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हिंदी पत्रकारिता दिवस विशेष: पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का खास लेख

हिंदी अखबार के 190 साल पूरे हो गए। हर साल हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाकर रस्म अदा करते हैं...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

प्रमोद जोशी 

वरिष्ठ पत्रकार  ।। 

हिंदी अखबार के 191 साल पूरे हो गए। हर साल हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाकर रस्म अदा करते हैं। हमें पता है कि कानपुर से कोलकाता गए किन्हीं पं. जुगल किशोर शुक्ल ने उदंत मार्तंड’ अखबार शुरू किया था। यह अखबार बंद क्यों हुआउसके बाद के अखबार किस तरह निकलेइन अखबारों की और पत्रकारों की भूमिका जीवन और समाज में क्या थीइस बातों पर अध्ययन नहीं हुए। आजादी के पहले और आजादी के बाद उनकी भूमिका में क्या बदलाव आयाइस पर भी रोशनी नहीं पड़ी। आज ऐसे शोधों की जरूरत हैक्योंकि पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण दौर खत्म होने के बाद एक और महत्वपूर्ण दौर शुरू हो रहा है।

अखबारों से अवकाश लेने के कुछ साल पहले और उसके बाद हुए अनुभवों ने मेरी कुछ अवधारणाओं को बुनियादी तौर पर बदला है। सत्तर का दशक शुरू होते वक्त जब मैंने इसमें प्रवेश किया थातब मन रुमानियत से भरा था। जेब में पैसा नहीं थेपर लगता था कि दुनिया की नब्ज पर मेरा हाथ है। रात के दो बजे साइकिल उठाकर घर जाते समय ऐसा लगता था कि जो जानकारी मुझे है वह हरेक के पास नहीं है। हम दुनिया को शिखर पर बैठकर देख रहे थे। हमसे जो भी मिलता उसे जब पता लगता कि मैं पत्रकार हूं तो वह प्रशंसा-भाव से देखता था। उस दौर में पत्रकार होते ही काफी कम थे। बहुत कम शहरों से अखबार निकलते थे। टीवी था ही नहीं। सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले या इंटरवल में फिल्म्स डिवीजन के समाचार वृत्त दिखाए जाते थेजिनमें महीनों पुरानी घटनाओं की कवरेज होती थी।

विजुअल मीडिया का मतलब तब कुछ नहीं था। पर हम शहरों तक सीमित थे। कस्बों में कुछ अंशकालिक संवाददाता होते थेजो अक्सर शहर के प्रतिष्ठित वकीलअध्यापकसमाज-सेवी होते थे। आज उनकी जगह पूर्णकालिक लोग आ गए हैं। रॉबिन जेफ्री की किताब इंडियाज न्यूजपेपर रिवॉल्यूशन’ सन 2000 में प्रकाशित हुई थी।

इक्कीसवीं सदी के प्रवेश द्वार पर आकर किसी ने संजीदगी के साथ भारतीय भाषाओं के अखबारों की खैर-खबर ली। पिछले दो दशक में हिंदी पत्रकारिता ने काफी तेजी से कदम बढ़ाए। मीडिया हाउसों की सम्पदा बढ़ी और पत्रकारों का रसूख। इंडियन एक्सप्रेस की पावरलिस्ट में मीडिया से जुड़े नाम कुछ साल पहले आने लगे थे। शुरुआती नाम मालिकों के थे। फिर एंकरों के नाम जुड़े। अब हिंदी एंकरों को भी जगह मिलने लगी है। पर मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि पत्रकारों को लेकर जिस प्रशंसा-भाव’ का जिक्र मैंने पहले किया हैवह कम होने लगा है।

रॉबिन जेफ्री ने किताब की शुरुआत करते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि अखबारी क्रांति ने एक नए किस्म के लोकतंत्र को जन्म दिया है। उन्होंने 1993 में मद्रास एक्सप्रेस से आंध्र प्रदेश की अपनी एक यात्रा का जिक्र किया है। उनका एक सहयात्री एक पुलिस इंस्पेक्टर था। बातों-बातों में अखबारों की जिक्र हुआ तो पुलिस वाले ने कहाअखबारों ने हमारा काम मुश्किल कर दिया है। पहले गांव में पुलिस जाती थी तो गांव वाले डरते थे। पर अब नहीं डरते। बीस साल पहले वह बात नहीं थी। तब सबसे नजदीकी तेलुगु अखबार तकरीबन 300 किलोमीटर दूर विजयवाड़ा से आता था। सन 1973 में ईनाडु का जन्म भी नहीं हुआ थापर 1993 में उस इंस्पेक्टर के हल्के में तिरुपति और अनंतपुर से अखबार के संस्करण निकलते थे।

