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर Neil Vogel का कहना है कि AI प्लेटफॉर्म्स को पब्लिशर्स और क्रिएटर्स को उनके कंटेंट का उचित पैसा देना होगा। वहीं Condé Nast के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Roger Lynch ने कहा कि OpenAI के साथ साझेदारी से पारंपरिक सर्च से होने वाले कमाई के नुकसान की कुछ हद तक भरपाई हो रही है।

लेकिन छोटे पब्लिशर्स की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उनके पास न तो OpenAI जैसी बड़ी कंपनियों के साथ डील है और न ही Condé Nast जैसा बड़ा ब्रैंड नाम।

ऐसे में 2026 में पब्लिशर्स के सामने टिके रहने के लिए कुछ ही रास्ते बचे हैं। जैसे — सब्सक्रिप्शन और मेंबरशिप बढ़ाना, अपनी ऑडियंस के साथ सीधा रिश्ता बनाना जिसे कोई प्लेटफॉर्म छीन न सके, न्यूजलेटर्स को कमाई का मजबूत जरिया बनाना, इवेंट्स और वास्तविक अनुभवों पर निवेश करना और जीईओ यानी “जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन” सीखना।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई। पब्लिशर्स अब सबसे ज्यादा निवेश YouTube पर करना चाहते हैं। 2025 में इसका नेट स्कोर 52 था, जो 2026 में बढ़कर 74 हो गया। इससे साफ है कि मीडिया इंडस्ट्री तेजी से वीडियो पत्रकारिता की तरफ बढ़ रही है।

एक युग का अंत, एक नई शुरुआत

जिस क्लिक इकॉनमी पर पिछले 20 साल की डिजिटल पत्रकारिता टिकी हुई थी, वह अब तेजी से बदल रही है। AI ने सामान्य कंटेंट को लगभग एक जैसी चीज बना दिया है। अब साधारण सवालों के जवाब AI खुद देने लगा है।

ऐसे में वही पत्रकारिता टिक पाएगी, जिसमें ओरिजिनल रिपोर्टिंग हो, एक्सक्लूसिव आंकड़े हों, विशेषज्ञों का विश्लेषण हो और ऐसा कंटेंट हो जिसे AI आसानी से कॉपी न कर सके।

2026 की मीडिया दुनिया की सबसे बड़ी चिंता यही है — “इनविजिबल पब्लिशर”। यानी वह पब्लिशर जो कंटेंट तो बना रहा है, जवाब भी उसी के कंटेंट से तैयार हो रहे हैं, लेकिन लोग उसकी वेबसाइट तक पहुंच ही नहीं रहे।

हालांकि इतिहास बताता है कि हर बड़ी तकनीकी क्रांति के समय मीडिया इंडस्ट्री ने खुद को बदला है। जब रेडियो आया तो अखबारों को डर लगा। टीवी आया तो रेडियो को खतरा महसूस हुआ। इंटरनेट आया तो टीवी इंडस्ट्री चिंतित हो गई। लेकिन हर दौर में मीडिया ने खुद को नए तरीके से ढाला।

अब AI सर्च के दौर में भी पब्लिशर्स को खुद को बदलना होगा। सिर्फ गूगल के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने पाठकों और दर्शकों की जरूरतों के हिसाब से।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

भगवंत मान वीडियो विवाद: फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट मामले में आया नया मोड़

अकाल तख्त सचिवालय के मीडिया सलाहकार जसकरण सिंह ने हरियाणा पुलिस द्वारा कथित फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार किए जाने के मामले में दर्ज की गई एफआईआर को बेहद गंभीर बताया है।

Last Modified:
Thursday, 25 June, 2026
Bhagwant Maan

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित आपत्तिजनक वीडियो विवाद में एक नया मोड़ सामने आया है। अकाल तख्त सचिवालय के मीडिया सलाहकार जसकरण सिंह ने हरियाणा पुलिस द्वारा कथित फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार किए जाने के मामले में दर्ज की गई एफआईआर को बेहद गंभीर बताया है। उन्होंने मामले से जुड़े सभी लोगों की भूमिका उजागर करने की मांग की है।

दरअसल, गुरुग्राम पुलिस ने मंगलवार को दो लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने एक व्यक्ति की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उससे वायरल वीडियो के संबंध में एक मनगढ़ंत फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार कराने के लिए संपर्क किया गया था।

बुधवार को प्रतिक्रिया देते हुए जसकरण सिंह ने कहा कि कथित आपत्तिजनक वीडियो के संबंध में फर्जी फॉरेंसिक रिपोर्ट तैयार करने का मामला अत्यंत गंभीर है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब सिख समुदाय और पंजाब के लोगों को गुमराह करने तथा अकाल तख्त को गलत साबित करने की मंशा से किया गया।

उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में शामिल सभी लोगों को बेनकाब किया जाना चाहिए। जसकरण सिंह ने यह भी कहा कि इतिहास गवाह है कि अकाल तख्त को चुनौती देने वालों को हमेशा प्रतिकूल परिणामों का सामना करना पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि सिख विरोधी ताकतों और अकाल तख्त को चुनौती देने वालों को यह याद रखना चाहिए कि सांसारिक मामलों में लोगों को भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन गुरु साहिब और उनके तख्त को नहीं।

उन्होंने कहा कि इस कथित साजिश में शामिल लोगों को अपने अंतर्मन की आवाज सुननी चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि गुरु से विमुख होने वालों को कहीं सहारा नहीं मिलता तथा ऐसे कर्मों का दाग पीढ़ियों तक बना रहता है।

गौरतलब है कि इस कथित वीडियो को लेकर पहले ही राजनीतिक विवाद खड़ा हो चुका है। अकाल तख्त ने 15 जून को मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ आदेश जारी करते हुए उन्हें ‘गुरु दोखी’ और ‘खालसा पंथ विरोधी’ घोषित किया था। यह फैसला अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गर्गज्ज के उस दावे के बाद आया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि दो फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की जांच में वीडियो को “प्रामाणिक” पाया गया है।

हालांकि, भगवंत मान पहले ही इस वीडियो को खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि यह उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से फैलाया गया “झूठा प्रचार” है। वहीं, पंजाब में आम आदमी पार्टी ने भी दावा किया था कि दो फॉरेंसिक जांचों में यह निष्कर्ष सामने आया कि कथित वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति भगवंत मान नहीं है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

NDTV इंडिया से रिटायर हुए प्रियदर्शन, सहयोगियों ने दी शानदार फेयरवेल

दिसंबर 2003 में चैनल से जुड़ने वाले प्रियदर्शन ने यहां 23 साल से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं और संपादकीय टीम के अहम स्तंभ के रूप में पहचान बनाई।

Last Modified:
Wednesday, 24 June, 2026
Priyadarshan Ji

हिंदी पत्रकारिता के प्रतिष्ठित नाम, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और संपादक प्रियदर्शन मंगलवार (23 जून) को ‘एनडीटीवी इंडिया’ (NDTV India) से सेवानिवृत्त हो गए। दिसंबर 2003 में चैनल से जुड़ने वाले प्रियदर्शन ने यहां 23 साल से अधिक समय तक अपनी सेवाएं दीं और संपादकीय टीम के अहम स्तंभ के रूप में पहचान बनाई। उनके रिटायरमेंट पर सहयोगियों ने उन्हें शानदार विदाई दी और पत्रकारिता में उनके योगदान को याद किया।

प्रियदर्शन की पहचान केवल एक टीवी पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर लेखक, स्तंभकार और सांस्कृतिक विश्लेषक के रूप में भी है। साहित्य, सिनेमा, राजनीति, समाज और मीडिया जैसे विषयों पर उनकी गहरी पकड़ है। उनकी लेखन शैली में तथ्यपरकता, भाषा की सादगी और विषय की गहराई का संतुलित मेल देखने को मिलता है।

यह भी पढ़ें: NDTV से प्रियदर्शन के रिटायरमेंट पर भावुक हुए रवीश रंजन शुक्ला, साझा कीं यादें

मूल रूप से झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले प्रियदर्शन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने अखबारों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। पढ़ाई के दिनों में वे कुछ समय तक आकाशवाणी, रांची से कैजुअल आधार पर भी जुड़े रहे।

पत्रकारिता में उनका पेशेवर सफर फ्रीलांस लेखन से शुरू हुआ। वर्ष 1993 से 1996 तक उन्होंने दिल्ली में स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम किया। इसके बाद 1996 में वे हिंदी के प्रतिष्ठित समाचारपत्र ‘जनसत्ता’ से जुड़े, जहां उन्होंने करीब सात वर्षों तक सेवाएं दीं। वर्ष 2003 में उन्होंने एनडीटीवी इंडिया का रुख किया और फिर चैनल के साथ उनकी लंबी और उल्लेखनीय पारी चली।

एनडीटीवी इंडिया में अपने कार्यकाल के दौरान प्रियदर्शन ने संपादकीय संचालन, कंटेंट निर्माण और भाषा की शुद्धता को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। न्यूजरूम में उन्हें ऐसे संपादक के रूप में जाना जाता रहा, जो तथ्यों से समझौता किए बिना संवाद, बहस और नए विचारों को प्रोत्साहित करते थे। कई पीढ़ियों के पत्रकारों ने उनके साथ काम करते हुए भाषा, संपादन और पत्रकारिता की बारीकियां सीखीं।

पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य में भी प्रियदर्शन का योगदान उल्लेखनीय रहा है। अब तक उनकी 20 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि उन्होंने सात पुस्तकों का अनुवाद भी किया है।

NDTV इंडिया से उनके रिटायरमेंट को हिंदी पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण अध्याय के समापन के रूप में देखा जा रहा है। मीडिया जगत के अनेक पत्रकारों, सहयोगियों और शुभचिंतकों ने उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें नई पारी के लिए शुभकामनाएं दी हैं।

एनडीटीवी इंडिया से प्रियदर्शन के फेयरवेल की कुछ तस्वीरें आप यहां देख सकते हैं-

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

हैप्पी बर्थडे के. माधवन: भारतीय टीवी क्रांति के सूत्रधार हैं आप

बदलते दौर में बहुत कम लोग होते हैं जो हर बदलाव के साथ खुद को ढालते हुए लगातार प्रासंगिक बने रहते हैं। के. माधवन ऐसे ही चुनिंदा मीडिया नेताओं में शामिल हैं।

Last Modified:
Friday, 19 June, 2026
KMadhavan451

मीडिया इंडस्ट्री में बदलाव हमेशा तेजी से होते रहे हैं। नई तकनीकें आती हैं, दर्शकों की पसंद बदलती है और बिजनेस मॉडल भी लगातार बदलते रहते हैं। लेकिन ऐसे दौर में बहुत कम लोग होते हैं जो हर बदलाव के साथ खुद को ढालते हुए लगातार प्रासंगिक बने रहते हैं। के. माधवन ऐसे ही चुनिंदा मीडिया नेताओं में शामिल हैं।

उनके जन्मदिन के मौके पर मीडिया जगत एक ऐसे पेशेवर को याद कर रहा है, जिनका प्रभाव सिर्फ कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पिछले दो दशकों में करोड़ों भारतीय दर्शकों तक पहुंचा है, जिन्होंने टीवी मनोरंजन की दुनिया को करीब से देखा और जिया है।

के. माधवन ने अपने करियर की शुरुआत फाइनेंस और बैंकिंग सेक्टर से की थी। इसके बाद 1999 में उन्होंने एशियानेट कम्युनिकेशंस का रुख किया। यहां उन्होंने क्षेत्रीय प्रसारण नेटवर्क को दक्षिण भारत के सबसे प्रभावशाली मीडिया नेटवर्क्स में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब स्टार ने एशियानेट का अधिग्रहण किया, तब माधवन ने आसानी से स्टार नेटवर्क के बड़े इकोसिस्टम में खुद को स्थापित किया। रीजनल मार्केट्स की उनकी गहरी समझ आगे चलकर स्टार नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनी।

वर्षों के दौरान वह स्टार नेटवर्क के विस्तार की रणनीति तैयार करने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। उन्होंने यह साबित किया कि क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय कहानियों पर आधारित कंटेंट भी राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता हासिल कर सकता है। स्थानीय सोच और वैश्विक मीडिया रणनीतियों के संतुलन ने भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री के विकास का नया मॉडल तैयार किया।

बाद में डिज्नी स्टार के कंट्री मैनेजर और प्रेसिडेंट के रूप में उन्होंने देश के सबसे बड़े मीडिया संगठनों में से एक का नेतृत्व किया। यह वह दौर था जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का तेजी से विस्तार हो रहा था, प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी और दर्शकों की आदतों में बड़ा बदलाव आ रहा था।

मनोरंजन, खेल प्रसारण, स्ट्रीमिंग सेवाओं और स्टूडियो कारोबार जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उनके नेतृत्व ने यह दिखाया कि कंटेंट, तकनीक और वितरण व्यवस्था को साथ-साथ विकसित करना ही भविष्य की सफलता की कुंजी है।

कॉर्पोरेट नेतृत्व के अलावा भी उनकी भूमिका काफी अहम रही है। इंडस्ट्री से जुड़े लोग उन्हें ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो सुर्खियां बटोरने के बजाय टीम को साथ लेकर चलने और संस्थानों को मजबूत बनाने में विश्वास रखते हैं। यही वजह है कि प्रतिस्पर्धी कंपनियों, कारोबारी साझेदारों और नीति निर्माताओं के बीच भी उन्हें समान रूप से सम्मान मिलता है।

आज जब टेलीविजन, स्ट्रीमिंग और डिजिटल मीडिया के बीच की सीमाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं, तब के. माधवन का करियर इस बात का उदाहरण बनकर सामने आता है कि स्थायी नेतृत्व केवल बदलावों के अनुसार खुद को ढालने से नहीं, बल्कि आने वाले बदलावों को पहले से पहचानने से बनता है।

