होम / / क्या यही हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ है?

क्या यही हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ है?

आनंद प्रधान ।। क्या 188 साल की भरी-पूरी उम्र में कई उतार-चढ़ाव देख चुकी हिंदी पत्रकारिता का यह ‘स्वर्ण युग’ है? जाने-माने संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने बहुत पहले 8

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

आनंद प्रधान ।। क्या 188 साल की भरी-पूरी उम्र में कई उतार-चढ़ाव देख चुकी हिंदी पत्रकारिता का यह ‘स्वर्ण युग’ है? जाने-माने संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने बहुत पहले 80-90 के दशक में ही यह ऐलान कर दिया था कि यह हिंदी पत्रकारिता का ‘स्वर्ण युग’ है। बहुतेरे और भी संपादक और विश्लेषक इससे सहमत हैं। उनका तर्क है कि आज की हिंदी पत्रकारिता हिंदी न्यूज मीडिया उद्योग के विकास और विस्तार के साथ पहले से ज्यादा समृद्ध हुई है। उसके प्रभाव में वृद्धि हुई है। वह ज्यादा प्रोफेशनल हुई है, पत्रकारों के विषय और तकनीकी ज्ञान में वृद्धि हुई है, विशेषज्ञता के साथ उनके वेतन और सेवाशर्तों में उल्लेखनीय सुधार आया है और उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ के पक्षधरों के मुताबिक, न्यूज चैनलों की लोकप्रियता, विस्तार और प्रभाव ने बची-खुची कसर भी पूरी कर दी है क्योंकि वहां हिंदी न्यूज चैनलों का ही बोलबाला है। हिंदी न्यूज चैनलों और कुछ बड़े हिंदी अखबारों के संपादक/एंकर आज मीडिया जगत के बड़े स्टार हैं। उनकी लाखों-करोड़ों में सैलरी है। इसके अलावा हिंदी न्यूज चैनलों के आने से पत्रकारों के वेतन बेहतर हुए हैं। उनका यह भी कहना है कि दीन-हीन और खासकर आजादी के बाद सत्ता की चाटुकारिता करनेवाली हिंदी पत्रकारिता के तेवर और धार में भी तेजी आई है। आज वह ज्यादा बेलाग और सत्ता को आईना दिखानेवाली पत्रकारिता है। इसमें कोई शक नहीं है कि इनमें से कई दावे और तथ्य सही हैं लेकिन उन्हें एक परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने की जरूरत है। इनमें से कई दावे और तथ्य 1977 से पहले की हिंदी पत्रकारिता की तुलना में बेहतर दिखते हैं लेकिन वे तुलनात्मक हैं। दूसरे, इनमें से अधिकतर दावे और तथ्य हिंदी मीडिया उद्योग के ‘स्वर्णकाल’ की पुष्टि करते हैं लेकिन जरूरी नहीं है कि वे हिंदी पत्रकारिता के बारे में भी उतने ही सच हों। क्या हिंदी अखबारों का रंगीन होना, ग्लासी पेपर, बेहतर छपाई और उनका बढ़ता सर्कुलेशन या हिंदी चैनलों के प्रभाव और ग्लैमर को हिंदी पत्रकारिता के बेहतर होने का प्रमाण माना जा सकता है? हिंदी पत्रकारिता को पहचान देनेवाले बाबूराव विष्णुराव पराडकर के आजादी के पहले दिए गए ‘आछे दिन, पाछे गए’ वाले मशहूर भाषण को याद कीजिए जिसमें उन्होंने आज से कोई 75 साल पहले भविष्यवाणी कर दी थी कि भविष्य के अखबार ज्यादा रंगीन, बेहतर कागज और छपाई वाले होंगे लेकिन उनमें आत्मा नहीं होगी। सवाल यह है कि जिसे पत्रकारिता का ‘स्वर्णयुग’ बताया जाता है, उसके कई उल्लेखनीय और सकारात्मक पहलुओं को रेखांकित करने के बावजूद क्या यह सही नहीं है कि उसमें आत्मा नहीं है? अंग्रेजी के मशहूर लेखक आर्थर मिलर ने कभी एक अच्छे अखबार की परिभाषा करते हुए कहा था कि, ‘अच्छा अखबार वह है जिसमें देश खुद से बातें करता है।’ सवाल यह है कि क्या हमारे आकर्षक-रंगीन-प्रोफेशनल अखबारों और न्यूज चैनलों में देश खुद से बातें करता हुआ दिखाई देता है? क्या आज की हिंदी पत्रकारिता में पूरा देश, उसकी चिंताएं, उसके सरोकार, उसके मुद्दे और विचार दिखाई या सुनाई देते हैं? कितने हिंदी के अखबार/चैनल या उनके पत्रकार पूर्वोत्तर भारत, कश्मीर, उड़ीसा, दक्षिण भारत और पश्चिम भारत से रिपोर्टिंग कर रहे हैं? उसमें देश की सांस्कृतिक, एथनिक, भाषाई, जाति-वर्ग, धार्मिक विविधता और विचारों, मुद्दों, सरोकारों की बहुलता किस हद तक दिखती है? मुख्यधारा की यह हिंदी पत्रकारिता कितनी समावेशी