कैसे अरबों डॉलर का मार्केटिंग महाकुंभ बन गया फुटबॉल का सबसे बड़ा मंच- FIFA वर्ल्ड कप 2026

48 टीमें, 104 मैच, 6 अरब दर्शक और विज्ञापनदाताओं के लिए अनगिनत मौके- जानिए क्यों FIFA World Cup 2026 अब सिर्फ खेल नहीं, बल्कि इतिहास का सबसे बड़ा मीडिया और मार्केटिंग इवेंट बन चुका है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 18 June, 2026
Last Modified:
Thursday, 18 June, 2026
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48 टीमें, 104 मैच, करीब 6 अरब दर्शक और विज्ञापनदाताओं के लिए बेशुमार अवसर- FIFA वर्ल्ड कप 2026 अब सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा मीडिया और मार्केटिंग मंच बन चुका है।

मैदान पर फुटबॉल, लेकिन असली मुकाबला अरबों डॉलर के कारोबार का

11 जून 2026 को मेक्सिको सिटी के एज्टेका स्टेडियम में FIFA वर्ल्ड कप 2026 की शुरुआत हुई। उद्घाटन मैच को दुनिया भर में करीब 1.2 अरब लोगों ने देखा। तुलना करें तो अमेरिकी Super Bowl को लगभग 12.56 करोड़ दर्शक मिले थे, यानी वर्ल्ड कप के पहले मैच की पहुंच उससे लगभग 10 गुना ज्यादा रही। यही वजह है कि यह टूर्नामेंट सिर्फ खिलाड़ियों और टीमों का मुकाबला नहीं, बल्कि ब्रैंड्स, मीडिया कंपनियों और विज्ञापन एजेंसियों के लिए भी सबसे बड़ा वैश्विक मंच बन गया है।

इस बार का वर्ल्ड कप कई मायनों में रिकॉर्ड तोड़ है। इसमें 48 टीमें हिस्सा ले रही हैं, कुल 104 मैच खेले जाएंगे, मुकाबले 16 स्टेडियमों में होंगे और अमेरिका, कनाडा व मेक्सिको मिलकर इसकी मेजबानी कर रहे हैं। 39 दिनों तक चलने वाला यह टूर्नामेंट खेल जगत का सबसे बड़ा आयोजन है। हालांकि इसकी सबसे बड़ी ताकत सिर्फ फुटबॉल नहीं, बल्कि इसके साथ जुड़ा विशाल मीडिया, प्रसारण और विज्ञापन कारोबार है, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े कमर्शियल इवेंट्स में शामिल करता है।

FIFA का $13 अरब का कमर्शियल साम्राज्य

FIFA ने शुरुआत में 2023-2026 चक्र के लिए 11 अरब डॉलर का बजट तय किया था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर लगभग 13 अरब डॉलर कर दिया गया। यह आंकड़ा 2019-2022 के कतर वर्ल्ड कप चक्र के 7.57 अरब डॉलर के मुकाबले करीब 72% अधिक है। 

बजट में हुई करीब 2 अरब डॉलर की बढ़ोतरी का मुख्य कारण 2025 FIFA Club वर्ल्ड कप को शामिल किया जाना था, जो शुरुआती योजना का हिस्सा नहीं था। FIFA का संशोधित लक्ष्य अब 2023-2026 कमर्शियल साइकल से 13 अरब डॉलर की आय हासिल करना है। इसमें से लगभग 8.9 अरब डॉलर की कमाई अकेले FIFA वर्ल्ड कप 2026 से होने का अनुमान है। यानी FIFA के कुल चार वर्षीय राजस्व का लगभग 68% हिस्सा सिर्फ 2026 वर्ल्ड कप से आने की उम्मीद है, जो इस टूर्नामेंट की विशाल व्यावसायिक ताकत को दर्शाता है।

Ampere Analysis के मुताबिक, मीडिया राइट्स से $3.8 अरब की आमदनी होगी, जो 2022 कतर टूर्नामेंट से 22% अधिक है। स्पॉन्सरशिप रेवेन्यू Ampere के अनुसार, $2.4 अरब तक पहुंचने का अनुमान है, 2022 के मुकाबले 37% की बढ़त। FIFA के आधिकारिक बजट के अनुसार ब्रॉडकास्टिंग राइट्स पहली बार $4.2 अरब का आंकड़ा पार कर सकते हैं।

टिकट और हॉस्पिटैलिटी से भी रिकॉर्ड कमाई होगी। कतर 2022 में मैचडे रेवेन्यू (टिकट + हॉस्पिटैलिटी) करीब $95 करोड़ ($950 मिलियन) था, जो 2026 में $3 अरब तक पहुंच सकता है, यानी 216% की वृद्धि! सभी 16 स्पॉन्सरशिप स्लॉट टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही बिक चुके थे, FIFA के इतिहास में पहली बार। FIFA अपने $13 अरब के बजट टारगेट की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें 2025 के अंत तक 93% अनुबंधित हो चुका था।

ब्रैंड्स की $10.5 अरब की विज्ञापन जंग

WARC Media के अनुसार, 2026 की दूसरी तिमाही में वर्ल्ड कप की वजह से वैश्विक विज्ञापन खर्च में $10.5 अरब का अतिरिक्त इजाफा होने का अनुमान है। इस टूर्नामेंट ने ब्रैंड वॉर्स का एक नया युग खोल दिया है।

Adidas बनाम Nike: Adidas ने 'Backyard Legends' कैंपेन पर करीब £50 मिलियन (~$63 मिलियन) का दांव लगाया है, जिसमें Timothée Chalamet, Lionel Messi, Jude Bellingham, Lamine Yamal, Bad Bunny और AI-डी-एज्ड David Beckham, Zinedine Zidane, Alessandro Del Piero जैसे सितारे हैं। टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही Adidas ने वर्ल्ड कप प्रोडक्ट्स से €250 मिलियन ($292 मिलियन) की बिक्री कर ली। Nike ने 'Winning Isn't for Everyone' और 'Toma El Juego' स्ट्रीट-कल्चर कैंपेन के जरिए अलग रास्ता चुना।

Coca-Cola बनाम Pepsi: Coca-Cola 1950 से हर वर्ल्ड कप में विज्ञापन दे रही है। इस बार उसने Van Halen के 'Jump' गाने का नया वर्जन J Balvin और Travis Barker के साथ रिलीज किया। हालांकि कंपनी के AI-जनरेटेड 'Uncanned Emotions' विज्ञापन को दर्शकों की आलोचना झेलनी पड़ी। Pepsi ने David Beckham के साथ 'Football Nation' कैंपेन बनाया जिसमें Generative AI का इस्तेमाल किया गया।

LEGO का विज्ञापन, जिसमें Messi, Ronaldo, Mbappé और Vinícius Jr. एक साथ LEGO वर्ल्ड कप ट्रॉफी बनाते दिखे, 24 घंटे में 31.4 करोड़ व्यूज हासिल कर चुका था। DoorDash ने अपना पहला ग्लोबल कैंपेन 'Deliver Us To Fútbol' लॉन्च किया। Bank of America, Verizon और Frito-Lay ने भी नई स्पॉन्सरशिप ली।

OTT बनाम टीवी: व्यूअरशिप का नया युद्ध

2022 कतर वर्ल्ड कप में 5 अरब लोग किसी न किसी रूप में जुड़े थे, Argentina-France फाइनल को 1.42 अरब दर्शकों ने देखा (हालांकि FIFA आधिकारिक संचार में इस संख्या को प्रायः 1.5 अरब दर्शकों के रूप में दर्शाता है), जो किसी एकल स्पोर्टिंग इवेंट का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। 2026 में FIFA का लक्ष्य 6 अरब तक पहुंचना है।

अमेरिका में TV राइट्स की वैल्यू 2022 के मुकाबले 94% बढ़ी है। यूरोप में फ्री-टू-एयर मॉडल हावी है, UK में BBC और ITV, जर्मनी में ARD/ZDF, फ्रांस में M6 सभी 104 मैच मुफ्त दिखा रहे हैं। अमेरिकी कंपनियां अब FIFA की कुल स्पॉन्सरशिप आय का 52% योगदान दे रही हैं, जो 2022 में 36% थी।

डिजिटल का दबदबा बढ़ रहा है। 2022 में FIFA के सोशल मीडिया चैनल्स पर 81.1 करोड़ एंगेजमेंट हुए थे, 2018 से 448% अधिक। 3.6 अरब वीडियो व्यूज देखे गए। 2026 में यह आंकड़ा और बड़ा होगा। FIFA ने अपना खुद का प्लेटफॉर्म FIFA+ भी लॉन्च किया है जहां सभी 104 मैच मुफ्त स्ट्रीम होंगे।

भारत: बिना टीम के भी बड़ा बाजार

भारत कभी वर्ल्ड कप नहीं खेला, फिर भी Ipsos के 2026 सर्वे के मुताबिक 59% भारतीयों ने कहा कि वे इस टूर्नामेंट को देखने का इरादा रखते हैं। यह आंकड़ा इटली (62%), मलेशिया (60%) जैसे फुटबॉल-प्रेमी देशों के बराबर है।

भारत में मीडिया राइट्स की कहानी नाटकीय रही। JioStar ने शुरुआत में ₹890 करोड़ की FIFA की मांग को नकारा और बाद में ₹290 करोड़ की कीमत पर भी पीछे हट गया। अंतत: Zee Entertainment ने 2034 तक भारत में FIFA के 39 टूर्नामेंट्स के टीवी और डिजिटल प्रसारण के एक्सक्लूसिव अधिकार खरीदे हैं। बताया जाता है कि कंपनी ने लगभग $6 करोड़ (60 मिलियन डॉलर) से कम में ये अधिकार हासिल किए हैं। Zee ने इसके लिए चार नए स्पोर्ट्स चैनल, Unite8 Sports 1, 2, 3 और 4, लॉन्च किए। चुनिंदा मैच DD Sports पर भी निशुल्क उपलब्ध हैं।