उनकी प्रोफेशनल जर्नी भारतीय प्रसारण इंडस्ट्री के विकास की कहानी भी है। सैटेलाइट टेलीविजन से लेकर कनेक्टेड स्क्रीन तक और क्षेत्रीय नेटवर्क्स से लेकर वैश्विक मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक, उन्होंने इस बदलाव को न सिर्फ देखा बल्कि उसे दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एक और नए वर्ष की शुरुआत के साथ के. माधवन की विरासत मीडिया जगत की नई पीढ़ी को प्रेरित करती रहेगी। उनका करियर यह बताता है कि दूरदृष्टि, अनुशासन और शांत लेकिन प्रभावी नेतृत्व किसी भी इंडस्ट्री की दिशा बदल सकता है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

22 भाषाओं में तैयार होंगी 22 हजार से ज्यादा किताबें, मातृभाषा में पढ़ाई को मिलेगा बढ़ावा

इस पहल का उद्देश्य छात्रों तक ज्ञान को उनकी अपनी भाषा में पहुंचाना है, ताकि वे पढ़ाई को बेहतर ढंग से समझ सकें और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहकर सीख सकें।

Last Modified:
Friday, 19 June, 2026
Books

देश में मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। भारतीय भाषा पुस्तक योजना (Bharatiya Bhasha Pustak Yojana) और अस्मिता (ASMITA) पहल के तहत 22 भारतीय भाषाओं में 22,000 से अधिक पाठ्यपुस्तकों का विकास किया जा रहा है।

इस पहल का उद्देश्य छात्रों तक ज्ञान को उनकी अपनी भाषा में पहुंचाना है, ताकि वे पढ़ाई को बेहतर ढंग से समझ सकें और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहकर सीख सकें। सरकार का मानना है कि जब शिक्षा मातृभाषा या परिचित भाषा में उपलब्ध होती है, तो छात्रों के लिए विषयों को समझना आसान हो जाता है और सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है।

इस योजना के जरिए न केवल शिक्षा को अधिक सुलभ बनाया जा रहा है, बल्कि भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन को भी नई ताकत मिल रही है। इससे देश के विभिन्न हिस्सों के विद्यार्थियों को अपनी भाषा में गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध हो सकेगी।

सरकार का कहना है कि यह पहल शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिससे ज्ञान की पहुंच बढ़ेगी और अधिक से अधिक छात्र अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के साथ आगे बढ़ सकेंगे।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

INjoy Entertainment के फाउंडर और चीफ कंटेंट ऑफिसर गौतम तलवार का निधन

गौतम तलवार की स्मृति में 19 जून को शाम 4:30 बजे मुंबई के सांताक्रूज वेस्ट स्थित आर्य समाज मंदिर में प्रार्थना सभा आयोजित की जाएगी।

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
Gautam Talwar

INjoy Entertainment के फाउंडर और चीफ कंटेंट ऑफिसर (CCO) गौतम तलवार का निधन हो गया है। उनके निधन की खबर से एंटरटेनमेंट और मीडिया जगत में शोक की लहर है।

गौतम तलवार लगभग सात वर्षों तक MX Player में चीफ कंटेंट ऑफिसर के पद पर रहे। अपने लंबे और सफल करियर के दौरान उन्होंने विज्ञापन और कंटेंट इंडस्ट्री दोनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत विज्ञापन जगत से की थी और Lowe Lintas India, Grey Group तथा Rediffusion Y&R जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों में काम किया। उन्होंने कंटेंट क्रिएशन और एंटरटेनमेंट क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

गौतम तलवार को ‘Times of Music’ के लिए Filmfare पुरस्कार भी मिला था। वे ‘Ashram’, ‘Queen’, ‘High’, ‘Samantar’ और ‘Dharavi Bank’ जैसे लोकप्रिय शोज के एग्जिक्यूटिव प्रोड्यूसर रहे और इनके रचनात्मक नेतृत्व में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इसके अलावा, उन्होंने Kaleidoscope Entertainment में फीचर फिल्मों के एग्जिक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में भी काम किया था। परिवार की ओर से शेयर की गई जानकारी के मुताबिक, गौतम तलवार की स्मृति में 19 जून को शाम 4:30 बजे मुंबई के सांताक्रूज वेस्ट स्थित आर्य समाज मंदिर में प्रार्थना सभा आयोजित की जाएगी। 

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

Zee5 की बड़ी पहल: फुटबॉल से होने वाली आय का 15% भारतीय प्रतिभाओं के विकास पर होगा खर्च

इस बारे में ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ के CEO पुनीत गोयनका ने कहा कि भारत में फुटबॉल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें सही अवसर और मंच उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।

Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
Zee Media....