सेवंती नायनन ने हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड’ में ग्रामीण क्षेत्रों के संवाद संकलन का रोचक वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि ग्रामीण क्षेत्र में अखबार से जुड़े कई काम एक जगह पर जुड़ गए। सेल्सविज्ञापनसमाचार संकलन और रिसर्च सब कोई एक व्यक्ति या परिवार कर रहा है। खबर लिखी नहीं एकत्र की जा रही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के कांकेर-जगदलपुर हाइवे पर पड़ने वाले गांव बानपुरी की दुकान में लगे साइनबोर्ड का जिक्र किया हैजिसमें लिखा है- आइए अपनी खबरें यहां जमा कराइए।’ यह विवरण करीब पन्द्रह साल पहले का है। आज की स्थितियां और ज्यादा बदल चुकी हैं। कवरेज में टीवी का हिस्सा बढ़ा है। और उसमें कुछ नई प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ है।

दो साल मुझे आगरा में एक समारोह में जाने का मौका मिलाजहां इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े ऐसे पत्रकार मिलेजिन्हें उनका संस्थान वेतन नहीं देताबल्कि कमाकर लाने का वचन लेता है और बदले में कमीशन देता है। इनसे जुड़े पत्रकार किसी संस्थान से पत्रकारिता की डिग्री लेकर आते हैं। वे अफसोस के साथ पूछते हैं कि हमारे पास विकल्प क्या हैखबरों के कारोबार की कहानियां बड़ी रोचक और अंतर्विरोधों से भरी हैं। इनके साथ लोग अलग-अलग वजह से जुड़े हैं। इनमें ऐसे लोग हैंजो तपस्या की तरह कष्ट सहते हुए खबरों को एकत्र करके भेजते हैं। नक्सली खौफसामंतों की नाराजगीऔर पुलिस की हिकारत जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना करके खबरें भेजने वाले पत्रकार हैं। और ऐसे भी हैंजो टैक्सी चलाते हैंरास्ते में कोई सरकारी मुलाजिम परेशान न करे इसलिए प्रेस का कार्ड जेब में रखते हैं। ऐसे भी हैं जो पत्रकारिता की आड़ में वसूलीब्लैकमेलिंग और दूसरे अपराधों को चलाते हैं।

अखबारों ने गांवों तक प्रवेश करके लोगों को ताकतवर बनाया। पाठकों के साथ पत्रकार भी ताकतवर बने। पत्रकारों का रसूख बढ़ा हैपर सम्मान कम हुआ है। वह प्रशंसा-भाव’ बढ़ने के बजाय कम क्यों हुआरॉबिन जेफ्री की ट्रेन यात्रा के 23 साल बाद आज कहानी और भी बदली है। मोरल पुलिसिंगखाप पंचायतोंजातीय भेदभावों और साम्प्रदायिक विद्वेष के किस्से बदस्तूर हैं। इनकी प्रतिरोधी ताकतें भी खड़ी हुई हैंजो नई पत्रकारिता की देन हैं। लोगों ने मीडिया की ताकत को पहचाना और अपनी ताकत को भी। मीडिया और राजनीति के लिहाज से पिछले सात साल गर्द-गुबार से भरे गुजरे हैं। इस दौरान तमाम नए चैनल खुले और बंद हुए।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए। खासतौर से अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान यह बात भी कही गई कि भ्रष्ट-व्यवस्था में मीडिया की भूमिका भी है। लोग मीडिया से उम्मीद करते हैं कि वह जनता की ओर से व्यवस्था से लड़ेगा। पर मीडिया व्यवस्था का हिस्सा है और कारोबार भी। पत्रकारिता औद्योगिक क्रांति की देन है।

मार्शल मैकलुहान इसे पहला व्यावसायिक औद्योगिक उत्पाद मानते हैं। अखबार नबीसी के वजूद में आने की दूसरी वजह है लोकतंत्र। वह भी औद्योगिक क्रांति की देन है। यह औद्योगिक क्रांति अगली छलांग भरने जा रही हैवह भी हमारे इलाके में। पर हम इसके सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों को पढ़ नहीं पा रहे हैं। अखबार हमारे पाठक का विश्वकोश है। वह पाठक जमीन से आसमान तक की बातों को जानना चाहता हैहम उसे फैशन परेड की तस्वीरेंपार्टियांमस्ती वगैरह पेश कर रहे हैं। वह भी उसे चाहिएपर उससे ज्यादा की उसे जरूरत है।

एक जमाना था जब पाठकों के लिए अखबार में छपा पत्थर की लकीर होता था। पाठक का गहरा भरोसा उस पर था। भरोसे का टूटना खराब खबर है। पाठकदर्शक या श्रोता का इतिहास-बोधसांस्कृतिक समझ और जीवन दर्शन गढ़ने में हमारी भूमिका है। यह भूमिका जारी रहेगीक्योंकि लोकतंत्र खत्म नहीं होगा।  


 

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