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न्यूज18 इंडिया के कंसल्टिंग एडिटर प्रबल प्रताप सिंह संग खास बातचीत....

अभिषेक मेहरोत्रा संपादकीय प्रभारी

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

अभिषेक मेहरोत्रा

संपादकीय प्रभारी

समाचार4मीडिया.कॉम

हिंदी के जाने-पहचाने टेलिविजन पत्रकारों में से एक प्रबल प्रताप सिंह इन दिनों ‘न्यूज18 इंडिया’ (पहले IBN7) के साथ जुड़े हुए हैं। वे यहां कंसल्टिंग एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। प्रबल प्रताप सिंह लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। 'न्यूज18 इंडिया' जॉइन करने से पहले वे कई मीडिया संस्थानो के साथ बतौर सलाहाकार जुड़े रह चुके हैं। रिपोर्टिंग के जरिए ही अपनी अलग पहचान बनाने वाले प्रबल प्रताप ने पत्रकारिता में कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं, लेकिन 'न्यूज18 इंडिया' में जब उनकी जिम्मेदारी और अलग-अलग मुद्दों पर उनकी राय को लेकर समाचार4मीडिया के संपादकीय प्रभारी ने उनसे मुलाकात की तो उन्होंने कई मुश्किल और विवादित सवालों का जवाब भी बड़ी शालीनता से दिया। पढ़िए इंटरव्यू के मुख्य अंश:

टीवी की खबरों का क्या इम्पैक्ट होता है?

प्रबल प्रताप सिंह ने बताया कि जब देश में नोटबंदी लागू हुई तो कालेधन को लेकर पाकिस्तानी कलाकारों पर हमने अपने ‘कच्चा चिट्ठा’ प्रोग्राम में एक स्टिंग चलाया था। यह पाकिस्तान के पांच बड़े कलाकारों पर किया गया था, जिनमें फवाद खान, मावरा होकेन, इमरान अब्बास, राहत फतेह अली खान और शफकत अमानत अली के नाम शामिल थे। इनमें से दो कलाकारों से तो पाकिस्तान में सीधे फोन पर बातचीत हुई थी, इस बातचीत में उन्होंने बताया था कि व्हाइट को ब्लैक कैसे करना है। ये काफी साहसिक स्टिंग था और इस पर एक्शन भी हुआ है। क्राइम ब्रांच ने आयकर विभाग के साथ मिलकर पाक कलाकार राहत फतेह अली खान और इमरान अब्बास के मैनेजरों के ऑफिस और अन्य ठिकानों पर छापेमारी की।

क्या स्टिंग से आपको टीआरपी मिलती है?

हर तरह के स्टिंग से टीआरपी नहीं मिलती है, लेकिन कुछ खास स्टिंग होते हैं जो टीआरपी में अच्छी भूमिका निभाते हैं, जैसे कालेधन पर पाक कलाकारों का किया गया स्टिंग, नोटबंदी पर किया गया स्टिंग आदि।

...तो क्या ये कहा जा सकता है कि ऐसे स्टिंग ही टीआरपी दिलाते हैं, जो आमजन से जुड़े हों?

जी हां, लेकिन  स्टिंग ऐसे होने चाहिए, जिनका स्केल बहुत बड़ा हो।

चैनल की रिब्रैंडिंग के बाद प्रोग्रामों में किस तरह के बदलाव हुए हैं?

हमने कुछ डेली क्राइम शो को नए कलेवर में पेश किया, बतौर ‘हादसा’ को रिनेम किया है, वीकली क्राइम शो ‘साजिश’ को भी रिनेम किया है। एक आउटडोर शो शुरू किया है, जो हर दिन शाम 5 बजे से 6 बजे तक होता है और इसे प्रतीक त्रिवेदी करते हैं  'हम तो पूछेंगे', आर-पार’ और ‘डंके की चोट पर’ पहले से प्रसारित हो रहा है और ये शोज खूब लोकप्रिय भी हैं। हाल ही में कई शोज 'सौ बात की एक बात' से ‘कच्चा चिट्ठा’ तक शुरू किए हैं। । 'सौ बात की एक बात' जहां किशोर अजवाणी होस्ट करते हैं, वहीं कच्चा चिट्ठा प्रोग्राम को प्रीति रघुनंदन होस्ट करती हैं, जो अभी दो महीने पहले ही इस संस्थान से जुड़ीं हैं। ये शो भी खूब पसंद किया जा रहा है।

आगामी चुनावों पर आपकी क्या तैयारी है?