एंटरटेनमेंट और मीडिया क्षेत्र की प्रमुख कंपनी जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (Z) ने भारत में फुटबॉल के विकास को नई गति देने के लिए खास पहल की घोषणा की है। कंपनी ने कहा है कि अब Zee5 पर फुटबॉल देखने वाला हर सब्सक्राइबर देश के कोने-कोने में मौजूद युवा फुटबॉल प्रतिभाओं की पहचान, प्रशिक्षण और उनके विकास में योगदान देगा।

कंपनी ने घोषणा की है कि Zee5 की फुटबॉल से संबंधित सब्सक्रिप्शन आय का 15 प्रतिशत हिस्सा भारतीय फुटबॉल के विकास के लिए समर्पित किया जाएगा। इस पहल के जरिए Zee5 के दर्शकों को भी देश में एक मजबूत और समावेशी फुटबॉल इकोसिस्टम तैयार करने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने का अवसर मिलेगा।

जी एंटरटेनमेंट का कहना है कि पिछले तीन दशकों में कंपनी ने अपने कंटेंट और विभिन्न सामाजिक पहलों के माध्यम से लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालने का प्रयास किया है। एक ‘एकेडमी ऑफ टैलेंट’ के रूप में कंपनी ने देशभर से प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ाने का काम किया है। अब इसी सोच को वह खेल जगत, विशेष रूप से फुटबॉल में और अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाना चाहती है।

कंपनी का मानना है कि भारत में फुटबॉल प्रतिभाओं की बड़ी संख्या मौजूद है, जिसे सही अवसर और संसाधन उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है। इसी उद्देश्य के तहत Zee5 के माध्यम से जुटाए जाने वाले संसाधनों का उपयोग युवा खिलाड़ियों की पहचान और प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा।

कंपनी की FIFA के साथ वर्ष 2034 तक की साझेदारी भी इस दिशा में उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। जी एंटरटेनमेंट का मानना है कि वैश्विक स्तर पर प्रतिभा विकास, लीग इकोसिस्टम निर्माण और खिलाड़ियों व कोचों के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की FIFA की पहलें भारत में प्रतिस्पर्धी फुटबॉल ढांचा विकसित करने में मददगार साबित होंगी।

कंपनी के अनुसार, Zee5 सब्सक्राइबर्स के सामूहिक योगदान के आधार पर भविष्य की प्रतिभाओं के लिए एक मजबूत पाइपलाइन तैयार की जाएगी। इसके तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे और शहर, जिला, राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार योग्य लीग फॉर्मेट विकसित किए जाएंगे। साथ ही, फुटबॉल के क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को भी इस अभियान से जोड़ा जाएगा, ताकि खिलाड़ियों के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया जा सके।

इसके अलावा, कंपनी वैश्विक फुटबॉल महासंघों तथा राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय खेल संगठनों के साथ सहयोग कर प्रतिभा पहचान और प्रशिक्षण के लिए ठोस कदम तय करेगी। इसका उद्देश्य युवाओं के बीच फुटबॉल को एक संभावनाशील खेल करियर के रूप में स्थापित करना भी है।

इस पहल के तहत शहरों, जिलों और राज्यों के स्तर पर युवा खिलाड़ियों को अवसर उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। जमीनी स्तर पर लीग और विकास कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे, जिससे शुरुआती चरण से ही प्रतिभाओं को निखारा जा सके और वे आगे चलकर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।

कंपनी का लक्ष्य एक ऐसा समावेशी और मजबूत फुटबॉल इकोसिस्टम तैयार करना है, जो वर्ष 2034 तक भारत की पुरुष और महिला फुटबॉल टीमों को विभिन्न आयु वर्गों में FIFA World Cup में भागीदारी के योग्य बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सके।

इस पहल के बारे में ‘जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड’ के चीफ एग्जिक्यूटिव ऑफिसर पुनीत गोयनका ने कहा कि भारत में फुटबॉल प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें सही अवसर और मंच उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कंपनी एक जिम्मेदार इंडस्ट्री पार्टनर और भारत में फुटबॉल के प्रमुख प्लेटफॉर्म के रूप में खेल के समग्र विकास के लिए अनुकूल और टिकाऊ वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उनके अनुसार, यह पहल फुटबॉल दर्शकों को देश के उन युवा खिलाड़ियों के सपनों में निवेश करने का अवसर देगी, जो वैश्विक मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं।

कंपनी ने कहा कि यह पहल युवाओं को सशक्त बनाने की भावना से प्रेरित है और स्वामी विवेकानंद के उस संदेश से भी प्रेरणा लेती है, जिसमें युवाओं को फुटबॉल के माध्यम से शक्ति, अनुशासन, आत्मविश्वास और कर्मशीलता विकसित करने का आह्वान किया गया था।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

Truecaller Ads ने लॉन्च किया AI आधारित ‘Call-to-Cart’, अब कॉल के दौरान ही हो सकेगी खरीदारी