इस डील का फायदा Zee को तुरंत मिलने भी लगा है। कंपनी ने अपने नए स्पोर्ट्स चैनल नेटवर्क Unite8 Sports और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म Zee5 पर FIFA से जुड़े अभियानों के लिए ऑटोमोबाइल, FMCG, बैंकिंग-फाइनेंस (BFSI), बेवरेज, टेक्नोलॉजी और लाइफस्टाइल जैसे कई क्षेत्रों के एक दर्जन से ज्यादा ब्रैंड्स को जोड़ लिया है।

स्पॉन्सरशिप के मोर्चे पर Mahindra को Co-Presenting Sponsor बनाया गया है, जबकि Diageo Co-Powered By Sponsor के रूप में जुड़ा है। इसके अलावा Apple, Pernod Ricard और Mondelez जैसे बड़े ब्रैंड्स भी इस अभियान का हिस्सा हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो Zee ने FIFA के अधिकार खरीदकर भारत में फुटबॉल दर्शकों और विज्ञापनदाताओं को अपने प्लेटफॉर्म पर आकर्षित करने की बड़ी रणनीति बनाई है और कई बड़ी कंपनियां पहले ही इसके साथ जुड़ चुकी हैं।

लेकिन यहां, सबसे बड़ी समस्या टाइम जोन की है। उत्तरी अमेरिका और भारत के बीच 9-12 घंटे का अंतर है, यानी ज्यादातर मैच रात 12:30 बजे से सुबह 6 बजे के बीच होते हैं। यह कमर्शियल मोनेटाइजेशन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद भारत में फुटबॉल की युवा ऑडियंस, खासकर बंगाल, केरल, गोवा और उत्तर-पूर्व में, तेजी से बढ़ रही है। ब्रैंड्स हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में लोकलाइज्ड कैंपेन के जरिए इस बाजार को टारगेट कर रहे हैं।

सोशल मीडिया और AI: विज्ञापन का नया चेहरा

2026 का वर्ल्ड कप पहली बार पूरी तरह AI-युग में हो रहा है। Sportradar जैसी कंपनियां रियल-टाइम डेटा और डायनामिक क्रिएटिव ऑप्टमाइजेशन के जरिए ऐसे विज्ञापन बना रही हैं जो मैच के दौरान लाइव स्कोर और घटनाओं के साथ अपने आप बदल जाते हैं। अमेरिका में 2026 में programmatic ad spending $203 अरब से ज्यादा होने का अनुमान है, जो साल-दर-साल 12.5% की वृद्धि है।

हालांकि AI के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर विवाद भी जारी है। Coca-Cola के AI से तैयार किए गए विज्ञापनों की लगातार तीसरे साल आलोचना हुई है, और कई लोगों ने उन्हें ‘भावनाहीन’ (soulless) तथा ‘असहज महसूस कराने वाला’ (unsettling) बताया है। Pepsi के 'Football Nation' में भी AI विजुअल्स की आलोचना हुई। इसके विपरीत Adidas ने असली सेलिब्रिटीज पर £50 मिलियन लगाकर Harvard Business Review की उस बात को साबित करने की कोशिश की: 'AI optimize कर सकता है, लेकिन लोगों को परवाह नहीं करा सकता।'

इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग भी जोरों पर है। LEGO का Messi-Ronaldo कैंपेन, जो खिलाड़ियों के सोशल अकाउंट्स से 24 घंटे में 31.4 करोड़ व्यूज पाया, यह साबित करता है कि सही क्रिएटर-कंटेंट कॉम्बिनेशन मास मीडिया को पीछे छोड़ सकता है। Instagram Reels, YouTube Shorts और X (Twitter) पर मीम मार्केटिंग इस बार एक अलग स्तर पर है।

48 टीमें, 104 मैच: विज्ञापनदाताओं के लिए सुनहरा अवसर

पिछले वर्ल्ड कप में 64 मैच थे, इस बार 104। यह सिर्फ फुटबॉल की बात नहीं, यह ऐड इन्वेंट्री की बात है। ज्यादा मैच मतलब ज्यादा प्राइम-टाइम स्लॉट, ज्यादा हाफ-टाइम ब्रेक और एक नई सुविधा, हर क्वार्टर में हाईड्रेशन ब्रेक, जो विज्ञापनदाताओं को और स्क्रीन टाइम देती है।

48 टीमों का मतलब है नए बाजारों का जुड़ना। पहली बार कई अफ्रीकी, एशियाई और कनाडाई टीमें शामिल हैं जो अपने-अपने देशों में नई ऑडियंस ला रही हैं। कनाडा, मोरक्को और जापान जैसी टीमों की भागीदारी ने उनके घरेलू बाजारों में स्पॉन्सरशिप की मांग कई गुना बढ़ा दी है।

खेल से बड़ा बिजनेस

FIFA वर्ल्ड कप 2026 इतिहास का सबसे महंगा, सबसे बड़ा और सबसे कमर्शियल स्पोर्टिंग इवेंट है। $13 अरब के कमर्शियल साइकल, $10.5 अरब के अतिरिक्त विज्ञापन खर्च और 6 अरब संभावित दर्शकों के साथ यह टूर्नामेंट Olympic Games और Super Bowl दोनों को बिजनेस के लिहाज से पीछे छोड़ देता है।

ब्रैंड्स के लिए FIFA World Cup किसी महाकुंभ से कम नहीं है। AI और प्रोग्रामेटिक विज्ञापन ने दर्शकों तक सटीक पहुंच बनाना पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। OTT प्लेटफॉर्म्स ने दर्शकों की पहुंच को वैश्विक स्तर तक बढ़ाया है, जबकि सोशल मीडिया ने फैंस और ब्रैंड्स के बीच जुड़ाव को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है।

भारत जैसे मार्केट, जहां अपनी टीम भले ही वर्ल्ड कप में न हो, लेकिन करोड़ों फुटबॉल दर्शक मौजूद हैं, आने वाले वर्षों में ब्रैंड्स और विज्ञापनदाताओं के लिए सबसे बड़े अवसरों में से एक साबित हो सकते हैं।

जैसा कि Ampere Analysis की Chloe Ng-Triquet ने कहा: 'इस बार FIFA वर्ल्ड कप में ब्रैंड हर अवसर का फायदा उठाने के लिए तैयार हैं।' मैदान पर 48 टीमें एक ट्रॉफी के लिए लड़ेंगी, पर्दे के पीछे हजारों ब्रैंड्स अरबों दिलों के लिए। 

 

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मणिका जुनेजा ने संभाली Dentsu Creative के COO की कमान

Dentsu Creative ने अपनी नेतृत्व टीम को और मजबूत करते हुए मनिका जुनेजा को चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) नियुक्त किया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 10 June, 2026
Last Modified:
Wednesday, 10 June, 2026
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Dentsu Creative ने अपनी नेतृत्व टीम को और मजबूत करते हुए मनिका जुनेजा को चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) नियुक्त किया है।

मनिका का जुनेजा ने इस नई जिम्मेदारी की जानकारी लिंक्डइन पर साझा की। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, “विकास किसी एक अभियान, किसी एक नए क्लाइंट या किसी एक उपलब्धि से नहीं आता। यह धीरे-धीरे मजबूत होता है। बेहतरीन लोगों, ईमानदार साझेदारियों, लगातार खुद को बेहतर बनाने की इच्छा और हर बार बेहतर परिणाम देने के अनुशासन से ही वास्तविक विकास संभव होता है।”

मनिका जुनेजा के पास 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। अपने करियर के दौरान उन्होंने मजबूत टीमों के निर्माण और विस्तार, नए बिजनेस वर्टिकल्स को विकसित करने तथा विभिन्न क्लाइंट्स और बाजारों के लिए इंटीग्रेटेड ग्रोथ सॉल्यूशंस तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है।

COO की जिम्मेदारी संभालने से पहले वह Dentsu Creative में मैनेजिंग पार्टनर के पद पर कार्यरत थीं। अब नई भूमिका में उनसे कंपनी के संचालन, विकास रणनीतियों और बिजनेस विस्तार को आगे बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है।

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Pitch CMO Summit में मार्केटिंग दिग्गजों ने बताए ब्रैंड लॉयल्टी के नए फॉर्मूले

Pitch CMO Summit में मार्केटिंग एक्सपर्ट्स ने बदलते उपभोक्ता व्यवहार के बीच मजबूत ब्रैंड बनाने की चुनौतियों पर चर्चा की।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 10 June, 2026
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Wednesday, 10 June, 2026
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भारत के उपभोक्ताओं को समझना कभी आसान नहीं रहा, लेकिन अब जिस तेजी से वे प्लेटफॉर्म, भौगोलिक क्षेत्रों, भाषाओं और जीवन के अलग-अलग चरणों में बंट रहे हैं, उसने मार्केटर्स के लिए चुनौती को और बढ़ा दिया है। Pitch CMO Summit में आयोजित "Brand Strategies: Turning Audience Complexity Into Loyalty and Impact" नामक पैनल चर्चा में मार्केटिंग एक्सपर्ट्स ने इस बात पर विस्तार से चर्चा की कि ऐसे माहौल में एक मजबूत ब्रैंड बनाना वास्तव में कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है

इस पैनल में IndiGo की Vice President–Marketing and Digital दीप्ति संपत, LT Foods के India और Far East के Chief Marketing Officer रितेश सूद, pladis India के Head of Marketing पवन जगनिक, Motorola India की Marketing Head इप्शिता चौधरी और Footprynt के Co-Founder प्रतीक गौर शामिल थे। चर्चा का संचालन ShareChat और Moj की National Sales Head–Agency and Government सीमा वालिया ने किया।

चर्चा की शुरुआत करते हुए सीमा वालिया ने कहा कि आज का ग्राहक पहले की तरह सीधी और सरल खरीदारी यात्रा नहीं अपनाता। चाहे मोबाइल फोन खरीदना हो या कोई खाद्य उत्पाद, ग्राहक अब कई प्लेटफॉर्म पर जाकर कीमतों की तुलना करता है, रिव्यू पढ़ता है और उसके बाद निर्णय लेता है। यह जटिलता सभी जानते हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि ब्रैंड इससे कैसे निपट रहे हैं।

वालिया ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए पूछा कि क्या मार्केटर्स संस्कृति और भाषा, व्यक्तिगत और रिलेटेबल जैसे विषयों को जरूरत से ज्यादा सरल बनाकर देख रहे हैं?

