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जब तक कंटेंट लिखने का तरीका नहीं बदलेगा, पाठकों के दिल को नहीं छू सकते: अजय उपाध्याय

पत्रकारिता के क्षेत्र में कई दशकों से सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार अजय उपाध्याय ने अपने जीवन की इस यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

वरिष्ठ पत्रकार अजय उपाध्याय ने अपने जीवन में हमेशा अपनी शर्तों के साथ काम किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में कई दशकों से सक्रिय अजय उपाध्याय को प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों का लंबा अनुभव है। उन्होंने अपने जीवन की इस यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के मुख्य अंश-

अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताइए। मीडिया और समाचार पत्रों में रुचि कैसे पनपी?

मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर था। दरअसल, समाचार पत्रों में तो रुचि हमेशा से ही थी। पढ़ाई के दौरान ही ये चीज समझ आ गई थी कि मुझे तो मीडिया की दुनिया में ही जाना है। मैं उस वक्त अपनी नौकरी छोड़कर बनारस में चला गया था और सोचा कि अब कोई काम देखा जाएगा। उस समय काशी के साहित्यकार मनु शर्मा जी ने ‘आज‘ अखबार के संपादक शार्दुल विक्रम गुप्ता जी के पास मुझे भेजा था। वो मेरी पहली नौकरी थी। उस समय उस अखबार में काम करके बहुत कुछ सीखने को मिला, लेकिन एक समय बाद मुझे काशी की पत्रकारिता में एक ठहराव सा दिखाई दिया तो मैंने दिल्ली जाने का निर्णय किया। हालांकि यहां कुछ तकलीफ झेलनी पड़ी, लेकिन एक समय के बाद अच्छा काम मिला।

जैसा कि आपने बताया कि आप दिल्ली आ गए थे तो उसके बाद दिल्ली में आपको सबसे पहली नौकरी कैसे मिली और उसके बाद के अनुभव बताएं।

जैसा कि मैंने आपको कहा कि शुरू में कुछ तकलीफ हुई। एक सज्जन के साथ हमारी बात हुई थी कि वो मुझे एक ग्रुप जॉइन करवाने वाले हैं, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं तो साल भर बड़ी कठिनाई से गुजरा, लेकिन मैं तय करके आया था कि दिल्ली से वापस नहीं जाऊंगा। उसी दौरान डालमिया समूह द्वारा ‘संडे मेल‘ निकलता था तो मैंने वहां काम करना शुरू कर दिया था। उसके बाद मेरी यात्रा ठीक रही। इसके बाद मुझे ‘माया‘ पत्रिका में भी काम करने का मौका मिला और उसके बाद मुझे ‘दैनिक जागरण‘ का राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख बना दिया गया। ‘नवभारत‘ जब मुंबई में लॉन्च हुआ तो मैं उसका पहला संपादक था। मुझे ‘आजतक‘ में भी काम करने का मौका मिला और फिर मैं ‘हिंदुस्तान‘ चला गया।

वर्तमान समय और 90 के दशक की जब आप तुलना करते हैं तो क्या आपको लगता है कि उस समय काम करना अधिक कठिन था?

मेरा मानना है कि इस प्रकार की तुलना ठीक नहीं है। दरअसल, समय कैसा भी हो, चुनौती बनी रहती है। हम ये कभी भी नहीं कह सकते हैं कि उस समय के लोग काम नहीं किया करते थे या काम का बोझ आज नहीं है। काम तो हमेशा रहता है और जो इस चुनौती का डटकर सामना करता है, वो सफल होता है। मानव सभ्यता में ऐसी कई घटनाएं हैं, जिन्होंने मनुष्य को डरा दिया लेकिन उनका सामना डटकर किया गया। जब मैं ‘हिंदुस्तान‘ में था मैंने वहां भी मल्टीएडीशन न्यूज पेपर का प्रयोग किया। इसके अलावा पटना, दिल्ली और भागलपुर जैसी जगह में हमने अखबार को रिलॉन्च किया।

आप ‘हिंदुस्तान‘ के संपादक रहे। उन दिनों की क्या कोई ऐसी घटना याद आती है, जिसका प्रभाव कई दिनों तक जहन पर रहा हो?

मुझे ऐसा लगता है कि अमेरिका में 9/11 का हमला एक ऐतिहासिक घटना थी। उस समय किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक हवाई जहाज से भी आतंकी हमला करवाया जा सकता है। वो अपने आप में एक अलग तरह की घटना थी और देखा जाए तो उस घटना ने दुनिया को बताया कि कैसे तकनीक पर मानव की निर्भरता उस पर खतरा बनकर भी वापस आ सकती है। ये सोचा नहीं जा सकता था कि एक देश के प्रेजिडेंट को कुछ दिनों के लिए गायब ही कर दिया जाए।

वर्तमान समय में क्या आपको ऐसा लगता है कि पाठक सिर्फ अब लेख पढ़ने भर तक ही सीमित रह गया है और उसका बौद्धिक विकास नहीं हो रहा है?