Truecaller Ads ने आज वैश्विक स्तर पर अपने नए AI-संचालित कॉमर्स समाधान ‘Call-to-Cart’ की शुरुआत की है।

Last Modified:
Wednesday, 17 June, 2026
TrueCaller87451

Truecaller Ads ने आज वैश्विक स्तर पर अपने नए AI-संचालित कॉमर्स समाधान ‘Call-to-Cart’ की शुरुआत की है। कंपनी का दावा है कि यह नया प्लेटफॉर्म रोजमर्रा के कम्युनिकेशन मोमेंट्स को सीधे खरीदारी के अनुभव में बदल देगा और उपभोक्ताओं के लिए प्रोडक्ट खोजने से लेकर खरीदने तक की प्रक्रिया को पहले से कहीं ज्यादा आसान बनाएगा।

कंपनी के अनुसार, किसी विज्ञापन को देखने और खरीदारी पूरी करने के बीच जितने अधिक चरण होते हैं, उतनी ही संभावना बढ़ जाती है कि उपभोक्ता बीच में ही प्रक्रिया छोड़ दे। मौजूदा समय में अधिकांश मोबाइल कॉमर्स अनुभवों में ग्राहकों को कई स्क्रीन के बीच जाना पड़ता है, प्रोडक्ट सर्च करना पड़ता है और अलग-अलग ऐप्स के बीच स्विच करना पड़ता है। यही वजह है कि खरीदारी की प्रक्रिया अक्सर लंबी और जटिल हो जाती है।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए Truecaller ने Call-to-Cart विकसित किया है। यह समाधान Truecaller की उस विशेष स्थिति का लाभ उठाता है, जहां वह दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म्स में से एक है। यह फीचर ब्रांड्स को उन दो महत्वपूर्ण क्षणों में ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर देता है, जब कोई व्यक्ति कॉल प्राप्त करता है या जब कॉल समाप्त होती है। इन हाई-अटेंशन मोमेंट्स को AI आधारित टार्गेटिंग और कॉमर्स इंटीग्रेशन के साथ जोड़कर कंपनी खरीदारी की प्रक्रिया को सिर्फ दो चरणों तक सीमित करने का दावा कर रही है।

Truecaller Ads के वाइस प्रेसिडेंट और ग्लोबल हेड हेमंत अरोड़ा ने कहा कि आज लाखों खरीदारी संबंधी फैसले पारंपरिक शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स के बाहर शुरू होते हैं। उनके मुताबिक कम्युनिकेशन मोमेंट्स भी अब कॉमर्स के लिए एक प्रभावी माध्यम बन चुके हैं और Call-to-Cart इसी अवसर का लाभ उठाने के लिए तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि यह उत्पाद खासतौर पर FMCG, D2C ब्यूटी, फार्मा, फिनटेक और मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों के विज्ञापनदाताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है, जहां सही समय और सही संदर्भ उपभोक्ता के खरीदारी निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कंपनी का कहना है कि Call-to-Cart की सफलता के पीछे उसकी स्वामित्व वाली तकनीक काम करती है। Truecaller Ads के adVantage प्लेटफॉर्म के इंजीनियरिंग डायरेक्टर लिनिकर सेइक्सास ने बताया कि इस समाधान के पीछे adVantage नाम का इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है, जिसे कंपनी ने खुद विकसित किया है। यह प्लेटफॉर्म एडवांस्ड रिकमेंडेशन इंजन, AI आधारित पर्सनलाइजेशन और फर्स्ट-पार्टी डेटा सिग्नल्स का उपयोग करके ग्राहकों को सही समय पर सही ऑफर दिखाने में मदद करता है। इससे उपभोक्ताओं को अधिक सहज अनुभव मिलता है और विज्ञापनदाताओं को बेहतर व्यावसायिक परिणाम हासिल करने में मदद मिलती है।

Call-to-Cart को Truecaller Ads का पहला ऐसा समाधान बताया जा रहा है जिसे वैश्विक स्तर पर सीधे विज्ञापनदाताओं के लिए लॉन्च किया गया है। Truecaller के 150 से अधिक देशों में फैले यूजर बेस और दुनिया भर में 50 करोड़ से ज्यादा सक्रिय उपयोगकर्ताओं के कारण ब्रांड्स को बड़े पैमाने पर ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। कंपनी का कहना है कि उसके प्लेटफॉर्म पर हर दिन अरबों विज्ञापन अवसर उपलब्ध होते हैं, जिससे कम्युनिकेशन-आधारित मार्केटिंग को नई दिशा मिल सकती है।