इस पर इप्शिता चौधरी ने कहा कि "संस्कृति" शब्द का अक्सर गलत इस्तेमाल किया जाता है। उनके मुताबिक कोई ट्रेंड या कुछ समय के लिए लोकप्रिय हो जाने वाली चीज संस्कृति नहीं होती। संस्कृति वह होती है जिसकी जड़ें किसी समुदाय के सामाजिक और आर्थिक इतिहास में गहराई तक मौजूद होती हैं।

उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अक्सर टियर-2 शहरों को एक जैसा मान लिया जाता है। उन्होंने कहा कि पूर्वी भारत का टियर-2 शहर और दक्षिण भारत का टियर-2 शहर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। उनकी सोच, खरीदारी की क्षमता और जीवनशैली अलग है। अगर कोई चीज समान है तो वह है आकांक्षा। आज भारत एक युवा और महत्वाकांक्षी देश है। लेकिन यह आकांक्षा किस बिंदु से शुरू होती है, यह संस्कृति तय करती है। इसलिए भाषा, संवाद का तरीका और कहानी कहने की शैली भी उसी के अनुसार होनी चाहिए।

रितेश सूद ने इस विषय पर एक वास्तविकता सामने रखी। उन्होंने कहा कि अधिकांश मार्केटिंग ब्रीफ मेट्रो शहरों में बैठी टीमें तैयार करती हैं और उपभोक्ता शोध भी प्रायः दिल्ली या मुंबई में ही किया जाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि हम सभी इस गलती के दोषी हैं। उन्हें याद नहीं कि आखिरी बार ग्रामीण भारत में बड़े स्तर पर उपभोक्ता शोध कब किया गया था।

उन्होंने कहा कि गोरखपुर और दिल्ली के 28 वर्षीय युवा दोनों इंस्टाग्राम इस्तेमाल कर सकते हैं और एक जैसी श्रेणी के उत्पाद खरीद सकते हैं, लेकिन उनकी प्रेरणाएं पूरी तरह अलग होती हैं। सबसे जरूरी यह है कि उन्हें ब्रैंड से जुड़ाव महसूस हो और यही वह हिस्सा है जो अक्सर छूट जाता है।

चर्चा इसके बाद भोजन और क्षेत्रीय पहचान पर पहुंची। सूद ने बताया कि उनकी कंपनी के पोर्टफोलियो में हैदराबादी, कोलकाता और लखनवी बिरयानी शामिल हैं और ये सिर्फ भोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि बिरयानी केवल एक डिश नहीं बल्कि एक क्षेत्रीय पहचान और भावना है। किसी कोलकाता के व्यक्ति से हैदराबादी बिरयानी के साथ जश्न मनाने को कहना वैसा ही है जैसे किसी RCB प्रशंसक से दिल्ली की जर्सी पहनकर चीयर करने को कहना।

उन्होंने कहा कि जनसांख्यिकीय आंकड़े यह बताते हैं कि कोई व्यक्ति कागज पर कौन है, लेकिन संस्कृति यह बताती है कि वह क्या महसूस करता है, उसे क्या पसंद है, उसे क्या प्रेरित करता है और वह किस तरह जश्न मनाता है। यही वह स्तर है जहां ब्रैंड उपभोक्ता के दिल तक पहुंचते हैं और खरीदारी के वास्तविक फैसले प्रभावित करते हैं।

विज्ञापनों में स्टीरियोटाइपिंग यानी पूर्वाग्रह आधारित प्रस्तुति के जोखिम पर बात करते हुए सूद ने कहा कि इसकी जड़ में अनुमान होता है। जब आप किसी उपभोक्ता समूह के बारे में पहले से धारणा बना लेते हैं और उसे उन पर थोप देते हैं, तब स्टीरियोटाइपिंग होती है।

उनके अनुसार इसका समाधान सिर्फ रिसर्च रिपोर्ट्स नहीं हैं, बल्कि बाजार में जाकर लोगों के बीच रहना है। उन्होंने कहा कि खाने की परंपराएं, त्योहार मनाने के तरीके और संगीत जैसी चीजें ही असली सांस्कृतिक समझ देती हैं। पंजाब का संगीत और दक्षिण भारत का संगीत बिल्कुल अलग है। यही वे जगहें हैं जहां संस्कृति की असली बारीकियां मौजूद हैं।

सूद की बात से सहमति जताते हुए पवन जगनिक ने कहा कि भारत की विविधता सिर्फ रचनात्मक चुनौती नहीं बल्कि एक बड़ा व्यावसायिक अवसर भी है। उन्होंने कहा कि भारत अनेक संस्कृतियों का देश है और यही ब्रैंड्स के लिए अवसर बनाता है। बिस्किट उद्योग जैसे 50-60 हजार करोड़ रुपये के बाजार में अगर कोई ब्रैंड केवल एक राज्य पर ध्यान देकर उपभोक्ताओं की जरूरतों और उनकी भाषा को सही समझ ले, तो भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि बेहतर पहुंच और डिजिटल माध्यमों ने छोटे ब्रैंड्स के लिए भी अपनी जगह बनाने के अवसर बढ़ा दिए हैं।

प्रतीक गौर ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए एक दिलचस्प उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने एक पॉडकास्ट "Teen Taal" में सुना था कि भले ही हम 2026 में रह रहे हों, लेकिन झारखंड का कोई जिला व्यवहारिक रूप से अभी भी 1996 या 2006 जैसी परिस्थितियों में जी रहा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा खतरा यह मान लेना है कि इंटरनेट सबके हाथ में होने का मतलब है कि सभी लोग एक जैसा कंटेंट देख रहे हैं। वास्तविकता यह है कि एक ही इलाके में रहने वाले लोगों और 150 किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों की कंटेंट खपत पूरी तरह अलग हो सकती है।

गौर के अनुसार भारत में काम करने वाला हर ब्रैंड मैनेजर दुनिया के किसी भी बाजार में काम करने की क्षमता रखता है, क्योंकि वह एक साथ कई संस्कृतियों को समझने और संभालने का काम करता है।

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके एक पुराने क्लाइंट Emami ने उनकी एजेंसी से काम इसलिए हटा लिया था क्योंकि उनकी टीम में भले ही चार बंगाली भाषी लोग थे, लेकिन दो दिल्ली के CR Park से और दो मुंबई से थे। जबकि क्लाइंट को कोलकाता के लोगों की समझ रखने वाली टीम चाहिए थी।

इसी तरह एक OTT प्लेटफॉर्म, जो बंगाली कंटेंट का प्रचार कर रहा था, चाहता था कि प्रचार सामग्री उसी तरह की भाषा में हो जैसी लोग वास्तव में बोलते हैं, न कि उसका कोई शुद्ध या कृत्रिम संस्करण। गौर ने कहा कि जैसे-जैसे संचार विशिष्ट दर्शकों तक पहुंचता है, उसे उनकी वास्तविक दुनिया से जुड़ा होना चाहिए, न कि किसी मेट्रो शहर की टीम की कल्पना से।

दीप्ति संपत ने बताया कि यह सोच ग्राहक अनुभव में कैसे दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि IndiGo में क्षेत्रीय भोजन परोसना केवल मेन्यू का निर्णय नहीं बल्कि ब्रैंड का निर्णय है। जब किसी यात्री को उसके क्षेत्र का भोजन मिलता है तो उसे अपनापन महसूस होता है और तुरंत भावनात्मक जुड़ाव बन जाता है। उनके अनुसार उड़ान का अनुभव भी एक तरह की कहानी कहने की प्रक्रिया है, जो विज्ञापन अभियानों के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से भी काम करती है।

इसके बाद चर्चा ब्रैंड संचार के बदलते तरीकों और सेलिब्रिटी इन्फ्लुएंसर्स से क्षेत्रीय कंटेंट क्रिएटर्स की ओर बढ़ते रुझान पर केंद्रित हुई।

इप्शिता चौधरी ने कोलकाता के एक बाजार दौरे का अनुभव साझा किया। उन्होंने एक गृहिणी से मुलाकात की जो अपने Motorola फोन से रोज खाना बनाने के वीडियो रिकॉर्ड करती थीं और यूट्यूब पर उनके 35,000 फॉलोअर्स थे।

उन्होंने कहा कि जब हम मार्केटिंग अभियान बनाते हैं, तब अक्सर यह नहीं समझ पाते कि एक डिवाइस किसी व्यक्ति को कितना सशक्त बना सकता है। लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत कभी सेलिब्रिटी होते हैं तो कभी उनके आसपास के साधारण लोग, जिनकी अपनी दिलचस्प कहानी होती है। यही चीज आज की Creator Economy को आगे बढ़ा रही है।

