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रेप के मामलों की रिपोर्टिंग पर क्या है वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त की राय, पढ़ें यहां...
<p style="text-align: justify;"><strong>समाचार</strong><strong>4</strong><strong>मीडिया ब्यूरो ।।</strong></p> <p style="text-align: justify;">'एनडीटीवी' (NDTV) की कंसल्टिंग एडिटर बरखा दत्त ने हिन्दुस्तान टाइम्स(HT) अखबार द्वारा चलाई गई एक स्पेशल सीरीज के तहत अपने कॉलम के जरिए लिखा है है कि किसी महिला के साथ दुष्कर्म की घटना को किसी तरह का तमाशा
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
'एनडीटीवी' (NDTV) की कंसल्टिंग एडिटर बरखा दत्त ने हिन्दुस्तान टाइम्स(HT) अखबार द्वारा चलाई गई एक स्पेशल सीरीज के तहत अपने कॉलम के जरिए लिखा है है कि किसी महिला के साथ दुष्कर्म की घटना को किसी तरह का तमाशा नहीं बनाना चाहिए। 'हिन्दुस्तान टाइम्स' (Hindustan Times) में छपे आर्टिकल में बरखा दत्त का कहना है कि किसी को भी निजता का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है और मीडिया को भी ऐसा करने से बचना चाहिए।
बरखा का कहना है, ‘इस तरह के संवेदशनील मामलों की रिपोर्टिंग करने का क्या बेहतर तरीका होना चाहिए, इससे पूर्व हमें यह चर्चा करनी होगी कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा। इस संवेदशनशील मुद्दे की रिपोर्टिंग काफी सावधानीपूर्वक करनी चाहिए। मैं मानती हूं कि जब तकरीबन बीस साल की उम्र में मैंने अपनी नौकरी शुरू की थी तो उस समय मैं महिलाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर काफी डिफेंसिव थी। मैं पॉलिटिक्स, हंगामा, दंगा, युद्ध आदि की रिपेार्टिंग करना चाहती थी। मेरा मानना था कि कोई यह न कहे कि एक महिला रिपोर्टर होने के नाते मैं यह नहीं कर सकती हूं।’
जब मुझे इस तरह की रिपोर्टिंग का सबसे पहला असाइ्नमेंट सौंपा गया था, वह राजस्थान के एक गांव में एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता महिला भंवरी देवी के साथ सामूहिक दुष्कर्म का मामला था, जो एक साल के बच्चे के विवाह का विरोध कर रही थी। इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा था। वह एक सरकारी कार्यक्रम से जुड़ी हुई थी, जिसका मकसद स्थानीय लोगों को इस तरह के मामलों के प्रति जागरूक करना था। भंवरी देवी के साथ दुष्कर्म करने वाले आरोपियों में उस बच्चे का पिता भी शामिल था। इस मामले में जज ने आरोपियों को बरी करने का प्रयास किया था, क्योंकि उसका मानना था कि ऊंची जाति के जिन लोगों पर आरोप लगा है, वह उस खास वर्ग की महिला को छुएंगे भी नहीं। वहीं भंवरी देवी को ही आरोपियों की धमकी के कारण गांव से बाहर डरकर रहना पड़ा। उसे सार्वजनिक नल से पानी भरने से भी वंचित कर दिया गया था। वह पहला असाइ्नमेंट था, जिससे मैंने जाना कि महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार की रिपोर्टिंग करना सॉफ्ट यानी ‘आसान काम’ नहीं है, जैसा मैं पहले सोच रही थी। हमारे देश में इस तरह के मामले जाति और वर्ग (caste and class) में उलझकर रह जाते हैं।’
आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक पर बरखा दत्त के पूरे आर्टिकल को पढ़ सकते हैं:
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