और लोकतांत्रिक है? तात्पर्य यह कि उसमें भारतीय समाज के विभिन्न हिस्सों खासकर दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की कितनी भागीदारी है? क्या हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ का ऐलान करते हुए यह सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि हिंदी क्षेत्र के कितने जिला मुख्यालयों पर पूर्णकालिक महिला पत्रकार काम कर रही हैं? कितने हिंदी अखबारों और चैनलों की संपादक महिला या फिर दलित या अल्पसंख्यक हैं? क्या हिंदी पत्रकारिता के ‘स्वर्णयुग’ का मतलब सिर्फ पुरुष और वह भी समाज के अगड़े वर्गों से आनेवाले पत्रकार हैं? यही नहीं, हिंदी अखबारों और चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों के वेतन और सेवाशर्तों में सुधार का ‘स्वर्णयुग’ सिर्फ चुनिंदा अखबारों/चैनलों और उनके मुठ्ठी भर पत्रकारों तक सीमित है। कड़वी सच्चाई यह है कि छोटे-मंझोले से लेकर देश के सबसे ज्यादा पढ़े/देखे जानेवाले अखबारों/चैनलों के हजारों स्ट्रिंगरों के वेतन और सेवाशर्तों में कोई सुधार नहीं आया है। वह अभी भी अंधकार युग में हैं जहां बिना नियुक्ति पत्र, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा के वे काम करने को मजबूर हैं। उन्हें सांस्थानिक तौर पर भ्रष्ट होने और दलाली करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उनकी बदहाल हालत देखकर आप कह नहीं सकते हैं कि हिंदी अखबारों और चैनलों में बड़ी कॉरपोरेट पूंजी आई है, वे शेयर बाजार में लिस्टेड कम्पनियां हैं, उनके मुनाफे में हर साल वृद्धि हो रही है और वे ‘स्वर्णयुग’ में पहुंच गए हैं। उदाहरण के लिए हिंदी के बड़े अखबारों की मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने में आनाकानी को ही लीजिए। उनका तर्क है कि इस वेतन आयोग के मुताबिक तनख्वाहें दी गईं तो अखबार चलाना मुश्किल हो जाएगा। अखबार बंद हो जाएंगे। सवाल यह है कि अखबार या चैनल स्ट्रिंगरों की छोड़िए, अपने अधिकांश पूर्णकालिक पत्रकारों को भी बेहतर और सम्मानजनक वेतन देने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? क्या यह एक बड़ा कारण नहीं है कि हिंदी अखबारों/चैनलों में बेहतरीन युवा प्रतिभाएं आने के लिए तैयार नहीं हैं? आप मानें या न मानें लेकिन यह सच है कि आज हिंदी पत्रकारिता के कथित ‘स्वर्णयुग’ के बावजूद हिंदी क्षेत्र के कॉलेजों/विश्वविद्यालयों के सबसे प्रतिभाशाली और टॉपर छात्र-छात्राएं इसमें आने के लिए तैयार नहीं हैं या उनकी प्राथमिकता सूची में नहीं है। दूसरी ओर, हिंदी अखबारों और चैनलों में बेहतर और सरोकारी पत्रकारिता करने की जगह भी दिन पर दिन संकुचित और सीमित होती जा रही है। आश्चर्य नहीं कि आज हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा संकट उसके पत्रकारों की वह प्रोफेशल असंतुष्टि है जो उन्हें सृजनात्मक और सरोकारी पत्रकारिता करने का मौका न मिलने या सत्ता और कॉरपोरेट के सामने धार और तेवर के साथ खड़े न होने की वजह से पैदा हुई है। हैरानी की बात नहीं है कि हिंदी पत्रकारिता के इस ‘स्वर्णयुग’ में पत्रकारों की घुटन बढ़ी है, उनपर कॉरपोरेट दबाव बढ़े हैं और पेड न्यूज जैसे सांस्थानिक भ्रष्ट तरीकों के कारण ईमानदार रहने के विकल्प में घटे हैं। यही नहीं, हिंदी पत्रकारिता की अपनी मूल पहचान भी खतरे में है। वह न सिर्फ अंग्रेजी के अंधानुकरण में लगी हुई है बल्कि उसकी दिलचस्पी केवल अपमार्केट उपभोक्ताओं में है। उसे उस विशाल हिंदी समाज की चिंताओं की कोई परवाह नहीं है जो गरीब हैं, हाशिए पर हैं, बेहतर जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं चाहते हैं। लेकिन मुख्यधारा की हिंदी पत्रकारिता को उसकी कोई चिंता नहीं है। (लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान में एसोशिएट प्रोफेसर हैं। यह उनके निजी विचार हैं। उनका एक ब्लॉग भी है: http://teesraraasta।blogspot।in/ )   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।