उनके अनुसार क्षेत्रीय क्रिएटर्स ऐसी प्रामाणिकता लेकर आते हैं जिसे बड़े अभियान अक्सर तैयार नहीं कर पाते और ब्रैंड्स को इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए।

इस पर रितेश सूद ने कहा कि सेलिब्रिटी आपको पहुंच यानी Reach दे सकते हैं, लेकिन क्षेत्रीय क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स आपको अपनापन यानी Belonging देते हैं। आखिरकार उपभोक्ता यह जानना चाहता है कि उसके जैसे और लोग भी इस ब्रैंड पर भरोसा करते हैं।

उन्होंने कंटेंट क्रिएटर्स को जरूरत से ज्यादा स्क्रिप्ट देने की प्रवृत्ति का भी विरोध किया। उनका कहना था कि उन्हें ब्रैंड की भावना समझने दें और फिर अपनी शैली में उसे प्रस्तुत करने दें। वरना हर जगह एक जैसी रील्स दिखाई देने लगती हैं।

प्रतीक गौर ने बताया कि लगभग छह साल पहले उन्होंने Asian Paints के साथ काम किया था, जब माइक्रो-इन्फ्लुएंसर्स का चलन इतना लोकप्रिय नहीं था। कंपनी देश के अलग-अलग हिस्सों के पेंटर्स और कारीगरों को तलाश रही थी, जो स्थानीय भाषा और अंदाज में यूट्यूब वीडियो बनाते थे और लोगों को उत्पादों के इस्तेमाल और उपलब्धता की जानकारी देते थे।

गौर ने कहा कि तभी उन्हें समझ आया कि क्षेत्रीय क्रिएटर्स लोगों में अपनापन पैदा करते हैं। यदि Asian Paints मेरे जैसे किसी व्यक्ति के साथ काम कर रही है, तो मुझे भी लगता है कि मैं उस ब्रैंड के साथ जुड़ सकता हूं। यह वह जुड़ाव है जिसे कई बार बड़े विज्ञापन अभियान भी नहीं बना पाते।

पैनल ने माइक्रो-ड्रामा और नए कंटेंट फॉर्मेट्स पर भी चर्चा की। दीप्ति संपत ने कहा कि मार्केटर्स का काम प्रयोग करना है। दर्शक अब छोटे-छोटे समूहों में बंटते जा रहे हैं और रणनीति इस बात पर निर्भर करती है कि वह समूह कहां मौजूद है और ब्रैंड का व्यावसायिक उद्देश्य क्या है। उदाहरण के लिए बिजनेस क्लास यात्रियों को लक्ष्य बनाना या टियर-2 शहर के पहली बार उड़ान भरने वाले यात्रियों तक पहुंचना।

रितेश सूद ने बताया कि सत्र से लगभग छह महीने पहले वह खुद माइक्रो-ड्रामा देखने के आदी हो गए थे। उनके अनुसार FMCG और खाद्य उत्पादों के लिए यह फॉर्मेट ब्रैंड को कहीं अधिक स्वाभाविक तरीके से कहानी में शामिल करने का अवसर देता है, जो पारंपरिक 30 सेकंड के विज्ञापन में संभव नहीं होता।

पवन जगनिक ने इसे बजट के नजरिए से देखा। उन्होंने कहा कि यदि आपके अगले ग्राहक माइक्रो-ड्रामा देख रहे हैं, तो आपको वहां मौजूद होना चाहिए। यदि वे नहीं देख रहे, तो वहां निवेश करने का कोई मतलब नहीं है।

मापन यानी Measurement पर चर्चा करते हुए पैनल ने इस बात पर सहमति जताई कि आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन उनका अत्यधिक दबाव रचनात्मकता को नुकसान पहुंचा सकता है।

प्रतीक गौर ने कहा कि एंगेजमेंट के आंकड़े झूठ नहीं बोलते और CFO हमेशा खर्च का हिसाब मांगेंगे। लेकिन अगर मार्केटिंग को सिर्फ आंकड़ों तक सीमित कर दिया जाए तो उसकी रचनात्मकता खत्म हो जाती है। उनके अनुसार किसी अभियान की असली सफलता यह है कि लोग उसे पांच साल बाद भी याद रखें।

पवन जगनिक ने कहा कि उनकी रणनीति यह होती है कि किसी अभियान की शुरुआत से पहले CEO और CFO के साथ लक्ष्य स्पष्ट कर लिए जाएं और हर छह महीने में उनकी समीक्षा की जाए। उनके मुताबिक अंतिम मापदंड राजस्व यानी Revenue ही होता है।

इप्शिता चौधरी ने भी इस बात से सहमति जताई, लेकिन उन्होंने यह मानने से इनकार किया कि रचनात्मकता और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी हैं। उनका कहना था कि यदि रणनीति स्पष्ट हो और दिशा तय हो, तो रचनात्मक तरीके से लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

रितेश सूद ने इस विषय को एक उदाहरण के जरिए समझाया। उन्होंने कहा कि किसी अभियान की सफलता को सिर्फ एक मीट्रिक से जोड़ना ऐसा है जैसे किसी ऐसे व्यंजन का श्रेय वेटर को दे देना, जिसे बनाने में शेफ ने तीन घंटे लगाए हों। उपभोक्ता के निर्णय का क्षण कहीं भी आ सकता है, चाहे वह पड़ोसी का व्हाट्सऐप संदेश हो या किसी क्रिएटर का वीडियो। इसलिए पूरी तस्वीर को देखना जरूरी है।

चर्चा का समापन ब्रैंड लॉयल्टी पर हुआ, जो पूरे सत्र का सबसे चर्चित विषय रहा।

दीप्ति संपत के अनुसार लॉयल्टी एक क्रमिक प्रक्रिया है जिसमें पहले अच्छा अनुभव आता है, फिर निरंतरता और उसके बाद भरोसा बनता है। विमानन क्षेत्र में जहां उत्पाद और कीमत में ज्यादा अंतर नहीं होता, वहां ग्राहक अनुभव ही असली पहचान बनता है। उन्होंने कहा कि यदि यात्रा का अनुभव अच्छा होगा तो ग्राहक दोबारा उसी एयरलाइन को चुनेगा। हर टचपॉइंट पर ब्रैंड के वादे को निभाना ही लंबे समय में भरोसा बनाता है।

प्रतीक गौर ने कहा कि आज के दौर में, जब लोगों का ध्यान कम समय तक टिकता है, तब पहली और आखिरी छाप सबसे ज्यादा मायने रखती है। चाहे वह विज्ञापन पर पहली क्लिक हो या स्टोर में पहला कदम, और अंत में उत्पाद या सेवा का अनुभव। यदि दोनों अच्छे हों तो ग्राहक लंबे समय तक ब्रैंड के साथ बना रहता है।

पवन जगनिक ने कहा कि किसी ब्रैंड की वास्तविक लॉयल्टी तब समझ में आती है जब कीमत बढ़ने के बाद भी ग्राहक वापस लौटकर आए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि McVitie's जैसे ब्रैंड के लिए, जहां एक पैक की कीमत सिर्फ 10 रुपये है, लॉयल्टी हासिल करना मुश्किल और उसे बनाए रखना उससे भी कठिन है। उनका सुझाव था कि ब्रैंड को किसी एक क्षेत्र में अपनी पहचान बनानी चाहिए और हर टचपॉइंट पर एक जैसी स्थिरता बनाए रखनी चाहिए।

इप्शिता चौधरी ने सबसे स्पष्ट और ईमानदार टिप्पणी करते हुए कहा कि आज की दुनिया में लॉयल्टी बहुत मायावी हो गई है। हर ब्रैंड इसके पीछे भाग रहा है, लेकिन क्या यह वास्तव में मौजूद भी है?

उन्होंने कहा कि क्विक कॉमर्स के दौर में ग्राहक अक्सर उसी ब्रैंड को चुनता है जो उस समय उसकी समस्या हल कर दे। हालांकि कुछ अपवाद जरूर होते हैं। यदि कोई ब्रैंड आधी रात को किसी माता-पिता की जरूरत पूरी कर दे, तो वह अनुभव लंबे समय तक याद रहता है।

उनके मुताबिक ऐसे छोटे लेकिन अर्थपूर्ण अनुभव ही शायद वास्तविक लॉयल्टी पैदा करते हैं। लेकिन इसके बावजूद लॉयल्टी आज भी एक ऐसी चीज बनी हुई है, जिसे हर ब्रैंड पाना चाहता है, लेकिन जिसे हासिल करना आसान नहीं है।

यही विचार इस चर्चा का सबसे उपयुक्त निष्कर्ष साबित हुआ। इसमें यह स्वीकार किया गया कि उपभोक्ताओं की बदलती दुनिया में ब्रैंड लॉयल्टी बनाना पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है, फिर भी हर ब्रैंड उसी लक्ष्य की ओर लगातार प्रयास कर रहा है।

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Bright Outdoor Media का बड़ा कदम, BSE SME से मेन बोर्ड पर जाने की तैयारी

देश की पहली सूचीबद्ध आउट-ऑफ-होम (OOH) विज्ञापन कंपनी Bright Outdoor Media Limited ने जानकारी दी है कि कंपनी के निदेशक मंडल (Board of Directors) की बैठक 12 जून 2026, शुक्रवार को आयोजित की जाएगी।

Vikas Saxena by
Published - Tuesday, 09 June, 2026
Last Modified:
Tuesday, 09 June, 2026
BrightOutdoor986

