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मोदी-नीतीश की जुगलबंदी को किस नजरिए से देखते हैं देश के वरिष्ठ संपादक...
अभिषेक मेहरोत्रा।। जिस तरह आज प्रधानमंत्री मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे की तारीफें कर
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
राजीव सचान, एसोसिएट एडिटर, दैनिक जागरण
देखिए राजनीति में कभी भी धुरंधर विरोधियों का मिलन होना हैरान नहीं करता है। अतीत में कांशीराम और मुलायम मिल चुके है, तो बंगाल में हमने धुर विरोधी ममता और वाम का मिलन भी देखा है। और वैसे भी सुशासन बाबू नीतीश का कुशासन के पर्याय रह चुके लालू के साथ लंबी पारी खेलना अस्वाभाविक है। आज देश की जनता भी गुड गवर्नेंस को समझ रही है, ऐसे में मुझे लगता है कि जदयू और बीजेपी में आने वाले समय में काफी नजदीकियां बढ़ेंगी।
एक जमाने में नीतीश कुमार के नरेंद्र मोदी से रिश्ते कुछ ज्यादा ही खराब थे। सनद रहे कि नीतीश उनके साथ तस्वीर तक खिंचवाने में परहेज करते थे। एक भोज सिर्फ इसलिए रद हुआ क्योंकि उसमें मोदी का आगमन होना था। उस समय नीतीश अटल, आडवाणी, यशवंत को पसंद करते थे, पर मोदी उन्हें बिल्कुल नहीं सुहाते थे। पर ये नीतीश की वैचारिक सोच नहीं थी, उनका निजी दुराग्रह था। पर एक पत्रकार होने के नाते मैं मानता हूं कि आपका निजी आग्रह-दुराग्रह किसी से भी हो सकता है, पर शिष्टाचार और मर्यादा हमेशा रहनी ही चाहिए। आज के दौर में नीतीश का दूसरा आयाम दिख रहा है। ये नई जुगलबंदी केंद्र और राज्य सरकार के परस्पर संबंधों के साथ-साथ सियासी रिश्ते की ओर भी इशारा कर रही है। नीतीश के मोदी के साथ रिश्ते रिवाइव होते दिख रहे है। इसके पीछे कोई तात्कालिक कारण तो नहीं दिख रहा है, पर भविष्य के राजनैतिक समीकरणों से इनकार भी नहीं किया जा सकता है।
ये बहुत ही रोचक डेवलपमेंट है। अलग-अलग विचारधाराओं के दो लोग एक सकारात्मक मुद्दे पर एकसाथ बात कर रहे है, ये राजनीति के लिए अच्छा संकते है लेकिन एक राजनैतिक विश्लेषक होने के चलते मैं इसे यहीं नहीं छोड़ूंगा। आने वाले समय यानी 2019 में यदि नीतीश और मोदी को बैसाखी की जरूरत पड़ेगी तो इस सियासी जुगलबंदी की अहम भूमिका तब नजर आ सकती है। देश की राजनीति के इस अहम विषय को आज शाम 8 बजे मेरे शो ‘हम तो पूछेंगे’ में विस्तार से भी समझा जा सकता है।
राजनीति अपने समीकरणों को अपने हिसाब से करने का फलसवां रखती है। नीतीश-मोदी की जुगलबंदी भी उनके इसी हुनर की बानगी है। दोनों अपनी इमेज बिल्डिंग स्ट्रैटजी के तहत काम कर रहे हैं। जहां नीतीश आज विपक्षी दलों के सुपरहीरो हैं। ऐसे में मोदी के लिए उनकी तारीफ सत्ता पक्ष के लिए सुकून है, तो दूसरी ओर मोदी द्वारा नीतीश की तारीफ नीतीश के लिए लालू पर प्रेशर टेटटिस का हिस्सा है। मोदी के नीतीश को लेकर सकारात्मक बोल जहां लालू पर दवाब बना रहे हैं तो नीतीश को उनकी ही सरकार में राहत देने वाले हैं। वैसे भी दोनों सुशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध की अपनी छवि को बनाए रखने के लिए भी इस तरह की जुगलबंदी पेश कर रहे हैं।
जिस तरह नोटबंदी के मसले पर नीतीश कुमार ने पीएम मोदी की पहल का समर्थन किया है, उसी अंदाज में आज मोदी ने नीतीश की प्रशंसा की है। एक बार नीतीश ने मोदा का भेजा चेक लौटा दिया था, ऐसे में अगर अब सकारात्मक रुख दिख रहा है, तो ये लोकतंत्र के लिए सेहतमंद होने की बात है। नेताओं के बीच रिश्ते सुधर रहे है, तो ये अच्छी बात ही है।
राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नही होता और न ही कोई स्थायी दोस्त होता है। इसका ताजा उदाहरण है नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की जुगलबंदी। प्रकाश पर्व पर दोनों के बॉडी लैंग्वेज ने साफ कर दिया कि आग इधर भी है औऱ आग उधर भी। अब किसी दिन ये दोनों खुशखबरी सुना दें तो अचरज नहीं। जब नीतीश कुमार से नोटबंदी पर मोदी की जमकर तारीफ की तब से कयास लग रहे हैं। वैसे भी नीतीश कुमार अपने नए सहयोगी परिवार से दुखी और चिंतित हैं,बीजेपी के साथ सत्ता में बिताए 8 साल, और लालू के साथ सत्ता का विष पीते पिछले एक -सवा साल में काफी फर्क है, और उसी फर्क के अहसास का नतीजा है यह जुगलबंदी। सत्ता में रहते हुए बड़े भाई की हैसियत से रहना और सत्ता में रहते हुए बंदिशों के बीच रहने में फर्क है।लेकिन एक बात पर गौर करना जरुरी है कि नीतीश कुमार ने जब मोदी का विरोध किया था तब पीएम की कुर्सी पर नजर थी और अब जब उनका साथ देंगे तब भी पीएम की कुर्सी पर नजर होगी।
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