टैग्स
सम्बंधित खबरें

हिंदी अखबारों के सामने जनसरोकार की पत्रकारिता बड़ी चुनौती है: वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष चतुर्वेदी

एक तो हिंदी अखबारों ने जनसरोकार की पत्रकारिता करना बंद कर दिया है, लोगों से जुड़े मुद्दे उठाना बंद कर दिया है...

30-May-2017

हिंदी अखबारों के लिए विश्वसनीयता बचाना ही चुनौती है: राजीव सचान, एसोसिएट एडिटर, दैनिक जागरण

आज भी देश की बड़ी आबादी हिंदी भाषा ही समझती है, ऐसे में हिंदी मीडिया विशेषकर हिंदी अखबार ही उनके लिए सूचना पाने का जरिया होते हैं...

30-May-2017

हिंदी पत्रकारों को इस समय का फायदा उठाना चाहिए, बोले हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक(हिंदी)

मेरा मानना है कि हिंदी पत्रकारिता मजबूत तौर पर खड़ी है और कहीं भी इसके सर्वाइवल पर कोई सवाल नहीं है

30-May-2017

'अखबार आज पाठक की जरूरत नहीं बल्कि आदत की वजह से खरीदा जाता है’

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। आज हिंदी का ह्रास और पत्रकारिता का अवमूल्यन हो रहा है। अखबार आज पाठक की जरूरत नहीं बल्कि आदत की वजह से खरीदा जाता है। ये बात हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए जाने-माने टिप्पणीकार, पद्मश्री प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने कही। संगोष्ठी में मुख्य वक

01-June-2016

न रुकी, न रुकेगी हिंदी पत्रकारिता: शशि शेखर, प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान

‘लोकतंत्र के लिए जितनी जरूरी स्वस्थ राजनीति है, उतनी ही जरूरत स्वतंत्र पत्रकारिता की है। अपनी इस आजादी के लिए हम जूझते आए हैं, आगे भी जूझते रहेंगे। कुछ दिक्कतें जरूर हैं, पर रास्ते की दुश्वारियों की न हमारे पुरखों ने परवाह की, न हम करेंगे।’ हिंदी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान में अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दुस्तान अखबार के समूह सं

30-May-2016


बड़ी खबरें

दुनिया को अलविदा कह गए वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व राज्यसभा सांसद एच.के. दुआ

वरिष्ठ पत्रकार, राजनयिक और पूर्व राज्यसभा सांसद एच.के. दुआ का बुधवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।

3 hours ago

BSE व NSE ने इस मामले में 'बालाजी टेलीफिल्म्स' पर लगाया जुर्माना

टीवी और फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स (Balaji Telefilms Limited) पर स्टॉक एक्सचेंज ने जुर्माना लगाया है।

1 day ago

मैडिसन मीडिया सिग्मा की CEO वनिता केसवानी ने छोड़ा पद

मीडिया इंडस्ट्री से एक बड़ी खबर सामने आई है। वनिता केसवानी ने मैडिसन मीडिया सिग्मा (Madison Media Sigma) के सीईओ पद से इस्तीफा दे दिया है।

1 day ago

क्या पाकिस्तान अफगानिस्तान को हरा पाएगा: रजत शर्मा

तालिबान ने कहा कि उसके हमले में 55 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, इनमें से 23 सैनिकों की लाशें भी अफगान लड़ाके अपने साथ अफगानिस्तान ले गए।

1 day ago

वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी में शाजिया फ़ज़ल को मिली ये बड़ी जिम्मेदारी

ग्लोबल मीडिया और एंटरटेनमेंट कंपनी वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी (Warner Bros. Discovery) में शाजिया फ़ज़ल को बड़ी जिम्मेदारी मिली है

1 day ago