देश की पहली सूचीबद्ध आउट-ऑफ-होम (OOH) विज्ञापन कंपनी Bright Outdoor Media Limited ने जानकारी दी है कि कंपनी के निदेशक मंडल (Board of Directors) की बैठक 12 जून 2026, शुक्रवार को आयोजित की जाएगी। इस बैठक में कंपनी के शेयरों को BSE के SME प्लेटफॉर्म से मेन बोर्ड पर स्थानांतरित करने और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के मेन बोर्ड पर सूचीबद्ध कराने से जुड़े महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा।

कंपनी ने सेबी (लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) रेगुलेशंस, 2015 के रेगुलेशन 29 और अन्य लागू प्रावधानों के तहत बीएसई को भेजी सूचना में यह जानकारी दी है।

कंपनी के अनुसार, बोर्ड बैठक में सबसे पहले BSE लिमिटेड के SME प्लेटफॉर्म से कंपनी के इक्विटी शेयरों की लिस्टिंग और ट्रेडिंग को BSE के मेन बोर्ड पर स्थानांतरित करने के प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा। इसके साथ ही कंपनी के इक्विटी शेयरों को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (NSE) के मेन बोर्ड पर सूचीबद्ध कराने के प्रस्ताव को भी मंजूरी के लिए रखा जाएगा। हालांकि, यह प्रक्रिया सभी आवश्यक मंजूरियों और नियामकीय शर्तों के अनुपालन के अधीन होगी।

बैठक में दूसरा महत्वपूर्ण एजेंडा पोस्टल बैलेट नोटिस को मंजूरी देना होगा। इस नोटिस के जरिए कंपनी अपने शेयरधारकों से BSE SME प्लेटफॉर्म से BSE मेन बोर्ड और NSE मेन बोर्ड पर माइग्रेशन के प्रस्ताव को मंजूरी देने की मांग करेगी।

कंपनी ने बताया कि बोर्ड बैठक में इन प्रस्तावों के अलावा अध्यक्ष की अनुमति से अन्य जरूरी विषयों पर भी विचार किया जा सकता है।

Bright Outdoor Media Limited का कहना है कि यह कदम कंपनी की विकास रणनीति का हिस्सा है। मेन बोर्ड पर लिस्टिंग से कंपनी की बाजार में पहचान और निवेशकों तक पहुंच को और मजबूत करने में मदद मिल सकती है। 

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IMPACT 40Under40: मार्केटिंग जगत के उभरते सितारों का सम्मान

5 जून को नई दिल्ली में IMPACT 40Under40 के चौथे संस्करण का आयोजन हुआ, जिसमें इंडस्ट्री में उल्लेखनीय योगदान देने वाले युवा ब्रैंड मार्केटर्स को सम्मानित किया गया।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 06 June, 2026
Last Modified:
Saturday, 06 June, 2026
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नई दिल्ली में 5 जून को IMPACT 40Under40 के चौथे संस्करण का भव्य आयोजन किया गया। इस मौके पर मार्केटिंग जगत के दिग्गज लीडर्स, बिजनेस हेड्स और एक्सपर्ट्स की मौजूदगी में उन युवा मार्केटिंग प्रोफेशनल्स को सम्मानित किया गया, जिनकी उम्र 40 वर्ष से कम है और जो मार्केटिंग इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।

यह प्रतिष्ठित सम्मान उन ब्रैंड मार्केटर्स को दिया जाता है जिन्होंने अपने काम के दम पर इंडस्ट्री में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, वर्तमान में नेतृत्व की भूमिका निभा रहे हैं और भविष्य में मार्केटिंग जगत के प्रमुख चेहरों के रूप में उभरने की क्षमता रखते हैं।

आज के दौर में मार्केटिंग लीडर्स से सिर्फ ब्रैंड प्रमोशन की उम्मीद नहीं की जाती, बल्कि वे संस्कृति को आकार देने, बिजनेस ग्रोथ को आगे बढ़ाने, नई तकनीकों से आने वाली चुनौतियों का सामना करने और बदलती उपभोक्ता जरूरतों के बीच ब्रैंड को प्रासंगिक बनाए रखने की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं।

IMPACT CMO 40 Under 40 के 2026 संस्करण में मार्केटिंग नेतृत्व में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भी साफ दिखाई दी। इस साल अंतिम सूची में 21 महिलाओं और 29 पुरुषों को जगह मिली, जो इस क्षेत्र में महिलाओं के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

इस वर्ष की सूची में कुल 50 ऐसे युवा नेताओं को शामिल किया गया है, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। इनमें PUMA India की श्रेया सचदेव, Visa की ऋचा बत्रा, Mastercard की लावणी अग्रवाल, Zomato के साहिबजीत सिंह साहनी, ACKO के नितिन खन्ना, Ather Energy के सौरभ शर्मा और Reliance Ajio के अर्पण बिस्वास जैसे कई प्रमुख नाम शामिल हैं।

यह सूची आधुनिक मार्केटिंग नेतृत्व की व्यापकता और विविधता को भी दर्शाती है। इसमें शामिल पेशेवर FMCG, ऑटोमोबाइल, फाइनेंशियल सर्विसेज, मीडिया, टेक्नोलॉजी, रिटेल और D2C जैसे विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

विजेताओं का चयन लंबी चर्चा और गहन विचार-विमर्श के बाद किया गया। इन युवा नेताओं ने अपनी रणनीतिक सोच, रचनात्मकता, नवाचार और व्यवसाय पर पड़ने वाले ठोस प्रभाव के जरिए खुद को अलग साबित किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी मिलकर यह तय कर रहे हैं कि आने वाले वर्षों में मार्केटिंग का स्वरूप कैसा होगा।

IMPACT CMO 40 Under 40 2026 की यह सूची उन नई पीढ़ी के मार्केटिंग लीडर्स का सम्मान है, जो तेजी से बदलती दुनिया में ब्रैंड्स को नई दिशा देने और उद्योग के भविष्य को आकार देने का काम कर रहे हैं।

विजेताओं की पूरी सूची नीचे दी गई है। सभी नाम अंग्रेजी वर्णमाला (Alphabetical Order) के अनुसार शामिल किए गए हैं।

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क्या Gen Z को जीतने के लिए ब्रैंड्स को बदलनी पड़ रही अपनी सोच?

Gen Z केवल प्रॉडक्ट नहीं खरीदती, वे अनुभव, पहचान और मूल्य खरीदती है। इनके लिए ब्रैंड का मतलब सिर्फ एक लोगो नहीं, बल्कि यह है कि वह ब्रैंड किस बात के लिए खड़ा है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 06 June, 2026
Last Modified:
Saturday, 06 June, 2026
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आज अगर किसी ब्रैंड का करोड़ों रुपये का टीवी विज्ञापन किसी बड़े सेलिब्रिटी के साथ प्रसारित होता है, तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि युवा दर्शक उसे देख भी रहे हों। उस समय संभव है कि 20-25 साल का उपभोक्ता इंस्टाग्राम रील्स स्क्रॉल कर रहा हो, किसी इन्फ्लुएंसर की सिफारिश सुन रहा हो, यूट्यूब शॉर्ट्स देख रहा हो या दोस्तों के साथ किसी ट्रेंडिंग कंटेंट पर चर्चा कर रहा हो। यही है Gen Z,एक ऐसी पीढ़ी जो पारंपरिक विज्ञापनों से ज्यादा डिजिटल कंटेंट, इन्फ्लुएंसर्स और वास्तविक अनुभवों पर भरोसा करती है। मार्केटिंग की दुनिया में यह वर्ग आज सबसे चुनौतीपूर्ण भी है और सबसे प्रभावशाली भी, क्योंकि इसके फैसले आने वाले वर्षों में ब्रैंड्स की सफलता और असफलता तय करेंगे।

1997 से 2012 के बीच जन्मे इस वर्ग की उम्र 2026 में 14 से 29 वर्ष के बीच है। भारत में इनकी संख्या 37.7 करोड़ से अधिक है, यानी देश की आबादी का लगभग 27% हिस्सा। वैश्विक स्तर पर Gen Z दुनिया की कुल आबादी का 24.6% है, जो करीब 2 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। BCG और Snapchat की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत में Gen Z पहले से ही कुल उपभोक्ता खर्च के 43% ($860 अरब) को प्रभावित कर रही है। 2035 तक इनका प्रत्यक्ष खर्च (direct spending) $1.8 ट्रिलियन और कुल स्पेंडिंग पावर (खर्च करने की क्षमता) $2 ट्रिलियन तक पहुंच सकती है, यानी 2035 में भारत में खर्च होने वाला हर दूसरा रुपया Gen Z से आएगा। जो ब्रैंड आज इस पीढ़ी को नहीं समझेगा, वह कल के मार्केट में अप्रासंगिक हो जाएगा।

Gen Z का खरीदारी व्यवहार: पुरानी पीढ़ियों से बिल्कुल अलग

Gen Z केवल प्रॉडक्ट नहीं खरीदती, वे अनुभव, पहचान और मूल्य खरीदती है। इनके लिए ब्रैंड का मतलब सिर्फ एक लोगो नहीं, बल्कि यह है कि वह ब्रैंड किस बात के लिए खड़ा है।

खरीदारी से पहले ये ऑनलाइन रिसर्च को अनिवार्य मानते हैं, BCG-Snap रिपोर्ट बताती है कि Gen Z, Millennials की तुलना में 1.5 गुना अधिक रिसर्च करके खरीदारी करती है। यूजर-जनरेटेड कंटेंट, रिव्यू और दोस्तों की सिफारिशें इनके फैसलों पर गहरा असर डालती हैं। FOMO (Fear of Missing Out) यानी "कहीं मैं पीछे न रह जाऊं" की भावना इनकी खरीदारी को आवेगपूर्ण और तेज बनाती है। शोध बताते हैं कि Gen Z, पुराने पीढ़ियों की तुलना में सोशल मीडिया के जरिए 2.5 गुना अधिक आवेगपूर्ण खरीदारी करती है।

