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हैप्पी बर्थडे लालकृष्ण आडवाणी: वो आपके 'ऑर्गनाइजर' के दिन...

समचार4मीडिया ब्यूरो ।। एल.के.आडवाणी देश के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं, जो पत्रकारिता करते करते राजनीति के शीर्ष पर पहुंच गए। लेकिन हिंदुत्व हार्डलाइनर माने जाने वाले इन नेता ने गंभीर विषयों पर तमाम भाषण दिए हों, ब्लॉग लिखे हों, लेकिन पत्रकारिता उन्होंने फिल्मो

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

समचार4मीडिया ब्यूरो ।।

एल.के.आडवाणी देश के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं, जो पत्रकारिता करते करते राजनीति के शीर्ष पर पहुंच गए। लेकिन हिंदुत्व हार्डलाइनर माने जाने वाले इन नेता ने गंभीर विषयों पर तमाम भाषण दिए हों, ब्लॉग लिखे हों, लेकिन पत्रकारिता उन्होंने फिल्मों की ही की। उन्हें खुद को फिल्म क्रिटिक कहलाना पसंद था। इतना ही नहीं जब पहली बार जनता पार्टी की सरकार आई तो वे मीडिया वालों के ही मंत्री बने, मोरारजी देसाई सरकार में जहां अटलजी को विदेश मंत्रालय दिया गया तो आडवाणी को सूचना-प्रसारण मंत्रालय दिया गया।

आडवाणी ने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘माई कंट्री माई लाइफ’ में अपने पत्रकारिता के दिनों के बारे में लिखा है। वो संघ के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ से ही प्रमुख तौर पर जुड़े रहे, तो चैप्टर का नाम भी ‘द ऑर्गनाइजर ईयर्स’ ही रखा है।

इसमें उन्होंने लिखा है कि मां की मौत तो बहुत जल्द ही हो गई थी, कराची से माइग्रेशन के बाद पापा कांदला के निकट आदीपुर में सिंधु रिसैटलमेंट कॉरपोरेशन में तैनात थे और मैं पहले बतौर प्रचारक राजस्थान, फिर दिल्ली में संघ का काम करता रहा। पिताजी रिटायर होने वाले थे, उनके साथ-साथ एक कजिन की जिम्मेदारी थी मेरे ऊपर, तो मैंने अपनी चिंता दीनदयाल जी के साथ शेयर की। दीनदयाल जी ने कहा कि तुम्हें तो लिखने का काफी शौक है, क्यों नहीं ऑर्गनाइजर में जॉब कर लेते? वो भी तो संगठन का काम है। उस जनरल को भी तुम्हारे जैसे व्यक्ति की जरूरत है। तब मैं 1960 में ऑर्गनाइजर में बतौर असिस्टेंट एडिटर जुड़ गया।

उस वक्त तक ऑर्गनाइजर को 13 साल हो चुके थे, और कम सर्कुलेशन के बावजूद वो पढ़े लिखे तबके में अपनी अच्छी पहचान बना चुका था। उसके एडिटर के आर. मलकानी, जो खुद एक अच्छे राइटर थे, मुझे सिंध में प्रचारक के दिनों से जानते थे, आजादी से पहले ही। हमने 1946 में अपनी ओटीसी (संघ का ट्रेनिंग कैम्प) नागपुर में साथ साथ किया था। वो मुझे ना केवल एक संघ कार्यकर्ता बल्कि राजस्थान के ऑर्गनाइजर कॉरस्पोंडेंट के तौर पर भी जानते थे। उस वक्त में राजस्थान में राजनीतिक हलचलों और विधान सभा की गतिविधियों पर रिपोर्ट भेजा करता था। अब मैं उनका स्टाफ था, उन्होंने मुझे काफी क्रिएटिव फ्रीडम दी। बहुत जल्द अखबार में मेरे तीन कॉलम अलग अलग नामों से शुरू हो गए।

उस वक्त मेरी सैलरी केवल साढ़े तीन सौ रुपए ही थी। उस वक्त भी ये रकम ज्यादा नहीं थी।