कंपनी ने यह भी बताया कि Call-to-Cart को काफी हद तक कस्टमाइज किया जा सकता है। शुरुआती चरण में Truecaller ने विभिन्न प्रमुख बाजारों के चुनिंदा ‘ऑलवेज-ऑन’ डायरेक्ट विज्ञापनदाताओं को इस प्रोग्राम का हिस्सा बनने की अनुमति दी है। इन साझेदारों को विशेष ऑनबोर्डिंग सहायता, कस्टम इंटीग्रेशन, adVantage प्रोग्राम तक सीधी पहुंच और प्लेटफॉर्म की विभिन्न कस्टमाइजेशन सुविधाओं का प्राथमिक लाभ मिलेगा।

Truecaller का मानना है कि यह नया समाधान डिजिटल विज्ञापन और मोबाइल कॉमर्स के बीच की दूरी को कम करेगा और ब्रांड्स को उपभोक्ताओं तक अधिक प्रभावी तरीके से पहुंचने में मदद करेगा। कंपनी को उम्मीद है कि AI और कम्युनिकेशन-आधारित कॉमर्स का यह मॉडल आने वाले समय में डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स उद्योग के लिए एक नया मानक स्थापित कर सकता है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

6 साल की देरी पर हाई कोर्ट सख्त, महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज केस व चार्जशीट रद्द

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी आपराधिक मामले की जांच और चार्जशीट दाखिल करने में बिना उचित कारण के कई वर्षों की देरी करना आरोपी के मौलिक अधिकारों पर असर डालता है।

Last Modified:
Wednesday, 17 June, 2026
ChattisgarhHighCourt8745

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी आपराधिक मामले की जांच और चार्जशीट दाखिल करने में बिना उचित कारण के कई वर्षों की देरी करना आरोपी के मौलिक अधिकारों पर असर डालता है। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति व्यक्ति के त्वरित न्याय पाने के अधिकार को प्रभावित करती है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। इसी आधार पर कोर्ट ने एक महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले और उससे जुड़ी चार्जशीट को निरस्त कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ के समक्ष यह मामला सुनवाई के लिए आया था। याचिका दायर करने वाली श्रिया पांडेय वर्ष 2018 में एक समाचार चैनल में रिपोर्टर के रूप में कार्यरत थीं। उसी दौरान प्रदेश में पुलिसकर्मियों का आंदोलन चल रहा था और एक मामले में आंदोलनकारी पुलिसकर्मी की पत्नी को महिला थाने में रखे जाने की जानकारी सामने आई थी।

बताया गया कि इस सूचना की पुष्टि करने और मामले की रिपोर्टिंग के उद्देश्य से श्रिया पांडेय अपनी टीम के साथ देर रात महिला थाने पहुंची थीं। वहां उन्होंने पुलिस अधिकारियों से जानकारी लेने का प्रयास किया। बाद में इस घटना को लेकर विवाद पैदा हुआ और पुलिस की ओर से उनके खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने, मारपीट करने तथा अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया गया।

पत्रकार ने पुलिस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि घटना वर्ष 2018 की थी, जबकि मामले में चार्जशीट नवंबर 2024 में दाखिल की गई। कोर्ट ने इस लंबे अंतराल को गंभीरता से लिया और पूछा कि जांच में इतनी देरी क्यों हुई। हालांकि, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई संतोषजनक कारण सामने नहीं आया जो छह वर्ष से अधिक की देरी को उचित ठहरा सके।

मामले के दस्तावेजों और जांच रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष मुख्य रूप से पुलिसकर्मियों और उनसे जुड़े गवाहों के बयानों पर आधारित था। घटनास्थल पर मौजूद किसी स्वतंत्र गवाह का समर्थन रिकॉर्ड में नहीं था। इसके अलावा उपलब्ध बयानों में भी कई महत्वपूर्ण विसंगतियां दिखाई दीं।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पत्रकार के खिलाफ किसी अपराध की स्पष्ट और ठोस पुष्टि नहीं करती। ऐसे में मामले को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का उचित उपयोग नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि इतने लंबे समय तक मामले को लंबित रखना संबंधित व्यक्ति के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने महिला पत्रकार के खिलाफ दर्ज एफआईआर और बाद में दाखिल की गई चार्जशीट को रद्द कर दिया। कोर्ट के इस फैसले को त्वरित न्याय और निष्पक्ष जांच के सिद्धांतों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

क्या AI है क्रिएटिविटी का भविष्य? MIFF में फिल्मकारों और विशेषज्ञों ने रखी अपनी राय

19वें मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (MIFF) के दौरान इंडियन डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IDPA) ने “क्या AI है क्रिएटिविटी का भविष्य?” विषय पर एक ओपन फोरम का आयोजन किया।