सोशल मीडिया: नया मार्केट, नए नियम

अगर आपको Gen Z तक पहुंचना है तो आपको उनके मैदान में उतरना होगा और वह मैदान है सोशल मीडिया।

2026 में Gen Z प्रतिदिन औसतन 4 घंटे सोशल मीडिया पर बिताती है, जो 2025 के 3 घंटे 18 मिनट से काफी अधिक है। भारत में Gen Z, देश के कुल सोशल मीडिया यूजर्स का 40% हिस्सा है और इनकी अनुमानित सालाना खरीद शक्ति ₹1.2 लाख करोड़ से अधिक है।

प्लेटफॉर्म की प्राथमिकताओं की बात करें तो:

  • Instagram 89% Gen Z यूजर्स की पसंद है (72% इसे कस्टमर केयर के लिए भी चुनते हैं)
  • YouTube 84% के साथ दूसरे स्थान पर, भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो यूसेज में 22% की वार्षिक वृद्धि
  • TikTok (वैश्विक संदर्भ में) 83% डेली एक्टिव यूसेज के साथ सबसे अधिक एंगेजमेंट देता है; 77% Gen Z इसे प्रॉडक्ट डिस्कवरी के लिए उपयोग करते हैं

भारत में YouTube और WhatsApp का दबदबा है, जबकि Instagram Reels ने ब्रैंड कम्युनिकेशन को पूरी तरह बदल दिया है। मीम मार्केटिंग और वायरल कैंपेन अब किसी भी टीवी विज्ञापन से ज्यादा असरदार साबित हो रहे हैं।

सेलिब्रिटी से ज्यादा इन्फ्लुएंसर पर भरोसा

Gen Z की मार्केटिंग में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब माइक्रो और नैनो इन्फ्लुएंसर, करोड़ों के मेहनताने वाले सेलिब्रिटी से ज्यादा असरदार हैं।

आंकड़े बताते हैं कि 87% Gen Z उपभोक्ता इन्फ्लुएंसर की सिफारिश पर प्रॉडक्ट खरीदने को तैयार होते हैं, यह प्रतिशत Millennials (78%) और Gen X (77%) से काफी अधिक है। 77% Gen Z ने वास्तव में किसी इन्फ्लुएंसर की सिफारिश के बाद खरीदारी की है। एक अन्य अध्ययन बताता है कि 82.4% Gen Z उपभोक्ता इन्फ्लुएंसर कंटेंट के जरिए नए प्रॉडक्ट खोजते हैं।

वैश्विक सलाहकार फर्म अर्नस्ट एंड यंग (EY) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग का मार्केट 2026 तक ₹3,375 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, 18% की CAGR से बढ़ता हुआ। 47% ब्रैंड्स अब माइक्रो और नैनो इन्फ्लुएंसर को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि ये कम खर्च में दर्शकों के साथ ज्यादा भरोसेमंद और वास्तविक जुड़ाव बनाने में सक्षम होते हैं।

Nykaa ने अपनी रणनीति में क्रांतिकारी बदलाव करते हुए सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट की जगह 200+ ब्यूटी माइक्रो-इन्फ्लुएंसर से साझेदारी की, हर एक के 10,000 से 50,000 फॉलोअर्स। नतीजा? Q2 FY25 में Nykaa का मार्केटिंग खर्च साल-दर-साल 40% बढ़ा। boAt ने भी युवा कंटेंट क्रिएटर्स के साथ साझेदारी कर अपनी अलग ब्रांड पहचान बनाई है और आज यह भारत के सबसे लोकप्रिय ऑडियो ब्रैंड्स में से एक बन चुका है।

पारंपरिक विज्ञापन से कंटेंट मार्केटिंग की ओर

Gen Z सीधे विज्ञापन से बचती है, लेकिन वही बात अगर मनोरंजक कहानी के रूप में आए तो वे उसे पसंद करते हैं और शेयर करते हैं।

Zomato इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। कंपनी का #EnjoyLargeMealsOnZomato अभियान रील्स पर हास्य और भावनात्मक कहानी कहने के अनोखे मिश्रण की वजह से काफी लोकप्रिय हुआ। सोशल मीडिया पर Zomato की मौजूदगी- मीम्स, चुटीले जवाब और लोगों से जुड़ने वाला कंटेंट, Gen Z से किसी दोस्त की तरह संवाद करती है, किसी पारंपरिक ब्रैंड की तरह नहीं।

वहीं, Mamaearth और Swiggy ने भी ब्रैंडेड कंटेंट, रील्स और पॉडकास्ट जैसे माध्यमों का इस्तेमाल कर अपनी बात Gen Z की भाषा में पहुंचाई। Myntra ने Gen Z क्रिएटर्स के साथ मिलकर फैशन हॉल वीडियो और स्टाइलिंग टिप्स के जरिए खुद को एक ऐसे ब्रैंड के रूप में स्थापित किया है, जिससे युवा आसानी से जुड़ाव महसूस करते हैं।

पर्सनलाइजेशन और AI: हर किसी के लिए अलग अनुभव

Gen Z अब हर चीज़ में व्यक्तिगत अनुभव चाहती है। Netflix की व्यक्तिगत पसंद के आधार पर दी जाने वाली सिफारिशें, Spotify की ‘Discover Weekly’ प्लेलिस्ट और Amazon के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित उत्पाद सुझाव Gen Z को यह महसूस कराते हैं कि यह प्लेटफॉर्म खास तौर पर उसी के लिए बनाया गया है।

आज 41% Gen Z ऑनलाइन जानकारी खोजने के लिए Google से पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेती है। इसका सीधा मतलब है कि ब्रैंड्स को अपनी AI और कंटेंट रणनीति ऐसी बनानी होगी, जो हर प्लेटफॉर्म के अनुरूप हो और वहां के उपयोगकर्ताओं के व्यवहार के हिसाब से काम करे।

Purpose-Driven Branding: सिर्फ प्रॉडक्ट नहीं, विचारधारा बेचें

Gen Z के लिए किसी ब्रैंड का "क्या" जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका "क्यों" भी है। यानी यह पीढ़ी सिर्फ उत्पाद नहीं देखती, बल्कि यह भी जानना चाहती है कि ब्रैंड किन मूल्यों और सिद्धांतों के साथ खड़ा है। Morning Consult के एक सर्वे के अनुसार, 83% Gen Z उपभोक्ता उन्हीं ब्रैंड्स को चुनना पसंद करते हैं, जिनके मूल्य और सोच उनके अपने विचारों से मेल खाते हों। वहीं, Nielsen की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि 73% Gen Z उपभोक्ता पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ उत्पादों के लिए अधिक कीमत चुकाने को भी तैयार हैं। यह आंकड़ा 2024 की तुलना में 5% अधिक है।

वैश्विक स्तर पर Patagonia और Ben & Jerry's जैसे ब्रैंड पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखने के कारण Gen Z की पसंद बने हुए हैं। भारत में Tata Consumer Products की कुछ पहलें और Mamaearth की ‘टॉक्सिन-फ्री’ तथा ‘प्राकृतिक’ उत्पादों पर आधारित ब्रैंडिंग भी इसी सोच को दर्शाती है।

विविधता (Diversity), समावेशिता (Inclusion) और सामाजिक जिम्मेदारी (Social Responsibility) अब सिर्फ मार्केटिंग के आकर्षक नारे नहीं रह गए हैं, बल्कि Gen Z इन्हीं मानकों पर किसी ब्रैंड की विश्वसनीयता और पहचान को परखती है।

ई-कॉमर्स से सोशल कॉमर्स तक: खरीदारी अब स्क्रॉल में होती है

Instagram Shopping, YouTube Shopping और Live Commerce ने खरीदारी के तरीके को बदल दिया है। 52% Gen Z (18-29 आयु वर्ग) पहले से ही सोशल प्लेटफॉर्म पर सीधे खरीदारी कर चुके हैं। भारत में 97.4% सोशल मीडिया उपयोगकर्ता स्मार्टफोन से प्लेटफॉर्म एक्सेस करते हैं, यानी यहां का मार्केट पूरी तरह मोबाइल-फर्स्ट है।

Quick Commerce, जैसे Zomato Blinkit और Swiggy Instamart, Gen Z की "अभी चाहिए" मानसिकता को पूरी तरह से कैप्चर करता है।

चुनौतियां: Gen Z को जीतना आसान नहीं

इतने अवसरों के बावजूद, Gen Z तक पहुंचना और उन्हें बनाए रखना कठिन है:

चयनात्मक ध्यान (Selective Attention): Gen Z का ध्यान कम नहीं हुआ है, बल्कि वह बहुत चयनात्मक हो गया है। McKinsey की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, Gen Z का "सिर्फ 8 सेकंड का ध्यान" होने वाली धारणा एक मिथक है। हकीकत यह है कि यह पीढ़ी गैर-जरूरी या उबाऊ कंटेंट को तुरंत छोड़ देती है, लेकिन अगर कोई विषय उसे पसंद आ जाए तो उस पर घंटों समय बिताती है। आंकड़ों के मुताबिक, 59% Gen Z पहले किसी विषय पर शॉर्ट वीडियो देखती है और फिर उसी विषय पर विस्तार से जानकारी पाने के लिए लंबा कंटेंट तलाशती है।

विज्ञापन थकान (Ad Fatigue): Gen Z सोशल मीडिया पर काफी समय बिताती है। 61% युवा देर रात तक सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, लेकिन 55% ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी न कभी सोशल मीडिया से दूरी बनाने के लिए ‘सोशल मीडिया डिटॉक्स’ अपनाया है। इसका मतलब है कि यह पीढ़ी जरूरत से ज्यादा मार्केटिंग और विज्ञापनों को पहचान लेती है और उनसे बचने की कोशिश करती है।