देखिए, आम आदमी की भागीदारी से किसी भी समाचार पत्र की लोकप्रियता में इजाफा होता है और उसके हिसाब से बदलाव होने चाहिए लेकिन मैं आज भी ये मानता हूं कि बेस्ट कंटेंट वही है जो पाठक के दिलो दिमाग पर सवार होता है, उसके मन में जगह बना लेता है और उसको प्रभावित करता है। इस प्रकार के कंटेंट की रचना करने के लिए मनुष्य का अत्यंत बुद्धिमान होना जरूरी है। कई ऐसे समाचार पत्र थे जो 50 से अधिक पेज तक चले गए थे, लेकिन एक समय के बाद उन्हें भी संख्या कम करनी पड़ी है। पिछले 50 साल के इतिहास को आप अगर देखे तो कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन पर अधिक काम नहीं कर पाए। आज भी सरकारी योजनाओं पर पेज नहीं हैं, स्वास्थ्य पर अच्छे लेख नहीं हैं। कोरोना काल में हम सबने इस कमी को महसूस किया है। रोजगार एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर आज भी बहुत कम पढ़ने को मिलता है। रिसर्च करने का मतलब किसी अखबार को पढ़कर कुछ लिखने भर तक सीमित नहीं है, वो बुद्धि से जुड़ा है।

क्या वर्तमान में ग्राउंड रिपोर्टिंग की कमी महसूस होती है? क्या आपको ऐसा लगता है कि मीडिया राजनीति और ग्लैमर में खो गया है?

आज की पत्रकारिता में ऐसे कई काम हैं जो बड़े अच्छे हैं। हम जब काम करते थे तो कई काम अधूरे रह जाते थे लेकिन आज वो काम पूरे हैं। जैसे कि अगर उस वक्त कहीं कोई आग लग जाती थी तो हमें घटनाक्रम के लिए किसी और पर निर्भर होना पड़ता था क्योंकि उतनी तेजी से हमारे पास सूचना आना असंभव थी, लेकिन आज ऐसा नहीं है। वर्तमान में कहीं भी हो रही घटना का विश्लेषण आप मिनटों में कर सकने में कामयाब हुए हैं। हमारे समय में रिपोर्टर ग्राउंड पर जाता था और सुविधाओं के अभाव के बाद भी जो स्टोरी फाइल करता था और उसमें जो कथानक होता था, मैं उसे याद करता हूं। आज के समय में किसी भी घटना को समझाने के लिए जो कथानक है, वो ठीक नहीं है। कथा एक अलग चीज है और उसे कथानक में कहना एक अलग चीज, उसे इस प्रकार से कहना कि वो पाठक के दिल में घर कर जाए, उसकी कमी आज मैं महसूस करता हूँ। जब तक कंटेंट लिखने का तरीका नहीं बदलता, तब तक पाठक के दिल को छू नहीं सकते।

क्या आपको कभी ऐसा कोई किस्सा याद आता है, जिसे आप भूलते नहीं हैं?

जी बिल्कुल, दरअसल एक सैटेलाइट का लॉन्च था। पीएम के साथ हम सबको इसरो सेंटर जाना था और दोपहर को हम सब पुडुचेरि पहुंच गए। मुझे मेरे कुछ साथियों ने कहा कि अब प्रेसवार्ता है और हमें लगता है कि हमारे तमिल साथी कुछ उनके राज्य के बारे में सवाल करेंगे तो इधर अभी रुकने का कोई फायदा नहीं है लेकिन मैं रुका रहा। मेरे मन में कारगिल को लेकर कुछ सवाल थे। दरअसल, हमारा जम्मू का आदमी रोज घुसपैठ की खबर भेज रहा था और मैंने उसी पर सवाल किया। उन्होंने जवाब दिया की ये गंभीर घटना है और देश कड़ी कार्यवाही करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। उन्होंने हवाई हमले करने तक की बात उस प्रेस वार्ता में मेरे सवाल के जवाब में कहीं। उसके बाद अगले दिन जैसे ही हम श्रीहरिकोटा उस रॉकेट लॉन्च की कवरेज के लिए उतरे, हमें खबर मिलती है कि कारगिल में भारत ने घुसपैठियों पर हवाई हमले कर दिए हैं। ये घटना बड़ी रोचक है और इसलिए आपसे इसका जिक्र मैंने किया। नमस्कार।

समाचार4मीडिया के साथ अजय उपाध्याय की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।


टैग्स इंटरव्यू साक्षात्कार अजय उपाध्याय
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