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जानिए, 'कश्मीर विवाद' को लेकर क्या है हिंदी पत्रकारों की सोच
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर हमेशा से ही विवादों में रहा है। लेकिन इस विवाद को हिंदी पत्रकार किस नजरिए से देखते हैं, इसे लेकर एक सर्वे कराया गया है। इस सर्वे में 49 फीसदी हिंदी पत्रकारों ने कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए कश्मीरियों से बातचीत को बेहतरीन विकल्प माना है, जबकि 10 फीसदी पत्रकारों को लगता है कि सै
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर हमेशा से ही विवादों में रहा है। लेकिन इस विवाद को हिंदी पत्रकार किस नजरिए से देखते हैं, इसे लेकर एक सर्वे कराया गया है। इस सर्वे में 49 फीसदी हिंदी पत्रकारों ने कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए कश्मीरियों से बातचीत को बेहतरीन विकल्प माना है, जबकि 10 फीसदी पत्रकारों को लगता है कि सैन्य बलों के जरिए ही इस मुद्दे का समाधान संभव है।
इतना हीं नहीं 55 फीसदी पत्रकारों को लगता है कि कश्मीर में अलगाववाद की भावना पाकिस्तान की वजह से उपजी है, जबकि 45 फीसदी पत्रकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते ।
मीडिया स्टडीज ग्रुप एमएसजी की ओर से हिंदी के पत्रकार और कश्मीर विषय पर किए गए एक सर्वेक्षण में 61 फीसदी हिंदी पत्रकारों ने यह भी माना कि कश्मीर मुद्दे पर दिल्ली और देश के अन्य राज्यों के प्रमुख अखबारों की भूमिका सराहनीय नहीं है।
हिंदी के पत्रकारों के मन में कश्मीर और कश्मीरियों के प्रति भावना को परखने के मकसद से यह ऑनलाइन सर्वेक्षण 16 सितंबर से 22 अक्तूबर के बीच किया गया, जिसमें 80 से ज्यादा हिंदी के पत्रकारों ने हिस्सा लिया । इस सर्वेक्षण में कुल 21 सवाल पूछे गए थे ।
सर्वेक्षण में शामिल हुए 76 फीसदी पत्रकारों ने माना कि कश्मीर से सिर्फ हिंदुओं का नहीं, बल्कि मुस्लिमों और अन्य कश्मीरियों का भी विस्थापन हुआ है, जबकि 34 फीसदी पत्रकारों को यह नहीं पता कि ‘पंडित’ सरनेम का इस्तेमाल करने वाले कश्मीरी हिंदू ही नहीं होते, बल्कि कश्मीरी मुस्लिम भी होते हैं ।
इस सर्वेक्षण में शामिल हुए 51 फीसदी पत्रकारों ने माना कि हिंदी पट्टी के लोगों में कश्मीर के प्रति अलगाववादी भावना रहती है। सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 58 फीसदी पत्रकारों ने कहा कि वे कश्मीर के झंडे की पहचान नहीं कर सकते जबकि 68 फीसदी पत्रकारों को यह पता नहीं है कि हुर्रियत कांफ्रेंस के नरमपंथी धड़े के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक दरअसल धार्मिक प्रमुख हैं।
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