अभी तक हम चैनल के रिलॉन्च में व्यस्त थे, लेकिन यूपी चुनावों को लेकर हम  अभी तैयार कर रहे हैं। वैसे, रेगुलर शोज के जरिए भी इस पर फोकस किया जा रहा है।

क्या डिबेट शो से ज्यादा आउटडोर शो टीआरपी लाते हैं और क्या वे ज्यादा पसंद भी आते हैं?

देखिए, सवाल टीआरपी का नहीं है। मेरा मानना है कि यदि आप आउटडोर टेलिविजन करते हैं, तो वो ज्यादा इम्पैक्ट डालता है। चूंकि हमारे डिबेट शो इनहाउस होते हैं, यदि हम ये डिबेट शो बाहर से करते हैं तो हमारे लिए ज्यादा अच्छा होता है और इसका फोकस भी केवल आमजन से होता है। हाल ही में यूपी में ट्रेन दुर्घटना हुई, तो हमने अपना डिबेट शो वहां से कराया। इससे ये होता है कि जो लोग इस स्टोरी से जुड़े होते हैं, आप उनके पास सीधे पहुंचते हैं, बजाय इसके कि आप उनको अपने स्टूडियो में बुलाएं।

आज ज्यादातर चैनल प्राइम टाइम के समय पैनल डिस्कशन शो के बजाय खबरों का बुलेटिन पेश कर रहे हैं, ये बदलाव क्यों?

देखिए, ये पिछले डेढ़ साल से ट्रेंड बन गया था, लेकिन जिस चीज के लिए आप जाने जाते हैं, यदि वहीं नहीं दिखाएंगे तो आपको कौन देखेगा। इसलिए खबरों की ओर लौटना पड़ा। पत्रकारिता का मूल खबर ही है।

 

नोटबंदी का मीडिया पर कितना असर पड़ा है?

देखिए, इसका प्रभाव रेवेन्यू पर कितना पड़ेगा, ये मैं कैसे बता सकता हूं। नोटबंदी का प्रभाव आगे क्या होगा, जब सरकार नहीं बता पा रही है, जानकार नहीं बता पा रहे हैं, तो मैं भी इसका आकलन कैसे कर सकता हूं। पॉजिटिव-निगेटिव तो आने वाले समय के साथ पता चल जाएगा, लेकिन अभी इसमें समय लगेगा।

आज मीडिया की विश्वसनीयता में कमी आई है, ये कितना सही है?

देखिए, मुझे नहीं लगता कि मीडिया की विश्वसनीयता में बहुत ज्यादा कमी आई है। हां, ये देखने का नजरिया जरूर हो सकता है। यानी एक व्यक्ति किस नजरिये से चीजों को देखता है, और दूसरा व्यक्ति किस नजरिए से। इसलिए मैं नहीं कहूंगा कि मीडिया की विश्वसनीयता में कमी आई है।

आज के दौर में मीडिया-मीडिया से टकरा रहा है, एक एडिटर दूसरे एडिटर के कामों पर उंगली उठा रहा है, इस पर आप क्या कहेंगे?

देखिए, ये पहले भी होता था जब टेलिविजन नहीं था। अखबारों में काम करने वाले लोगों के बीच ऐसा होता था। लोग अलग-अलग विचारधाराओं से लेख लिखते थे। यानी तब भी विभिन्न सोच के लोग थे और आज भी हैं। लेकिन अगर कोई किसी पर पर्सनल अटैक करता है तो वो नहीं होना चाहिए।

ब्रेकिंग न्यूज में कुछ भी दिखाना, एक खबर को बार-बार दिखाना और हो-हल्ला करना, ये तीन सवाल अकसर टीवी जर्नलिज्म को  लेकर उठते हैं, इस पर आपकी क्या राय है?

