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सरकारी मिजाज में आई ये नरमी मीडिया संस्थानों को कुछ यूं पहुंचा रही राहत

मीडिया से नाराज़गी कोई मोल लेना नहीं चाहता, खासकर नेता तो बिल्कुल...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

मीडिया से नाराज़गी कोई मोल लेना नहीं चाहता, खासकर नेता तो बिल्कुल भी नहीं। शायद यही वजह है कि कल तक मीडिया को मिलने वाले विज्ञापनों को फिजूलखर्ची बताने वाली मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार अब खुद भी इसी राह पर चल निकली है। शुरुआत के कुछ दिन तो मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अंधाधुंध विज्ञापन जारी करने की पूर्ववर्ती सरकार की अघोषित परंपरा को बंद करा दिया था, लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि ऐसे काम नहीं चल पाएगा।

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस समर्थक कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने भी कमलनाथ को समझाया कि विज्ञापन न मिलने की सूरत में मीडिया नकारात्मक ख़बरों पर फोकस कर सकता है और यदि ऐसा हुआ तो लोकसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ेगा। अब वजह चाहे जो भी हो, राज्य सरकार के मिजाज में आई इस नरमी ने मीडिया संस्थानों को काफी राहत पहुंचाई है। जिस तरह से शुरुआत में सरकार ने विज्ञापन जारी करने में कंजूसी दिखाई थी, उससे मीडिया संस्थानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। अपने एक महीने के कार्यकाल में कमलनाथ सरकार की तरफ से केवल एक या दो विज्ञापन ही जारी किये गए थे और वो भी केवल चुनिंदा एडिशन के लिए। इसके मद्देनज़र कुछ संस्थानों ने तो कॉस्ट-कटिंग का फ़ॉर्मूला भी तैयार कर लिया था, हालांकि अब उम्मीद है कि उन्हें फ़ॉर्मूले के इस्तेमाल की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

पिछले कुछ दिनों से राज्य सरकार द्वारा प्रमुख अख़बारों में लगातार विज्ञापन देकर अपनी उपलब्धियों का बखान किया जा रहा है। केवल प्रिंट ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी विज्ञापन जारी करने में कल की ‘कंजूस’ सरकार आज दरियादिली दिखा रही है। रेडियो पर तो आलम यह हो चला है कि कभी-कभी गानों से ज्यादा कांग्रेस सरकार के विज्ञापन सुनाई दे जाते हैं। इसके अलावा फ्लेक्स, बैनर और होर्डिंग पर भी मुख्यमंत्री नज़र आ जाते हैं।

हालांकि, ये बात अलग है कि कमलनाथ अब भी यह कहते नहीं थक रहे कि उनकी सरकार विज्ञापन से ज्यादा विकास पर जोर दे रही है। वैसे इतना ज़रूर है कि शिवराज काल में जहां छोटे-बड़े सभी मीडिया संस्थानों पर विज्ञापनों की बरसात हो जाया करती थी, वो अब तक कांग्रेस राज में देखने को नहीं मिली है। लेकिन जिस तरह से कमलनाथ ने ‘कंजूसी’ कुर्बान करने का मन बनाया है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले दिनों में ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाले भाजपाई नारे को कांग्रेस भी आत्मसात करनी नज़र आएगी।

जानकार इसकी वजह यह मानते हैं कि कांग्रेसी विचारधारा से प्रभावित मीडिया संस्थानों को विज्ञापन देना कमलनाथ की मज़बूरी है और यही मज़बूरी एक दूसरी मज़बूरी को भी जन्म देती है। यदि सरकार विज्ञापन जारी करने में भेदभाव करती है तो मीडिया में उसके खिलाफ असंतोष उत्पन्न होगा, जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे। लिहाजा, कमलनाथ को मज़बूरी में ही सही, विज्ञापन जारी करने होंगे। कुछ पत्रकार यह भी मानते हैं कि जनता तक अपनी उपलब्धियों को पहुंचाने के लिए सरकार को मीडिया का साथ चाहिए  और इसके लिए उसे विज्ञापन भी देने होंगे। विज्ञापन बंद करके सरकार नहीं चलाई जा सकती। जबकि कुछ का कहना है कि विज्ञापनों को लेकर आई तेजी लोकसभा चुनाव को लेकर है। बहरहाल मीडिया संस्थानों और उनसे जुड़े पत्रकारों के लिए फ़िलहाल सरकार का यह रुख राहत भरा है।


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