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हिंदी अखबारों के सामने जनसरोकार की पत्रकारिता बड़ी चुनौती है: वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष चतुर्वेदी
एक तो हिंदी अखबारों ने जनसरोकार की पत्रकारिता करना बंद कर दिया है, लोगों से जुड़े मुद्दे उठाना बंद कर दिया है...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago
आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक
प्रभात खबर ।।
एक तो हिंदी अखबारों ने जनसरोकार की पत्रकारिता करना बंद कर दिया है, लोगों से जुड़े मुद्दे उठाना बंद कर दिया है। दूसरी बड़ी चुनौती है कि हिंदी अखबारों में विषयों की विविधता का अभाव है।
दो उदाहरण देना चाहूंगा। चीन ने हाल में वन रोड, वन बेल्ट जैसा सम्मेलन आयोजित किया। इसे इस सदी की सबसे बड़ी आर्थिक कूटनीतिक पहल माना जा रहा है। 2.5 खरब डॉलर की यह योजना यदि सिरे चढ़ गई तो इससे एशिया, यूरोप और अफ्रीका की 4.4 अरब आबादी प्रभावित होगी। भारत ने इसमें हिस्सा नहीं लिया, उसके अपने कारण हैं। लेकिन हिंदी अखबारों में इस विषय पर कोई बहस नहीं हो रही, पाठकों को कोई विशेष सामग्री नहीं दी जा रही। यह हम सबसे जुड़ी खबर है।
रैनसमवेयर वायरस का दुनिया भर के कंप्यूटर पर हमला हुआ। यह अब तक का सबसे बड़ा वायरस हमला माना गया। लगभग 150 देश इस वायरस से प्रभावित हुए। इससे कुछ देशों की स्वास्थ्य सेवाएं, तो कुछ की रेल व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। भारत में तकनीक का इस्तेमाल कितना बढ़ गया है, हम सब इससे परिचित हैं। हमारी बैंकिंग और रेल प्रणाली पूरी तरह से नेटवर्क पर आधारित है। इनमें से कोई भी व्यवस्था यदि थोड़ी सी भी प्रभावित हो जाए तो पूरे देश में हाहाकार मच जाए। हिंदी अखबार इस पर विशेष चर्चा नहीं करते।
यह सच है कि हिंदी पत्रकारों की राजनीति समझ कहीं अधिक है। इसका प्रभाव यह रहता है कि हिंदी अखबारों में राजनीतिक टिप्पणियों की भरमार रहती है, लेकिन नए विषयों पर सामग्री की भारी कमी रहती है।
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