ब्रैंड निष्ठा की कमी (Lack of Brand Loyalty): यह पीढ़ी पारंपरिक और स्थापित ब्रैंड्स के बजाय नए रुझानों और नवाचारों को ज्यादा महत्व देती है। BCG-Snap रिपोर्ट के अनुसार, Gen Z नए और अलग तरह के उत्पादों को आजमाने में अधिक रुचि रखती है। इसलिए किसी एक ब्रैंड के प्रति लंबे समय तक वफादार बने रहना इस पीढ़ी की खासियत नहीं है।

विश्वसनीयता की कड़ी कसौटी (Authenticity Test): Gen Z किसी भी ब्रैंड या इन्फ्लुएंसर की वास्तविकता को बहुत जल्दी परख लेती है। अगर उसे जरा भी महसूस हो कि कोई प्रचार सिर्फ पैसे लेकर किया गया है या उसमें ईमानदारी की कमी है, तो वह तुरंत उस ब्रैंड या इन्फ्लुएंसर पर से भरोसा खो देती है। इसलिए इस पीढ़ी के साथ जुड़ने के लिए प्रामाणिकता और पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण हैं।

भविष्य की दिशा: AI इन्फ्लुएंसर, AR/VR और गेमिंग मार्केटिंग का बढ़ता प्रभाव

2026 के बाद मार्केटिंग की दुनिया और भी तेजी से बदलने वाली है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से संचालित वर्चुअल इन्फ्लुएंसर वैश्विक मार्केट में अपनी जगह बना रहे हैं और कई ब्रैंड्स इन्हें अपने प्रचार अभियानों में शामिल कर रहे हैं। वहीं, ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) और वर्चुअल रियलिटी (VR) आधारित सुविधाएं, जैसे Myntra का वर्चुअल फिटिंग रूम, खरीदारी के अनुभव को अधिक वास्तविक और आकर्षक बना रही हैं। इसके अलावा, गेमिंग मार्केटिंग भी तेजी से उभर रहा क्षेत्र है, जहां ब्रैंड्स गेम्स के भीतर विज्ञापनों और प्रायोजित आयोजनों के जरिए Gen Z गेमर्स तक अपनी पहुंच बना रहे हैं।

EY की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की क्रिएटर इकोनॉमी का आकार 2024 में करीब 12,500 करोड़ रुपये था, जिसके 2030 तक बढ़कर 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। वहीं, BCG की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय क्रिएटर इकोनॉमी 2030 तक उपभोक्ता खर्च को 1 ट्रिलियन डॉलर तक प्रभावित कर सकती है, जो इसकी बढ़ती ताकत को दर्शाता है।

दरअसल, Gen Z ने मार्केटिंग के पुराने नियमों को पूरी तरह बदल दिया है। अब ब्रैंड्स सिर्फ उत्पाद नहीं बेचते, बल्कि रिश्ते, अनुभव और भरोसा बेचते हैं। जो ब्रैंड इस पीढ़ी से दोस्त की तरह संवाद करना सीखेगा, उनकी भाषा और संस्कृति को समझेगा, सामाजिक मुद्दों पर अपनी जिम्मेदारी दिखाएगा और माइक्रो-इन्फ्लुएंसर्स की ताकत का सही इस्तेमाल करेगा, वही आने वाले वर्षों में मार्केट में बढ़त हासिल कर सकेगा।

भारत में 37.7 करोड़ से अधिक Gen Z उपभोक्ता हैं। 2035 तक उनकी सामूहिक खर्च करने की क्षमता 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है और वे रोजाना औसतन चार घंटे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिताते हैं। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि Gen Z सिर्फ एक उपभोक्ता वर्ग नहीं है, बल्कि वह पीढ़ी है जो आने वाले समय में मार्केट और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगी।

 

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सिर्फ ब्रैंड नहीं, पूरा बिजनेस समझिए; तभी CMO से CEO बनने का रास्ता खुलेगा: एन. एस. सतीश

e4m Pitch CMO Summit में हायर एप्लायंसेज इंडिया के प्रेजिडेंट एन. एस. सतीश ने ऐसा संबोधन दिया, जो सिर्फ मार्केटिंग कैंपेन की बात नहीं था, बल्कि भविष्य के बिजनेस लीडर को तैयार करने का एक रोडमैप था।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 05 June, 2026
Last Modified:
Friday, 05 June, 2026
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e4m Pitch CMO Summit में हायर एप्लायंसेज इंडिया के प्रेजिडेंट एन. एस. सतीश ने ऐसा संबोधन दिया, जो सिर्फ मार्केटिंग कैंपेन की बात नहीं था, बल्कि भविष्य के बिजनेस लीडर को तैयार करने का एक रोडमैप था।

उन्होंने साफ कहा कि आने वाले समय का CMO (Chief Marketing Officer) सिर्फ ब्रैंड का रखवाला बनकर नहीं रह सकता। अगर उसे CEO की कुर्सी तक पहुंचना है, तो उसे ग्राहक, प्रॉफिट एंड लॉस (P&L), प्रोडक्ट, सर्विस, डिस्ट्रीब्यूशन चैनल और तेजी से बदलते उपभोक्ता व्यवहार को गहराई से समझना होगा।

सतीश का संबोधन काफी व्यक्तिगत, बेबाक और उपभोक्ता कारोबार की वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ था। उन्होंने ग्राहक शिकायतों से लेकर क्विक कॉमर्स तक, D2C ब्रैंड्स के बढ़ते प्रभाव से लेकर प्रोडक्ट डिजाइन तक और ग्रामीण बाजारों में अपने अनुभवों से लेकर युवाओं व इंटर्न्स के साथ हुई बातचीत तक कई उदाहरण साझा किए।

उनके पूरे संबोधन का सबसे अहम संदेश यह था कि ब्रैंड्स को खुद को सिर्फ प्रोडक्ट बेचने वाली कंपनियां समझना बंद करना होगा और उपभोक्ताओं की समस्याओं का समाधान देने वाली संस्था के रूप में देखना होगा।

उन्होंने कहा, “आप यह नहीं सोच सकते कि आप सिर्फ एक रेफ्रिजरेटर बेच रहे हैं। आपको यह सोचना होगा कि आप लोगों को बेहतर कूलिंग समाधान दे रहे हैं या उनका खाना ताजा रखने में मदद कर रहे हैं। इसी तरह आप सिर्फ एयर कंडीशनर नहीं बेच रहे, बल्कि लोगों के घरों को आरामदायक बना रहे हैं।”

सतीश के मुताबिक, यहीं से आधुनिक CMO की भूमिका सिर्फ कम्युनिकेशन तक सीमित नहीं रहती। आज मार्केटिंग उपभोक्ता की समझ, प्रोडक्ट इनोवेशन, सर्विस डिलीवरी, डिजिटल कॉमर्स और बिजनेस ग्रोथ के बीच का केंद्र बन चुकी है। जो CMO सिर्फ विज्ञापन और कैंपेन समझता है, उसकी भूमिका सीमित रह जाएगी, लेकिन जो पूरे बिजनेस को समझता है, वही आगे चलकर CEO बन सकता है।

उन्होंने कहा कि आज ग्राहक का खरीदारी का सफर पहले जैसा सीधा नहीं रह गया है। पहले ग्राहक किसी डीलर के स्टोर पर जाता था और काफी हद तक सेल्समैन की सलाह पर निर्भर रहता था। लेकिन अब ग्राहक YouTube, सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स रिव्यू, परिवार के WhatsApp ग्रुप और दोस्तों की सलाह जैसी कई जगहों से जानकारी जुटाकर आता है।

सतीश ने कहा, “आज का ग्राहक हर जगह जाता है। आप यह नहीं बता सकते कि वह कहां जाएगा और क्या करेगा। इसलिए आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि हर टचपॉइंट पर आपका ब्रैंड सही तरीके से मौजूद हो।”

उन्होंने यह भी बताया कि हैयर अपने उत्पादों के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी कंपनियों के उत्पादों की नकारात्मक समीक्षाओं का भी गहराई से अध्ययन करता है। इससे कंपनी को यह समझने में मदद मिलती है कि ग्राहक वास्तव में किन समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई बार यही शिकायतें नए इनोवेशन की शुरुआत बन जाती हैं।

उदाहरण देते हुए उन्होंने वॉशर-ड्रायर कैटेगरी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ग्राहक चार घंटे तक चलने वाले वॉश और ड्राई साइकिल से परेशान रहते हैं। इसलिए हैयर ड्राइंग टाइम को काफी कम करने पर काम कर रहा है, क्योंकि असली मुद्दा मशीन नहीं, बल्कि ग्राहक की सुविधा है।

सतीश ने ब्रैंड निर्माण में आफ्टर-सेल्स सर्विस की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किचन एप्लायंसेज जैसी श्रेणियों में यदि कोई उत्पाद खराब हो जाए तो घर का पूरा कामकाज प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि हैयर हर शहर में अपने हब्स (Hobs) नहीं बेचता। कंपनी पहले यह सुनिश्चित करती है कि वहां उत्पाद को सपोर्ट करने के लिए पर्याप्त सर्विस इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हो।

उन्होंने कहा कि इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा सबक फुर्ती और तेजी (Agility) है। जैसे-जैसे कंपनियां बड़ी होती हैं, उनकी प्रक्रियाएं और नीतियां कई बार उन्हें धीमा बना देती हैं। लेकिन D2C ब्रैंड्स, क्विक कॉमर्स और डिजिटल-फर्स्ट बाजार के दौर में यह बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