देखिए, इतना बड़ा देश है यदि आप ब्रेकिंग नहीं चलाएंगे तो तुरंत घटने वाली खबरों का पता कैसे चलेगा और ऐसा नहीं है कि ब्रेकिंग न्यूज पर कोई गलत खबर चलती हो। अंतरराष्ट्रीय चैनलों पर भी ब्रेकिंग न्यूज चलती है और रही बात खबरों के रिपीटेशन की तो अकसर बड़ी खबरें ही बार-बार दिखाई जाती हैं। स्पीड न्यूज का कॉन्सेप्ट भी है, जिसके जरिए कई छोटी-छोटी कई शहरों की खबरें दिखाई जाती हैं।

आजकल एंकर्स के स्टाइल पर लोग डिस्कस कर रहे हैं, कोई चिल्लाता है तो कोई डराता है?

डिबेट शो में हो-हल्ला एक स्टाइल है और इसके भी अपने व्युअर्स हैं। हर एंकर का अपना एक स्टाइल है, जनता जिनके स्टाइल को पसंद करती है, वो शो लोकप्रिय होता है और लोग उसके बारे में बात करते हैं।

2014 में मोदी के आने के बाद से मीडिया में क्या बदलाव आया है?   

मुझे नहीं लगता है कि कोई बदलाव आया है। पहले भी मीडिया में नेशनलिज्म था और आज भी है।

सोशल मीडिया पर मीडिया दो फाड़ दिखता है, एक सरकार के साथ और दूसरा सरकार के खिलाफ, इस पर क्या कहेंगे?

सोशल मीडिया के बारे में मैं नहीं बोलूंगा, क्योंकि यहां पर बड़े ही माइनस टाइप के लोग हैं। आपको पता भी नहीं होगा कि कौन क्या है। कुछ लोग तो अपनी पहचान भी छुपाए रहते हैं। सोशल मीडिया वर्चुअल वर्ल्ड में है, कोई क्या लिख देता है और कौन लिख देता है? सबसे बड़ा सवाल यही तो है। जब भी शोज को सोशल मीडिया पर शेयर किया  जाता है, तो कई ऐसे लोग भी कमेंट करते हैं, जिन्होंने शो को पांच मिनट भी नहीं दिया होता है,  तो कोई कुछ भी लिख देता है। कई लोगों की पहचान ही सामने नहीं आती है।

जो खबर आज चैनल या अखबार न दिखाए या छापे, वो सोशल मीडिया पर आ जाती हैं और बाद में मीडिया पर इसे लेने का प्रेशर बढ़ जाता है, इस पर क्या राय है?

मुझे नहीं लगता, लेकिन अगर ऐसा है तो खबर की क्रेडिबिलिटी और वेरिफिकेशन के बाद ही टीवी उसे दिखाता है, क्योंकि वे एक जिम्मेदार माध्यम है।

टीवी की खबरों का सोशल मीडिया पर प्रमोट करने का कितना फायदा है?

टेलिविजन अभी मोबाइल पर  सरलता से उपलब्ध नहीं है, इसलिए टीवी देखने के लिए आपको घर में रहना पड़ेगा। लेकिन अगर आप इसको सोशल मीडिया पर डाल देते हैं तो सरलता से टीवी देखा जा सकता है।

न्यूज चैनल अकसर जनरल एंटरटेनमेंट चैनलों के शोज दिखाते हैं, क्या इससे टीआरपी मिलती है?

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ का एक सप्लिमेंट आता है ‘डेली टाइम्स’, वो भी तो यही है और वह इसलिए प्रकाशित करता है क्योंकि ये पब्लिक डिमांड है। न्यूज चैनलों के दर्शक भी किसी एक्टर की कहानी देखना चाहते हैं, एंटरटेनमेंट शोज के बारे में जानना चाहते हैं। इसलिए ये कह देना कि कंटेंट की कमी है तो ये गलत है। ये हमारे व्युअर्स की रिक्वायरमेंट है।

कुछ चैनल ने अपने एस्ट्रोलोजी शो बंद कर दिए हैं और कुछ अभी भी दिखा रहे हैं?

आप हमारा एस्ट्रोलोजी शो देखिए। जब इसे लॉन्च किया तो इसका नाम ही ‘कर्मपथ’ दिया, क्योंकि हमने कई एस्ट्रोलोजर्स से बात की और जिसे चुना उनका यही कहना है कि आपके स्टार बुलंद हो सकते है, लेकिन जब आप कर्म नहीं करेंगे तो इसका लाभ नहीं मिलेगा।

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