 ऑर्गनाइजर वैसे भी कोई कॉमर्शियल पेपर नहीं था, उन दिनों मीडिया में बहुत अच्छी सैलरी मिलती भी नहीं थी। जो इस फील्ड में आते भी थे, तो या तो वो लोग आते है, जिनका इस फील्ड की तरफ बहुत ज्यादा रुझान होता था, या फिर जो बहुत आदर्शवादी होते थे और अपनी बात रखने के लिए जिन्हें प्लेटफॉर्म चाहिए होता था।

उस वक्त मेरी जरुरतें बहुत साधारण थीं, मेरी कमाई मेरे लिए काफी थी। लेकिन एक असली फायदा जो मुझे मिला वो था एक्रीडेशन। मुझे आर.के.पुरम में एक घर अलॉट हो गया, सरकार सालाना चार पत्रकारों को कोटे से घर देती थी। हालांकि वेटिंग लिस्ट में मैं बहुत नीचे था और उस साल एलिजिबल भी नहीं था, लेकिन आर.के.पुरम में कॉलोनी नई बसी थी, और उस वक्त बहुत दूर समझी जाती थी। तो जो लोग एलिजिबल थे, उन्होंने वहां जाने से मना कर दिया और मकान मुझे मिल गया।

ऑर्गनाइजर जॉइन करने से पहले मैं आरएसएस का प्रचारक हो गया था, सो पैंट शर्ट छोड़कर धोती-कुर्ता पहनने लगा था। ऑर्गनाइजर के ऑफिस में वहीं पहनकर आने लगा, तो साथियों ने टोका कहा कि ये ड्रेस तो नेताओं की है। हालांकि मैंने कभी नहीं माना कि पैंट शर्ट पहनकर आप मॉर्डन हो जाते हैं, लेकिन मैंने साथियों की सलाह पर फिर से शर्ट और ट्राउजर पहनना शुरू कर दिया।

एक दिन एडिटोरियल रिव्यू मीटिंग में हम सबने डिस्कस किया कि हमारे लेख केवल एडिटोरियल होते हैं, कभी- कभी बोरियत हो जाती है। रीडर्स कुछ और भी पढ़ना चाहते हैं, मलकानी जी ने कहा कि हां, मैं भी सोचता हूं हमें सोसायटी के कुछ और विषयों पर लिखना चाहिए, जैसे फिल्में, लेकिन लिखेगा कौन? तो मैंने अपना नाम बढ़ा दिया और उस दिन से मेरा एक फिल्मी कॉलम शुरू किया और मैंने उसमें अपना पेन नेम रखा ‘नेत्र’।

बतौर एक फिल्म क्रिटिक मुझे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स और दिल्ली के तमाम फिल्मी फंक्शंस अटैंड करने का मौका मिला। अक्टूबर 1961 में मलकानी जी को हॉवर्ड की फेलोशिप मिली और वो दो साल के लिए अमेरिका चले गए। मुझे एक्टिंग एडिटर बना दिया गया। उस दौरान जो सबसे बड़ा मुझे अनुभव मिला, वो था 1962 में भारत-चीन के युद्ध को लेकर लिखना, हफ्तों तक काफी पैशन के साथ हमने काम किया। उस वक्त हमने चीन को लेकर, तिब्बत को लेकर पटेल ने अपने मरने से पहले जो चिंताएं व्यक्त की थीं, उनको जमकर अपने पेपर में छापा। पटेल आखिरकार सही साबित हो रहे थे।

युद्ध के बाद सरकार ने 6 विदेशी और 6 भारतीय पत्रकारों को लद्दाख बॉर्डर पर स्थिति का जायजा लेने के लिए भेजा और तब पहली बार हमने महसूस किया कि हमारे जवानों के लिए इस दुर्गम जगह पर युद्ध लड़ना कितना नामुमकिन सा काम था। इतनी ऊंचाई पर सांस भी लेना मुश्किल था। उसके बाद उस सीमा की सुरक्षा के लिए आईटीबीपी फोर्स बनाई गई। उसके बाद जब जब मैं कश्मीर या उस सीमा पर कभी भी गया, कोशिश की कि उनसे मिलूं, उनके कैम्पों में जाऊं। आरएसएस ने भी उनके लिए देश भर में ब्लड डोनेशन कैम्पस आयोजित किए थे।

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