सतीश ने कहा, “अगर आपकी संस्था में फुर्ती नहीं है, तो आप खत्म हो चुके हैं।”

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने एक ऐसी बात भी कही, जिसने सभी का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा, “अनुभव कई बार बाधा बन जाता है।”

हालांकि उन्होंने इसे नकारात्मक अर्थ में नहीं कहा। उनका मतलब था कि कई बार पुरानी सफलताएं हमें नए बदलावों को देखने से रोक देती हैं। इसलिए आने वाली पीढ़ी के मार्केटिंग लीडर्स को लगातार सीखने, पुरानी चीजों को छोड़ने और ग्राहकों की बात ध्यान से सुनने की आदत विकसित करनी होगी।

अपने संबोधन के अंत में सतीश ने CMO की भूमिका को नए नजरिए से परिभाषित किया। उनके अनुसार भविष्य का CMO सिर्फ ब्रैंड बनाने वाला व्यक्ति नहीं होगा, बल्कि वह ग्राहक को इतनी गहराई से समझेगा कि प्रोडक्ट, सर्विस, कॉमर्स, ग्रोथ और P&L जैसे बिजनेस के अहम फैसलों को भी प्रभावित कर सके।

उन्होंने कहा कि वही CMO आगे चलकर CEO बनने की क्षमता रखता है।

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‘Imaging Endpoints’ ने श्रीकांत अय्यप्पन को सौंपी ग्लोबल मार्केटिंग की कमान

इस भूमिका में वह कंपनी की ग्लोबल मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का नेतृत्व करेंगे और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मार्केट्स में ब्रैंड की मौजूदगी को मजबूत बनाने की दिशा में काम करेंगे।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 02 June, 2026
Last Modified:
Tuesday, 02 June, 2026
Srikanth Ayyappan

ऑन्कोलॉजी (कैंसर) पर केंद्रित इमेजिंग कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (CRO) इमेजिंग एंडपॉइंट्स (Imaging Endpoints) ने श्रीकांत अय्यप्पन को एसोसिएट वाइस प्रेजिडेंट (ग्लोबल मार्केटिंग) नियुक्त किया है। इस भूमिका में वह कंपनी की ग्लोबल मार्केटिंग स्ट्रैटेजी का नेतृत्व करेंगे और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मार्केट्स में ब्रैंड की मौजूदगी को मजबूत बनाने की दिशा में काम करेंगे।

कंपनी के अनुसार, श्रीकांत अय्यप्पन का मुख्य फोकस कंपनी की पहचान और पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ प्रायोजकों, साझेदारों तथा इंडस्ट्री से जुड़े विभिन्न स्टेकहोल्डर्स के साथ जुड़ाव को और मजबूत बनाना होगा।

अपनी नई जिम्मेदारी पर प्रतिक्रिया देते हुए श्रीकांत अय्यप्पन ने कहा कि क्लीनिकल रिसर्च का क्षेत्र इमेजिंग तकनीक, डेटा साइंस और प्रिसिजन मेडिसिन में हो रही प्रगति के कारण एक परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि इमेजिंग एंडपॉइंट्स कैंसर संबंधी दवाओं के विकास को उन्नत इमेजिंग समाधानों के माध्यम से महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान कर रही है और वह कंपनी की निरंतर वृद्धि, वैश्विक पहचान तथा लाइफ साइंसेज इकोसिस्टम में इसके प्रभाव को और मजबूत बनाने में योगदान देने के लिए उत्साहित हैं।

बता दें कि इमेजिंग एंडपॉइंट्स कैंसर अनुसंधान और दवा विकास से जुड़े क्लीनिकल ट्रायल्स के लिए इमेजिंग आधारित समाधान उपलब्ध कराती है। कंपनी वैश्विक स्तर पर फार्मास्यूटिकल, बायोटेक और रिसर्च संगठनों के साथ मिलकर काम करती है। ऐसे में श्रीकांत अय्यप्पन की नियुक्ति को कंपनी की वैश्विक विस्तार रणनीति और ब्रैंड सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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आदित्य बिड़ला फैशन एंड रिटेल से जुड़े सुचित काकर, संभालेंगे बड़ी जिम्मेदारी

फ्रांस की मशहूर लग्जरी डिपार्टमेंट स्टोर चेन Galeries Lafayette ने हाल ही में भारत में पहली बार एंट्री की है। ऐसे में सुचित काकर की नियुक्ति को कंपनी के लिए अहम माना जा रहा है।

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Published - Thursday, 28 May, 2026
Last Modified:
Thursday, 28 May, 2026
Suchit Kakar

फैशन और रिटेल सेक्टर की प्रमुख कंपनी आदित्य बिड़ला फैशन एंड रिटेल (ABFRL) ने सुचित काकर (Suchit Kakar) को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। वह कंपनी में Senior Manager, Brand & Customer Experience for Galeries Lafayette India के तौर पर शामिल हुए हैं।

फ्रांस की मशहूर लग्जरी डिपार्टमेंट स्टोर चेन Galeries Lafayette ने हाल ही में भारत में पहली बार एंट्री की है। ऐसे में सुचित काकर की नियुक्ति को कंपनी के लिए अहम माना जा रहा है।

सुचित काकर इससे पहले ब्रैंड कंसल्टिंग कंपनी Landor के साथ जुड़े हुए थे। यहां उन्होंने करीब छह वर्षों तक काम किया और हाल ही में Senior Strategist, Experience Strategy Lead के पद से इस्तीफा दिया।

सुचित काकर ने अपनी नई पारी की जानकारी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए साझा की। उन्होंने बताया कि यह उनके करियर का पहला मौका है, जब वह क्लाइंट साइड की भूमिका में काम करेंगे।

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KFC India में सौरदीप सरकार की एंट्री, Growth & Market Planning की मिली कमान

KFC India जॉइन करने से पहले सौरदीप सरकार करीब चार वर्षों तक ब्लिंकिट से जुड़े रहे। वहां वह एसोसिएट डायरेक्टर और हेड (Growth and Expansion)– New Formats + Bistro के पद पर कार्यरत थे।

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Published - Thursday, 28 May, 2026
Last Modified:
Thursday, 28 May, 2026
Souradip Sarkar

क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म ब्लिंकिट (Blinkit) में लंबे समय तक अहम जिम्मेदारियां निभाने वाले सौरदीप सरकार (Souradip Sarkar) ने अब KFC India जॉइन कर लिया है। उन्हें कंपनी में हेड (Growth & Market Planning) की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

सौरदीप सरकार ने लिंक्डइन पोस्ट के जरिए अपनी नई पारी की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि ब्लिंकिट में बेहद संतोषजनक करियर के बाद वह KFC India से जुड़कर काफी उत्साहित हैं और नई जिम्मेदारी को लेकर आगे के सफर का इंतजार कर रहे हैं।

KFC India जॉइन करने से पहले सौरदीप सरकार करीब चार वर्षों तक ब्लिंकिट से जुड़े रहे। वहां वह एसोसिएट डायरेक्टर और हेड (Growth and Expansion)– New Formats + Bistro के पद पर कार्यरत थे। इस भूमिका में उन्होंने कंपनी के ग्रोथ और एक्सपेंशन से जुड़े कई महत्वपूर्ण काम संभाले।

ब्लिंकिट से पहले सौरदीप सरकार लगभग दो वर्षों तक Rockwell Automation के साथ भी जुड़े रहे। अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड (TCS) में भी काम किया।

शैक्षणिक पृष्ठभूमि की बात करें तो सौरदीप सरकार ने Management Development Institute (MDI), गुरुग्राम से मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। यहां उन्होंने मार्केटिंग और स्ट्रैटेजी में विशेषज्ञता हासिल की।

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इस बड़े पद पर Gruner ग्रुप से जुड़े सचिन पालीवाल

सचिन पालीवाल इससे पहले ‘रिपब्लिक वर्ल्ड’ में असिस्टेंट वाइस प्रेजिडेंट (AVP) के पद पर कार्यरत थे।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 21 May, 2026
Last Modified:
Thursday, 21 May, 2026
Sachin Paliwal

मीडिया, डिजिटल और ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री में लंबा अनुभव रखने वाले सचिन पालीवाल ने ग्रुनर ग्रुप (Gruner Group) में GM-मार्केटिंग एंड ब्रैंडिंग के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने लिंक्डइन पोस्ट के जरिए अपनी नई पारी की जानकारी साझा की।

सचिन पालीवाल इससे पहले ‘रिपब्लिक वर्ल्ड’ में असिस्टेंट वाइस प्रेजिडेंट (AVP) के पद पर कार्यरत थे। मार्केटिंग, ब्रैंड स्ट्रैटेजी और ब्रैंड पोजिशनिंग के क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। माना जा रहा है कि उनकी नियुक्ति से ग्रुनर ग्रुप की ब्रैंड मौजूदगी और मार्केटिंग रणनीतियों को नई मजबूती मिलेगी।

नई जिम्मेदारी को लेकर उत्साह जाहिर करते हुए सचिन पालीवाल ने अपने लिंक्डइन पोस्ट में कहा कि वह ग्रुनर ग्रुप में नई शुरुआत को लेकर बेहद उत्साहित हैं और आने वाले समय को लेकर सकारात्मक महसूस कर रहे हैं।

सचिन पालीवाल के पास 17 वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने मीडिया, डिजिटल और ब्रॉडकास्ट सेक्टर में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। अपने करियर के दौरान वह हिंदी न्यूज, हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल (GEC), इंग्लिश न्यूज, हिंदी मूवीज, हिंदी म्यूजिक, रीजनल GEC और होम शॉपिंग जैसे कई सेगमेंट्स में काम कर चुके हैं।

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