Last Modified:
Wednesday, 17 June, 2026
MIFF-AI512

19वें मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (MIFF) के दौरान इंडियन डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (IDPA) ने “Is AI the Future of Creativity?” (क्या AI है क्रिएटिविटी का भविष्य?) विषय पर एक ओपन फोरम का आयोजन किया। इस चर्चा में Firefly Creative Studio Pvt. Ltd. के को-फाउंडर सनथ पी.सी., SMPTE के चेयरमैन उज्ज्वल निरगुडकर, वकील हेतल देसाई सोलिया और Fanboy Pictures के निदेशक एवं फिल्मकार सुबोध मेनन शामिल हुए। सभी वक्ताओं ने फिल्म निर्माण और कंटेंट क्रिएशन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े अवसरों, चुनौतियों और इसके प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की।

चर्चा के दौरान रचनात्मक दुनिया में AI की बढ़ती भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया। पैनलिस्ट्स ने बताया कि AI किस तरह कहानी कहने की कला, प्रोडक्शन प्रक्रियाओं और फिल्म इंडस्ट्री के भविष्य को प्रभावित कर रहा है। हालांकि सभी ने AI की परिवर्तनकारी क्षमता को स्वीकार किया, लेकिन इस बात पर भी जोर दिया कि कहानी कहने की कला में मानवीय रचनात्मकता और भावनात्मक समझ की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

SMPTE के चेयरमैन उज्ज्वल निरगुडकर ने सिनेमा में तकनीकी विकास पर बात करते हुए AI को फिल्म निर्माण का अगला स्वाभाविक चरण बताया। उन्होंने कहा कि पोस्ट-प्रोडक्शन के क्षेत्र में AI की भूमिका लगातार बढ़ रही है। साउंड को बेहतर बनाने, कलर करेक्शन, विजुअल क्वालिटी सुधारने और पुरानी फिल्मों के रेस्टोरेशन जैसे कई कामों में AI का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि AI से जुड़े टूल्स बहुत तेजी से विकसित हो रहे हैं, लेकिन पूरे उद्योग में इनके मानकीकरण और व्यापक उपयोग में अभी कुछ समय लगेगा।

Fanboy Pictures के निदेशक और फिल्मकार सुबोध मेनन ने कहा कि AI कंटेंट तैयार कर सकता है और नए विचारों पर सोचने में मदद कर सकता है, लेकिन कहानी कहने की असली ताकत इंसानों के पास ही रहेगी। उन्होंने AI को आइडिया जनरेशन और आइडिया वैलिडेशन का एक उपयोगी माध्यम बताया। उनके अनुसार, जैसे-जैसे यह तकनीक आम होती जाएगी, फिल्मकारों के लिए AI को समझना और उसका सही इस्तेमाल करना बेहद जरूरी हो जाएगा।

Firefly Creative Studio Pvt. Ltd. के को-फाउंडर सनथ पी.सी. ने कहा कि AI कहानी कहने की प्रक्रिया को और बेहतर बना सकता है। इसके जरिए तस्वीरों की गुणवत्ता, ध्वनि और दर्शकों के अनुभव में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने मौजूदा दौर को प्रयोगों का समय बताते हुए कहा कि रचनाकारों को AI की संभावनाओं को खुलकर तलाशना चाहिए, लेकिन पूरी तरह इस पर निर्भर होने के बजाय इसे एक सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए।

AI से तैयार किए गए कंटेंट से जुड़े कानूनी पहलुओं पर बात करते हुए वकील हेतल देसाई सोलिया ने लाइसेंस प्राप्त डेटा के उपयोग और रचनात्मक कार्यों में पर्याप्त मानवीय भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कॉपीराइट का स्वामित्व मानव रचनाकारों के पास ही रहता है। इसलिए फिल्मकारों को AI का उपयोग अपने मूल कंटेंट को बेहतर बनाने के लिए करना चाहिए, न कि उसे पूरी तरह से बदलने के लिए।

चर्चा के दौरान सभी पैनलिस्ट इस बात पर सहमत नजर आए कि AI को मानव रचनात्मकता का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सहयोगी माना जाना चाहिए। उनका मानना था कि AI प्रोडक्शन प्रक्रियाओं को आसान बना सकता है, कार्यक्षमता बढ़ा सकता है और रचनात्मक संभावनाओं का दायरा विस्तृत कर सकता है, लेकिन कहानी कहने की आत्मा आज भी इंसानी कल्पना, भावनाओं और कलात्मक दृष्टि में ही बसती है।

इस सत्र के बाद दर्शकों के साथ भी रोचक संवाद हुआ। प्रतिभागियों ने AI को अपनाने, उससे जुड़े नैतिक सवालों, कॉपीराइट सुरक्षा और रचनात्मक पेशों के भविष्य जैसे विषयों पर कई सवाल पूछे। चर्चा के अंत में सभी विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि फिल्मकारों को तकनीकी बदलावों को अपनाना चाहिए, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कहानी कहने की प्रक्रिया के केंद्र में हमेशा मानवीय रचनात्मकता ही बनी रहे।

न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए